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25 वर्षों के बाघ संरक्षण कार्यों के लिए उपेन्द्र कुमार दुबे सम्मानित, उपमुख्यमंत्री ने किया सम्मान

मुंगेली।  TODAY छत्तीसगढ़  / विश्व बाघ दिवस के अवसर पर अचानकमार टाइगर रिजर्व के शिवतराई में आयोजित जनजागरूकता एवं संरक्षण कार्यक्रम में WWF-India के वरिष्ठ परियोजना अधिकारी उपेन्द्र कुमार दुबे को बाघ, वन्यजीव एवं जैवविविधता संरक्षण के क्षेत्र में 25 वर्षों के योगदान के लिए सम्मानित किया गया।

छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री अरुण साव ने उन्हें प्रशस्ति-पत्र और स्मृति-चिह्न प्रदान कर सम्मानित किया। विज्ञप्ति में बताया गया है कि उपेन्द्र कुमार दुबे पिछले 25 वर्षों से मध्य भारत के विभिन्न संरक्षित वन क्षेत्रों एवं टाइगर रिजर्वों में वन्यजीव संरक्षण और वैज्ञानिक प्रबंधन से जुड़े कार्यों में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

उन्होंने अचानकमार, कान्हा, बांधवगढ़, संजय-डुबरी, पेंच, वीरांगना रानी दुर्गावती, उदंती-सीतानदी तथा गुरु घासीदास-तमोर पिंगला टाइगर रिजर्व सहित अनेक संरक्षित क्षेत्रों में बाघ संरक्षण, जैवविविधता संवर्धन, वन्यजीव मॉनिटरिंग और तकनीकी सहयोग प्रदान किया है।

आधिकारिक जानकारी के अनुसार, भारत सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा आयोजित ऑल इंडिया टाइगर एस्टिमेशन (All India Tiger Estimation) कार्यक्रम में वर्ष 2010 से वह मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ वन विभाग के लिए मास्टर ट्रेनर के रूप में सेवाएं दे रहे हैं। इसके अलावा वह छत्तीसगढ़ राज्य वन्यप्राणी मंडल में WWF-India के प्रतिनिधि सदस्य के रूप में भी संरक्षण और जैवविविधता से जुड़े विषयों पर सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

कार्यक्रम में मौजूद जनप्रतिनिधियों, वन विभाग के अधिकारियों और अन्य अतिथियों ने उपेन्द्र कुमार दुबे को इस सम्मान के लिए बधाई देते हुए उनके दीर्घकालीन संरक्षण कार्यों की सराहना की।


बाघ संरक्षण और जनभागीदारी पर केंद्रित रहा अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस कार्यक्रम

मुंगेली।
  TODAY छत्तीसगढ़  /  अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस के अवसर पर बुधवार को शिवतराई बैगा रिसॉर्ट में अचानकमार टाइगर रिजर्व द्वारा जनजागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, कार्यक्रम का उद्देश्य बाघ संरक्षण, वन्यजीवों की सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ाना था।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि उपमुख्यमंत्री अरुण साव और विशिष्ट अतिथि जिला पंचायत अध्यक्ष श्रीकांत पाण्डेय सहित अन्य जनप्रतिनिधि उपस्थित रहे। कार्यक्रम की शुरुआत उपमुख्यमंत्री द्वारा WWF की ओर से अचानकमार टाइगर रिजर्व को उपलब्ध कराए गए स्निफर डॉग रैपिड एक्शन फोर्स पेट्रोलिंग वाहन (बोलेरो कैंपर) को हरी झंडी दिखाकर रवाना करने के साथ हुई।

अचानकमार टाइगर रिजर्व की स्निफर डॉग 'नीतू' वर्ष 2025 में राष्ट्रीय डॉग प्रशिक्षण केंद्र, पंचकूला (हरियाणा) से प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद वन एवं वन्यजीव संरक्षण कार्य में तैनात है। विभाग का दावा है कि नीतू ने अब तक छत्तीसगढ़ के पांच वनमंडलों में छह गंभीर वन्यजीव अपराधों के खुलासे में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

कार्यक्रम में अचानकमार टाइगर रिजर्व के उप संचालक अभिनव कुमार ने बाघ संरक्षण के लिए किए जा रहे प्रयासों की जानकारी दी। कलेक्टर कुंदन कुमार ने बाघों को वन पारिस्थितिकी तंत्र का प्रमुख संरक्षक बताते हुए जिला प्रशासन की ओर से संरक्षण कार्यों में सहयोग का भरोसा दिलाया। वहीं, मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) एवं क्षेत्रीय निदेशक प्रियंका पाण्डेय ने बाघों की गणना, सुरक्षा तकनीकों और संरक्षण अभियानों की जानकारी साझा करते हुए स्थानीय वनग्रामों के लोगों से संरक्षण में सक्रिय भागीदारी की अपील की।

अपने संबोधन में उपमुख्यमंत्री अरुण साव ने कहा कि बाघ केवल एक वन्यजीव नहीं, बल्कि स्वस्थ जंगलों और पर्यावरण संतुलन के प्रतीक हैं। उन्होंने कहा कि बाघों का संरक्षण जल स्रोतों, जैव विविधता और पर्यावरण सुरक्षा से सीधे जुड़ा हुआ है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'एक पेड़ मां के नाम' अभियान का उल्लेख करते हुए अधिक से अधिक वृक्षारोपण और पौधों के संरक्षण का भी संदेश दिया। साथ ही अचानकमार टाइगर रिजर्व में बाघ संरक्षण, पर्यटन विकास और स्थानीय लोगों के रोजगार सृजन के प्रयासों की सराहना की। 

कार्यक्रम के दौरान बाघिन 'झुमरी' की बांधवगढ़ से अचानकमार तक की यात्रा और उसके प्रजनन पर आधारित एक लघु फिल्म भी प्रदर्शित की गई, जिसमें वन्यजीव कॉरिडोर और बाघ संरक्षण के महत्व को दर्शाया गया।

आधिकारिक जानकारी के अनुसार, कार्यक्रम में WWF के वरिष्ठ परियोजना अधिकारी उपेन्द्र दूबे, गोंड एवं गोदना कला के लिए रागिनी ध्रुव और तान्या मरावी सहित विभिन्न क्षेत्रों में योगदान देने वाले लोगों को सम्मानित किया गया। इसके अलावा अचानकमार टाइगर रिजर्व के 20 उत्कृष्ट वनकर्मियों को मेडल, प्रशस्ति पत्र और ₹1,000 की प्रोत्साहन राशि प्रदान की गई। वनग्रामों के विद्यार्थियों के लिए आयोजित चित्रकला प्रतियोगिता के विजेताओं को भी पुरस्कार एवं प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया।

कार्यक्रम में जनप्रतिनिधियों, वन विभाग एवं जिला प्रशासन के अधिकारियों, पूर्व आईएफएस अधिकारी, स्कूली छात्र-छात्राओं, ग्रामीणों और पर्यावरण प्रेमियों ने भाग लिया।



अचानकमार टाइगर रिजर्व: आनुवंशिक विविधता की एक जीवंत कहानी

जंगल की असली कहानी केवल बाघों की संख्या नहीं है जब हम किसी जंगल के बारे में सोचते हैं, तो सबसे पहले हमारे मन में एक सवाल आता हैवहाँ कितने बाघ हैं? लेकिन बाघ संरक्षण की असली कहानी केवल संख्या से पूरी नहीं होती। किसी जंगल में क्षमता के अनुरूप पर्याप्त बाघ होना निश्चित रूप से अच्छी बात है, लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण यह है कि उन बाघों के बीच आनुवंशिक विविधता कितनी है। क्या वे सभी एक ही परिवार से हैं? या अलग-अलग जंगलों से आए बाघ यहाँ मिल रहे हैं, प्रजनन कर रहे हैं और नई पीढ़ी को जन्म दे रहे हैं

यही वह सवाल है, जिसका उत्तर हमें अचानकमार टाइगर रिजर्व में मिलता है। अचानकमार के जंगलों में रहने वाले सभी बाघ स्थानीय नहीं हैं। कुछ बाघ दूर-दराज के दूसरे टाइगर रिजर्वों से जंगलों और प्राकृतिक वन्यजीव कॉरिडोरों के रास्ते यहाँ पहुँचे हैं। उन्होंने यहाँ अपना क्षेत्र बनाया, साथी चुना और शावकों को जन्म दिया। इस तरह अचानकमार केवल बाघों का घर नहीं रहा, बल्कि अलग-अलग जंगलों से आने वाले बाघों के जीन के मिलन का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया है। यही कारण है कि अचानकमार को समझने के लिए केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि यहाँ कितने बाघ हैं। यह देखना भी जरूरी है कि ये बाघ कहाँ-कहाँ से आए हैं।

अचानकमारप्रकृति की अद्भुत देन

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर और मुंगेली जिलों में स्थित अचानकमार टाइगर रिजर्व का इतिहास बहुत पुराना है। वर्ष 1975 में इसे वन्यजीव अभयारण्य घोषित किया गया था। उस समय इसका क्षेत्रफल 551.552 वर्ग किलोमीटर था। बाद में 9 फरवरी 2009 को इसे टाइगर रिजर्व का दर्जा मिला और इसका क्षेत्र बढ़ाकर 914.017 वर्ग किलोमीटर कर दिया गया। इसमें 626.195 वर्ग किलोमीटर कोर क्षेत्र और 287.822 वर्ग किलोमीटर बफर क्षेत्र शामिल हैं।

सतपुड़ा और मैकल पर्वतमालाओं की गोद में बसा अचानकमार प्रकृति की अनोखी सुंदरता से भरपूर है। यहाँ ऊँचे-ऊँचे पहाड़ हैं, गहरी घाटियाँ हैं, विस्तृत पठार हैं, चट्टानी करार हैं, प्राकृतिक गुफाएँ हैं और कहीं-कहीं खुले घास के मैदान भी हैं। घने साल के जंगलों के बीच सागौन और बाँस के वन इस पूरे क्षेत्र को और समृद्ध बनाते हैं। यहाँ बाघ के साथ-साथ तेंदुआ, हाथी, भालू, ढोल, भेड़िया, लकड़बग्घा, सियार, लोमड़ी, गौर, सांभर, चीतल, चौसिंघा, कोटरी, मूषक हिरण और जंगली सूअर जैसे अनेक वन्यजीव पाए जाते हैं। भरपूर शिकार, पानी और सुरक्षित वन क्षेत्रये सभी मिलकर अचानकमार को बाघों के लिए एक आदर्श घर बनाते हैं।

बाघों की संख्या से आगे की कहानी

यदि किसी जंगल में बाघों की आबादी लंबे समय तक अलग-थलग रहे और केवल आपस में ही प्रजनन करती रहे, तो इनब्रीडिंग का खतरा बढ़ सकता है। इससे आने वाली पीढ़ियों में रोगों के प्रति संवेदनशीलता, शारीरिक कमजोरी और प्रजनन क्षमता में कमी जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। लेकिन जब कोई बाघ दूसरे जंगल से आता है और स्थानीय बाघों के साथ प्रजनन करता है, तो वह अपने साथ नए जीन भी लाता है। यही जीन विविधता आने वाली पीढ़ियों को अधिक स्वस्थ और मजबूत बनाती है। इसलिए कहा जा सकता है: वन्यजीव कॉरिडोर केवल जंगलों को नहीं जोड़ते, वे बाघों के जीन को भी जोड़ते हैं।

अचानकमार की विशेषता यह है कि यहाँ आने वाले कई बाघों की कहानी दूसरे टाइगर रिजर्वों से जुड़ी हुई है, जो हमें कॉरिडोर का महत्व बताते है।

बाघों की यात्राएँकॉरिडोर और जीन विविधता की कहानी

अचानकमार टाइगर रिजर्व में पाए जाने वाले बाघों की कहानियाँ इसके सक्रिय वन्यजीव कॉरिडोरों और आनुवंशिक विविधता का जीवंत प्रमाण हैं। AKT-8 (झुमरी) बांधवगढ़ से प्राकृतिक रूप से अचानकमार पहुँची, यहाँ सफलतापूर्वक प्रजनन कर रही है और उसकी संतति इस कॉरिडोर की महत्ता को दर्शाती है। AKT-14 पेंच से होते हुए अचानकमार पहुँची और यहाँ दूसरी बार प्रजनन कर रही है, जो पेंचकान्हाअचानकमार परिदृश्य के आपसी जुड़ाव को प्रमाणित करता है। AKT-22 का कान्हा से अचानकमार आगमन स्थानीय बाघ आबादी में नए जीन के प्रवाह का महत्वपूर्ण उदाहरण है। वहीं ATR-16, जिसे सूरजपुर में मानवबाघ संघर्ष के दौरान घायल अवस्था में रेस्क्यू कर उपचार के बाद अचानकमार में छोड़ा गया, आज सफलतापूर्वक प्रजनन कर रही है और संरक्षण की सफलता की कहानी कहती है।रजनीनामक एक उम्रदराज बाघिन, जिसे 2021 में गंभीर रूप से घायल अवस्था में रेस्क्यू किया गया था, लगभग एक वर्ष की देखभाल के बाद बच नहीं सकी; लेकिन कैमरा ट्रैप और वैज्ञानिक पहचान से यह पता चला कि उसका जन्म 2009 में बांधवगढ़ में हुआ था। उसकी जीवन-यात्रा भी बांधवगढ़अचानकमार के बीच वर्षों से सक्रिय प्राकृतिक संपर्क का प्रमाण है।

बाघ केवल आते नहींआगे भी जाते हैं

अचानकमार में केवल दूसरे जंगलों से बाघ आते ही नहीं हैं। कई युवा बाघ बड़े होने के बाद अपना नया क्षेत्र खोजने के लिए अचानकमार से आगे भी निकलते हैं। यही प्रकृति का नियम है। एक युवा नर या मादा बाघ जब अपनी जन्मभूमि छोड़ता है, तो वह नए क्षेत्र की तलाश में जंगलों के बीच यात्रा करता है।

इसी यात्रा के दौरान वह दूसरे जंगलों तक पहुँचता है और अपने साथ नए जीन ले जाता है। कैमरा ट्रैप निगरानी और वैज्ञानिक बाघ पहचान से यह स्पष्ट हुआ है कि अचानकमार मध्य भारत के विभिन्न जंगलों के बीच एक महत्वपूर्ण जैविक सेतु की भूमिका निभा रहा है।

अचानकमार से जुड़े प्रमुख वन्यजीव कॉरिडोर

कान्हाअचानकमार कॉरिडोर - मैकल पर्वतमाला के घने जंगलों से होकर मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के वन क्षेत्रों को जोड़ता है। यह बाघ, हाथी, तेंदुए और अन्य वन्यजीवों के आवागमन का महत्वपूर्ण मार्ग है।

अचानकमारबांधवगढ़ कॉरिडोर - मैकल और विंध्य पर्वतमालाओं के बीच एक प्राकृतिक सेतु है, जो मरवाही क्षेत्र से होते हुए बांधवगढ़ तक जाता है। झुमरी और रजनी जैसी बाघिनों की यात्राएँ इसकी महत्ता का जीवंत प्रमाण हैं।

उत्तर-पूर्वी कॉरिडोर - अचानकमार को छत्तीसगढ़ के उत्तरी वन क्षेत्रों से जोड़ते हुए गुरु घासीदासतैमोर पिंगला और आगे झारखंड के पलामू क्षेत्र तक पहुँचता है। इन जुड़े हुए जंगलों में बाघों, हाथियों और अन्य वन्यजीवों की आवाजाही होती रहती है।

कॉरिडोरों  संरक्षण से सुरक्षित होगा बाघों, हाथियों तथा अन्य वन्यप्राणियों का भविष्य

कॉरिडोर बचेंगे, तभी बाघ बचेंगे -कल्पना कीजिए कि जंगलों के बीच बने प्राकृतिक रास्ते अचानक बंद हो जाएँ और सड़कें, रेल लाइनें, खनन, बस्तियाँ या अन्य विकास कार्य जंगलों को छोटे-छोटे हिस्सों में बाँट दें। ऐसी स्थिति में बाघों के लिए एक जंगल से दूसरे जंगल तक जाना कठिन हो जाएगा और धीरे-धीरे अलग-अलग बाघ आबादियाँ एक-दूसरे से अलग हो सकती हैं। इससे उनके बीच जीन का आदान-प्रदान कम होगा और भविष्य में आनुवंशिक विविधता के लिए खतरा उत्पन्न हो सकता है। इसके विपरीत, यदि जंगल जुड़े रहें और कॉरिडोर सुरक्षित रहें, तो युवा बाघ सुरक्षित रूप से नए क्षेत्र खोज सकते हैं, दूसरे क्षेत्रों की बाघ आबादियों तक पहुँच सकते हैं और नई पीढ़ियों में नए जीन का प्रवाह बनाए रख सकते हैं। इसलिए कॉरिडोर केवल जंगलों के बीच बने रास्ते नहीं हैं, बल्कि बाघों के भविष्य की जीवनरेखाएँ हैं। बाघ संरक्षण का अर्थ केवल टाइगर रिजर्व की सीमाओं की रक्षा करना नहीं, बल्कि उन जंगलों और वन क्षेत्रों को भी सुरक्षित रखना है जो एक टाइगर रिजर्व को दूसरे से जोड़ते हैंक्योंकि कई बार बाघ का भविष्य टाइगर रिजर्व के अंदर नहीं, बल्कि दो टाइगर रिजर्वों के बीच स्थित जंगलों में तय होता है।

अचानकमार टाइगर रिजर्व से जुड़े वन्यजीव कॉरिडोरों की महत्ता केवल बाघों के आवागमन तक सीमित नहीं है, बल्कि ये मध्य भारत में बाघों के दीर्घकालिक अस्तित्व और आनुवंशिक विविधता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। जब कान्हा, बांधवगढ़, पेंच, गुरु घासीदासतैमोर पिंगला और अन्य वन क्षेत्रों के बीच प्राकृतिक संपर्क बना रहता है, तो बाघ एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक आवागमन कर सकते हैं, नए क्षेत्रों में बस सकते हैं और अलग-अलग आबादियों के बीच जीन का आदान-प्रदान संभव होता है। यही जीन प्रवाह बाघों की आनुवंशिक विविधता को बनाए रखने और आने वाली पीढ़ियों को स्वस्थ एवं मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसलिए कॉरिडोर केवल जंगलों को जोड़ने वाले प्राकृतिक मार्ग नहीं, बल्कि मध्य भारत के बाघों के भविष्य की जीवनरेखाएँ हैं। यदि ये कॉरिडोर सुरक्षित रहेंगे, तो बाघों की आवाजाही, जीन प्रवाह और प्राकृतिक आबादियों का आपसी जुड़ाव भी बना रहेगाऔर यही बाघ संरक्षण की वास्तविक सफलता होगी। 

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