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सूरजपुर: गर्लफ्रैंड के सामने ही वन कर्मचारी से मारपीट, गाना बजाकर नाचने के लिए कहा

सांकेतिक तस्वीर 
सूरजपुर।  TODAY छत्तीसगढ़  / छत्तीसगढ़ के सूरजपुर ज़िले से एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें वर्दी पहने एक व्यक्ति के साथ कुछ युवकों द्वारा मारपीट की जाती दिख रही है। स्थानीय लोगों का दावा है कि वीडियो कोतवाली थाना क्षेत्र के एक नर्सरी परिसर का है और उसमें दिख रहा व्यक्ति वन विभाग का कर्मचारी है।

सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो में कुछ युवक वनकर्मी से बहस करते और फिर उसके साथ मारपीट करते दिखाई देते हैं। वीडियो में यह भी देखा जा सकता है कि उसे गाना बजाकर नाचने के लिए कहा जा रहा है। स्थानीय सूत्रों का कहना है कि संबंधित कर्मचारी एक महिला के साथ नर्सरी परिसर में मौजूद था, जिसे लेकर कुछ युवकों ने आपत्ति जताई। इसके बाद कथित तौर पर विवाद बढ़ गया और मारपीट की घटना हुई।

इस मामले में अब तक पुलिस की ओर से कोई विस्तृत आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। कोतवाली थाना क्षेत्र की पुलिस ने कहा है कि वायरल वीडियो की जांच की जा रही है और तथ्यों की पुष्टि के बाद आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।  

ATR में नए सफारी वाहनों की शुरुआत, उप मुख्यमंत्री ने सौंपी चाबियां

बिलासपुर। TODAY छत्तीसगढ़  / प्रदेश के उप मुख्यमंत्री अरुण साव शुक्रवार को अचानकमार टाइगर रिजर्व स्थित शिवतराई बैगा रिसॉर्ट पहुंचे। यहां स्थानीय छात्र-छात्राओं और कलाकारों ने पारंपरिक लोक नृत्य प्रस्तुत कर उनका आत्मीय स्वागत किया। इस दौरान उप मुख्यमंत्री ने सदा सोहागी महिला स्व-सहायता समूह, सिवलखार द्वारा संचालित टाइगर केंटीन और सोविनियर शॉप का निरीक्षण किया।

सोविनियर शॉप में महिला समूह की सदस्य कु. रागिनी धुर्वे ने गोंडी आर्ट पेंटिंग तथा कु. तान्या मरावी ने अचानकमार टाइगर रिजर्व का प्रतीक चिन्ह भेंट कर उनका स्वागत किया। उप मुख्यमंत्री ने महिला समूहों के आत्मनिर्भरता प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि यह ग्रामीण सशक्तिकरण का उत्कृष्ट उदाहरण है और ऐसे प्रयासों से स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल रही है।

इस अवसर पर वन एवं वन्यप्राणियों की सुरक्षा में तैनात प्रशिक्षित वाइल्ड लाइफ स्निफर डॉग ‘नीतू’ ने सलामी देकर उप मुख्यमंत्री का सम्मान किया। श्री साव ने नीतू द्वारा किए जा रहे सर्चिंग और सुरक्षा कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि वन्यजीव संरक्षण में प्रशिक्षित टीमों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।

उप मुख्यमंत्री ने अचानकमार, सिवलखार और रंजकी वन प्रबंधन समितियों द्वारा क्रय किए गए पांच नए ‘योद्धा’ (महारानी) सफारी वाहनों की चाबी संबंधित समिति अध्यक्षों को सौंपकर उनका शुभारंभ किया। इसके साथ ही स्पेशल टाइगर प्रोटेक्शन टीम को ट्रेकिंग शू और टॉर्च वितरित किए गए, जिससे जंगल में गश्त और सुरक्षा कार्य और अधिक प्रभावी हो सके।  

नए सफारी वाहनों के शुरू होने से पर्यटकों को बेहतर सुविधा मिलने और पर्यटन गतिविधियों में वृद्धि की उम्मीद है। इससे स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे। उप मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार वन्यजीव संरक्षण के साथ-साथ स्थानीय समुदायों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए प्रतिबद्ध है, ताकि विकास और संरक्षण दोनों को साथ लेकर आगे बढ़ा जा सके। इस दौरान महावत शिवमोहन राजवाड़े को हाथियों के संरक्षण, देखभाल और कल्याण में उनके दीर्घकालीन योगदान के लिए सम्मानित किया गया। इस ख़ास मौके पर अचानकमार टाईगर रिजर्व प्रबंधन के सभी अधिकारी, कर्मचारी मौजूद रहे। 


ATR: जब जंगल में बाघ मरा और व्यवस्था खामोश रही


बिलासपुर।
  TODAY छत्तीसगढ़  /  आज 26 जनवरी को छत्तीसगढ़ के अचानकमार टाइगर रिज़र्व से आई एक ख़बर ने केवल वन्यजीव प्रेमियों को नहीं, बल्कि लोकतंत्र में जवाबदेही पर भरोसा रखने वाले हर नागरिक को असहज कर दिया। जंगल के भीतर एक युवा नर बाघ मृत पाया गया। आधिकारिक बयान आया, मौत दो बाघों के बीच आपसी संघर्ष का नतीजा है। फ़ाइलें चलीं, पोस्टमार्टम हुआ, रिपोर्ट बनी और मामला लगभग बंद मान लिया गया है। गणतंत्र दिवस के मौके पर आज जब तिरंगे के नीचे संविधान की शपथ दोहराई जा रही थी, उसी देश के चर्चित जंगल अचानकमार टाईगर रिजर्व में एक राष्ट्रीय पशु चुपचाप सड़ता रहा और जब उसकी मौत का सच सामने आया, तब जवाबों से ज़्यादा बचाव के बयान सामने आए। 

छत्तीसगढ़ के अचानकमार टाइगर रिज़र्व में एक युवा नर बाघ की मौत को वन विभाग ने दो बाघों के बीच हुए आपसी संघर्ष का परिणाम बताया है। घटना 25 जनवरी 2026 को अचानकमार परिक्षेत्र के सारसडोल क्षेत्र अंतर्गत कुडेरापानी परिसर की बताई गई है, जहाँ नियमित पेट्रोलिंग के दौरान सुरक्षा बलों ने बाघ का शव देखा। सूचना मिलते ही वन विभाग की टीम ने इलाके को सुरक्षित कर लिया और वरिष्ठ अधिकारियों को जानकारी दी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के निष्कर्षों के आधार पर यह दावा तकनीकी रूप से संभव भी है। बाघों के बीच क्षेत्रीय द्वंद्व प्राकृतिक व्यवहार का हिस्सा होता है और देश के कई संरक्षित इलाकों में ऐसी घटनाएँ दर्ज की गई हैं। लेकिन लोकतंत्र में ओप-एड का दायित्व केवल आधिकारिक निष्कर्ष दोहराना नहीं, बल्कि उन प्रश्नों को सामने लाना है जो सरकारी बयान के दायरे से बाहर रह जाते हैं। अचानकमार की यह घटना भी ऐसी ही है जहाँ मौत से ज़्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है, मौत के बाद का प्रबंधन।

विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, जिस बाघ का शव 26 जनवरी को पाया गया, उसकी मौत संभवतः कई दिन पहले हो चुकी थी। शव की स्थिति और इलाके में फैली दुर्गंध इस ओर संकेत करती है कि घटना और उसकी पहचान के बीच समय का अंतर था। अगर यह सही है, तो सवाल बाघ की मौत के कारण पर नहीं, बल्कि निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर उठता है। 

यहाँ बताना लाज़िमी होगा कि कुछ दिन पहले ही अचानकमार टाईगर रिजर्व क्षेत्र में बाघ गड़ना के लिये लगाये गये ट्रैप कैमरों में से दो ट्रैप कैमरों की मेमोरी चिप चोरी हो गई थी। यह घटना साधारण चोरी नहीं कही जा सकती। कैमरा ट्रैप को खोलना और उसमें से डेटा निकालना तकनीकी जानकारी की माँग करता है। मतलब साफ़ है, प्रतिबंधित क्षेत्र में लगाये गये कैमरों से चिप चोरी करने वाला अज्ञात शख़्स उन कैमरों को आपरेट करने की तकनीकि से वाकिफ है। अब यहां यह सवाल अनिवार्य हो जाता है कि चोरी किसने की ? क्या यह किसी बाहरी शिकारी का काम था या आंतरिक मिलीभगत ? और क्या इस मामले में आपराधिक जांच को प्राथमिकता दी गई ? ऐसे में जब निगरानी उपकरण ही निष्क्रिय कर दिए जाएँ, तो किसी भी संरक्षण दावे की विश्वसनीयता कमजोर पड़ जाती है। 

अचानकमार टाइगर रिज़र्व सालों से विवादों में रहा है। बाघ की मौत, ट्रैप कैमरों से डेटा कार्ड की चोरी के कुछ समय पहले ही कोर क्षेत्र में प्रभावशाली युवकों की मौजूदगी का एक वीडियो सामने आया था, उस वीडियो ने एटीआर प्रबंधन की लाचारी और अव्यवस्था की कलई खोलकर रख दी। सियासत, प्रभावशाली लोगों के सामने एटीआर प्रबंधन कितना बौना है और जंगल कितना असुरक्षित यह बात उस वीडियो से उजागर हुई। इस जंगल में कानून और नियम सभी के लिए समान रूप से लागू नहीं हैं। जहाँ स्थानीय समुदायों पर कड़े प्रतिबंध लागू होते हैं, वहीं रसूखदारों की घुसपैठ पर अक्सर नरमी दिखाई देती है। यह दोहरा मापदंड न केवल संरक्षण प्रयासों को कमजोर करता है, बल्कि स्थानीय लोगों के बीच व्यवस्था के प्रति अविश्वास भी पैदा करता है।

भारत में बाघ संरक्षण को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक सफलता के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है। बाघों की संख्या में वृद्धि, नए रिज़र्व की घोषणा और पर्यटन के आँकड़े ये सब सकारात्मक संकेत हैं। लेकिन संरक्षण केवल संख्या का खेल नहीं है। एटीआर में अगर बाघों की संख्या बढ़ रही है, तो निगरानी और सुरक्षा भी उसी अनुपात में मज़बूत होनी चाहिए। अचानकमार की ये तमाम घटनायें यह याद दिलाती है कि काग़ज़ी उपलब्धियाँ ज़मीनी हकीकत की जगह नहीं ले सकतीं। 

Chhattisgarh: एटीआर में नर बाघ की मौत, आपसी संघर्ष को कारण बताया गया

बिलासपुर/अचानकमार। छत्तीसगढ़ के अचानकमार टाइगर रिज़र्व में एक नर बाघ मृत अवस्था में पाया गया है। वन विभाग के अनुसार प्रारंभिक जांच में बाघ की मौत का कारण दो बाघों के बीच हुआ आपसी संघर्ष सामने आया है।

यह घटना 25 जनवरी 2026 को अचानकमार परिक्षेत्र के सारसडोल क्षेत्र अंतर्गत कुडेरापानी परिसर की बताई गई है, जहाँ नियमित पेट्रोलिंग के दौरान सुरक्षा बलों ने बाघ का शव देखा। सूचना मिलते ही वन विभाग की टीम ने इलाके को सुरक्षित कर लिया और वरिष्ठ अधिकारियों को जानकारी दी।

राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) की मानक प्रक्रिया के तहत गठित समिति की मौजूदगी में अगले दिन पशु चिकित्सकों की टीम ने बाघ का पोस्टमार्टम किया। अधिकारियों के मुताबिक मृत बाघ की उम्र लगभग दो वर्ष थी और वह नर था।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बताया गया है कि बाघ की गर्दन की हड्डी टूटी हुई पाई गई, वहीं गर्दन के निचले हिस्से पर दूसरे नर बाघ के दाँतों के स्पष्ट निशान मिले हैं। घटनास्थल पर झाड़ियों के टूटे हुए हिस्से, खरोंच के निशान, बाल और मल जैसे संकेत भी पाए गए हैं, जो क्षेत्रीय संघर्ष की ओर इशारा करते हैं। वन विभाग का कहना है कि मृत बाघ के पंजों में भी दूसरे बाघ के बाल मिले हैं, जिससे इस निष्कर्ष को बल मिलता है कि मौत आपसी द्वंद्व का नतीजा है। एहतियातन, एनटीसीए के दिशा-निर्देशों के अनुसार आंतरिक अंगों को संरक्षित कर प्रयोगशाला जांच के लिए भेजा गया है। 

घटना में शामिल दूसरे बाघ की पहचान कर ली गई है और उसकी गतिविधियों पर कैमरा ट्रैप और फील्ड ट्रैकिंग के ज़रिये निगरानी की जा रही है। पोस्टमार्टम के बाद अधिकारियों और विशेषज्ञों की मौजूदगी में बाघ का अंतिम संस्कार किया गया। वन अधिकारियों का कहना है कि अचानकमार टाइगर रिज़र्व में बाघों की संख्या में हाल के वर्षों में वृद्धि हुई है। कान्हा–बांधवगढ़ कॉरिडोर से प्राकृतिक प्रवासन, अनुकूल आवास और प्रजनन सफलता के कारण क्षेत्र में बाघों की उपस्थिति बढ़ी है, जिसके चलते क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा और संघर्ष की घटनाएँ स्वाभाविक मानी जाती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार ऐसी घटनाएँ स्वस्थ बाघ आबादी वाले क्षेत्रों में कभी-कभी सामने आती हैं और यह वन्यजीवों के प्राकृतिक व्यवहार का हिस्सा होती हैं।

बंजर में जीवन की आहट: मोहनभाठा में इंडियन कोर्सर की वापसी


बिलासपुर।
 TODAY छत्तीसगढ़  /  कभी-कभी धरती बहुत धीमी आवाज़ में बोलती है। इतनी धीमी कि अगर सुनने का धैर्य न हो, तो वह आवाज़ खो जाती है। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले का मोहनभाठा भी ऐसी ही एक आवाज़ है सूखी, बंजर और उपेक्षित, लेकिन भीतर ही भीतर जीवन से भरी हुई। सवा साल के लंबे इंतज़ार के बाद 18 जनवरी को जब यहाँ एक बार फिर इंडियन कोर्सर (Indian Courser) दिखाई पड़ा, तो लगा जैसे इस ज़मीन ने खुद कहा हो 'मैं अब भी ज़िंदा हूँ।' 

"वह आता है, दौड़ता है और बिना कोई निशान छोड़े ओझल हो जाता है। लेकिन उसकी मौजूदगी बहुत कुछ कह जाती है।"

तेज़ चाल, सतर्क स्वभाव और खुले, शुष्क मैदानों से गहरे रिश्ते वाला यह दुर्लभ परिंदा कल शाम जब मोहनभाठा में अपनी ज़मीन तलाशता दिखाई देता है, तो यह महज़ एक पक्षी का दिखना नहीं बल्कि एक पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के जीवित होने का संकेत होता है। कल तीन कौरसरों का मोहनभाठा में दिखना इस बात का प्रमाण है कि तमाम दबावों के बावजूद यह मैदान अब भी उन्हें बुला रहा है। मध्यम आकार का, पतले शरीर और लंबी टाँगों वाला इंडियन कोर्सर (Indian Courser) उड़ने से ज़्यादा दौड़कर चलता है। 

"उन तस्वीरों में सिर्फ़ अंडे नहीं थे वे भरोसे की निशानी थीं। भरोसा कि यह ज़मीन सुरक्षित है, भरोसा कि यहीं अगली पीढ़ी जन्म ले सकती है।"

इन ख़ास पक्षियों को लेकर सबसे चौकाने वाली बात करीब दो बरस पहले सामने आई। बिलासपुर के दो नामचीन पक्षी प्रेमी और फोटोग्राफर संदीपन अधिकारी, राधाकिशन शर्मा ने इंडियन कोर्सर (Indian Courser) के अंडे की तस्वीरें दर्ज कीं। यह महज़ फ़ोटोग्राफ़ी नहीं थी यह ठोस प्रमाण था कि मोहनभाठा की बंजर भूमि उन्हें केवल भाती ही नहीं, बल्कि यहीं वे अपनी अगली पीढ़ी को भी बढ़ा रहे हैं। कुछ फ़ोटोग्राफ़रों के पास इनके चूजों की तस्वीरें होना इस विश्वास को और मज़बूत करता है कि यह मैदान एक सक्रिय प्रजनन स्थल है।

मोहनभाठा की पहचान उसकी जैव-विविधता है। यहाँ शेड्यूल–I से लेकर IV तक के पक्षी, जीव-जंतु और वन्यप्राणी समय-समय पर दिखाई देते हैं। बारिश के मौसम में यह क्षेत्र कई दुर्लभ प्रजाति के प्रवासी पक्षियों के ठहराव का बड़ा केंद्र बन जाता है। सबसे संकटग्रस्त श्रेणी में शामिल इजिप्शन वल्चर का हर साल परिवार के साथ यहां दिखाई देना बताता है कि आसपास कहीं उनका रहवास मौजूद है। ऐसे संकेत किसी भी इलाके के पारिस्थितिक स्वास्थ्य का पैमाना होते हैं। 

इंडियन कोर्सर की वापसी हमें खुश करती है, लेकिन साथ ही सवाल भी पूछती है क्या यह ज़मीन आने वाले वर्षों में भी उसे स्वीकार कर पाएगी ? इंडियन कोर्सर जैसे पक्षी संकेतक होते हैं। वे बताते हैं कि प्रकृति अब भी हमें एक मौका दे रही है। 

लेकिन यही समृद्धि आज खतरे में है। मोहनभाठा जो कभी पक्षी प्रेमियों के लिए स्वर्ग समान था अब अवैध भूमि अधिग्रहण, शिकारियों की बेख़ौफ़ आवाजाही, मुरूम के अवैध उत्खनन, पेड़ों की कटाई और असामाजिक तत्वों की पनाहगाह बनता जा रहा है। प्रशासनिक उदासीनता और जिम्मेदार विभागों की अनदेखी ने इस चारागाह को सिमटने की कगार पर ला खड़ा किया है।

इंडियन कोर्सर की वापसी जितनी सुखद है, उतनी ही चेतावनी भी। यह बताती है कि अगर संरक्षण की ठोस पहल नहीं हुई, तो यह जीवन-रेखा टूट सकती है। घास भूमियाँ अक्सर “बंजर” कहकर नज़रअंदाज़ कर दी जाती हैं, जबकि यही मैदान दुर्लभ प्रजातियों का आधार होते हैं। कौरसर जैसे संकेतक पक्षी हमें बताते हैं कि प्रकृति कहाँ तक सहन कर सकती है और कहाँ नहीं। 

मोहनभाठा के संरक्षण की मुहिम जारी रहनी चाहिए क्योंकि मैदान बचेंगे, तभी परिंदे लौटेंगे; और परिंदे लौटेंगे, तभी उम्मीदें जिंदा रहेंगी।

मोहनभाठा को बचाना केवल एक मैदान को बचाना नहीं, बल्कि उस विरासत को संभालना है जो आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवन का सबक बन सकती है। जब तक इंडियन कोर्सर (Indian Courser) जैसे पक्षी यहाँ दौड़ते रहेंगें, तब तक यह धरती ज़िंदा है। इसके संरक्षण की मुहिम जारी रहनी चाहिए क्योंकि मैदान बचेंगे, तभी परिंदे लौटेंगे; और परिंदे लौटेंगे, तभी उम्मीदें जिंदा रहेंगी।

ATR रिज़र्व या रियासत ? अचानकमार की अंदरूनी कहानी


बिलासपुर।
 TODAY छत्तीसगढ़  / छत्तीसगढ़ का अचानकमार टाइगर रिज़र्व केवल बाघों का आवास नहीं है, यह राज्य की वन-नीति, प्रशासनिक ईमानदारी और सरकार की नीयत का जीवित प्रमाण होना चाहिए था लेकिन आज एटीआर जिस हालत में खड़ा है, वह बताता है कि यहाँ संरक्षण नहीं, संरक्षण का नाटक चल रहा है; क़ानून नहीं, रसूख़ सर्वोपरि है। 2009 में टाइगर रिज़र्व घोषित होने के बाद से एटीआर लगातार विवादों में रहा है। कभी बाघों की संख्या को लेकर संदेह, तो कभी अफसरों की लापरवाही। लेकिन हालिया घटनाएँ यह स्पष्ट कर देती हैं कि समस्या अब केवल प्रशासनिक अक्षमता की नहीं, बल्कि सिस्टमेटिक मिलीभगत की है।

कोर एरिया में निजी वाहन, राइफल, खुलेआम फायरिंग, आग जलाना और घंटों तक बेरोक-टोक घूमना ये सब किसी आम नागरिक के लिए असंभव है। यह सब तभी संभव है, जब नीचे से ऊपर तक संरक्षण और शह मौजूद हो। 

लोरमी क्षेत्र के रसूख़दार युवकों का मामला इसी सच्चाई को उजागर करता है। उनका आत्मविश्वास बताता है कि उन्हें न पकड़े जाने का डर था, न कार्रवाई का। क्योंकि अनुभव से वे जानते थे यह जंगल काग़ज़ों में संरक्षित है, हक़ीक़त में नहीं। चूँकि उनका ही बनाया हुआ वीडियो जब सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तो अफसरों को कार्रवाही की प्रक्रिया शुरू करनी पड़ी। विभागीय ढोल में पोल होने के बाद उन युवकों को पकड़ा गया और जेल भेज दिया गया। अब मामला न्यायालयीन व्यवस्था और प्रक्रिया के बीच है। 

वायरल वीडियो को देखकर कहना गलत नहीं होगा कि जमुनाही, सुरही और कंचनपुर जैसे कई बैरियर वन-सुरक्षा के प्रतीक नहीं, बल्कि अब रसूख़दारों के लिए स्वागत द्वार बन चुके हैं। बिना पूछताछ, बिना तलाशी, बिना अनुमति बैरियर उठते चले जाते हैं। सवाल यह नहीं कि गार्ड ने बैरियर क्यों उठाया, सवाल यह है कि गार्ड को यह भरोसा किसने दिया कि उससे कोई सवाल नहीं होगा ? 

जब मामला सामने आया, तब जो हुआ वह और भी चिंताजनक है। फील्ड डायरेक्टर छुट्टी का हवाला देते हैं, डिप्टी डायरेक्टर और रेंज अफसर फोन बंद रखते हैं, और सहायक संचालक “नंबर देने से मना है” कहकर कॉल काट देते हैं। यह केवल गैर-जिम्मेदारी नहीं, यह जांच से बचने की सोची-समझी रणनीति है।

यह मानना भोलापन ही होगा कि सरकार को इन हालात की जानकारी नहीं है। सवाल यह है कि जानते हुए भी चुप क्यों है? क्या इसलिए कि आरोपी “प्रभावशाली” हैं ? क्या इसलिए कि कार्रवाई करने से राजनीतिक असुविधा होगी ? अगर ऐसा है, तो सरकार को साफ़ कहना चाहिए कि उसके लिए जंगल, बाघ और क़ानून तीनों से ऊपर रसूख़, राजनैतिक प्रभाव है। 

आज एटीआर में बाघों की संख्या बढ़ने के दावे किए जाते हैं, लेकिन जब कोर एरिया में राइफलें गरजें, आग जले और अफसर आंखें मूंद लें तो ये आंकड़े सिर्फ़ प्रेस रिलीज़ बनकर रह जाते हैं। बाघ केवल शिकारी से नहीं मरता, वह प्रशासनिक लापरवाही और राजनीतिक संरक्षण से भी मरता है। कईयों सवाल हैं जैसे, कोर एरिया में निजी हथियारों को ले जाने की अनुमति किसने दी ? बैरियर पर तैनात कर्मचारियों ने किसके निर्देश पर बिना जांच रास्ता खोला ? प्रतिबंधित क्षेत्र में 3–4 घंटे तक मौज मस्ती, फायरिंग और आगजनी की जानकारी वरिष्ठ अफसरों तक क्यों नहीं पहुँची या जानबूझकर पहुँचने नहीं दी गई ? और सबसे बड़ा सवाल, क्या इस मामले में सिर्फ़ राजनैतिक और रसूख़दार युवक ही दोषी हैं या पूरा सिस्टम ? 

यहां का हालिया घटनाक्रम यह दर्शाता है कि एटीआर में कानून, नियम और संरक्षण की अवधारणा गंभीर रूप से कमजोर हुई है। स्थिति ऐसी बन चुकी है कि यह मामला अब प्रशासनिक चूक का नहीं, बल्कि संवैधानिक कर्तव्यों के उल्लंघन और सार्वजनिक संसाधनों की अवैध लूट का बनता जा रहा है जिस पर न्यायिक हस्तक्षेप जरूरी है।

 उपलब्ध वीडियो साक्ष्यों के अनुसार न केवल वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की धारा 27, 28 एवं 38-V का उल्लंघन है, बल्कि नेशनल टाइगर कंज़र्वेशन अथॉरिटी (NTCA) की गाइडलाइंस का भी सीधा अपमान है।

अब तो ऐसा लगता है अचानकमार टाइगर रिज़र्व आज बाघों से ज़्यादा सिस्टम के शिकंजे में फंसा हुआ है। अगर अब भी जिम्मेदार अफसरों पर सख़्त कार्रवाई नहीं होती, अगर राजनीतिक संरक्षण पर पर्दा नहीं उठता तो यह मान लेना चाहिए कि यह जंगल संरक्षण नहीं, बल्कि सत्ता-संरक्षित अराजकता का इलाका बन चुका है। ऐसे हालात में इतिहास यही दर्ज करेगा कि बाघ जंगल में नहीं मरे, उन्हें सिस्टम ने मारा है। 

Chhattisgarh: बीस साल का संरक्षण या दो दशक का भ्रम ? वन विभाग की नीति पर सवाल

उदंती सीता नदी टाइगर रिजर्व में पूरी ब्रीड का अकेला बच्चा छोटू वन भैंसा

मध्य प्रदेश में एक और बाघ मृत मिला, मरने वालों की संख्या 55 हुई: क्या गलत हो रहा है ?

Chhattisgarh Wildlife : कोरगांव जंगल में मृत मिला तेंदुआ, चारों पंजे गायब


कुरुद । 
 TODAY छत्तीसगढ़  / मगरलोड ब्लॉक के कोरगांव जंगल में एक तेंदुआ मृत अवस्था में पाया गया है। तेंदुए के चारों पैर के पंजे गायब होने से वन विभाग में खलबली मच गई है। इस घटना ने वन्य प्राणियों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रारंभिक तौर पर आशंका जताई जा रही है कि अज्ञात शिकारियों ने तेंदुए का शिकार कर उसके पंजे काटकर ले गए।

जानकारी के अनुसार मगरलोड तहसील के उत्तर सिंगपुर वन कक्ष क्रमांक 23 में 22 दिसंबर को ग्रामीणों ने जंगल में तेंदुए का शव देखा, जिसकी सूचना वन विभाग को दी गई। मौके पर पहुंची वन विभाग की टीम ने जांच शुरू की।

प्रभारी डीएफओ ससिगानन्धन ने बताया कि मृत तेंदुए का पोस्टमार्टम कर लिया गया है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि तेंदुए की मौत शिकार के कारण हुई है या किसी अन्य वजह से। फिलहाल मामले की गहन जांच की जा रही है। अज्ञात शिकारियों की तलाश के लिए जंगल सफारी रायपुर की डॉग स्क्वायड टीम को धमतरी बुलाया गया है। जंगल क्षेत्र में सघन तलाशी अभियान चलाया जा रहा है।

उल्लेखनीय है कि इससे पहले 14 दिसंबर को राजनांदगांव जिले के खैरागढ़ स्थित कोपेनवागांव क्षेत्र में भी एक तेंदुआ मृत मिला था, जिसका जबड़ा और पंजे अज्ञात शिकारियों द्वारा काटकर ले जाए गए थे। लगातार सामने आ रही इन घटनाओं से वन्यजीव संरक्षण को लेकर चिंता बढ़ गई है।

जिस डॉक्टर पर एक्सपायर्ड दवा देने से मौत का आरोप, उसे ‘स्पेशलिस्ट’ बताकर फिर से सेवा ले रहा वन विभाग


रायपुर।
  TODAY छत्तीसगढ़  / छत्तीसगढ़ के जंगलों में इन दिनों जो हो रहा है, वह किसी प्राकृतिक आपदा का नतीजा नहीं, बल्कि प्रशासनिक निष्क्रियता का खुला प्रदर्शन है। बाघ, तेंदुआ, बाइसन और हाथी जैसा संवेदनशील, विशालकाय वन्यप्राणी एक-एक कर मारे जा रहे हैं, लेकिन जंगलों के तथाकथित रक्षक 'छत्तीसगढ़ वन विभाग' अब भी फाइलों और फार्मेलिटी की आड़ में बेशर्मी से छिपे हुए हैं। इसी बीच वन विभाग की कार्यप्रणाली पर एक और गंभीर सवाल खड़े करने वाला मामला सामने आया है, जिसमें जिस वन्यप्राणी चिकित्सक पर बाइसन की मौत का आरोप लगा उसी से शासन के स्पष्ट आदेशों के विपरीत दोबारा सेवाएं ली जा रही हैं। 

राज्य के अलग-अलग इलाकों से शिकार की लगातार सामने आ रही घटनायें इस बात का सबूत हैं कि राज्य में वन्यजीव संरक्षण व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। यह कहना अब गलत नहीं होगा कि छत्तीसगढ़ “शिकार का हॉटस्पॉट” नहीं, बल्कि “शिकारगढ़” बनता जा रहा है। अफसोस यह है कि इस बदलाव का श्रेय बंदूकधारी शिकारियों से ज्यादा दफ्तरों में बैठे अफसरों को जाता है। 

बीते दिनों सूरजपुर जिला में बाघ के शिकार, भोरमदेव अभ्यारण में चार बाइसन (गौर) की मौत, खैरागढ़, भोरमदेव और कांकेर में तेंदुओं के शिकार, तथा उदंती-सीता नदी टाइगर रिजर्व में दो सांभरों के शिकार की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। इन घटनाओं ने वन विभाग की जवाबदेही और निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। ऐसे विपरीत हालातों में राज्य वन विभाग की कार्यप्रणाली पर एक और गंभीर सवाल खड़े करने वाला मामला सामने आया है, जिसमें जिस वन्यप्राणी चिकित्सक पर बाइसन की मौत का आरोप लगा उसी से शासन के स्पष्ट आदेशों के विपरीत दोबारा सेवाएं ली जा रही हैं। आखिर इसमें किसका कैसा स्वार्थ निहित है ? 


जनवरी 2025 में बरनावापारा अभ्यारण से गुरु घासीदास नेशनल पार्क भेजी गई एक मादा बाइसन की मौत के मामले में गंभीर आरोप लगे थे। विवेचना में मुख्य वन्यजीव संरक्षक (वन्यप्राणी) सह फील्ड डायरेक्टर उदंती-सीता नदी टाइगर रिजर्व सतोविषा समाजदार ने स्पष्ट उल्लेख किया कि एक्टिवान दवा के कालातीत (एक्सपायर्ड) होने और उसी दवा के उपयोग के कारण ट्रांसलोकेट की गई मादा गौर की मृत्यु संभावित प्रतीत होती है।


इस रिपोर्ट के आधार पर तत्कालीन प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) सुधीर अग्रवाल ने 2 मार्च 2025 को वन्यप्राणी चिकित्सक डॉ. राकेश वर्मा को आगामी आदेश तक वन्यप्राणी से जुड़े सभी कार्यों से तत्काल पृथक करने के आदेश जारी किए थे। साथ ही अलग आदेश में उन्हें वन्यप्राणी उपचार, निदान और संबंधित सभी कार्यों से हटाया गया था।

उल्लेखनीय है कि डॉ. राकेश वर्मा इससे पहले रायपुर जंगल सफारी में 17 चौसिंघा की मौत के मामले में भी विवादों में रह चुके हैं, जहां विधानसभा अध्यक्ष तक ने उन्हें हटाने के निर्देश दिए थे। इसके बावजूद अब उन्हें ‘स्पेशलिस्ट’ बताकर दोबारा सेवाओं में लिए जाने से वन विभाग की मंशा और पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लग गया है।

वन्यजीव संरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर इस तरह की कथित मेहरबानी से न केवल विभाग की साख पर असर पड़ रहा है, बल्कि छत्तीसगढ़ में वन्यजीवों की सुरक्षा को लेकर आमजन की चिंताएं भी लगातार बढ़ती जा रही हैं।

वन्यजीव कॉरिडोर में हादसा: हाथियों के झुंड से टकराई राजधानी एक्सप्रेस, कोई हताहत नहीं


गुवाहाटी |
  TODAY छत्तीसगढ़  /  राज्य के नागांव जिले के कामपुर इलाके में चंगजुराई के पास बीती रात बड़ी दुखद घटना हुई. सैरांग से दिल्ली जाने वाली 20507 राजधानी एक्सप्रेस के एक झुंड से टकरा जाने से सात जंगली हाथियों की मौत हो गई. इससे पशु प्रेमियों को गहरा सदमा पहुंचा है. यह घटनास्थल गुवाहाटी से लगभग 126 किमी दूर हुई.

टक्कर की वजह से राजधानी एक्सप्रेस के पांच डिब्बे पटरी से उतर गए. हालांकि, राहत की बात यह रही कि इस हादसे में किसी यात्री को चोट नहीं आई. रेलवे अधिकारियों ने बताया कि घायल यात्रियों को कुछ समय के लिए दूसरे डिब्बों की खाली बर्थ में बिठाया गया.  

रेलवे का आधिकारिक बयान

उत्तर–पूर्व सीमांत रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी कपिंजल किशोर शर्मा ने बताया कि यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित है और सभी आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं। रेलवे प्रशासन हादसे के कारणों की जांच कर रहा है, वहीं प्रभावित रेल मार्ग पर यातायात बहाल करने के प्रयास जारी हैं।  

पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे (NFR) ने डिविजनल हेडक्वार्टर के सीनियर अधिकारियों के साथ एक्सीडेंट रिलीफ ट्रेनें मौके पर भेजी. पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे के जनरल मैनेजर और लुमडिंग के डिविजनल रेलवे मैनेजर समेत सीनियर रेलवे अधिकारी रेस्टोरेशन के काम की देखरेख के लिए मौके पर पहुंचे. यात्रियों की मदद के लिए गुवाहाटी रेलवे स्टेशन पर हेल्पलाइन नंबर 0361-2731621 / 2731622 / 2731623 जारी किए गए.

इस हादसे की खबर लगते ही वन विभाग के लोग तुरंत मौके पर पहुंचे और घायल बच्चे (हाथी) के लिए इमरजेंसी में इलाज का इंतजाम किया. जानवरों के डॉक्टरों की एक टीम भी मौके पर पहुंच गई और मरे हुए हाथियों का पोस्टमॉर्टम किया. इस बीच जंगल के लोग तुरंत मौके पर पहुंचे और घायल बछड़े के लिए इमरजेंसी इलाज का इंतजाम किया.

वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक यह हादसा रात करीब 2.17 पर घने कोहरे के बीच हुआ, जब जंगली हाथियों का एक झुंड पास की पहाड़ियों से नीचे आया और रेलवे ट्रैक पर चला गया. सात हाथियों की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि एक हाथी का बच्चा गंभीर रूप से घायल हो गया.

 

Chhattisgarh: जंगल में मिला बाघ का शव, शिकारी हमले की आशंका


सूरजपुर | 
TODAY छत्तीसगढ़  /जिले के वाड्रफनगर वन परिक्षेत्र से सटे भैंसामुंडा क्षेत्र के जंगल में बाघ का शव मिलने से वन विभाग में हड़कंप मच गया है। संदिग्ध परिस्थितियों में हुई इस मौत ने वन्यजीव सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

सूचना मिलते ही वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची और पूरे इलाके को घेराबंदी कर सील कर दिया गया। प्रारंभिक जांच में बाघ के शरीर पर चोट के निशान पाए गए हैं, जिससे शिकारी हमले की आशंका जताई जा रही है। फिलहाल शव का परीक्षण कर पोस्टमार्टम किया गया, पोस्टमार्डम रिपोर्ट से मौत के वास्तविक कारणों का पता चल सके।

मामले की गंभीरता को देखते हुए वरिष्ठ वन अधिकारी भी मौके पर पहुंचें । आसपास के जंगल क्षेत्रों में गश्त बढ़ा दी गई है, वहीं स्थानीय ग्रामीणों से भी पूछताछ की जा रही है, ताकि किसी संदिग्ध गतिविधि की जानकारी मिल सके।

वन मंडल अधिकारी आलोक बाजपेई ने बताया कि यह क्षेत्र सूरजपुर जिले का सरहदी वन इलाका है, जहां संरक्षित वन्यजीवों की विशेष निगरानी की आवश्यकता रहती है। उन्होंने कहा कि मामले की गहन जांच की जा रही है और पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो पाएगी।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद: मध्यप्रदेश के टाइगर रिज़र्व में नाइट सफारी पर आज से पूर्ण प्रतिबंध


भोपाल।
  TODAY छत्तीसगढ़  /  मध्यप्रदेश के सभी टाइगर रिज़र्व में रात्रिकालीन सफारी अब पूरी तरह बंद हो गई है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा 17 नवम्बर 2025 को T.N. Godavarman बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में दिए गए आदेश के बाद प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) ने शुक्रवार को यह निर्देश जारी किए। आदेश में स्पष्ट कहा गया है कि देशभर में नाइट टूरिज़्म पर पूर्ण प्रतिबंध लागू होगा और सभी राज्यों को NTCA (राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण) की पर्यटन संबंधी गाइडलाइन्स का सख्ती से पालन करना होगा। यह आदेश आज 1 दिसंबर 2025 से प्रभावशील होगा। 

जारी पत्र में उल्लेख है कि सर्वोच्च न्यायालय ने नाइट टूरिज़्म को बाघ संरक्षण के हित में प्रतिबंधित करते हुए सामुदायिक आधारित पर्यटन व्यवस्था को बढ़ावा देने पर जोर दिया है। कोर्ट ने राज्यों को निर्देश दिया है कि वे पर्यटन गतिविधियों को नियंत्रित कर ऐसी प्रणाली विकसित करें जिससे वन्यजीवों के प्राकृतिक व्यवहार में बाधा न हो। 

आदेश के तहत मध्यप्रदेश के सभी क्षेत्र संचालकों को त्वरित प्रभाव से रात्रिकालीन सफारी रोकने के निर्देश दिए गए हैं। इसके साथ ही बताया गया है कि सभी टाइगर रिज़र्व प्रबंधन इस आदेश की सूचना स्थानीय स्तर पर तुरंत प्रसारित करें और यह सुनिश्चित करें कि कोई भी नाइट सफारी वाहिकाएँ जंगल में प्रवेश न करें।

वन विभाग द्वारा जारी इस आदेश की प्रति राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA), नई दिल्ली के सदस्य सचिव तथा राज्य सरकार के संबंधित विभागों को भी भेजी गई है।

वन विभाग का मानना है कि नाइट सफारी बंद होने से जंगल के वन्यजीवों को रात के समय होने वाली मानव गतिविधियों से मुक्ति मिलेगी और बाघ संरक्षण के प्रयासों को मजबूती मिलेगी।

जटगा रेंज में 65 हाथियों की धमक: रातभर चला रेस्क्यू अभियान, कोई जनहानि नहीं

Chhattisgarh: कड़ाके की ठंड और गहरी रात के बावजूद वन कर्मियों ने टार्च की रोशनी और जिप्सी के हूटर की मदद से हाथियों को गांव की सीमा से दूर करने का अभियान शुरू किया। यह रेस्क्यू ऑपरेशन लगभग तीन से चार घंटे तक चला। पूरी रात डीएफओ और वन विभाग की टीम जंगल में डटी रही तथा ग्रामीणों के बीच रहकर हालात पर नजर बनाए रखी। 

सांकेतिक तस्वीर / TCG NEWS 

आसमान की शहजादियां: Amur falcon ने 6 दिन में मणिपुर से केन्या तक रिकॉर्ड उड़ान भरी


नई दिल्ली।
 TODAY छत्तीसगढ़  /  मणिपुर के घने जंगलों से सैटेलाइट टैग के जरिये निगरानी में रखे गए तीन अमूर फाल्कन ने इस साल फिर ऐसा कमाल कर दिखाया है, जिसने दुनिया भर के पक्षी वैज्ञानिकों को हैरत में डाल दिया है। महज 150 ग्राम वज़न वाले इन छोटे परिंदों ने कुछ ही दिनों में महाद्वीप पार कर अविश्वसनीय दूरी तय की है।

सबसे आगे रही ‘अपापंग’, जिसे नारंगी टैग लगाया गया है। इस नन्ही योद्धा ने पूर्वोत्तर भारत से उड़ान भरकर महज 6 दिन 8 घंटे में 6,100 किलोमीटर की नॉन-स्टॉप यात्रा पूरी की। भारत के पूर्वी पहाड़ों से लेकर प्रायद्वीपीय भारत, अरब सागर और हॉर्न ऑफ़ अफ्रीका को पार करते हुए उसने केन्या में लैंड किया। वैज्ञानिकों के मुताबिक इतनी लंबी निर्बाध उड़ान किसी छोटे शिकारी पक्षी के लिए लगभग असंभव मानी जाती है।

पीछे-पीछे पहुंची ‘अलांग’, जिसे पीला टैग मिला है और जो इन तीनों में सबसे कम उम्र की है। उसने 5,600 किलोमीटर की दूरी 6 दिन 14 घंटे में तय की। रास्ते में उसने एक रात तेलंगाना में बिताई और महाराष्ट्र में लगभग तीन घंटे का छोटा विश्राम लेकर दोबारा समुद्र पार करने उड़ चली। पहली बार लंबी दूरी की यात्रा करने वाली अलांग की सहनशक्ति ने विशेषज्ञों को भी चौंका दिया है। आखिरकार वह भी केन्या पहुंच गई।

तीसरी सदस्य ‘अहू’ (लाल टैग) ने थोड़ा उत्तरी रास्ता चुना और अरब सागर के पार जाने से पहले पश्चिमी बांग्लादेश में रणनीतिक ठहराव लिया। उसने अब तक 5,100 किलोमीटर की उड़ान 5 दिन 14 घंटे में पूरी कर ली है और इस समय सोमालिया के उत्तरी सिरे पर रुकी हुई है। अनुमान है कि वह जल्द ही अपने साथियों से केन्या के प्रसिद्ध Tsavo National Park में आ मिलेगी, जहां ये पक्षी हर साल रुकते हैं।

अमूर फाल्कन को यूँ ही “टाइनी लॉन्ग-डिस्टेंस वॉयेजर” नहीं कहा जाता। भारत से पूर्वी अफ्रीका तक इनका सालाना प्रवास, जिसमें वे सागर, रेगिस्तान और निर्जन इलाकों को पार करती हैं, दुनिया भर के पक्षी प्रेमियों और संरक्षणवादियों को लगातार प्रेरित करता है। इनकी ये यात्राएं बताती हैं कि महाद्वीपों को जोड़ने वाली प्राकृतिक प्रवासी मार्गों की रक्षा कितनी ज़रूरी है।



मैकू मठ का टूटा शिलालेख: जंगल की स्मृति पर प्रहार और समाज के टूटते विवेक का आईना


बिलासपुर। 
TODAY छत्तीसगढ़  / अचानकमार टाइगर रिज़र्व (ATR) के कोर ज़ोन में स्थित ऐतिहासिक मेकू मठ सिर्फ पत्थरों का ढेर नहीं है—यह जंगल, वन्यजीवन और उन लोगों के साहस का मौन स्मारक है, जिन्होंने इस कठिन भौगोलिक क्षेत्र में अपनी जान जोखिम में डालकर काम किया। लेकिन हाल ही में इस स्मारक के शिलालेख को तोड़ दिया गया। यह केवल एक पत्थर तोड़ने की घटना नहीं, बल्कि इतिहास, स्मृति और संवेदनशीलता पर किया गया असंवेदनशील प्रहार है।

एक शहीद वनरक्षक की विरासत

मेकू गोंड, बिंदावल वन ग्राम के एक फायर वॉचर थे—सीमित संसाधनों के बीच जंगल की रक्षा करने वाले उन अनेक अज्ञात नायकों में से एक। 10 अप्रैल 1949 को वह आदमखोर बाघिन का शिकार बने। वन विभाग ने कार्रवाई की और 13 अप्रैल 1949 को कोटा परिक्षेत्र के रेंजर एम. डब्ल्यू. के. खोखर ने उस बाघिन का सफाया किया। इस घटना की याद में यहाँ स्मारक बनाया गया। समय के साथ दूसरा स्मारक भी खड़ा किया गया। लेकिन अब नए मठ का शिलालेख किसी ने तोड़ दिया—यह कृत्य सिर्फ गलत ही नहीं, बल्कि बेहद दुखद और चिंताजनक भी है।  

कोर ज़ोन में हुई शरारत: गंभीर प्रश्नों को जन्म

यह क्षेत्र सामान्य नहीं है। अचानकमार टाईगर रिजर्व क्षेत्र का यह कोर ज़ोन है, जहाँ आज भी बाघों की उपस्थिति दर्ज की जाती है। ऐसे सुरक्षित क्षेत्र में किसी का घुसकर शिलालेख तोड़ देना सुरक्षा व्यवस्था और संवेदनशीलता दोनों पर प्रश्नचिह्न लगाता है। क्या यह महज शरारत है, या स्मारकों से असम्मान का बढ़ता चलन ? 

स्मारक—इतिहास का संरक्षक

एक समाज तभी सभ्य माना जाता है जब वह अपने इतिहास, अपने नायकों और अपनी विरासत को संजोकर रखे। मेकू मठ का शिलालेख केवल पत्थर नहीं था। वह उस व्यक्ति के साहस का प्रतीक था, जिसने वन की रक्षा करते हुए अपना जीवन आहुति कर दिया। उस स्मृति को नष्ट करना न केवल अपराध है, बल्कि हमारे सामाजिक विवेक पर भी गहरा धब्बा है। ऐसा कृत्य किसी ‘शैतानी दिमाग’ की उपज है और इससे कठोर संदेश जाना चाहिए कि इतिहास और संरक्षित क्षेत्रों से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। वन विभाग और स्थानीय प्रशासन को इस मामले को गंभीरता से लेना चाहिए, दोषियों की पहचान करके उन्हें दंडित करना चाहिए। 


ओडिशा में बनेगी दुनिया की पहली ब्लैक टाइगर सफारी, सुप्रीम कोर्ट से मंजूरी


 भुवनेश्वर। 
 TODAY छत्तीसगढ़  / ओडिशा के प्रकृति प्रेमियों के लिए बड़ी खुशखबरी है। मयूरभंज जिले में दुनिया की पहली मेलेनिस्टिक (ब्लैक) टाइगर सफारी स्थापित करने के राज्य सरकार के प्रस्ताव को सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी दे दी है। कोर्ट की अनुमति के साथ इस प्रोजेक्ट से जुड़ी अंतिम कानूनी अड़चन भी दूर हो गई है।

यह सफारी बारीपदा से करीब 10 किलोमीटर दूर मंचबंधा में विकसित की जाएगी। इससे पहले प्रोजेक्ट को सेंट्रल ज़ू अथॉरिटी (CZA) और नेशनल टाइगर कंज़र्वेशन अथॉरिटी (NTCA) से भी स्वीकृति मिल चुकी थी। अब सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी के बाद ओडिशा सरकार इस परियोजना को शुरू करने की दिशा में आगे बढ़ सकती है। अधिकारियों के अनुसार यह पहल राज्य को वाइल्ड लाइफ टूरिज्म का बड़ा केंद्र बनाएगी और पूर्वी भारत में रेस्क्यू एवं कंज़र्वेशन व्यवस्था को मजबूत करेगी।

200 हेक्टेयर में विकसित होगा प्रोजेक्ट

कुल 200 हेक्टेयर क्षेत्र में प्रस्तावित इस सफारी में 100 हेक्टेयर हिस्सा टाइगर हैबिटैट के लिए तय किया गया है, जबकि शेष 100 हेक्टेयर क्षेत्र में रेस्क्यू सेंटर, वेटेरिनरी यूनिट, स्टाफ इन्फ्रास्ट्रक्चर और पार्किंग जैसी सुविधाएं विकसित की जाएंगी।

पहले चरण में पांच ब्लैक टाइगर होंगे शामिल

पहले चरण में नंदनकानन जूलॉजिकल पार्क से तीन और रांची जू से दो मेलेनिस्टिक टाइगर लाए जाने की योजना है। इन बाघों को डिस्प्ले और कंज़र्वेशन यूनिट में स्थानांतरित किए जाने से पहले विशेषज्ञों की देखरेख में उन्हें नए वातावरण के अनुकूल बनाया जाएगा।

अचानकमार टाइगर रिज़र्व में मंत्री केदार कश्यप का निरीक्षण, पर्यटन बढ़ाने पर फोकस


 बिलासपुर।
 TODAY छत्तीसगढ़  / छत्तीसगढ़ के वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री केदार कश्यप ने शुक्रवार को अचानकमार टाइगर रिज़र्व का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने पर्यटक मार्ग, रिसॉर्ट, चारागाह क्षेत्र और वन्यजीव गतिविधियों का विस्तृत निरीक्षण किया। वन मंत्री केदार कश्यप के साथ PCCF (वन्यप्राणी) अरुण पांडेय मौजूद रहे। वन मंत्री ने मौके पर ही अधिकारियों को कई अहम निर्देश भी दिए।

शुक्रवार की सुबह वन मंत्री श्री कश्यप लोरमी पहुँचे, जहाँ उन्होंने सबसे पहले पर्यटक मार्ग का जायजा लिया। इसके बाद वे हाथी कैंप सिहावल सागर पहुंचे, जो मनियारी नदी का उद्गम स्थल है। निरीक्षण के दौरान मंत्री ने मार्ग सुधार, सुविधाओं के उन्नयन और सुरक्षा प्रबंधन को बेहतर करने के निर्देश दिए।

इसके बाद मंत्री अचानकमार ग्राम पहुँचे, जहाँ ग्रामीणों ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया। शिवतराई पहुँचकर उन्होंने बैगा रिसॉर्ट, कैंटीन और सोविनियर शॉप के संचालन की विस्तृत समीक्षा की। स्थानीय महिला समूहों ने भी मंत्री का स्वागत किया। मंत्री ने बैगा रिसॉर्ट की आय बढ़ाने के लिए बिलासपुर और रायपुर के होटल संचालकों व टूर ऑपरेटरों के साथ बैठक कर सुझाव लेने के निर्देश दिए और रिज़र्व के व्यापक प्रचार-प्रसार पर जोर दिया।

मंत्री कश्यप ने कहा कि रोड मैपिंग और वाटर बॉडी मार्किंग के बाद नए पर्यटन रूट तैयार किए जाएँ, ताकि पर्यटकों को वन्यजीवों की बेहतर साईटिंग मिल सके। उन्होंने चारागाह विकास कार्यों का निरीक्षण किया और खाद्य घास प्रजातियों के बीज संग्रहण सहित चल रही गतिविधियों पर संतोष जताया।

यह इस वर्ष मंत्री का अचानकमार टाइगर रिज़र्व का दूसरा दौरा है। उन्होंने 19 मई को दिए गए निर्देशों की भी समीक्षा की और अब तक हुए कार्यों की सराहना की। मंत्री ने कहा कि रिज़र्व के विकास से पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा और स्थानीय युवाओं को रोजगार के अधिक अवसर मिलेंगे।

इस दौरान प्रधान मुख्य वन संरक्षक अरुण पांडे, मुख्य वन संरक्षक मनोज पांडे, उप संचालक गणेश यू.आर. सहित कई अधिकारी मौजूद रहे।

Chhattisgarh: दुर्लभ पक्षियों के आसरे को मिलेगा वैश्विक दर्जा: कोपरा जलाशय प्रस्तावित रामसर स्थल


रायपुर ।
  TODAY छत्तीसगढ़  /  छत्तीसगढ़ सरकार ने बिलासपुर जिले में स्थित कोपरा जलाशय को प्रस्तावित रामसर स्थल घोषित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है। वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री केदार कश्यप के निर्देश पर राज्य वेटलैंड प्राधिकरण ने इसके लिए औपचारिक प्रस्ताव भेजा है। प्राकृतिक एवं मानव निर्मित विशेषताओं वाला यह जलाशय जल संसाधन, सिंचाई और जैव विविधता के लिए क्षेत्र का प्रमुख केंद्र माना जाता है।

राष्ट्रीय–अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलने की उम्मीद

वन मंत्री श्री कश्यप ने कहा कि कोपरा जलाशय को रामसर स्थल का दर्जा मिलने से न केवल इसका संरक्षण और मजबूत होगा, बल्कि क्षेत्र को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिलेगी। यह जलाशय वर्षा और आसपास के नालों से भरता है तथा स्थानीय ग्रामीणों की पेयजल और सिंचाई आवश्यकताओं का मुख्य स्रोत है। जलाशय के आसपास की भूमि अत्यंत उपजाऊ होने के कारण कई गाँवों की कृषि गतिविधियाँ इसी पर निर्भर हैं। 

जैव विविधता का समृद्ध केंद्र

कोपरा जलाशय वर्षभर विभिन्न प्रजातियों के पक्षियों, जलचर जीवों और वनस्पतियों का सुरक्षित आवास बना हुआ है। खासकर प्रवासी पक्षियों की यहां बड़ी संख्या में मौजूदगी दर्ज की जाती है। जलाशय में मछलियों, जलीय पौधों, उभयचर, सरीसृपों और असंख्य कीट-पतंगों की उपस्थिति इसे महत्वपूर्ण जैव विविधता क्षेत्र बनाती है।

दुर्लभ प्रजातियों के संरक्षण का उपयुक्त स्थल

राज्य वेटलैंड प्राधिकरण के अनुसार यह क्षेत्र रिवर टर्न, कॉमन पोचार्ड और इजिप्शियन वल्चर जैसे दुर्लभ एवं संवेदनशील पक्षियों के संरक्षण के लिए अत्यंत उपयुक्त है। विशेषज्ञों का कहना है कि कोपरा जलाशय रामसर मानदंड 02, 03 और 05 को पूरा करता है, जो इसे एक उत्कृष्ट वेटलैंड इकोसिस्टम बनाते हैं। 

पर्यटन और संरक्षण दोनों को मिलेगा बढ़ावा

केंद्र से स्वीकृति मिलने पर कोपरा जलाशय को अंतरराष्ट्रीय स्तर का संरक्षण मिलेगा और इसका वैज्ञानिक, पर्यावरणीय तथा पर्यटन संबंधी महत्व और बढ़ जाएगा। सरकार जल संरक्षण, जैव विविधता संवर्धन और ग्रामीण आजीविका से जुड़ी गतिविधियों को भी सुदृढ़ करने की तैयारी कर रही है, ताकि क्षेत्र में प्राकृतिक संसाधनों और स्थानीय समुदाय के बीच बेहतर संतुलन स्थापित किया जा सके।

कर्नाटक के चिड़ियाघर में चार दिन में 31 काले हिरणों की मौत, जीवाणु संक्रमण की आशंका


बेलगावी।
 TODAY छत्तीसगढ़  /  कर्नाटक के बेलगावी जिले में स्थित कित्तूर रानी चेन्नम्मा चिड़ियाघर से एक बेहद चिंताजनक खबर सामने आई है। यहां जीवाणु संक्रमण के चलते चार दिनों में 31 काले हिरणों की मौत हो गई है। लगातार हो रही मौतों के बाद चिड़ियाघर में अब सिर्फ 7 काले हिरण बचे हैं। मामला सामने आते ही सरकार ने उच्च स्तरीय जांच के आदेश जारी कर दिए हैं।

4 दिनों में ऐसे हुईं मौतें

चिड़ियाघर सूत्रों के मुताबिक, गुरुवार को 8 हिरणों की मौत हुई। इसके बाद शनिवार को हालात बिगड़ते गए और 20 हिरणों ने दम तोड़ दिया। पिछले दो दिनों में तीन और हिरण मर गए। ये सभी हिरण 4 से 6 साल की उम्र के थे और गडग के बिंकदत्ती चिड़ियाघर से बेलगावी लाए गए थे।

चिड़ियाघर के उप निदेशक नागेश बालेहोसुर ने बताया कि 29वें हिरण की मौत शनिवार रात, 30वें की रविवार शाम और एक घायल हिरण की मौत सोमवार सुबह हुई। अंतिम हिरण की मौत संक्रमण से हुई या पैर में लगी चोट से, यह पोस्टमार्टम के बाद तय होगा।

मंत्री खुद पहुंचे बेलगावी, अधिकारियों को फटकार

वन मंत्री ईश्वर खंड्रे सोमवार को बेलगावी पहुंचे और चिड़ियाघर अधिकारियों के साथ बैठक कर पूरे मामले की समीक्षा की। उन्होंने मौतों पर दुख जताते हुए बीमारी के स्रोत और फैलाव की दिशा में तुरंत जांच करने के आदेश दिए।

विसरा जांच के लिए भेजा गया

हिरणों के विसरा के सैंपल बेंगलुरु स्थित बन्नेरघट्टा वन्य प्राणी रोग निदान प्रयोगशाला भेजे गए हैं। अधिकारियों का कहना है कि इतने बड़े पैमाने पर काले हिरणों की अचानक मौत इस चिड़ियाघर में पहली बार हुई है। डॉक्टरों को जानवरों के इलाज के लिए पर्याप्त समय भी नहीं मिल पाया।

स्थानीय प्रशासन अलर्ट

लगातार मौतों के बाद चिड़ियाघर प्रशासन और वन विभाग हाई अलर्ट पर है। जांच रिपोर्ट आने के बाद ही असल वजह स्पष्ट हो पाएगी।

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