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सुरक्षा पर सवाल: महिला वनरक्षक ने लगाई न्याय की गुहार, मानसिक-आर्थिक प्रताड़ना के आरोप

बिलासपुर।  TODAY छत्तीसगढ़  /  वन विभाग की महिला वनरक्षक द्वारा लिखा गया दो पन्नों का पत्र केवल एक शिकायत नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र की संवेदनशीलता, जवाबदेही और महिला सुरक्षा के दावों की वास्तविकता को परखने वाला दस्तावेज बनकर सामने आया है।

बिलासपुर वनमण्डल के अनुसन्धान एवं विस्तार विभाग की महिला वनरक्षक ओसिन रानी सिंह ने पत्र में महिला ने स्पष्ट रूप से अपने ही विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों और कर्मचारियों पर मानसिक, आर्थिक और सामाजिक प्रताड़ना के आरोप लगाए हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह आरोप किसी निजी संस्था पर नहीं, बल्कि एक शासकीय विभाग पर हैं—जहां नियम, संरचना और शिकायत निवारण तंत्र पहले से स्थापित होना चाहिए। 

पीड़िता ने अपने पत्र में वनमंडलाधिकारी नीरज कुमार यादव, वनरक्षक बंसल महिलागे और भूपेंद्र उहरिया पर मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना के गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने बताया कि लगातार प्रताड़ना के चलते उनकी शारीरिक और मानसिक स्थिति भी प्रभावित हो रही है।

महिला वनरक्षक का कहना है कि उन्होंने इस मामले में उच्च अधिकारियों से भी शिकायत की, लेकिन कहीं सुनवाई नहीं हुई। ऐसे में उन्होंने मीडिया के माध्यम से अपनी आवाज सरकार तक पहुंचाने की अपील की है। पीड़िता ने अपने आरोपों के समर्थन में एक आडियो/वीडियो भी साझा किया है, जिसमें कथित तौर पर आपत्तिजनक भाषा का उपयोग किया गया है। हालांकि, इसकी स्वतंत्र पुष्टि अभी बाकी है।  

पत्र क्या कहता है — आरोपों की परतें

पत्र के अनुसार— महिला को लगातार मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है, आर्थिक दबाव और कार्यस्थल पर उत्पीड़न का आरोप, गाली-गलौज और अपमानजनक व्यवहार का उल्लेख है। महिला कर्मी का कहना है कि शिकायत के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं होना वन कार्यालय में जंगल कानून जैसा लगता है। इस पुरे मामले में सबसे गंभीर आरोप यह है कि पीड़िता ने विभागीय स्तर पर शिकायत करने के बाद भी कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं होने की बात कही है, जिससे यह संकेत मिलता है कि या तो शिकायत प्रणाली निष्क्रिय है या जानबूझकर अनदेखी की जा रही है। 

50 करोड़ की पैंगोलिन के साथ दो तस्कर गिरफ्तार, बड़ा वन्यजीव तस्करी मामला ?


रायपुर। 
TODAY छत्तीसगढ़  /  छत्तीसगढ़ वन विभाग की टीम ने राजधानी रायपुर में बड़ी कार्रवाई करते हुए दुर्लभ वन्यजीव पैंगोलिन के साथ दो तस्करों को गिरफ्तार किया है। जब्त पैंगोलिन का वजन करीब 20 किलोग्राम बताया जा रहा है, जिसकी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत लगभग 50 करोड़ रुपये आंकी गई है।

वन विभाग को सूचना मिली थी कि भाठागांव क्षेत्र के पास रावांभाठा, वालफोर्ट सिटी के पीछे स्थित एक झुग्गी में दो संदिग्ध व्यक्ति ठहरे हुए हैं और उनके पास जिंदा पैंगोलिन है। सूचना के आधार पर टीम ने एक कर्मचारी को ग्राहक बनाकर मौके पर भेजा। 

कर्मचारी ने तस्करों से संपर्क कर पैंगोलिन दिखाने को कहा। आरोपियों ने जिंदा पैंगोलिन दिखाया और उसकी कीमत करोड़ों में बताई। सौदा तय होने के बाद कर्मचारी ने संकेत देकर बाहर इंतजार कर रही टीम को बुलाया। जैसे ही वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची, आरोपी भागने की कोशिश करने लगे, लेकिन टीम ने पीछा कर दोनों को पकड़ लिया। उनके कब्जे से 20 किलो वजनी पैंगोलिन जब्त की गई।

गिरफ्तार आरोपियों की पहचान प्यारेलाल गोपचे (जिला बलाघाट, मध्यप्रदेश) और गोखन हलदार (भानुप्रतापपुर, कांकेर) के रूप में हुई है। वन विभाग के अनुसार, दोनों आरोपियों की पिछले एक सप्ताह से तलाश की जा रही थी। फिलहाल दोनों के खिलाफ वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत मामला दर्ज कर आगे की जांच की जा रही है। 

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रामसर साइट कोपरा के पास सकर्रा में प्रस्तावित स्टील प्लांट नहीं लगेगा, कंपनी ने खुद लिया फैसला


बिलासपुर।
जिले के सकरी क्षेत्र में प्रस्तावित स्टील प्लांट परियोजना को लेकर एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। IMAEC स्टील एंड पावर लिमिटेड ने पर्यावरणीय कारणों का हवाला देते हुए अपनी प्रस्तावित ग्रीनफील्ड स्टील प्लांट परियोजना को स्वेच्छा से वापस लेने का निर्णय लिया है। इस संबंध में कंपनी ने छत्तीसगढ़ राज्य वेटलैंड प्राधिकरण को औपचारिक पत्र भेजकर अपने आवेदन को निरस्त करने का अनुरोध किया है।

कंपनी द्वारा 20 अप्रैल 2026 को भेजे गए पत्र के अनुसार, ग्राम सकरी, तहसील सकरी, जिला बिलासपुर में प्रस्तावित इस परियोजना के लिए वेटलैंड NOC हेतु आवेदन प्रस्तुत किया गया था। यह आवेदन 24 मार्च 2026 को संबंधित प्राधिकरण के समक्ष रखा गया था। 

कंपनी ने अपने पत्र में उल्लेख किया है कि परियोजना स्थल के समीप स्थित कोपर्रा जलाशय (रामसर साइट/वेटलैंड क्षेत्र) पर्यावरणीय दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील है। यह क्षेत्र समृद्ध जैव विविधता (फ्लोरा एवं फौना) से भरपूर है और यहां विभिन्न प्रजातियों के पक्षियों का आवागमन होता है।

वन विभाग एवं अन्य संबंधित एजेंसियों से प्राप्त जानकारी के आधार पर यह स्पष्ट हुआ कि इस क्षेत्र का पर्यावरणीय महत्व अत्यधिक है। ऐसे में किसी भी औद्योगिक परियोजना से यहां के पारिस्थितिक संतुलन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

IMAEC स्टील एंड पावर लिमिटेड ने अपने पत्र में कहा है कि वह पर्यावरण संरक्षण के प्रति प्रतिबद्ध है और इसी को ध्यान में रखते हुए कंपनी ने यह निर्णय लिया है। कंपनी ने स्पष्ट किया कि प्रस्तावित स्टील प्लांट (जिसमें DRI किल्न, पावर प्लांट और अन्य सहायक इकाइयां शामिल थीं) को पूरी तरह से वापस लिया जा रहा है।

कंपनी ने यह भी बताया कि पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) के PARIVESH पोर्टल पर प्रस्तुत आवेदन को भी विधिवत वापस ले लिया गया है। कंपनी ने वेटलैंड NOC के लिए दिए गए आवेदन को निरस्त मानते हुए इस संबंध में आगे किसी भी प्रकार की कार्रवाई न करने का अनुरोध किया है।

इस फैसले को पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है। आमतौर पर औद्योगिक परियोजनाओं को लेकर पर्यावरणीय विवाद सामने आते रहते हैं, लेकिन इस मामले में कंपनी द्वारा स्वयं परियोजना वापस लेना एक महत्वपूर्ण संकेत है। 

गौरतलब हो कि कल ही हमने इस आशय को लेकर एक खबर प्रकाशित की थी उसके बाद  यह बड़ा और ऐतिहासिक फैसला लिया गया।  आपको बता दें कि छत्तीसगढ़ की पहली रामसर साइट कोपरा जलाशय एक बार फिर विवादों के केंद्र में थी। प्रस्तावित स्टील एवं पावर प्लांट परियोजना के लिए तैयार इनवायरमेंट इंपैक्ट एसेसमेंट (EIA) रिपोर्ट में कथित तौर पर भ्रामक जानकारी दिए जाने का मामला सामने आया था । इसको लेकर अधिवक्ता संदीप तिवारी एवं वाइल्डलाइफ फोटोजर्नलिस्ट सत्यप्रकाश पांडेय ने गंभीर आपत्ति दर्ज कराई थी। इधर वेटलैंड अथॉरिटी ने बिलासपुर कलेक्टर को पत्र भेजकर दर्ज आपत्ति और शिकायतों की जांच करने कहा था ।  

श्री तिवारी ने वेटलैंड अथॉरिटी को भेजे पत्र में उल्लेख किया है कि EIA रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि परियोजना स्थल के 10 किलोमीटर दायरे में किसी भी वन्यजीव का प्रवासी मार्ग नहीं है। जबकि वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 के अनुसार पक्षियों को भी वन्यजीव की श्रेणी में रखा गया है।

रामसर कन्वेंशन को दी गई आधिकारिक जानकारी के अनुसार कोपरा जलाशय 161 प्रजातियों के पक्षियों का महत्वपूर्ण आवास है। इनमें 58 प्रवासी प्रजातियां शामिल हैं, जो सेंट्रल एशियन फ्लाईवे के माध्यम से हर वर्ष यहां पहुंचती हैं। इनमें पांच अत्यंत संकटग्रस्त प्रजातियां भी हैं।

“रामसर साइट कोपरा पर संकट ? EIA रिपोर्ट में ‘गायब’ हो गए प्रवासी पक्षी !”  

“रामसर साइट कोपरा पर संकट ? EIA रिपोर्ट में ‘गायब’ हो गए प्रवासी पक्षी !”


रायपुर। 
TODAY छत्तीसगढ़  /  छत्तीसगढ़ की पहली रामसर साइट कोपरा जलाशय एक बार फिर विवादों के केंद्र में है। प्रस्तावित स्टील एवं पावर प्लांट परियोजना के लिए तैयार इनवायरमेंट इंपैक्ट एसेसमेंट (EIA) रिपोर्ट में कथित तौर पर भ्रामक जानकारी दिए जाने का मामला सामने आया है। इसको लेकर अधिवक्ता संदीप तिवारी एवं वाइल्डलाइफ फोटोजर्नलिस्ट सत्यप्रकाश पांडेय ने गंभीर आपत्ति दर्ज कराई है। इधर वेटलैंड अथॉरिटी ने बिलासपुर कलेक्टर को पत्र भेजकर दर्ज आपत्ति और शिकायतों की जांच करने कहा है।  

श्री तिवारी ने वेटलैंड अथॉरिटी को भेजे पत्र में उल्लेख किया है कि EIA रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि परियोजना स्थल के 10 किलोमीटर दायरे में किसी भी वन्यजीव का प्रवासी मार्ग नहीं है। जबकि वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 के अनुसार पक्षियों को भी वन्यजीव की श्रेणी में रखा गया है।

रामसर कन्वेंशन को दी गई आधिकारिक जानकारी के अनुसार कोपरा जलाशय 161 प्रजातियों के पक्षियों का महत्वपूर्ण आवास है। इनमें 58 प्रवासी प्रजातियां शामिल हैं, जो सेंट्रल एशियन फ्लाईवे के माध्यम से हर वर्ष यहां पहुंचती हैं। इनमें पांच अत्यंत संकटग्रस्त प्रजातियां भी हैं।

Central Asian Flyway का एक अंतरराष्ट्रीय प्रवासी मार्ग है, जिसके जरिए पक्षी हर साल ठंड के मौसम में उत्तर (साइबेरिया/मध्य एशिया) से भारत जैसे देशों में आते हैं। यह मार्ग पक्षियों के लिए भोजन, विश्राम और जीवित रहने के लिए महत्वपूर्ण आर्द्रभूमियों (जैसे कोपरा जलाशय) पर निर्भर करता है। इसलिए इस मार्ग के किसी भी स्थल को नुकसान पहुंचाना प्रवासी पक्षियों और पूरे पारिस्थितिक तंत्र पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है।

श्री तिवारी का कहना है कि रिपोर्ट में सेंट्रल एशियन फ्लाईवे के महत्व को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया है। उन्होंने मांग की है कि भ्रामक एवं अपूर्ण जानकारी के आधार पर तैयार EIA रिपोर्ट को निरस्त किया जाए तथा एक स्वतंत्र एवं वैज्ञानिक अध्ययन कराया जाए, जिसमें परियोजना के समग्र पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन हो।

वेटलैंड अथॉरिटी द्वारा मामले को कलेक्टर बिलासपुर को भेजे जाने पर भी आपत्ति जताई गई है। तिवारी का कहना है कि रामसर से संबंधित तकनीकी जानकारी वेटलैंड अथॉरिटी के पास उपलब्ध है, ऐसे में इसकी जांच भी उसी स्तर पर की जानी चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि जिला प्रशासन इस प्रकार के जटिल पर्यावरणीय मुद्दे का तकनीकी परीक्षण कैसे कर पाएगा। 

इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन को लेकर बहस तेज कर दी है। एक ओर औद्योगिक परियोजनाओं के माध्यम से आर्थिक विकास की बात कही जा रही है, वहीं दूसरी ओर जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर चिंता व्यक्त की जा रही है। 

पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि रामसर साइट जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में किसी भी परियोजना को स्वीकृति देने से पहले अत्यंत सावधानी बरतना आवश्यक है। यदि प्रवासी पक्षियों के मार्ग और आवास प्रभावित होते हैं, तो इसका असर केवल स्थानीय नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी देखने को मिल सकता है।

कोपरा जलाशय का मामला केवल एक परियोजना का नहीं, बल्कि नीति और प्राथमिकताओं का सवाल है। यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संरक्षित वेटलैंड भी सटीक जानकारी और जिम्मेदारी के अभाव में खतरे में पड़ जाएं, तो यह बेहद चिंताजनक स्थिति है। आवश्यक है कि संबंधित एजेंसियां पारदर्शिता और वैज्ञानिक आधार पर निर्णय लें, ताकि विकास के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण भी सुनिश्चित हो सके।

तुंगल इको-टूरिज्म सेंटर बना बदलाव की मिसाल, आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ीं महिलाएं


रायपुर/सुकमा।
  TODAY छत्तीसगढ़  / छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में वन विभाग की एक पहल ने विकास और पुनर्वास की नई मिसाल पेश की है। वन मंत्री केदार कश्यप के मार्गदर्शन में विकसित तुंगल इको-पर्यटन केंद्र आज आत्मनिर्भरता और सामाजिक बदलाव का प्रतीक बनकर उभरा है।

सुकमा नगर से लगभग एक किलोमीटर दूर स्थित यह स्थान कभी उपेक्षित और जर्जर था, लेकिन अब यह एक आकर्षक पर्यटन केंद्र के रूप में पहचान बना चुका है। प्राकृतिक सौंदर्य, टापुओं का निर्माण और शांत वातावरण पर्यटकों को अपनी ओर खींच रहा है। पड़ोसी राज्य ओडिशा से भी बड़ी संख्या में पर्यटक यहां पहुंच रहे हैं।

इस केंद्र की सबसे खास पहल “तुंगल नेचर कैफे” है, जिसे ‘आत्मसमर्पण पुनर्वास महिला स्वयं सहायता समूह’ संचालित कर रहा है। समूह की 10 महिलाओं में 5 ने नक्सलवाद का रास्ता छोड़कर आत्मसमर्पण किया है, जबकि अन्य महिलाएं नक्सल हिंसा से प्रभावित रही हैं। इन्हें विशेष प्रशिक्षण देकर आत्मनिर्भर बनाया गया है। आज ये महिलाएं आत्मविश्वास के साथ पर्यटकों का स्वागत कर रही हैं और सम्मानजनक जीवन जी रही हैं। जो कभी भय और संघर्ष के माहौल में थीं, वे अब स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता की मिसाल बन चुकी हैं।

पर्यटन केंद्र की लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 31 दिसंबर 2025 से 30 मार्च 2026 तक यहां 8,889 पर्यटक पहुंचे और लगभग 2.92 लाख रुपये की आय हुई। यहां आने वाले पर्यटक स्थानीय व्यंजनों का स्वाद लेने के साथ-साथ कयाकिंग, पैडल बोटिंग और बांस राफ्टिंग जैसी गतिविधियों का भी आनंद ले रहे हैं। यह पहल दर्शाती है कि सही दिशा और अवसर मिलने पर जीवन की दिशा बदली जा सकती है। तुंगल इको-पर्यटन केंद्र न केवल पर्यटन को बढ़ावा दे रहा है, बल्कि समाज में सकारात्मक बदलाव की मजबूत नींव भी रख रहा है।

माहुल: एक वृक्ष का संकट; आजीविका, पर्यावरण और परंपरा—तीनों पर खतरा


बिलासपुर।
  TODAY छत्तीसगढ़  /  छत्तीसगढ़ के जंगलों में जीवन और आजीविका का आधार रहे ‘माहुल’ वृक्ष पर अब अस्तित्व का संकट गहरा गया है। अंतरराष्ट्रीय संस्था IUCN ने इसे अपनी रेड डेटा बुक में सर्वाधिक संकटग्रस्त (Critically Endangered) प्रजाति के रूप में दर्ज किया है। यह खुलासा न केवल पर्यावरणविदों, बल्कि उन हजारों परिवारों के लिए भी चिंता का विषय बन गया है, जिनकी रोजी-रोटी इस वृक्ष पर निर्भर है। 

वन अनुसंधानों में सामने आया है कि पौधरोपण के प्रति अनिच्छा, जंगलों की अंधाधुंध कटाई, संरक्षण की अनदेखी और इसके बीजों का समुचित उपयोग न होना जैसे कारणों से माहुल तेजी से विलुप्ति की कगार पर पहुंच गया है। यह स्थिति इसलिए भी गंभीर है क्योंकि ‘माहुल परिवार’ का प्रमुख वृक्ष पलाश पहले ही इसी तरह के संकट से गुजर रहा है। 

माहुल की पत्तियां ग्रामीण और आदिवासी अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती हैं। दोना-पत्तल निर्माण, छप्पर और घरेलू उपयोग, बीजों से औषधि निर्माण और जड़ों से पारंपरिक दवाइयां बनाई जाती रही हैं। ग्रामीण जनजीवन और कुछ शहरी क्षेत्र के हजारों परिवारों का जीवनयापन 'माहुल' से जुड़ा हुआ है।

सबसे आश्चर्य और हैरत की बात यह है कि यह हर जमीन पर उगने वाला ‘जीवन वृक्ष’ है। माहुल की खासियत यह है कि यह लगभग हर प्रकार की भूमि में उग सकता है जिसकी ऊंचाई 10–30 मीटर तक हो सकती है । यह वृक्ष मिट्टी के कटाव को रोकता है साथ ही पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखता है। इसके अलावा बेल और वृक्ष की छाल से रस्सी, तने से टोकरी व चटाई और पत्तियों से पर्यावरण अनुकूल उत्पाद तैयार किए जाते हैं। ऐसे में यह सिर्फ एक पेड़ का संकट नहीं है बल्कि यह उस पूरी जीवन-श्रृंखला का संकट है, जो इससे जुड़ी हुई है। 


नक्सल मुक्ति के बाद जंगलों में ‘शिकार राज’ ! VIDEO से खुला 9 दुर्लभ गिलहरियों के शिकार का कांड


दंतेवाड़ा / रायपुर ।
  TODAY छत्तीसगढ़  / छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभाव से मुक्त हो रहे इलाकों में अब एक नया खतरा तेजी से उभर रहा है—वन्यजीवों का संगठित अवैध शिकार। दंतेवाड़ा क्षेत्र में (गीदम-बारसूर) 9 दुर्लभ भारतीय विशाल गिलहरियों (Indian Giant Squirrel या Malabar Giant Squirrel) के शिकार का सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसने जंगलों की सुरक्षा और वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 


इस पूरे मामले का खुलासा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर वायरल एक वीडियो से हुआ, जिसमें आरोपी शिकार की गई गिलहरियों के साथ दिखाई दे रहे थे। वीडियो सामने आने के बाद वन विभाग की टीम हरकत में आई और संयुक्त कार्रवाई करते हुए मुख्य आरोपी बंशीराम कोवासी को दंतेवाड़ा के बारसूर क्षेत्र से गिरफ्तार किया।  

वन महकमें को तलाशी में आरोपी के घर से भालू की खाल, शिकार में इस्तेमाल होने वाले फंदे बरामद हुए। यह मामला Wildlife Protection Act 1972 की अनुसूची-1 में शामिल प्रजाति से जुड़ा है, जहां सजा बेहद कठोर है। वन विभाग ने संकेत दिए हैं कि यह मामला अकेले व्यक्ति का नहीं, बल्कि संगठित शिकार नेटवर्क से जुड़ा हो सकता है। इस मामले में शामिल अन्य आरोपी फरार हैं और उनकी तलाश जारी है। 


जानकारों का और स्थानीय सूत्रों का कहना है कि जिन इलाकों में पहले नक्सली गतिविधियों के कारण मानव गतिविधि सीमित थी, वहां अब नियंत्रण कमजोर पड़ते ही शिकार की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं।  इस मामले में गिरफ्तार आरोपी ने अपने वायरल वीडियो में जिस गाने को बैग्राउंड में बजाया है वो प्रदेश के कुख्यात नक्सली कमांडर हिड़मा के ऊपर बनाया गया गीत है। मतलब साफ़ है कि फिर नक्सली हिड़मा के गाने पर रील बनाकर इंस्टाग्राम पर डालने वाले गिरोह के तार और गहरे हैं। 

इस घटना ने वन विभाग की निगरानी प्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। शिकार की गतिविधियां लंबे समय से जारी थीं, सोशल मीडिया पर वीडियो आने के बाद ही वन महकमें की नींद खुली और आरोपी के खिलाफ कार्रवाई की गयी। इतना ही नहीं वन अमले का जमीनी स्तर पर गश्त और इंटेलिजेंस कमजोर दिखाई देता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जंगलों में फंदे और अवैध शिकार अब आम होता जा रहा है, लेकिन समय रहते रोकथाम नहीं हो पा रही।

जहरीला कुत्ता बना काल: 25 गिद्धों की मौत से हड़कंप, वन विभाग जांच में जुटा


लखनऊ।
  TODAY छत्तीसगढ़  / लखीमपुर खीरी के भीरा थाना क्षेत्र स्थित सेमरिया गांव में मंगलवार को एक खेत में मरा हुआ कुत्ता खाने से लुप्तप्राय प्रजाति के 25 गिद्धों की मौत हो गई. गांव वालों ने बकरियों पर हमला करने वाले हिंसक कुत्तों को मारने के लिए चावल में कीटनाशक (पेस्टीसाइड) मिलाकर खिलाया था. इस जहरीले भोजन को खाकर एक कुत्ते की मौत हुई, जिसे खाने के लिए गिद्धों का झुंड वहां पहुंचा. जहर इतना घातक था कि कुत्ते का मांस खाते ही 25 गिद्धों ने मौके पर दम तोड़ दिया, जबकि 5 गिद्धों की हालत अब भी गंभीर बनी हुई है. वन विभाग ने सभी शवों को कब्जे में लेकर जांच शुरू कर दी है. 

सेमरिया गांव के लोगों ने बताया कि उन्होंने सालों से एक साथ इतने गिद्धों का झुंड नहीं देखा था. जब शुरुआत में तकरीबन 40 गिद्ध वहां कुत्ते का शव खाने जुटे, तो ग्रामीण उन्हें देखकर खुश थे. लेकिन कुछ ही देर में यह खुशी मातम में बदल गई. ग्रामीणों के सामने ही एक-एक कर गिद्ध तड़पने लगे और देखते ही देखते खेत में गिद्धों की लाशों का ढेर लग गया. प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, करीब 25 गिद्धों ने तुरंत दम तोड़ दिया.

दुधवा टाइगर रिजर्व बफर जोन की डीएफओ कीर्ति चौधरी ने बताया कि किसान अपनी बकरियों और खेतों में आने वाले जानवरों से परेशान था. उसने चावल में पेस्टीसाइड मिलाकर कुत्तों के लिए रखा था. इसे खाकर जिस कुत्ते की मौत हुई, वह गिद्धों के लिए काल बन गया.वन विभाग की टीम ने त्वरित कार्रवाई करते हुए मृत गिद्धों का पोस्टमार्टम कराया है. अधिकारियों के मुताबिक, जहर के असर की सटीक पुष्टि के लिए विसरा सुरक्षित कर आईवीआरआई (IVRI) बरेली भेजा जा रहा है. 

गिद्धों की यह मौत पर्यावरण के लिए किसी बड़ी त्रासदी से कम नहीं है. गिद्ध पहले से ही लुप्तप्राय श्रेणी में हैं और सरकार टाइगर रिजर्व के पास सेंचुरी बनाकर उन्हें बचाने का प्रयास कर रही है. ऐसे में एक ही स्थान पर 25 गिद्धों का मरना संरक्षण प्रयासों को बड़ा झटका है. फिलहाल, 5 गंभीर रूप से बीमार गिद्धों को बचाने की कोशिश की जा रही है. वन विभाग इस पूरे मामले में कानूनी कार्रवाई की प्रक्रिया भी देख रहा है. (साभार / आजतक )



करंट से वन्यजीवों की मौत पर हाई कोर्ट सख्त, अपर मुख्य सचिव से मांगा शपथ पत्र


रायपुर ।
  TODAY छत्तीसगढ़  / छत्तीसगढ़ में बिजली करंट से हो रही हाथियों और अन्य वन्यजीवों की लगातार मौत के मामलों पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने स्वत: संज्ञान लेते हुए वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के अपर मुख्य सचिव से शपथ पत्र प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। सोमवार को मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा एवं न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ में मामले की सुनवाई हुई।

 लगातार घटनाओं ने बढ़ाई चिंता

रायपुर निवासी नितिन सिंघवी की ओर से अदालत में प्रस्तुत समाचार पत्रों की कतरनों के आधार पर बताया गया कि मार्च माह में प्रदेश के विभिन्न जिलों में करंट से कई वन्यजीवों की मौत हुई है। इनमें प्रमुख घटनाएं— रायगढ़ के घरघोड़ा वन क्षेत्र में दो हाथी शावकों की मौत,  सूरजपुर के प्रतापपुर में खेत में करंट तार से हाथी की मौत, कोरबा में 11 केवी तार की चपेट में मादा भालू व दो शावकों की मौत AUR मैनपाट व सारंगढ़ क्षेत्रों में अवैध करंट से मानव और वन्यजीवों की मौत शामिल हैं।

 कोर्ट ने मांगा विस्तृत जवाब

खंडपीठ ने अपर मुख्य सचिव से यह स्पष्ट करने को कहा है कि उक्त घटनाएं किन परिस्थितियों में हुईं जिम्मेदार अधिकारियों ने क्या कार्रवाई की ? भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं ? 

 अवैध करंट बना मौत का कारण

प्राथमिक तौर पर सामने आया है कि खेतों व जंगलों में जंगली जानवरों से फसलों की सुरक्षा या शिकार के लिए अवैध रूप से करंट युक्त तार बिछाए जा रहे हैं, जो वन्यजीवों के लिए घातक साबित हो रहे हैं। हाईकोर्ट ने मामले को गंभीर मानते हुए अगली सुनवाई 5 मई को निर्धारित की है और तब तक संबंधित विभाग से शपथ पत्र प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।

जंगली सुअर का शिकार: मांस पकाते पकड़े गए पांच आरोपी, न्यायिक हिरासत में भेजे गए जेल


बिलासपुर। 
 TODAY छत्तीसगढ़  /  वन्य जीव संरक्षण को लेकर सख्ती दिखाते हुए वन विभाग ने जंगली सुअर के शिकार और उसका मांस पकाने के मामले में बड़ी कार्रवाई की है। विभाग की टीम ने दबिश देकर पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया है। सभी आरोपियों को न्यायालय में पेश करने के बाद 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया।

वन विभाग से मिली जानकारी के अनुसार वन परिक्षेत्र अधिकारी बेलगहना देव सिंह मरावी को मुखबिर से सूचना मिली थी कि अट्टडा गांव में जंगली सुअर का मांस पकाया जा रहा है।सूचना मिलते ही वन विभाग की टीम ने मौके पर दबिश दी। वहां पका हुआ मांस बरामद किया गया। इसके साथ ही मांस काटने और पकाने में शामिल लोगों की पहचान कर उन्हें एक-एक कर हिरासत में लिया गया। पूछताछ के दौरान आरोपियों ने वन अपराध करना स्वीकार कर लिया।

वन विभाग ने बताया कि सभी आरोपियों के खिलाफ वन्य प्राणी संरक्षण अधिनियम 1972 की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है। प्रकरण क्रमांक 11386/25 दिनांक 1 अप्रैल 2026 को दर्ज कर पांचों आरोपियों को विधिवत गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तार आरोपियों में रूपलाल (29 वर्ष), नितिन (19 वर्ष), संदीप (20 वर्ष), गोविंद (54 वर्ष) और रामकुमार (51 वर्ष) शामिल हैं। सभी आरोपी अट्टडा गांव के निवासी बताए गए हैं। कार्रवाई के बाद सभी आरोपियों को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, बिलासपुर के समक्ष पेश किया गया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक अभिरक्षा में सेंट्रल जेल भेज दिया गया।

संजय वन वाटिका: 15 मौतें, एक फरार हिरण और सोता हुआ सिस्टम


अंबिकापुर।
  TODAY छत्तीसगढ़  /  शहर के संजय वन वाटिका में लगातार हो रही घटनाएं अब सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि वन्य प्रबंधन की गंभीर विफलता की तस्वीर पेश कर रही हैं। ऐसा लगता है कि संजय वन वाटिका “संरक्षण” नहीं, बल्कि “उपेक्षा” का जीवंत उदाहरण है। जिस स्थान का उद्देश्य वन्य प्राणियों को सुरक्षा और संरक्षण देना है, वही अब उनकी असुरक्षा और मौत का कारण बनता दिख रहा है।

21 मार्च की रात आवारा कुत्तों के हमले में 15 वन्य प्राणियों (चीतल, सांभर और कोटरी) की दर्दनाक मौत ने पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया था। इस घटना की जांच और जिम्मेदारी तय होने से पहले ही 30 मार्च की रात एक और चौंकाने वाली घटना सामने आ गई। 

बताया जा रहा है कि चारा डालने के दौरान एक कर्मचारी ने घेराबंदी का गेट खुला छोड़ दिया, जिसका फायदा उठाकर एक हिरण वन वाटिका से बाहर भाग निकला। यह घटना न सिर्फ सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोलती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि बुनियादी सावधानियां तक नहीं बरती जा रही हैं। हिरण के भागने के बाद कुछ वनकर्मी टॉर्च लेकर उसकी तलाश करते नजर आए, लेकिन यह कोशिश ज्यादा औपचारिकता निभाने जैसी ही लगी। सवाल यह उठता है कि जब पहले ही इतनी बड़ी घटना हो चुकी थी, तो सुरक्षा को लेकर अतिरिक्त सतर्कता क्यों नहीं बरती गई? 

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यह घटनाएं केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं हैं, बल्कि यह उस मानसिकता को उजागर करती हैं जिसमें जवाबदेही का कोई भय नहीं और कर्तव्यबोध का कोई स्थान नहीं। जब तक जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों पर सख्त कार्रवाई नहीं होगी, तब तक यह “वन वाटिका” यूं ही “वन्य त्रासदी का केंद्र” बनी रहेगी। अब सवाल यह है कि जब जिम्मेदारी की कुर्सी पर बैठा व्यक्ति ही “अनदेखी” को अपना कार्यशैली बना ले, तो फिर नीचे के कर्मचारियों से सजगता की उम्मीद करना क्या महज एक औपचारिक मजाक नहीं है? 

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सरकारी रिसॉर्ट में चीतल का मांस पकाने के आरोप में 6 लोग गिरफ़्तार, 14 दिन की न्यायिक हिरासत में जेल दाखिल


बिलासपुर।
  TODAY छत्तीसगढ़  /  ज़िले में वन विभाग ने वन्यजीव शिकार से जुड़े एक मामले में छह लोगों को गिरफ़्तार किया है। अधिकारियों के अनुसार, यह कार्रवाई बेलगहना क्षेत्र में स्थित कुरदर के एक ईको पर्यटन रिसॉर्ट में की गई, जहां कथित तौर पर चीतल (हिरण) का मांस पकाया जा रहा था।

वन विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि वनमंडल अधिकारी नीरज कुमार को इस संबंध में सूचना मिली थी। इसके बाद एक टीम गठित कर रिसॉर्ट पर छापा मारा गया। टीम का नेतृत्व वन परिक्षेत्र अधिकारी देव सिंह मरावी कर रहे थे, जबकि कार्रवाई उपवनमंडल अधिकारी अनिल भास्करन के मार्गदर्शन में की गई।

अधिकारियों के मुताबिक, मौके से पका हुआ मांस बरामद किया गया। प्रारंभिक जांच में इसे नर चीतल का मांस बताया गया है। इस मामले में जिन लोगों को गिरफ़्तार किया गया है, उनसे पूछताछ के दौरान कथित तौर पर शिकार और मांस पकाने की बात स्वीकार की गई।

वन विभाग ने बताया कि आरोपियों के खिलाफ वन्य प्राणी संरक्षण अधिनियम 1972 की विभिन्न धाराओं—9, 39, 44, 50 और 51—के तहत मामला दर्ज किया गया है। ये धाराएं वन्यजीवों के शिकार, उनके अवैध कब्जे और संबंधित गतिविधियों को दंडनीय बनाती हैं। 

गिरफ़्तार किए गए लोगों में रामकुमार टोप्पो, जनक राम बैगा, देवसिंह बैगा, राजेश बैगा, लखन सिंह और रजनीश सिंह शामिल हैं। सभी को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, बिलासपुर की अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।  वन विभाग का कहना है कि मामले की आगे जांच जारी है और इस तरह की गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए निगरानी बढ़ाई जाएगी।  

कार्रवाई में वन विभाग बेलगहना के परिक्षेत्र सहायक शिवकुमार पैकरा, बीएफओ संतकुमार वाकरे, पंकज साहू, सोमप्रकाश जयसिंधु, सावन यादव, वन विकास निगम रेंजर रवि जगत, डिप्टी रेंजर अरविंद बंजारे और नंदकिशोर सिंह की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

ACB: सुरही रेंजर पल्लव नायक और डिप्टी रेंजर श्रीवास्तव 50 हजार की रिश्वत लेते रंगे हाथों गिरफ्तार


बिलासपुर। 
TODAY छत्तीसगढ़  /  एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) बिलासपुर की टीम ने गुरुवार को बड़ी कार्रवाई करते हुए अचानकमार टाइगर रिजर्व के सुरही रेंज में पदस्थ रेंजर पल्लव नायक और डिप्टी रेंजर मनीष श्रीवास्तव को 50 हजार रुपये की रिश्वत लेते रंगेहाथ पकड़ लिया। दोनों अधिकारियों पर एक प्रकरण में चालान जल्द पेश करने और जब्त वाहन वापस करने के एवज में रिश्वत मांगने का आरोप है।

ACB के डीएसपी अजितेश सिंह ने बताया कि मुंगेली जिले के लोरमी निवासी अजीत कुमार वैष्णव ने इस संबंध में शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत के अनुसार, दिसंबर 2025 में वह अपने साथियों के साथ सुरही रेंज क्षेत्र में चारपहिया वाहन से घूमने गया था, जहां एयर गन के साथ बनाई गई एक रील सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। इसके बाद वन विभाग ने कार्रवाई करते हुए वाहन जब्त कर लिया था और संबंधित लोगों को करीब 18 दिन जेल में भी रहना पड़ा।  

जेल से रिहा होने के बाद प्रार्थी जब मामले में जल्द चालान पेश कराने के लिए डिप्टी रेंजर मनीष श्रीवास्तव से मिला, तो उससे कथित तौर पर 4 से 5 लाख रुपये खर्च होने की बात कही गई। साथ ही वाहन छोड़ने के लिए 70 हजार रुपये रिश्वत मांगी गई। शिकायत का सत्यापन सही पाए जाने के बाद ACB ने ट्रैप की योजना बनाई। 26 मार्च को प्रार्थी को कोटा स्थित मित्र मिलन रेस्टोरेंट में आरोपियों को रिश्वत की पहली किश्त देने भेजा गया। यहां प्रार्थी ने मनीष श्रीवास्तव को 50 हजार रुपये सौंपे, तभी ACB टीम ने उसे रंगेहाथ पकड़ लिया।

कार्रवाई के दौरान मौके पर रेंजर पल्लव नायक भी मौजूद थे। जांच में यह भी सामने आया कि उन्होंने भी प्रार्थी से रिश्वत की मांग की थी। ACB ने मनीष श्रीवास्तव से रिश्वत की पूरी राशि बरामद कर ली है। दोनों आरोपियों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 की धारा 7 और 12 के तहत मामला दर्ज कर आगे की कार्रवाई की जा रही है।

ACB ने आम लोगों से अपील की है कि यदि कोई शासकीय कर्मचारी रिश्वत की मांग करता है तो इसकी सूचना तत्काल ACB को दें। उल्लेखनीय है कि पिछले दो वर्षों में ACB बिलासपुर की यह 45वीं ट्रैप कार्रवाई है, जो विभाग की सक्रियता को दर्शाती है।  


अचानकमार की आबोहवा में जहर घोलने वाला ये वीडियो, जिसके आरोपियों की मदद के लिए रेंजर और डिप्टी रेंजर लाखों रूपये की रिश्वत मांगते हुए आज पकडे गये। देखें पूरा वीडियो - 

दीवार में छुपाकर रखा गया था हाथी दांत; डीएनए जांच के लिए देहरादून भेजा जाएगा, तीन आरोपी गिरफ्तार


गरियाबंद।
 TODAY छत्तीसगढ़  /  ज़िले में उदंती सीतानदी टाइगर रिजर्व की एंटी-पोचिंग टीम ने वन्यजीव तस्करी के एक मामले में तीन लोगों को गिरफ्तार किया है। अधिकारियों के अनुसार, आरोपियों के पास से एक हाथी का दांत और शिकार से जुड़े कई उपकरण बरामद किए गए हैं। वन विभाग की ओर से जारी जानकारी के मुताबिक, यह कार्रवाई एक गोपनीय सूचना के आधार पर की गई। सूचना में कहा गया था कि कुल्हाड़ीघाट क्षेत्र का एक व्यक्ति जंगली हाथी का दांत अपने पास रखे हुए है और उसे बेचने की कोशिश कर रहा है।

इसके बाद सहायक संचालक के निर्देशन में गठित टीम ने संदिग्ध के घर और आसपास की तलाशी ली। तलाशी के दौरान अधिकारियों को एक हाथी का दांत बरामद हुआ, जिसे कथित तौर पर आरोपी ने अपने घर की दीवार में छुपाकर रखा था। विभाग का कहना है कि यह दांत पिछले चार वर्षों से वहां छिपा हुआ था। गिरफ्तार किए गए लोगों में एक आरोपी का पहले भी वन्यजीव अपराधों से जुड़ा रिकॉर्ड सामने आया है। अधिकारियों के अनुसार, वह हाल ही में सांभर के शिकार से जुड़े एक मामले में जमानत पर बाहर था और उसी दौरान इस मामले में कथित रूप से शामिल पाया गया।

वन विभाग ने आरोपियों के पास से दो धनुष, कई तीर, पक्षियों के शिकार में इस्तेमाल होने वाला विशेष उपकरण, गुलेल और अन्य सामग्री भी जब्त की है। अधिकारियों का कहना है कि यह सामग्री शिकार की गतिविधियों में इस्तेमाल की जा सकती है। पूछताछ के दौरान एक आरोपी ने दावा किया कि हाथी का दांत उसे 2021 में एक अन्य व्यक्ति से मिला था, जिसकी 2022 में हाथी-मानव संघर्ष के दौरान मौत हो गई थी। हालांकि, वन विभाग ने इस दावे पर संदेह जताया है।

अधिकारियों के मुताबिक, जब्त किए गए हाथी दांत के नमूने को डीएनए जांच के लिए देहरादून स्थित भारतीय वन्यजीव संस्थान भेजा जा रहा है। इससे यह पता लगाने की कोशिश की जाएगी कि यह दांत किस हाथी का है और उसकी मौत किन परिस्थितियों में हुई थी। वन विभाग का कहना है कि मामले की आगे जांच जारी है और इससे जुड़े अन्य पहलुओं की भी पड़ताल की जा रही है। 

वन विभाग घिरा: ‘रेस्क्यू सेंटर’ या अवैध जू? हिरणों की मौत के बाद उठे गंभीर सवाल


रायपुर ।
  TODAY छत्तीसगढ़  /  अंबिकापुर के संजय वन वाटिका में कुत्तों के हमले से 15 हिरणों की मौत के बाद वन विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल तेज हो गए हैं। रायपुर निवासी नितिन सिंघवी ने इस घटना को दुखद बताते हुए वन विभाग के उच्च अधिकारियों से पूछा है कि प्रदेश में ऐसे और कितने केंद्र संचालित हो रहे हैं, जिन्हें सेंट्रल जू अथॉरिटी (CZA) से मान्यता प्राप्त नहीं है।

‘रेस्क्यू सेंटर’ या अवैध जू?

सिंघवी का आरोप है कि संजय वाटिका को जू नहीं, बल्कि ‘रेस्क्यू सेंटर’ बताकर अधिकारियों द्वारा भ्रम फैलाया जा रहा है। उनका कहना है कि वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम के तहत रेस्क्यू सेंटर के लिए भी CZA की मान्यता अनिवार्य होती है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि यहां लाए गए वन्यजीवों को उपचार के बाद वापस जंगल में छोड़ा जाता है, तो उनकी संख्या लगातार कैसे बढ़ रही है। साथ ही, संरक्षित प्रजातियों—जैसे नीलगाय—को वहां रखने पर भी उन्होंने आपत्ति जताई है।

छोटे कर्मचारियों पर कार्रवाई, बड़े अधिकारी बचे?

सिंघवी ने यह भी आरोप लगाया कि घटना के बाद कार्रवाई केवल निचले स्तर के कर्मचारियों तक सीमित रखी जा रही है, जबकि जिम्मेदारी तय करते समय उच्च अधिकारियों की भूमिका पर सवाल नहीं उठाए जा रहे। उनका कहना है कि यदि टिकट लेकर आम लोगों के लिए वन्यजीवों का प्रदर्शन किया जा रहा है, तो यह सीधे तौर पर ‘जू संचालन’ की श्रेणी में आता है, जिसके लिए विधिवत मान्यता जरूरी है।

अन्य केंद्रों पर भी सवाल

सिंघवी ने सरगुजा के रमकोला स्थित एलीफेंट रेस्क्यू एंड रिहैबिलिटेशन सेंटर, बारनवापारा अभ्यारण के वन भैंसा ब्रीडिंग सेंटर और उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में संचालित केंद्रों का उदाहरण देते हुए पूछा कि क्या ये सभी संस्थान पूर्ण मान्यता के साथ संचालित हो रहे हैं या नहीं। इसके अलावा, रायपुर और राजनांदगांव में इको-टूरिज्म के नाम पर सीमित क्षेत्र में फेंसिंग कर वन्यजीवों को रखने की व्यवस्था पर भी उन्होंने सवाल उठाए हैं।

नंदनवन और पुराने मामलों का जिक्र

सिंघवी ने रायपुर के नंदनवन में वन्यजीवों को लंबे समय तक रखने और धमतरी जिले में निजी जू पर हुई कार्रवाई का हवाला देते हुए पूछा कि यदि निजी संचालकों पर कार्रवाई हो सकती है, तो सरकारी स्तर पर जिम्मेदारी क्यों तय नहीं की जाती।

मांग: पारदर्शिता और जवाबदेही

सिंघवी ने मांग की है कि प्रदेश में संचालित सभी ऐसे केंद्रों की स्थिति सार्वजनिक की जाए और जहां भी नियमों का उल्लंघन हो रहा है, वहां कार्रवाई की जाए। साथ ही, उन्होंने इन केंद्रों में रखे गए वन्यजीवों को सुरक्षित अभ्यारणों में छोड़ने की भी मांग उठाई है। इस पूरे मामले में वन विभाग की ओर से विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार है, लेकिन घटना ने एक बार फिर वन्यजीव संरक्षण और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 


Wildlife Deaths: कुत्तों के हमले के बाद संजय वन वाटिका बंद, 15 चीतलों की मौत


सरगुजा।
  TODAY छत्तीसगढ़  / छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर स्थित संजय वन वाटिका में 15 चीतलों की मौत ने सिर्फ एक हादसे का नहीं, बल्कि व्यवस्था की गहरी खामियों का सवाल खड़ा कर दिया है। जिस जगह को वन्यजीवों के संरक्षण के लिए बनाया गया था, वही अब उनकी असुरक्षा और मौत का कारण बनती दिख रही है। 

बताया जा रहा है कि 21 मार्च की रात पांच-छह आवारा कुत्ते बाड़े की कमजोर फेंसिंग का फायदा उठाकर अंदर घुस गए। इसके बाद जो हुआ, वह किसी भी संरक्षण क्षेत्र के लिए शर्मनाक है। यहां मौजूद हिरण प्रजाति के कई वन्यजीव आवारा कुत्तों के सामने बेबस, असहाय दिखे। बताया जा रहा है कि संजय पार्क में आवारा कुत्तों ने 14 चीतल और एक सांभर को मार डाला है । एक अन्य घायल चीतल ने आज सुबह दम तोड़ दिया। वन विभाग ने मरे हुए वन्यप्राणियों के शव को आनन-फानन में जला भी दिया है ताकि बड़े और गंभीर सवालों से बचा जा सके। 

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ एक ‘दुर्घटना’ है, या फिर लंबे समय से चली आ रही लापरवाही का नतीजा? प्रारंभिक जानकारी से साफ है कि बाड़े की फेंसिंग इतनी कमजोर थी कि आवारा कुत्ते आसानी से भीतर पहुंच गए। अगर यही सुरक्षा व्यवस्था है, तो फिर यह ‘वाटिका’ नहीं, एक खुला खतरा क्षेत्र बन चुका है। और सवाल यहीं खत्म नहीं होते क्या रात में कोई सुरक्षा गश्त नहीं थी? क्या निगरानी की कोई व्यवस्था नहीं थी? घटना रात में हुई, लेकिन इसकी जानकारी पार्क प्रबंधन और वन विभाग को अगले दिन सुबह मिली। इसका मतलब साफ है न तो तत्काल निगरानी थी, न ही कोई अलर्ट सिस्टम। संरक्षित क्षेत्र में अगर पूरी रात हिंसक हमला चलता रहे और किसी जिम्मेदार को खबर तक न हो, तो यह सिर्फ चूक नहीं, बल्कि तंत्र की विफलता है। 

हर बड़े हादसे के बाद ‘जांच के आदेश’ एक तय प्रक्रिया बन चुके हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या जांच से आगे भी कुछ होगा? क्या किसी अधिकारी की जवाबदेही तय होगी, या यह मामला भी फाइलों में दब जाएगा? हालांकि सुरक्षा में बड़ी चूक मानते हुए ड्यूटी पर तैनात 4 कर्मचारियों को तत्काल निलंबित (Suspend) कर दिया गया है। इस मामले में अब तक किसी बड़े अफसर पर गाज नहीं गिरी है, ना ही जवाबदेही तय की गई है। 

संरक्षण या दिखावा?

संजय वन वाटिका को पर्यटकों के लिए तीन दिनों के लिए बंद कर दिया गया है। लेकिन क्या यह कदम पर्याप्त है? जब तक सुरक्षा व्यवस्था की खामियों को दूर नहीं किया जाता, निगरानी तंत्र को मजबूत नहीं किया जाता और जिम्मेदारों पर कार्रवाई नहीं होती तब तक यह बंदी सिर्फ एक औपचारिकता भर ही रहेगी।

‘छोटू’ की शुद्धता पर विवाद, डीएनए रिपोर्ट से नहीं मिला समर्थन


रायपुर।
 TODAY छत्तीसगढ़  /  उदंती–सीतानदी टाइगर रिजर्व में रखे गए वन भैंसे ‘छोटू’ को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। वन विभाग जहां उसे अंतिम शुद्ध नस्ल का जंगली भैंसा बता रहा है, वहीं उपलब्ध डीएनए रिपोर्ट इस दावे की पुष्टि नहीं करती है।

डिप्टी डायरेक्टर स्तर पर प्रस्तुत की गई डीएनए रिपोर्ट का अध्ययन करने पर यह सामने आया है कि इसमें केवल उदंती क्षेत्र के भैंसों के आनुवंशिक आंकड़े और विविधता का उल्लेख है। रिपोर्ट में किसी एक भैंसे को शुद्ध नस्ल का घोषित नहीं किया गया है। ऐसे में छोटू को शुद्ध नस्ल का बताना वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित निष्कर्ष नहीं माना जा रहा है।

प्रजनन योजना पर उठे सवाल

वन विभाग असम से लाई गई मादा वन भैंसों के साथ छोटू का प्रजनन कराने की तैयारी कर रहा है। इस पर रायपुर निवासी नितिन सिंघवी ने आपत्ति जताते हुए शासन को पत्र लिखकर छोटू की शुद्धता की जांच की मांग की थी। शासन ने इस संबंध में प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) को दावों के परीक्षण के निर्देश दिए हैं। हालांकि आरोप है कि बिना किसी स्वतंत्र वैज्ञानिक जांच के ही छोटू को शुद्ध नस्ल का मान लिया गया और आगे इस विषय पर संज्ञान न लेने की अनुशंसा भी की गई।

वन्यजीव प्रेमियों की आवाज दबाने का आरोप

नितिन सिंघवी ने वन विभाग पर सूचना के अधिकार के तहत जानकारी देने में बाधा उत्पन्न करने और वन्यजीव प्रेमियों की आवाज दबाने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि यह लोकतांत्रिक परंपराओं के विरुद्ध है।

उम्र और प्रजनन क्षमता पर संशय

छोटू की उम्र को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। दस्तावेजों में अब भी उसकी उम्र 21 वर्ष दर्ज है, जबकि पूर्व अभिलेखों के आधार पर उसकी वास्तविक उम्र 24 वर्ष से अधिक मानी जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस उम्र में जंगली भैंसों की प्रजनन क्षमता काफी कम हो जाती है। वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में भी पूर्व में प्रजनन के प्रयासों के असफल रहने का उल्लेख किया गया है। ऐसे में वर्तमान प्रजनन योजना की व्यवहारिकता पर भी प्रश्न उठ रहे हैं।

अन्य मुद्दों पर भी जवाब बाकी

मामले में असम से लाई गई मादा भैंसों को वर्षों तक बाड़े में रखने, पूर्व में खरीदी गई भैंसों की डीएनए जांच न कराने और हाइब्रिड भैंसों पर हुए खर्च को लेकर भी कई सवाल उठाए गए हैं। फिलहाल, छोटू को लेकर उठे इस विवाद ने वन विभाग के दावों की वैज्ञानिकता और पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।

सूरजपुर: गर्लफ्रैंड के सामने ही वन कर्मचारी से मारपीट, गाना बजाकर नाचने के लिए कहा

सांकेतिक तस्वीर 
सूरजपुर।  TODAY छत्तीसगढ़  / छत्तीसगढ़ के सूरजपुर ज़िले से एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें वर्दी पहने एक व्यक्ति के साथ कुछ युवकों द्वारा मारपीट की जाती दिख रही है। स्थानीय लोगों का दावा है कि वीडियो कोतवाली थाना क्षेत्र के एक नर्सरी परिसर का है और उसमें दिख रहा व्यक्ति वन विभाग का कर्मचारी है।

सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो में कुछ युवक वनकर्मी से बहस करते और फिर उसके साथ मारपीट करते दिखाई देते हैं। वीडियो में यह भी देखा जा सकता है कि उसे गाना बजाकर नाचने के लिए कहा जा रहा है। स्थानीय सूत्रों का कहना है कि संबंधित कर्मचारी एक महिला के साथ नर्सरी परिसर में मौजूद था, जिसे लेकर कुछ युवकों ने आपत्ति जताई। इसके बाद कथित तौर पर विवाद बढ़ गया और मारपीट की घटना हुई।

इस मामले में अब तक पुलिस की ओर से कोई विस्तृत आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। कोतवाली थाना क्षेत्र की पुलिस ने कहा है कि वायरल वीडियो की जांच की जा रही है और तथ्यों की पुष्टि के बाद आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।  

ATR में नए सफारी वाहनों की शुरुआत, उप मुख्यमंत्री ने सौंपी चाबियां

बिलासपुर। TODAY छत्तीसगढ़  / प्रदेश के उप मुख्यमंत्री अरुण साव शुक्रवार को अचानकमार टाइगर रिजर्व स्थित शिवतराई बैगा रिसॉर्ट पहुंचे। यहां स्थानीय छात्र-छात्राओं और कलाकारों ने पारंपरिक लोक नृत्य प्रस्तुत कर उनका आत्मीय स्वागत किया। इस दौरान उप मुख्यमंत्री ने सदा सोहागी महिला स्व-सहायता समूह, सिवलखार द्वारा संचालित टाइगर केंटीन और सोविनियर शॉप का निरीक्षण किया।

सोविनियर शॉप में महिला समूह की सदस्य कु. रागिनी धुर्वे ने गोंडी आर्ट पेंटिंग तथा कु. तान्या मरावी ने अचानकमार टाइगर रिजर्व का प्रतीक चिन्ह भेंट कर उनका स्वागत किया। उप मुख्यमंत्री ने महिला समूहों के आत्मनिर्भरता प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि यह ग्रामीण सशक्तिकरण का उत्कृष्ट उदाहरण है और ऐसे प्रयासों से स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल रही है।

इस अवसर पर वन एवं वन्यप्राणियों की सुरक्षा में तैनात प्रशिक्षित वाइल्ड लाइफ स्निफर डॉग ‘नीतू’ ने सलामी देकर उप मुख्यमंत्री का सम्मान किया। श्री साव ने नीतू द्वारा किए जा रहे सर्चिंग और सुरक्षा कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि वन्यजीव संरक्षण में प्रशिक्षित टीमों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।

उप मुख्यमंत्री ने अचानकमार, सिवलखार और रंजकी वन प्रबंधन समितियों द्वारा क्रय किए गए पांच नए ‘योद्धा’ (महारानी) सफारी वाहनों की चाबी संबंधित समिति अध्यक्षों को सौंपकर उनका शुभारंभ किया। इसके साथ ही स्पेशल टाइगर प्रोटेक्शन टीम को ट्रेकिंग शू और टॉर्च वितरित किए गए, जिससे जंगल में गश्त और सुरक्षा कार्य और अधिक प्रभावी हो सके।  

नए सफारी वाहनों के शुरू होने से पर्यटकों को बेहतर सुविधा मिलने और पर्यटन गतिविधियों में वृद्धि की उम्मीद है। इससे स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे। उप मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार वन्यजीव संरक्षण के साथ-साथ स्थानीय समुदायों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए प्रतिबद्ध है, ताकि विकास और संरक्षण दोनों को साथ लेकर आगे बढ़ा जा सके। इस दौरान महावत शिवमोहन राजवाड़े को हाथियों के संरक्षण, देखभाल और कल्याण में उनके दीर्घकालीन योगदान के लिए सम्मानित किया गया। इस ख़ास मौके पर अचानकमार टाईगर रिजर्व प्रबंधन के सभी अधिकारी, कर्मचारी मौजूद रहे। 


ATR: जब जंगल में बाघ मरा और व्यवस्था खामोश रही


बिलासपुर।
  TODAY छत्तीसगढ़  /  आज 26 जनवरी को छत्तीसगढ़ के अचानकमार टाइगर रिज़र्व से आई एक ख़बर ने केवल वन्यजीव प्रेमियों को नहीं, बल्कि लोकतंत्र में जवाबदेही पर भरोसा रखने वाले हर नागरिक को असहज कर दिया। जंगल के भीतर एक युवा नर बाघ मृत पाया गया। आधिकारिक बयान आया, मौत दो बाघों के बीच आपसी संघर्ष का नतीजा है। फ़ाइलें चलीं, पोस्टमार्टम हुआ, रिपोर्ट बनी और मामला लगभग बंद मान लिया गया है। गणतंत्र दिवस के मौके पर आज जब तिरंगे के नीचे संविधान की शपथ दोहराई जा रही थी, उसी देश के चर्चित जंगल अचानकमार टाईगर रिजर्व में एक राष्ट्रीय पशु चुपचाप सड़ता रहा और जब उसकी मौत का सच सामने आया, तब जवाबों से ज़्यादा बचाव के बयान सामने आए। 

छत्तीसगढ़ के अचानकमार टाइगर रिज़र्व में एक युवा नर बाघ की मौत को वन विभाग ने दो बाघों के बीच हुए आपसी संघर्ष का परिणाम बताया है। घटना 25 जनवरी 2026 को अचानकमार परिक्षेत्र के सारसडोल क्षेत्र अंतर्गत कुडेरापानी परिसर की बताई गई है, जहाँ नियमित पेट्रोलिंग के दौरान सुरक्षा बलों ने बाघ का शव देखा। सूचना मिलते ही वन विभाग की टीम ने इलाके को सुरक्षित कर लिया और वरिष्ठ अधिकारियों को जानकारी दी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के निष्कर्षों के आधार पर यह दावा तकनीकी रूप से संभव भी है। बाघों के बीच क्षेत्रीय द्वंद्व प्राकृतिक व्यवहार का हिस्सा होता है और देश के कई संरक्षित इलाकों में ऐसी घटनाएँ दर्ज की गई हैं। लेकिन लोकतंत्र में ओप-एड का दायित्व केवल आधिकारिक निष्कर्ष दोहराना नहीं, बल्कि उन प्रश्नों को सामने लाना है जो सरकारी बयान के दायरे से बाहर रह जाते हैं। अचानकमार की यह घटना भी ऐसी ही है जहाँ मौत से ज़्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है, मौत के बाद का प्रबंधन।

विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, जिस बाघ का शव 26 जनवरी को पाया गया, उसकी मौत संभवतः कई दिन पहले हो चुकी थी। शव की स्थिति और इलाके में फैली दुर्गंध इस ओर संकेत करती है कि घटना और उसकी पहचान के बीच समय का अंतर था। अगर यह सही है, तो सवाल बाघ की मौत के कारण पर नहीं, बल्कि निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर उठता है। 

यहाँ बताना लाज़िमी होगा कि कुछ दिन पहले ही अचानकमार टाईगर रिजर्व क्षेत्र में बाघ गड़ना के लिये लगाये गये ट्रैप कैमरों में से दो ट्रैप कैमरों की मेमोरी चिप चोरी हो गई थी। यह घटना साधारण चोरी नहीं कही जा सकती। कैमरा ट्रैप को खोलना और उसमें से डेटा निकालना तकनीकी जानकारी की माँग करता है। मतलब साफ़ है, प्रतिबंधित क्षेत्र में लगाये गये कैमरों से चिप चोरी करने वाला अज्ञात शख़्स उन कैमरों को आपरेट करने की तकनीकि से वाकिफ है। अब यहां यह सवाल अनिवार्य हो जाता है कि चोरी किसने की ? क्या यह किसी बाहरी शिकारी का काम था या आंतरिक मिलीभगत ? और क्या इस मामले में आपराधिक जांच को प्राथमिकता दी गई ? ऐसे में जब निगरानी उपकरण ही निष्क्रिय कर दिए जाएँ, तो किसी भी संरक्षण दावे की विश्वसनीयता कमजोर पड़ जाती है। 

अचानकमार टाइगर रिज़र्व सालों से विवादों में रहा है। बाघ की मौत, ट्रैप कैमरों से डेटा कार्ड की चोरी के कुछ समय पहले ही कोर क्षेत्र में प्रभावशाली युवकों की मौजूदगी का एक वीडियो सामने आया था, उस वीडियो ने एटीआर प्रबंधन की लाचारी और अव्यवस्था की कलई खोलकर रख दी। सियासत, प्रभावशाली लोगों के सामने एटीआर प्रबंधन कितना बौना है और जंगल कितना असुरक्षित यह बात उस वीडियो से उजागर हुई। इस जंगल में कानून और नियम सभी के लिए समान रूप से लागू नहीं हैं। जहाँ स्थानीय समुदायों पर कड़े प्रतिबंध लागू होते हैं, वहीं रसूखदारों की घुसपैठ पर अक्सर नरमी दिखाई देती है। यह दोहरा मापदंड न केवल संरक्षण प्रयासों को कमजोर करता है, बल्कि स्थानीय लोगों के बीच व्यवस्था के प्रति अविश्वास भी पैदा करता है।

भारत में बाघ संरक्षण को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक सफलता के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है। बाघों की संख्या में वृद्धि, नए रिज़र्व की घोषणा और पर्यटन के आँकड़े ये सब सकारात्मक संकेत हैं। लेकिन संरक्षण केवल संख्या का खेल नहीं है। एटीआर में अगर बाघों की संख्या बढ़ रही है, तो निगरानी और सुरक्षा भी उसी अनुपात में मज़बूत होनी चाहिए। अचानकमार की ये तमाम घटनायें यह याद दिलाती है कि काग़ज़ी उपलब्धियाँ ज़मीनी हकीकत की जगह नहीं ले सकतीं। 

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