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भीड़ में वारदात, चाकू से हमला कर फरार हुए आरोपी गिरफ्तार


बिलासपुर । 
 TODAY छत्तीसगढ़  /  हनुमान जयंती की शोभायात्रा के दौरान भीड़ में पुरानी रंजिश को लेकर युवक पर जानलेवा हमला करने का मामला सामने आया है। तोरवा पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए तीन आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है। आरोपियों के कब्जे से घटना में प्रयुक्त धारदार चाकू भी जब्त किया गया है।

पुलिस के अनुसार, 2 अप्रैल को शहर में हनुमान जयंती के अवसर पर विभिन्न स्थानों पर शोभायात्रा निकाली जा रही थी। इसी दौरान चांटीडीह सरकंडा निवासी सन्नी श्रीवास अपने साथी सूरज साहू के साथ तोरवा क्षेत्र स्थित पेंडलवार अस्पताल के पास रैली देख रहे थे। तभी दयालबंद कोतवाली निवासी प्रियांशु बोले अपने दो साथियों के साथ वहां पहुंचा।

बताया गया कि साइड हटने की बात को लेकर दोनों पक्षों में विवाद शुरू हो गया। विवाद के दौरान आरोपियों ने गाली-गलौज करते हुए मारपीट की और मुख्य आरोपी प्रियांशु बोले ने अपने पास रखे धारदार चाकू से सूरज साहू के पेट में वार कर दिया। गंभीर रूप से घायल सूरज साहू को तत्काल सिम्स अस्पताल में भर्ती कराया गया।

घटना के बाद तोरवा थाना में मामला दर्ज कर आरोपियों की तलाश शुरू की गई। वारदात के बाद आरोपी फरार होकर छिपते फिर रहे थे। पुलिस ने साइबर सेल की मदद से लोकेशन ट्रेस कर 5 अप्रैल को कोतवाली क्षेत्र में दबिश देकर तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तार आरोपियों में प्रियांशु बोले (25 वर्ष), ओम बोले (23 वर्ष) निवासी दयालबंद तथा के. राघवेन्द्र राव उर्फ सुरेश (26 वर्ष) निवासी तोरवा शामिल हैं। पुलिस ने मुख्य आरोपी के पास से घटना में प्रयुक्त लोहे का धारदार चाकू जब्त किया है।

अंबिकापुर कांड: बाबा बोले दोषियों को फांसी हो, PM का सच बेहद डरावना

अंबिकापुर / रायपुर।   TODAY छत्तीसगढ़  /  अंबिकापुर में एक युवती के साथ दुष्कर्म के बाद निर्मम हत्या की घटना को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। वरिष्ठ कांग्रेस नेता टीएस सिंहदेव ने घटना पर गहरा आक्रोश व्यक्त करते हुए राज्य सरकार पर सीधा हमला बोला है।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर जारी अपने बयान में सिंहदेव ने कहा कि “अंबिकापुर आज रो रहा है और हर संवेदनशील व्यक्ति शर्मसार है।” उन्होंने इस घटना को दिल्ली के निर्भया कांड जैसी दिल दहला देने वाली बताया। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि क्या अब बेटियां सड़कों पर भी सुरक्षित नहीं हैं। सिंहदेव ने आरोप लगाया कि यह घटना सरकार की नाकामी को उजागर करती है। जब शहर का व्यस्त इलाका सुरक्षित नहीं है, तो कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।

कांग्रेस नेता ने कहा कि अपराधियों में कानून का कोई डर नहीं बचा है और वे खुलेआम ऐसी घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं, जबकि सरकार मूकदर्शक बनी हुई है। उन्होंने पीड़िता को न्याय दिलाने की मांग करते हुए कहा कि इस मामले को न तो भुलाया जाएगा और न ही दबाया जाएगा। सिंहदेव ने दोषियों की तत्काल गिरफ्तारी, फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुनवाई और कड़ी से कड़ी सजा देने की मांग की। उन्होंने अपनी व्यक्तिगत राय में ऐसे जघन्य अपराधों के लिए मृत्युदंड का प्रावधान लागू करने की भी बात कही। उन्होंने कहा कि न्याय में देरी अब बर्दाश्त नहीं होगी और यह हर बेटी की सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा है। 

पूरी खबर पढ़ें - महामाया द्वार के पास मिला महिला का गला रेतकर हत्या, चेहरा कुचला—दरिंदगी की आशंका 

आपको बता दें कि अंबिकापुर में महिला की हत्या के मामले में पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने वारदात की भयावहता उजागर कर दी है। मेडिकल कॉलेज के फोरेंसिक विभाग के डॉक्टरों ने जांच में बताया कि आरोपी ने दुष्कर्म के बाद महिला की बेहद निर्ममता से हत्या की। फोरेंसिक विशेषज्ञ डॉ. संटू बाग के अनुसार, आरोपी ने महिला के सिर पर पत्थर से इतना जोरदार वार किया कि सिर की तीन हड्डियां टूट गईं। हमले की बर्बरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि महिला के सीने की सभी 12 पसलियां भी टूट चुकी थीं।

डॉक्टरों ने बताया कि गंभीर चोटों के कारण महिला के फेफड़े और हृदय को भी भारी नुकसान पहुंचा, जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने साफ कर दिया है कि हत्या बेहद क्रूर और योजनाबद्ध तरीके से की गई। इस सनसनीखेज खुलासे के बाद पूरे इलाके में आक्रोश का माहौल है। लोग आरोपियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई और जल्द से जल्द सख्त सजा की मांग कर रहे हैं। पुलिस मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच में जुटी हुई है और आरोपियों की गिरफ्तारी व मामले के जल्द खुलासे की दिशा में कार्रवाई तेज कर दी गई है। 



साइबर अपराध के खिलाफ ‘ख़ौफ़’ का आगाज़, शॉर्ट फिल्म का भव्य विमोचन

रायगढ़/जशपुर ।  TODAY छत्तीसगढ़  /  डिजिटल दौर में तेजी से बढ़ रहे साइबर अपराधों के खिलाफ जागरूकता की दिशा में जशपुर से एक महत्वपूर्ण पहल सामने आई है। जशपुर के विशिष्ट कम्युनिटी हॉल सभागार में साइबर फ्रॉड पर आधारित शॉर्ट फिल्म “ख़ौफ़ - द डिजिटल वॉर” का भव्य विमोचन किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में कौशल्या देवी साय तथा प्रदेश के पुलिस महानिदेशक अरुण देव गौतम मौजूद रहे।

कार्यक्रम में प्रशासनिक एवं पुलिस अधिकारियों के साथ बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक और फिल्म से जुड़े कलाकार उपस्थित रहे। सभागार में फिल्म के प्रदर्शन के बाद दर्शकों ने इसे सराहनीय पहल बताते हुए खूब प्रशंसा की। फिल्म की कहानी, निर्देशन और अभिनय की जिम्मेदारी शशि मोहन सिंह ने निभाई है। उन्होंने फिल्म में एक पीड़ित शिक्षक की भूमिका अदा की है। उनके पुत्र ऋभु समर्थ सिंह भी प्रमुख भूमिका में नजर आए। इससे पूर्व भी वे सामाजिक विषयों पर आधारित फिल्मों के माध्यम से जागरूकता का संदेश दे चुके हैं।

फिल्म में साइबर ठगों द्वारा अपनाए जा रहे नए-नए हथकंडों को प्रभावी तरीके से दर्शाया गया है। ऑनलाइन ठगी, फर्जी कॉल और डिजिटल जालसाजी जैसे अपराधों से बचाव का संदेश फिल्म के माध्यम से दिया गया है। फिल्म में प्रवीण अग्रवाल, कुंदन सिंह, वंशिका गुप्ता, लायरा जैन और राम प्रकाश पाण्डेय सहित स्थानीय कलाकारों ने अभिनय किया है। कलाकारों की प्रस्तुति को दर्शकों ने खूब सराहा। 

इस अवसर पर मुख्य अतिथि कौशल्या देवी साय ने कहा कि इस तरह की फिल्में समाज में जागरूकता फैलाने का प्रभावी माध्यम हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि यह फिल्म लोगों को साइबर फ्रॉड से सतर्क रहने के लिए प्रेरित करेगी।

वहीं डीजीपी अरुण देव गौतम ने कहा कि फिल्म के संदेश को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाना जरूरी है, ताकि आमजन साइबर अपराधों के प्रति सजग हो सकें। राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव के प्रमुख डॉ. आनंद पाण्डेय ने कहा कि इस तरह के आयोजनों से स्थानीय कलाकारों को मंच मिलता है और उनकी प्रतिभा को निखारने का अवसर मिलता है।

कार्यक्रम में आरएसएस के वरिष्ठ नेता राजीव नंदे, कलेक्टर रोहित व्यास, एसएसपी लाल उमेद सिंह सहित कई अधिकारी और गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। अंत में शशि मोहन सिंह ने कहा कि फिल्म को सकारात्मक प्रतिक्रिया मिल रही है। उन्होंने लोगों से अपील की कि अधिक से अधिक लोग इस फिल्म को देखें और साझा करें, ताकि साइबर अपराध के खिलाफ जागरूकता का उद्देश्य सफल हो सके। 






कैमरे की कलम: “मर्यादा बिकाऊ है: समाज के इस ‘सभ्य’ बाजार में आपका स्वागत है”

हाल के कुछ महीनों में देश के विभिन्न हिस्सों से सामने आई घटनाएं जिनमें कथित आध्यात्मिक व्यक्तियों पर यौन शोषण के आरोप, सार्वजनिक जीवन से जुड़े प्रभावशाली लोगों पर पद दुरुपयोग के आरोप, और निजी संबंधों में अविश्वास के चलते हिंसा एक व्यापक सामाजिक प्रवृत्ति की ओर संकेत करती हैं।  इन घटनाओं को अलग-अलग देखना आसान है लेकिन जब इन्हें एक साथ रखा जाता है, तो यह प्रश्न उठता है कि क्या समाज की नैतिक और सामाजिक संरचना किसी परिवर्तन के दौर से गुजर रही है और यदि हां, तो उसकी दिशा क्या है? 

हाल के दिनों में नासिक और सूरत से सामने आए दो अलग-अलग मामले, भले ही अपने स्वरूप में भिन्न प्रतीत होते हों, लेकिन वे एक साझा सामाजिक प्रश्न की ओर इशारा करते हैं। नासिक में एक स्वयंभू आध्यात्मिक गुरु और ज्योतिषी, अशोक खरात, के कथित यौन शोषण से जुड़े वीडियो सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से प्रसारित हुए हैं। आरोपों के अनुसार, वह महिलाओं को उनके पारिवारिक जीवन, विशेषकर पति से जुड़े संभावित “खतरों” का भय दिखाकर अपने पास बुलाता था। इसके बाद वह कथित रूप से “विशेष अनुष्ठान” के नाम पर उनका शोषण करता, इन कृत्यों को रिकॉर्ड करता और बाद में ब्लैकमेलिंग या आर्थिक लाभ के लिए इस्तेमाल करता। इस मामले की गंभीरता केवल आरोपों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भी बताया गया है कि उसके पास से बड़ी मात्रा में संपत्ति बरामद हुई है जो इस पूरे तंत्र की संगठित प्रकृति की ओर संकेत करता है।

इसी समय, सूरत से सामने आया एक अन्य मामला धार्मिक संस्थाओं की आंतरिक जवाबदेही पर प्रश्न खड़े करता है। यहां एक जैन मुनि के कथित आपत्तिजनक ऑडियो और वीडियो सामने आने के बाद, स्थानीय समुदाय की महिलाओं ने स्वयं पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि शिकायत किसी बाहरी विरोध या राजनीतिक आरोप के रूप में नहीं, बल्कि उसी धार्मिक समुदाय के भीतर से आई। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि इस तरह की घटनाएं न केवल व्यक्तिगत आचरण का प्रश्न हैं, बल्कि पूरे समुदाय और उसकी आस्था की छवि को प्रभावित करती हैं।

इसी व्यापक परिदृश्य में छत्तीसगढ़ के चर्चित आईपीएस रतनलाल डांगी के स्कैंडल को देखिये। इसी तरह राज्य के बिलासपुर, रायपुर और कवर्धा से सामने आई हाल की घटनाएं सामाजिक अस्थिरता के एक और पहलू को उजागर करती हैं। बिलासपुर जिले के रतनपुर क्षेत्र के ग्राम पेंडरवा में चरित्र संदेह को लेकर हुआ हिंसक संघर्ष हो, या रायपुर में पारिवारिक संबंधों से जुड़ी गंभीर हत्याएं, ये घटनाएं यह संकेत देती हैं कि निजी संबंधों में अविश्वास किस प्रकार हिंसक रूप ले सकता है। इसी तरह, कवर्धा में सामने आया बाल यौन शोषण का मामला यह दर्शाता है कि अपराध के स्वरूप और संदर्भ बदल रहे हैं और पारंपरिक धारणाएं इन जटिलताओं को पूरी तरह समझाने में सक्षम नहीं हैं।

कहते हैं भारत “संस्कारों का देश” है। यहां परिवार है, परंपरा है, मर्यादा है, और सबसे बढ़कर—“इज्जत” है लेकिन जरा ठहरकर आईना देखिए। क्या वाकई यह सब अब भी बचा है, या हम सिर्फ इन शब्दों की माला जपकर खुद को धोखा दे रहे हैं? सच यह है कि समाज अब “संस्कारों” से नहीं सुविधा, स्वार्थ और सन्नाटे से चल रहा है और इस नए समाज में आपका स्वागत है, जहां मर्यादा एक विचार नहीं एक बिकने वाली वस्तु है।

पहले लोग भगवान में विश्वास करते थे। अब लोग “बाबाओं के पैकेज” खरीदते हैं। “समस्या समाधान शिविर”, “विशेष अनुष्ठान” और “गुप्त साधना” नाम बदलते रहते हैं, लेकिन धंधा वही रहता है। डर बेचो, समाधान बेचो और अगर ग्राहक खास हो तो “विशेष सेवा” भी दे दो। यहां सबसे मजेदार बात यह है कि ग्राहक खुद चलकर आता है। वह अपने डर, अपनी कमजोरी और कई बार अपनी समझ तक किसी और के चरणों में रख देता है और फिर जब उसके साथ शोषण होता है तो समाज कहता है “उसे समझना चाहिए था।”

वाह! धोखा भी खाओ और दोष भी खुद पर लो। शरीर: अब आत्मा से ज्यादा उपयोगी संपत्ति। हमने हमेशा कहा कि “आत्मा अमर है, शरीर नश्वर है।” लेकिन व्यवहार में हमने क्या किया? हमने शरीर को ही सबसे बड़ा निवेश बना दिया। कहीं नौकरी के लिए, कहीं प्रमोशन के लिए, कहीं कृपा पाने के लिए— शरीर अब एक “करेंसी” बन चुका है और इस बाजार में खरीदार भी हैं, बिकने वाले भी हैं और सबसे ज्यादा देखकर चुप रहने वाले दर्शक।

कहते हैं सत्ता सेवा का माध्यम होती है लेकिन अब यह सुविधा का शॉर्टकट बन चुकी है। फाइल आगे बढ़ानी है? संपर्क चाहिए। संपर्क नहीं है? तो “समझौता” चाहिए और यह समझौता किस चीज का होता है यह बताने की जरूरत नहीं। यहां नैतिकता फाइलों में बंद रहती है और फैसले बंद कमरों में होते हैं। बाहर भाषण में “नारी सम्मान” गूंजता है, और अंदर सम्मान का सबसे सस्ता सौदा होता है।

हमने बचपन में पढ़ा था कि द्रौपदी का चीर हरण अन्याय था और पूरा सभ्य समाज उसके खिलाफ खड़ा होना चाहिए था। आज भी चीर हरण हो रहा है लेकिन फर्क यह है कि अब यह एक सिस्टम बन चुका है। कभी कैमरे के जरिए, कभी ब्लैकमेलिंग के जरिए, कभी सत्ता के दबाव से और सबसे बड़ी बात अब कोई कृष्ण नहीं आता क्योंकि आज के “कृष्ण” खुद किसी और के दरबार में खड़े हैं।

समाज को अगर किसी को खत्म करना हो तो उसे सबूत की जरूरत नहीं होती उसे सिर्फ एक शब्द चाहिए: “चरित्र” . एक बार यह शब्द किसी महिला के नाम के साथ जुड़ गया, तो फिर न उसे सफाई का मौका मिलता है न न्याय का। और अगर कोई पुरुष इस “शक” के नाम पर हत्या कर दे तो समाज धीरे से कहता है “गुस्से में गलती हो गई।” गलती? या मानसिकता? 

हम कहते हैं कि “परिवार समाज की नींव है।” लेकिन सच्चाई यह है कि अब परिवार सबसे बड़ा अभिनय मंच बन चुका है। बाहर से सब ठीक, अंदर से सब बिखरा हुआ। संवाद नहीं है, विश्वास नहीं है, लेकिन फोटो पर मुस्कान है और जब सच्चाई बाहर आती है तो या तो रिश्ता टूटता है या किसी की जान चली जाती है।

हर बार जब कोई मामला सामने आता है तो सबसे आसान सवाल पूछा जाता है “वह वहां क्यों गई?” कोई यह नहीं पूछता “उसे वहां तक लाया किसने?” समाज को एक आदत लग चुकी है दोष वहीं डालो, जहां से आवाज कम उठे और महिलाएं इस व्यवस्था में सबसे आसान निशाना हैं।

आज हर स्कैंडल एक “कंटेंट” है। वीडियो वायरल, रील तैयार, कैप्शन सनसनीखेज। किसी की जिंदगी बर्बाद हो रही है, लेकिन व्यूज बढ़ रहे हैं तो सब ठीक है। यह समाज अब संवेदनशील नहीं रहा यह मनोरंजनप्रिय हो गया है। उसे सच नहीं चाहिए, उसे मसाला चाहिए। हम खुद को निर्दोष मानते हैं। कहते हैं “हमने क्या किया?” लेकिन असली सवाल यह है— हमने क्या नहीं किया? हमने सवाल नहीं पूछा, हमने विरोध नहीं किया, हमने चुप्पी चुनी और यही चुप्पी हर अपराध की साझेदार बन गई।

समस्या यह नहीं है कि हमें सच्चाई दिखती नहीं है। समस्या यह है कि हम उसे देखना नहीं चाहते क्योंकि अगर हम सच देख लेंगे, तो हमें बदलना पड़ेगा और बदलना सबसे मुश्किल काम है। इसलिए हम क्या करते हैं? हम मर्यादा की बात करते हैं, संस्कारों की बात करते हैं और फिर चुपचाप उसी दलदल में उतर जाते हैं जिसे हम खुद कोसते हैं। जब मर्यादा बिक रही हो, आस्था व्यापार बन चुकी हो और रिश्ते समझौते में बदल गए हों तो दोष किसे दें?

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