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CEIR पोर्टल: 128 गुम मोबाइल लौटाकर रायगढ़ पुलिस ने जीता भरोसा


रायगढ़।
 TODAY छत्तीसगढ़  /  साइबर अपराधों पर प्रभावी नियंत्रण और आम नागरिकों की संपत्ति की सुरक्षा के लिए रायगढ़ पुलिस को बड़ी सफलता मिली है। साइबर थाना रायगढ़ की टीम ने गुम एवं चोरी हुए 128 मोबाइल फोन रिकवर कर उनके वास्तविक स्वामियों को सौंपे हैं।

पुलिस कंट्रोल रूम में आयोजित कार्यक्रम में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक शशि मोहन सिंह, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक अनिल कुमार सोनी, साइबर डीएसपी उन्नति ठाकुर, साइबर थाना प्रभारी निरीक्षक विजय चेलक सहित साइबर टीम की मौजूदगी में मोबाइल वितरण किया गया। 

एसएसपी शशि मोहन सिंह ने कहा कि वर्तमान समय में मोबाइल केवल संचार का साधन नहीं, बल्कि बैंकिंग, जरूरी दस्तावेज और व्यक्तिगत जानकारी का महत्वपूर्ण माध्यम है। उन्होंने नागरिकों से अपील की कि मोबाइल गुम होने पर तुरंत CEIR पोर्टल पर जानकारी दर्ज करें।

जिले में गुम मोबाइल की शिकायतों के निराकरण के लिए भारत सरकार के दूरसंचार विभाग द्वारा विकसित CEIR (Central Equipment Identity Register) पोर्टल का उपयोग किया जा रहा है। शिकायत दर्ज होते ही संबंधित सिम को ब्लॉक कर दिया जाता है और मोबाइल को ट्रैकिंग पर रखा जाता है।

साइबर डीएसपी उन्नति ठाकुर के निर्देशन में साइबर थाना प्रभारी विजय चेलक और उनकी टीम लगातार मॉनिटरिंग कर कार्रवाई करती है। टेलीकॉम कंपनियों की सहायता से मोबाइल में नई गतिविधि मिलने पर तत्काल कार्रवाई कर उसे बरामद किया जाता है। 

साइबर टीम ने 128 मोबाइल फोन को सफलतापूर्वक ट्रेस किया। ये मोबाइल बिहार, कोलकाता सहित कोरबा, जांजगीर और रायगढ़ जिले के धरमजयगढ़, घरघोड़ा, पूंजीपथरा, तमनार, छाल और खरसिया क्षेत्रों में उपयोग में पाए गए। पुलिस ने संबंधित उपयोगकर्ताओं से संपर्क कर मोबाइल वापस प्राप्त किए। बरामद मोबाइल में वीवो, ओप्पो, रेडमी, पोको, रियलमी, वनप्लस, सैमसंग और मोटोरोला जैसे ब्रांड शामिल हैं। इनकी कुल कीमत लगभग 25 लाख 60 हजार रुपये आंकी गई है। 

मोबाइल वापस मिलने पर कई लोग भावुक हो उठे। कुछ ने तो अपने फोन मिलने की उम्मीद ही छोड़ दी थी। मोबाइल पाकर लोगों ने पुलिस टीम का आभार जताया और खुशी जाहिर की।

“रामसर साइट कोपरा पर संकट ? EIA रिपोर्ट में ‘गायब’ हो गए प्रवासी पक्षी !”


रायपुर। 
TODAY छत्तीसगढ़  /  छत्तीसगढ़ की पहली रामसर साइट कोपरा जलाशय एक बार फिर विवादों के केंद्र में है। प्रस्तावित स्टील एवं पावर प्लांट परियोजना के लिए तैयार इनवायरमेंट इंपैक्ट एसेसमेंट (EIA) रिपोर्ट में कथित तौर पर भ्रामक जानकारी दिए जाने का मामला सामने आया है। इसको लेकर अधिवक्ता संदीप तिवारी एवं वाइल्डलाइफ फोटोजर्नलिस्ट सत्यप्रकाश पांडेय ने गंभीर आपत्ति दर्ज कराई है। इधर वेटलैंड अथॉरिटी ने बिलासपुर कलेक्टर को पत्र भेजकर दर्ज आपत्ति और शिकायतों की जांच करने कहा है।  

श्री तिवारी ने वेटलैंड अथॉरिटी को भेजे पत्र में उल्लेख किया है कि EIA रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि परियोजना स्थल के 10 किलोमीटर दायरे में किसी भी वन्यजीव का प्रवासी मार्ग नहीं है। जबकि वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 के अनुसार पक्षियों को भी वन्यजीव की श्रेणी में रखा गया है।

रामसर कन्वेंशन को दी गई आधिकारिक जानकारी के अनुसार कोपरा जलाशय 161 प्रजातियों के पक्षियों का महत्वपूर्ण आवास है। इनमें 58 प्रवासी प्रजातियां शामिल हैं, जो सेंट्रल एशियन फ्लाईवे के माध्यम से हर वर्ष यहां पहुंचती हैं। इनमें पांच अत्यंत संकटग्रस्त प्रजातियां भी हैं।

Central Asian Flyway का एक अंतरराष्ट्रीय प्रवासी मार्ग है, जिसके जरिए पक्षी हर साल ठंड के मौसम में उत्तर (साइबेरिया/मध्य एशिया) से भारत जैसे देशों में आते हैं। यह मार्ग पक्षियों के लिए भोजन, विश्राम और जीवित रहने के लिए महत्वपूर्ण आर्द्रभूमियों (जैसे कोपरा जलाशय) पर निर्भर करता है। इसलिए इस मार्ग के किसी भी स्थल को नुकसान पहुंचाना प्रवासी पक्षियों और पूरे पारिस्थितिक तंत्र पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है।

श्री तिवारी का कहना है कि रिपोर्ट में सेंट्रल एशियन फ्लाईवे के महत्व को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया है। उन्होंने मांग की है कि भ्रामक एवं अपूर्ण जानकारी के आधार पर तैयार EIA रिपोर्ट को निरस्त किया जाए तथा एक स्वतंत्र एवं वैज्ञानिक अध्ययन कराया जाए, जिसमें परियोजना के समग्र पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन हो।

वेटलैंड अथॉरिटी द्वारा मामले को कलेक्टर बिलासपुर को भेजे जाने पर भी आपत्ति जताई गई है। तिवारी का कहना है कि रामसर से संबंधित तकनीकी जानकारी वेटलैंड अथॉरिटी के पास उपलब्ध है, ऐसे में इसकी जांच भी उसी स्तर पर की जानी चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि जिला प्रशासन इस प्रकार के जटिल पर्यावरणीय मुद्दे का तकनीकी परीक्षण कैसे कर पाएगा। 

इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन को लेकर बहस तेज कर दी है। एक ओर औद्योगिक परियोजनाओं के माध्यम से आर्थिक विकास की बात कही जा रही है, वहीं दूसरी ओर जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर चिंता व्यक्त की जा रही है। 

पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि रामसर साइट जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में किसी भी परियोजना को स्वीकृति देने से पहले अत्यंत सावधानी बरतना आवश्यक है। यदि प्रवासी पक्षियों के मार्ग और आवास प्रभावित होते हैं, तो इसका असर केवल स्थानीय नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी देखने को मिल सकता है।

कोपरा जलाशय का मामला केवल एक परियोजना का नहीं, बल्कि नीति और प्राथमिकताओं का सवाल है। यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संरक्षित वेटलैंड भी सटीक जानकारी और जिम्मेदारी के अभाव में खतरे में पड़ जाएं, तो यह बेहद चिंताजनक स्थिति है। आवश्यक है कि संबंधित एजेंसियां पारदर्शिता और वैज्ञानिक आधार पर निर्णय लें, ताकि विकास के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण भी सुनिश्चित हो सके।

कैमरे की कलम: बादाम, बाबू और बेबस नागरिक


बिलासपुर के हाउसिंग बोर्ड कार्यालय में घटी हालिया घटना ने प्रशासनिक तंत्र की उस पुरानी बीमारी को फिर उजागर कर दिया है, जिसे हम सब जानते तो हैं, पर अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। तोरण साहु नाम का युवक अपनी फाइल के महीनों से अटके होने से त्रस्त जब महिला अधिकारी की मेज पर बादाम उड़ेलते हुए यह कहता है कि “इसे खाइए, याद आ जाएगा फाइल कहां रखी है”, तो यह केवल एक क्षणिक आवेश या अनोखा विरोध नहीं रह जाता; यह व्यवस्था पर सीधा, तीखा और असहज सवाल बन जाता है।

यह घटना हंसी का विषय बन सकती है, सोशल मीडिया पर मनोरंजन का साधन भी। लेकिन यदि इसे केवल एक वायरल वीडियो के रूप में देख लिया गया, तो हम उस गहरे संकट को नजरअंदाज कर देंगे, जिसकी ओर यह इशारा करती है। 

उसके बादाम सिर्फ मेज पर नहीं गिरे थे वे उस पूरी व्यवस्था पर गिरे थे जो वर्षों से “याददाश्त खोने” का नाटक कर रही है।

सरकारी दफ्तरों में “फाइल नहीं मिल रही” अब अपवाद नहीं, लगभग एक स्वीकृत सत्य बन चुका है। यह स्थिति उतनी ही चिंताजनक है, जितनी सामान्य लगने लगी है। सवाल यह नहीं कि फाइलें क्यों खो जाती हैं, सवाल यह है कि उनके खो जाने के बाद भी व्यवस्था क्यों नहीं हिलती? एक नागरिक जब अपनी वैध प्रक्रिया पूरी कर चुका हो, दस्तावेज जमा कर चुका हो, और फिर भी महीनों तक केवल यह सुनता रहे कि उसकी फाइल “ढूंढी जा रही है”, तो यह केवल प्रशासनिक ढिलाई नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों का प्रत्यक्ष हनन है।

प्रशासनिक प्रक्रियाओं में समयसीमा तय होती है, कम से कम कागजों पर लेकिन व्यवहार में यह समयसीमा अक्सर एक औपचारिकता भर रह जाती है। एक-दो महीने में पूरा होने वाला काम सात महीने तक भी अधूरा रह जाए, तो यह केवल देरी नहीं, बल्कि जवाबदेही की विफलता है। इस विफलता की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसका कोई स्पष्ट उत्तरदायी नहीं होता। फाइल एक टेबल से दूसरी टेबल तक घूमती रहती है, और अंततः “कहीं” अटक जाती है बिना किसी के जिम्मेदार ठहराए।

यह विचारणीय है कि एक नागरिक को अपने वैध अधिकार के लिए व्यंग्य का सहारा क्यों लेना पड़ता है। बादाम का प्रतीकात्मक उपयोग केवल हास्य नहीं था यह उस संवेदनहीनता पर चोट थी, जो प्रशासनिक व्यवहार में गहराई तक समा चुकी है। जब सीधी शिकायतें अनसुनी रह जाती हैं, जब आवेदन और अनुस्मारक (रिमाइंडर) निष्प्रभावी हो जाते हैं, तब नागरिक के पास ऐसे ही प्रतीकात्मक तरीकों का सहारा बचता है। यह स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए स्वस्थ संकेत नहीं मानी जा सकती।

इस पूरे प्रकरण में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि मामला तब चर्चा में आया, जब उसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। यह दर्शाता है कि पारंपरिक शिकायत तंत्र की तुलना में सार्वजनिक दबाव अब अधिक प्रभावी होता जा रहा है लेकिन क्या किसी नागरिक को न्याय या समाधान पाने के लिए अपने मुद्दे को वायरल करना आवश्यक होना चाहिए? यदि हां, तो यह प्रशासनिक तंत्र की गंभीर कमजोरी का संकेत है।

किसी भी प्रशासनिक व्यवस्था की विश्वसनीयता उसकी जवाबदेही पर निर्भर करती है। यदि फाइल गुम होती है, तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि इसके लिए कौन जिम्मेदार है। यदि तय समय में काम नहीं होता, तो इसके परिणाम क्या होंगे। वर्तमान स्थिति में, इन दोनों प्रश्नों के उत्तर अक्सर धुंधले होते हैं। यही धुंधलापन लापरवाही को बढ़ावा देता है और नागरिक को असहाय बनाता है। 

यह मान लेना आसान है कि यह सिर्फ एक अलग घटना है लेकिन सच्चाई यह है कि यह हर शहर, हर कस्बे, हर दफ्तर की कहानी है—बस तरीके अलग-अलग हैं।

इस पूरी व्यवस्था में सबसे अधिक प्रभावित वह नागरिक है, जिसके पास न तो संसाधन हैं और न ही प्रभाव। वह केवल प्रक्रिया का पालन करता है, निर्देशों का अनुपालन करता है, और बदले में अपेक्षा करता है कि उसका काम समय पर हो जाएगा लेकिन जब उसे बार-बार दफ्तर के चक्कर लगाने पड़ते हैं, जब उसे हर बार नया बहाना सुनने को मिलता है, तो यह केवल असुविधा नहीं—यह उसके आत्मसम्मान पर भी चोट है।

इस घटना को एक अपवाद मानकर भुला देना आसान होगा, लेकिन इससे समस्या समाप्त नहीं होगी। आवश्यक है कि इसे एक संकेत के रूप में देखा जाए और सुधार की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं। प्रक्रियाओं का पूर्ण डिजिटलीकरण, ताकि फाइलों के गुम होने की संभावना समाप्त हो, समयबद्ध सेवा की सख्त निगरानी, प्रत्येक स्तर पर स्पष्ट जवाबदेही और सबसे महत्वपूर्ण, नागरिक के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण होना जरूरी है। 

बिलासपुर की यह घटना केवल एक युवक के विरोध की कहानी नहीं है; यह उस व्यापक असंतोष की अभिव्यक्ति है, जो लंबे समय से प्रशासनिक उदासीनता के कारण पनप रहा है।बादाम यहां एक प्रतीक बन गए हैं—याददाश्त बढ़ाने का नहीं, बल्कि व्यवस्था को उसकी जिम्मेदारियों की याद दिलाने का। 

तुंगल इको-टूरिज्म सेंटर बना बदलाव की मिसाल, आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ीं महिलाएं


रायपुर/सुकमा।
  TODAY छत्तीसगढ़  / छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में वन विभाग की एक पहल ने विकास और पुनर्वास की नई मिसाल पेश की है। वन मंत्री केदार कश्यप के मार्गदर्शन में विकसित तुंगल इको-पर्यटन केंद्र आज आत्मनिर्भरता और सामाजिक बदलाव का प्रतीक बनकर उभरा है।

सुकमा नगर से लगभग एक किलोमीटर दूर स्थित यह स्थान कभी उपेक्षित और जर्जर था, लेकिन अब यह एक आकर्षक पर्यटन केंद्र के रूप में पहचान बना चुका है। प्राकृतिक सौंदर्य, टापुओं का निर्माण और शांत वातावरण पर्यटकों को अपनी ओर खींच रहा है। पड़ोसी राज्य ओडिशा से भी बड़ी संख्या में पर्यटक यहां पहुंच रहे हैं।

इस केंद्र की सबसे खास पहल “तुंगल नेचर कैफे” है, जिसे ‘आत्मसमर्पण पुनर्वास महिला स्वयं सहायता समूह’ संचालित कर रहा है। समूह की 10 महिलाओं में 5 ने नक्सलवाद का रास्ता छोड़कर आत्मसमर्पण किया है, जबकि अन्य महिलाएं नक्सल हिंसा से प्रभावित रही हैं। इन्हें विशेष प्रशिक्षण देकर आत्मनिर्भर बनाया गया है। आज ये महिलाएं आत्मविश्वास के साथ पर्यटकों का स्वागत कर रही हैं और सम्मानजनक जीवन जी रही हैं। जो कभी भय और संघर्ष के माहौल में थीं, वे अब स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता की मिसाल बन चुकी हैं।

पर्यटन केंद्र की लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 31 दिसंबर 2025 से 30 मार्च 2026 तक यहां 8,889 पर्यटक पहुंचे और लगभग 2.92 लाख रुपये की आय हुई। यहां आने वाले पर्यटक स्थानीय व्यंजनों का स्वाद लेने के साथ-साथ कयाकिंग, पैडल बोटिंग और बांस राफ्टिंग जैसी गतिविधियों का भी आनंद ले रहे हैं। यह पहल दर्शाती है कि सही दिशा और अवसर मिलने पर जीवन की दिशा बदली जा सकती है। तुंगल इको-पर्यटन केंद्र न केवल पर्यटन को बढ़ावा दे रहा है, बल्कि समाज में सकारात्मक बदलाव की मजबूत नींव भी रख रहा है।

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