छत्तीसगढ़ के कवर्धा जिले में जो हुआ, वह घोटाला नहीं घोटाले का सरकारी विज्ञापन है। फर्क बस इतना है कि इस बार पोस्टर पर नेता नहीं, चूहे मुस्कुरा रहे हैं। 26 हजार क्विंटल धान, सात करोड़ रुपये और जवाब चूहा, दीमक, मौसम। यानी चोरी भी प्रकृति ने की, गिनती भी प्रकृति ने बिगाड़ी और जवाबदेही भी प्रकृति ले जाएगी। यह घटना उस व्यवस्था का चरित्र प्रमाणपत्र है, जो हर बड़े घोटाले के बाद और ज्यादा बेशर्म, ज्यादा आत्मविश्वासी और ज्यादा रचनात्मक होती जा रही है। सात करोड़ रुपये का धान न आग में जला, न बाढ़ में बहा, न ही किसी युद्ध में लुटा बस चूहों, दीमकों और मौसम ने खा लिया। यह सफाई इतनी मासूम है कि अपराध भी खुद को ठगा हुआ महसूस करे।
यह पहला मौका है जब सरकारी बयान ने जीव-जंतुओं को भ्रष्टाचार की अग्रिम पंक्ति में ला खड़ा किया है। अब तक घोटालों में नेता, अफसर, दलाल और ठेकेदार बदनाम होते थे, लेकिन कवर्धा ने इतिहास रच दिया यहाँ चूहे मुख्य अभियुक्त हैं। वे भी ऐसे चूहे, जो क्विंटल में खाते हैं, रजिस्टर में एंट्री करवाते हैं, फर्जी बिल बनवाते हैं और जाते-जाते CCTV की आंखों पर पट्टी भी बाँध देते हैं। यह कोई साधारण चूहा नहीं, बल्कि सिस्टम-अनुकूल चूहा है।
प्रश्न यह नहीं है कि 26 हजार क्विंटल धान कैसे गायब हुआ। असली प्रश्न यह है कि इतना धान गायब होने के बाद भी सिस्टम कैसे खड़ा है? गोदामों में धान आता है, तौला जाता है, सील होता है, निरीक्षण होता है, रिपोर्ट बनती है और फिर एक दिन पता चलता है कि धान था ही नहीं। यह जादू नहीं, यह प्रशासनिक कला है। इसे भ्रष्टाचार कहना इस कला का अपमान होगा; यह तो प्रशासनिक शिल्प है।
प्रशासन की सफाई बताती है कि चूहे और दीमक अब सिर्फ अनाज या लकड़ी नहीं खाते, वे जवाबदेही भी खाते हैं। मौसम सिर्फ फसल नहीं खराब करता, वह फाइलें भी साफ कर देता है। यह वही मौसम है जो हर घोटाले के बाद अचानक सक्रिय हो जाता है कभी बारिश बनकर, कभी नमी बनकर, कभी “लंबे समय तक भंडारण” के बहाने। लगता है प्रकृति भी अब सरकारी तंत्र का हिस्सा बन चुकी है।
विपक्ष ने इसे घोटाला कहा, जनता ने मज़ाक बनाया और प्रशासन ने औपचारिक कार्रवाई। कुछ निलंबन, कुछ नोटिस यानी संस्कार अनुसार शोकसभा । असली दोषी वहीं सुरक्षित हैं, जहाँ हर घोटाले के बाद रहते हैं फ़ाइलों के पीछे, पदों के ऊपर और व्यवस्था की छाया में। निलंबन यहाँ सज़ा नहीं, रिवाज़ है। नोटिस यहाँ सवाल नहीं, ढाल है।
यह पूरा प्रकरण बताता है कि भ्रष्टाचार अब चोरी नहीं करता, वह प्रक्रिया का पालन करता है। सब कुछ नियमों के भीतर होता है काग़ज़ पूरे, हस्ताक्षर पूरे, मुहरें पूरी। कमी सिर्फ गोदाम में होती है। और जब कमी पकड़ में आती है, तो कारण इतने प्राकृतिक होते हैं कि मानव जिम्मेदारी की जरूरत ही नहीं पड़ती।
कल्पना कीजिए यदि किसी किसान के घर से एक बोरी धान गायब हो जाए, तो क्या वह यह कह सकता है कि “चूहे खा गए”? शायद नहीं। उससे पूछा जाएगा लापरवाही क्यों की, सुरक्षा क्यों नहीं की। लेकिन जब सरकारी गोदाम से सात करोड़ का धान गायब होता है, तो सवाल उल्टा हो जाता है बेचारे चूहे क्या करें ? यही तो शासन और आम आदमी का फर्क है। आम आदमी दोषी होता है, सिस्टम हमेशा पीड़ित।
यह मामला यह भी बताता है कि निगरानी तंत्र सिर्फ काग़ज़ पर जिंदा है। CCTV कैमरे थे, लेकिन उन्होंने कुछ नहीं देखा। रजिस्टर थे, लेकिन उन्होंने सब कुछ सही बताया। निरीक्षण हुए, लेकिन किसी को कमी नहीं दिखी। यह सामूहिक अंधापन नहीं, सहमति से ओढ़ी गई पट्टी है। जब सबको पता हो कि क्या नहीं देखना है, तब कुछ भी नहीं दिखता।
कवर्धा का यह प्रकरण एक जिले की कहानी नहीं है। यह उस राज्य और उस व्यवस्था का प्रतीक है, जहाँ धान खरीदी किसान के नाम पर होती है, लेकिन फायदा हमेशा किसी और को मिलता है। किसान खेत में खड़ा रहता है, धूप में, कर्ज़ में, इंतज़ार में और धान गोदाम पहुँचते ही अदृश्य हो जाता है। न किसान को जवाब, न जनता को हिसाब। आज चूहे हैं, कल कुछ और होगा। कभी कहा जाएगा नमी ज्यादा थी। कभी रिकॉर्ड पुराना था। कभी मानव भूल। लेकिन एक बात स्थायी रहेगी ऊपर तक कोई जिम्मेदार नहीं। क्योंकि जिम्मेदारी वहीं मर जाती है, जहाँ सत्ता शुरू होती है।
सबसे खतरनाक यह नहीं कि धान गायब हुआ। सबसे खतरनाक यह है कि इसे लेकर सिस्टम शर्मिंदा नहीं है। वह सफाई दे रहा है, तर्क दे रहा है, बहस कर रहा है और आगे बढ़ रहा है। यह निर्लज्जता ही असली संकट है। जब घोटाला भी रूटीन हो जाए, तब लोकतंत्र सिर्फ चुनावी रस्म बनकर रह जाता है।
कवर्धा ने हमें यह सिखाया है कि आज के शासन में चूहा सबसे सुरक्षित पात्र है। न उसे गिरफ्तार किया जा सकता है, न उससे पूछताछ। वह हर बार बच निकलता है बिल्कुल वैसे ही जैसे असली दोषी। फर्क सिर्फ इतना है कि चूहा भूखा होता है, और व्यवस्था लालची।
मेरा यह कथन किसी चूहे के खिलाफ नहीं है। यह उस तंत्र के खिलाफ है, जिसने चूहे को बहाना बना लिया है। क्योंकि सच यह है कि धान चूहों ने नहीं खाया धान व्यवस्था ने खाया है। और जब व्यवस्था खुद खाने लगे, तब देश सिर्फ गोदाम नहीं खोता, विश्वास भी खो देता है।
आज सवाल यह नहीं है कि 26 हजार क्विंटल धान कहाँ गया। सवाल यह है कि हमारी जवाबदेही, हमारी नैतिकता और हमारी शासन व्यवस्था कब और कहाँ गायब हुई ? और उसका जवाब शायद किसी गोदाम में नहीं मिलेगा वह कहीं फाइलों के बीच, नोटिसों के नीचे और चूहों की आड़ में दफन है।




