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कैमरे की कलम: न्याय की मंशा बनाम व्यवस्था की हिचक


उच्च शिक्षा के परिसरों में समानता और गरिमा का प्रश्न कोई नया नहीं है। वर्षों से यह सवाल उठता रहा है कि क्या विश्वविद्यालय ज्ञान के मंदिर हैं या सामाजिक भेदभाव की प्रयोगशाला। इसी पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट द्वारा यूजीसी के 2026 के भेदभाव-रोधी नियमों पर लगाई गई अंतरिम रोक एक साधारण न्यायिक आदेश नहीं, बल्कि व्यवस्था के अंतर्विरोधों पर तीखी टिप्पणी है। कोर्ट का कहना है कि ये नियम “दूरगामी परिणाम” पैदा कर सकते हैं और “समाज को विभाजित” कर सकते हैं। सवाल यह है कि क्या समाज पहले से विभाजित नहीं है? क्या रोहित वेमुला और डॉ. पायल तडवी की मौतें किसी काल्पनिक विभाजन की उपज थीं, या उस सच्चाई का आईना थीं जिसे लंबे समय तक संस्थागत चुप्पी ने ढक रखा था ?

इन नियमों की उत्पत्ति किसी अकादमिक प्रयोग से नहीं, बल्कि पीड़ा से हुई थी। वर्षों की याचिकाएँ, माताओं की गुहार और न्याय की उम्मीद इन्हीं से यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन के 2026 के नियम जन्मे। इनका उद्देश्य था: शिकायत की सुनवाई, जवाबदेही और संरक्षण। परंतु विरोध की तेज़ आँधी जिसमें बड़े पैमाने पर सामान्य वर्ग की असहजता दिखी,  उसने यह उजागर किया कि समानता की बात आते ही विशेषाधिकार कितने असुरक्षित हो जाते हैं।

वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह की टिप्पणी इस बहस का नैतिक केंद्र है। अगर सरकार अपने ही नियमों का बचाव नहीं कर सकती, तो यह केवल कानूनी कमजोरी नहीं संवैधानिक कर्तव्य से पलायन है। न्यायपालिका ने समिति बनाने का सुझाव देकर संतुलन साधने की कोशिश की है, पर समिति की शरण अक्सर निर्णय को टालने का सुविधाजनक रास्ता भी बन जाती है। यहां मूल टकराव स्पष्ट है: भेदभाव-रोधी व्यवस्था बनाम ‘रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन’ की आशंका। पर क्या सुरक्षा देना भेदभाव है? क्या कमजोर के लिए ढाल बनना, मज़बूत पर अन्याय है? विश्वविद्यालयों में सत्ता-संरचना आज भी वही है फर्क बस इतना है कि अब पीड़ित बोलने लगे हैं।

सुप्रीम कोर्ट की यह रोक अंतिम फैसला नहीं है, पर एक चेतावनी अवश्य है कि नियम जल्दबाज़ी में नहीं, गहन विमर्श से बनें। मगर विमर्श का अर्थ विलंब नहीं होना चाहिए। हर स्थगन के साथ कैंपस में डर का एक और दिन जुड़ जाता है। न्याय तब तक अधूरा है, जब तक वह समय पर न मिले। यह कहना गलत नहीं होगा कि नियमों की भाषा सुधारी जा सकती है, प्रक्रिया पर बहस हो सकती है, पर भेदभाव के अस्तित्व से इनकार नहीं। अगर उच्च शिक्षा में समानता को ‘विभाजन’ कहा जाएगा, तो सवाल नियमों पर नहीं हमारे सामाजिक विवेक पर उठेगा।

किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसके विश्वविद्यालयों, स्कूलों और शिक्षकों के हाथों में आकार लेता है। शिक्षा केवल डिग्री पाने का माध्यम नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा, सामाजिक न्याय की रीढ़ और आर्थिक प्रगति की बुनियाद होती है। लेकिन आज भारत में यह सवाल पहले से कहीं ज़्यादा तीखेपन के साथ खड़ा है, क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था वास्तव में नागरिक गढ़ रही है या केवल आज्ञाकारी उपभोक्ता और सुविधाजनक भीड़ तैयार कर रही है?

देश की शिक्षा व्यवस्था इस समय एक गहरे असमंजस से गुजर रही है। एक तरफ़ “विश्वगुरु” बनने के दावे हैं, नई-नई नीतियाँ हैं, तकनीक और नवाचार की भाषा है; दूसरी ओर जर्जर स्कूल, खाली पद, असमान अवसर, बढ़ता निजीकरण और विश्वविद्यालय परिसरों में भय का माहौल। यह विरोधाभास किसी दुर्घटना का नतीजा नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही राजनीतिक प्राथमिकताओं का परिणाम है। 

सरकारें अक्सर शिक्षा नीतियों का हवाला देती हैं। नई शिक्षा नीति (NEP) को ऐतिहासिक बताया गया, लचीलापन, बहुविषयकता और मातृभाषा में शिक्षा जैसे वादे किए गए। लेकिन नीति और ज़मीनी हकीकत के बीच की खाई लगातार चौड़ी होती गई। शिक्षा पर सार्वजनिक खर्च आज भी जीडीपी के उस स्तर तक नहीं पहुँचा, जिसकी सिफ़ारिश दशकों से होती रही है। नई इमारतें और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म दिखाने में आसान हैं, लेकिन शिक्षक भर्ती, शोध अनुदान और छात्रवृत्तियाँ राजनीतिक प्राथमिकताओं की सूची में नीचे खिसकती चली गईं। इससे यह सवाल उठता है क्या सरकारें शिक्षा को सशक्तिकरण का औज़ार मानती हैं, या केवल एक प्रबंधन योग्य तंत्र?

शिक्षा में निजीकरण अब अपवाद नहीं, बल्कि मुख्यधारा बन चुका है। मेडिकल, इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट हर जगह फीस आसमान छू रही है। छात्र ऋण लेकर पढ़ने को मजबूर हैं और डिग्री पूरी होते ही रोज़गार की अनिश्चितता उनका इंतज़ार करती है। इस व्यवस्था में शिक्षा सामाजिक गतिशीलता का साधन कम और आर्थिक बोझ ज़्यादा बनती जा रही है। सरकारें निजी निवेश को समाधान के रूप में पेश करती हैं, लेकिन यह भूल जाती हैं कि बाज़ार का पहला लक्ष्य लाभ होता है, समानता नहीं। जब शिक्षा लाभ का साधन बनती है, तो हाशिये पर खड़े समुदाय सबसे पहले बाहर धकेले जाते हैं। 

विश्वविद्यालयों का हाल इससे भी ज़्यादा चिंताजनक है। कभी जिन परिसरों में बहस, असहमति और विचारों की टकराहट होती थी, आज वहाँ नोटिस, जांच और निलंबन का डर छाया रहता है। प्रशासनिक नियंत्रण इतना बढ़ चुका है कि विश्वविद्यालय अब ज्ञान के केंद्र नहीं, बल्कि सत्ता की प्रयोगशाला बनते जा रहे हैं। जब छात्र सवाल पूछते हैं, तो उन्हें “राष्ट्रविरोधी” कहा जाता है। जब शिक्षक असहमति जताते हैं, तो उन्हें “अनुशासनहीन”। यह कोई संयोग नहीं कि आलोचनात्मक सोच को पाठ्यक्रम से धीरे-धीरे हटाया जा रहा है। इतिहास को सुविधाजनक बनाया जा रहा है, समाजशास्त्र को संदिग्ध और दर्शन को अनुपयोगी। यह सब किसी अज्ञानवश नहीं हो रहा। यह एक स्पष्ट संकेत है कि सरकारें ऐसे नागरिक नहीं चाहतीं जो सोचें, बल्कि ऐसे जो मानें।

जातिगत भेदभाव, मानसिक उत्पीड़न और संस्थागत उपेक्षा ये विश्वविद्यालयों की कड़वी सच्चाइयाँ हैं। जब इन्हें रोकने के लिए नियम बनाए जाते हैं, तो हंगामा मचता है कि “समाज बँट जाएगा।” जैसे समाज पहले से बराबरी पर खड़ा हो ! 

ATR: जब जंगल में बाघ मरा और व्यवस्था खामोश रही


बिलासपुर।
  TODAY छत्तीसगढ़  /  आज 26 जनवरी को छत्तीसगढ़ के अचानकमार टाइगर रिज़र्व से आई एक ख़बर ने केवल वन्यजीव प्रेमियों को नहीं, बल्कि लोकतंत्र में जवाबदेही पर भरोसा रखने वाले हर नागरिक को असहज कर दिया। जंगल के भीतर एक युवा नर बाघ मृत पाया गया। आधिकारिक बयान आया, मौत दो बाघों के बीच आपसी संघर्ष का नतीजा है। फ़ाइलें चलीं, पोस्टमार्टम हुआ, रिपोर्ट बनी और मामला लगभग बंद मान लिया गया है। गणतंत्र दिवस के मौके पर आज जब तिरंगे के नीचे संविधान की शपथ दोहराई जा रही थी, उसी देश के चर्चित जंगल अचानकमार टाईगर रिजर्व में एक राष्ट्रीय पशु चुपचाप सड़ता रहा और जब उसकी मौत का सच सामने आया, तब जवाबों से ज़्यादा बचाव के बयान सामने आए। 

छत्तीसगढ़ के अचानकमार टाइगर रिज़र्व में एक युवा नर बाघ की मौत को वन विभाग ने दो बाघों के बीच हुए आपसी संघर्ष का परिणाम बताया है। घटना 25 जनवरी 2026 को अचानकमार परिक्षेत्र के सारसडोल क्षेत्र अंतर्गत कुडेरापानी परिसर की बताई गई है, जहाँ नियमित पेट्रोलिंग के दौरान सुरक्षा बलों ने बाघ का शव देखा। सूचना मिलते ही वन विभाग की टीम ने इलाके को सुरक्षित कर लिया और वरिष्ठ अधिकारियों को जानकारी दी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के निष्कर्षों के आधार पर यह दावा तकनीकी रूप से संभव भी है। बाघों के बीच क्षेत्रीय द्वंद्व प्राकृतिक व्यवहार का हिस्सा होता है और देश के कई संरक्षित इलाकों में ऐसी घटनाएँ दर्ज की गई हैं। लेकिन लोकतंत्र में ओप-एड का दायित्व केवल आधिकारिक निष्कर्ष दोहराना नहीं, बल्कि उन प्रश्नों को सामने लाना है जो सरकारी बयान के दायरे से बाहर रह जाते हैं। अचानकमार की यह घटना भी ऐसी ही है जहाँ मौत से ज़्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है, मौत के बाद का प्रबंधन।

विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, जिस बाघ का शव 26 जनवरी को पाया गया, उसकी मौत संभवतः कई दिन पहले हो चुकी थी। शव की स्थिति और इलाके में फैली दुर्गंध इस ओर संकेत करती है कि घटना और उसकी पहचान के बीच समय का अंतर था। अगर यह सही है, तो सवाल बाघ की मौत के कारण पर नहीं, बल्कि निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर उठता है। 

यहाँ बताना लाज़िमी होगा कि कुछ दिन पहले ही अचानकमार टाईगर रिजर्व क्षेत्र में बाघ गड़ना के लिये लगाये गये ट्रैप कैमरों में से दो ट्रैप कैमरों की मेमोरी चिप चोरी हो गई थी। यह घटना साधारण चोरी नहीं कही जा सकती। कैमरा ट्रैप को खोलना और उसमें से डेटा निकालना तकनीकी जानकारी की माँग करता है। मतलब साफ़ है, प्रतिबंधित क्षेत्र में लगाये गये कैमरों से चिप चोरी करने वाला अज्ञात शख़्स उन कैमरों को आपरेट करने की तकनीकि से वाकिफ है। अब यहां यह सवाल अनिवार्य हो जाता है कि चोरी किसने की ? क्या यह किसी बाहरी शिकारी का काम था या आंतरिक मिलीभगत ? और क्या इस मामले में आपराधिक जांच को प्राथमिकता दी गई ? ऐसे में जब निगरानी उपकरण ही निष्क्रिय कर दिए जाएँ, तो किसी भी संरक्षण दावे की विश्वसनीयता कमजोर पड़ जाती है। 

अचानकमार टाइगर रिज़र्व सालों से विवादों में रहा है। बाघ की मौत, ट्रैप कैमरों से डेटा कार्ड की चोरी के कुछ समय पहले ही कोर क्षेत्र में प्रभावशाली युवकों की मौजूदगी का एक वीडियो सामने आया था, उस वीडियो ने एटीआर प्रबंधन की लाचारी और अव्यवस्था की कलई खोलकर रख दी। सियासत, प्रभावशाली लोगों के सामने एटीआर प्रबंधन कितना बौना है और जंगल कितना असुरक्षित यह बात उस वीडियो से उजागर हुई। इस जंगल में कानून और नियम सभी के लिए समान रूप से लागू नहीं हैं। जहाँ स्थानीय समुदायों पर कड़े प्रतिबंध लागू होते हैं, वहीं रसूखदारों की घुसपैठ पर अक्सर नरमी दिखाई देती है। यह दोहरा मापदंड न केवल संरक्षण प्रयासों को कमजोर करता है, बल्कि स्थानीय लोगों के बीच व्यवस्था के प्रति अविश्वास भी पैदा करता है।

भारत में बाघ संरक्षण को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक सफलता के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है। बाघों की संख्या में वृद्धि, नए रिज़र्व की घोषणा और पर्यटन के आँकड़े ये सब सकारात्मक संकेत हैं। लेकिन संरक्षण केवल संख्या का खेल नहीं है। एटीआर में अगर बाघों की संख्या बढ़ रही है, तो निगरानी और सुरक्षा भी उसी अनुपात में मज़बूत होनी चाहिए। अचानकमार की ये तमाम घटनायें यह याद दिलाती है कि काग़ज़ी उपलब्धियाँ ज़मीनी हकीकत की जगह नहीं ले सकतीं। 

Chhattisgarh: एटीआर में नर बाघ की मौत, आपसी संघर्ष को कारण बताया गया

बिलासपुर/अचानकमार। छत्तीसगढ़ के अचानकमार टाइगर रिज़र्व में एक नर बाघ मृत अवस्था में पाया गया है। वन विभाग के अनुसार प्रारंभिक जांच में बाघ की मौत का कारण दो बाघों के बीच हुआ आपसी संघर्ष सामने आया है।

यह घटना 25 जनवरी 2026 को अचानकमार परिक्षेत्र के सारसडोल क्षेत्र अंतर्गत कुडेरापानी परिसर की बताई गई है, जहाँ नियमित पेट्रोलिंग के दौरान सुरक्षा बलों ने बाघ का शव देखा। सूचना मिलते ही वन विभाग की टीम ने इलाके को सुरक्षित कर लिया और वरिष्ठ अधिकारियों को जानकारी दी।

राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) की मानक प्रक्रिया के तहत गठित समिति की मौजूदगी में अगले दिन पशु चिकित्सकों की टीम ने बाघ का पोस्टमार्टम किया। अधिकारियों के मुताबिक मृत बाघ की उम्र लगभग दो वर्ष थी और वह नर था।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बताया गया है कि बाघ की गर्दन की हड्डी टूटी हुई पाई गई, वहीं गर्दन के निचले हिस्से पर दूसरे नर बाघ के दाँतों के स्पष्ट निशान मिले हैं। घटनास्थल पर झाड़ियों के टूटे हुए हिस्से, खरोंच के निशान, बाल और मल जैसे संकेत भी पाए गए हैं, जो क्षेत्रीय संघर्ष की ओर इशारा करते हैं। वन विभाग का कहना है कि मृत बाघ के पंजों में भी दूसरे बाघ के बाल मिले हैं, जिससे इस निष्कर्ष को बल मिलता है कि मौत आपसी द्वंद्व का नतीजा है। एहतियातन, एनटीसीए के दिशा-निर्देशों के अनुसार आंतरिक अंगों को संरक्षित कर प्रयोगशाला जांच के लिए भेजा गया है। 

घटना में शामिल दूसरे बाघ की पहचान कर ली गई है और उसकी गतिविधियों पर कैमरा ट्रैप और फील्ड ट्रैकिंग के ज़रिये निगरानी की जा रही है। पोस्टमार्टम के बाद अधिकारियों और विशेषज्ञों की मौजूदगी में बाघ का अंतिम संस्कार किया गया। वन अधिकारियों का कहना है कि अचानकमार टाइगर रिज़र्व में बाघों की संख्या में हाल के वर्षों में वृद्धि हुई है। कान्हा–बांधवगढ़ कॉरिडोर से प्राकृतिक प्रवासन, अनुकूल आवास और प्रजनन सफलता के कारण क्षेत्र में बाघों की उपस्थिति बढ़ी है, जिसके चलते क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा और संघर्ष की घटनाएँ स्वाभाविक मानी जाती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार ऐसी घटनाएँ स्वस्थ बाघ आबादी वाले क्षेत्रों में कभी-कभी सामने आती हैं और यह वन्यजीवों के प्राकृतिक व्यवहार का हिस्सा होती हैं।

कैमरे की कलम: शोर का लोकतंत्र और आस्था की राजनीति


आज का भारत बहसों से नहीं, शोर से चल रहा है। यह शोर टीवी स्टूडियो से लेकर सोशल मीडिया तक फैला है। हर मुद्दा तात्कालिक है, हर गुस्सा प्रायोजित, और हर बहस अधूरी। धर्म, जाति और पहचान ये अब सामाजिक विमर्श नहीं रहे, ये राजनीतिक औज़ार बन चुके हैं। जिस दिन कोई मुद्दा जनसरोकार के सवालों की ओर बढ़ने लगता है, उसी दिन नया शोर पैदा कर दिया जाता है। समाज, धर्म और जाति जो कभी पहचान और सह-अस्तित्व के आधार थे अब टकराव की रेखाओं में बदलते दिख रहे हैं। भीड़ के शोर में व्यक्ति की आवाज़ गुम होती जा रही है। हर मुद्दा दो ध्रुवों में बँट जाता है समर्थन या विरोध, बीच की विवेकपूर्ण आवाज़ के लिए कोई जगह नहीं बचती। यह हालात लोकतंत्र के लिए खतरनाक हैं, क्योंकि लोकतंत्र बहस से मजबूत होता है, उन्माद से नहीं।

पिछले एक सप्ताह से देश में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से जुड़े मुद्दों पर गरमाई बहस यह दिखाती है कि आज आस्था भी राजनीतिक हथियार बनती जा रही है। कोई समर्थन में खड़ा है, कोई विरोध में। लेकिन बहुत कम लोग सवाल पूछने की जगह बचा पा रहे हैं। धर्म जब संवाद के बजाय दमन का माध्यम बन जाए, तो समस्या धर्म में नहीं उसके राजनीतिक इस्तेमाल में होती है। यह विवाद असल में इस बात का प्रतीक है कि हम असहमति को अपमान समझने लगे हैं। जैसा कि सभी जानते हैं प्रयागराज में मौनी अमावस्या के अवसर पर संगम स्नान को लेकर ज्योतिष पीठ बद्रीनाथ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और मेला प्रशासन के बीच टकराव देखने को मिला। इस दौरान शंकराचार्य के स्नान कार्यक्रम और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर प्रशासन और उनके समर्थकों के बीच मतभेद सामने आए। मौनी अमावस्या के दिन मेला प्रशासन ने शंकराचार्य को पालकी पर सवार होकर स्नान के लिए जाने से रोक दिया। प्रशासन का कहना था कि सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन को देखते हुए विशेष व्यवस्था लागू की गई थी। वहीं शंकराचार्य समर्थकों ने इसे परंपराओं का अपमान बताया। स्थिति उस समय तनावपूर्ण हो गई जब शंकराचार्य समर्थकों और पुलिस के बीच धक्का-मुक्की की खबरें सामने आईं। इसके बाद शंकराचार्य ने मेला और स्थानीय प्रशासन के खिलाफ धरना शुरू कर दिया। इस घटनाक्रम ने न सिर्फ प्रयागराज बल्कि देशभर में ध्यान खींचा और सोशल मीडिया से लेकर टीवी चैनलों तक यह मुद्दा चर्चा का विषय बन गया। हालांकि यह पहला मौका नहीं है जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सार्वजनिक विवादों में आए हों। इससे पहले भी उनके कई बयान और हस्तक्षेप चर्चा और विवाद का कारण बन चुके हैं।

वैसे भी भारत में विवाद कोई नई चीज़ नहीं है। यहाँ विवाद जन्म लेते हैं, पलते हैं, मीडिया में जवान होते हैं और फिर किसी अगले विवाद की आहट में खो जाते हैं। लेकिन कुछ विवाद ऐसे होते हैं जो सिर्फ किसी व्यक्ति या बयान तक सीमित नहीं रहते वे समाज के भीतर चल रहे गहरे अंतर्विरोधों को उजागर कर देते हैं। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को लेकर देशभर में जो बहस चल रही है, वह भी ऐसा ही एक मामला है। कोई उनके शंकराचार्य होने पर सवाल खड़े करता है, कोई उनके अहंकारी तेवर का हवाला देकर गलत ठहराता है। ऐसा लगता है यह विवाद किसी एक बयान का नहीं, बल्कि उस भूमिका का है जो एक धार्मिक पदाधिकारी आज के भारत में निभा रहा है या निभाना चाहता है। 

भारतीय परंपरा में शंकराचार्य केवल एक धार्मिक गुरु नहीं होता। वह विचार की परंपरा का वाहक होता है संयम, विवेक और तटस्थता का प्रतीक। ऐसे में जब कोई शंकराचार्य बार-बार समकालीन राजनीति, सरकार, नीतियों या सामाजिक समूहों पर तीखे वक्तव्य देता है, तो प्रश्न उठना स्वाभाविक है क्या यह आध्यात्मिक मार्गदर्शन है या वैचारिक हस्तक्षेप ? स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के हालिया वक्तव्यों ने यही प्रश्न फिर से केंद्र में ला दिया है। कभी गाय, कभी संविधान, कभी राष्ट्रवाद, कभी सरकार, विषयों की सूची लंबी है। समस्या यह नहीं कि वे बोल रहे हैं; समस्या यह है कि वे किस स्वर, किस भाषा और किस उद्देश्य से बोल रहे हैं। सदियों से व्यंग्य और कटाक्ष भारतीय बौद्धिक परंपरा का हिस्सा रहे हैं। कबीर ने भी किया, तुलसी ने भी संकेत दिए। लेकिन वहाँ व्यंग्य आत्ममंथन के लिए था, न कि तालियाँ बटोरने के लिए। आज जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का कोई बयान आता है, तो वह टीवी बहसों की हेडलाइन बनता है, सोशल मीडिया के ट्रेंड में बदल जाता है और फिर राजनीतिक खेमों में बाँट दिया जाता है। एक पक्ष उन्हें “सच्चा धर्मरक्षक” बताता है, दूसरा “राजनीतिक एजेंडा चलाने वाला साधु”। यह विभाजन बताता है कि उनका वक्तव्य अब आध्यात्मिक संवाद नहीं रह गया, वह राजनीतिक हथियार बन चुका है। 

यहाँ एक असहज प्रश्न खड़ा होता है, क्या एक साधु की भाषा उतनी ही कठोर हो सकती है जितनी एक राजनीतिक नेता की? जब धर्माचार्य सरकार पर सीधा हमला करते हैं, तो एक वर्ग इसे “साहस” कहता है। लेकिन जब वही धर्माचार्य किसी विशेष सामाजिक या वैचारिक समूह के प्रति कठोर रुख अपनाते हैं, तो वही वर्ग “धर्म की रक्षा” का तर्क देता है। यह दोहरा मापदंड ही विवाद की असली जड़ है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के कुछ वक्तव्यों में यह स्पष्ट दिखता है कि वे खुद को नैतिक सत्ता के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। एक ऐसी सत्ता जो चुनी नहीं गई, लेकिन जो चुनी हुई सत्ता को चुनौती देती है। 

आज स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की चर्चा केवल इसलिए भी नहीं है कि वे एक शंकराचार्य हैं, बल्कि इसलिए भी कि वे उस बदलती भूमिका का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसमें धर्माचार्य आध्यात्मिक मार्गदर्शन से आगे बढ़कर सामाजिक और राजनीतिक विमर्श में सक्रिय दिखाई देते हैं। यह भूमिका भारतीय लोकतंत्र और समाज, दोनों के लिए नए सवाल खड़े करती है। क्या धर्माचार्यों की यह सक्रियता समय की मांग है, या इससे धार्मिक पदों की तटस्थता प्रभावित होती है यह बहस अभी जारी है। लेकिन इतना स्पष्ट है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद आज के भारत में धर्म, राजनीति और सार्वजनिक विमर्श के संगम पर खड़े एक ऐसे व्यक्ति हैं, जिनकी हर टिप्पणी केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक अर्थ भी ग्रहण कर लेती है। 

इस पूरे विवाद में मीडिया की भूमिका भी कम दिलचस्प नहीं है। हर बयान को ब्रेकिंग न्यूज़, हर कटाक्ष को राष्ट्रीय बहस और हर प्रतिक्रिया को टकराव बना दिया गया। टीवी स्टूडियो में बैठे एंकर पूछते हैं— “क्या स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती देश की आवाज़ हैं?” “क्या वे राजनीति में हस्तक्षेप कर रहे हैं?” लेकिन शायद ही कोई यह पूछता है कि क्या हम धर्माचार्यों को इस भूमिका में धकेल रहे हैं, क्योंकि हमें शोर चाहिए, समाधान नहीं? 


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