STATE

नई दिल्ली, छत्तीसगढ़, Politics, बिहार

GUEST COLUMN

Guest Column

EDITOR CHOICE

Editor Choice

TRAVELLING STORY

TRAVELLING STORY

TCG EXCLUSIVE

टीसीजी एक्सक्लूसिव, इतिहास

VIDEO

VIDEO

कैमरे की कलम: “साड़ी में भी ‘फीका’ पड़ गया सिस्टम !”


छत्तीसगढ़ में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं की साड़ियों का मामला अब रंग से ज्यादा ‘ढंग’ दिखाने लगा है। साड़ियाँ क्या आईं, जैसे मानो सरकारी वादों की तरह पहले चमकदार, फिर धीरे-धीरे फीकी! कहीं लंबाई कम, कहीं चौड़ाई गायब, तो कहीं कपड़ा इतना पतला कि पारदर्शिता में ईमानदारी भी शरमा जाए। लोकतंत्र में योजनाएं अक्सर बड़े इरादों के साथ जन्म लेती हैं, कागज़ों पर वे संवेदनशीलता की मिसाल होती हैं, भाषणों में वे जनकल्याण की गारंटी बन जाती हैं और विज्ञापनों में वे सरकार की “जनहितैषी” छवि का चमकदार चेहरा। लेकिन ज़मीनी हकीकत कभी-कभी इतनी विडंबनापूर्ण होती है कि वह इन दावों का मज़ाक बनाकर रख देती है। छत्तीसगढ़ में महिला एवं बाल विकास विभाग की साड़ी खरीदी का ताज़ा मामला भी कुछ ऐसा ही है जहां साड़ी की लंबाई कम हुई है, लेकिन सवालों की सूची लंबी होती जा रही है।

करीब 9.7 करोड़ रुपए की लागत से गुजरात के सूरत से खरीदी गई साड़ियां, जो आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं के सम्मान का प्रतीक बननी थीं, अब उपहास और आक्रोश का कारण बन गई हैं। जिन महिलाओं के कंधों पर पोषण, शिक्षा और समाज के सबसे निचले तबके तक सरकारी योजनाएं पहुंचाने की जिम्मेदारी है, उन्हें ऐसी साड़ियां दी गईं जिन्हें पहनना तक मुश्किल हो गया। कहीं लंबाई कम, कहीं रंग धोते ही गायब, और कहीं कपड़ा ऐसा कि बाजार में आधी कीमत पर भी लोग दो बार सोचें। यह केवल गुणवत्ता की समस्या नहीं, बल्कि नीयत की गुणवत्ता का भी आईना है। 

विडंबना देखिए वर्क ऑर्डर में साड़ी की लंबाई 6.3 मीटर तय की गई थी लेकिन वितरण के बाद यह लंबाई 5 मीटर तक सिमट गई। ऐसा लगता है जैसे साड़ी ही नहीं, पूरी व्यवस्था “डाइटिंग” पर चली गई हो। फर्क बस इतना है कि इस डाइटिंग से किसी का वजन नहीं, बल्कि जनता का भरोसा कम हो रहा है।

अब सवाल यह है कि यह सब हुआ कैसे ? क्या यह मान लिया जाए कि करोड़ों की खरीदी में गुणवत्ता जांच महज औपचारिकता थी ? या फिर यह माना जाए कि जांच करने वालों की नजरें भी उसी तरह “सिकुड़” गई थीं, जैसे साड़ी धोने के बाद सिकुड़ रही है ? सरकारी तंत्र में यह एक पुराना खेल है फाइलों में सब कुछ परफेक्ट, जमीन पर सब कुछ संदिग्ध। कागज़ों पर साड़ी पूरी लंबाई की, लेकिन हकीकत में कटौती का ऐसा हुनर कि दर्जी भी शरमा जाए।

सरकार की मंशा पर बात करना भी इस समय जरूरी है। योजनाएं बनाते वक्त सरकार यह संदेश देना चाहती है कि वह अपने जमीनी कार्यकर्ताओं के प्रति संवेदनशील है। लेकिन जब क्रियान्वयन इस स्तर का हो, तो यह संवेदनशीलता संदेह में बदल जाती है। क्या सरकार को इस गड़बड़ी की जानकारी नहीं थी ? अगर नहीं थी, तो यह प्रशासनिक विफलता है और अगर थी तो यह और भी गंभीर सवाल खड़े करता है,क्या जानबूझकर आंखें मूंद ली गईं?

राज्य की महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े का इस मसले पर बयान आया है कि “जहां-जहां खराब साड़ियाँ गई हैं, उन्हें वापस किया जाएगा।” सुनकर ऐसा लगा जैसे साड़ियों की नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों की ‘रिटर्न पॉलिसी’ लागू हो गई हो। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या मंत्री को इस खरीदी की गुणवत्ता का अंदाजा नहीं था? या फिर यह मामला उनकी प्राथमिकताओं में कहीं पीछे छूट गया? यदि मंत्री स्तर पर ही ऐसी लापरवाही नजर आए, तो नीचे के अधिकारियों से क्या उम्मीद की जा सकती है?

इस पूरे प्रकरण का सबसे दिलचस्प और दुखद पहलू यह है कि इसमें नुकसान केवल पैसों का नहीं हुआ, बल्कि भरोसे का भी हुआ है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, जो पहले से ही सीमित संसाधनों में काम करती हैं, अब खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही हैं। जिनके लिए यह साड़ी सम्मान का प्रतीक होनी चाहिए थी, वह अब उनके लिए एक “समस्या” बन गई है। यह स्थिति केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि संवेदनशीलता की कमी को भी दर्शाती है। यह साड़ी घोटाला भी कुछ ऐसा ही कर रहा है। विपक्ष के लिए यह मुद्दा तैयार है, जनता के बीच यह चर्चा का विषय बन चुका है, और सोशल मीडिया पर यह व्यंग्य का नया केंद्र बन गया है। लोग कह रहे हैं “साड़ी ही नहीं, सरकार की साख भी सिकुड़ गई है।”

 एक सवाल यह भी है कि जिस “खादी और ग्रामोद्योग” को आत्मनिर्भरता और गुणवत्ता का प्रतीक माना जाता है, उसी के जिम्मे यह खरीदी थी। यह वही खादी है, जिसे कभी स्वदेशी और स्वाभिमान का प्रतीक कहा जाता था। लेकिन इस मामले में यह प्रतीक भी सवालों के घेरे में आ गया है। क्या खादी अब केवल नाम भर रह गई है, और गुणवत्ता कहीं पीछे छूट गई है? या फिर गुजरात के सूरत शहर के जिस साड़ी निर्माता को यह ठेका दिया गया उसका खादी से कोई वास्ता ही नहीं। 

इस पूरे घटनाक्रम में एक पैटर्न भी नजर आता है, छोटी-छोटी कटौतियों का बड़ा खेल। कहीं लंबाई में कटौती, कहीं गुणवत्ता में, और कहीं जवाबदेही में। यह कटौती केवल साड़ी तक सीमित नहीं रहती, बल्कि धीरे-धीरे सिस्टम की आत्मा को भी काटने लगती है। और जब यह प्रक्रिया लंबे समय तक चलती है, तो भ्रष्टाचार “अपवाद” नहीं, बल्कि “व्यवस्था” बन जाता है।

अब सवाल यह है कि आगे क्या ? क्या इस मामले की जांच होगी ? क्या जिम्मेदारों पर कार्रवाई होगी ? या फिर यह मामला भी उन फाइलों में दफन हो जाएगा, जहां पहले से ही कई “घोटाले” धूल खा रहे हैं ? अनुभव कहता है कि शोर कुछ दिनों तक रहेगा, बयानबाजी होगी, और फिर धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य हो जाएगा। लेकिन हर बार की तरह इस बार भी एक चीज पीछे छूट जाएगी—जनता का भरोसा।

सरकार के लिए यह समय आत्ममंथन का है। योजनाएं बनाना आसान है, लेकिन उन्हें ईमानदारी से लागू करना ही असली चुनौती है। यदि जमीनी स्तर पर ही ऐसी गड़बड़ियां होती रहेंगी, तो बड़े-बड़े दावे भी खोखले साबित होंगे। और जब जनता का भरोसा डगमगाने लगे, तो कोई भी “विकास” का नारा उसे संभाल नहीं सकता।

अंततः, यह मामला हमें एक कड़वी सच्चाई की याद दिलाता है—भ्रष्टाचार हमेशा बड़े घोटालों में ही नहीं होता, वह छोटी-छोटी कटौतियों में भी छिपा होता है। और जब ये छोटी कटौतियां मिलकर एक बड़ा रूप ले लेती हैं, तो वह केवल आर्थिक नुकसान नहीं पहुंचातीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता को भी कमजोर कर देती हैं।

 इस “छोटी साड़ी” की कहानी दरअसल बहुत बड़ी है। यह केवल कपड़े की लंबाई की नहीं, बल्कि नीयत की गहराई की कहानी है। और जब नीयत ही छोटी हो जाए, तो फिर किसी भी योजना की लंबाई बढ़ाने से क्या फर्क पड़ता है? कुल मिलाकर, साड़ी का रंग भले ही फीका पड़ गया हो लेकिन इस पूरे मामले ने सिस्टम के रंग जरूर गहरे कर दिए हैं—और वो भी ऐसे कि अब धुलने से भी नहीं जाएंगे ! 

सिनेमाघरों में भी दिखाई जाएगी साइबर फ्रॉड पर फिल्म “खौफ- द डिजिटल वार”

 

रायगढ़। 
TODAY छत्तीसगढ़  /  साइबर फ्रॉड के प्रति जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से बनाई गई शॉर्ट फिल्म “खौफ- द डिजिटल वार” को प्रदेश के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने अपने आधिकारिक फेसबुक पेज पर साझा किया है। उन्होंने फिल्म की सराहना करते हुए इसे समयानुकूल पहल बताया और लोगों को सतर्क रहने का संदेश दिया।यह फिल्म वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक शशि मोहन सिंह द्वारा निर्मित एवं अभिनीत है, जिसमें डिजिटल अरेस्ट जैसे गंभीर साइबर अपराध को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया है।

CMO ने भी किया साझा

सीएमओ छत्तीसगढ़ के आधिकारिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से भी इस फिल्म को साझा कर साइबर अपराधों के प्रति जागरूकता का संदेश दिया गया। फिल्म में दिखाए गए विषयों की सराहना करते हुए आमजन से सतर्क रहने की अपील की गई।

सिनेमाघरों में भी होगा प्रदर्शन

रायगढ़ पुलिस द्वारा इस फिल्म को यूट्यूब समेत विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर व्यापक रूप से प्रसारित किया जा रहा है। साथ ही, इसे जिले के सिनेमाघरों और मल्टीप्लेक्स में निशुल्क प्रदर्शित करने की तैयारी भी की जा रही है। हाल ही में घरघोड़ा के एके सिनेमा में इसका निःशुल्क प्रदर्शन किया गया।

 एसएसपी ने जताया आभार

एसएसपी शशि मोहन सिंह ने मुख्यमंत्री का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह प्रोत्साहन भविष्य में और बेहतर कार्य करने की प्रेरणा देता है। उन्होंने बताया कि फिल्म का उद्देश्य आम लोगों को साइबर ठगी से बचाने के लिए जागरूक करना है।

फर्जी डॉक्टर बनकर करोड़ों की बैंक ठगी की साजिश नाकाम, आरोपी गिरफ्तार


रायपुर। 
TODAY छत्तीसगढ़  /  राजधानी में पुलिस ने समय रहते एक बड़े अंतरराज्यीय बैंक ठगी गिरोह की साजिश को विफल कर दिया। कबीर नगर थाना पुलिस ने ओडिशा के कटक निवासी श्रीधर राउत (32) को गिरफ्तार किया है, जो पिछले सात महीनों से फर्जी पहचान के साथ शहर में रह रहा था।

पुलिस के अनुसार, आरोपी खुद को एम्स का डॉक्टर बताकर बैंक अधिकारियों और आम लोगों का विश्वास जीतने की कोशिश कर रहा था। उसकी योजना फर्जी दस्तावेजों के जरिए करोड़ों रुपये के बैंक ऋण हासिल कर फरार होने की थी। जांच में सामने आया कि आरोपी अलग-अलग नाम—आदित्य मिश्रा, आदित्य अग्निहोत्री और डॉ. सिद्धार्थ—का इस्तेमाल कर अपनी पहचान छिपा रहा था। वह प्रतिष्ठित संस्थान से जुड़ा होने का दावा कर लोगों को भ्रमित करता था। 

पुलिस के मुताबिक आरोपी जमीन सौदों के नाम पर बैंक लोन लेने, लग्जरी वाहन के लिए ऋण हासिल करने, रकम लेकर फरार होने की मंशा बनाकर लोगों को झांसा देकर पैसा ऐंठने की योजना बना चुका था। बताया गया कि वह पहले भी मेडिकल छात्रों को वीजा दिलाने का झांसा देकर उनके पासपोर्ट हड़प चुका है। खास बात यह रही कि अब तक कोई शिकायत दर्ज नहीं हुई थी, इसके बावजूद पुलिस ने खुफिया जानकारी के आधार पर कार्रवाई कर आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। इससे करोड़ों रुपये की संभावित ठगी टल गई। पुलिस ने आरोपी के पास से नकली आधार और पैन कार्ड, फर्जी सिम कार्ड, अलग-अलग नामों के बैंक दस्तावेज, पासपोर्ट, जाली शैक्षणिक प्रमाण पत्र और प्रतिष्ठित संस्थानों के फर्जी आईडी बरामद किए हैं। 

नागरिकों से अपील

पुलिस ने लोगों और बैंक प्रबंधन से अपील की है कि किसी भी व्यक्ति की पहचान का स्वतंत्र सत्यापन करें, किरायेदार व कर्मचारियों का पुलिस वेरिफिकेशन अनिवार्य रूप से कराएं और संदिग्ध गतिविधियों की सूचना तुरंत दें।

फांसी की मांग: पांच साल की बच्ची से रेप, आरोपी गिरफ्तार


दुर्ग। 
 TODAY छत्तीसगढ़  / जिले के उतई थाना क्षेत्र में पांच साल की मासूम बच्ची के साथ दुष्कर्म का मामला सामने आया है। पुलिस ने इस मामले में आरोपी धनेश्वर साहू (35) को गिरफ्तार कर लिया है। घटना के बाद क्षेत्र में आक्रोश का माहौल है। पुलिस के अनुसार, शुक्रवार दोपहर बच्ची स्कूल से घर लौटने के बाद पास की दुकान में चॉकलेट लेने गई थी। इसी दौरान आरोपी उसे बहला-फुसलाकर अपने घर ले गया, जहां उसके साथ दुष्कर्म किया गया।  

जब बच्ची काफी देर तक घर नहीं पहुंची तो परिजनों ने तलाश शुरू की। करीब दो घंटे बाद ग्रामीणों को एक कुएं के पास संदिग्ध बोरा दिखाई दिया। बोरा खोलने पर उसमें बच्ची मिली, जिसका मुंह कपड़े से बंधा हुआ था। सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और बच्ची को तत्काल अस्पताल में भर्ती कराया गया। मेडिकल जांच में दुष्कर्म की पुष्टि हुई है। बच्ची फिलहाल डरी हुई है और उसका इलाज जारी है। 

पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है और उसके खिलाफ संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज कर लिया गया है। घटना के बाद बड़ी संख्या में ग्रामीण थाने के पास पहुंचे और आरोपी को कड़ी सजा देने की मांग की। पुलिस ने लोगों को समझाइश देकर शांत कराया। पुलिस अधिकारियों ने बताया कि मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में कराने का प्रयास किया जाएगा, ताकि पीड़िता को जल्द न्याय मिल सके। 

© all rights reserved TODAY छत्तीसगढ़ 2018
todaychhattisgarhtcg@gmail.com