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सोनसरी-मुकुंदपुर सड़क स्वीकृति पर उप मुख्यमंत्री का आभार


बिलासपुर। 
TODAY छत्तीसगढ़  /  उप मुख्यमंत्री अरुण साव से बिलासपुर के नेहरू चौक स्थित कार्यालय में आयोजित जनदर्शन कार्यक्रम में मस्तूरी के सोन ग्राम पंचायत के प्रतिनिधिमंडल ने सौजन्य भेंट की। प्रतिनिधिमंडल ने ग्राम में पूर्ण हुए एवं स्वीकृत विकास कार्यों के लोकार्पण तथा भूमिपूजन कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होने के लिए उन्हें औपचारिक निमंत्रण दिया। प्रतिनिधि मंडल ने बताया कि लगभग 19 लाख रुपये की लागत से नव निर्मित ग्राम पंचायत भवन का निर्माण कार्य पूर्ण हो चुका है, जिसका शीघ्र ही लोकार्पण प्रस्तावित है। साथ ही सोनसरी से मुकुंदपुर तक साढ़े 8 किलोमीटर लंबाई की सड़क निर्माण कार्य के लिए लगभग 19 करोड़ रुपये की प्रशासकीय स्वीकृति लोक निर्माण विभाग द्वारा जारी की गई है।

 इस महत्वपूर्ण स्वीकृति के लिए प्रतिनिधिमंडल ने उप मुख्यमंत्री का आभार व्यक्त किया। उप मुख्यमंत्री श्री साव ने आमंत्रण स्वीकार करते हुए कहा कि कार्यक्रम की तिथि शीघ्र निर्धारित की जाएगी और वे स्वयं उपस्थित होकर विकास कार्यों की शुरुआत करेंगे। उन्होंने क्षेत्र के समग्र विकास के लिए शासन की प्रतिबद्धता दोहराई। प्रतिनिधि मंडल में भाजपा ग्रामीण जिला अध्यक्ष मोहित जायसवाल, जिला पंचायत सदस्य राधा खिलावन पटेल, सोन सरपंच मोतीराम साहू सहित बजरंग पटेल, खिलावन श्रीवास, मनोज केवट, सीमा साहू आदि जनप्रतिनिधि एवं ग्रामीण जन उपस्थित थे।    

कैमरे की कलम: “नौकरी का विज्ञापन और ठगी का राष्ट्रनिर्माण”


बिलासपुर जिले के कोटा ब्लॉक मुख्यालय में जय स्तम्भ पर लगा यह पोस्टर अपने आप में केवल एक “नौकरी का विज्ञापन” नहीं, बल्कि बेरोजगारी के बाजार में चल रहे उस संगठित भ्रम उद्योग का जीवंत उदाहरण है, जिसमें शब्द रोजगार के होते हैं और परिणाम अक्सर शोषण के। इस पोस्टर में बड़े अक्षरों में लिखा है—“नौकरी चाहिए, फोन घुमाइए”। यह वाक्य सुनने में जितना सरल और आकर्षक लगता है, उतना ही खतरनाक भी हो सकता है। क्योंकि जिस देश में लाखों युवा वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं, वहां अगर केवल “फोन घुमाने” से 18,500 से 21,500 रुपये महीने की नौकरी मिलने लगे, तो यह रोजगार कम और चमत्कार अधिक प्रतीत होता है। 

पोस्टर में दावा किया गया है कि कंपनी को “हेल्पर की जरूरत है”, पोस्टर में यह भी लिखा है कि “कंपनी की तरफ से रूम फ्री” और “आने-जाने के लिए गाड़ी फ्री” होगी। यह पढ़कर ऐसा लगता है कि कंपनी को कर्मचारी नहीं, दामाद चाहिए। यह सुविधाएं किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी के पैकेज जैसी लगती हैं, लेकिन पोस्टर में कंपनी का नाम, उसका पंजीयन नंबर, लाइसेंस विवरण या कोई वैधानिक पहचान स्पष्ट रूप से उल्लेखित नहीं है। यह वही खामोशी है, जिसमें अक्सर धोखाधड़ी की आवाज छिपी होती है। इस पोस्टर में स्थानीय स्तर पर बिलासपुर (छत्तीसगढ़) का संपर्क नंबर दिया गया है, जबकि “डायरेक्टर” जिग्नेश भाई पटेल का नाम गुजरात के भरूच से जुड़ा बताया गया है। यह भौगोलिक दूरी और स्थानीय संपर्क का संयोजन ठगी के कई पुराने मामलों में देखा गया पैटर्न है जहां स्थानीय व्यक्ति केवल एक माध्यम होता है और वास्तविक संचालन कहीं और से होता है। 

दरअसल देश में बेरोजगारी अब केवल एक आंकड़ा नहीं रही, यह एक ऐसा खुला बाजार बन चुकी है, जहां नौकरी से ज्यादा नौकरी का भ्रम बिकता है। और इस भ्रम के सबसे बड़े कारोबारी वे लोग हैं, जो रोजगार नहीं देते, बल्कि रोजगार की कल्पना का प्राइवेट लिमिटेड संस्करण बेचते हैं। यह एक ऐसा स्टार्टअप इकोसिस्टम है, जहां निवेश बेरोजगारों की उम्मीदें होती हैं और मुनाफा उनके आत्मसम्मान से वसूला जाता है। आज का ठग पुराना ठग नहीं रहा। वह अब जेबकतरा नहीं, बल्कि “डिजिटल एचआर मैनेजर” बन चुका है। वह अब स्टेशन पर खड़े होकर नहीं कहता—“चलो मुंबई, नौकरी दिलाएंगे।” अब वह लिंक्डइन पर प्रोफाइल बनाता है, इंस्टाग्राम पर विज्ञापन चलाता है और वाट्सऍप  पर “Congratulations” लिखकर बेरोजगार युवक को यह एहसास दिलाता है कि देश की अर्थव्यवस्था अब उसी के भरोसे चल रही है।

विडंबना यह है कि जिस देश में एक वास्तविक नौकरी पाने के लिए युवा वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं में खप जाता है, उसी देश में एक फर्जी नौकरी देने वाला व्यक्ति मात्र एक सिम कार्ड और एक फर्जी लोगो से “मल्टीनेशनल कंपनी” बन जाता है। यह स्टार्टअप इंडिया का वह अंधेरा पक्ष है, जहां नवाचार का उपयोग रोजगार सृजन के लिए नहीं, बल्कि रोजगार भ्रम सृजन के लिए किया जा रहा है। 

इन ठगों की कार्यप्रणाली अत्यंत वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक है। वे जानते हैं कि बेरोजगार युवक को सबसे ज्यादा किस शब्द की भूख होती है—“Selected”। यह शब्द सुनते ही युवक की आंखों में वह चमक आ जाती है, जो वर्षों की असफलताओं ने बुझा दी थी। और यही वह क्षण होता है, जब ठग अपनी पहली किस्त वसूलता है—“रजिस्ट्रेशन फीस” के नाम पर। इसके बाद शुरू होता है शुल्कों का एक ऐसा सिलसिला, जो कभी समाप्त नहीं होता—ट्रेनिंग फीस, सिक्योरिटी फीस, प्रोसेसिंग फीस। यह फीस दरअसल नौकरी की नहीं, बल्कि ठगी की प्रक्रिया को वैधता देने का टैक्स होता है।

जब युवक पैसे दे देता है, तो उसे दूसरे राज्य भेज दिया जाता है। वहां उसका स्वागत किसी एयरपोर्ट मैनेजर के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे श्रमिक के रूप में होता है, जिसकी स्वतंत्रता पहले ही किस्त में गिरवी रखी जा चुकी होती है। वह समझ जाता है कि उसे नौकरी नहीं मिली, बल्कि उसे बेच दिया गया है—उसके श्रम को, उसकी मजबूरी को और उसके सपनों को।

यहां सबसे गंभीर प्रश्न ठगों की मौजूदगी नहीं, बल्कि उनकी निर्भीकता है। यह निर्भीकता उन्हें किसी अदृश्य शक्ति से नहीं, बल्कि व्यवस्था की सुस्ती से मिलती है। फर्जी विज्ञापन खुलेआम सोशल मीडिया पर चलते रहते हैं, हजारों लोगों तक पहुंचते हैं, लेकिन कार्रवाई का पहिया तब घूमता है, जब पीड़ित युवक थाने पहुंचकर अपनी मूर्खता का प्रमाण देने लगता है। व्यवस्था का रवैया भी कम व्यंग्यात्मक नहीं है। जब कोई युवक शिकायत करता है, तो उससे पूछा जाता है—“तुमने पैसे क्यों दिए?” यह प्रश्न दरअसल एक प्रशासनिक दर्शन को प्रकट करता है—कि अपराध से ज्यादा गंभीर गलती विश्वास करना है।

यह स्थिति केवल कानून-व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि सामाजिक संवेदनहीनता का भी प्रमाण है। क्योंकि ठग केवल पैसे नहीं चुराते, वे उस विश्वास को चुराते हैं, जिस पर समाज टिका होता है। वे केवल एक युवक को नहीं ठगते, बल्कि एक पूरे परिवार की आशाओं को दिवालिया घोषित कर देते हैं। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अधिक संगठित और पेशेवर अगर कोई है, तो वह ठग है। उसके पास मार्केटिंग टीम है, फर्जी रिव्यू हैं, आकर्षक वेबसाइट है, और सबसे महत्वपूर्ण—उसे यह विश्वास है कि उसके खिलाफ कार्रवाई देर से ही होगी।

इसके विपरीत, पीड़ित युवक के पास केवल एक शिकायत होती है और एक लंबा इंतजार। यह स्थिति किसी भी सभ्य समाज के लिए चिंता का विषय होनी चाहिए।क्योंकि जब अपराध तकनीकी रूप से आधुनिक हो जाए और कानून मानसिक रूप से परंपरागत बना रहे, तो न्याय हमेशा पीछे रह जाता है।

यह आवश्यक है कि व्यवस्था केवल अपराध होने के बाद सक्रिय न हो, बल्कि अपराध होने से पहले सतर्क हो। फर्जी प्लेसमेंट एजेंसियों का सत्यापन, सोशल मीडिया विज्ञापनों की निगरानी और त्वरित कार्रवाई—ये केवल प्रशासनिक विकल्प नहीं, बल्कि नैतिक दायित्व हैं। लेकिन फिलहाल स्थिति यह है कि बेरोजगार युवक नौकरी की तलाश में है और ठग बेरोजगार युवकों की तलाश में। 

डीजीपी ने राजकिशोर नगर लूट मामले में त्वरित कार्रवाई को सराहा, पुलिस अधिकारियों की ली बैठक

बिलासपुर ।  TODAY छत्तीसगढ़  / छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) अरुण देव गौतम ने शुक्रवार को पुलिस महानिरीक्षक (आईजी) बिलासपुर रेंज कार्यालय के सभागार में जिले के पुलिस अधिकारियों की समीक्षा बैठक ली। डीजीपी गौतम ने राजकिशोर नगर में सर्राफा व्यवसायी के साथ हुई लूट की घटना में पुलिस द्वारा 24 घंटे के भीतर आरोपियों को माल मशरूका सहित गिरफ्तार करने और अंतर्राज्यीय समन्वय स्थापित करने की सराहना की। साथ ही उन्होंने ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए गश्त-पेट्रोलिंग बढ़ाने, संदिग्धों की सघन जांच, होटल-लॉज की नियमित चेकिंग और आसूचना तंत्र को मजबूत करने के निर्देश दिए। उन्होंने सर्राफा बाजार, बैंक और अन्य संवेदनशील स्थानों की नियमित सुरक्षा जांच तथा सीसीटीवी व्यवस्था की निगरानी सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया।

डीजीपी ने राजपत्रित अधिकारियों को थानों का नियमित और गुणवत्तापूर्ण पर्यवेक्षण करने, फरियादियों की शिकायतों को गंभीरता से सुनने और थानों को अधिक संवेदनशील बनाने के निर्देश दिए। उन्होंने नाकाबंदी व्यवस्था में सुधार, थाना प्रभारियों द्वारा स्वयं रिपोर्ट सुनने और एफआईआर दर्ज करने की प्रक्रिया पर निगरानी रखने तथा संदिग्ध मर्ग प्रकरणों की सूक्ष्मता से जांच सुनिश्चित करने पर भी बल दिया।

बैठक में अभियोजन विभाग को विवेचना की गुणवत्ता बढ़ाने और आईसीजेएस प्रणाली के तहत ई-चालान व ई-साक्ष्य की प्रक्रिया को न्यायालय और थानों के समन्वय से शीघ्र लागू करने की दिशा में आवश्यक व्यवस्था करने के निर्देश दिए गए। वहीं होमगार्ड और अग्निशमन अधिकारियों से फायर सेफ्टी और फायर ऑडिट की स्थिति की जानकारी ली गई तथा सिरगिट्टी और मोपका में हुई आगजनी की घटनाओं पर विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर प्रशासन से साझा करने के निर्देश दिए गए।

डीजीपी गौतम ने पुलिस महानिरीक्षक रामगोपाल गर्ग को रेंज के सभी जिलों में पुलिस कार्यप्रणाली की सतत निगरानी करने और बैठक में दिए गए निर्देशों का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि बेहतर पुलिसिंग के लिए संवेदनशीलता, सतर्कता और समन्वय आवश्यक है। 

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“ट्रांजैक्शन नहीं, ट्रांसफॉर्मेशन बने जीवन का लक्ष्य” : राज्यपाल


बिलासपुर। 
 TODAY छत्तीसगढ़  / राज्यपाल रमेन डेका ने आज अटल बिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय में “ट्रांसफॉर्मिंग यूनिवर्सिटीज फॉर होलिस्टिक डेवलपमेंट” विषय पर आयोजित कुलपतियों के दो दिवसीय सम्मेलन का उद्घाटन किया। सम्मेलन में देश और प्रदेश के विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुल 42 कुलपतियों और पूर्व कुलपतियों ने भाग लिया। राज्यपाल ने विद्यार्थियों से जीवन में सकारात्मकता बनाए रखने का आह्वान करते हुए कहा कि अपने संपूर्ण जीवन में कोई एक ऐसा कार्य करें कि जिसमें केवल ट्रांजैक्शन नहीं, बल्कि ट्रांसफॉर्मेशन का भाव हो। इस अवसर पर राज्यपाल श्री डेका ने विश्वविद्यालय की त्रैमासिक पत्रिका कन्हार का भी विमोचन किया। कार्यक्रम में यूनिवर्सिटी के कुलपति आचार्य एडीएन वाजपेयी, महापौर श्रीमती पूजा विधानी, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति श्री गिरीश चंद्र त्रिपाठी, कुल सचिव श्री तारणीश गौतम सहित विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपति मौजूद थे। 

      राज्यपाल श्री डेका ने अपने उद्बोधन में कहा कि भारत की प्राचीन शिक्षा व्यवस्था अत्यंत समृद्ध और मूल्यनिष्ठ थी, किंतु औपनिवेशिक काल में लॉर्ड मैकाले की नीतियों के कारण इसकी दिशा परिवर्तित हुई। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भारतीय मूल्यों और समग्र विकास की अवधारणा को पुनर्स्थापित करने का सशक्त प्रयास है। इसकी विशेषताओं को समाज तक पहुँचाना तथा प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करना विश्वविद्यालयों की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। राज्यपाल ने कहा कि विश्वविद्यालय केवल डिग्री प्रदान करने वाले संस्थान नहीं रहे बल्कि विचार, नवाचार और राष्ट्र निर्माण के केंद्र हैं। कुलपति शैक्षणिक नेतृत्व के संवाहक हैं, जिनके निर्णय आने वाली पीढ़ियों की दिशा तय करते हैं। उन्होंने शैक्षणिक सुशासन, गुणवत्ता आश्वासन, शोध एवं नवाचार तथा डिजिटल परिवर्तन पर विशेष बल दिया।

     उन्होंने कहा कि समग्र विकास की दिशा में स्कूल कॉलेजों में ड्रॉपआउट की समस्या सबसे बड़ी चुनौती है। जब तक विद्यार्थी शिक्षा से निरंतर जुड़े नहीं रहेंगे, तब तक किसी भी नीति का उद्देश्य पूर्ण नहीं हो सकता। डिजिटल युग का उल्लेख करते हुए राज्यपाल ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), ऑनलाइन संसाधन और डेटा विश्लेषण उच्च शिक्षा के महत्वपूर्ण उपकरण हैं। इनका उपयोग शिक्षा की गुणवत्ता और पहुँच बढ़ाने के लिए किया जाना चाहिए, साथ ही मानवीय मूल्यों को भी सुदृढ़ बनाए रखना आवश्यक है। उन्होंने शोध और नवाचार को विश्वविद्यालयों की आत्मा बताते हुए कहा कि गुणवत्तापूर्ण अनुसंधान से ही आत्मनिर्भर भारत की नींव सशक्त होगी। विश्वविद्यालयों को उद्योग, समाज और शासन के साथ समन्वय स्थापित कर नवाचार की संस्कृति विकसित करनी चाहिए।

      अटल बिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय के कुलपति आचार्य ए.डी.एन. वाजपेयी ने विश्वविद्यालय की शैक्षणिक एवं प्रशासनिक उपलब्धियों की जानकारी देते हुए कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप पाठ्यक्रम निर्माण, दीक्षांत समारोहों के आयोजन तथा समयबद्ध परीक्षा परिणामों में विश्वविद्यालय ने उल्लेखनीय प्रगति की है। उन्होंने बताया कि प्रशासनिक पारदर्शिता और सामूहिक निर्णय प्रक्रिया विश्वविद्यालय की प्राथमिकता है। वित्तीय सुदृढ़ीकरण एवं अधोसंरचना विकास योजनाओं पर कार्य जारी है। कुलपति ने विश्वविद्यालय को उत्कृष्टता की दिशा में आगे बढ़ाने के लिए सभी के सहयोग के प्रति आभार व्यक्त किया।

      राज्यपाल ने आयोजन के लिए विश्वविद्यालय परिवार को बधाई देते हुए सम्मेलन की सफलता के लिए शुभकामनाएं दीं। इस अवसर संभागीय कमिश्नर श्री सुनील जैन, कलेक्टर श्री संजय अग्रवाल, नगर निगम कमिश्नर श्री प्रकाश कुमार सर्वे, सीईओ जिला पंचायत श्री संदीप अग्रवाल एवं शिक्षकगण एवं विद्यार्थी उपस्थित थे। 

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