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कैमरे की कलम: चूहे, दीमक और सात करोड़ की लोकतांत्रिक भूख


छत्तीसगढ़ के कवर्धा जिले में जो हुआ, वह घोटाला नहीं घोटाले का सरकारी विज्ञापन है। फर्क बस इतना है कि इस बार पोस्टर पर नेता नहीं, चूहे मुस्कुरा रहे हैं। 26 हजार क्विंटल धान, सात करोड़ रुपये और जवाब चूहा, दीमक, मौसम। यानी चोरी भी प्रकृति ने की, गिनती भी प्रकृति ने बिगाड़ी और जवाबदेही भी प्रकृति ले जाएगी। यह घटना उस व्यवस्था का चरित्र प्रमाणपत्र है, जो हर बड़े घोटाले के बाद और ज्यादा बेशर्म, ज्यादा आत्मविश्वासी और ज्यादा रचनात्मक होती जा रही है। सात करोड़ रुपये का धान न आग में जला, न बाढ़ में बहा, न ही किसी युद्ध में लुटा बस चूहों, दीमकों और मौसम ने खा लिया। यह सफाई इतनी मासूम है कि अपराध भी खुद को ठगा हुआ महसूस करे।

यह पहला मौका है जब सरकारी बयान ने जीव-जंतुओं को भ्रष्टाचार की अग्रिम पंक्ति में ला खड़ा किया है। अब तक घोटालों में नेता, अफसर, दलाल और ठेकेदार बदनाम होते थे, लेकिन कवर्धा ने इतिहास रच दिया यहाँ चूहे मुख्य अभियुक्त हैं। वे भी ऐसे चूहे, जो क्विंटल में खाते हैं, रजिस्टर में एंट्री करवाते हैं, फर्जी बिल बनवाते हैं और जाते-जाते CCTV की आंखों पर पट्टी भी बाँध देते हैं। यह कोई साधारण चूहा नहीं, बल्कि सिस्टम-अनुकूल चूहा है।

प्रश्न यह नहीं है कि 26 हजार क्विंटल धान कैसे गायब हुआ। असली प्रश्न यह है कि इतना धान गायब होने के बाद भी सिस्टम कैसे खड़ा है? गोदामों में धान आता है, तौला जाता है, सील होता है, निरीक्षण होता है, रिपोर्ट बनती है और फिर एक दिन पता चलता है कि धान था ही नहीं। यह जादू नहीं, यह प्रशासनिक कला है। इसे भ्रष्टाचार कहना इस कला का अपमान होगा; यह तो प्रशासनिक शिल्प है।

प्रशासन की सफाई बताती है कि चूहे और दीमक अब सिर्फ अनाज या लकड़ी नहीं खाते, वे जवाबदेही भी खाते हैं। मौसम सिर्फ फसल नहीं खराब करता, वह फाइलें भी साफ कर देता है। यह वही मौसम है जो हर घोटाले के बाद अचानक सक्रिय हो जाता है कभी बारिश बनकर, कभी नमी बनकर, कभी “लंबे समय तक भंडारण” के बहाने। लगता है प्रकृति भी अब सरकारी तंत्र का हिस्सा बन चुकी है।

विपक्ष ने इसे घोटाला कहा, जनता ने मज़ाक बनाया और प्रशासन ने औपचारिक कार्रवाई। कुछ निलंबन, कुछ नोटिस यानी संस्कार अनुसार शोकसभा । असली दोषी वहीं सुरक्षित हैं, जहाँ हर घोटाले के बाद रहते हैं फ़ाइलों के पीछे, पदों के ऊपर और व्यवस्था की छाया में। निलंबन यहाँ सज़ा नहीं, रिवाज़ है। नोटिस यहाँ सवाल नहीं, ढाल है।

यह पूरा प्रकरण बताता है कि भ्रष्टाचार अब चोरी नहीं करता, वह प्रक्रिया का पालन करता है। सब कुछ नियमों के भीतर होता है काग़ज़ पूरे, हस्ताक्षर पूरे, मुहरें पूरी। कमी सिर्फ गोदाम में होती है। और जब कमी पकड़ में आती है, तो कारण इतने प्राकृतिक होते हैं कि मानव जिम्मेदारी की जरूरत ही नहीं पड़ती।

कल्पना कीजिए यदि किसी किसान के घर से एक बोरी धान गायब हो जाए, तो क्या वह यह कह सकता है कि “चूहे खा गए”? शायद नहीं। उससे पूछा जाएगा लापरवाही क्यों की, सुरक्षा क्यों नहीं की। लेकिन जब सरकारी गोदाम से सात करोड़ का धान गायब होता है, तो सवाल उल्टा हो जाता है बेचारे चूहे क्या करें ? यही तो शासन और आम आदमी का फर्क है। आम आदमी दोषी होता है, सिस्टम हमेशा पीड़ित।

यह मामला यह भी बताता है कि निगरानी तंत्र सिर्फ काग़ज़ पर जिंदा है। CCTV कैमरे थे, लेकिन उन्होंने कुछ नहीं देखा। रजिस्टर थे, लेकिन उन्होंने सब कुछ सही बताया। निरीक्षण हुए, लेकिन किसी को कमी नहीं दिखी। यह सामूहिक अंधापन नहीं, सहमति से ओढ़ी गई पट्टी है। जब सबको पता हो कि क्या नहीं देखना है, तब कुछ भी नहीं दिखता।

कवर्धा का यह प्रकरण एक जिले की कहानी नहीं है। यह उस राज्य और उस व्यवस्था का प्रतीक है, जहाँ धान खरीदी किसान के नाम पर होती है, लेकिन फायदा हमेशा किसी और को मिलता है। किसान खेत में खड़ा रहता है, धूप में, कर्ज़ में, इंतज़ार में और धान गोदाम पहुँचते ही अदृश्य हो जाता है। न किसान को जवाब, न जनता को हिसाब। आज चूहे हैं, कल कुछ और होगा। कभी कहा जाएगा नमी ज्यादा थी। कभी रिकॉर्ड पुराना था। कभी मानव भूल। लेकिन एक बात स्थायी रहेगी ऊपर तक कोई जिम्मेदार नहीं। क्योंकि जिम्मेदारी वहीं मर जाती है, जहाँ सत्ता शुरू होती है।

सबसे खतरनाक यह नहीं कि धान गायब हुआ। सबसे खतरनाक यह है कि इसे लेकर सिस्टम शर्मिंदा नहीं है। वह सफाई दे रहा है, तर्क दे रहा है, बहस कर रहा है और आगे बढ़ रहा है। यह निर्लज्जता ही असली संकट है। जब घोटाला भी रूटीन हो जाए, तब लोकतंत्र सिर्फ चुनावी रस्म बनकर रह जाता है।

कवर्धा ने हमें यह सिखाया है कि आज के शासन में चूहा सबसे सुरक्षित पात्र है। न उसे गिरफ्तार किया जा सकता है, न उससे पूछताछ। वह हर बार बच निकलता है बिल्कुल वैसे ही जैसे असली दोषी। फर्क सिर्फ इतना है कि चूहा भूखा होता है, और व्यवस्था लालची।

मेरा यह कथन किसी चूहे के खिलाफ नहीं है। यह उस तंत्र के खिलाफ है, जिसने चूहे को बहाना बना लिया है। क्योंकि सच यह है कि धान चूहों ने नहीं खाया धान व्यवस्था ने खाया है। और जब व्यवस्था खुद खाने लगे, तब देश सिर्फ गोदाम नहीं खोता, विश्वास भी खो देता है। 

आज सवाल यह नहीं है कि 26 हजार क्विंटल धान कहाँ गया। सवाल यह है कि हमारी जवाबदेही, हमारी नैतिकता और हमारी शासन व्यवस्था कब और कहाँ गायब हुई ? और उसका जवाब शायद किसी गोदाम में नहीं मिलेगा वह कहीं फाइलों के बीच, नोटिसों के नीचे और चूहों की आड़ में दफन है।

कैमरे की कलम: राष्ट्रीय परिसंवाद या मौन सम्मेलन ?


किसी विश्वविद्यालय का सभागार आमतौर पर ज्ञान, संवाद और असहमति का सुरक्षित स्थल माना जाता है। यहाँ सवाल पूछे जाते हैं, बहस होती है और कभी-कभी तीखी असहमति भी सामने आती है लेकिन वही असहमति विश्वविद्यालय को विश्वविद्यालय बनाती है। यदि वहाँ सिर्फ़ ताली बजाने वाले श्रोता चाहिए हों, तो वह मंच अकादमिक नहीं, मनोरंजनात्मक हो जाता है। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर स्थित गुरू घासीदास सेंट्रल यूनिवर्सिटी में हाल में जो हुआ, उसने यही बुनियादी सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या हमारे विश्वविद्यालय अब संवाद के लिए हैं या केवल कुर्सियों की पूजा के लिए।

घटना एक राष्ट्रीय परिसंवाद की है, विषय था ‘समकालीन हिन्दी कहानी : बदलते जीवन संदर्भ’। यानी ऐसा विषय जिसमें जीवन की जटिलताएँ, विडंबनाएँ और असहमति स्वाभाविक हैं। आयोजन साहित्य अकादमी, दिल्ली के सहयोग से था। मंच पर देश के कई प्रतिष्ठित साहित्यकार मौजूद थे, जिनमें कथाकार मनोज रूपड़ा भी शामिल थे। लेकिन परिसंवाद साहित्य से अधिक सत्ता और संवेदनशीलता के टकराव का मंच बन गया।

बताया जाता है कि विश्वविद्यालय के कुलपति आलोक कुमार चक्रवाल अपने वक्तव्य में विषय से भटकते हुए चुटकुलों के सहारे श्रोताओं को संबोधित कर रहे थे। यह कोई अपराध नहीं है जब तक कि चुटकुले ज्ञान का विकल्प न बनने लगें। लेकिन जब कुलपति ने मंच पर बैठे कथाकार से यह पूछ लिया कि वे कहीं बोर तो नहीं हो रहे, तो मानो उन्होंने स्वयं संवाद का दरवाज़ा खोल दिया। कथाकार ने भी उसी खुले दरवाज़े से भीतर कदम रखते हुए सिर्फ़ इतना कहा “आप विषय पर नहीं बोल रहे हैं।”

यहीं से विश्वविद्यालय का सभागार अचानक अदालत में बदल गया, जहाँ जज भी वही थे, अभियोजक भी वही और फ़ैसला सुनाने वाले भी वही। एक साधारण-सी टिप्पणी को असहिष्णुता का ऐसा झोंका लगा कि कुलपति ने सार्वजनिक मंच से ही अतिथि लेखक को अनुशासनहीन, बदतमीज़ और अवांछित घोषित कर दिया। फिर आदेश आया बाहर जाइए। मानो यह कोई विश्वविद्यालय नहीं, निजी ड्रॉइंग रूम हो, जहाँ मेहमान वही टिक सकता है जो मेज़बान की हर बात पर सिर हिलाए।

विडंबना यह है कि विश्वविद्यालय में कुलपति को पहला विद्वान माना जाता है, पहला शिक्षक, पहला श्रोता भी। लेकिन यहाँ तो पहला श्रोता ही सवाल सुनने को तैयार नहीं था। सवाल सुनते ही कुर्सी ने अपनी असली शक्ति दिखा दी। यह वही कुर्सी है जो आदमी को ऊँचा नहीं करती, लेकिन उसे यह भ्रम ज़रूर दे देती है कि वह ऊँचा हो गया है।

वीडियो में दिखता है कि कुछ श्रोता कथाकार के साथ सभागृह से बाहर निकल गए। यह दृश्य किसी विरोध प्रदर्शन जैसा नहीं था, बल्कि एक मौन असहमति थी जैसे कोई कह रहा हो, “अगर सवाल पूछना अपराध है, तो हम इस अदालत में नहीं बैठेंगे।” यह शायद उस दिन की सबसे सार्थक प्रतिक्रिया थी।

अब सवाल उठता है क्या विश्वविद्यालयों में असहमति की कोई जगह बची है? क्या ‘राष्ट्रीय परिसंवाद’ का अर्थ यह है कि मंच से केवल वही बोला जाए जो सत्ता को अच्छा लगे? अगर ऐसा ही है, तो फिर विश्वविद्यालय और सरकारी दफ़्तर में क्या अंतर रह जाता है?

कुलपति का पद केवल प्रशासनिक नहीं होता, वह नैतिक और बौद्धिक नेतृत्व का भी प्रतीक होता है। गुरु घासीदास जैसे संत के नाम पर बने विश्वविद्यालय से यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वहाँ विनम्रता और संवाद की परंपरा होगी। लेकिन यहाँ तो हाथ हिलाकर अतिथि को बाहर निकालना ही संवाद का अंतिम रूप बन गया।

यह तर्क दिया जा सकता है कि मंच की मर्यादा बनाए रखना ज़रूरी है। यह बात सही है। लेकिन मर्यादा केवल अतिथि के लिए नहीं होती, मेज़बान के लिए भी होती है। और जब मर्यादा की परिभाषा यह हो जाए कि “आप हमारी बात से असहमत नहीं हो सकते”, तो वह मर्यादा नहीं, मौन का अनुशासन कहलाता है।

कुलपति बनने से पहले वे गुजरात के सौराष्ट्र विश्वविद्यालय में प्राध्यापक रह चुके हैं। यानी अकादमिक जीवन में बहस, सवाल और आलोचना से उनका परिचय नया नहीं होना चाहिए। फिर भी यदि एक टिप्पणी से इतना विचलन हो जाए कि सार्वजनिक अपमान का रास्ता चुना जाए, तो समस्या टिप्पणी में नहीं, संवेदनशीलता के अभाव में है।

यह घटना केवल एक लेखक और एक कुलपति के बीच का विवाद नहीं है। यह उस व्यापक संकट का लक्षण है, जिसमें संस्थानों की कुर्सियाँ व्यक्तियों से बड़ी हो गई हैं। जहाँ आलोचना को दुश्मनी समझा जाने लगा है और असहमति को अनुशासनहीनता। विश्वविद्यालयों में उत्कृष्टता इसी वजह से घट रही है क्योंकि सवाल पूछने वाले कम होते जा रहे हैं और ताली बजाने वाले बढ़ते जा रहे हैं।

अचरज की बात यह भी है कि ऐसी घटनाओं पर व्यवस्था की चुप्पी अब असामान्य नहीं रही। न केंद्र सरकार से कोई प्रतिक्रिया, न राज्यपाल स्तर से कोई सवाल। शायद इसलिए कि बदतमीजी अब अपवाद नहीं रही, बल्कि धीरे-धीरे ‘नया सामान्य’ बनती जा रही है। गरिमा जैसे शब्द अब भाषणों में ज़्यादा मिलते हैं, व्यवहार में कम।

ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या साहित्यकारों, शिक्षाविदों और पत्रकारों को ऐसे कुलपतियों के रहते विश्वविद्यालयों का बहिष्कार नहीं करना चाहिए? यह बहिष्कार किसी विचारधारा के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि व्यवहार के ख़िलाफ़ होना चाहिए। यह किसी वाम-दक्षिण की लड़ाई नहीं, बल्कि न्यूनतम इंसानियत की माँग है। कहा जाता है कि वाम और दक्षिण के बीच कहीं एक मानवपंथ भी होना चाहिए। शायद वही मानवपंथ हमें यह सिखाता है कि सत्ता अस्थायी होती है, लेकिन शब्द स्थायी। और शब्दों के साथ किया गया अन्याय देर-सबेर इतिहास में दर्ज हो जाता है।

यदि छत्तीसगढ़ के राज्यपाल को अपनी संवैधानिक भूमिका का ज़रा भी अहसास है, तो उन्हें इस घटना के वीडियो को केवल देखना नहीं चाहिए, बल्कि यह सवाल भी पूछना चाहिए कि विश्वविद्यालयों को भय और अहंकार का प्रयोगशाला बनाने का अधिकार आखिर किसने दिया ?

फिलहाल, समाज के पास ऐसे अहंकार का कोई बड़ा इलाज नहीं है। न अदालतें, न आयोग, न समितियाँ। लेकिन एक छोटा-सा लोकतांत्रिक उपाय अब भी बचा है स्मृति। लोग याद रखें कि किसने सवाल को अपमान समझा और किसने अपमान को सवाल बना दिया। और अगर कोई चिट्ठी भेजनी ही हो, तो उसमें लंबे भाषण की ज़रूरत नहीं। कभी-कभी एक वाक्य भी पर्याप्त होता है  “आप कुर्सी पर तो बैठे हैं, लेकिन गरिमा अभी बाहर खड़ी है।”

ATR रिज़र्व या रियासत ? अचानकमार की अंदरूनी कहानी


बिलासपुर।
 TODAY छत्तीसगढ़  / छत्तीसगढ़ का अचानकमार टाइगर रिज़र्व केवल बाघों का आवास नहीं है, यह राज्य की वन-नीति, प्रशासनिक ईमानदारी और सरकार की नीयत का जीवित प्रमाण होना चाहिए था लेकिन आज एटीआर जिस हालत में खड़ा है, वह बताता है कि यहाँ संरक्षण नहीं, संरक्षण का नाटक चल रहा है; क़ानून नहीं, रसूख़ सर्वोपरि है। 2009 में टाइगर रिज़र्व घोषित होने के बाद से एटीआर लगातार विवादों में रहा है। कभी बाघों की संख्या को लेकर संदेह, तो कभी अफसरों की लापरवाही। लेकिन हालिया घटनाएँ यह स्पष्ट कर देती हैं कि समस्या अब केवल प्रशासनिक अक्षमता की नहीं, बल्कि सिस्टमेटिक मिलीभगत की है।

कोर एरिया में निजी वाहन, राइफल, खुलेआम फायरिंग, आग जलाना और घंटों तक बेरोक-टोक घूमना ये सब किसी आम नागरिक के लिए असंभव है। यह सब तभी संभव है, जब नीचे से ऊपर तक संरक्षण और शह मौजूद हो। 

लोरमी क्षेत्र के रसूख़दार युवकों का मामला इसी सच्चाई को उजागर करता है। उनका आत्मविश्वास बताता है कि उन्हें न पकड़े जाने का डर था, न कार्रवाई का। क्योंकि अनुभव से वे जानते थे यह जंगल काग़ज़ों में संरक्षित है, हक़ीक़त में नहीं। चूँकि उनका ही बनाया हुआ वीडियो जब सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तो अफसरों को कार्रवाही की प्रक्रिया शुरू करनी पड़ी। विभागीय ढोल में पोल होने के बाद उन युवकों को पकड़ा गया और जेल भेज दिया गया। अब मामला न्यायालयीन व्यवस्था और प्रक्रिया के बीच है। 

वायरल वीडियो को देखकर कहना गलत नहीं होगा कि जमुनाही, सुरही और कंचनपुर जैसे कई बैरियर वन-सुरक्षा के प्रतीक नहीं, बल्कि अब रसूख़दारों के लिए स्वागत द्वार बन चुके हैं। बिना पूछताछ, बिना तलाशी, बिना अनुमति बैरियर उठते चले जाते हैं। सवाल यह नहीं कि गार्ड ने बैरियर क्यों उठाया, सवाल यह है कि गार्ड को यह भरोसा किसने दिया कि उससे कोई सवाल नहीं होगा ? 

जब मामला सामने आया, तब जो हुआ वह और भी चिंताजनक है। फील्ड डायरेक्टर छुट्टी का हवाला देते हैं, डिप्टी डायरेक्टर और रेंज अफसर फोन बंद रखते हैं, और सहायक संचालक “नंबर देने से मना है” कहकर कॉल काट देते हैं। यह केवल गैर-जिम्मेदारी नहीं, यह जांच से बचने की सोची-समझी रणनीति है।

यह मानना भोलापन ही होगा कि सरकार को इन हालात की जानकारी नहीं है। सवाल यह है कि जानते हुए भी चुप क्यों है? क्या इसलिए कि आरोपी “प्रभावशाली” हैं ? क्या इसलिए कि कार्रवाई करने से राजनीतिक असुविधा होगी ? अगर ऐसा है, तो सरकार को साफ़ कहना चाहिए कि उसके लिए जंगल, बाघ और क़ानून तीनों से ऊपर रसूख़, राजनैतिक प्रभाव है। 

आज एटीआर में बाघों की संख्या बढ़ने के दावे किए जाते हैं, लेकिन जब कोर एरिया में राइफलें गरजें, आग जले और अफसर आंखें मूंद लें तो ये आंकड़े सिर्फ़ प्रेस रिलीज़ बनकर रह जाते हैं। बाघ केवल शिकारी से नहीं मरता, वह प्रशासनिक लापरवाही और राजनीतिक संरक्षण से भी मरता है। कईयों सवाल हैं जैसे, कोर एरिया में निजी हथियारों को ले जाने की अनुमति किसने दी ? बैरियर पर तैनात कर्मचारियों ने किसके निर्देश पर बिना जांच रास्ता खोला ? प्रतिबंधित क्षेत्र में 3–4 घंटे तक मौज मस्ती, फायरिंग और आगजनी की जानकारी वरिष्ठ अफसरों तक क्यों नहीं पहुँची या जानबूझकर पहुँचने नहीं दी गई ? और सबसे बड़ा सवाल, क्या इस मामले में सिर्फ़ राजनैतिक और रसूख़दार युवक ही दोषी हैं या पूरा सिस्टम ? 

यहां का हालिया घटनाक्रम यह दर्शाता है कि एटीआर में कानून, नियम और संरक्षण की अवधारणा गंभीर रूप से कमजोर हुई है। स्थिति ऐसी बन चुकी है कि यह मामला अब प्रशासनिक चूक का नहीं, बल्कि संवैधानिक कर्तव्यों के उल्लंघन और सार्वजनिक संसाधनों की अवैध लूट का बनता जा रहा है जिस पर न्यायिक हस्तक्षेप जरूरी है।

 उपलब्ध वीडियो साक्ष्यों के अनुसार न केवल वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की धारा 27, 28 एवं 38-V का उल्लंघन है, बल्कि नेशनल टाइगर कंज़र्वेशन अथॉरिटी (NTCA) की गाइडलाइंस का भी सीधा अपमान है।

अब तो ऐसा लगता है अचानकमार टाइगर रिज़र्व आज बाघों से ज़्यादा सिस्टम के शिकंजे में फंसा हुआ है। अगर अब भी जिम्मेदार अफसरों पर सख़्त कार्रवाई नहीं होती, अगर राजनीतिक संरक्षण पर पर्दा नहीं उठता तो यह मान लेना चाहिए कि यह जंगल संरक्षण नहीं, बल्कि सत्ता-संरक्षित अराजकता का इलाका बन चुका है। ऐसे हालात में इतिहास यही दर्ज करेगा कि बाघ जंगल में नहीं मरे, उन्हें सिस्टम ने मारा है। 

कैमरे की कलम: वर्दी नोची गई, व्यवस्था खामोश रही


छत्तीसगढ़ के तमनार से सामने आई यह घटना केवल एक अपराध नहीं है यह हमारे समाज के चेहरे पर पड़ा एक गहरा तमाचा है। जेपीएल कोयला खदान के विरोध में हो रहे प्रदर्शन के दौरान ड्यूटी पर तैनात एक महिला आरक्षक को खेत-खलिहानों में दौड़ाया जाना, फिर थककर गिरने के बाद उसके साथ मारपीट करना और उसके कपड़े फाड़कर अर्धनग्न कर देना यह विवरण पढ़ना भी शर्मनाक है, देखना तो असहनीय रहा होगा और उससे भी ज़्यादा विचलित करने वाली बात यह है कि उस दौरान वह महिला आरक्षक लोगों के सामने छोड़ देने की गुहार लगाती रही, गिड़गिड़ाती रही और वहीं मौजूद कुछ लोग उसे बचाने के बजाय इस अमानवीय कृत्य का वीडियो बनाते रहे। यह दृश्य केवल एक महिला की बेबसी नहीं दिखाता, यह हमारे सामूहिक पतन का आईना है। मामले का खुलासा भी सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो के बाद हुआ, चर्चा है शासन-प्रशासन के कुछ लोग मामले में चुप्पी साधने का इशारा करते रहे।  

तमनार की तस्वीर: लोकतंत्र का सबसे शर्मनाक फ्रेम

ड्यूटी निभा रही एक महिला के कपड़े फाड़े जाना, उसके साथ बदसलूकी और उसके सम्मान को सार्वजनिक रूप से रौंदा जाना यह किसी भी परिस्थिति में, किसी भी तर्क के साथ, किसी भी आंदोलन या असंतोष के नाम पर कभी जायज़ नहीं ठहराया जा सकता। अगर कोई समाज यह बहस करने लगे कि “हालात ऐसे थे” या “भीड़ उग्र थी”, तो समझ लेना चाहिए कि वह समाज अपने नैतिक आधार खो चुका है। 

लोकतंत्र में विरोध एक मौलिक अधिकार है। असहमति, आंदोलन, प्रदर्शन ये सब लोकतांत्रिक ढाँचे की ताकत हैं लेकिन जब विरोध हिंसा में बदल जाए और वह हिंसा किसी महिला की देह और गरिमा पर हमला बन जाए, तो वह विरोध नहीं रहता वह अराजकता बन जाता है। जब एक थकी हुई महिला आरक्षक खेत में गिरती है और भीड़ उसे घेर लेती है तो वह सत्ता का प्रतीक नहीं रहती, वह सिर्फ़ एक असहाय महिला रह जाती है और उस क्षण अगर समाज उसे बचाने के बजाय तमाशा देखे, तो समझ लेना चाहिए कि समस्या सिर्फ़ अपराधियों की नहीं, हम सबकी है। 

तमनार में उस महिला के कपड़े नहीं फटे, राज्य की साख फटी है। भीड़ ने वर्दीधारी महिला को अर्धनग्न नहीं किया गया बल्कि पूरा प्रशासन नंगा हुआ है।

तमनार की घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या आज विरोध का अर्थ सिर्फ़ आक्रोश उगलना रह गया है ? क्या अब विरोध में यह भी शामिल है कि सामने खड़ी महिला वर्दीधारी है तो उसे “टारगेट” बनाया जाए ? और अगर वर्दी में खड़ी महिला भी सुरक्षित नहीं, तो फिर आम महिलाओं के लिए यह समाज कितना सुरक्षित है ? इस तरह की घटनाओं में सबसे डरावनी चीज़ सिर्फ़ अपराध नहीं होती, बल्कि आसपास खड़ी भीड़ की चुप्पी होती है। कितने लोगों ने रोका ? कितनों ने कहा कि “यह गलत है” ? कितनों ने आगे बढ़कर उस महिला की मदद की ? तमनार की घटना ने एक बार फिर यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि भारत में महिला सशक्तिकरण की वास्तविक स्थिति क्या है। यह घटना उस व्यापक सामाजिक दावे को भी चुनौती देती है, जिसके तहत यह कहा जाता है कि भारत में महिलाएँ अब पहले से कहीं अधिक सशक्त हो चुकी हैं। 

अक्सर कहा जाता है कि वर्दी सत्ता का प्रतीक होती है। लेकिन यहाँ यह तर्क भी खोखला साबित होता है। क्योंकि अगर यह केवल सत्ता का विरोध होता, तो हमला प्रतीकात्मक होता नारे, प्रतिरोध, गिरफ्तारी, पर यहाँ हमला महिला पर था उसके शरीर पर, उसके सम्मान पर। यह फर्क समझना ज़रूरी है। यह घटना बताती है कि हमारे समाज में आज भी महिला को सबसे आसान निशाना माना जाता है, चाहे वह आम नागरिक हो या वर्दी में खड़ी राज्य की प्रतिनिधि।  

यह मत कहिए कि छत्तीसगढ़ हिंसक हो गया है। छत्तीसगढ़ आज भी उतना ही सरल, आत्मीय और मानवीय है। बदली है तो व्यवस्था, जिसने लोगों के आक्रोश को संवाद नहीं, हिंसा में बदल दिया है। बदले हैं तो शासक, जो उद्योगपतियों के लिए रेड कार्पेट बिछाते हैं और जनता के लिए पुलिस की लाठी छोड़ देते हैं।

तमनार की घटना छत्तीसगढ़ के सामने कई कठिन सवाल रखती है—क्या बढ़ता आक्रोश राज्य की पारंपरिक सामाजिक सहनशीलता को पीछे छोड़ रहा है? और क्या विकास, विरोध और कानून-व्यवस्था के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए नई सोच की ज़रूरत है ? क्या इस विरोध प्रदर्शन के मद्देनज़र मौके पर पुलिस अफसरों के अलावा सैकड़ों पुलिस कर्मी उस पीड़ित महिला सहकर्मी की मदद करने में नाकाम नहीं रहे ? क्या पुलिस सत्ता के इशारे पर केवल पूंजीपतियों की ढाल बनकर हक़ मांगने वालों के सामने खड़ी रहेगी ? पिछले कई दिनों से शांति पूर्ण तरीके से चल रहे विरोध प्रदर्शन में उस दिन (27 दिसंबर) आखिर वो कौन लोग थे जिन्होंने प्रदर्शनकारियों और प्रशासन के बीच अपनी रोटी सेंकी ? शासन-प्रशासन की भद्द पिट जाने के बाद पुलिस हरकत में आई है ऐसी ख़बरें हैं। अब मामलें में दोषियों की गिरफ्तारी और जरूरी कार्रवाही होगी। कुछ गिरफ्तारियां भी हुई हैं।   

इस घटना को केवल एक अलग-थलग मामला मानकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं होगा। यह एक चेतावनी है कि यदि आक्रोश को दिशा नहीं मिली और संवेदनशीलता कमजोर पड़ी, तो उसका सबसे बड़ा असर समाज के सबसे असुरक्षित वर्गों पर पड़ता है। 

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