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कैमरे की कलम: आयुष्मान भारत बनाम चारपाई इंडिया

इस तस्वीर को देखिए। बड़े ध्यान से देखिए। यह कोई दुर्लभ, असामान्य या अपवादस्वरूप घटना नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था का आईना है जिसे हम बड़े गर्व से “स्वास्थ्य तंत्र” कहते हैं। चारपाई पर लेटा एक मरीज, कंधों पर उठाए कुछ लोग, कीचड़, पगडंडी और दूर कहीं पक्की सड़क की उम्मीद, यही आज ग्रामीण भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था की वास्तविक पहचान है। यह तस्वीर किसी एक राज्य, किसी एक जिले या किसी एक गांव की नहीं है; यह उस देश की सामूहिक तस्वीर है जो खुद को दुनिया की उभरती महाशक्ति कहने में नहीं थकता। देश में आयुष्मान भारत है, राज्य की अपनी स्वास्थ्य बीमा योजनाएं हैं, कैशलेस इलाज की लंबी-चौड़ी सूचियां हैं। कागजों में इलाज जन्म से मृत्यु तक सुरक्षित है। बस एक छोटी सी कमी है, गांव से अस्पताल तक पहुंचने का प्रावधान किसी भी योजना में स्पष्ट नहीं है। योजनाएं इलाज का खर्च उठाती हैं, लेकिन रास्ते का बोझ अब भी मरीज और उसके तीमारदार उठा रहे हैं—कंधों पर। 

इक्कीसवीं सदी के भारत में इलाज कैशलेस है, लेकिन रास्ता अब भी इंसानों के कंधों पर चलता है।

आइये इस तस्वीर पर फोकस करते है। ये तस्वीर छत्तीसगढ़ राज्य गठन के 25 बरस बाद “विकास कथा” का स्थायी फ्रेम है। कोरिया जिले के ग्राम पंचायत बंजारीडाँड़ के रोहना ठीहाई गांव में एक अनोखी, लेकिन बेहद भरोसेमंद स्वास्थ्य सेवा आज भी पूरे आत्मविश्वास के साथ चल रही है। नाम है “चारपाई एक्सप्रेस”। यह सेवा न ऐप पर मिलती है, न टोल-फ्री नंबर पर, न GPS मांगती है और न ही सड़क की ज़िद करती है। बस चार मज़बूत कंधे चाहिए, एक पुरानी खटिया और किस्मत का साथ। रोहना ठीहाई में भी यही हुआ। गांव तक सड़क नहीं है, इसलिए एम्बुलेंस वहीं तक आई, जहां सड़क खत्म होती है। उसके आगे मरीज को खटिया पर उठाकर लाने की जिम्मेदारी ग्रामीणों ने निभाई। यह जन-भागीदारी का बेहतरीन उदाहरण है, जिसे नीति आयोग की रिपोर्टों में जगह मिलनी चाहिए। मरीज का नाम लक्ष्मी नारायण है, लक्ष्मी की कृपा से दूर मरीज सिर्फ नारायण के भरोसे है। 

यह वही गांव है जहां इलाज से पहले मरीज को यह साबित करना पड़ता है कि वह सड़क तक पहुंचने लायक है। जो सड़क तक पहुंच गया, वही सिस्टम की नजर में “इलाज के योग्य” माना जाता है। यहां संविधान में “जीवन का अधिकार” तो है, लेकिन उस जीवन तक पहुंचने का रास्ता नहीं है। छत्तीसगढ़ हो, झारखंड हो, मध्यप्रदेश हो, बिहार, ओडिशा, उत्तर प्रदेश या पूर्वोत्तर के राज्य, ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सुविधा आज भी चारपाई पर लेटी हुई है। फर्क बस इतना है कि कहीं चारपाई बांस की है, कहीं लकड़ी की; कहीं उठाने वाले चार लोग हैं, कहीं दो। लेकिन व्यवस्था हर जगह एक सी बेहोश पड़ी है। 

यह तस्वीर किसी एक गांव की नहीं, उस व्यवस्था की है जो विकास को नक्शों में और मरीज को खटिया पर छोड़ देती है।

सरकारी नक्शों में सड़कें हैं, स्वास्थ्य केंद्र हैं, योजनाएं हैं, और लक्ष्य भी हैं। लेकिन रोहना ठीहाई जैसे गांवों में यह सब नक्शे पर ही रह जाता है। जमीन पर जो है, वह है कच्ची पगडंडी, नेटवर्क का सन्नाटा, बिजली की अनियमितता और इलाज की अनिश्चितता। जब बीमारी दस्तक देती है, तो न योजना काम आती है, न फाइल। काम आती है चारपाई जो यहां एम्बुलेंस है, स्ट्रेचर है और कई बार ज़िंदगी का अंतिम वाहन भी। यह कैसी विडंबना है कि जिस देश में “स्मार्ट सिटी” शब्द गर्व से बोला जाता है, उसी देश में “स्मार्ट गांव” आज भी खटिया के भरोसे है। 

इस देश में 108, 112, 104, ये सभी नंबर स्वास्थ्य सुरक्षा के प्रतीक माने जाते हैं। लेकिन इन सेवाओं का दायरा भी सड़क की सीमा तक ही है। जहां सड़क खत्म, वहीं आपातकाल समाप्त। यह व्यवस्था बड़ी ईमानदारी से मानती है कि गांव में बीमारी उतनी गंभीर नहीं होती, जितनी शहर में। इसलिए गांव का मरीज अगर बच गया, तो उसे सहनशील माना जाता है; और अगर नहीं बचा—तो फाइल में लिख दिया जाता है, “दुर्गम क्षेत्र।” 

दिल्ली से घोषित ‘सार्वभौमिक स्वास्थ्य’ गांव पहुंचते-पहुंचते चारपाई पर सिमट जाता है।

केंद्र और राज्य सरकारों ने कस्बाई इलाकों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के नाम पर दो-तीन कमरों का ढांचा खड़ा कर रखा हैं। बाहरी दीवार पर बोर्ड लगे हैं, उद्घाटन शिलाएं चमक रही हैं लेकिन भीतर डॉक्टर अक्सर अस्थायी रूप से अनुपस्थित रहते हैं, दवाएं आपूर्ति की प्रतीक्षा में होती हैं और जांच सुविधाएं जिला स्तर पर उपलब्ध बताई जाती हैं। यानि इलाज की पूरी श्रृंखला मौजूद है, बस गांव में कुछ भी नहीं। डिजिटल हेल्थ मिशन के तहत हेल्थ आईडी, ऑनलाइन रिपोर्ट और टेलीमेडिसिन का सपना दिखाया जा रहा है। रोहना ठीहाई जैसे गांव पूछ रहे है—“नेटवर्क कब मिलेगा?” जहां मोबाइल सिग्नल नहीं, वहां टेलीमेडिसिन एक प्रेरक नारा भर है। मरीज खटिया पर है और व्यवस्था ऐप डाउनलोड करने की सलाह दे रही है। रोहना ठीहाई गाँव अकेला नहीं है। देश के कई राज्यों के ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सुविधा आज भी चारपाई पर ही सफर करती है। कहीं तस्वीर सामने आ जाती है, तो कुछ दिन चर्चा का विषय बनी होती है। फिर सब कुछ सामान्य, अगली खटिया के इंतजार में। 

रोहना ठीहाई अकेला गांव नहीं है। देश के कई राज्यों के ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सुविधा आज भी चारपाई पर ही सफर करती है। जहां मोबाइल सिग्नल नहीं, वहां टेलीमेडिसिन एक प्रेरक नारा भर है। मरीज खटिया पर है और व्यवस्था ऐप डाउनलोड करने की सलाह दे रही है।

हम किसी एक सरकार या विभाग पर आरोप नहीं लगा रहे, बल्कि उस स्थायी मानसिकता पर कटाक्ष कर रहे है, जिसमें गांव को हमेशा प्राथमिकता के क्रम में आखरी पायदान पर रखा जाता है। चारपाई पर लेटा मरीज किसी योजना की विफलता नहीं, बल्कि केंद्र और राज्य सरकारों की संयुक्त स्वास्थ्य नीति की मैदानी रिपोर्ट का जीवंत प्रमाण पत्र है। चारपाई पर लेटा लोकतंत्र केवल इलाज नहीं मांग रहा। वह सत्ता से, नौकरशाहों से यह सवाल पूछ रहा है “क्या इस देश में स्वास्थ्य सेवा तक पहुंचने के लिए भी पहले सड़क पास करनी होगी?” जवाब में व्यवस्था हमेशा की तरह, खामोशी से खटिया की ओर इशारा कर देती है।  

कैमरे की कलम: न्याय की मंशा बनाम व्यवस्था की हिचक


उच्च शिक्षा के परिसरों में समानता और गरिमा का प्रश्न कोई नया नहीं है। वर्षों से यह सवाल उठता रहा है कि क्या विश्वविद्यालय ज्ञान के मंदिर हैं या सामाजिक भेदभाव की प्रयोगशाला। इसी पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट द्वारा यूजीसी के 2026 के भेदभाव-रोधी नियमों पर लगाई गई अंतरिम रोक एक साधारण न्यायिक आदेश नहीं, बल्कि व्यवस्था के अंतर्विरोधों पर तीखी टिप्पणी है। कोर्ट का कहना है कि ये नियम “दूरगामी परिणाम” पैदा कर सकते हैं और “समाज को विभाजित” कर सकते हैं। सवाल यह है कि क्या समाज पहले से विभाजित नहीं है? क्या रोहित वेमुला और डॉ. पायल तडवी की मौतें किसी काल्पनिक विभाजन की उपज थीं, या उस सच्चाई का आईना थीं जिसे लंबे समय तक संस्थागत चुप्पी ने ढक रखा था ?

इन नियमों की उत्पत्ति किसी अकादमिक प्रयोग से नहीं, बल्कि पीड़ा से हुई थी। वर्षों की याचिकाएँ, माताओं की गुहार और न्याय की उम्मीद इन्हीं से यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन के 2026 के नियम जन्मे। इनका उद्देश्य था: शिकायत की सुनवाई, जवाबदेही और संरक्षण। परंतु विरोध की तेज़ आँधी जिसमें बड़े पैमाने पर सामान्य वर्ग की असहजता दिखी,  उसने यह उजागर किया कि समानता की बात आते ही विशेषाधिकार कितने असुरक्षित हो जाते हैं।

वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह की टिप्पणी इस बहस का नैतिक केंद्र है। अगर सरकार अपने ही नियमों का बचाव नहीं कर सकती, तो यह केवल कानूनी कमजोरी नहीं संवैधानिक कर्तव्य से पलायन है। न्यायपालिका ने समिति बनाने का सुझाव देकर संतुलन साधने की कोशिश की है, पर समिति की शरण अक्सर निर्णय को टालने का सुविधाजनक रास्ता भी बन जाती है। यहां मूल टकराव स्पष्ट है: भेदभाव-रोधी व्यवस्था बनाम ‘रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन’ की आशंका। पर क्या सुरक्षा देना भेदभाव है? क्या कमजोर के लिए ढाल बनना, मज़बूत पर अन्याय है? विश्वविद्यालयों में सत्ता-संरचना आज भी वही है फर्क बस इतना है कि अब पीड़ित बोलने लगे हैं।

सुप्रीम कोर्ट की यह रोक अंतिम फैसला नहीं है, पर एक चेतावनी अवश्य है कि नियम जल्दबाज़ी में नहीं, गहन विमर्श से बनें। मगर विमर्श का अर्थ विलंब नहीं होना चाहिए। हर स्थगन के साथ कैंपस में डर का एक और दिन जुड़ जाता है। न्याय तब तक अधूरा है, जब तक वह समय पर न मिले। यह कहना गलत नहीं होगा कि नियमों की भाषा सुधारी जा सकती है, प्रक्रिया पर बहस हो सकती है, पर भेदभाव के अस्तित्व से इनकार नहीं। अगर उच्च शिक्षा में समानता को ‘विभाजन’ कहा जाएगा, तो सवाल नियमों पर नहीं हमारे सामाजिक विवेक पर उठेगा।

किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसके विश्वविद्यालयों, स्कूलों और शिक्षकों के हाथों में आकार लेता है। शिक्षा केवल डिग्री पाने का माध्यम नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा, सामाजिक न्याय की रीढ़ और आर्थिक प्रगति की बुनियाद होती है। लेकिन आज भारत में यह सवाल पहले से कहीं ज़्यादा तीखेपन के साथ खड़ा है, क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था वास्तव में नागरिक गढ़ रही है या केवल आज्ञाकारी उपभोक्ता और सुविधाजनक भीड़ तैयार कर रही है?

देश की शिक्षा व्यवस्था इस समय एक गहरे असमंजस से गुजर रही है। एक तरफ़ “विश्वगुरु” बनने के दावे हैं, नई-नई नीतियाँ हैं, तकनीक और नवाचार की भाषा है; दूसरी ओर जर्जर स्कूल, खाली पद, असमान अवसर, बढ़ता निजीकरण और विश्वविद्यालय परिसरों में भय का माहौल। यह विरोधाभास किसी दुर्घटना का नतीजा नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही राजनीतिक प्राथमिकताओं का परिणाम है। 

सरकारें अक्सर शिक्षा नीतियों का हवाला देती हैं। नई शिक्षा नीति (NEP) को ऐतिहासिक बताया गया, लचीलापन, बहुविषयकता और मातृभाषा में शिक्षा जैसे वादे किए गए। लेकिन नीति और ज़मीनी हकीकत के बीच की खाई लगातार चौड़ी होती गई। शिक्षा पर सार्वजनिक खर्च आज भी जीडीपी के उस स्तर तक नहीं पहुँचा, जिसकी सिफ़ारिश दशकों से होती रही है। नई इमारतें और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म दिखाने में आसान हैं, लेकिन शिक्षक भर्ती, शोध अनुदान और छात्रवृत्तियाँ राजनीतिक प्राथमिकताओं की सूची में नीचे खिसकती चली गईं। इससे यह सवाल उठता है क्या सरकारें शिक्षा को सशक्तिकरण का औज़ार मानती हैं, या केवल एक प्रबंधन योग्य तंत्र?

शिक्षा में निजीकरण अब अपवाद नहीं, बल्कि मुख्यधारा बन चुका है। मेडिकल, इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट हर जगह फीस आसमान छू रही है। छात्र ऋण लेकर पढ़ने को मजबूर हैं और डिग्री पूरी होते ही रोज़गार की अनिश्चितता उनका इंतज़ार करती है। इस व्यवस्था में शिक्षा सामाजिक गतिशीलता का साधन कम और आर्थिक बोझ ज़्यादा बनती जा रही है। सरकारें निजी निवेश को समाधान के रूप में पेश करती हैं, लेकिन यह भूल जाती हैं कि बाज़ार का पहला लक्ष्य लाभ होता है, समानता नहीं। जब शिक्षा लाभ का साधन बनती है, तो हाशिये पर खड़े समुदाय सबसे पहले बाहर धकेले जाते हैं। 

विश्वविद्यालयों का हाल इससे भी ज़्यादा चिंताजनक है। कभी जिन परिसरों में बहस, असहमति और विचारों की टकराहट होती थी, आज वहाँ नोटिस, जांच और निलंबन का डर छाया रहता है। प्रशासनिक नियंत्रण इतना बढ़ चुका है कि विश्वविद्यालय अब ज्ञान के केंद्र नहीं, बल्कि सत्ता की प्रयोगशाला बनते जा रहे हैं। जब छात्र सवाल पूछते हैं, तो उन्हें “राष्ट्रविरोधी” कहा जाता है। जब शिक्षक असहमति जताते हैं, तो उन्हें “अनुशासनहीन”। यह कोई संयोग नहीं कि आलोचनात्मक सोच को पाठ्यक्रम से धीरे-धीरे हटाया जा रहा है। इतिहास को सुविधाजनक बनाया जा रहा है, समाजशास्त्र को संदिग्ध और दर्शन को अनुपयोगी। यह सब किसी अज्ञानवश नहीं हो रहा। यह एक स्पष्ट संकेत है कि सरकारें ऐसे नागरिक नहीं चाहतीं जो सोचें, बल्कि ऐसे जो मानें।

जातिगत भेदभाव, मानसिक उत्पीड़न और संस्थागत उपेक्षा ये विश्वविद्यालयों की कड़वी सच्चाइयाँ हैं। जब इन्हें रोकने के लिए नियम बनाए जाते हैं, तो हंगामा मचता है कि “समाज बँट जाएगा।” जैसे समाज पहले से बराबरी पर खड़ा हो ! 

ATR: जब जंगल में बाघ मरा और व्यवस्था खामोश रही


बिलासपुर।
  TODAY छत्तीसगढ़  /  आज 26 जनवरी को छत्तीसगढ़ के अचानकमार टाइगर रिज़र्व से आई एक ख़बर ने केवल वन्यजीव प्रेमियों को नहीं, बल्कि लोकतंत्र में जवाबदेही पर भरोसा रखने वाले हर नागरिक को असहज कर दिया। जंगल के भीतर एक युवा नर बाघ मृत पाया गया। आधिकारिक बयान आया, मौत दो बाघों के बीच आपसी संघर्ष का नतीजा है। फ़ाइलें चलीं, पोस्टमार्टम हुआ, रिपोर्ट बनी और मामला लगभग बंद मान लिया गया है। गणतंत्र दिवस के मौके पर आज जब तिरंगे के नीचे संविधान की शपथ दोहराई जा रही थी, उसी देश के चर्चित जंगल अचानकमार टाईगर रिजर्व में एक राष्ट्रीय पशु चुपचाप सड़ता रहा और जब उसकी मौत का सच सामने आया, तब जवाबों से ज़्यादा बचाव के बयान सामने आए। 

छत्तीसगढ़ के अचानकमार टाइगर रिज़र्व में एक युवा नर बाघ की मौत को वन विभाग ने दो बाघों के बीच हुए आपसी संघर्ष का परिणाम बताया है। घटना 25 जनवरी 2026 को अचानकमार परिक्षेत्र के सारसडोल क्षेत्र अंतर्गत कुडेरापानी परिसर की बताई गई है, जहाँ नियमित पेट्रोलिंग के दौरान सुरक्षा बलों ने बाघ का शव देखा। सूचना मिलते ही वन विभाग की टीम ने इलाके को सुरक्षित कर लिया और वरिष्ठ अधिकारियों को जानकारी दी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के निष्कर्षों के आधार पर यह दावा तकनीकी रूप से संभव भी है। बाघों के बीच क्षेत्रीय द्वंद्व प्राकृतिक व्यवहार का हिस्सा होता है और देश के कई संरक्षित इलाकों में ऐसी घटनाएँ दर्ज की गई हैं। लेकिन लोकतंत्र में ओप-एड का दायित्व केवल आधिकारिक निष्कर्ष दोहराना नहीं, बल्कि उन प्रश्नों को सामने लाना है जो सरकारी बयान के दायरे से बाहर रह जाते हैं। अचानकमार की यह घटना भी ऐसी ही है जहाँ मौत से ज़्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है, मौत के बाद का प्रबंधन।

विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, जिस बाघ का शव 26 जनवरी को पाया गया, उसकी मौत संभवतः कई दिन पहले हो चुकी थी। शव की स्थिति और इलाके में फैली दुर्गंध इस ओर संकेत करती है कि घटना और उसकी पहचान के बीच समय का अंतर था। अगर यह सही है, तो सवाल बाघ की मौत के कारण पर नहीं, बल्कि निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर उठता है। 

यहाँ बताना लाज़िमी होगा कि कुछ दिन पहले ही अचानकमार टाईगर रिजर्व क्षेत्र में बाघ गड़ना के लिये लगाये गये ट्रैप कैमरों में से दो ट्रैप कैमरों की मेमोरी चिप चोरी हो गई थी। यह घटना साधारण चोरी नहीं कही जा सकती। कैमरा ट्रैप को खोलना और उसमें से डेटा निकालना तकनीकी जानकारी की माँग करता है। मतलब साफ़ है, प्रतिबंधित क्षेत्र में लगाये गये कैमरों से चिप चोरी करने वाला अज्ञात शख़्स उन कैमरों को आपरेट करने की तकनीकि से वाकिफ है। अब यहां यह सवाल अनिवार्य हो जाता है कि चोरी किसने की ? क्या यह किसी बाहरी शिकारी का काम था या आंतरिक मिलीभगत ? और क्या इस मामले में आपराधिक जांच को प्राथमिकता दी गई ? ऐसे में जब निगरानी उपकरण ही निष्क्रिय कर दिए जाएँ, तो किसी भी संरक्षण दावे की विश्वसनीयता कमजोर पड़ जाती है। 

अचानकमार टाइगर रिज़र्व सालों से विवादों में रहा है। बाघ की मौत, ट्रैप कैमरों से डेटा कार्ड की चोरी के कुछ समय पहले ही कोर क्षेत्र में प्रभावशाली युवकों की मौजूदगी का एक वीडियो सामने आया था, उस वीडियो ने एटीआर प्रबंधन की लाचारी और अव्यवस्था की कलई खोलकर रख दी। सियासत, प्रभावशाली लोगों के सामने एटीआर प्रबंधन कितना बौना है और जंगल कितना असुरक्षित यह बात उस वीडियो से उजागर हुई। इस जंगल में कानून और नियम सभी के लिए समान रूप से लागू नहीं हैं। जहाँ स्थानीय समुदायों पर कड़े प्रतिबंध लागू होते हैं, वहीं रसूखदारों की घुसपैठ पर अक्सर नरमी दिखाई देती है। यह दोहरा मापदंड न केवल संरक्षण प्रयासों को कमजोर करता है, बल्कि स्थानीय लोगों के बीच व्यवस्था के प्रति अविश्वास भी पैदा करता है।

भारत में बाघ संरक्षण को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक सफलता के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है। बाघों की संख्या में वृद्धि, नए रिज़र्व की घोषणा और पर्यटन के आँकड़े ये सब सकारात्मक संकेत हैं। लेकिन संरक्षण केवल संख्या का खेल नहीं है। एटीआर में अगर बाघों की संख्या बढ़ रही है, तो निगरानी और सुरक्षा भी उसी अनुपात में मज़बूत होनी चाहिए। अचानकमार की ये तमाम घटनायें यह याद दिलाती है कि काग़ज़ी उपलब्धियाँ ज़मीनी हकीकत की जगह नहीं ले सकतीं। 

Chhattisgarh: एटीआर में नर बाघ की मौत, आपसी संघर्ष को कारण बताया गया

बिलासपुर/अचानकमार। छत्तीसगढ़ के अचानकमार टाइगर रिज़र्व में एक नर बाघ मृत अवस्था में पाया गया है। वन विभाग के अनुसार प्रारंभिक जांच में बाघ की मौत का कारण दो बाघों के बीच हुआ आपसी संघर्ष सामने आया है।

यह घटना 25 जनवरी 2026 को अचानकमार परिक्षेत्र के सारसडोल क्षेत्र अंतर्गत कुडेरापानी परिसर की बताई गई है, जहाँ नियमित पेट्रोलिंग के दौरान सुरक्षा बलों ने बाघ का शव देखा। सूचना मिलते ही वन विभाग की टीम ने इलाके को सुरक्षित कर लिया और वरिष्ठ अधिकारियों को जानकारी दी।

राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) की मानक प्रक्रिया के तहत गठित समिति की मौजूदगी में अगले दिन पशु चिकित्सकों की टीम ने बाघ का पोस्टमार्टम किया। अधिकारियों के मुताबिक मृत बाघ की उम्र लगभग दो वर्ष थी और वह नर था।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बताया गया है कि बाघ की गर्दन की हड्डी टूटी हुई पाई गई, वहीं गर्दन के निचले हिस्से पर दूसरे नर बाघ के दाँतों के स्पष्ट निशान मिले हैं। घटनास्थल पर झाड़ियों के टूटे हुए हिस्से, खरोंच के निशान, बाल और मल जैसे संकेत भी पाए गए हैं, जो क्षेत्रीय संघर्ष की ओर इशारा करते हैं। वन विभाग का कहना है कि मृत बाघ के पंजों में भी दूसरे बाघ के बाल मिले हैं, जिससे इस निष्कर्ष को बल मिलता है कि मौत आपसी द्वंद्व का नतीजा है। एहतियातन, एनटीसीए के दिशा-निर्देशों के अनुसार आंतरिक अंगों को संरक्षित कर प्रयोगशाला जांच के लिए भेजा गया है। 

घटना में शामिल दूसरे बाघ की पहचान कर ली गई है और उसकी गतिविधियों पर कैमरा ट्रैप और फील्ड ट्रैकिंग के ज़रिये निगरानी की जा रही है। पोस्टमार्टम के बाद अधिकारियों और विशेषज्ञों की मौजूदगी में बाघ का अंतिम संस्कार किया गया। वन अधिकारियों का कहना है कि अचानकमार टाइगर रिज़र्व में बाघों की संख्या में हाल के वर्षों में वृद्धि हुई है। कान्हा–बांधवगढ़ कॉरिडोर से प्राकृतिक प्रवासन, अनुकूल आवास और प्रजनन सफलता के कारण क्षेत्र में बाघों की उपस्थिति बढ़ी है, जिसके चलते क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा और संघर्ष की घटनाएँ स्वाभाविक मानी जाती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार ऐसी घटनाएँ स्वस्थ बाघ आबादी वाले क्षेत्रों में कभी-कभी सामने आती हैं और यह वन्यजीवों के प्राकृतिक व्यवहार का हिस्सा होती हैं।

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