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कैमरे की कलम: नशे की खेती और सत्ता की खामोशी


छत्तीसगढ़ को लंबे समय तक “धान का कटोरा” कहा जाता रहा है। यह नाम केवल कृषि उत्पादन का प्रतीक नहीं था, बल्कि उस सामाजिक पहचान का भी संकेत था जिसमें मेहनत, खेती और सादगी की संस्कृति शामिल थी। लेकिन हाल के दिनों में जिस तरह अफीम (पॉपी) की अवैध खेती के मामले सामने आ रहे हैं, वे इस पहचान पर एक असहज प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं। दुर्ग और बलरामपुर में अफीम की खेती के अब तक तीन मामले उजागर हो चुके हैं। यह घटनाएँ केवल कानून-व्यवस्था से जुड़ी सामान्य खबरें नहीं हैं; यह उस खतरनाक प्रवृत्ति की ओर इशारा करती हैं जो समय रहते न रोकी गई तो आने वाले वर्षों में सामाजिक और पीढ़ीगत संकट का रूप ले सकती है। हालांकि अवैध रूप से हो रही अफीम की खेती के खुलासे के बाद राज्य सरकार पूरी तरह एक्शन मोड में आ गई है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने इस मामले पर कड़ा रुख अपनाते हुए सभी जिलों के कलेक्टरों को सख्त निर्देश जारी किए हैं। उन्होंने कहा है कि यह सुनिश्चित किया जाए कि राज्य के किसी भी हिस्से में अवैध रूप से अफीम की खेती न हो।राज्य में अवैध मादक पदार्थों के उत्पादन और कारोबार के प्रति सरकार की नीति ‘जीरो टॉलरेंस’ की है।  

इन मामलों का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि अफीम की खेती कोई छोटी या छिपी हुई गतिविधि नहीं होती। इसके लिए जमीन, संसाधन, श्रम और समय चाहिए। पौधे अचानक रातोंरात खेतों में खड़े नहीं हो जाते। इसका अर्थ साफ है कि यह सब लंबे समय से चल रहा था और किसी न किसी स्तर पर प्रशासनिक निगाहों से बचता रहा। सवाल यही है कि क्या सचमुच यह सब नजरों से ओझल था, या फिर व्यवस्था ने देखने की जरूरत ही नहीं समझी?

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि भारत में अफीम की खेती सामान्य कृषि की तरह स्वतंत्र नहीं है। यह पूरी तरह नियंत्रित और लाइसेंस आधारित गतिविधि है। केंद्र सरकार के अधीन केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो (CBN) किसानों को लाइसेंस जारी करता है और यह अनुमति केवल कुछ निर्धारित राज्यों के सीमित क्षेत्रों तक ही दी जाती है। वर्तमान में मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों में ही चिकित्सा और वैज्ञानिक उद्देश्यों के लिए अफीम की खेती की अनुमति है। छत्तीसगढ़ इस सूची में शामिल नहीं है। इसलिए यहां अफीम की खेती का पाया जाना केवल एक कृषि अपराध नहीं बल्कि कानून की खुली अवहेलना है।

लेकिन विडंबना यह है कि यह अवैध खेती केवल खेतों तक सीमित मुद्दा नहीं बनती। इसके साथ एक पूरा अवैध आर्थिक तंत्र जुड़ जाता है—तस्करी, अवैध व्यापार, संगठित अपराध और राजनीतिक संरक्षण की आशंकाएँ। हालिया मामलों में करोड़ों रुपये की अवैध आय का अनुमान लगाया गया है और कई गिरफ्तारियाँ भी हुई हैं। इस प्रकरण में भाजपा से जुड़े नेता विनायक ताम्रकार की गिरफ्तारी हुई, वहीं कृषि विभाग की अधिकारी एकता साहू को निलंबित किया गया। इसके बाद स्वाभाविक रूप से राजनीतिक बयानबाजी शुरू हुई और विपक्ष को सरकार को घेरने का अवसर मिल गया।

लेकिन यहाँ एक मूलभूत सवाल उठता है—क्या समस्या केवल इतनी है कि किसी एक नेता या एक अधिकारी के अलावा कुछ ही लोगों की भूमिका सामने आ गई? या फिर यह मामला उस बड़े ढांचे की ओर संकेत करता है जिसमें अपराध, प्रशासनिक ढिलाई और राजनीतिक स्वार्थ एक दूसरे से टकराते भी हैं और कभी-कभी एक दूसरे को ढकते भी हैं?

भारतीय राजनीति में यह एक परिचित दृश्य है कि जैसे ही कोई बड़ा मामला सामने आता है, सत्ता और विपक्ष अपनी-अपनी भूमिकाओं में सक्रिय हो जाते हैं। सत्ता पक्ष कार्रवाई और सख्ती की बात करता है, जबकि विपक्ष इसे शासन की विफलता का प्रमाण बताता है। लेकिन अक्सर इस राजनीतिक शोर के बीच असली मुद्दा पीछे छूट जाता है—कि यह सब शुरू कैसे हुआ और इतने समय तक चलता कैसे रहा।

छत्तीसगढ़ में शराब और गांजा की अवैध खेप की खबरें पहले भी सामने आती रही हैं। यह भी कोई रहस्य नहीं कि इनका एक समानांतर नेटवर्क लंबे समय से सक्रिय है। सरकारें बदलती रहीं, लेकिन नशे के कारोबार की खबरें भी समय-समय पर सामने आती रहीं। फर्क सिर्फ इतना रहा कि हर बार मामला कुछ गिरफ्तारियों, कुछ बयानबाजियों और कुछ निलंबनों के बाद धीरे-धीरे शांत हो गया। 

इतिहास बताता है कि जब किसी समाज में नशे का कारोबार धीरे-धीरे अपनी जड़ें जमाता है, तो उसके प्रभाव केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं रहते। वह समाज की आत्मा तक को प्रभावित करता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण पंजाब है। कभी अपनी कृषि समृद्धि, मेहनतकश संस्कृति और आर्थिक मजबूती के लिए जाना जाने वाला पंजाब धीरे-धीरे नशे की समस्या से जूझने लगा। यह प्रक्रिया अचानक नहीं हुई। वर्षों तक छोटे-छोटे संकेत मिलते रहे—तस्करी की खबरें, युवाओं में बढ़ती लत, और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप। लेकिन जब तक समाज और व्यवस्था ने इसकी गंभीरता को पूरी तरह समझा, तब तक स्थिति काफी जटिल हो चुकी थी।

इसी पृष्ठभूमि में “उड़ता पंजाब” जैसा शब्द सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बना। यह केवल एक फिल्म का नाम नहीं था, बल्कि एक सामाजिक सच्चाई का प्रतीक बन गया—एक ऐसा राज्य जो कभी समृद्धि का प्रतीक था, लेकिन नशे के जाल में उलझता चला गया। छत्तीसगढ़ के सामने आज वही सवाल खड़ा होता दिखाई देता है। क्या यह केवल कुछ एकाकी घटनाएँ हैं या फिर किसी बड़े नेटवर्क की शुरुआती झलक? क्या यह केवल कुछ व्यक्तियों की गलती है या फिर उस व्यवस्था की कमजोरी का परिणाम है जो समय रहते संकेतों को समझ नहीं पाती?

अक्सर प्रशासनिक तंत्र की सबसे बड़ी समस्या यह नहीं होती कि उसे कुछ पता नहीं होता, बल्कि यह होती है कि उसे बहुत कुछ पता होने के बावजूद वह समय रहते कार्रवाई नहीं करता। जब तक मामला सार्वजनिक नहीं हो जाता, तब तक फाइलें चलती रहती हैं, नोटिंग्स होती रहती हैं और जिम्मेदारी कहीं न कहीं टलती रहती है।

जब खेतों में धान बोया जाता है तो उसे समर्थन मूल्य, बीमा योजना और कृषि विभाग की योजनाओं की जरूरत होती है। लेकिन जब उन्हीं खेतों में अफीम उगने लगती है, तो व्यवस्था को अचानक पता चलता है कि यह सब “गंभीर अपराध” है। तब छापे पड़ते हैं, बयान जारी होते हैं और कार्रवाई का प्रदर्शन शुरू हो जाता है। सवाल यह नहीं है कि कार्रवाई हुई या नहीं। सवाल यह है कि कार्रवाई इतनी देर से क्यों हुई।

किसी भी राज्य में अफीम जैसी फसल का उगना केवल अपराधियों की चतुराई का परिणाम नहीं होता। इसके पीछे जमीन, नेटवर्क, बाजार और संरक्षण की संभावनाएँ होती हैं। यदि इन संभावनाओं को समय रहते खत्म न किया जाए, तो वे धीरे-धीरे एक संगठित व्यवस्था का रूप ले लेती हैं।

छत्तीसगढ़ के लिए यह एक चेतावनी का क्षण है। यदि इसे केवल एक राजनीतिक मुद्दा बनाकर छोड़ दिया गया, तो आने वाले वर्षों में यह समस्या कहीं अधिक गंभीर रूप ले सकती है। नशे का कारोबार केवल अपराध नहीं पैदा करता, बल्कि सामाजिक विघटन भी पैदा करता है। इसका सबसे बड़ा प्रभाव युवाओं पर पड़ता है, जो किसी भी समाज की ऊर्जा और भविष्य होते हैं। इसलिए जरूरी है कि इस पूरे प्रकरण को केवल एक घटना या एक विवाद के रूप में न देखा जाए। इसकी व्यापक और निष्पक्ष जांच हो, जिम्मेदारियों को स्पष्ट किया जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि ऐसी घटनाएँ दोबारा न हों। 

कैमरे की कलम: सड़क पर अभियान नहीं, व्यवस्था और व्यवहार में बदलाव की दरकार


छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में सकरी- पेंड्रीडीह बाइपास की हालिया सड़क दुर्घटना की तस्वीरें और वीडियो किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को भीतर तक झकझोर देने के लिए काफी हैं। सड़क पर बिखरे मलबे के बीच पसरा सन्नाटा और रोते-बिलखते परिजन, ये दृश्य सिर्फ एक हादसे का नहीं बल्कि उस व्यवस्था की विफलता का आईना हैं, जो हर साल हजारों जिंदगियां निगल रही है। यह कोई इकलौती घटना नहीं है। कुछ दिन पहले ही एक पिता अपनी पत्नी और बच्चे के शव से लिपटकर विलाप करता दिखाई दिया था। कहीं तेज रफ्तार बाइक पर निकला घर का इकलौता बेटा कभी लौटकर नहीं आया। हर ऐसी खबर एक परिवार के उजड़ने की कहानी है, जिसे हम पढ़ते हैं, अफसोस जताते हैं और फिर अगली सुर्खी की ओर बढ़ जाते हैं।

देश के साथ-साथ राज्य में भी सड़क सुरक्षा को लेकर वर्षों से अभियान चलाए जा रहे हैं। पहले सड़क सुरक्षा सप्ताह मनाया गया, फिर पखवाड़ा और अब सड़क सुरक्षा माह। जगह-जगह बैनर, पोस्टर, रैलियां, शपथ ग्रहण, स्कूलों में भाषण—सब कुछ होता है। आंकड़ों की समीक्षा बैठकों में होती है, योजनाएं बनती हैं, लक्ष्य तय होते हैं। लेकिन जमीनी हकीकत यही है कि हादसों की रफ्तार कम होने के बजाय कई जगह बढ़ी है। इसका सीधा अर्थ है कि हमारे प्रयास या तो नाकाफी हैं या फिर केवल औपचारिकता तक सीमित रह गए हैं।

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि नियमों का पालन कराने की जिम्मेदारी जिन पर है, वे स्वयं कई बार नियमों की अनदेखी करते दिखाई देते हैं। मंत्री, विधायक, वरिष्ठ अधिकारी—कई बार सार्वजनिक कार्यक्रमों में बिना सीट बेल्ट या बिना हेलमेट नजर आते हैं। संदेश देने के नाम पर निकाली जाने वाली बाइक रैलियों में शामिल अधिकांश लोग हेलमेट नहीं पहनते। जब नेतृत्वकर्ता ही उदाहरण प्रस्तुत नहीं करेंगे, तो आम नागरिक से अनुशासन की अपेक्षा कैसे की जा सकती है?

सड़क दुर्घटनाओं से होने वाली मौतों के आंकड़े भयावह हैं। हर साल इतनी जिंदगियां चली जाती हैं, जितनी कई छोटे शहरों की कुल आबादी होती है। यह केवल आंकड़ा नहीं, सामाजिक त्रासदी है। हर मृतक के पीछे एक परिवार है, जिसकी आर्थिक और भावनात्मक दुनिया एक पल में बिखर जाती है। कई घरों में कमाने वाला सदस्य चला जाता है, बच्चों का भविष्य अधर में लटक जाता है।

इस स्थिति के लिए केवल तेज रफ्तार या लापरवाह चालक ही जिम्मेदार नहीं हैं। खराब सड़कें, गड्ढे, अपर्याप्त संकेतक, स्ट्रीट लाइट की कमी, ओवरलोड वाहन, और बिना उचित परीक्षण के जारी किए गए ड्राइविंग लाइसेंस भी उतने ही बड़े कारण हैं। यदि आरटीओ में लाइसेंस वास्तविक ड्राइविंग परीक्षा के बजाय कागजी प्रक्रिया बनकर रह जाए, तो सड़क पर अयोग्य चालक उतरेंगे ही। यदि सड़क निर्माण में गुणवत्ता से समझौता होगा, तो दुर्घटनाएं बढ़ेंगी ही।

जरूरत इस बात की है कि सड़क सुरक्षा को ‘अभियान’ नहीं, ‘निरंतर जिम्मेदारी’ के रूप में लिया जाए। जिस तरह स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव जैसे कार्यक्रमों का व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ, उसी तरह सड़क सुरक्षा को वर्ष भर प्राथमिकता दी जाए। पुलिस की मौजूदगी सिर्फ चालान काटने तक सीमित न रहे, बल्कि अनुशासन की संस्कृति विकसित करे। जनप्रतिनिधि और अधिकारी सार्वजनिक रूप से नियमों का पालन करते हुए उदाहरण प्रस्तुत करें। स्कूलों और कॉलेजों में सड़क सुरक्षा शिक्षा को व्यवहारिक रूप से जोड़ा जाए, केवल भाषणों तक सीमित न रखा जाए।

सड़क सुरक्षा का असली संदेश पोस्टर या मंच से नहीं, सड़क पर दिखने वाले आचरण से जाएगा। जब लोग देखेंगे कि नियम तोड़ना आसान नहीं और नियम मानना सम्मान की बात है, तभी बदलाव संभव होगा। यह समझना होगा कि सड़क पर चलने वाला हर व्यक्ति सिर्फ एक वाहन चालक नहीं, बल्कि किसी का बेटा, बेटी, पिता, मां या जीवनसाथी है। एक क्षण की लापरवाही, एक गलत निर्णय या एक प्रशासनिक ढिलाई पूरे परिवार की दुनिया बदल सकती है।

अब समय आ गया है कि सड़क सुरक्षा को औपचारिकता के दायरे से निकालकर जीवन की प्राथमिकता बनाया जाए। वरना हम हर वर्ष नए संकल्प लेते रहेंगे और हर वर्ष नई शोकसभाओं में शामिल होते रहेंगे। सवाल यह नहीं कि सड़क सुरक्षा माह कब मनाया जाएगा; सवाल यह है कि क्या हम सच में किसी घर का चिराग बुझने से बचाने के लिए तैयार हैं?

सकरी बायपास पर दर्दनाक हादसा: स्कॉर्पियो के परखच्चे उड़े, चार मृत


बिलासपुर।
  TODAY छत्तीसगढ़  /  ज़िले के सकरी थाना क्षेत्र में गुरुवार-शुक्रवार की दरम्यानी रात हुए एक सड़क हादसे में चार लोगों की मौत हो गई, जबकि एक व्यक्ति गंभीर रूप से घायल है। हादसा सकरी- पेंड्रीडीह बाईपास पर ग्राम सम्बलपुरी स्थित यादव ढाबा के सामने हुआ है । 

पुलिस को मिले सीसीटीवी फुटेज के मुताबिक, रात करीब दो बजे ट्रेलर (CG-11-BD-9044) रतनपुर से रायपुर की ओर जा रहा था। इसी दौरान चालक कथित तौर पर वाहन से नियंत्रण खो बैठा और ट्रेलर रॉन्ग साइड में पहुंच गया। सामने से आ रही स्कॉर्पियो (CG-04-MQ-4220) से उसकी आमने-सामने टक्कर हो गई। टक्कर इतनी तेज थी कि ट्रेलर पास में खड़े एक अन्य ट्रेलर से टकराने के बाद पलट गया। 

हादसे के बाद स्कॉर्पियो बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई और उसमें सवार लोग वाहन के भीतर फंस गए। सूचना मिलने पर पुलिस और डायल-112 की टीम मौके पर पहुंची। गैस कटर की मदद से करीब दो घंटे की मशक्कत के बाद मृतकों का शव बाहर निकाला गया। 

मृतकों की पहचान छत्रपाल रात्रे (37) निवासी कुवागांव, विशाल लहरें (25), अनमोल लहरें (14) निवासी बिरगहनी, जिला मुंगेली और सोनू मिरी (28) निवासी कोटा के रूप में हुई है। प्रकाश रात्रे गंभीर रूप से घायल हैं और उन्हें सिम्स अस्पताल में भर्ती कराया गया है। पुलिस ने ट्रेलर चालक को हिरासत में लेकर मामला दर्ज कर लिया है और जांच शुरू कर दी है। हाईवे पर तेज रफ्तार और लापरवाही से वाहन चलाने को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। 


दिल्ली आबकारी नीति मामला: अदालत ने अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया को क्लीन चिट


नई दिल्ली। 
 TODAY छत्तीसगढ़  /  दिल्ली की एक विशेष अदालत ने कथित आबकारी नीति घोटाले से जुड़े मामले में पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को बड़ी राहत देते हुए शुक्रवार को बरी कर दिया। अदालत ने केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो) द्वारा दायर आरोपपत्र पर संज्ञान लेने से भी इनकार कर दिया।इस मामले में 21 अन्य आरोपियों को भी अदालत ने बरी कर दिया है।

सीबीआई ने आम आदमी पार्टी (आम आदमी पार्टी) की पूर्ववर्ती दिल्ली सरकार द्वारा लागू की गई और बाद में रद्द की जा चुकी आबकारी नीति के निर्माण और क्रियान्वयन में कथित भ्रष्टाचार की जांच की थी। 

विशेष न्यायाधीश जितेंद्र सिंह ने अपने आदेश में जांच एजेंसी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि केजरीवाल के खिलाफ कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए। अदालत ने यह भी कहा कि सिसोदिया के विरुद्ध प्रथम दृष्टया कोई मामला बनता नहीं है।  

न्यायाधीश ने आरोपपत्र में “आंतरिक विरोधाभासों” और “भ्रामक कथनों” का उल्लेख करते हुए कहा कि कई आरोप ऐसे हैं जिनकी पुष्टि उपलब्ध साक्ष्यों या गवाहों से नहीं होती। अदालत के अनुसार, आरोपपत्र में मौजूद कमियां कथित साजिश की थ्योरी को कमजोर करती हैं।

अदालत ने कहा कि पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में केजरीवाल के खिलाफ लगाए गए आरोप टिक नहीं सकते और किसी भी व्यक्ति को बिना ठोस आधार के अभियोजन का सामना कराना कानून के शासन के सिद्धांतों के प्रतिकूल है। सिसोदिया के संबंध में अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई प्रमाण नहीं है जो उनकी संलिप्तता को दर्शाता हो, और न ही उनके खिलाफ कोई बरामदगी दिखाई गई है।  

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