STATE

नई दिल्ली, छत्तीसगढ़, Politics, बिहार

GUEST COLUMN

Guest Column

EDITOR CHOICE

Editor Choice

TRAVELLING STORY

TRAVELLING STORY

TCG EXCLUSIVE

टीसीजी एक्सक्लूसिव, इतिहास

VIDEO

VIDEO
LATEST NEWS
Loading Latest News...

एक सदी बाद ATR लौटे हाथी: एक भूला हुआ गलियारा और संरक्षण की नई चुनौती

"करीब एक सदी बाद साल 2020 में एशियाई हाथियों का एक झुंड अचानकमार टाइगर रिज़र्व पहुंचा। कोविड लॉकडाउन के दौरान कम हुई मानवीय गतिविधियों ने उनके आवागमन को संभव बनाने में भूमिका निभाई होने की संभावना जताई गई। हाथियों की यह वापसी अचानकमार के पुराने वन्यजीव गलियारों, बदलते भू-दृश्य और मानव-हाथी संघर्ष की चुनौतियों पर नए सिरे से ध्यान खींचती है।"
एक संरक्षणवादी और वन्यजीव प्रेमी के रूप में मेरे लिए यह अत्यंत सुखद और भावुक करने वाली खबर है कि लगभग एक सदी के लंबे अंतराल के बाद एशियाई हाथियों ने छत्तीसगढ़ के अचानकमार टाइगर रिज़र्व में फिर से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। यह केवल हाथियों की वापसी की घटना नहीं है, बल्कि यह उस प्राकृतिक विरासत की वापसी का संकेत है, जिसे कभी जंगलों, रेल पटरियों, सड़कों, खनन और बढ़ती मानवीय गतिविधियों ने हमसे दूर कर दिया था।

यह घटना वर्ष 2020 के कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान हुई, जब मानव गतिविधियों और यातायात में अचानक आई कमी ने वन्यजीवों को अपेक्षाकृत निर्बाध आवागमन का अवसर दिया। उस समय की घटनाएँ आज भी मेरी स्मृतियों में उतनी ही स्पष्ट हैं।

24 मार्च 2020 — वह ऐतिहासिक दिन

24 मार्च 2020 को मुझे अचानकमार टाइगर रिज़र्व के तत्कालीन फील्ड डायरेक्टर से सूचना मिली कि 12 एशियाई जंगली हाथियों का एक झुंड तेंगनमाड़ा और बेलगहना के घने जंगलों से होते हुए अचानकमार टाइगर रिज़र्व में प्रवेश कर चुका है।

झुंड में दो छोटे बच्चे, दो उप-वयस्क नर और आठ वयस्क मादाएँ थीं। यह एक पारिवारिक झुंड था और इसकी संरचना ने स्पष्ट संकेत दिया कि हाथियों के लिए यह क्षेत्र केवल आकस्मिक पड़ाव नहीं, बल्कि उनके पारंपरिक आवागमन क्षेत्र का हिस्सा रहा होगा।

मेरे विचार से, कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान राजमार्ग और बिलासपुर–कटनी रेल मार्ग पर यातायात में आई असाधारण कमी ने इस झुंड को वह अवसर दिया, जिसका उन्हें लंबे समय से इंतजार था। जिस मार्ग पर सामान्य परिस्थितियों में तेज गति से वाहन और रेलगाड़ियाँ लगातार गुजरती थीं, वह अचानक अपेक्षाकृत शांत हो गया था। हाथियों ने इसी अवसर का लाभ उठाया और उत्तर-पूर्वी सीमा से अचानकमार के कोर क्षेत्र में प्रवेश किया। 

जनसंख्या बढ़ी, कृषि का विस्तार हुआ और औद्योगिक गतिविधियां बढ़ीं। रेलवे के विस्तार के लिए लकड़ी और कोयले की मांग ने भी जंगलों पर दबाव बढ़ाया।

अचानकमार से कान्हा–अचानकमार कॉरिडोर तक

झुंड लगभग एक सप्ताह तक अचानकमार के जंगलों में रहा। इसके बाद वह उत्तर-पश्चिम दिशा में आगे बढ़ते हुए कान्हा–अचानकमार कॉरिडोर में प्रवेश कर गया। यह क्षेत्र मध्य भारत में वन्यजीवों के आवागमन और विशेष रूप से बाघों सहित अनेक प्रजातियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। कुछ दिनों तक मध्यप्रदेश के खरिदीह गाँव और आसपास के जंगलों में रहने के बाद हाथियों का यह झुंड पुनः अचानकमार के कोर क्षेत्र में लौट आया। यह वापसी मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण संकेतों में से एक थी।

इसका अर्थ था कि अचानकमार के जंगल उन्हें अनुकूल लग रहे थे—यहाँ भोजन, पानी और अपेक्षाकृत सुरक्षित आवास उपलब्ध था। आज भी हाथियों की उपस्थिति इस बात का प्रमाण है कि यदि जंगल और उनके पारंपरिक आवागमन मार्ग सुरक्षित रहें, तो वन्यजीव अपने पुराने घरों को पहचानने और वापस लौटने की क्षमता रखते हैं। यह उनकी पहली कोशिश नहीं थी, हालाँकि वर्ष 2020 में हाथियों ने अचानकमार में सफलतापूर्वक प्रवेश किया, लेकिन यह उनकी पहली कोशिश नहीं थी।

वर्ष 2014 में भी हाथियों का एक झुंड अचानकमार की उत्तर-पूर्वी सीमा तक पहुँचा था। लेकिन सामने मौजूद व्यस्त रेल मार्ग और तेज गति से गुजरती ट्रेनों ने उनके रास्ते को रोक दिया। झुंड के अधिकांश हाथी आगे नहीं बढ़ सके। केवल एक युवा नर हाथी ने जोखिम उठाया और आगे बढ़ गया। बाद में उसे “राजू” नाम दिया गया। राजू ने अचानकमार के जंगलों से होते हुए मध्यप्रदेश के फेन वन्यजीव क्षेत्र तक यात्रा की और आगे छत्तीसगढ़ के राजनांदगाँव क्षेत्र तक पहुँचा, जहाँ उसे पकड़ लिया गया। अपने परिवार से बिछड़ने के बाद उसके झुंड ने उसे खोजने की कोशिश की। लगभग 23 हाथियों का झुंड कुछ ही दिनों में बिलासपुर और मरवाही वनमंडल की सीमा तक पहुँच गया था।

उस समय मुझे स्वयं इन हाथियों को देखने और वन विभाग के साथ क्षेत्र में सर्वे करने का अवसर मिला। स्थानीय लोगों से बातचीत के दौरान एक रोचक बात सामने आई। ग्रामीणों ने बताया कि झुंड की मुखिया मादा हाथी रेल की पटरियों पर अपनी सूँड़ रखकर कंपन महसूस करती थी—मानो वह यह जानने का प्रयास कर रही हो कि कहीं कोई ट्रेन तो नहीं आ रही। यह व्यवहार हमें बताता है कि हाथी अपने आसपास के वातावरण और संभावित खतरों को कितनी बारीकी से महसूस करते हैं।

“सोनू” की कहानी

वर्ष 2017 में एक और युवा नर हाथी, जिसे बाद में “सोनू” कहा गया, इसी क्षेत्र से आगे बढ़ते हुए भोरमदेव वन्यजीव अभयारण्य तक पहुँच गया था। लेकिन उसे भी पकड़कर वापस अचानकमार लाया गया। मेरे आकलन में, राजू और सोनू जैसे युवा नर हाथियों की कम उम्र और अपेक्षाकृत अधिक जोखिम लेने की प्रवृत्ति ने उन्हें उस बाधा को पार करने के लिए प्रेरित किया, जिससे पूरा झुंड बच रहा था लेकिन इन घटनाओं ने एक महत्वपूर्ण सवाल भी सामने रखा—यदि हाथियों का पारंपरिक मार्ग यहाँ था, तो आखिर वे इसे छोड़ने के लिए मजबूर क्यों हुए? इसका उत्तर हमें इतिहास में मिलता है। जब मैकाल की पहाड़ियों में हाथी आम हुआ करते थे, आज जिस क्षेत्र में हाथियों की उपस्थिति एक असाधारण घटना मानी जाती है, वही क्षेत्र कभी हाथियों का प्राकृतिक आवास हुआ करता था। 

अचानकमार में हाथियों का लौटना इस बात का संकेत हो सकता है कि वन्यजीव पुराने आवासों और गलियारों का इस्तेमाल फिर कर सकते हैं, बशर्ते वहां पर्याप्त जंगल, पानी, भोजन और सुरक्षित आवाजाही की सुविधा मौजूद हो।

उन्नीसवीं शताब्दी में मैकाल पहाड़ियों के उत्तरी हिस्से में हाथी सामान्य रूप से पाए जाते थे। ब्रिटिश काल के वन अधिकारी जेम्स फोर्सिथ के विवरणों में बिलासपुर के उत्तर में लगभग 3,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में करीब 200–300 हाथियों की उपस्थिति का उल्लेख मिलता है। ये हाथी मध्य भारत और पूर्वी भारत के व्यापक हाथी परिदृश्य का हिस्सा थे, जिसकी आबादी पूर्व दिशा में कटक तक फैली हुई थी, लेकिन धीरे-धीरे परिस्थितियाँ बदलने लगीं।

विकास की कीमत और जंगलों का सिकुड़ना

बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में जनसंख्या वृद्धि, कृषि विस्तार और औद्योगिक गतिविधियों के कारण जंगल तेजी से कम होने लगे। रेलवे के विस्तार के लिए लकड़ी और कोयले की बढ़ती आवश्यकता ने भी जंगलों पर भारी दबाव डाला। जंगलों के कटने के साथ-साथ हाथियों के पारंपरिक आवागमन मार्ग बाधित होते गए। सबसे बड़ी बाधाओं में से एक रेलवे नेटवर्क था। जहाँ हाथियों के लिए जंगल एक निरंतर भू-दृश्य हुआ करता था, वहीं रेल पटरियों ने उनके मार्ग को काट दिया। बाद में सड़कें, बस्तियाँ, कृषि क्षेत्र, खनन और अन्य विकास गतिविधियाँ इस विखंडन को और बढ़ाती गईं।

परिणामस्वरूप, बीसवीं शताब्दी के शुरुआती दशकों तक बिलासपुर क्षेत्र में हाथियों की संख्या तेजी से घटती गई और लगभग 1920 के दशक तक उनका स्थानीय अस्तित्व समाप्त हो गया। एक समय जो क्षेत्र हाथियों की आवाजाही से जीवंत था, वहाँ उनकी अनुपस्थिति सामान्य बात बन गई। एक सदी बाद प्रकृति ने फिर दस्तक दी, वर्ष 2020 की घटना ने इस लंबे इतिहास को एक नया मोड़ दिया।

लगभग सौ वर्षों के बाद हाथियों का अचानकमार में लौटना यह दर्शाता है कि प्रकृति के पास अपनी स्मृतियाँ होती हैं। वन्यजीव अपने पुराने आवासों और मार्गों को पीढ़ियों बाद भी पुनः खोज सकते हैं—बशर्ते वहाँ पर्याप्त वन, पानी, भोजन और सुरक्षित आवागमन की संभावना बनी रहे। अचानकमार की यह घटना केवल हाथियों की कहानी नहीं है। यह वन्यजीव गलियारों के महत्व की कहानी भी है।

कान्हा–अचानकमार परिदृश्य बाघों, हाथियों और अन्य वन्यजीवों के लिए एक बड़े परिदृश्य का हिस्सा है। यदि इस पूरे भू-दृश्य में जंगलों के बीच संपर्क बना रहे, तो वन्यजीवों के लिए नए आवासों तक पहुँचना संभव हो सकता है, लेकिन वापसी के साथ चुनौती भी आई है, हाथियों की वापसी निश्चित रूप से हमारे लिए गर्व और खुशी का विषय है, लेकिन इसके साथ एक बड़ी जिम्मेदारी भी जुड़ी है।

मानव-हाथी संघर्ष को कम करने में स्थानीय समुदायों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। समय पर चेतावनी, प्रभावी मुआवजा व्यवस्था, ग्रामीणों की जागरूकता और वन विभाग की त्वरित प्रतिक्रिया से नुकसान को कम किया जा सकता है।

जहाँ जंगल समाप्त होते हैं और गाँव शुरू होते हैं, वहीं से मानव–हाथी संघर्ष की संभावना बढ़ जाती है। भोजन और पानी की तलाश में हाथी खेतों और बस्तियों की ओर जा सकते हैं। दूसरी ओर, ग्रामीणों की फसल और आजीविका भी प्रभावित हो सकती है। इसलिए हाथियों के संरक्षण का अर्थ केवल जंगल के भीतर उन्हें सुरक्षित रखना नहीं है। हमें उनके आवागमन मार्गों, जलस्रोतों, भोजन वाले क्षेत्रों और वन से जुड़े मानव परिदृश्य को भी सुरक्षित रखना होगा। रेलवे और सड़कें जहाँ आवश्यक हैं, वहाँ वन्यजीवों की आवाजाही को ध्यान में रखते हुए सुरक्षित क्रॉसिंग, गति नियंत्रण, निगरानी और अन्य वैज्ञानिक उपायों पर गंभीरता से काम करना होगा। साथ ही स्थानीय समुदायों को संरक्षण का भागीदार बनाना होगा। हाथियों की उपस्थिति से जुड़े अवसरों और चुनौतियों के बारे में ग्रामीणों में जागरूकता बढ़ाना, त्वरित मुआवजा व्यवस्था, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और प्रभावी वन विभागीय प्रतिक्रिया मानव–हाथी संघर्ष को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

अचानकमार के सामने एक नई परीक्षा

अचानकमार ने अपने इतिहास में अनेक चुनौतियों का सामना किया है। शिकार, अवैध गतिविधियों और वनों के क्षरण से जूझते हुए इस परिदृश्य ने धीरे-धीरे अपनी प्राकृतिक पहचान वापस हासिल की है। आज बाघों की वापसी, वन्यजीवों की बढ़ती उपस्थिति और हाथियों का लगभग एक सदी बाद लौटना इस जंगल की पारिस्थितिक क्षमता का प्रमाण है। लेकिन हाथियों की वापसी के साथ अचानकमार के सामने एक नई परीक्षा भी है। क्या हम इस ऐतिहासिक वापसी को स्थायी बना पाएँगे? क्या हम हाथियों के पारंपरिक मार्गों को सुरक्षित रख पाएँगे? क्या हम विकास और संरक्षण के बीच ऐसा संतुलन बना पाएँगे, जिसमें जंगल और उसके आसपास रहने वाले लोग दोनों सुरक्षित रहें? इन सवालों के जवाब केवल वन विभाग या संरक्षण संगठनों के पास नहीं हैं। यह जिम्मेदारी हम सभी की है।

उम्मीद की एक किरण

लगभग सौ वर्षों के बाद जब हाथियों ने अचानकमार की धरती पर कदम रखा, तो मुझे ऐसा लगा जैसे जंगल ने अपने अतीत को फिर से पहचान लिया हो। यह केवल 12 हाथियों का एक झुंड नहीं था। यह इतिहास की वापसी थी। यह एक भूले हुए गलियारे की याद थी। यह प्रकृति की अद्भुत पुनर्जीवन क्षमता का प्रमाण था और साथ ही यह हमारे लिए एक चेतावनी भी थी कि यदि हम वन्यजीवों के रास्ते बंद करेंगे, तो संघर्ष बढ़ेगा; लेकिन यदि हम उनके रास्ते सुरक्षित रखेंगे, तो जंगल स्वयं अपना संतुलन पुनः स्थापित करने की क्षमता रखता है। अचानकमार ने कभी हाथियों को खोया था। लगभग एक सदी बाद हाथियों ने अचानकमार को फिर खोज लिया। अब हमारी जिम्मेदारी है कि इस बार उन्हें दोबारा खोने न दें। 

अब चुनौती यह है कि इस वापसी को सिर्फ एक ऐतिहासिक घटना बनकर न रह जाने दिया जाए, बल्कि इसे दीर्घकालीन संरक्षण की दिशा में एक अवसर बनाया जाए।

मुझे इस ऐतिहासिक वापसी को लेकर सतर्क आशावाद है। आने वाला समय बताएगा कि अचानकमार इन नए मेहमानों को स्थायी घर दे पाता है या नहीं। लेकिन एक संरक्षणवादी के रूप में मैं इतना अवश्य मानता हूँ कि हाथियों का लौटना अचानकमार के जंगलों के लिए प्रकृति की ओर से मिला एक अनमोल अवसर है—और हमें इसे हर संभव प्रयास से सुरक्षित रखना चाहिए।

कैरी बैग में मिलीं 106 नशीली गोलियां, नेहरू नगर से महिला गिरफ्तार

रायपुर।  TODAY छत्तीसगढ़  /  रायपुर पुलिस ने नशीली दवाइयों के कथित अवैध कारोबार के खिलाफ कार्रवाई करते हुए 27 वर्षीय एक महिला को गिरफ्तार किया है। पुलिस के मुताबिक, महिला के पास से NITRAZEPAM TABLET IP NITROSUN-10 की 106 गोलियां बरामद हुई हैं।

पुलिस के अनुसार, यह कार्रवाई विजिबल पुलिसिंग अभियान के तहत थाना कोतवाली पुलिस और एंटी क्राइम एंड साइबर यूनिट (ACCU)/क्राइम ब्रांच की संयुक्त टीम ने की।

पुलिस को सूचना मिली थी कि नेहरू नगर के चार नाला चौक के पास एक महिला नशीली गोलियां बेचने के लिए मौजूद है। इसके बाद टीम ने मौके पर पहुंचकर घेराबंदी की और संदिग्ध महिला को हिरासत में लिया।

पूछताछ में महिला ने अपना नाम योगिता साहू, उम्र 27 वर्ष बताया। पुलिस ने उसके पास मौजूद कैरी बैग की तलाशी ली, जिसमें 106 नशीली गोलियां मिलीं। पुलिस ने गोलियों को जब्त कर सीलबंद किया।

पुलिस ने योगिता साहू के खिलाफ एनडीपीएस एक्ट की धारा 22(बी) के तहत मामला दर्ज किया है। गिरफ्तारी के बाद उसे अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया गया।  

नाना और लॉरेंस: विश्वास, प्रेम और विदाई की वह कहानी जिसे दुनिया कभी नहीं भूलेगी


12 अगस्त को विश्व हाथी दिवस मनाते समय यदि किसी एक कहानी ने पूरी दुनिया को यह सिखाया है कि प्रेम और विश्वास की कोई भाषा नहीं होती, तो वह है दक्षिण अफ्रीका के थुला थुला प्राइवेट गेम रिजर्व की प्रसिद्ध हथिनी नाना और महान संरक्षणवादी लॉरेंस एंथोनी की कहानी। यह केवल एक मनुष्य और एक जंगली हाथी के बीच मित्रता की कहानी नहीं, बल्कि धैर्य, करुणा, कर्तव्यनिष्ठा और अटूट विश्वास की ऐसी गाथा है, जिसने लाखों लोगों को वन्यजीवों को देखने का नजरिया बदल दिया। 

सन् 1999 में दक्षिण अफ्रीका में एक जंगली हाथियों के झुंड को "समस्याग्रस्त झुंड" घोषित कर दिया गया था। यदि उन्हें कोई सुरक्षित स्थान नहीं मिलता, तो उन्हें मार दिया जाता। इस झुंड का नेतृत्व उसकी निर्भीक और बुद्धिमान मुखिया (Matriarch) नाना कर रही थी। उस समय नाना के साथ उसके परिवार के छह अन्य हाथी थे। इन सातों हाथियों के सामने उनकी पूर्व मुखिया और उसके शावक की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस दर्दनाक घटना ने पूरे परिवार को भयभीत और असुरक्षित बना दिया था। वर्षों तक मनुष्यों से मिले इन कटु अनुभवों ने नाना का विश्वास लगभग समाप्त कर दिया था। वह केवल अपने परिवार की सुरक्षा चाहती थी। 

 "एक ऐसा जंगली हाथी परिवार, जो इंसानों से डरता था, धीरे-धीरे एक इंसान पर भरोसा करने लगा। और जब उस इंसान की मृत्यु हुई तो हाथियों का उसके घर तक पहुंचना इस रिश्ते को दुनिया की सबसे मार्मिक वन्यजीव कहानियों में शामिल कर गया।"

जब इस परिवार को थुला थुला लाया गया, तब वहाँ एक भी हाथी नहीं था। उस समय तक लॉरेंस हाथियों के बारे में लगभग कुछ भी नहीं जानते थे। नाना ने इस स्थान को अपना घर मानने से इंकार कर दिया। कुछ ही दिनों में उसने लगभग 8000 वोल्ट की विद्युत बाड़ तोड़ दी और पूरे परिवार को लेकर रिज़र्व से बाहर निकल गई। वह उसी दिशा की ओर बढ़ रही थी, जहाँ के जंगल से उसे पकड़कर लाया गया था। यदि हाथी आबादी वाले क्षेत्रों में पहुँच जाते, तो उनके मारे जाने की पूरी संभावना थी। लॉरेंस ने वन विभाग के अधिकारियों के साथ मिलकर अथक प्रयास किए और पूरे हाथी परिवार को सुरक्षित वापस थुला थुला लाने में सफलता प्राप्त की।

नाना की स्वतंत्रता छीनकर उसे रोकना आसान था, लेकिन लॉरेंस ने इसके बजाय धैर्य और विश्वास का कठिन रास्ता चुना। उन्होंने नाना को हराने की नहीं, बल्कि उसके भीतर छिपे भय और अविश्वास को दूर करने की कोशिश की।  वे बाड़ के पास खड़े होकर उससे धीरे-धीरे बात करते रहे। जब तक नाना और उसका परिवार शांत नहीं हो गया, तब तक लॉरेंस हर रात वहीं बाड़ के पास ही रहे। न उन्होंने उसे डराया, न दंड दिया। उन्होंने केवल धैर्य रखा। धीरे-धीरे नाना को एहसास होने लगा कि यह मनुष्य उन लोगों जैसा नहीं है, जिन्होंने उसके जीवन में केवल भय और पीड़ा दी थी। उसके भीतर उसे पहली बार खतरा नहीं, बल्कि विश्वास, सुरक्षा और अपनापन दिखाई दिया।

लेकिन कुछ समय बाद नाना एक बार फिर अपने परिवार के साथ बाड़ तोड़कर बाहर निकलने वाली थी। इस बार भी लॉरेंस ने विश्वास का सहारा लिया। वे अकेले नाना के सामने जाकर खड़े हो गए और उससे बार-बार कहते रहे—

"नाना, ऐसा मत करो... मेरी बच्ची, ऐसा मत करो। यही तुम्हारा घर है। प्लीज यहाँ से मत जाओ। यदि तुम बाड़ तोड़कर बाहर निकलोगी, तो वे तुम सबको मार डालेंगे। अब तुम्हें कहीं भागने की ज़रूरत नहीं है। यदि तुम बाहर गईं, तो तुम सब मारे जाओगे। यहीं रहो। मैं तुम्हारे साथ हूँ और हमेशा तुम्हारे साथ रहूँगा। यह जगह तुम्हारे और तुम्हारे परिवार के लिए सुरक्षित है।" एंथोनी बार-बार कहते रहे, "यदि तुम चली गईं, तो तुम सब मर जाओगे। यहीं रहो। मैं तुम्हारे साथ यहीं रहूँगा। यह एक अच्छी जगह है।" नाना ने बाड नहीं तोड़ी। 

"...यहीं से लॉरेंस एंथोनी की असली परीक्षा शुरू हुई। थुला थुला के आधिकारिक इतिहास के अनुसार, एंथोनी ने इस झुंड को बचाने के बाद उनके साथ भरोसे का रिश्ता बनाया और बाद में उनकी कहानी उनकी चर्चित पुस्तक The Elephant Whisperer में दर्ज हुई।"

कुछ दिनों बाद जब लॉरेंस ने देखा कि पूरा परिवार शांत हो चुका है और थुला थुला को अपना घर स्वीकार कर लेगा, तब उन्होंने बाड़ का द्वार खोल दिया। परन्तु कुछ समय बाद नाना पूरे परिवार के साथ, फिर गेम रिज़र्व की विद्युत-तारों वाली बाड़ तोड़कर बाहर जाने लगी। तब लॉरेंस उसके बिल्कुल सामने, कुछ फीट की दूरी पर जाकर खड़े हो गए और फिर वही बातें दोहराने लगे—"नाना, ऐसा मत करो... मत करो।" नाना ने लॉरेंस की ओर देखा और दोनों लगभग दस मिनट तक एक-दूसरे की आँखों में देखते रहे।

उसी क्षण सब कुछ बदल गया। नाना कुछ देर तक शांत खड़ी रही, फिर मुड़ी और अपने पूरे परिवार को लेकर वापस गेम रिज़र्व के भीतर चली गई। इसके बाद से आज तक यह हाथी परिवार लगभग 55 वर्ग किलोमीटर के इस रिज़र्व में स्वतंत्र रूप से रह रहा है और उसने फिर कभी रिज़र्व की बाड़ तोड़कर बाहर निकलने का प्रयास नहीं किया। यह किसी प्रशिक्षण की नहीं, बल्कि विश्वास की जीत थी। यही वह क्षण था, जब एक मनुष्य और एक जंगली हथिनी के बीच ऐसा रिश्ता बना, जिसकी मिसाल आज भी पूरी दुनिया में दी जाती है।

समय बीतता गया और नाना तथा लॉरेंस एंथोनी के बीच ऐसा रिश्ता बन गया, जिसे शब्दों में व्यक्त करना कठिन है। जब भी लॉरेंस एंथोनी गेम रिज़र्व के जंगल में जाते, नाना उनसे मिलने आ जाती और उन्हें अपनी सूँड से सूँघती। परन्तु वन्यजीव संरक्षण के सिद्धांतों का सम्मान करते हुए लॉरेंस एंथोनी ने नाना से मिलना-जुलना भी कम कर दिया, ताकि उसका मनुष्यों के प्रति लगाव और अधिक न बढ़े और और वह अपनी प्राकृतिक स्वतंत्र अवस्था में रह सके। थुला थुला के कर्मचारियों ने कई बार एक आश्चर्यजनक बात देखी। जब भी लॉरेंस एंथोनी किसी यात्रा पर बाहर जाते और वापस लौटने वाले होते, नाना के नेतृत्व में हाथियों का परिवार गेम रिज़र्व में, उनके घर के पास आकर खड़ा हो जाता था, मानो वे अपने प्रिय मित्र की प्रतीक्षा कर रहे हों। यह आज तक कोई नहीं समझ पाया कि हाथियों को कैसे पता चल जाता था कि लॉरेंस वापस आने वाले हैं। शायद यह उनकी अद्भुत संवेदनशीलता थी, शायद उनका गहरा लगाव, या शायद प्रकृति का कोई ऐसा रहस्य, जिसे हम आज भी पूरी तरह समझ नहीं पाए हैं।

2 मार्च 2012 को लॉरेंस एंथोनी का अचानक हृदयाघात से निधन हो गया। इसके बाद जो घटना हुई, उसने पूरी दुनिया को भावुक कर दिया। नाना के नेतृत्व में हाथियों का परिवार स्वयं उनके गेम रिज़र्व स्थित घर पहुँचा और लंबे समय तक वहाँ शांत खड़ा रहा, मानो वे अपने उस मित्र को अंतिम विदाई देने आए हों, जिसने कभी उनके जीवन की रक्षा की थी। इस घटना ने दुनिया भर के लोगों को झकझोर दिया। आज भी इस घटना से जुड़े वीडियो YouTube पर लाखों लोग देखते हैं और हर बार यह एहसास होता है कि प्रेम, सहानुभूति और विश्वास केवल मनुष्यों की भावनाएँ नहीं हैं।

वर्षों के साथ नाना वृद्ध होती गई। बढ़ती आयु में उसे मोतियाबिंद हो गया और उसकी एक आँख की दृष्टि चली गई। तब उसने अपने परिवार के नेतृत्व की जिम्मेदारी अपनी विश्वसनीय उत्तराधिकारी फ्रैंकी को सौंप दी। बाद में फ्रैंकी की मृत्यु के पश्चात उसकी बेटी मारुला आज इस ऐतिहासिक हाथी परिवार की नई मातृसत्ता है। नाना आज लगभग 62 वर्ष की है। समय के साथ इस परिवार में नए शावकों का जन्म हुआ और अन्य हाथी भी इसमें शामिल हुए। आज थुला थुला में 28 हाथी हैं। 

"थुला थुला में यह परिवार लंबे समय तक संरक्षण की मिसाल बना रहा। नाना के बाद झुंड का नेतृत्व फ्रैंकी ने संभाला। फ्रैंकी की 2021 में मृत्यु के बाद उसकी बेटी मारुला मातृसत्ता बनी। थुला थुला की आधिकारिक वेबसाइट भी मारुला को वर्तमान मातृसत्ता के रूप में दर्ज करती है।"

आज भी थुला थुला प्राइवेट गेम रिजर्व का संचालन लॉरेंस एंथोनी की पत्नी फ्रांकोइस एंथोनी उसी समर्पण और संरक्षण की भावना के साथ कर रही हैं, जिसे लॉरेंस एंथोनी ने अपने जीवन का उद्देश्य बनाया था। नाना, मारुला और उनका परिवार आज भी वहाँ आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को यह संदेश देता है कि प्रकृति पर अधिकार नहीं, बल्कि उसके साथ विश्वास का रिश्ता बनाया जा सकता है।

लॉरेंस एंथोनी की प्रसिद्ध पुस्तक The Elephant Whisperer केवल एक हाथी परिवार की कहानी नहीं है। यह उनके वन्यजीवों के प्रति अथाह प्रेम, धैर्य, साहस और संरक्षण के प्रति समर्पण का जीवंत दस्तावेज़ है। पूरी पुस्तक में अनेक ऐसी घटनाओं का उल्लेख है, जो पाठक को यह महसूस कराती हैं कि यदि मनुष्य प्रेम, सम्मान और धैर्य के साथ प्रकृति के पास जाए, तो जंगल भी उसे अपना लेते हैं। पुस्तक के कई प्रसंग इतने मार्मिक हैं कि वे पाठक की आँखें नम कर देते हैं।

विश्व हाथी दिवस पर नाना और लॉरेंस एंथोनी की यह कहानी हमें यह सिखाती है कि विश्वास कभी शक्ति से नहीं जीता जाता, बल्कि करुणा, धैर्य और निस्वार्थ प्रेम से अर्जित किया जाता है। आज जब हाथी अपने अस्तित्व की सबसे बड़ी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, तब यह कहानी हमें याद दिलाती है कि एक संवेदनशील मनुष्य केवल एक हाथी परिवार ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की सोच बदल सकता है।

लेखक की टिप्पणी : कुछ समय पूर्व मुझे अपनी पत्नी के साथ थुला थुला जाने का सौभाग्य मिला। सफारी के दौरान हमारी लैंड रोवर लगभग आधे घंटे तक मारुला और उसके परिवार के बीच खड़ी रही। उस दौरान मारुला स्वयं हमारी गाड़ी के बिल्कुल पास आई। उसने अपनी शांत आँखों से मेरी पत्नी को देखा और फिर अपनी सूँड से बड़े स्नेह और जिज्ञासा के साथ सूँघा। उस समय मारुला और मेरी पत्नी के बीच की दूरी लगभग तीन इंच रही होगी। वह क्षण अविस्मरणीय था—आखिर वह उसी हाथी परिवार की सदस्य थी, जिसे लॉरेंस एंथोनी ने थुला थुला में बसाया था। बस एक कसक रह गई कि हम नाना से नहीं मिल पाए; उस दिन वह जंगल में कहीं दूर थी। 

गेड़ी की धमक और गुड़हा चीले की मिठास... ऐसे मनाया जाता है हरेली तिहार

छत्तीसगढ़ी संस्कृति में लोक-त्योहारों की एक समृद्ध परंपरा रही है, जिसमें प्रकृति, कृषि और जीव-जंतुओं के प्रति गहरा सम्मान झलकता है। इन्हीं त्योहारों में सबसे पहला और प्रमुख त्यौहार है — हरेली तिहार। सावन माह की अमावस्या (हरियाली अमावस्या) को मनाया जाने वाला यह पर्व छत्तीसगढ़ के लोक-जीवन, कृषि परंपरा और पर्यावरण-प्रेम का प्रतीक है। छत्तीसगढ़ की पहचान सिर्फ उसकी प्रकृति नहीं, बल्कि उसकी समृद्ध लोक संस्कृति और परंपराएँ भी हैं।

छत्तीसगढ़ के लोक जीवन में पर्व और त्यौहारों की बहुलता है। प्रत्येक माह कोई न कोई त्यौहार यहाँ लोक मानस को अपने रंग में रंग लेता है। ये त्यौहार जहॉं लोक जीवन में हंसी-खुशी के अवसर उपलब्ध कराती हैं, वहीं खेल और मनोरंजन के अनुकूल साबित होते हैं। प्रकति का यह हरापन छत्तीसगढ़ के लोक जीवन में भी पूरी समाहित है। हरेली, भोजली, जँवारा हो या बसंत पंचमी सभी पर्वों में प्रकृति का मनोरम और इसका अप्रतिम सौंदर्य झलकता है। इस रूप-सौंदर्य में जीवन की चारों अवस्थाओं का उल्लास और उत्साह विविध रंगों में बिखरा हुआ है।

शायद ‘हरेली’ का हरापन हमारी परंपराओं में हमारे संस्कारों में और हमारे लोक जीवन में प्राकृतिक हरीतिमा का ज्यादा एहसास कराता है। हरेली का यह हरापन सबके जीवन में बिखरे और निखरे यही कामना है। यह भी कामना है कि भौतिकता की चकाचौंध से परे हमारी खेल परंपराएँ जीवित रहे ताकि माटी से जुड़े ग्रामीणजन शारीरिक और मानसिक दृष्टि से सुदृढ़ रहें। माटी की सोंधी-सोंधी महक हमारे लोक गीतो से आती रहे और खेल परंपरा की यह अविरल धारा निरंतर गतिमान रहे। 

1. हरेली शब्द का अर्थ और महत्व

'हरेली' शब्द 'हरियाली' से बना है। सावन के महीने में जब चारों तरफ़ खेतों और मैदानों में हरी-भरी फसलें और हरियाली लहलहाने लगती है, तब किसान इस पर्व को उल्लासपूर्वक मनाते हैं। इसे छत्तीसगढ़ का पहला तिहार माना जाता है, जहाँ से राज्य के प्रमुख लोक-पर्वों की श्रृंखला शुरू होती है।

2. कृषि उपकरणों और पशुधन की पूजा

हरेली का दिन मुख्य रूप से कृषकों और कृषि से जुड़े साधनों का धन्यवाद ज्ञापित करने का दिन है:

कृषि यंत्रों की पूजा:- हरेली की जड़ें छत्तीसगढ़ क्षेत्र की कृषि विरासत में गहराई से जुड़ी हुई हैं। यह एक उत्सव होने के साथ-साथ एक आध्यात्मिक भेंट भी है, लोगों के लिए प्रकृति, बारिश और अपने कृषि कार्य को सम्पन्न करने के बाद किसान अपने औजार, हल, फावड़ा, कुदाल, कुदाली, कुम्हड़ी, बिन्धना, बसुला, हथौड़ी, आरी,असिया, पैसुल, छूरा, खुर्पी आदि को धोकर स्वच्छ मिट्टी (मुरमी) का आसन से सजाकर किसान-किसानिन पूजा सामग्री रखकर धुले हुए चांवल आटे से हाथा लगाकर चन्दन, फूल, धुप-दीप व चीला रोटी से भोग लगाकर श्रीफल अर्पित करते हैं एवं भाव विभोर हो प्रार्थना करते हैं - ‘हे बलराम रूपी हल प्रचण्ड शक्ति के प्रतीक धारापति, आपने कंधा के रूप में माता को संवारा एवं सेवा करने में हमारी सहायता की कृषि कार्य बोनी ब्यासी रोपा के होते ही चहूओर हरियाली छाई इसके लिए कोटिशः धन्यवाद आपका कार्य सम्पन्न हुआ विश्राम करे। हमने आपको बड़ा कष्ट दिया, काम लिया, हमें क्षमा करें। आपकी दया हम पर सदैव बनी रहे, इसी प्रकार अन्य औजारों का कार्यानुसार निवेदन करते गेड़ी की पूजा कर शरीर के सामर्थ पैरो की रक्षा की कामना करते हैं।

पशुधन का सत्कार: पशुधन किसानों की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भारत में किसान मिश्रित कृषि प्रणाली अपनाते हैं, जिसमें फसल और पशुधन का संयोजन होता है। छत्तीसगढ़ में बड़ी संख्या में लोग कम पढ़े-लिखे और अकुशल होने के कारण अपनी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर हैं।  बैल छत्तीसगढ़ कृषि की रीढ़ हैं। किसान, विशेषकर सीमांत और लघु किसान, जुताई, ढुलाई और उत्पादन और इनपुट दोनों के परिवहन के लिए बैलों पर निर्भर रहते हैं।

खेती-किसानी के सच्चे साथी यानी गाय और बैलों की विशेष सेवा की जाती है। उन्हें नहला-धुलाकर आरती उतारी जाती है तथा 'गहूंता' (आटा, नमक और जड़ी-बूटी से बना पौष्टिक मिश्रण) खिलाया जाता है, ताकि वे रोगों से मुक्त रहें। जड़ी बुटियों से तैयार औषधि को गौठान में ले जाकर अन्डी एवं खम्हार के पत्तों में नमक, चावल या गेहूँ के गोला के साथ दवा डाल कर पशुओं को खिलाया जाता है। अरण्ड, खम्हार का पत्ता औषधि है, जो वायुजनित रोगों को दूर करता है। नमक उत्प्रेक्षण का कार्य करता है, चावल या गेहूँ के कारण दवा अधिक असरकारक बन जाती है। इससे पशु धन निरोग हो जाता है यह एक प्रकार टीकाकरण ही है।

3. परंपराएं एवं रीति-रिवाज

गेड़ी चढ़ने का आनंद:- इस पर्व में गेंड़ी का काफी महत्व है बांस के मोटे डंडो एवं बांस के पहुये को विशेष विधि से कस कर बांधा जाता है। गेड़ी का उदारण हमें पुराणों में मिलता है। बलदाऊ-कृष्ण अपने सखाओं के साथ गेड़ी चढ़ा करते थे। कृष्ण लीला प्रसंग में इसका उदाहरण मिलता है तथा खेलों का आयोजन भी होते रहे हैं, जिसमें गेड़ी दौड़, पानी पिलाना, एक पैर में खड़े होना, एक पैर में कूदना आदि अनेक खेल का आयोजन प्राचीन काल से अब तक होते आ रहे हैं। बारिश के मौसम में कीचड़ और पानी से भरे रास्तों पर चलने के साधन के रूप में शुरू हुई यह परंपरा आज एक मनोरंजक खेल बन चुकी है। 

विभिन्न प्रतियोगिता का आयोजन:-हरेली में गाँव व शहरों में नारियल फेंक प्रतियोगिता भी होती है। सुबह पूजा-अर्चना के बाद गाँव के चौक-चौराहों पर युवाओं की टोली जुटती है और नारियल फेंक प्रतियोगिता का आयोजन की जाती है। नारियल हारने और जीतने का यह सिलसिला देर रात तक चलता है। गाँव-गाँव में गेड़ी दौड़ का आयोजन होता है। कहीं खो-खो तो कहीं फुगड़ी, कहीं बिल्लस, कहीं अत्ती-पत्ती, डंडा पचरंगा खेल का आयोजन होते आ रहे हैं। गाँव का गौठान हो या स्कूल का मैदान, गाँव के बाहर सड़क हो या चौबट्टा लगता है सारे लोग रंग-बिरंगे परिधानों में सजे रहते हैं।

टोटका और सुरक्षा का विधान:- मान्यतानुसार, इस दिन गाँव को बुरी नज़र और रोगों से बचाने के लिए घर के मुख्य दरवाजों पर नीम की पत्तियाँ बांधी जाती हैं। लोहार द्वारा घरों के चौखट पर नीम की शाखाएं और लोहे की कीलें लगाई जाती हैं। स्थानीय मान्यता है कि इससे घर को बुरी शक्तियों और बीमारियों से सुरक्षा मिलती है। यह प्रथा नीम के ज्ञात औषधीय गुणों और ग्रामीण स्वास्थ्य संबंधी पारंपरिक मान्यताओं में इसकी भूमिका से प्रेरित है।

हरेली तिहार में बनाए जाने वाले ब्यंजन:- मुख्य रूप से गुड़ के चीला, अईरसा, चौसेला और बोबरा जैसे पारंपरिक पकवान बनाए और बांटे जाते हैं। गुलगुला भजिया, गुड़हा चीला, सोहारी, बड़ा, ठेठरी, खुरमी और बोबरा जैसे पारंपरिक छत्तीसगढ़ी पकवान बनाए जाते हैं। इन व्यंजनों का भोग कृषि औजारों और गोधन को लगाया जाता है। इस दिन छत्तीसगढ़ी व्यंजनों का विशेष आनंद लिया जाता है। 

4. सांस्कृतिक और सामाजिक संदेश

हरेली तिहार केवल एक धार्मिक या लोक-अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह मानव का प्रकृति के साथ अटूट संबंध दर्शाता है। यह पर्व सिखाता है कि जो प्रकृति और पशुधन हमें जीवन और भोजन देते हैं, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना हमारा परम कर्तव्य है।आज के समय में छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा हरेली पर सार्वजनिक अवकाश घोषित कर और 'छत्तीसगढ़िया क्रांति' के तहत पारंपरिक खेलों (जैसे गेड़ी दौड़) को बढ़ावा देकर इस लोक-सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने का सराहनीय कार्य किया जा रहा है। 


कार में 5.32 ग्राम ‘ओजी’ लेकर घूम रहा था शोभित जजोदिया, पुलिस ने दबोचा

बिलासपुर। TODAY छत्तीसगढ़  /  नशीले पदार्थों के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान के तहत सिरगिट्टी पुलिस और एसीसीयू की टीम ने बड़ी कार्रवाई की है। पुलिस ने तिफरा नया बस स्टैंड के पास घेराबंदी कर कार में मादक पदार्थ लेकर जा रहे एक युवक को गिरफ्तार किया। आरोपित के कब्जे से 5.32 ग्राम ‘ओरिजनल गैंगस्टर ओजी’, करीब सात लाख रुपये कीमत की सेल्टोस कार और 50 हजार रुपये कीमत का आइफोन बरामद किया गया है। जब्त सामान की कुल कीमत करीब 7.65 लाख रुपये बताई गई है।

बस स्टैंड में घेराबंदी

पुलिस के अनुसार, मादक पदार्थों के अवैध परिवहन और बिक्री पर कार्रवाई के दौरान मुखबिर से सूचना मिली कि एक व्यक्ति काले रंग की सेल्टोस कार से तिफरा नया बस स्टैंड के आसपास महंगा नशीला पदार्थ लेकर पहुंचने वाला है।

सूचना वरिष्ठ अधिकारियों को देने के बाद पुलिस टीम ने नया बस स्टैंड तिफरा के पास घेराबंदी की। मुखबिर के बताए हुलिए और वाहन के आधार पर संदिग्ध कार को रोका गया।

तलाशी में मिला नशीला पदार्थ

पुलिस ने कार सवार युवक की तलाशी ली। उसके कब्जे से 5.32 ग्राम मादक पदार्थ ‘ओरिजनल गैंगस्टर ओजी’ बरामद हुआ। इसके अलावा पुलिस ने अवैध परिवहन में इस्तेमाल सेल्टोस कार क्रमांक CG10AS3131, जिसकी कीमत करीब सात लाख रुपये है, जब्त की।

आरोपित के पास से एप्पल आइफोन 16 प्रो, जिसकी कीमत करीब 50 हजार रुपये बताई गई है, भी जब्त किया गया। पुलिस ने कुल जब्ती की कीमत करीब 7 लाख 65 हजार रुपये बताई है।

NDPS एक्ट के तहत कार्रवाई, जेल भेजा

गिरफ्तार आरोपित की पहचान शोभित जजोदिया उर्फ अक्षत (32) निवासी लिंक रोड, तारबहार, बिलासपुर के रूप में हुई है। पुलिस ने उसके खिलाफ सिरगिट्टी थाने में अपराध क्रमांक 570/2026 के तहत एनडीपीएस एक्ट की धारा 20ए में कार्रवाई की है।

आरोपित को गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उसे न्यायिक रिमांड पर जेल भेज दिया गया।

हाथों में तिरंगा, जुबां पर वंदे मातरम्... बिलासपुर में दिखा देशभक्ति का ऐसा नजारा

बिलासपुर। TODAY छत्तीसगढ़  /  स्वतंत्रता दिवस के उत्सव से पहले मंगलवार को न्यायधानी देशभक्ति के रंग में रंगी नजर आई। बिलासपुर पुलिस की ओर से निकाली गई भव्य तिरंगा यात्रा में पुलिस अधिकारी-कर्मचारियों के साथ एनसीसी, एनएसएस, रेडक्रॉस और स्काउट-गाइड के सदस्यों ने हाथों में तिरंगा लेकर हिस्सा लिया। पुलिस बैंड की देशभक्ति से ओतप्रोत धुनों और ‘भारत माता की जय’ व ‘वंदे मातरम्’ के जयघोष से शहर का माहौल राष्ट्रप्रेम से भर गया।

पुलिस ग्राउंड से निकली तिरंगा यात्रा

स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में 11 अगस्त को बिलासपुर पुलिस ने तिरंगा यात्रा का आयोजन किया। यात्रा का शुभारंभ पुलिस ग्राउंड से हुआ। जिला दंडाधिकारी संजय अग्रवाल मुख्य अतिथि और उपमहानिरीक्षक एवं वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक रजनेश सिंह विशिष्ट अतिथि के रूप में मौजूद रहे।

पुलिस बैंड ने ‘सारे जहां से अच्छा’, ‘वंदे मातरम्’ और ‘मेरी देश की धरती’ जैसी देशभक्ति की धुनों से माहौल में जोश भर दिया। विशाल तिरंगे के साथ निकली यात्रा में पुलिसकर्मियों के अलावा विभिन्न संस्थाओं के युवाओं ने भी उत्साह से भाग लिया।

जयघोष से गूंजा शहर

यात्रा के दौरान प्रतिभागियों के हाथों में तिरंगा लहराता रहा और ‘भारत माता की जय’ तथा ‘वंदे मातरम्’ के नारों से वातावरण गूंजता रहा। यात्रा में शामिल लोगों ने राष्ट्रीय एकता, अखंडता और देशप्रेम का संदेश दिया।

पुलिस अधिकारियों और जवानों के साथ एनसीसी, एनएसएस, रेडक्रॉस तथा स्काउट एंड गाइड के सदस्यों की सहभागिता ने आयोजन को खास बना दिया।

युवाओं ने दिया राष्ट्रएकता का संदेश

बिलासपुर पुलिस ने कहा कि तिरंगा यात्रा का उद्देश्य नागरिकों में राष्ट्रप्रेम, कर्तव्यबोध और राष्ट्रीय ध्वज के प्रति सम्मान की भावना को मजबूत करना है। विभिन्न संस्थाओं से जुड़े युवाओं की भागीदारी ने कार्यक्रम को व्यापक स्वरूप दिया।

इस अवसर पर जिला पंचायत सीईओ संदीप अग्रवाल, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक शहर पंकज पटेल, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक ग्रामीण मधुलिका सिंह, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक यातायात रामगोपाल करियारे, रक्षित निरीक्षक भूपेंद्र कुमार गुप्ता सहित पुलिस विभाग के अधिकारी-कर्मचारी मौजूद रहे।

बिलासपुर पुलिस ने नागरिकों से स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय एकता और अखंडता को मजबूत करने तथा राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों के निर्वहन का संकल्प लेने की अपील की। 


एक किलोमीटर बिजली तार चोरी करने वाले चार आरोपित पकड़े गए, कार भी जब्त

बिलासपुर। TODAY छत्तीसगढ़  / सिरगिट्टी क्षेत्र में सड़क लाइट के लिए लगाए गए बिजली के तार चोरी करने वाले गिरोह का पुलिस ने 24 घंटे के भीतर पर्दाफाश कर दिया। सिरगिट्टी पुलिस ने मामले में चार आरोपितों को गिरफ्तार किया है। आरोपितों के कब्जे से चोरी किए गए चार बंडल बिजली पावर सप्लाई तार और वारदात में इस्तेमाल ओमनी कार बरामद की गई है। पुलिस जांच में आरोपितों के खिलाफ अन्य थानों में भी चोरी समेत कई मामले दर्ज होने की जानकारी सामने आई है।

एक किलोमीटर तार काटकर ले गए थे चोर

पुलिस के अनुसार तिफरा सेक्टर-डी में सड़क लाइट के लिए विद्युत पोल खड़े कर तार बिछाए गए थे। वर्तमान में यहां पावर सप्लाई बंद थी। इसी का फायदा उठाकर नौ और 10 अगस्त की दरमियानी रात अज्ञात चोर करीब एक किलोमीटर लंबा बिजली का तार काटकर ले गए। चोरी गए तार की कीमत करीब 45 हजार रुपये बताई गई है।

शिकायत मिलने के बाद सिरगिट्टी थाने में अज्ञात आरोपितों के खिलाफ अपराध क्रमांक 571/2026, धारा 303(2) बीएनएस के तहत मामला दर्ज किया गया।

आरोपितों तक पहुंची पुलिस

मामले की गंभीरता को देखते हुए वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के निर्देश पर सिरगिट्टी पुलिस ने जांच शुरू की। पुलिस ने मुखबिर तंत्र सक्रिय करने के साथ तकनीकी साक्ष्यों का विश्लेषण किया। संदेहियों से पूछताछ की गई और पूर्व में चोरी के मामलों में जेल जा चुके आरोपितों से भी बारीकी से जानकारी जुटाई गई।

जांच के दौरान पुलिस को चार संदिग्धों के बारे में अहम सुराग मिले। इसके बाद नीतेश पंडित, राजेश राय उर्फ रात्रे, विकास साण्डे और श्रीजीत जोशी को पकड़कर पूछताछ की गई। पुलिस के अनुसार पूछताछ में चारों ने बिजली तार चोरी की घटना में शामिल होना स्वीकार किया।

चार बंडल तार और ओमनी कार बरामद

पुलिस ने आरोपितों की निशानदेही पर चोरी किए गए चार बंडल बिजली पावर सप्लाई तार बरामद किए। इसके अलावा वारदात में इस्तेमाल ओमनी कार क्रमांक सीजी 10 एफए 2456 भी जब्त की गई है।

पुलिस जांच में आरोपितों के खिलाफ अकलतरा, मस्तूरी, मुलमुला और जांजगीर-चांपा थाना क्षेत्रों में भी अन्य अपराध दर्ज होने की जानकारी मिली है।

चारों आरोपितों को गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक रिमांड पर जेल भेज दिया गया।

गिरफ्तार आरोपित

  1. नीतेश पंडित, 22 वर्ष, निवासी अमोरा, थाना मुलमुला।
  2. राजेश राय उर्फ रात्रे, 32 वर्ष, निवासी मुरलीडीह, थाना मुलमुला।
  3. विकास साण्डे, 22 वर्ष, निवासी मुरलीडीह, थाना मुलमुला।
  4. श्रीजीत जोशी, 30 वर्ष, निवासी विद्युत नगर तिफरा, सिरगिट्टी, बिलासपुर।
© all rights reserved TODAY छत्तीसगढ़ 2018
todaychhattisgarhtcg@gmail.com
TODAY छत्तीसगढ़
लाइव मार्केट & सराफा