बिलासपुर। TODAY छत्तीसगढ़ / पुलिस महकमे में अक्सर कहा जाता है कि अपराध की गंभीरता उसकी धाराओं से नहीं, पीड़ित की पीड़ा से तय होती है। लेकिन जब वही पीड़ा पुलिस की फाइलों में दबने लगे, जांच कागजों तक सीमित रह जाए और संवेदनशील मामलों में भी जिम्मेदार अधिकारी मौके पर पहुंचना जरूरी न समझें, तब कार्रवाई भी उतनी ही कठोर होती है।
बिलासपुर जिले के सिरगिट्टी थाना क्षेत्र में नाबालिग बच्चियों से जुड़े एक बेहद संवेदनशील मामले में जांच के दौरान बरती गई गंभीर लापरवाही ने एक थाना प्रभारी की कुर्सी छीन ली है। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक रजनेश सिंह ने मामले को गंभीरता से लेते हुए सिरगिट्टी थाना प्रभारी निरीक्षक अभय सिंह बैस और उप निरीक्षक संतोषी अग्रवाल को तत्काल प्रभाव से लाइन अटैच कर दिया है। यहां ये बताना भी जरूरी है कि इस मामले में हाल ही में शीतला प्रसाद त्रिपाठी को निलंबित किया जा चुका है।
जारी आदेश के अनुसार थाना सिरगिट्टी के अपराध क्रमांक 383/2026 में निरीक्षक अभय सिंह बैस द्वारा न केवल घटनास्थल का निरीक्षण नहीं किया गया, बल्कि मामले से जुड़े महत्वपूर्ण साक्ष्यों को भी समय पर एकत्रित नहीं किया गया। इतना ही नहीं, सात वर्ष या उससे अधिक सजा वाले गंभीर प्रकरणों में नियमानुसार एफएसएल टीम को बुलाने की अनिवार्यता के बावजूद फोरेंसिक सहायता नहीं ली गई। आदेश में इसे स्पष्ट रूप से उपेक्षापूर्ण और लापरवाहीपूर्ण आचरण माना गया है।
पीड़ितों की आवाज बनी कार्रवाई का आधार
सूत्रों के अनुसार पीड़ित बच्चियों के परिजनों ने जांच की कार्यप्रणाली और पुलिस की निष्क्रियता को लेकर गंभीर शिकायतें की थीं। आरोप केवल प्रक्रिया संबंधी चूक के नहीं थे, बल्कि संवेदनशीलता के अभाव के भी थे। यही कारण है कि मामला सीधे जिले के पुलिस कप्तान तक पहुंचा और जांच के बाद कार्रवाई का फैसला लिया गया।
यह कार्रवाई केवल एक अधिकारी को लाइन भेजने तक सीमित नहीं है। यह पूरे पुलिस महकमे के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि नाबालिगों, महिलाओं और संवेदनशील अपराधों से जुड़े मामलों में लापरवाही अब केवल विभागीय गलती नहीं मानी जाएगी, बल्कि जवाबदेही तय होगी।
कुर्सी नहीं, जवाबदेही महत्वपूर्ण
पुलिस विभाग में स्थानांतरण और लाइन अटैचमेंट नई बात नहीं है, लेकिन हर कार्रवाई के पीछे एक संदेश छिपा होता है। इस मामले में संदेश बिल्कुल स्पष्ट है—थानेदारी केवल कुर्सी संभालने का नाम नहीं है। यह कानून, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी का दायित्व है।
जब एक पीड़ित परिवार न्याय की उम्मीद लेकर थाने पहुंचता है, तब वह केवल एफआईआर दर्ज कराने नहीं आता। वह यह भरोसा लेकर आता है कि पुलिस उसकी पीड़ा को समझेगी, साक्ष्य जुटाएगी और न्याय की दिशा में ईमानदारी से काम करेगी। यदि उसी प्रक्रिया में लापरवाही हो जाए तो सबसे बड़ा नुकसान केवल जांच का नहीं, बल्कि जनता के विश्वास का होता है।
महकमे के लिए चेतावनी
एसएसपी रजनेश सिंह की यह कार्रवाई उन सभी अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए चेतावनी मानी जा रही है जो संवेदनशील मामलों को महज एक केस डायरी या रूटीन फाइल की तरह देखते हैं। कानून की किताब में दर्ज धाराएं केवल आंकड़े नहीं होतीं। उनके पीछे किसी पीड़ित का दर्द, किसी परिवार की चिंता और न्याय की उम्मीद होती है। ऐसे मामलों में संवेदनहीनता, टालमटोल और प्रक्रियात्मक लापरवाही किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं हो सकती।









