STATE

नई दिल्ली, छत्तीसगढ़, Politics, बिहार

GUEST COLUMN

Guest Column

EDITOR CHOICE

Editor Choice

TRAVELLING STORY

TRAVELLING STORY

TCG EXCLUSIVE

टीसीजी एक्सक्लूसिव, इतिहास

VIDEO

VIDEO

साक्ष्य पर फोकस: एनडीपीएस मामलों में कानूनी पहलुओं पर कार्यशाला


रायगढ़।
  TODAY छत्तीसगढ़  /  जिले में मादक पदार्थों से जुड़े मामलों की विवेचना को और प्रभावी बनाने के उद्देश्य से पुलिस विभाग द्वारा एनडीपीएस एक्ट पर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस कार्यशाला में जप्ती, तलाशी, गिरफ्तारी और चेन ऑफ कस्टडी जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से प्रशिक्षण दिया गया।

कार्यक्रम वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक शशि मोहन सिंह के निर्देशन में आयोजित हुआ, जिसमें डीएसपी एवं एंटी-नारकोटिक्स टास्क फोर्स प्रभारी सुशांतो बनर्जी सहित जिले के थाना प्रभारी और विवेचक शामिल हुए। मुख्य वक्ता अपर लोक अभियोजक तन्मय बनर्जी ने एनडीपीएस एक्ट के प्रावधानों और विवेचना की बारीकियों पर विस्तार से मार्गदर्शन दिया।

कार्यशाला में अधिकारियों को जप्ती, तलाशी और गिरफ्तारी की कानूनी प्रक्रिया के साथ-साथ साक्ष्यों की चेन ऑफ कस्टडी बनाए रखने के महत्व को समझाया गया। पूर्व मामलों के उदाहरणों के माध्यम से विवेचना की जटिलताओं को सरल तरीके से बताया गया। वर्चुअल सत्र में थाना तमनार और लैलूंगा के अधिकारियों द्वारा हाल के अफीम प्रकरणों पर प्रस्तुति दी गई। इस दौरान जप्ती कार्यवाही के वीडियो फुटेज भी दिखाए गए, जिससे अधिकारियों को वास्तविक प्रक्रिया की बेहतर समझ मिली।

एसएसपी शशि मोहन सिंह ने कहा कि एनडीपीएस मामलों में छोटी-छोटी त्रुटियां भी न्यायालयीन प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए विवेचकों को हर चरण की सटीक जानकारी होना आवश्यक है, ताकि आरोपी को कड़ी सजा दिलाई जा सके। उन्होंने भविष्य में पॉक्सो एक्ट और साइबर अपराध जैसे विषयों पर भी इस प्रकार की कार्यशालाएं आयोजित करने की बात कही। कार्यक्रम के अंत में अपर लोक अभियोजक तन्मय बनर्जी को सम्मानित किया गया।

मशहूर गायिका आशा भोसले का निधन, 92 साल की उम्र में ली आखिरी सांस


मुम्बई।
  TODAY छत्तीसगढ़  /  संगीत की दुनिया की मशहूर हस्ती आशा भोसले का रविवार को निधन हो गया. 92 वर्ष की उम्र में उन्होंने मुंबई स्थिच ब्रीच कैंडी अस्पताल में अंतिम सांसें लीं. महाराष्ट्र के सांस्कृतिक मामलों के मंत्री आशीष शेलार ने यह दुखद खबर साझा करते हुए बताया कि उनका पार्थिव शरीर सोमवार सुबह 11 बजे से दोपहर 3 बजे तक उनके घर पर रखा जाएगा, और अंतिम संस्कार शाम 4 बजे शिवाजी पार्क में होगा.

वहीं ब्रीच कैंडी अस्पताल के डॉ. प्रतीत समदानी ने बताया कि मल्टी-ऑर्गन फेलियर के कारण आशा भोसले का निधन हो गया. डॉ. समदानी ने बताया कि आशा भोसले को कार्डियक अरेस्ट आने के बाद तुरंत अस्पताल लाया गया. अस्पताल की इमरजेंसी मेडिकल सर्विसेज यूनिट में उनका इलाज चल रहा था, लेकिन कई अंगों के काम करना बंद करने की वजह से उन्हें बचाया नहीं जा सका.

14 भाषाओं में गाए 12000 गाने

लता मंगेशकर की बहन आशा भोसले ने अपनी मधुर आवाज से कई पीढ़ियों को मोहित किया है. आशा भोसले का नाम गिनिज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी दर्ज है. उन्होंने 14 भाषाओं में 12000 से अधिक गाने गाए, जिनमें फिल्मी गीतों के अलावा, पॉप, गजल, भजन से लेकर शास्त्रीय संगीत तक शामिल है. आशा भोसले ग्रैमी अवार्ड जीतने वाली पहली भारतीय गायिका थी. इसके अलावा उन्हें दादा साहेब फाल्के अवार्ड, पद्म विभूषण सम्मान से भी सम्मानित किया जा चुका है.

इन गानों के लिए हमेशा याद की जाएंगी आशा भोसले 

8 सितंबर, 1933 को जन्मी आशा ने बहुत कम उम्र में अपना करियर शुरू किया था और अपने पूरे करियर में हिंदी, मराठी, बंगाली और गुजराती समेत कई भाषाओं में हज़ारों गानों को अपनी आवाज़ दी. आशा भोसले के टाइमलेस हिट्स की लिस्ट में पिया तू अब तो आजा, दम मारो दम, चुरा लिया है तुमने जो दिल को, झुमका गिरा रे, यह मेरा दिल, दिल चीज़ क्या है, ओ मेरे सोना रे, और इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हज़ारों हैं, जैसे क्लासिक गाने शामिल हैं.

संगीत प्रेमियों के लिए शोक का क्षण

आशा भोसले को पिछले कुछ सालों में उम्र के कारण स्वास्थ्य संबंधी कुछ परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. हालांकि वे अभी भी काफी सक्रिय थीं और संगीत कार्यक्रमों में शामिल होती रहती थीं. उनके निधन की खबर सुनकर फिल्म और संगीत जगत में चिंता की लहर दौड़ गई है.

आशा भोसले के निधन पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा, ‘यह पूरे भारत और दुनिया भर के संगीत प्रेमियों के लिए शोक का क्षण है. उन्हें सबसे बहुमुखी कलाकार के रूप में जाना जाता था. संगीत के प्रति उनकी सेवा, मंगेशकर परिवार द्वारा संगीत के प्रति की गई सेवा… हमने लता दीदी का निधन देखा, और आज हम यह देख रहे हैं. हम सभी दुखी हैं… यह हम सभी के लिए एक बहुत बड़ी क्षति है; हम शोक संतप्त परिवार के साथ खड़े हैं.’ (साभार सोर्स / news 18)


खनिजों के अवैध परिवहन पर बड़ी कार्रवाई, 2 हाइवा व 6 ट्रैक्टर-ट्रॉली जब्त


बिलासपुर। 
 TODAY छत्तीसगढ़  /  जिले में खनिजों के अवैध उत्खनन और परिवहन के खिलाफ प्रशासन ने सख्त रुख अपनाते हुए बड़ी कार्रवाई की है। कलेक्टर के निर्देश पर खनिज विभाग की टीम ने विभिन्न क्षेत्रों में छापेमारी कर 2 हाइवा और 6 ट्रैक्टर-ट्रॉली समेत कुल 8 वाहनों को जब्त किया है।

कलेक्टर संजय अग्रवाल के निर्देशानुसार एवं उप संचालक खनिज के मार्गदर्शन में जिले में अवैध खनिज उत्खनन, परिवहन एवं भंडारण के विरुद्ध लगातार सघन कार्रवाई की जा रही है। इसी क्रम में 10 अप्रैल एवं 12 अप्रैल 2026 को खनिज विभाग की टीम द्वारा चकरभाठा, रहंगी-बिल्हा, दगोरी, उमरिया, उड़गन, उड़नताल, खपरी, कोहरौदा, बर्तोरी, सेलर, पिपरा और खैरा क्षेत्रों में व्यापक जांच अभियान चलाया गया। जांच के दौरान उड़नताल क्षेत्र में अवैध रूप से रेत परिवहन करते 2 ट्रैक्टर-ट्रॉली को जब्त किया गया। वहीं उमरिया क्षेत्र में ईंट-मिट्टी का परिवहन करते 2 ट्रैक्टर-ट्रॉली पकड़े गए। 

खैरा क्षेत्र से मुरुम का अवैध परिवहन करते 1 हाइवा वाहन को जब्त किया गया, जबकि अशोक नगर क्षेत्र में गिट्टी का परिवहन करते 1 हाइवा वाहन को भी कब्जे में लिया गया। इसके अलावा पिपरा क्षेत्र में रेत परिवहन करते 2 ट्रैक्टर-ट्रॉली भी जब्त की गईं।इस प्रकार कुल 8 वाहनों पर कार्रवाई करते हुए उन्हें पुलिस थाना बिल्हा एवं कोनी की अभिरक्षा में रखा गया है। खनिज विभाग ने स्पष्ट किया है कि जिले में अवैध खनिज गतिविधियों के विरुद्ध यह अभियान आगे भी लगातार जारी रहेगा और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

कैमरे की कलम: “साड़ी में भी ‘फीका’ पड़ गया सिस्टम !”


छत्तीसगढ़ में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं की साड़ियों का मामला अब रंग से ज्यादा ‘ढंग’ दिखाने लगा है। साड़ियाँ क्या आईं, जैसे मानो सरकारी वादों की तरह पहले चमकदार, फिर धीरे-धीरे फीकी! कहीं लंबाई कम, कहीं चौड़ाई गायब, तो कहीं कपड़ा इतना पतला कि पारदर्शिता में ईमानदारी भी शरमा जाए। लोकतंत्र में योजनाएं अक्सर बड़े इरादों के साथ जन्म लेती हैं, कागज़ों पर वे संवेदनशीलता की मिसाल होती हैं, भाषणों में वे जनकल्याण की गारंटी बन जाती हैं और विज्ञापनों में वे सरकार की “जनहितैषी” छवि का चमकदार चेहरा। लेकिन ज़मीनी हकीकत कभी-कभी इतनी विडंबनापूर्ण होती है कि वह इन दावों का मज़ाक बनाकर रख देती है। छत्तीसगढ़ में महिला एवं बाल विकास विभाग की साड़ी खरीदी का ताज़ा मामला भी कुछ ऐसा ही है जहां साड़ी की लंबाई कम हुई है, लेकिन सवालों की सूची लंबी होती जा रही है।

करीब 9.7 करोड़ रुपए की लागत से गुजरात के सूरत से खरीदी गई साड़ियां, जो आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं के सम्मान का प्रतीक बननी थीं, अब उपहास और आक्रोश का कारण बन गई हैं। जिन महिलाओं के कंधों पर पोषण, शिक्षा और समाज के सबसे निचले तबके तक सरकारी योजनाएं पहुंचाने की जिम्मेदारी है, उन्हें ऐसी साड़ियां दी गईं जिन्हें पहनना तक मुश्किल हो गया। कहीं लंबाई कम, कहीं रंग धोते ही गायब, और कहीं कपड़ा ऐसा कि बाजार में आधी कीमत पर भी लोग दो बार सोचें। यह केवल गुणवत्ता की समस्या नहीं, बल्कि नीयत की गुणवत्ता का भी आईना है। 

विडंबना देखिए वर्क ऑर्डर में साड़ी की लंबाई 6.3 मीटर तय की गई थी लेकिन वितरण के बाद यह लंबाई 5 मीटर तक सिमट गई। ऐसा लगता है जैसे साड़ी ही नहीं, पूरी व्यवस्था “डाइटिंग” पर चली गई हो। फर्क बस इतना है कि इस डाइटिंग से किसी का वजन नहीं, बल्कि जनता का भरोसा कम हो रहा है।

अब सवाल यह है कि यह सब हुआ कैसे ? क्या यह मान लिया जाए कि करोड़ों की खरीदी में गुणवत्ता जांच महज औपचारिकता थी ? या फिर यह माना जाए कि जांच करने वालों की नजरें भी उसी तरह “सिकुड़” गई थीं, जैसे साड़ी धोने के बाद सिकुड़ रही है ? सरकारी तंत्र में यह एक पुराना खेल है फाइलों में सब कुछ परफेक्ट, जमीन पर सब कुछ संदिग्ध। कागज़ों पर साड़ी पूरी लंबाई की, लेकिन हकीकत में कटौती का ऐसा हुनर कि दर्जी भी शरमा जाए।

सरकार की मंशा पर बात करना भी इस समय जरूरी है। योजनाएं बनाते वक्त सरकार यह संदेश देना चाहती है कि वह अपने जमीनी कार्यकर्ताओं के प्रति संवेदनशील है। लेकिन जब क्रियान्वयन इस स्तर का हो, तो यह संवेदनशीलता संदेह में बदल जाती है। क्या सरकार को इस गड़बड़ी की जानकारी नहीं थी ? अगर नहीं थी, तो यह प्रशासनिक विफलता है और अगर थी तो यह और भी गंभीर सवाल खड़े करता है,क्या जानबूझकर आंखें मूंद ली गईं?

राज्य की महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े का इस मसले पर बयान आया है कि “जहां-जहां खराब साड़ियाँ गई हैं, उन्हें वापस किया जाएगा।” सुनकर ऐसा लगा जैसे साड़ियों की नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों की ‘रिटर्न पॉलिसी’ लागू हो गई हो। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या मंत्री को इस खरीदी की गुणवत्ता का अंदाजा नहीं था? या फिर यह मामला उनकी प्राथमिकताओं में कहीं पीछे छूट गया? यदि मंत्री स्तर पर ही ऐसी लापरवाही नजर आए, तो नीचे के अधिकारियों से क्या उम्मीद की जा सकती है?

इस पूरे प्रकरण का सबसे दिलचस्प और दुखद पहलू यह है कि इसमें नुकसान केवल पैसों का नहीं हुआ, बल्कि भरोसे का भी हुआ है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, जो पहले से ही सीमित संसाधनों में काम करती हैं, अब खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही हैं। जिनके लिए यह साड़ी सम्मान का प्रतीक होनी चाहिए थी, वह अब उनके लिए एक “समस्या” बन गई है। यह स्थिति केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि संवेदनशीलता की कमी को भी दर्शाती है। यह साड़ी घोटाला भी कुछ ऐसा ही कर रहा है। विपक्ष के लिए यह मुद्दा तैयार है, जनता के बीच यह चर्चा का विषय बन चुका है, और सोशल मीडिया पर यह व्यंग्य का नया केंद्र बन गया है। लोग कह रहे हैं “साड़ी ही नहीं, सरकार की साख भी सिकुड़ गई है।”

 एक सवाल यह भी है कि जिस “खादी और ग्रामोद्योग” को आत्मनिर्भरता और गुणवत्ता का प्रतीक माना जाता है, उसी के जिम्मे यह खरीदी थी। यह वही खादी है, जिसे कभी स्वदेशी और स्वाभिमान का प्रतीक कहा जाता था। लेकिन इस मामले में यह प्रतीक भी सवालों के घेरे में आ गया है। क्या खादी अब केवल नाम भर रह गई है, और गुणवत्ता कहीं पीछे छूट गई है? या फिर गुजरात के सूरत शहर के जिस साड़ी निर्माता को यह ठेका दिया गया उसका खादी से कोई वास्ता ही नहीं। 

इस पूरे घटनाक्रम में एक पैटर्न भी नजर आता है, छोटी-छोटी कटौतियों का बड़ा खेल। कहीं लंबाई में कटौती, कहीं गुणवत्ता में, और कहीं जवाबदेही में। यह कटौती केवल साड़ी तक सीमित नहीं रहती, बल्कि धीरे-धीरे सिस्टम की आत्मा को भी काटने लगती है। और जब यह प्रक्रिया लंबे समय तक चलती है, तो भ्रष्टाचार “अपवाद” नहीं, बल्कि “व्यवस्था” बन जाता है।

अब सवाल यह है कि आगे क्या ? क्या इस मामले की जांच होगी ? क्या जिम्मेदारों पर कार्रवाई होगी ? या फिर यह मामला भी उन फाइलों में दफन हो जाएगा, जहां पहले से ही कई “घोटाले” धूल खा रहे हैं ? अनुभव कहता है कि शोर कुछ दिनों तक रहेगा, बयानबाजी होगी, और फिर धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य हो जाएगा। लेकिन हर बार की तरह इस बार भी एक चीज पीछे छूट जाएगी—जनता का भरोसा।

सरकार के लिए यह समय आत्ममंथन का है। योजनाएं बनाना आसान है, लेकिन उन्हें ईमानदारी से लागू करना ही असली चुनौती है। यदि जमीनी स्तर पर ही ऐसी गड़बड़ियां होती रहेंगी, तो बड़े-बड़े दावे भी खोखले साबित होंगे। और जब जनता का भरोसा डगमगाने लगे, तो कोई भी “विकास” का नारा उसे संभाल नहीं सकता।

अंततः, यह मामला हमें एक कड़वी सच्चाई की याद दिलाता है—भ्रष्टाचार हमेशा बड़े घोटालों में ही नहीं होता, वह छोटी-छोटी कटौतियों में भी छिपा होता है। और जब ये छोटी कटौतियां मिलकर एक बड़ा रूप ले लेती हैं, तो वह केवल आर्थिक नुकसान नहीं पहुंचातीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता को भी कमजोर कर देती हैं।

 इस “छोटी साड़ी” की कहानी दरअसल बहुत बड़ी है। यह केवल कपड़े की लंबाई की नहीं, बल्कि नीयत की गहराई की कहानी है। और जब नीयत ही छोटी हो जाए, तो फिर किसी भी योजना की लंबाई बढ़ाने से क्या फर्क पड़ता है? कुल मिलाकर, साड़ी का रंग भले ही फीका पड़ गया हो लेकिन इस पूरे मामले ने सिस्टम के रंग जरूर गहरे कर दिए हैं—और वो भी ऐसे कि अब धुलने से भी नहीं जाएंगे ! 

© all rights reserved TODAY छत्तीसगढ़ 2018
todaychhattisgarhtcg@gmail.com