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रंगों की होली: राज्य की सभी देशी और विदेशी मदिरा दुकानें रहेंगी बंद


रायपुर।
  TODAY छत्तीसगढ़  /   होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि उमंग, उल्लास और सामाजिक मेल-मिलाप का प्रतीक है। लेकिन इस बार छत्तीसगढ़ में होली का रंग कुछ अलग तरह से बदला हुआ नजर आ रहा है। कुछ दिन पहले जब राज्य सरकार द्वारा तीन ‘ड्राई डे’ समाप्त करने की खबर सामने आई थी, तब यह खबर जितनी अखबारों और सोशल मीडिया की सुर्खियों में रही, उससे कहीं अधिक उत्साह शराब के शौकीनों के बीच देखा गया। खासतौर पर जब यह स्पष्ट हुआ कि इस सूची में होली जैसे बड़े त्योहार का नाम भी शामिल है, तब कई लोगों ने यह मान लिया था कि इस बार की होली पहले से अधिक ‘रंगीन’ और ‘नशीली’ होगी।

गांवों की चौपालों से लेकर शहरों के क्लबों और होटलों तक, यह चर्चा आम हो गई थी कि इस बार त्योहार के दिन भी शराब की दुकानें खुली रहेंगी। कई लोगों ने तो अपनी योजनाएं भी इसी हिसाब से बनानी शुरू कर दी थीं। लेकिन जैसे-जैसे इस फैसले पर सामाजिक और नैतिक स्तर पर सवाल उठने लगे, सरकार ने भी इस मुद्दे की संवेदनशीलता को समझा। त्योहार केवल व्यक्तिगत आनंद का अवसर नहीं होता, बल्कि वह समाज की सामूहिक चेतना और परंपराओं का भी प्रतीक होता है। यही कारण है कि अंततः राज्य सरकार ने अपने फैसले पर पुनर्विचार किया और एक नया आदेश जारी कर दिया। इस संबंध में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने अपने X हेंडल पर ट्वीट किया है। 

छत्तीसगढ़ शासन के वाणिज्यिक कर (आबकारी) विभाग द्वारा जारी ताजा आदेश के अनुसार, 4 मार्च 2026 को होली के दिन पूरे प्रदेश में ‘शुष्क दिवस’ (Dry Day) घोषित किया गया है। इस दिन राज्य की सभी देशी और विदेशी मदिरा दुकानें, होटल, रेस्टोरेंट-बार और क्लब पूरी तरह बंद रहेंगे। महानदी भवन से जारी इस आदेश में स्पष्ट किया गया है कि केवल शराब दुकानें ही नहीं, बल्कि भांग और भांगघोटा की फुटकर दुकानें भी बंद रखने के निर्देश दिए गए हैं।

यह फैसला केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि त्योहार की मूल भावना को संरक्षित रखने का प्रयास भी माना जा रहा है। शासन ने यह भी स्पष्ट किया है कि किसी भी निजी क्लब, स्टार होटल या गैर-मालिकाना प्रतिष्ठानों में मदिरा परोसने की अनुमति नहीं होगी। इसके साथ ही व्यक्तिगत भंडारण और गैर-लाइसेंस प्राप्त परिसरों में शराब रखने पर भी सख्त प्रतिबंध लगाया गया है।

प्रशासन ने इस आदेश को प्रभावी बनाने के लिए उड़नदस्तों को सक्रिय कर दिया है। इन्हें निर्देश दिए गए हैं कि अवैध परिवहन, बिक्री या भंडारण की सघन जांच की जाए और नियमों का उल्लंघन करने वालों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। यह कदम इस बात का संकेत है कि सरकार इस आदेश को केवल कागजों तक सीमित नहीं रखना चाहती, बल्कि उसे जमीनी स्तर पर पूरी गंभीरता से लागू करना चाहती है।

वर्दी के साए में पले सपनों की उड़ान: जब पुलिस परिवार की बेटियों ने रचा सफलता का नया इतिहास


बिलासपुर। 
 TODAY छत्तीसगढ़  /   वर्दी केवल कर्तव्य का प्रतीक नहीं होती, वह त्याग, अनुशासन और अनगिनत अधूरे पारिवारिक पलों की भी साक्षी होती है। दिन-रात की ड्यूटी, त्योहारों पर घर से दूर रहना, और हर समय जिम्मेदारियों का बोझ, यह सब पुलिसकर्मियों के जीवन का हिस्सा होता है। लेकिन इन्हीं कठिन परिस्थितियों के बीच, जब उनके बच्चे अपने सपनों को साकार करते हैं, तो वह सफलता केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे पुलिस परिवार की सामूहिक जीत बन जाती है। बिलासपुर में ऐसा ही एक भावुक और गौरवपूर्ण क्षण तब सामने आया, जब विशेष शाखा में पदस्थ प्रधान आरक्षक सतलोक साय पैकरा की सुपुत्री कु. स्वाति पैकरा ने प्रथम प्रयास में ही सिविल जज बनकर न्यायपालिका में अपनी जगह बनाई।

यह उपलब्धि केवल एक परीक्षा पास करने की कहानी नहीं है, बल्कि उस संघर्ष, अनुशासन और प्रेरणा की कहानी है, जो एक पुलिस परिवार के वातावरण में स्वाभाविक रूप से बच्चों के व्यक्तित्व में समाहित हो जाती है। स्वाति पैकरा बचपन से ही मेधावी और लक्ष्य के प्रति समर्पित रही हैं। उन्होंने डी.पी. विप्र कॉलेज, बिलासपुर से बीए एलएलबी की पढ़ाई पूरी की और बिना किसी दूसरे प्रयास के सीधे न्यायिक सेवा में चयनित होकर यह साबित कर दिया कि यदि इरादे मजबूत हों, तो परिस्थितियां रास्ता नहीं रोक सकतीं।

इस गौरवपूर्ण अवसर पर पुलिस महानिरीक्षक रामगोपाल गर्ग का व्यवहार केवल एक वरिष्ठ अधिकारी का नहीं, बल्कि एक संरक्षक और अभिभावक का था। जब स्वाति अपने पिता सतलोक साय पैकरा और जोनल पुलिस अधीक्षक विशेष शाखा श्रीमती दीपमाला कश्यप के साथ उनके कार्यालय पहुंचीं, तो वहां का माहौल औपचारिक कम और पारिवारिक अधिक था। श्री गर्ग ने स्वाति को पुष्पगुच्छ और स्मरणिका भेंट कर सम्मानित किया, मिठाई खिलाई और उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए जीवन की एक महत्वपूर्ण सीख भी दी कि जीवन में आने वाली हर चुनौती का सामना ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा के साथ करना ही सच्ची सफलता का मार्ग है।

उस क्षण की सबसे मार्मिक तस्वीर वह थी, जब प्रधान आरक्षक सतलोक साय पैकरा अपनी बेटी को आईजीपी के हाथों सम्मानित होते देख भावुक हो उठे। एक पिता के लिए यह क्षण केवल गर्व का नहीं, बल्कि उन वर्षों की मेहनत और त्याग का प्रतिफल था, जब उन्होंने अपनी जिम्मेदारियों के बीच अपनी बेटी के सपनों को पंख देने का प्रयास किया।

इसी तरह की एक और प्रेरणादायक कहानी प्रधान आरक्षक (चालक)  उमाकांत कौशिक और श्रीमती मंदाकिनी कौशिक की सुपुत्री कु. संध्या कौशिक की है। संध्या ने न केवल कक्षा 12वीं में प्रदेश में सर्वोच्च अंक प्राप्त किए, बल्कि नीट परीक्षा में सफलता प्राप्त कर सिम्स, बिलासपुर से एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की। अपनी असाधारण प्रतिभा और समर्पण के बल पर उन्होंने एमबीबीएस के दौरान कुल पांच गोल्ड मेडल प्राप्त किए, जिनमें आप्थैल्मोलॉजी में सर्वोच्च अंक के लिए गोल्ड मेडल, डॉ. रमेश चन्द्र तिवारी मेमोरियल धन्वंतरि गोल्ड मेडल और डॉ. श्रुति चंद्राकर मेमोरियल गोल्ड मेडल शामिल हैं। वर्तमान में संध्या कौशिक केयर हॉस्पिटल, हैदराबाद में रेडियोलॉजी विषय में पोस्ट ग्रेजुएशन कर रही हैं, जो उनके निरंतर आगे बढ़ने के संकल्प का प्रमाण है।

इन दोनों बेटियों की उपलब्धियों पर पुलिस महानिरीक्षक रामगोपाल गर्ग ने न केवल उन्हें सम्मानित किया, बल्कि उनके अभिभावकों को भी बधाई देते हुए कहा कि पुलिस परिवार के बच्चे सीमित समय और संसाधनों के बावजूद अपनी प्रतिभा और परिश्रम से हर क्षेत्र में उत्कृष्टता प्राप्त कर रहे हैं। उन्होंने आश्वस्त किया कि पुलिस विभाग हमेशा अपने परिवार के बच्चों की शिक्षा और करियर को प्रोत्साहित करने के लिए तत्पर रहेगा।

वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक बिलासपुर रजनेश सिंह ने भी स्वाति पैकरा और संध्या कौशिक की सफलता को पूरे पुलिस परिवार के लिए गर्व का विषय बताया। उन्होंने कहा कि जब पुलिसकर्मियों की बेटियां न्यायपालिका और चिकित्सा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाती हैं, तो यह केवल उनके परिवार ही नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा बनता है।

जोनल पुलिस अधीक्षक विशेष शाखा श्रीमती दीपमाला कश्यप ने बताया कि अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (गुप्तवार्ता) श्री अमित कुमार ने भी स्वाति और संध्या दोनों की उपलब्धियों पर हर्ष व्यक्त करते हुए उन्हें और उनके अभिभावकों को हार्दिक बधाई दी है। यह सम्मान और शुभकामनाएं इस बात का प्रमाण हैं कि पुलिस विभाग अपने परिवार के हर सदस्य की सफलता को अपनी सफलता मानता है।

स्वाति पैकरा और संध्या कौशिक की कहानियां केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों की कहानी नहीं हैं, बल्कि यह उन अनगिनत पुलिस परिवारों के संघर्ष, विश्वास और उम्मीदों की कहानी हैं, जो हर दिन कर्तव्य और परिवार के बीच संतुलन बनाने का प्रयास करते हैं। यह सफलता बताती है कि वर्दी की सख्ती के पीछे एक संवेदनशील हृदय भी होता है, जो अपने बच्चों के सपनों को साकार होते देख गर्व और खुशी से भर उठता है।

आज जब स्वाति न्याय की कुर्सी की ओर बढ़ रही हैं और संध्या चिकित्सा के क्षेत्र में नई ऊंचाइयों को छू रही हैं, तब यह केवल उनके परिवार की नहीं, बल्कि पूरे पुलिस विभाग और समाज की जीत है। यह संदेश भी है कि सपनों की कोई सीमा नहीं होती—यदि संकल्प मजबूत हो, तो वर्दी की छाया में पले सपने भी आसमान को छू सकते हैं। 

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BILASPUR POLICE: महालक्ष्मी में लूट से पहले भाजपा पार्षद बंधू मौर्य के हत्या की थी साजिश, नारद मुख्य कड़ी


बिलासपुर। 
 TODAY छत्तीसगढ़  /  सराफा कारोबारी संतोष तिवारी से हुई तीन करोड़ रुपये की सनसनीखेज लूट के मामले की जांच के दौरान पुलिस को एक और चौंकाने वाला खुलासा हाथ लगा है। गिरफ्तार आरोपितों से पूछताछ में भाजपा पार्षद एवं एमआईसी सदस्य बंधु मौर्य की हत्या की सुपारी दिए जाने का मामला सामने आया है। इस मामले में पुलिस ने भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा के बेलतरा पूर्वी मंडल अध्यक्ष राजू सोनकर और शहर के निगरानी बदमाश नारद उर्फ सुमित श्रीवास को गिरफ्तार कर लिया है।

जिले के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक रजनेश सिंह ने सोमवार को बिलासा गुड़ी में आयोजित पत्रकार वार्ता में मामले का खुलासा करते हुए बताया कि सराफा कारोबारी लूटकांड में गिरफ्तार एक आरोपित ने पूछताछ के दौरान बताया कि राजू सोनकर ने बंधु मौर्य की हत्या कराने के लिए नारद श्रीवास को 25 लाख रुपये की सुपारी दी थी। इस सौदे के तहत छह लाख रुपये एडवांस भी दिए गए थे। पुलिस ने खुलासे के आधार पर त्वरित कार्रवाई करते हुए राजू सोनकर और नारद श्रीवास को गिरफ्तार कर लिया है। 

एसएसपी ने बताया कि जांच में सामने आया है कि 27 खोली क्षेत्र निवासी नारद श्रीवास ने करीब चार महीने पहले मध्यप्रदेश के अनूपपुर जिले के निवासी विनोद उर्फ बिन्त्रू प्रजापति से संपर्क किया था। उसने विनोद को “बड़ा काम” होने की बात कहकर बिलासपुर बुलाया। इसके बाद विनोद अपने साथियों विजय लांबा, रिंकू गगनदीप और आमिर के साथ बिलासपुर पहुंचा और सभी आरोपित होटल सेलिब्रेशन में ठहरे।

यहीं पर चांटीडीह निवासी राजू सोनकर और नारद श्रीवास ने आरोपितों के साथ बैठक की। बैठक में बंधु मौर्य के साथ रास्ते को लेकर हुए विवाद का हवाला देते हुए उनकी हत्या की सुपारी 25 लाख रुपये में तय की गई। इस दौरान छह लाख रुपये एडवांस के रूप में आरोपितों को दिए गए। हत्या की साजिश को अंजाम देने से पहले आरोपितों ने बंधु मौर्य की गतिविधियों की रेकी की। रेकी के दौरान यह जानकारी जुटाई गई कि बंधु मौर्य प्रतिदिन शाम को घर लौटते समय अपने साथ पांच से दस लाख रुपये तक नकद रखते हैं। 

पुलिस के अनुसार आरोपितों ने 18 दिसंबर को चांटीडीह कॉम्पलेक्स के पास बंधु मौर्य को रोककर लूट और हत्या की संयुक्त वारदात को अंजाम देने की योजना बनाई थी। हालांकि, आरोपित अपनी योजना में सफल नहीं हो सके और वारदात को अंजाम दिए बिना ही वहां से भाग निकले। इसके बाद आरोपितों ने अपने खर्च की भरपाई करने के उद्देश्य से 19 दिसंबर की सुबह करीब छह बजे जबड़ापारा क्षेत्र में होटल व्यवसायी लखन देवांगन उर्फ निटी को लूटने का प्रयास किया, लेकिन इस वारदात में भी उन्हें सफलता नहीं मिली।

दोनों वारदातों में असफल रहने के बाद सभी आरोपित बिलासपुर से भागकर मध्यप्रदेश के अनूपपुर चले गए। पुलिस ने सराफा कारोबारी संतोष तिवारी लूटकांड की जांच के दौरान तकनीकी साक्ष्यों और पूछताछ के आधार पर आरोपितों को गिरफ्तार किया, जिसके बाद इस सुपारी कांड का खुलासा हुआ।

एसएसपी रजनेश सिंह ने बताया कि मामले में शामिल अन्य आरोपितों की भूमिका की भी जांच की जा रही है। साथ ही सुपारी किलिंग की साजिश में प्रयुक्त संसाधनों और आर्थिक लेनदेन के संबंध में भी विस्तृत जांच जारी है। उन्होंने कहा कि शहर में कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए इस तरह के आपराधिक तत्वों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी और किसी भी साजिश को सफल नहीं होने दिया जाएगा। 

खुद को बड़ा गुंडा बताकर गैंग को किया प्रभावित

जांच में यह भी सामने आया है कि 27 खोली निवासी नारद श्रीवास पहले डबरीपारा क्षेत्र में रहता था। उसने विनोद और विजय की गैंग के सामने खुद को बिलासपुर का बड़ा गुंडा बताया था। इतना ही नहीं, उसने प्रेस क्लब को अपना ऑफिस बताकर पुलिस और पत्रकारों से करीबी संबंध होने का दावा किया था और गिरफ्तारी की स्थिति में बचाने का भरोसा भी दिलाया था। नारद की बातों से प्रभावित होकर बाहरी बदमाश उसकी योजना में शामिल हो गए।

घर से हथियार, प्रेस आईडी और नकदी बरामद

पुलिस ने नारद श्रीवास के घर की तलाशी ली, जहां उसकी आलमारी से दो देशी कट्टा, चार से अधिक बटन चाकू, प्रेस के दो आईडी कार्ड और 5.33 लाख रुपये नकद बरामद किए गए। पुलिस के अनुसार नारद सिविल लाइन थाना क्षेत्र का निगरानी बदमाश है और उसके खिलाफ हत्या, लूट और अन्य गंभीर अपराधों सहित 11 से अधिक मामले दर्ज हैं।

पुलिस की इस कार्रवाई से शहर में सनसनी फैल गई है। एक ओर जहां लूटकांड की गुत्थी सुलझ रही है, वहीं सुपारी देकर जनप्रतिनिधि की हत्या की साजिश सामने आने से राजनीतिक और सामाजिक हलकों में भी चर्चा तेज हो गई है। पुलिस अब इस पूरे नेटवर्क और इसके पीछे की पृष्ठभूमि की गहराई से जांच कर रही है। 

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क्रांतिकारी इतिहास की अनकही धाराओं को सामने लाती डॉ. लोकेश शरण की नई कृति


रायपुर।
  TODAY छत्तीसगढ़  /  राजधानी रायपुर के वृंदावन हॉल में सुप्रसिद्ध इतिहासकार, वरिष्ठ पत्रकार एवं शोधकर्ता डॉ. लोकेश कुमार शरण की पुस्तक "भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की क्रांतिकारी धाराएं" का विमोचन केवल एक औपचारिक साहित्यिक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उस पक्ष को पुनः सामने लाने का प्रयास था, जिसे लेखक और कई विद्वान अब तक उपेक्षित या आंशिक रूप से प्रस्तुत मानते हैं। श्लोक ध्वनि फाउंडेशन और अखिल भारतीय साहित्य परिषद के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित यह समारोह अपने उद्देश्य और वैचारिक संदेश दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण रहा।

इस पुस्तक की मूल प्रेरणा लेखक की उस जिज्ञासा और असंतोष में निहित है, जो उन्हें पाठ्यपुस्तकों में क्रांतिकारी आंदोलन की सीमित उपस्थिति देखकर हुआ। डॉ. लोकेश शरण का यह कथन कि "क्रांतिकारियों का इतिहास न तो पूरी तरह सामने आया है और न ही सही ढंग से प्रस्तुत किया गया है", केवल एक व्यक्तिगत अनुभव नहीं बल्कि इतिहास लेखन की एक व्यापक बहस को भी प्रतिबिंबित करता है। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को लंबे समय तक मुख्यतः अहिंसक संघर्ष के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया गया, जबकि सशस्त्र क्रांति और उग्र राष्ट्रवादी धाराओं की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण और प्रभावशाली रही। इस दृष्टि से यह पुस्तक इतिहास के बहुआयामी स्वरूप को सामने लाने का प्रयास करती है।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि डॉ. पूर्णेंदु सक्सेना द्वारा "वंदे मातरम् से बड़ी तोप अंग्रेजों के पास नहीं थी" जैसा कथन इस बात का प्रतीक है कि स्वतंत्रता संग्राम केवल भौतिक संघर्ष नहीं, बल्कि एक गहन सांस्कृतिक और भावनात्मक आंदोलन भी था। राष्ट्रगीत और प्रतीकों ने जनता के मन में जो चेतना और साहस पैदा किया, वह औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध सबसे प्रभावी मनोवैज्ञानिक हथियार बना। यह पुस्तक भी उसी भावनात्मक और वैचारिक ऊर्जा को ऐतिहासिक तथ्यों के माध्यम से पुनः स्थापित करने का प्रयास करती प्रतीत होती है। 

अटल बिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. ए.डी.एन. वाजपेयी ने कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए अपने वक्तव्य में इस पुस्तक की वैचारिक और ऐतिहासिक महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा कि "भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की क्रांतिकारी धाराएं" स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े अनेक स्थापित अनुमानों और पारंपरिक व्याख्याओं को चुनौती देने का साहसिक प्रयास करती है। उनके अनुसार यह कृति केवल घटनाओं का संकलन भर नहीं, बल्कि इतिहास की विभिन्न और अक्सर उपेक्षित धाराओं को एक सूत्र में पिरोने का गंभीर और शोधपरक प्रयास है।

उन्होंने कहा कि डॉ. लोकेश शरण ने इस पुस्तक के माध्यम से स्वतंत्रता आंदोलन के बहुआयामी स्वरूप को सामने लाने का कार्य किया है, जिससे पाठकों को इतिहास की एक व्यापक और संतुलित समझ विकसित करने का अवसर मिलेगा। डॉ. वाजपेयी ने विश्वास व्यक्त किया कि यह कृति न केवल शोधार्थियों और इतिहास के विद्यार्थियों के लिए उपयोगी सिद्ध होगी, बल्कि आम पाठकों के बीच भी इतिहास के प्रति नई जिज्ञासा और दृष्टि का संचार करेगी।

उन्होंने यह भी कहा कि इस पुस्तक के माध्यम से डॉ. लोकेश शरण ने इतिहास लेखन के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण और विशिष्ट पहचान बनाने की दिशा में सार्थक कदम बढ़ाया है, और भविष्य में वे देश के प्रमुख इतिहासकारों में अपना स्थान सुनिश्चित करेंगे।

पुस्तक की एक उल्लेखनीय विशेषता, जैसा कि विद्वानों ने रेखांकित किया, यह है कि इसमें इतिहासकार की तथ्यपरकता और पत्रकार की सहज भाषा का संयोजन है। डॉ. वंश गोपाल और शशांक शर्मा जैसे विद्वानों ने इस बात पर बल दिया कि यह कृति केवल शोधार्थियों तक सीमित नहीं, बल्कि सामान्य पाठकों के लिए भी समान रूप से पठनीय है। चौरी-चौरा कांड जैसे प्रसंगों की तथ्यपरक और गहन प्रस्तुति इस पुस्तक के शोधपरक आधार को मजबूत बनाती है और यह दर्शाती है कि लेखक ने पारंपरिक व्याख्याओं से आगे बढ़कर नए दृष्टिकोण प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।

हालाँकि, इस प्रकार की कृतियों के संदर्भ में यह भी आवश्यक है कि पाठक और इतिहासकार दोनों एक संतुलित दृष्टिकोण बनाए रखें। इतिहास का पुनर्पाठ और स्थापित मान्यताओं को चुनौती देना एक स्वस्थ बौद्धिक प्रक्रिया है, लेकिन इसके लिए स्रोतों की प्रमाणिकता, वस्तुनिष्ठता और आलोचनात्मक दृष्टि भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि यह पुस्तक ठोस प्राथमिक स्रोतों और निष्पक्ष विश्लेषण पर आधारित है, तो यह निश्चित रूप से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अध्ययन में एक महत्वपूर्ण योगदान सिद्ध हो सकती है।

समग्रतः, "भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की क्रांतिकारी धाराएं" का विमोचन केवल एक पुस्तक का प्रकाशन नहीं, बल्कि इतिहास के उस अध्याय को पुनः पढ़ने और समझने का आमंत्रण है, जो राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों का बलिदान देने वाले अनगिनत क्रांतिकारियों की स्मृति से जुड़ा है। ऐसे प्रयास न केवल ऐतिहासिक चेतना को समृद्ध करते हैं, बल्कि नई पीढ़ी में अपने अतीत के प्रति जिज्ञासा, सम्मान और समझ विकसित करने में भी सहायक होते हैं।

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