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बंद कमरे में सिगड़ी बनी काल, दंपती और मासूम बेटी की दम घुटने से मौत


सूरजपुर।
  TODAY छत्तीसगढ़  / ठंड से बचने की कोशिश एक परिवार के लिए जानलेवा साबित हो गई। कोतवाली थाना क्षेत्र के कोट चन्दरपुर गांव में मंगलवार रात बंद कमरे में सिगड़ी जलाकर सोए पति-पत्नी और उनकी चार वर्षीय मासूम बेटी की दम घुटने से मौत हो गई। घटना से पूरे गांव में शोक की लहर है।

मिली जानकारी के अनुसार 28 वर्षीय कवल सिंह, उनकी 25 वर्षीय पत्नी कुंती और चार साल की बेटी रात में कमरे के भीतर पत्थर कोयले की सिगड़ी जलाकर सो गए थे। जिस कमरे में वे सो रहे थे, वहां न तो खिड़की थी और न ही रोशनदान। देर रात सिगड़ी से उठे धुएं और जहरीली गैस के कारण कमरे में घुटन बढ़ती गई और तीनों की मौत हो गई।

आज बुधवार सुबह देर तक घर से कोई गतिविधि नहीं दिखने पर पड़ोसियों को आशंका हुई। दरवाजा खुलवाने पर तीनों को अचेत अवस्था में पाया गया। सूचना मिलते ही कोतवाली पुलिस मौके पर पहुंची और जांच शुरू की। शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है। पुलिस का कहना है कि प्रारंभिक जांच में दम घुटने से मौत की आशंका है। मामले की विस्तृत जांच की जा रही है। इस हृदयविदारक हादसे के बाद गांव में मातम पसरा है और परिजन बदहवास हैं।

मुख्यमंत्री ने मुख्य न्यायाधीश की माता श्रीमती कुसुम सिन्हा को दी श्रद्धांजलि

बिलासपुर।  TODAY छत्तीसगढ़  /  मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश श्री रमेश सिन्हा की माता स्वर्गीय श्रीमती कुसुम सिन्हा को श्रद्धांजलि अर्पित की। श्रीमती सिन्हा का 15 फरवरी को निधन हो गया था।

    मुख्यमंत्री ने  बिलासपुर के बोदरी स्थित मुख्य न्यायाधीश निवास में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में पहुंचकर श्रीमती सिन्हा के छायाचित्र पर पुष्प अर्पित किए और दिवंगत आत्मा की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना की। उन्होंने शोक संतप्त परिवारजनों  से मुलाकात कर उन्हें ढाढ़स बंधाया और कहा कि माता जी का स्नेह, संस्कार और त्याग जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है। श्रीमती कुसुम सिन्हा का सरल, स्नेहमयी और अनुपम स्वभाव सदैव स्मरणीय रहेगा। इस अवसर पर केंद्रीय शहरी विकास राज्य मंत्री एवं सांसद श्री तोखन साहू, स्कूल शिक्षा मंत्री श्री गजेन्द्र यादव, पूर्व राज्यपाल श्री रमेश बैस, विधायक श्री सुशांत शुक्ला ने भी श्रद्धांजलि अर्पित कर शोक संवेदना व्यक्त की। कार्यक्रम में उच्च न्यायालय और अधीनस्थ न्यायालयों के न्यायाधीगण, अधिवक्तागण, महाधिवक्ता कार्यालय के अधिकारी, मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव, पुलिस महानिदेशक,संभागायुक्त, आईजी, कलेक्टर सहित जिला प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी भी श्रद्धांजलि कार्यक्रम में उपस्थित रहे।

अवैध खनन जांच के दौरान मारपीट, मौत: कुसमी एसडीएम करूण डहरिया निलंबित


रायपुर/बलरामपुर। 
 TODAY छत्तीसगढ़  / अवैध बॉक्साइट खनन की जांच के दौरान ग्रामीणों से मारपीट और एक आदिवासी की मौत के मामले में राज्य सरकार ने कुसमी एसडीएम करूण डहरिया को निलंबित कर दिया है। घटना के बाद जिले में हालात तनावपूर्ण हो गए थे। ग्रामीणों के बढ़ते दबाव के बीच एसडीएम समेत चार लोगों के खिलाफ अपराध दर्ज कर जांच शुरू कर दी गई है।

जानकारी के अनुसार बलरामपुर जिले के कुसमी ब्लॉक अंतर्गत हंसपुर गांव में 15 फ़रवरी की रात खनन क्षेत्र में विवाद की स्थिति बनी। आरोप है कि एसडीएम करूण डहरिया निजी थार वाहन से कुछ लोगों के साथ मौके पर पहुंचे थे। इसी दौरान तीन ग्रामीणों से कहासुनी हो गई। आरोप है कि एसडीएम और उनके साथ मौजूद लोगों ने रॉड और लाठी-डंडों से ग्रामीणों की पिटाई कर दी। मारपीट में 62 वर्षीय रामनरेश की मौत हो गई, जबकि अन्य घायल हो गए।

घायलों ने बताया कि वे गेहूं के खेत में सिंचाई कर घर लौट रहे थे, तभी टीम से उनका सामना हुआ। घटना की जानकारी मिलते ही गांव में आक्रोश फैल गया और ग्रामीणों ने कार्रवाई की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन किया। प्रकरण को लेकर कई सवाल भी उठ रहे हैं। चर्चा है कि एसडीएम सरकारी वाहन के बजाय निजी थार गाड़ी से गए थे। साथ में राजस्व विभाग के कर्मचारियों के बजाय निजी लोग मौजूद थे। सूत्रों के अनुसार घटना के बाद नायब तहसीलदार को मौके पर बुलाया गया। 

ग्रामीणों के आंदोलन के बाद पुलिस ने एसडीएम समेत चार लोगों के खिलाफ अपराध दर्ज किया है। राज्य सरकार ने मामले को गंभीरता से लेते हुए एसडीएम को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। प्रशासन का कहना है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

क्या बिलासपुर लूटकांड राज्य की कानून-व्यवस्था पर सवाल है ?


बिलासपुर के राजकिशोर नगर में सराफा व्यापारी संतोष तिवारी पर हमले और करोड़ों की लूट की घटना केवल एक आपराधिक वारदात नहीं है; यह राज्य की कानून-व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न भी खड़ा करती है। जिस दुस्साहस के साथ नकाबपोश बदमाशों ने रिहायशी और व्यस्त इलाके में व्यापारी की कार को घेरकर जानलेवा हमला किया, हथियार लहराए और करोड़ों का माल लेकर फरार हो गए, वह आम नागरिक की सुरक्षा भावना को झकझोरने वाला है।

यह घटना कई स्तरों पर चिंताजनक है। पहला, अपराधियों का आत्मविश्वास। शहर के बीचों बीच, रात के समय, योजनाबद्ध तरीके से वारदात को अंजाम देना इस बात का संकेत देता है कि उन्हें कानून के तत्काल भय का अंदेशा नहीं था। यदि आरोप सही हैं कि रेकी कर रणनीति बनाई गई, तो यह संगठित अपराध की ओर भी इशारा करता है।

दूसरा, खुफिया और निवारक तंत्र की प्रभावशीलता। सवाल यह उठता है कि क्या शहर में अपराध की संभावनाओं को लेकर पर्याप्त सतर्कता थी? क्या संवेदनशील व्यापारिक गतिविधियों से जुड़े लोगों की सुरक्षा के लिए कोई विशेष प्रावधान या निगरानी व्यवस्था थी? यदि अपराधी चोरी के वाहन लेकर आए और उन्हें घटनास्थल पर छोड़कर आगे निकल गए, तो यह जांच एजेंसियों के लिए चुनौती के साथ-साथ व्यवस्था की खामियों का संकेत भी है।

तीसरा, सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा की धारणा। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार हथियार दिखाकर दहशत फैलाना और कथित तौर पर फायरिंग जैसी आवाजें सुनाई देना यह दर्शाता है कि अपराधियों ने भीड़भाड़ वाले इलाके को भी जोखिम नहीं माना। यह स्थिति नागरिकों के मन में भय और अविश्वास पैदा करती है।

पूरी ख़बर पढ़ें - नकाबपोशों का आतंक: व्यापारी पर जानलेवा हमला, पौने चार करोड़ का सोना लूटा; पुलिस के हाथ खाली

हालांकि पुलिस ने नाकेबंदी, विशेष टीम गठन और सीसीटीवी फुटेज की जांच जैसे कदम उठाए हैं, लेकिन यह कार्रवाई घटना के बाद की है। असली प्रश्न यह है कि क्या ऐसी घटनाओं को रोका जा सकता था? कानून-व्यवस्था केवल अपराध के बाद सक्रिय होने का नाम नहीं, बल्कि अपराध की संभावना को न्यूनतम करने की क्षमता भी है।

राजनीतिक स्तर पर आरोप-प्रत्यारोप स्वाभाविक हैं, परंतु इससे आगे बढ़कर यह आवश्यक है कि सरकार और पुलिस तंत्र इस घटना को चेतावनी के रूप में लें। व्यापारिक वर्ग की सुरक्षा, रात में गश्त की सघनता, तकनीकी निगरानी और खुफिया तंत्र की मजबूती, इन सभी पर पुनर्विचार की जरूरत है।

बिलासपुर की यह घटना एक शहर तक सीमित नहीं है। यह राज्य की व्यापक सुरक्षा व्यवस्था पर विमर्श का अवसर भी है। यदि संगठित और योजनाबद्ध अपराधों के प्रति सख्त और त्वरित प्रतिक्रिया नहीं दी गई, तो अपराधियों का मनोबल बढ़ना स्वाभाविक है।

अंततः, कानून-व्यवस्था केवल आंकड़ों का विषय नहीं, बल्कि नागरिकों के विश्वास का प्रश्न है। जब आम नागरिक स्वयं को असुरक्षित महसूस करने लगे, तो यह किसी भी शासन-व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी होती है। अब देखना यह है कि यह घटना सुधार का कारण बनती है या केवल एक और ‘फाइल’ बनकर रह जाती है।

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