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बाढ़ आई तो क्या होगा? छत्तीसगढ़ में 20 अगस्त को होगा रियलिटी टेस्ट

रायपुर। TODAY छत्तीसगढ़  / प्रदेश में संभावित बाढ़ की स्थिति से निपटने के लिए प्रशासन ने तैयारियां तेज कर दी हैं। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) की राज्य स्तरीय कॉन्फ्रेंस में आपदा प्रबंधन की तैयारियों और विभागों के बीच समन्वय की समीक्षा की गई। तय किया गया कि 18 अगस्त को राज्य स्तरीय टेबल-टॉप एक्सरसाइज और 20 अगस्त को व्यापक मॉक ड्रिल आयोजित की जाएगी। अभ्यास के जरिए यह परखा जाएगा कि बाढ़ जैसी आपदा के समय राहत और बचाव एजेंसियां कितनी तेजी और प्रभावी ढंग से काम कर सकती हैं।

शून्य देरी से राहत-बचाव पर जोर

राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग की सचिव श्रीमती शम्मी आबिदी ने जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों के अधिकारियों को टेबल-टॉप एक्सरसाइज की प्रक्रिया और एसओपी को अच्छी तरह समझने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि वास्तविक आपदा की स्थिति में राहत और बचाव कार्यों में किसी तरह की देरी नहीं होनी चाहिए।

उन्होंने अधिकारियों से पूर्वाभ्यास को गंभीरता से लेने और संभावित कमियों को समय रहते दूर करने पर जोर दिया, ताकि आपदा के दौरान उपलब्ध संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल किया जा सके।

सभी विभागों के बीच बेहतर तालमेल की होगी परीक्षा

कॉन्फ्रेंस में बाढ़ के दौरान अलग-अलग विभागों की जिम्मेदारियों और उनके बीच समन्वय की विस्तृत समीक्षा की गई। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग को प्रभावित लोगों के उपचार और स्वास्थ्य सेवाओं, लोक निर्माण विभाग को क्षतिग्रस्त सड़कों एवं अधोसंरचना, जल संसाधन विभाग को जलस्तर एवं बांधों की निगरानी तथा पीएचई को पेयजल व्यवस्था से जुड़ी जिम्मेदारियां निभानी होंगी। पशुपालन विभाग को बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में पशुओं की सुरक्षा और आवश्यक चिकित्सा व्यवस्था सुनिश्चित करने की तैयारियों पर भी चर्चा की गई।

पुलिस से लेकर रेलवे और एयरपोर्ट तक जुड़ेंगे

राज्य स्तरीय अभ्यास में आपदा प्रबंधन से जुड़े विभिन्न विभागों और एजेंसियों को शामिल किया गया है। नगर सेना, अग्निशमन, नागरिक सुरक्षा, पुलिस मुख्यालय, रायपुर रेल मंडल, स्वामी विवेकानंद एयरपोर्ट, दूरसंचार, विज्ञान केंद्र और औद्योगिक स्वास्थ्य एवं सुरक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने बैठक में हिस्सा लिया।

इसके अलावा पंचायत, ऊर्जा, परिवहन और खाद्य विभाग के अधिकारियों की भूमिका पर भी चर्चा की गई। प्रदेश के सभी जिलों के नोडल अधिकारी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से बैठक में जुड़े।

18 अगस्त को तैयारी, 20 को जमीन पर होगा अभ्यास

प्रशासन द्वारा 18 अगस्त को टेबल-टॉप एक्सरसाइज के जरिए बाढ़ की काल्पनिक स्थिति बनाकर विभागों की कार्ययोजना और निर्णय लेने की क्षमता को परखा जाएगा। इसके बाद 20 अगस्त को मॉक ड्रिल आयोजित कर वास्तविक परिस्थितियों में राहत एवं बचाव की तैयारियों का परीक्षण किया जाएगा। इस अभ्यास का उद्देश्य आपदा के दौरान संभावित कमियों की पहचान करना और राहत-बचाव व्यवस्था को और मजबूत बनाना है।

20 दिन में फेफड़ों की 9 लोबेक्टॉमी, अंबेडकर अस्पताल ने बनाया नया कीर्तिमान

रायपुर। TODAY छत्तीसगढ़  / डॉ. भीमराव अंबेडकर स्मृति चिकित्सालय के हार्ट, चेस्ट एवं वैस्कुलर सर्जरी विभाग ने फेफड़ों की जटिल सर्जरी के क्षेत्र में नया कीर्तिमान बनाया है। विभाग ने महज 20 दिनों में 9 लोबेक्टॉमी सर्जरी सफलतापूर्वक की हैं। इस उपलब्धि के साथ पिछले दो महीनों में फेफड़ों की कुल 13 लोबेक्टॉमी सर्जरी पूरी हो चुकी हैं। खास बात यह है कि इनमें 15 वर्षीय बच्चे की सर्जरी भी शामिल है, जो विभाग में अब तक लोबेक्टॉमी कराने वाला सबसे कम उम्र का मरीज है।

15 साल के बच्चे की भी हुई जटिल सर्जरी

हार्ट, चेस्ट एवं वैस्कुलर सर्जरी विभाग के अनुसार, हालिया सर्जरी में शामिल मरीजों की उम्र 15 से 70 वर्ष के बीच रही। 15 वर्षीय बच्चे के बाएं फेफड़े के ऊपरी हिस्से में एस्परजिलोमा नामक फंगल संक्रमण था। चिकित्सकों ने संक्रमित हिस्से की लोबेक्टॉमी कर सफल उपचार किया। विभाग के लिए यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इतनी कम उम्र में इस तरह की फेफड़े की सर्जरी यहां पहली बार की गई है।

दो मरीजों की इमरजेंसी सर्जरी

इन 9 सर्जरियों में दो मरीज ऐसे थे, जिन्हें खांसी के साथ अत्यधिक रक्तस्राव यानी हेमोप्टाइसिस की शिकायत थी। उनकी स्थिति को देखते हुए आपातकालीन आधार पर सर्जरी करनी पड़ी।

चिकित्सकों ने आधुनिक तकनीक और एडवांस्ड लंग स्टेपलर की मदद से जटिल ऑपरेशन किए। विभाग के अनुसार, इस तकनीक से सर्जरी के बाद होने वाली कुछ जटिलताओं, विशेषकर ब्रोंकोप्लूरल फिस्टुला, की संभावना कम करने में मदद मिलती है।

क्या होती है लोबेक्टॉमी?

फेफड़ों को सामान्यतः अलग-अलग लोब में बांटा गया है। दाएं फेफड़े में तीन और बाएं फेफड़े में दो लोब होते हैं। जब एस्परजिलोमा, ब्रोन्किएक्टैसिस या ट्यूमर जैसी बीमारी फेफड़े के किसी एक लोब तक सीमित होती है, तो संक्रमित या प्रभावित हिस्से को ऑपरेशन के जरिए निकाल दिया जाता है। इसी प्रक्रिया को लोबेक्टॉमी कहा जाता है।

सर्जरी के दौरान प्रभावित लोब को स्वस्थ हिस्से से अलग कर विशेष तकनीक और लंग स्टेपलर की मदद से बाहर निकाला जाता है। सामान्यतः ऑपरेशन के 6 से 8 दिन बाद मरीज को अस्पताल से छुट्टी दी जाती है।

टीबी के बाद भी हो सकता है फंगल संक्रमण

चिकित्सकों के मुताबिक, छत्तीसगढ़ में फेफड़े की लोबेक्टॉमी की प्रमुख वजहों में एस्परजिलोमा और ब्रोन्किएक्टैसिस शामिल हैं। एस्परजिलोमा फेफड़े में होने वाला एक फंगल संक्रमण है, जो विशेषकर पहले टीबी से प्रभावित रहे फेफड़ों में विकसित हो सकता है।

वहीं ब्रोन्किएक्टैसिस में फेफड़ों की वायुमार्ग संरचना क्षतिग्रस्त होने के कारण संक्रमण और खांसी के साथ खून आने की समस्या हो सकती है। फेफड़े का कैंसर, लंग एब्सिस और कुछ वैस्कुलर मालफॉर्मेशन भी खांसी में खून आने के कारण हो सकते हैं।

कैंसर की शुरुआती अवस्था में भी उपयोगी

चिकित्सकों के अनुसार, यदि फेफड़े का कैंसर शुरुआती अवस्था में है और एक ही लोब तक सीमित है, तो लोबेक्टॉमी उपचार का महत्वपूर्ण विकल्प हो सकती है। इसके अलावा अस्पताल में डिकॉर्टिकेशन, सेगमेंटेक्टॉमी और न्यूमोनेक्टॉमी जैसी अन्य फेफड़ों की सर्जरी भी की जाती हैं।

सालाना 15-20 लोबेक्टॉमी, अब दो महीने में 13

अस्पताल में सामान्य तौर पर एक वर्ष में करीब 15 से 20 लोबेक्टॉमी सर्जरी की जाती रही हैं। लेकिन इस वर्ष विभाग ने महज दो महीनों में 13 लोबेक्टॉमी कर एक नया रिकॉर्ड बनाया है।

विभागाध्यक्ष डॉ. कृष्णकांत साहू के अनुसार, छत्तीसगढ़ में फेफड़ों की सबसे अधिक जटिल सर्जरी इसी विभाग में की जाती हैं। यहां इलाज के लिए छत्तीसगढ़ के अलावा बिहार, झारखंड, ओडिशा, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश से भी मरीज पहुंचते हैं।

आयुष्मान योजना के तहत निश्शुल्क इलाज

अस्पताल प्रबंधन के अनुसार, ये सभी ऑपरेशन आयुष्मान योजना के तहत निश्शुल्क किए जा रहे हैं। विभाग में अभी भी लोबेक्टॉमी के लिए कुछ मरीज उपचार की प्रतीक्षा में हैं। 


इंडिया हैबिटेट सेंटर में छत्तीसगढ़ की पंडवानी का जलवा, महाभारत की कथा ने मोहा मन

रायपुर। TODAY छत्तीसगढ़  / छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक परंपरा पंडवानी ने राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में अपनी अलग छाप छोड़ी। इंडिया हैबिटेट सेंटर के स्टाइन ऑडिटोरियम में आयोजित आईएचसी लोक संगीत सम्मेलन 2026 का शुभारंभ पद्म विभूषण से सम्मानित स्वर्गीय तीजन बाई की स्मृति को समर्पित पंडवानी प्रस्तुति से हुआ। कलाकार प्रभा यादव ने पारंपरिक संगीतकारों के साथ महाभारत की कथाओं पर आधारित पंडवानी प्रस्तुत कर दर्शकों को छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति से रूबरू कराया।

महाभारत की कथा ने बांधा समां

इंडिया हैबिटेट सेंटर में आयोजित कार्यक्रम में पंडवानी कलाकार प्रभा यादव ने पारंपरिक वाद्य और संगीतकारों के साथ प्रस्तुति दी। महाभारत की कथाओं पर आधारित इस लोक शैली में कथा वाचन, गायन, संवाद, अभिनय और लय का अनूठा मेल देखने को मिला।

पंडवानी की प्रस्तुति के दौरान छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति और परंपरा की जीवंत झलक दिखाई दी। राष्ट्रीय राजधानी के दर्शकों ने इस विशिष्ट लोक विधा की खूब सराहना की।

तीजन बाई की कला यात्रा को किया याद

कार्यक्रम की प्रस्तुति महान पंडवानी कलाकार स्वर्गीय तीजन बाई को समर्पित रही। छत्तीसगढ़ की लोक परंपरा से निकलकर पंडवानी को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाने में तीजन बाई का योगदान अहम रहा है। अपनी विशिष्ट प्रस्तुति शैली के माध्यम से उन्होंने पंडवानी को देश-दुनिया में पहचान दिलाई।

तीजन बाई की स्मृति में आयोजित इस प्रस्तुति के माध्यम से उनकी कला यात्रा और छत्तीसगढ़ की उस परंपरा को याद किया गया, जिसमें कथावाचन पीढ़ियों से सांस्कृतिक स्मृतियों और जीवन मूल्यों को आगे बढ़ाने का माध्यम रहा है।

लोक कलाएं हमारी सांस्कृतिक विरासत

इंडिया हैबिटेट सेंटर के निदेशक प्रो. (डॉ.) केजी सुरेश ने कहा कि भारत की लोक कलाएं देश की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इनमें पीढ़ियों से चली आ रही कहानियां, परंपराएं और जीवन मूल्य सुरक्षित हैं। लोक कलाकारों और पारंपरिक विधाओं को राष्ट्रीय राजधानी में मंच मिलने से इनका विस्तार व्यापक दर्शकों तक होता है।

धरसींवा विधायक एवं छत्तीसगढ़ी फिल्म कलाकार अनुज शर्मा ने कहा कि पंडवानी छत्तीसगढ़ की पहचान से जुड़ी महत्वपूर्ण लोक कला है। तीजन बाई ने इसे गांवों से निकालकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया। दिल्ली में इस परंपरा का सम्मान होना पूरे छत्तीसगढ़ के लिए गौरव की बात है।

नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास

अन्वेषा कला केंद्र की सचिव अन्वेषा ब्रह्मा ने कहा कि भारत की लोक परंपराओं में सदियों का इतिहास, सामूहिक स्मृति और जीवन-दर्शन सुरक्षित है। ऐसे आयोजन पारंपरिक कलाओं को नए दर्शकों और नई पीढ़ी से जोड़ने का काम करते हैं।

कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार एवं मुख्यमंत्री के सलाहकार आर. कृष्ण दास, धरसींवा विधायक अनुज शर्मा, प्रबल प्रताप सिंह जूदेव सहित कला एवं संस्कृति क्षेत्र से जुड़े लोग मौजूद रहे।

देश की लोक कलाओं का साझा मंच

आईएचसी लोक संगीत सम्मेलन देश के अलग-अलग हिस्सों की लोक संगीत, कथावाचन और प्रदर्शन परंपराओं को एक मंच प्रदान करता है। इस वर्ष सम्मेलन की शुरुआत छत्तीसगढ़ की पंडवानी और तीजन बाई की स्मृति में प्रस्तुति से होना विशेष महत्व रखता है।

दिल्ली के प्रतिष्ठित सांस्कृतिक मंच पर पंडवानी की प्रस्तुति ने यह संदेश भी दिया कि लोक कलाएं केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि वर्तमान में भी भारत की सांस्कृतिक पहचान और रचनात्मक ऊर्जा का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

तेलघानी नाका में ड्रग्स तस्कर गिरफ्तार, 106 ग्राम एमडीएमए जब्त

रायपुर। TODAY छत्तीसगढ़  / नशे के अवैध कारोबार के खिलाफ रायपुर कमिश्नरेट पुलिस को बड़ी सफलता मिली है। एंटी क्राइम एंड साइबर यूनिट, एंटी नारकोटिक्स टास्क फोर्स और गंज थाना पुलिस की संयुक्त टीम ने तेलघानी नाका ओवरब्रिज के नीचे से राजस्थान के एक युवक को गिरफ्तार किया है। उसके कब्जे से 106.19 ग्राम एमडीएमए और एक आईफोन बरामद हुआ है। जब्त मादक पदार्थ की कीमत करीब 20 लाख रुपये बताई गई है। पुलिस आरोपी से ड्रग्स के सप्लायर और पूरे नेटवर्क के संबंध में पूछताछ कर रही है।

मुखबिर की सूचना पर घेराबंदी

पुलिस के अनुसार, 9 अगस्त को एंटी क्राइम एंड साइबर यूनिट को सूचना मिली थी कि गंज थाना क्षेत्र के तेलघानी नाका ओवरब्रिज के नीचे बिजली ऑफिस के पास एक व्यक्ति एमडीएमए लेकर बिक्री के लिए ग्राहक का इंतजार कर रहा है। सूचना के आधार पर डीसीपी क्राइम एवं साइबर स्मृतिक राजनाला और डीसीपी मध्य क्षेत्र तारकेश्वर पटेल के निर्देशन में संयुक्त टीम गठित कर मौके पर भेजी गई।

पुलिस टीम ने बताए गए हुलिए के आधार पर संदिग्ध व्यक्ति की घेराबंदी कर उसे पकड़ा। पूछताछ में उसकी पहचान रामनिवास माचरा (22), निवासी फलोदी, राजस्थान के रूप में हुई।

बैग की तलाशी में मिली एमडीएमए की खेप

पुलिस ने आरोपी के पास मौजूद बैग की तलाशी ली तो उसमें एमडीएमए बरामद हुआ। आरोपी से मादक पदार्थ रखने और परिवहन से संबंधित दस्तावेज मांगे गए, लेकिन वह कोई वैध दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सका।

इसके बाद पुलिस ने 106.19 ग्राम एमडीएमए और एक आईफोन, कुल करीब 20 लाख रुपये कीमत का सामान जब्त किया। आरोपी के खिलाफ गंज थाने में अपराध क्रमांक 243/26 के तहत नारकोटिक एक्ट की धारा 22(ग) में मामला दर्ज किया गया है।

साथियों के कहने पर रायपुर पहुंचा था

प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने पुलिस को बताया कि वह अपने अन्य साथियों के साथ मिलकर एमडीएमए की बिक्री करता है। वह साथियों के कहने पर मादक पदार्थ की खेप लेकर रायपुर में सप्लाई करने पहुंचा था।

अब पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि एमडीएमए की खेप कहां से लाई गई थी, इसका सप्लायर कौन है और रायपुर में इसकी सप्लाई किन लोगों तक पहुंचाई जानी थी। आरोपी के अन्य साथियों और पूरे सप्लाई नेटवर्क की भी जांच की जा रही है।

73 मामलों में 163 आरोपी गिरफ्तार

रायपुर कमिश्नरेट पुलिस के अनुसार, एंटी क्राइम एंड साइबर यूनिट और एंटी नारकोटिक्स टास्क फोर्स द्वारा एनडीपीएस एक्ट के तहत अब तक 73 प्रकरणों में 163 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है। इन मामलों में बड़ी मात्रा में गांजा, एमडीएमए, प्रतिबंधित नशीली गोलियां, कोकीन, हेरोइन, ब्राउन शुगर सहित अन्य मादक पदार्थ और वाहन जब्त किए गए हैं। पुलिस का कहना है कि नशे के अवैध कारोबार के खिलाफ कार्रवाई लगातार जारी रहेगी। 


नक्सलमुक्त बस्तर में बनेगी एजुकेशन सिटी, ट्राइबल यूनिवर्सिटी पर भी सरकार की नजर

रायपुर।  TODAY छत्तीसगढ़  / मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा है कि नक्सलवाद की चुनौती से मुक्त होने के बाद छत्तीसगढ़ विकास की नई राह पर तेजी से आगे बढ़ रहा है। सरकार का लक्ष्य सरगुजा से लेकर बस्तर तक संतुलित और लक्ष्य केंद्रित विकास करना है। मुख्यमंत्री शनिवार को राजधानी के महोबा बाजार स्थित निजी होटल में आईटीवी नेटवर्क और इंडिया न्यूज के युवा मंच कार्यक्रम में शामिल हुए। इस दौरान उन्होंने नक्सलवाद, पर्यटन, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, उद्योग और युवाओं से जुड़े मुद्दों पर सरकार की प्राथमिकताएं साझा कीं। कार्यक्रम में विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट योगदान देने वाले विशिष्टजनों को सम्मानित भी किया गया।

नक्सलवाद खत्म होने से विकास को मिली रफ्तार

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि छत्तीसगढ़ के विकास में नक्सलवाद लंबे समय तक बड़ी बाधा रहा। सरकार बनने के बाद केंद्र के साथ हुई बैठकों में छत्तीसगढ़ में नक्सल समस्या की गंभीरता सामने आई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ सुरक्षा बलों ने अभियान चलाया और प्रदेश को नक्सल समस्या से मुक्त करने में सफलता हासिल की।

उन्होंने कहा कि अब नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास की गति तेज की जा रही है। सरगुजा से बस्तर तक सभी क्षेत्रों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ना सरकार की प्राथमिकता है।

चित्रकोट से धुड़मारास तक पर्यटन को बढ़ावा

मुख्यमंत्री ने कहा कि छत्तीसगढ़ में पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं। बस्तर का चित्रकोट जलप्रपात अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के कारण देश-दुनिया में पहचान रखता है। धुड़मारास गांव को संयुक्त राष्ट्र विश्व पर्यटन संगठन की दुनिया के सर्वश्रेष्ठ पर्यटन गांवों की सूची में शामिल किया गया है।

उन्होंने बताया कि धुड़मारास में बंबू राफ्टिंग और होम स्टे जैसी गतिविधियां पर्यटकों को आकर्षित कर रही हैं। राज्य की नई उद्योग नीति में पर्यटन को भी शामिल किया गया है, ताकि इस क्षेत्र में निवेश और रोजगार के अवसर बढ़ें।

युवाओं के भविष्य पर सरकार का जोर

सीएम साय ने कहा कि सरकार युवाओं के साथ लगातार संवाद कर रही है और उनके सुझावों को नीति निर्माण में महत्व दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि पीएससी में भ्रष्टाचार के मामलों में कार्रवाई की गई है और अब भर्ती परीक्षाओं में पारदर्शिता पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि युवाओं के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए सरकार प्रतिबद्ध है। बरसात के बाद रोजगार मेला आयोजित किया जाएगा, जिसमें विभिन्न उद्योगों में युवाओं को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने का प्रयास होगा।

बस्तर में एजुकेशन सिटी, ट्राइबल यूनिवर्सिटी की तैयारी

मुख्यमंत्री ने शिक्षा को विकास का मूलमंत्र बताते हुए कहा कि नक्सलमुक्त बस्तर में एजुकेशन सिटी विकसित की जा रही है। इसके लिए बजट में प्रावधान किया गया है।

उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ आदिवासी बहुल राज्य है और आसपास के राज्यों में भी बड़ी जनजातीय आबादी रहती है। ऐसे में राज्य में ट्राइबल यूनिवर्सिटी स्थापित करने की दिशा में भी प्रयास किए जा रहे हैं, ताकि जनजातीय विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा का बेहतर अवसर मिल सके।

प्रदेश में 15 मेडिकल कॉलेज, पांच नए कॉलेजों को मंजूरी

सीएम साय ने कहा कि प्रदेश में स्वास्थ्य सुविधाओं का भी विस्तार किया जा रहा है। वर्तमान में 15 मेडिकल कॉलेज संचालित हैं, जबकि पांच नए मेडिकल कॉलेजों को मंजूरी मिल चुकी है। इन कॉलेजों में कुल 250 सीटें स्वीकृत हुई हैं और इसी वर्ष पढ़ाई शुरू होने की बात कही गई।

उन्होंने बताया कि बस्तर में सुपर स्पेशलिटी अस्पताल शुरू हो चुका है, जहां ब्रेन ट्यूमर जैसे गंभीर रोगों का भी इलाज किया जा रहा है। मुख्यमंत्री स्वस्थ बस्तर अभियान के तहत 34 लाख लोगों की स्वास्थ्य जांच की गई है और करीब 40 हजार लोगों का उपचार किया गया है।

नई उद्योग नीति से 8 लाख करोड़ के एमओयू

मुख्यमंत्री ने बताया कि प्रदेश की नई उद्योग नीति के तहत करीब 8 लाख करोड़ रुपये के एमओयू किए गए हैं। सेमीकंडक्टर प्लांट, एआई डाटा सेंटर और टेक्सटाइल सेक्टर में काम आगे बढ़ रहा है।

उन्होंने कहा कि ऐसे उद्यमियों को विशेष इंसेंटिव देने का प्रावधान किया गया है, जो एक हजार युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराएंगे। सरकार का उद्देश्य उद्योगों के विस्तार के साथ स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाना है।

धर्मांतरण और भर्ती परीक्षाओं पर भी बोले सीएम

मुख्यमंत्री ने कहा कि छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण रोकने के लिए कड़ा कानून लाया गया है। अन्य राज्यों के कानूनों का अध्ययन करने के बाद धर्म स्वातंत्र्य विधेयक लाया गया है और प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन कराने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है।

कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री ने विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट योगदान देने वाले विशिष्टजनों को सम्मानित किया। इस अवसर पर राज्यसभा सांसद कार्तिकेय शर्मा, आईटीवी नेटवर्क और इंडिया न्यूज के पदाधिकारी तथा गणमान्य नागरिक मौजूद रहे।

कैमरे की कलम: वर्दी का रौब, सुप्रीम कोर्ट का तमाचा

कानून की किताबों में पुलिस को नागरिकों की सुरक्षा का प्रहरी कहा गया है। संविधान पुलिस को असीमित शक्ति नहीं देता, बल्कि उसे कानून की सीमाओं में काम करने की जिम्मेदारी देता है। लेकिन जब हिरासत में लिया गया एक व्यक्ति तीन दिन बाद अस्पताल में दम तोड़ देता है, उसके सिर में लगी चोट उसकी मौत की वजह बताई जाती है और उसकी मौत की आपराधिक जांच के लिए FIR दर्ज करने में ढाई साल से अधिक समय लग जाता है, तब सवाल सिर्फ एक मौत का नहीं रह जाता—सवाल पूरी पुलिस व्यवस्था की संवेदनशीलता, जवाबदेही और कार्यक्षमता का बन जाता है।

छत्तीसगढ़ से सामने आया यह मामला इसी सवाल को कटघरे में खड़ा करता है। और इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने तो पुलिस प्रशासन के शीर्ष स्तर पर ही ऐसा प्रश्नचिह्न लगा दिया है, जिसे नजरअंदाज करना मुश्किल है।

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की कथित लापरवाही पर कड़ी नाराजगी जताते हुए छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक (DGP) पर बेहद तल्ख टिप्पणी की। अदालत ने कहा— “हमें यह कहते हुए दुख हो रहा है कि हमें यह दर्ज करना होगा कि छत्तीसगढ़ के DGP पूरी तरह से अयोग्य हैं!”

किसी राज्य के पुलिस महानिदेशक के लिए देश की सर्वोच्च अदालत से ऐसी टिप्पणी आना अपने आप में असाधारण है। लेकिन इस टिप्पणी के पीछे जिस घटनाक्रम की परतें हैं, वे उससे भी अधिक गंभीर हैं।

मामले के अनुसार, 34 वर्षीय व्यक्ति को उसकी किराने की दुकान के सामने बिक्री के लिए शराब रखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। शराब की कथित कीमत लगभग 1,200 रुपये थी। 18 जनवरी 2024 को उसे हिरासत में लिया गया। सवाल यह नहीं है कि वह अपराधी था या नहीं। सवाल यह है कि पुलिस की हिरासत में जाने के बाद उसकी जान कैसे चली गई। गिरफ्तारी के समय उसकी मेडिकल जांच की गई थी। राज्य ने हाईकोर्ट के सामने बताया कि उस समय उसके शरीर पर कोई गंभीर चोट नहीं थी—सिर्फ लगभग 15 दिन पुरानी बताई गई थोड़ी सूजन का उल्लेख था, लेकिन महज तीन दिन बाद तस्वीर बदल चुकी थी।

21 जनवरी 2024 को उसकी तबीयत बिगड़ने पर उसे अस्पताल ले जाया गया और सुबह करीब छह बजे उसकी मौत हो गई। एक व्यक्ति पुलिस की हिरासत में गया था। तीन दिन बाद वह मृत अवस्था में बाहर आया। यहीं से राज्य की जवाबदेही शुरू होती है। 

22 जनवरी को जेल अधीक्षक ने सेशन जज को पत्र लिखकर मृतक की मौत की न्यायिक जांच कराने का अनुरोध किया। इसके बाद चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ने CrPC की धारा 176 के तहत जांच शुरू की। जांच आगे बढ़ी और संबंधित JMFC ने जुलाई 2024 में अपनी रिपोर्ट दी। रिपोर्ट में राय दी गई कि मौत सिर की चोट से उत्पन्न जटिलताओं के कारण हुई थी। यह तथ्य बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि हिरासत में हुई मौत के मामले में सबसे पहला और सबसे जरूरी सवाल यही होता है कि चोट लगी कैसे? अगर गिरफ्तारी के समय गंभीर चोट नहीं थी और हिरासत के कुछ ही दिनों बाद व्यक्ति की मौत सिर की चोट की जटिलताओं से हुई, तो यह पता लगाना राज्य की कानूनी जिम्मेदारी बन जाती है कि वह चोट किन परिस्थितियों में लगी, लेकिन यहां सवालों के जवाब तलाशने के बजाय व्यवस्था मानो फाइलों के पीछे छिप गई। यह पुलिसिंग की गति है या फाइलों की तपस्या?

मृतक की पत्नी और दो बेटियों ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। परिवार ने मांग की कि हिरासत में हुई मौत की निष्पक्ष जांच कराई जाए और उन्हें 50 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य को एक लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया। अदालत ने माना कि राज्य उन कर्मचारियों का नियोक्ता है जिनकी लापरवाही के कारण मृतक की जान गई और इसलिए मुआवजा देने की जिम्मेदारी राज्य की है।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि इस तरह के मुआवजे का उद्देश्य पुलिस और जेल अधिकारियों पर ऐसा प्रभाव डालना होना चाहिए कि भविष्य में वे ऐसी हरकत न करें जिनसे किसी व्यक्ति की जान चली जाए, लेकिन यहां एक बुनियादी सवाल रह जाता है— क्या किसी नागरिक की हिरासत में मौत की कीमत वास्तव में एक लाख रुपये हो सकती है?

मुआवजा जीवन की कीमत नहीं है। वह राज्य की जिम्मेदारी स्वीकार करने का एक सार्वजनिक कानून संबंधी उपाय है। सर्वोच्च न्यायालय भी लंबे समय से यह स्पष्ट करता रहा है कि हिरासत में मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर दिया गया मुआवजा किसी अन्य आपराधिक या कानूनी जिम्मेदारी को समाप्त नहीं करता इसलिए परिवार के लिए असली सवाल रकम का नहीं, न्याय का है।

यही वह बिंदु है जहां पूरा मामला और ज्यादा गंभीर हो जाता है। मृत्यु जनवरी 2024 में हुई। न्यायिक जांच शुरू हुई। जुलाई 2024 में जांच रिपोर्ट सामने आई, जिसमें सिर की चोट से हुई मौत की बात कही गई फिर भी पुलिस ने मौत की जांच के लिए FIR 30 जुलाई 2026 को दर्ज की यानी जिस मौत की परिस्थितियों की आपराधिक जांच समय रहते होनी चाहिए थी, उसके लिए FIR दर्ज करने में लगभग ढाई साल निकल गए। यह देरी सिर्फ प्रशासनिक सुस्ती नहीं कही जा सकती। हिरासत में मौत जैसे मामले में समय स्वयं एक सबूत होता है। समय बीतने के साथ CCTV फुटेज गायब हो सकते हैं, रिकॉर्ड बदल सकते हैं, गवाहों की याद कमजोर हो सकती है और परिस्थितिजन्य साक्ष्य नष्ट हो सकते हैं और यही कारण है कि हिरासत में हुई मौत के मामलों में पुलिस से सामान्य मामलों की तुलना में कहीं अधिक पारदर्शिता और तत्परता की अपेक्षा होती है। 

इस वर्ष जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य को नोटिस जारी किया। राज्य की ओर से जवाबी हलफनामा दाखिल किया गया, लेकिन अदालत के सामने वह सबसे बुनियादी सवाल का संतोषजनक उत्तर नहीं दे सका—FIR दर्ज करने और मृतक की हिरासत में हुई मौत की जांच के लिए आखिर क्या कदम उठाए गए? यहीं सुप्रीम कोर्ट का धैर्य टूटता दिखाई दिया। किसी राज्य का सर्वोच्च पुलिस अधिकारी यदि अपने अधीनस्थ तंत्र में हुई हिरासत में मौत के मामले में यह सुनिश्चित नहीं कर पाता कि समय पर FIR हो, स्वतंत्र जांच हो और अदालत को स्पष्ट जवाब दिया जाए, तो फिर सवाल सिर्फ नीचे के स्तर के पुलिसकर्मियों पर क्यों रुके? यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें अदालत ने DGP को “पूरी तरह से अयोग्य” तक कह दिया। 

छत्तीसगढ़ में पुलिसिंग को लेकर अक्सर अपराध नियंत्रण, नक्सल विरोधी अभियान, कानून-व्यवस्था और पुलिस की कठोर छवि की चर्चा होती है लेकिन पुलिस की असली परीक्षा अपराधी को पकड़ने में नहीं, हिरासत में लिए गए व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा करने में होती है। जिस व्यक्ति को पुलिस ने पकड़ लिया, वह उसकी निजी संपत्ति नहीं हो जाता। हथकड़ी संविधान को नहीं रोकती। पुलिस स्टेशन संविधान से बाहर की जगह नहीं है और हिरासत न्यायपालिका से बाहर का क्षेत्र नहीं है। अगर पुलिस के पास किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने की शक्ति है तो उसी के साथ उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी आती है। यही लोकतांत्रिक पुलिसिंग और सत्ता के बल पर चलने वाली पुलिसिंग के बीच अंतर है।

पुलिस की वर्दी का उद्देश्य नागरिक को डराना नहीं, उसे कानून पर भरोसा दिलाना है लेकिन जब हिरासत में कोई व्यक्ति मर जाता है और उसके परिवार को न्याय के लिए हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक जाना पड़ता है, तो जनता के मन में स्वाभाविक सवाल उठता है— अगर पुलिस हिरासत में हमारी सुरक्षा की गारंटी नहीं दे सकती, तो पुलिस की शक्ति का औचित्य क्या है? एक लोकतंत्र में पुलिस सबसे शक्तिशाली संस्था नहीं होती। पुलिस संविधान की अधीनस्थ संस्था होती है। उसकी ताकत कानून से आती है और उसकी सीमा भी कानून ही तय करता है इसलिए हिरासत में मौत का हर मामला पुलिस के लिए सिर्फ एक विभागीय घटना नहीं होना चाहिए। वह पूरे बल के लिए संवैधानिक जवाबदेही की परीक्षा होना चाहिए। 

“पूरी तरह से अयोग्य” जैसी टिप्पणी को केवल अदालत की नाराजगी मानकर आगे बढ़ जाना खतरनाक होगा। यह टिप्पणी पुलिस नेतृत्व के लिए चेतावनी है कि वरिष्ठ पद केवल पदनाम और प्रोटोकॉल का विषय नहीं है। DGP का मतलब सिर्फ राज्य की पुलिस का सर्वोच्च अधिकारी होना नहीं है। इसका अर्थ यह भी है कि राज्य की पुलिस में होने वाली गंभीर घटनाओं पर अंतिम प्रशासनिक जवाबदेही तय हो।

छत्तीसगढ़ के इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अदालत ने केवल एक मौत पर सवाल नहीं उठाया है। उसने उस मानसिकता पर चोट की है जिसमें पुलिस की गलती को विभागीय प्रक्रिया, देरी और कागजी जवाबों के नीचे दबा देने की उम्मीद की जाती है।

अब सवाल यह है कि इस टिप्पणी के बाद छत्तीसगढ़ पुलिस बदलेगी या केवल एक और जवाबी हलफनामा दाखिल होगा? क्योंकि वर्दी की ताकत तभी सम्मान पैदा करती है, जब उसके पीछे जवाबदेही हो। वरना 1,200 रुपये की शराब के लिए दिखाई गई तत्परता और एक इंसान की हिरासत में हुई मौत पर दिखाई गई सुस्ती के बीच का अंतर जनता को बहुत कुछ समझा देता है और शायद यही इस मामले का सबसे कड़वा निष्कर्ष है— पुलिस अगर नागरिक को गिरफ्तार करने में तेज है, लेकिन अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करने में धीमी, तो समस्या सिर्फ पुलिसिंग की नहीं, पुलिस संस्कृति की है।

रात का विवाद बना खूनी खेल, युवक की मौत; दोनों आरोपी गिरफ्तार

रायपुर। TODAY छत्तीसगढ़  / सरस्वती नगर थाना क्षेत्र के सतनामी पारा कोटा में आपसी विवाद को लेकर एक युवक पर जानलेवा हमला कर दिया गया। गंभीर रूप से घायल महेश धृतलहरे की एम्स में उपचार के दौरान मौत हो गई। घटना की सूचना मिलते ही पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए दोनों आरोपियों को कुछ ही घंटों में गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने उनके कब्जे से वारदात में इस्तेमाल लकड़ी और ईंट भी बरामद की है।

आपसी विवाद के बाद किया हमला

पुलिस के मुताबिक, सतनामी पारा कोटा निवासी राजेंद्र धृतलहरे ने थाना सरस्वती नगर में रिपोर्ट दर्ज कराई थी। शिकायत में बताया गया कि 7 और 8 अगस्त की दरम्यानी रात आपसी विवाद के दौरान तुषार महिधर उर्फ बाउ और सुरेंद्र मधुकर उर्फ पोका ने उसके भाई महेश धृतलहरे के साथ मारपीट की।

हमले में महेश को गंभीर चोटें आईं। उसे तत्काल उपचार के लिए एम्स अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।

चंद घंटों में पुलिस के हाथ लगे दोनों आरोपी

घटना की गंभीरता को देखते हुए डीसीपी वेस्ट जोन रोबिनसन गुड़िया के निर्देशन और एडीसीपी राहुल देव शर्मा के मार्गदर्शन में पुलिस टीम ने आरोपियों की तलाश शुरू की। पुलिस ने अलग-अलग स्थानों पर दबिश देकर दोनों आरोपियों को घटना के कुछ ही घंटों में पकड़ लिया।

पूछताछ में आरोपियों ने आपसी विवाद के चलते हमला करने की बात स्वीकार की। पुलिस ने उनकी निशानदेही पर घटना में प्रयुक्त लकड़ी और ईंट बरामद कर जब्त कर ली।

दोनों आरोपी न्यायिक रिमांड पर जेल भेजे गए

सरस्वती नगर पुलिस ने मामले में अपराध क्रमांक 168/26 के तहत धारा 109, 103, 3(5) बीएनएस के अंतर्गत अपराध दर्ज किया है। गिरफ्तार दोनों आरोपियों को न्यायालय में पेश करने के बाद न्यायिक रिमांड पर जेल भेज दिया गया।

गिरफ्तार आरोपी:

  • तुषार महिधर उर्फ बाउ, 19 वर्ष, सतनामी पारा मंदिर के पास कोटा, रायपुर।
  • सुरेंद्र मधुकर उर्फ पोका, 25 वर्ष, सतनामी पारा मंदिर के पास कोटा, रायपुर।
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