STATE

नई दिल्ली, छत्तीसगढ़, Politics, बिहार

GUEST COLUMN

Guest Column

EDITOR CHOICE

Editor Choice

TRAVELLING STORY

TRAVELLING STORY

TCG EXCLUSIVE

टीसीजी एक्सक्लूसिव, इतिहास

VIDEO

VIDEO

किराना दुकान से गांजा बरामद, आरोपी गिरफ्तार


रतनपुर (बिलासपुर)। 
TODAY छत्तीसगढ़  / नशे के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान के तहत रतनपुर पुलिस ने एक किराना दुकान में दबिश देकर अवैध रूप से गांजा बिक्री करते एक आरोपी को गिरफ्तार किया है। पुलिस ने मौके से 225 ग्राम गांजा, बिक्री रकम व एक मोबाइल जब्त किया है।

शनिवार 14 फरवरी को मुखबिर से सूचना मिली कि भगत सिंह वार्ड (थानापारा) रतनपुर निवासी अरविंद जैन उर्फ अन्नू (36) अपने किराना स्टोर में अवैध रूप से गांजा की पुड़िया बनाकर बिक्री कर रहा है। सूचना पर पुलिस टीम ने दुकान में रेड कार्रवाई की। तलाशी के दौरान 225 ग्राम गांजा (कीमत करीब 2500 रुपये), गांजा बिक्री की 2300 रुपये नगद राशि तथा एक मोबाइल फोन जब्त किया गया। जब्त सामग्री की कुल कीमत 14,800 रुपये आंकी गई है। पुलिस ने आरोपी के विरुद्ध नारकोटिक एक्ट के तहत मामला दर्ज कर उसे गिरफ्तार कर न्यायिक रिमांड पर भेज दिया है।

अवैध शराब के साथ युवक गिरफ्तार, बीयर और स्कूटी जब्त

बिलासपुर। TODAY छत्तीसगढ़  / अवैध शराब के परिवहन पर अंकुश लगाने के लिए चलाए जा रहे विशेष अभियान के तहत तारबाहर पुलिस ने एक युवक को गिरफ्तार किया है। पुलिस ने उसके कब्जे से नौ नग बीयर और एक स्कूटी जब्त की है।

पुलिस के अनुसार वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश पर जिले में अवैध शराब के परिवहन और बिक्री के खिलाफ लगातार कार्रवाई की जा रही है। इसी क्रम में तारबाहर थाना पुलिस को मुखबिर से सूचना मिली कि एक युवक स्कूटी से अवैध रूप से बीयर ले जा रहा है। सूचना पर पुलिस टीम ने पुराना बस स्टैंड स्थित शुलभ के सामने घेराबंदी कर वाहन को रोका। जांच के दौरान युवक के थैले से छह नग बीयर तथा स्कूटी की डिक्की से तीन नग बीयर बरामद हुई। पूछताछ में उसकी पहचान शेरसिंह मोहले (24) निवासी शुरू अमेरी सतनाम नगर, थाना सकरी, जिला बिलासपुर के रूप में हुई। पुलिस ने कुल नौ नग बीयर व स्कूटी क्रमांक सीजी 10 जेड 9578 को जब्त कर आरोपी के विरुद्ध आबकारी एक्ट के तहत कार्रवाई करते हुए उसे गिरफ्तार कर न्यायिक रिमांड पर भेज दिया।

कैमरे की कलम: चिट्टा, सट्टा और सत्ता, खाकी की उलझी कहानी


पुलिस की वर्दी केवल खाकी कपड़ा नहीं राज्य की शक्ति और जनता के भरोसे का प्रतीक है। जब वही वर्दी कटघरे में खड़ी होती है, तो केवल व्यक्ति नहीं, पूरी संस्था सवालों में घिर जाती है। पुलिस को केवल कानून लागू करने वाली संस्था नहीं, बल्कि राज्य के नैतिक प्रतिनिधि के रूप में भी देखा जाता है और इसलिए जब पुलिस व्यवस्था पर बेईमानी, मिलीभगत या पद के दुरुपयोग के आरोप लगते हैं, तो सवाल केवल व्यक्तियों पर नहीं उठते, वे वैधता की जड़ों तक पहुँचते हैं। हाल के वर्षों में देश के कई हिस्सों से ऐसी घटनाएँ सामने आईं जिनमें पुलिसकर्मियों पर महिलाओं के यौन शोषण, नशे के कारोबार में संलिप्तता से लेकर आर्थिक अनियमितताओं और सट्टा नेटवर्क से जुड़ाव तक के आरोप लगे। छत्तीसगढ़ इससे बिल्कुल भी अछूता नहीं है, छत्तीसगढ़ पुलिस में ऐसे दर्जनों आईपीएस अफसर हैं  जिन पर अपनी हवस मिटाने के लिए महिलाओं के जिस्म नोचने के आरोप लगे है। नीचे से लेकर बड़े साहबों तक नाम के साथ आरोपों की फेहरिस्त लम्बी है। फिलहाल हिमांशु बर्मन, कल्पना वर्मा और सहदेव यादव जैसे बेईमान पुलिस वालों के लिए इस आदर्श वाक्य “सेवा और सुरक्षा” के मायने ही अलग हैं। मुझे लगता है इन लोगों की पारिवारिक पृष्ठभूमि में संस्कारों की कमी रही होगी, ये तीनों ही चेहरे चरित्र की बुनियादी परीक्षा में विफल रहे ? ये रही उनकी कहानियां। 

राजधानी रायपुर में नशे के खिलाफ चल रहे अभियान के बीच एक पुलिस आरक्षक हिमांशु बर्मन की प्रतिबंधित हेरोइन (चिट्टा) के साथ गिरफ्तारी ने एक असहज प्रश्न खड़ा कर दिया है। यह प्रश्न केवल एक व्यक्ति के आचरण तक सीमित नहीं है; यह उस व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा है जो स्वयं को कानून का प्रहरी कहती है। पुलिस के अनुसार सूचना के आधार पर आरक्षक हिमांशु बर्मन को कथित रूप से हेरोइन के साथ पकड़ा गया। वरिष्ठ अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि मामले की जांच जारी है, आरोपी को रिमांड पर लेकर पूछताछ की जा रही है और सप्लाई चेन की हर कड़ी तक पहुंचने का प्रयास होगा। आधिकारिक बयान यह भी कहता है कि “कोई भी हो, बख्शा नहीं जाएगा।” राजधानी रायपुर में हाल के महीनों में सूखे नशे के खिलाफ पुलिस की सक्रियता स्पष्ट रही है। कई मामले दर्ज हुए, आरोपियों की गिरफ्तारी हुई, बड़ी मात्रा में प्रतिबंधित सामग्री जब्त की गई। ऐसे में जब उसी विभाग का एक सदस्य कथित रूप से इस अवैध कारोबार में संलिप्त पाया जाता है, तो यह विडंबना को जन्म देता है। एक ओर सख्त संदेश, दूसरी ओर अंदरूनी दरार, यह विरोधाभास केवल प्रशासनिक चुनौती नहीं, नैतिक संकट भी है। 

हर संस्था में व्यक्तिगत चूक संभव है। यह तर्क अक्सर दिया जाता है कि कुछ मामलों के आधार पर पूरे विभाग को कठघरे में नहीं खड़ा किया जा सकता। यह बात सही भी है। हजारों पुलिसकर्मी कठिन परिस्थितियों में, सीमित संसाधनों के बीच, जोखिम उठाकर अपनी ड्यूटी निभाते हैं लेकिन जब समय-समय पर विभाग के भीतर से अनियमितताओं के आरोप सामने आते हैं, चाहे वह नशे का मामला हो, कथित आर्थिक अनियमितता हो, महिलाओं के यौन शोषण का हो या गोपनीय जानकारी लीक करने का आरोप। ऐसे में पुलिस अधिकारियों ने अपराध के खिलाफ “जीरो टॉलरेंस” की नीति दोहराई है। यह नीति तब सार्थक होती है जब वह बाहरी अपराधियों के साथ-साथ विभाग के भीतर भी समान कठोरता से लागू हो। 

पुलिस और नागरिक के बीच संबंध भय पर नहीं, विश्वास पर टिके होते हैं। जब नागरिक शिकायत लेकर थाने जाता है, तो वह राज्य की निष्पक्षता पर भरोसा करता है। यदि उसी राज्य के प्रतिनिधि (पुलिस) पर गंभीर आरोप लगे हों, तो यह भरोसा डगमगाता है। विश्वास का क्षरण अचानक नहीं होता; वह घटनाओं की पुनरावृत्ति से बनता है। इसलिए प्रत्येक ऐसी घटना केवल एक केस फाइल नहीं, बल्कि सार्वजनिक धारणा का हिस्सा बन जाती है। ऐसा पहली बार नहीं है जब छत्तीसगढ़ पुलिस की छवि पर सवाल उठे हों। अक्टूबर 2025 में रायपुर क्राइम ब्रांच के छह पुलिसकर्मियों पर दुर्ग के एक कारोबारी की कार से कथित तौर पर 2 लाख रुपये चोरी करने के आरोप लगे थे। जांच के बाद एक आरक्षक को निलंबित किया गया था। इसी तरह, हाल ही में चर्चित महिला डीएसपी कल्पना वर्मा को गोपनीय जानकारी लीक करने के आरोप में निलंबित किया गया। उनके खिलाफ यह भी आरोप सामने आए कि रायपुर में पदस्थ रहते हुए उन्होंने एक कारोबारी के साथ कथित धोखाधड़ी की और उससे अवैध ढंग से दो करोड़ रूपये हासिल कर लिये। 

देशभर में चर्चित महादेव सट्टा ऐप मामले में कई नाम उछले। सैकड़ों करोड़ के इस कथित ऑनलाइन सट्टा कारोबार में राजनीतिक, कारोबारी और प्रशासनिक कड़ियों की चर्चा होती रही। इसी कड़ी में पुलिस आरक्षक सहदेव यादव का नाम महादेव सट्टा का पैनल चलाने वाले के रूप में सामने आया, सहदेव ने अकेले वर्दी को नहीं बेचा था बल्कि उसके दो अन्य भाइयों पर भी वर्दी की नीलामी के आरोप लगे। भाई जेल में हैं, सहदेव को सेवा से बर्खास्त कर जेल भेज दिया गया। यहां ये बताना भी लाज़िमी होगा कि बिलासपुर शहर के तत्कालीन एएसपी राजेंद्र जायसवाल पर हाल ही में एक स्पा सेंटर के संचालक ने मासिक वसूली के गंभीर आरोप लगाये थे। शिकायत के बाद राज्य के गृह विभाग ने उन्हें तत्काल निलंबित कर दिया। इन घटनाओं ने पुलिस व्यवस्था के भीतर जवाबदेही और निगरानी तंत्र को लेकर बहस तेज कर दी है।  

पुलिस व्यवस्था में पदानुक्रम कठोर है, कार्य-घंटे लंबे हैं, संसाधन सीमित हैं और राजनीतिक दबावों की चर्चा आम है। इन परिस्थितियों में यदि आंतरिक निगरानी ढीली हो, संपत्ति और आचरण की पारदर्शी समीक्षा औपचारिकता बन जाए, और शिकायत निवारण तंत्र स्वतंत्र न हो, तो संस्थागत दरारें गहरी होती जाती हैं। दरारों में ही भ्रष्टाचार का पानी भरता है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि उपभोक्तावाद का दबाव केवल नागरिकों पर नहीं, वर्दीधारियों पर भी है। महंगे फोन, गाड़ियाँ, प्रभावी जीवनशैली। ये आकांक्षाएँ सामाजिक परिवेश का हिस्सा हैं। पर समस्या तब शुरू होती है जब आकांक्षा और आय के बीच की खाई को पद के प्रभाव से पाटने की कोशिश की जाती है। वर्दी तब साधन बन जाती है सेवा का नहीं, सौदे का। 

कैमरे की कलम: आयुष्मान भारत बनाम चारपाई इंडिया

इस तस्वीर को देखिए। बड़े ध्यान से देखिए। यह कोई दुर्लभ, असामान्य या अपवादस्वरूप घटना नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था का आईना है जिसे हम बड़े गर्व से “स्वास्थ्य तंत्र” कहते हैं। चारपाई पर लेटा एक मरीज, कंधों पर उठाए कुछ लोग, कीचड़, पगडंडी और दूर कहीं पक्की सड़क की उम्मीद, यही आज ग्रामीण भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था की वास्तविक पहचान है। यह तस्वीर किसी एक राज्य, किसी एक जिले या किसी एक गांव की नहीं है; यह उस देश की सामूहिक तस्वीर है जो खुद को दुनिया की उभरती महाशक्ति कहने में नहीं थकता। देश में आयुष्मान भारत है, राज्य की अपनी स्वास्थ्य बीमा योजनाएं हैं, कैशलेस इलाज की लंबी-चौड़ी सूचियां हैं। कागजों में इलाज जन्म से मृत्यु तक सुरक्षित है। बस एक छोटी सी कमी है, गांव से अस्पताल तक पहुंचने का प्रावधान किसी भी योजना में स्पष्ट नहीं है। योजनाएं इलाज का खर्च उठाती हैं, लेकिन रास्ते का बोझ अब भी मरीज और उसके तीमारदार उठा रहे हैं—कंधों पर। 

इक्कीसवीं सदी के भारत में इलाज कैशलेस है, लेकिन रास्ता अब भी इंसानों के कंधों पर चलता है।

आइये इस तस्वीर पर फोकस करते है। ये तस्वीर छत्तीसगढ़ राज्य गठन के 25 बरस बाद “विकास कथा” का स्थायी फ्रेम है। कोरिया जिले के ग्राम पंचायत बंजारीडाँड़ के रोहना ठीहाई गांव में एक अनोखी, लेकिन बेहद भरोसेमंद स्वास्थ्य सेवा आज भी पूरे आत्मविश्वास के साथ चल रही है। नाम है “चारपाई एक्सप्रेस”। यह सेवा न ऐप पर मिलती है, न टोल-फ्री नंबर पर, न GPS मांगती है और न ही सड़क की ज़िद करती है। बस चार मज़बूत कंधे चाहिए, एक पुरानी खटिया और किस्मत का साथ। रोहना ठीहाई में भी यही हुआ। गांव तक सड़क नहीं है, इसलिए एम्बुलेंस वहीं तक आई, जहां सड़क खत्म होती है। उसके आगे मरीज को खटिया पर उठाकर लाने की जिम्मेदारी ग्रामीणों ने निभाई। यह जन-भागीदारी का बेहतरीन उदाहरण है, जिसे नीति आयोग की रिपोर्टों में जगह मिलनी चाहिए। मरीज का नाम लक्ष्मी नारायण है, लक्ष्मी की कृपा से दूर मरीज सिर्फ नारायण के भरोसे है। 

यह वही गांव है जहां इलाज से पहले मरीज को यह साबित करना पड़ता है कि वह सड़क तक पहुंचने लायक है। जो सड़क तक पहुंच गया, वही सिस्टम की नजर में “इलाज के योग्य” माना जाता है। यहां संविधान में “जीवन का अधिकार” तो है, लेकिन उस जीवन तक पहुंचने का रास्ता नहीं है। छत्तीसगढ़ हो, झारखंड हो, मध्यप्रदेश हो, बिहार, ओडिशा, उत्तर प्रदेश या पूर्वोत्तर के राज्य, ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सुविधा आज भी चारपाई पर लेटी हुई है। फर्क बस इतना है कि कहीं चारपाई बांस की है, कहीं लकड़ी की; कहीं उठाने वाले चार लोग हैं, कहीं दो। लेकिन व्यवस्था हर जगह एक सी बेहोश पड़ी है। 

यह तस्वीर किसी एक गांव की नहीं, उस व्यवस्था की है जो विकास को नक्शों में और मरीज को खटिया पर छोड़ देती है।

सरकारी नक्शों में सड़कें हैं, स्वास्थ्य केंद्र हैं, योजनाएं हैं, और लक्ष्य भी हैं। लेकिन रोहना ठीहाई जैसे गांवों में यह सब नक्शे पर ही रह जाता है। जमीन पर जो है, वह है कच्ची पगडंडी, नेटवर्क का सन्नाटा, बिजली की अनियमितता और इलाज की अनिश्चितता। जब बीमारी दस्तक देती है, तो न योजना काम आती है, न फाइल। काम आती है चारपाई जो यहां एम्बुलेंस है, स्ट्रेचर है और कई बार ज़िंदगी का अंतिम वाहन भी। यह कैसी विडंबना है कि जिस देश में “स्मार्ट सिटी” शब्द गर्व से बोला जाता है, उसी देश में “स्मार्ट गांव” आज भी खटिया के भरोसे है। 

इस देश में 108, 112, 104, ये सभी नंबर स्वास्थ्य सुरक्षा के प्रतीक माने जाते हैं। लेकिन इन सेवाओं का दायरा भी सड़क की सीमा तक ही है। जहां सड़क खत्म, वहीं आपातकाल समाप्त। यह व्यवस्था बड़ी ईमानदारी से मानती है कि गांव में बीमारी उतनी गंभीर नहीं होती, जितनी शहर में। इसलिए गांव का मरीज अगर बच गया, तो उसे सहनशील माना जाता है; और अगर नहीं बचा—तो फाइल में लिख दिया जाता है, “दुर्गम क्षेत्र।” 

दिल्ली से घोषित ‘सार्वभौमिक स्वास्थ्य’ गांव पहुंचते-पहुंचते चारपाई पर सिमट जाता है।

केंद्र और राज्य सरकारों ने कस्बाई इलाकों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के नाम पर दो-तीन कमरों का ढांचा खड़ा कर रखा हैं। बाहरी दीवार पर बोर्ड लगे हैं, उद्घाटन शिलाएं चमक रही हैं लेकिन भीतर डॉक्टर अक्सर अस्थायी रूप से अनुपस्थित रहते हैं, दवाएं आपूर्ति की प्रतीक्षा में होती हैं और जांच सुविधाएं जिला स्तर पर उपलब्ध बताई जाती हैं। यानि इलाज की पूरी श्रृंखला मौजूद है, बस गांव में कुछ भी नहीं। डिजिटल हेल्थ मिशन के तहत हेल्थ आईडी, ऑनलाइन रिपोर्ट और टेलीमेडिसिन का सपना दिखाया जा रहा है। रोहना ठीहाई जैसे गांव पूछ रहे है—“नेटवर्क कब मिलेगा?” जहां मोबाइल सिग्नल नहीं, वहां टेलीमेडिसिन एक प्रेरक नारा भर है। मरीज खटिया पर है और व्यवस्था ऐप डाउनलोड करने की सलाह दे रही है। रोहना ठीहाई गाँव अकेला नहीं है। देश के कई राज्यों के ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सुविधा आज भी चारपाई पर ही सफर करती है। कहीं तस्वीर सामने आ जाती है, तो कुछ दिन चर्चा का विषय बनी होती है। फिर सब कुछ सामान्य, अगली खटिया के इंतजार में। 

रोहना ठीहाई अकेला गांव नहीं है। देश के कई राज्यों के ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सुविधा आज भी चारपाई पर ही सफर करती है। जहां मोबाइल सिग्नल नहीं, वहां टेलीमेडिसिन एक प्रेरक नारा भर है। मरीज खटिया पर है और व्यवस्था ऐप डाउनलोड करने की सलाह दे रही है।

हम किसी एक सरकार या विभाग पर आरोप नहीं लगा रहे, बल्कि उस स्थायी मानसिकता पर कटाक्ष कर रहे है, जिसमें गांव को हमेशा प्राथमिकता के क्रम में आखरी पायदान पर रखा जाता है। चारपाई पर लेटा मरीज किसी योजना की विफलता नहीं, बल्कि केंद्र और राज्य सरकारों की संयुक्त स्वास्थ्य नीति की मैदानी रिपोर्ट का जीवंत प्रमाण पत्र है। चारपाई पर लेटा लोकतंत्र केवल इलाज नहीं मांग रहा। वह सत्ता से, नौकरशाहों से यह सवाल पूछ रहा है “क्या इस देश में स्वास्थ्य सेवा तक पहुंचने के लिए भी पहले सड़क पास करनी होगी?” जवाब में व्यवस्था हमेशा की तरह, खामोशी से खटिया की ओर इशारा कर देती है।  

© all rights reserved TODAY छत्तीसगढ़ 2018
todaychhattisgarhtcg@gmail.com