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CEIR पोर्टल से मिली बड़ी सफलता, 18 गुम मोबाइल मालिकों को लौटाए


राजनांदगांव।
 TODAY छत्तीसगढ़  /  थाना बसंतपुर पुलिस ने सीईआईआर (CEIR) पोर्टल की मदद से गुम हुए 18 मोबाइल फोन बरामद कर उनके वास्तविक मालिकों को लौटाकर सराहनीय कार्य किया है। बरामद मोबाइलों की कुल अनुमानित कीमत लगभग 3 लाख रुपये बताई गई है।

पुलिस अधीक्षक सुश्री अंकिता शर्मा के निर्देशन, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक कीर्तन राठौर एवं नगर पुलिस अधीक्षक वैशाली जैन के मार्गदर्शन में थाना प्रभारी निरीक्षक एमन साहू के नेतृत्व में गुम मोबाइलों की तलाश के लिए विशेष अभियान चलाया जा रहा था। इसी अभियान के तहत विभिन्न कंपनियों के 18 मोबाइल फोन सफलतापूर्वक ट्रेस कर बरामद किए गए। 

मोबाइल वापस मिलने पर लोगों के चेहरे खुशी से खिल उठे। कई आवेदकों ने बताया कि मोबाइल में उनके परिवार की महत्वपूर्ण तस्वीरें, जरूरी दस्तावेज, संपर्क नंबर और व्यक्तिगत जानकारी सुरक्षित थी, जिसके वापस मिलने की उन्हें उम्मीद नहीं थी।

मोबाइल प्राप्त करने वाले लोगों ने राजनांदगांव पुलिस और बसंतपुर थाना पुलिस की तत्परता एवं तकनीकी दक्षता की सराहना करते हुए आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि पुलिस की सक्रियता के कारण उनकी बहुमूल्य जानकारी और निजी डेटा सुरक्षित वापस मिल सका।




प्रेम संबंध बना हत्या की वजह, पत्नी के प्रेमी की गला घोंटकर हत्या


बिलासपुर।
 TODAY छत्तीसगढ़  /  सकरी थाना क्षेत्र की हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी सैदा में प्रेम प्रसंग के चलते हुई एक सनसनीखेज हत्या का पुलिस ने कुछ ही घंटों में खुलासा कर दिया। पत्नी के प्रेमी को घर बुलाकर गला घोंटकर मौत के घाट उतारने के आरोप में पुलिस ने महिला के पति और उसके नाबालिग पुत्र को हिरासत में लिया है।

मृतक की पहचान दावेन्द्र कुमार बघेल निवासी राम्हेपुर, थाना लोरमी, जिला मुंगेली के रूप में हुई है। घटना शुक्रवार दोपहर की है, जब दावेन्द्र अपने घर से मोटरसाइकिल लेकर निकला था। शाम को परिजनों को सूचना मिली कि वह सैदा स्थित एक मकान में मृत अवस्था में पड़ा हुआ है।

परिजनों ने जब हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी स्थित मकान पहुंचकर पीछे की खिड़की से अंदर झांका तो दावेन्द्र कमरे में बेड के पास मृत पड़ा मिला। सूचना पर सकरी पुलिस मौके पर पहुंची और मर्ग कायम कर जांच शुरू की।

जांच में सामने आया कि आरोपी शिव कामले, जो कबीरधाम जिले के एक मिडिल स्कूल में प्रधान पाठक पद पर पदस्थ है, उसकी पत्नी रीना कामले और मृतक दावेन्द्र के बीच पिछले करीब दो वर्षों से प्रेम संबंध थे। दोनों की मुलाकात एक पारिवारिक विवाह समारोह के दौरान हुई थी।

करीब एक माह पहले शिव कामले को इस संबंध की जानकारी मिल गई थी। इसके बाद उसने पत्नी को दावेन्द्र से दूरी बनाने की हिदायत दी थी और उसका मोबाइल सिम भी तोड़ दिया था।

पुलिस के मुताबिक, शुक्रवार को दावेन्द्र रीना कामले को नया सिम देने सैदा पहुंचा था। इसी दौरान शिव कामले ने उसे देख लिया। उसने अपने नाबालिग बेटे की मदद से दावेन्द्र को घर के अंदर बुलाया और समझाने का प्रयास किया। लेकिन जब वह संबंध खत्म करने को तैयार नहीं हुआ तो विवाद बढ़ गया। आरोप है कि इसके बाद शिव कामले और उसके नाबालिग पुत्र ने मिलकर प्लास्टिक की सुतली और मोबाइल चार्जर के तार से दावेन्द्र का गला घोंट दिया। साथ ही उसका गला दबाकर हत्या कर दी।


जिला अस्पताल के पास शराब सप्लाई की तैयारी, दो आरोपी गिरफ्तार


बिलासपुर। 
 TODAY छत्तीसगढ़  /  अवैध शराब कारोबार के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान के तहत तारबाहर पुलिस ने बड़ी कार्रवाई करते हुए दो आरोपियों को गिरफ्तार किया है। पुलिस ने उनके कब्जे से 35 पौवा देशी शराब और परिवहन में इस्तेमाल की जा रही सेंट्रो कार जब्त की है। आरोपी जिला अस्पताल के पास कार में बैठकर अवैध शराब की सप्लाई की तैयारी कर रहे थे।

पुलिस के मुताबिक, जिले में अवैध शराब बिक्री और उससे जुड़े अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक रजनेश सिंह के निर्देश पर विशेष अभियान चलाया जा रहा है। अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (शहर) पंकज कुमार पटेल और नगर पुलिस अधीक्षक गगन कुमार के मार्गदर्शन में थाना प्रभारी रविन्द्र अनंत के नेतृत्व में टीम लगातार कार्रवाई कर रही है।

पुलिस को सूचना मिली थी कि दो व्यक्ति सफेद रंग की सेंट्रो कार में अवैध रूप से देशी शराब रखकर जिला अस्पताल के पास स्थित शौचालय (शुलभ) के सामने बिक्री के लिए खड़े हैं। सूचना मिलते ही पुलिस टीम मौके पर पहुंची और घेराबंदी कर वाहन को रोक लिया।

वाहन की तलाशी लेने पर उसमें 35 नग देशी शराब (180 एमएल प्रति पौवा) बरामद हुई। पूछताछ के दौरान आरोपी शराब के संबंध में कोई वैध दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सके। इसके बाद पुलिस ने शराब और वाहन को जब्त कर लिया। गिरफ्तार आरोपियों की पहचान सफी कुरैशी (33 वर्ष) और शेख अकबर (30 वर्ष) के रूप में हुई है। दोनों इंदिरा कॉलोनी, तारबाहर क्षेत्र के निवासी हैं। पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ आबकारी अधिनियम की धारा 34(2) के तहत मामला दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार किया और न्यायिक रिमांड पर भेज दिया है।

कैमरे की कलम: सत्ता का बैज और गुंडागर्दी का लाइसेंस

छत्तीसगढ़ के सीतापुर में जो हुआ, वह किसी एक विधायक, एक अफसर या एक जिले का मामला नहीं है। यह उस राजनीतिक बीमारी का लक्षण है जो लोकतंत्र के शरीर में धीरे-धीरे फैलती रही है। बीमारी का नाम है—सत्ता का अहंकार। 

एक सत्तारूढ़ दल का विधायक अपने समर्थकों के साथ सार्वजनिक स्थान पर एक नायब तहसीलदार से उलझता है। आरोप है कि बात इतनी बढ़ती है कि हाथापाई बाद में मारपीट तक पहुंच जाती है। वहां मौजूद वरिष्ठ अधिकारी रोकने की कोशिश करते हैं, लेकिन विधायक का गुस्सा, या कहिए सत्ता का नशा, किसी प्रशासनिक मर्यादा को स्वीकार करने को तैयार नहीं दिखता। यह दृश्य किसी व्यक्ति विशेष के क्रोध का नहीं, बल्कि उस मानसिकता का प्रतीक है जिसमें निर्वाचित प्रतिनिधि स्वयं को कानून का विषय नहीं, कानून का स्वामी समझने लगते हैं। 

लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि जनता की शक्ति का प्रतीक होता है, लेकिन जब वही जनप्रतिनिधि स्वयं को कानून से ऊपर समझने लगे, तब लोकतंत्र की आत्मा घायल होती है। सीतापुर के विधायक रामकुमार टोप्पो से जुड़ा हालिया विवाद इसी चिंता को सामने लाता है। मामले की सच्चाई क्या है, कौन दोषी है और किसकी बात सही है, इसका अंतिम निर्णय अदालतें और जांच एजेंसियां करेंगी। लेकिन जो दृश्य जनता ने देखा, वह अपने आप में कई गंभीर सवाल छोड़ गया है।

आरोप है कि एक सरकारी अधिकारी के साथ नेताजी के साथ साथ समर्थकों ने मारपीट की । आरोप यह भी है कि विवाद की जड़ एक ऐसे व्यक्ति की पैरोल से जुड़ी थी जिस पर हत्या जैसे गंभीर अपराध का आरोप है। हत्या जैसे संगीन अपराध में जेल की दीवारों में फंसा व्यक्ति रिश्ते में विधायक के जीजा हैं जिनकी पेरोल संबंधी कागजात को लेकर नेताजी की चचेरी बहन से नायब तहसीलदार की कहासुनी हुई । इन आरोपों की सत्यता जांच का विषय है, लेकिन इससे भी बड़ा प्रश्न उस राजनीतिक संस्कृति का है जो सत्ता को जवाबदेही नहीं, बल्कि विशेषाधिकार समझने लगती है। सवाल यह नहीं है कि अफसर सही था या गलत। सवाल यह है कि फैसला करने का अधिकार किसे है? लोकतंत्र में कानून को या सत्ता के मद में चूर किसी जनप्रतिनिधि को?

सबसे विचित्र और चिंताजनक दृश्य तब सामने आया जब विधायक ने स्वयं को गिरफ्तारी के लिए प्रस्तुत करने की बात कही। लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह एक सामान्य कानूनी प्रक्रिया हो सकती थी। लेकिन यह प्रक्रिया अचानक शक्ति प्रदर्शन के मंच में बदल गई। समर्थकों की भीड़, राष्ट्रीय राजमार्ग पर जाम, नारेबाजी और भावनात्मक उन्माद के बीच गिरफ्तारी का प्रसंग किसी न्यायिक प्रक्रिया से अधिक राजनीतिक आयोजन जैसा प्रतीत हुआ।

विडंबना यह है कि "वंदे मातरम्" और "जय श्री राम" जैसे राष्ट्रभक्ति और आस्था के उद्घोष भी इस शक्ति प्रदर्शन का हिस्सा बने। ये नारे करोड़ों लोगों की भावनाओं से जुड़े हैं। इनका स्थान राष्ट्रीय गौरव और सांस्कृतिक चेतना के उत्सव में है, न कि किसी व्यक्ति विशेष के कानूनी संकट को जनभावनाओं की ढाल बनाने में। जब ऐसे पवित्र प्रतीकों को राजनीतिक या व्यक्तिगत बचाव के उपकरण में बदला जाता है, तब नुकसान केवल राजनीति का नहीं, सामाजिक विश्वास का भी होता है। 

सवाल यह भी है कि यदि कोई जनप्रतिनिधि स्वयं को निर्दोष मानता है तो उसे कानून की प्रक्रिया का सम्मान करते हुए जांच में सहयोग करना चाहिए। निर्दोषता का सबसे मजबूत प्रमाण अदालत होती है, सड़क पर जुटी भीड़ नहीं। लोकतंत्र में न्यायालय का फैसला भीड़ के आकार से तय नहीं होता। लेकिन दुर्भाग्य से हमारे राजनीतिक जीवन में भीड़ को नैतिक वैधता का प्रमाणपत्र मानने की प्रवृत्ति लगातार बढ़ती जा रही है। यह बीमारी किसी एक दल तक सीमित नहीं है। भाजपा हो, कांग्रेस हो या कोई क्षेत्रीय दल—सत्ता मिलते ही बहुत से नेताओं के पांव जमीन छोड़ देते हैं। लोकतंत्र उन्हें जनता का सेवक बनाता है, लेकिन वे स्वयं को इलाके का शासक समझने लगते हैं। सांसद-विधायक बनने के बाद कुछ लोगों का व्यवहार ऐसा हो जाता है मानो जनता ने उन्हें संविधान से ऊपर बैठाने का जनादेश दिया हो।

देश भर में ऐसे अनगिनत वीडियो मौजूद हैं जिनमें नेता अफसरों को फोन पर गालियां देते सुनाई देते हैं। कहीं धमकियां हैं, कहीं तबादले की चेतावनी है, कहीं नौकरी खाने की भाषा है। मोबाइल कैमरों ने लोकतंत्र का एक नया सच उजागर किया है—जनप्रतिनिधियों के चेहरे पर चढ़ा सत्ता का मुखौटा अब रिकॉर्ड होने लगा है। पहले ऐसे किस्से बंद कमरों में दफन हो जाते थे। अब वे वायरल होते हैं। जनता देखती है कि मंचों पर संविधान की दुहाई देने वाले लोग व्यवहार में किस हद तक सामंती मानसिकता से भरे हुए हैं।

सत्तारूढ़ दलों के लिए ऐसी घटनाएं और अधिक शर्मनाक होती हैं। विपक्षी दल का नेता हंगामा करे तो सरकार कार्रवाई कर सकती है, पुलिस सक्रिय हो सकती है, कानून अपना रास्ता ले सकता है। लेकिन जब सत्ताधारी दल का विधायक ही आरोपों के घेरे में हो, तब सरकार एक असहज दुविधा में फंस जाती है। कार्रवाई करे तो अपनी ही राजनीतिक बिरादरी नाराज होती है, कार्रवाई न करे तो कानून के राज पर सवाल उठते हैं और यहीं किसी सरकार की असली परीक्षा होती है।

यदि सरकार अपने विधायक के खिलाफ भी वही कठोरता दिखा सके जो वह विपक्ष के नेताओं के खिलाफ दिखाती है, तभी "कानून का राज" एक विश्वसनीय अवधारणा बनता है। अन्यथा कानून केवल कमजोर लोगों के लिए और शक्ति केवल सत्ताधारियों के लिए बच जाती है।

सीतापुर की घटना इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि एक विधायक और एक अफसर के बीच विवाद हुआ। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसने लोकतंत्र के सामने खड़ा वह पुराना सवाल फिर जीवित कर दिया है—क्या जनप्रतिनिधि कानून के अधीन हैं, या कानून जनप्रतिनिधियों के अधीन है?

लोकतंत्र की ताकत चुनाव जीतने में नहीं, चुनाव जीतने के बाद भी कानून के सामने सिर झुकाने में होती है। लेकिन जब जनादेश को कुछ लोग दंडमुक्ति का प्रमाणपत्र समझने लगते हैं, तब लोकतंत्र का चरित्र बदलने लगता है। तब जनता का प्रतिनिधि, जनता का सेवक नहीं रह जाता; वह सत्ता का स्थानीय ठेकेदार बन जाता है और किसी भी लोकतंत्र के लिए इससे अधिक खतरनाक स्थिति दूसरी नहीं हो सकती क्योंकि जिस दिन जनता यह मान ले कि कानून का पालन केवल आम आदमी के लिए है और सत्ता में बैठे लोगों के लिए नहीं, उसी दिन लोकतंत्र की नैतिक नींव में पहली बड़ी दरार पड़ जाती है। सीतापुर की घटना उसी दरार की एक तेज़ और चिंताजनक आवाज़ है। 

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