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कैमरे की कलम: सड़क पर अभियान नहीं, व्यवस्था और व्यवहार में बदलाव की दरकार


छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में सकरी- पेंड्रीडीह बाइपास की हालिया सड़क दुर्घटना की तस्वीरें और वीडियो किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को भीतर तक झकझोर देने के लिए काफी हैं। सड़क पर बिखरे मलबे के बीच पसरा सन्नाटा और रोते-बिलखते परिजन, ये दृश्य सिर्फ एक हादसे का नहीं बल्कि उस व्यवस्था की विफलता का आईना हैं, जो हर साल हजारों जिंदगियां निगल रही है। यह कोई इकलौती घटना नहीं है। कुछ दिन पहले ही एक पिता अपनी पत्नी और बच्चे के शव से लिपटकर विलाप करता दिखाई दिया था। कहीं तेज रफ्तार बाइक पर निकला घर का इकलौता बेटा कभी लौटकर नहीं आया। हर ऐसी खबर एक परिवार के उजड़ने की कहानी है, जिसे हम पढ़ते हैं, अफसोस जताते हैं और फिर अगली सुर्खी की ओर बढ़ जाते हैं।

देश के साथ-साथ राज्य में भी सड़क सुरक्षा को लेकर वर्षों से अभियान चलाए जा रहे हैं। पहले सड़क सुरक्षा सप्ताह मनाया गया, फिर पखवाड़ा और अब सड़क सुरक्षा माह। जगह-जगह बैनर, पोस्टर, रैलियां, शपथ ग्रहण, स्कूलों में भाषण—सब कुछ होता है। आंकड़ों की समीक्षा बैठकों में होती है, योजनाएं बनती हैं, लक्ष्य तय होते हैं। लेकिन जमीनी हकीकत यही है कि हादसों की रफ्तार कम होने के बजाय कई जगह बढ़ी है। इसका सीधा अर्थ है कि हमारे प्रयास या तो नाकाफी हैं या फिर केवल औपचारिकता तक सीमित रह गए हैं।

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि नियमों का पालन कराने की जिम्मेदारी जिन पर है, वे स्वयं कई बार नियमों की अनदेखी करते दिखाई देते हैं। मंत्री, विधायक, वरिष्ठ अधिकारी—कई बार सार्वजनिक कार्यक्रमों में बिना सीट बेल्ट या बिना हेलमेट नजर आते हैं। संदेश देने के नाम पर निकाली जाने वाली बाइक रैलियों में शामिल अधिकांश लोग हेलमेट नहीं पहनते। जब नेतृत्वकर्ता ही उदाहरण प्रस्तुत नहीं करेंगे, तो आम नागरिक से अनुशासन की अपेक्षा कैसे की जा सकती है?

सड़क दुर्घटनाओं से होने वाली मौतों के आंकड़े भयावह हैं। हर साल इतनी जिंदगियां चली जाती हैं, जितनी कई छोटे शहरों की कुल आबादी होती है। यह केवल आंकड़ा नहीं, सामाजिक त्रासदी है। हर मृतक के पीछे एक परिवार है, जिसकी आर्थिक और भावनात्मक दुनिया एक पल में बिखर जाती है। कई घरों में कमाने वाला सदस्य चला जाता है, बच्चों का भविष्य अधर में लटक जाता है।

इस स्थिति के लिए केवल तेज रफ्तार या लापरवाह चालक ही जिम्मेदार नहीं हैं। खराब सड़कें, गड्ढे, अपर्याप्त संकेतक, स्ट्रीट लाइट की कमी, ओवरलोड वाहन, और बिना उचित परीक्षण के जारी किए गए ड्राइविंग लाइसेंस भी उतने ही बड़े कारण हैं। यदि आरटीओ में लाइसेंस वास्तविक ड्राइविंग परीक्षा के बजाय कागजी प्रक्रिया बनकर रह जाए, तो सड़क पर अयोग्य चालक उतरेंगे ही। यदि सड़क निर्माण में गुणवत्ता से समझौता होगा, तो दुर्घटनाएं बढ़ेंगी ही।

जरूरत इस बात की है कि सड़क सुरक्षा को ‘अभियान’ नहीं, ‘निरंतर जिम्मेदारी’ के रूप में लिया जाए। जिस तरह स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव जैसे कार्यक्रमों का व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ, उसी तरह सड़क सुरक्षा को वर्ष भर प्राथमिकता दी जाए। पुलिस की मौजूदगी सिर्फ चालान काटने तक सीमित न रहे, बल्कि अनुशासन की संस्कृति विकसित करे। जनप्रतिनिधि और अधिकारी सार्वजनिक रूप से नियमों का पालन करते हुए उदाहरण प्रस्तुत करें। स्कूलों और कॉलेजों में सड़क सुरक्षा शिक्षा को व्यवहारिक रूप से जोड़ा जाए, केवल भाषणों तक सीमित न रखा जाए।

सड़क सुरक्षा का असली संदेश पोस्टर या मंच से नहीं, सड़क पर दिखने वाले आचरण से जाएगा। जब लोग देखेंगे कि नियम तोड़ना आसान नहीं और नियम मानना सम्मान की बात है, तभी बदलाव संभव होगा। यह समझना होगा कि सड़क पर चलने वाला हर व्यक्ति सिर्फ एक वाहन चालक नहीं, बल्कि किसी का बेटा, बेटी, पिता, मां या जीवनसाथी है। एक क्षण की लापरवाही, एक गलत निर्णय या एक प्रशासनिक ढिलाई पूरे परिवार की दुनिया बदल सकती है।

अब समय आ गया है कि सड़क सुरक्षा को औपचारिकता के दायरे से निकालकर जीवन की प्राथमिकता बनाया जाए। वरना हम हर वर्ष नए संकल्प लेते रहेंगे और हर वर्ष नई शोकसभाओं में शामिल होते रहेंगे। सवाल यह नहीं कि सड़क सुरक्षा माह कब मनाया जाएगा; सवाल यह है कि क्या हम सच में किसी घर का चिराग बुझने से बचाने के लिए तैयार हैं?

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