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कैमरे की कलम: लापरवाही, लालच और लाचार व्यवस्था


कभी चिकित्सा को सेवा कहा जाता था। डॉक्टरों को भगवान का दर्जा दिया जाता था। अस्पतालों को वह स्थान माना जाता था जहां जीवन को दूसरा अवसर मिलता है। लेकिन आज का कटु यथार्थ इस आदर्श से उतना ही दूर है जितना विश्वास और अनुभव के बीच की खाई। ताजा मामला श्रीराम केयर अस्पताल का है, जहां एक पुलिसकर्मी सत्यकुमार पाटले की मौत ने फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या अब अस्पताल इलाज के केंद्र हैं या व्यवस्थित ‘राजस्व मशीन’? 

एक सामान्य पथरी का ऑपरेशन जिसे चिकित्सा जगत में रूटीन प्रक्रिया माना जाता है। उसके बाद मरीज की हालत स्थिर बताई जाती है, परिजनों को भरोसा दिया जाता है, और फिर अचानक मौत। उसके बाद शुरू होता है वही पुराना खेल कारणों का उलझाव, बयान बदलते डॉक्टर, और जिम्मेदारी से बचने की अदृश्य दौड़। अस्पताल कहता है ‘हार्ट अटैक’, परिजन कहते हैं ‘लापरवाही’। सच्चाई पोस्टमार्टम रिपोर्ट में दबी रह जाती है, और न्याय अक्सर फाइलों में।

लेकिन सवाल सिर्फ एक मौत का नहीं है। सवाल उस व्यवस्था का है जहां मरीज को इंसान नहीं, बल्कि ‘केस’ कहा जाता है। जहां भर्ती होते ही उसकी पहचान नाम से नहीं, फाइल नंबर से होती है। जहां इलाज की प्रक्रिया से पहले पैकेज तय होता है, और संवेदनशीलता से पहले अग्रिम जमा।

निजी अस्पतालों के गलियारों में एक अदृश्य अर्थशास्त्र चलता है—हर टेस्ट की कीमत है, हर घंटे की कीमत है, हर बेड की कीमत है, यहां तक कि हर सांस की भी कीमत तय होती दिखाई देती है। मरीज जितना अधिक समय अस्पताल में रहेगा, उतना अधिक ‘राजस्व’ उत्पन्न करेगा। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या इलाज की प्राथमिकता मरीज की जरूरत से तय होती है या अस्पताल के लाभ से?

परिजनों के आरोप—चार घंटे तक इलाज नहीं मिला—यदि सही हैं, तो यह केवल एक चिकित्सकीय चूक नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं का पतन है। अस्पताल, जो जीवन बचाने का स्थान होना चाहिए, यदि वहां मरीज तड़पता रह जाए और मशीनें मौन रहें, तो यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि एक प्रकार का संस्थागत अमानवीकरण है।

इस अस्पताल का अतीत भी विवादों से अछूता नहीं रहा है। आईसीयू में सुरक्षा जैसी बुनियादी जिम्मेदारी में चूक, कोरोना काल में कथित आर्थिक शोषण, और अब एक मौत पर उठते सवाल—यह सब मिलकर एक पैटर्न की ओर इशारा करते हैं। लेकिन इससे भी बड़ा सवाल यह है कि ऐसे संस्थान बार-बार सवालों के घेरे में आने के बावजूद निर्बाध रूप से कैसे चलते रहते हैं?

उत्तर स्पष्ट है—क्योंकि हमारी व्यवस्था में जवाबदेही का अभाव है।

स्वास्थ्य क्षेत्र में नियमों की कमी नहीं है। लाइसेंस, निरीक्षण, मानक, प्रोटोकॉल—सब कुछ मौजूद है। लेकिन इनका पालन कितना होता है? निरीक्षण अक्सर औपचारिकता बनकर रह जाते हैं। नोटिस जारी होते हैं, जवाब मांगा जाता है, और फिर फाइल बंद। इस प्रक्रिया में न तो किसी की जिम्मेदारी तय होती है, न ही किसी को सख्त दंड मिलता है। यह ढीलापन केवल प्रशासनिक कमजोरी नहीं, बल्कि एक प्रकार की मौन स्वीकृति है—कि ‘जो चल रहा है, चलने दो।’

एक आम नागरिक के लिए स्थिति और भी विडंबनापूर्ण है। सरकारी अस्पतालों में भीड़, संसाधनों की कमी और लंबी प्रतीक्षा उसे निजी अस्पतालों की ओर धकेलती है। लेकिन वहां पहुंचकर उसे राहत नहीं, बल्कि एक नए संघर्ष का सामना करना पड़ता है—आर्थिक शोषण का।

इलाज के नाम पर अनावश्यक जांच, महंगे पैकेज, अस्पष्ट बिलिंग, और हर कदम पर अतिरिक्त शुल्क—यह सब मिलकर एक ऐसा जाल बनाते हैं जिसमें मरीज और उसका परिवार फंस जाता है। बीमारी से ज्यादा डर अब अस्पताल के बिल का होता है।

कई परिवार इलाज के बाद केवल एक मरीज नहीं खोते, बल्कि अपनी वर्षों की जमा पूंजी भी खो देते हैं। कर्ज लेकर इलाज करवाना, जमीन गिरवी रखना, गहने बेच देना—यह सब अब असामान्य नहीं रहा।

यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है। हर डॉक्टर को दोषी ठहराना न तो उचित है, न ही न्यायसंगत। चिकित्सा क्षेत्र में आज भी ऐसे हजारों डॉक्टर हैं जो ईमानदारी और समर्पण से काम कर रहे हैं। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब चिकित्सा संस्थान ‘कॉर्पोरेट मॉडल’ पर चलने लगते हैं।

जब डॉक्टरों पर ‘टारगेट’ का दबाव होता है—इतने टेस्ट, इतने एडमिशन, इतनी सर्जरी—तो चिकित्सा निर्णय भी प्रभावित होते हैं। इलाज का केंद्र मरीज नहीं, बल्कि ‘प्रदर्शन’ बन जाता है। ऐसे में संवेदनशीलता धीरे-धीरे ‘प्रोफेशनल व्यवहार’ के पीछे छिप जाती है।

स्वास्थ्य सेवा का बाजारीकरण शायद इस पूरे संकट की जड़ है। जब स्वास्थ्य को ‘सेवा’ से ‘उद्योग’ में बदल दिया जाता है, तो प्राथमिकताएं स्वतः बदल जाती हैं। जहां पहले जीवन बचाना उद्देश्य था, वहां अब लाभ कमाना भी समानांतर लक्ष्य बन जाता है और जब लाभ और जीवन के बीच चयन करना हो, तो परिणाम अक्सर दुखद होते हैं।

हर बड़ी घटना के बाद वही प्रक्रिया दोहराई जाती है—जांच के आदेश, कमेटी का गठन, रिपोर्ट का इंतजार। लेकिन इन रिपोर्टों का क्या होता है? कितने मामलों में दोषियों को सजा मिलती है? कितने अस्पतालों का लाइसेंस रद्द होता है? सच यह है कि बहुत कम। यह स्थिति केवल लापरवाही नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता को दर्शाती है। जब तक दंड का भय नहीं होगा, तब तक सुधार की उम्मीद करना भी व्यर्थ है। यह केवल प्रशासन या अस्पतालों की जिम्मेदारी नहीं है। समाज को भी जागरूक होना होगा। मरीज के अधिकारों को जानना, बिलिंग पर सवाल उठाना, पारदर्शिता की मांग करना—यह सब आवश्यक है, चुप रहना अब विकल्प नहीं है।

इस घटना को केवल एक खबर की तरह पढ़कर भूल जाना आसान है। लेकिन यह समझना जरूरी है कि यह सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं है। यह उस व्यवस्था की विफलता का प्रतीक है जो हर दिन हजारों लोगों को प्रभावित करती है। यदि आज सवाल नहीं उठे, तो कल कोई और परिवार इसी दर्द से गुजरेगा।

कैमरे की कलम: गुमनामी के साये में सुबह का सिपाही


सुबह की पहली किरण जब क्षितिज पर दस्तक देती है, तब शहर अब भी आधी नींद में होता है। कहीं चाय चढ़ रही होती है, कहीं अलार्म बजने की तैयारी में होता है, और कहीं लोग अभी सपनों में खोए रहते हैं। लेकिन इसी अधजगी दुनिया में कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिनका दिन बहुत पहले शुरू हो चुका होता है। ये वे लोग हैं, जो हमारे दरवाजे तक हर सुबह अखबार पहुँचाते हैं—अखबार हॉकर।

हमारे लिए अखबार महज़ खबरों का पुलिंदा हो सकता है, लेकिन उनके लिए यह रोज़ी-रोटी का जरिया है, जीवन का संघर्ष है और जिम्मेदारी का एक ऐसा बोझ है, जिसे वे बिना किसी शोर-शराबे के ढोते रहते हैं। जब शहर सो रहा होता है, तब हॉकर जाग चुके होते हैं। सुबह के तीन या चार बजे का समय—जब ठंड हड्डियों तक चुभती है या गर्मी की रात अभी ढली नहीं होती—वे अपने दिन की शुरुआत करते हैं। नींद अधूरी होती है, शरीर थका हुआ होता है, लेकिन जिम्मेदारियाँ उन्हें आगे बढ़ने को मजबूर करती हैं।

अखबार एजेंसी तक पहुँचना, बंडल उठाना, उन्हें अलग-अलग मोहल्लों के हिसाब से बांटना—यह सब काम इतनी तेजी और सटीकता से होता है कि मानो यह कोई अभ्यास किया हुआ युद्ध हो। हर अखबार सही घर तक पहुँचना चाहिए, हर ग्राहक की अपेक्षा पूरी होनी चाहिए। एक छोटी सी चूक भी शिकायत में बदल सकती है। हॉकर का सबसे बड़ा दुश्मन समय होता है। उन्हें हर हाल में सूरज निकलने से पहले अपना काम पूरा करना होता है। साइकिल, मोटरसाइकिल या कभी-कभी पैदल—वे गलियों, सड़कों और मोहल्लों में दौड़ते रहते हैं। बारिश हो तो अखबार बचाना भी चुनौती बन जाता है। हवा तेज हो तो पन्ने उड़ने का डर रहता है। ठंड में उंगलियां सुन्न हो जाती हैं और गर्मी में पसीना आँखों में चुभता है। लेकिन इन सबके बावजूद, उनके काम की रफ्तार कभी धीमी नहीं पड़ती।

यह विडंबना ही है कि जो व्यक्ति हर सुबह हमें देश-दुनिया की खबरों से जोड़ता है, उसकी अपनी आर्थिक स्थिति अक्सर कमजोर होती है। अखबार बांटने के बदले उन्हें बहुत कम पैसा मिलता है—इतना कि उससे गुजारा करना भी मुश्किल हो जाता है। अक्सर यह काम वे किसी और नौकरी के साथ करते हैं, या फिर उनके परिवार के अन्य सदस्य भी किसी छोटे-मोटे काम में लगे होते हैं। कई बार बच्चों की पढ़ाई भी इसी संघर्ष में पीछे छूट जाती है।

समाज में हर काम का एक महत्व होता है, लेकिन हर काम को समान सम्मान नहीं मिलता। हॉकर का काम भी ऐसा ही है—जरूरी तो है, लेकिन सम्मान के मामले में पीछे छूट जाता है। हम अक्सर दरवाजा खोलते ही अखबार उठा लेते हैं, बिना यह सोचे कि उसे वहाँ तक पहुँचाने में कितनी मेहनत लगी होगी। कभी-कभी शिकायतें भी कर देते हैं—अखबार देर से आया, गीला था या सही जगह नहीं रखा गया। लेकिन क्या हम कभी उनके हालात समझने की कोशिश करते हैं?

अखबार हॉकर सिर्फ अखबार नहीं बाँटते, वे विश्वास भी बाँटते हैं। हर घर उनसे एक तय समय पर अखबार की उम्मीद करता है। यह भरोसा उनके कंधों पर एक अदृश्य जिम्मेदारी की तरह होता है। कई बार वे बीमार होते हुए भी काम पर निकलते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि अगर वे नहीं गए, तो कई घरों में सुबह अधूरी रह जाएगी। यह सिर्फ काम नहीं, बल्कि एक आदत और एक भरोसा है, जिसे वे निभाते हैं।

आज के डिजिटल युग में, जब खबरें मोबाइल स्क्रीन पर पल भर में उपलब्ध हो जाती हैं, अखबार हॉकर का काम और भी कठिन हो गया है। लोगों ने अखबार पढ़ना कम कर दिया है, जिससे उनकी आय पर सीधा असर पड़ा है। लेकिन इसके बावजूद, वे हार नहीं मानते। वे जानते हैं कि अभी भी बहुत से लोग सुबह की चाय के साथ कागज़ की खुशबू और छपी हुई खबरों का आनंद लेना पसंद करते हैं।

अगर हम गहराई से सोचें, तो हॉकर समाज को जोड़ने में एक अहम भूमिका निभाते हैं। वे हर दिन लाखों लोगों तक जानकारी पहुँचाते हैं, जागरूकता फैलाते हैं और लोकतंत्र की नींव को मजबूत करते हैं। उनका काम भले ही छोटा लगे, लेकिन उसका प्रभाव बहुत बड़ा होता है। वे उस सूचना श्रृंखला की पहली कड़ी हैं, जिसके बिना खबरें लोगों तक नहीं पहुँच सकतीं।

इन सबके बीच, हॉकर भी इंसान हैं—उनके भी सपने हैं, इच्छाएँ हैं और परेशानियाँ हैं। कोई अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देना चाहता है, कोई अपने घर की हालत सुधारना चाहता है, तो कोई सिर्फ एक स्थिर जीवन की उम्मीद करता है लेकिन अक्सर ये सपने जिम्मेदारियों और संघर्षों के बोझ तले दब जाते हैं। यह जरूरी है कि हम इन गुमनाम नायकों को पहचानें और उनके प्रति संवेदनशील बनें। एक छोटी सी मुस्कान, एक धन्यवाद, या उनके काम की सराहना—यह सब उनके लिए बहुत मायने रखता है। सरकार और समाज को भी उनके लिए बेहतर योजनाएँ बनानी चाहिए—जैसे बीमा, स्वास्थ्य सुविधाएँ और उचित वेतन। क्योंकि जब तक उनके जीवन में सुधार नहीं होगा, तब तक इस व्यवस्था की नींव कमजोर ही रहेगी।



कैमरे की कलम: बादाम, बाबू और बेबस नागरिक


बिलासपुर के हाउसिंग बोर्ड कार्यालय में घटी हालिया घटना ने प्रशासनिक तंत्र की उस पुरानी बीमारी को फिर उजागर कर दिया है, जिसे हम सब जानते तो हैं, पर अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। तोरण साहु नाम का युवक अपनी फाइल के महीनों से अटके होने से त्रस्त जब महिला अधिकारी की मेज पर बादाम उड़ेलते हुए यह कहता है कि “इसे खाइए, याद आ जाएगा फाइल कहां रखी है”, तो यह केवल एक क्षणिक आवेश या अनोखा विरोध नहीं रह जाता; यह व्यवस्था पर सीधा, तीखा और असहज सवाल बन जाता है।

यह घटना हंसी का विषय बन सकती है, सोशल मीडिया पर मनोरंजन का साधन भी। लेकिन यदि इसे केवल एक वायरल वीडियो के रूप में देख लिया गया, तो हम उस गहरे संकट को नजरअंदाज कर देंगे, जिसकी ओर यह इशारा करती है। 

उसके बादाम सिर्फ मेज पर नहीं गिरे थे वे उस पूरी व्यवस्था पर गिरे थे जो वर्षों से “याददाश्त खोने” का नाटक कर रही है।

सरकारी दफ्तरों में “फाइल नहीं मिल रही” अब अपवाद नहीं, लगभग एक स्वीकृत सत्य बन चुका है। यह स्थिति उतनी ही चिंताजनक है, जितनी सामान्य लगने लगी है। सवाल यह नहीं कि फाइलें क्यों खो जाती हैं, सवाल यह है कि उनके खो जाने के बाद भी व्यवस्था क्यों नहीं हिलती? एक नागरिक जब अपनी वैध प्रक्रिया पूरी कर चुका हो, दस्तावेज जमा कर चुका हो, और फिर भी महीनों तक केवल यह सुनता रहे कि उसकी फाइल “ढूंढी जा रही है”, तो यह केवल प्रशासनिक ढिलाई नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों का प्रत्यक्ष हनन है।

प्रशासनिक प्रक्रियाओं में समयसीमा तय होती है, कम से कम कागजों पर लेकिन व्यवहार में यह समयसीमा अक्सर एक औपचारिकता भर रह जाती है। एक-दो महीने में पूरा होने वाला काम सात महीने तक भी अधूरा रह जाए, तो यह केवल देरी नहीं, बल्कि जवाबदेही की विफलता है। इस विफलता की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसका कोई स्पष्ट उत्तरदायी नहीं होता। फाइल एक टेबल से दूसरी टेबल तक घूमती रहती है, और अंततः “कहीं” अटक जाती है बिना किसी के जिम्मेदार ठहराए।

यह विचारणीय है कि एक नागरिक को अपने वैध अधिकार के लिए व्यंग्य का सहारा क्यों लेना पड़ता है। बादाम का प्रतीकात्मक उपयोग केवल हास्य नहीं था यह उस संवेदनहीनता पर चोट थी, जो प्रशासनिक व्यवहार में गहराई तक समा चुकी है। जब सीधी शिकायतें अनसुनी रह जाती हैं, जब आवेदन और अनुस्मारक (रिमाइंडर) निष्प्रभावी हो जाते हैं, तब नागरिक के पास ऐसे ही प्रतीकात्मक तरीकों का सहारा बचता है। यह स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए स्वस्थ संकेत नहीं मानी जा सकती।

इस पूरे प्रकरण में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि मामला तब चर्चा में आया, जब उसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। यह दर्शाता है कि पारंपरिक शिकायत तंत्र की तुलना में सार्वजनिक दबाव अब अधिक प्रभावी होता जा रहा है लेकिन क्या किसी नागरिक को न्याय या समाधान पाने के लिए अपने मुद्दे को वायरल करना आवश्यक होना चाहिए? यदि हां, तो यह प्रशासनिक तंत्र की गंभीर कमजोरी का संकेत है।

किसी भी प्रशासनिक व्यवस्था की विश्वसनीयता उसकी जवाबदेही पर निर्भर करती है। यदि फाइल गुम होती है, तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि इसके लिए कौन जिम्मेदार है। यदि तय समय में काम नहीं होता, तो इसके परिणाम क्या होंगे। वर्तमान स्थिति में, इन दोनों प्रश्नों के उत्तर अक्सर धुंधले होते हैं। यही धुंधलापन लापरवाही को बढ़ावा देता है और नागरिक को असहाय बनाता है। 

यह मान लेना आसान है कि यह सिर्फ एक अलग घटना है लेकिन सच्चाई यह है कि यह हर शहर, हर कस्बे, हर दफ्तर की कहानी है—बस तरीके अलग-अलग हैं।

इस पूरी व्यवस्था में सबसे अधिक प्रभावित वह नागरिक है, जिसके पास न तो संसाधन हैं और न ही प्रभाव। वह केवल प्रक्रिया का पालन करता है, निर्देशों का अनुपालन करता है, और बदले में अपेक्षा करता है कि उसका काम समय पर हो जाएगा लेकिन जब उसे बार-बार दफ्तर के चक्कर लगाने पड़ते हैं, जब उसे हर बार नया बहाना सुनने को मिलता है, तो यह केवल असुविधा नहीं—यह उसके आत्मसम्मान पर भी चोट है।

इस घटना को एक अपवाद मानकर भुला देना आसान होगा, लेकिन इससे समस्या समाप्त नहीं होगी। आवश्यक है कि इसे एक संकेत के रूप में देखा जाए और सुधार की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं। प्रक्रियाओं का पूर्ण डिजिटलीकरण, ताकि फाइलों के गुम होने की संभावना समाप्त हो, समयबद्ध सेवा की सख्त निगरानी, प्रत्येक स्तर पर स्पष्ट जवाबदेही और सबसे महत्वपूर्ण, नागरिक के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण होना जरूरी है। 

बिलासपुर की यह घटना केवल एक युवक के विरोध की कहानी नहीं है; यह उस व्यापक असंतोष की अभिव्यक्ति है, जो लंबे समय से प्रशासनिक उदासीनता के कारण पनप रहा है।बादाम यहां एक प्रतीक बन गए हैं—याददाश्त बढ़ाने का नहीं, बल्कि व्यवस्था को उसकी जिम्मेदारियों की याद दिलाने का। 

कैमरे की कलम: “साड़ी में भी ‘फीका’ पड़ गया सिस्टम !”


छत्तीसगढ़ में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं की साड़ियों का मामला अब रंग से ज्यादा ‘ढंग’ दिखाने लगा है। साड़ियाँ क्या आईं, जैसे मानो सरकारी वादों की तरह पहले चमकदार, फिर धीरे-धीरे फीकी! कहीं लंबाई कम, कहीं चौड़ाई गायब, तो कहीं कपड़ा इतना पतला कि पारदर्शिता में ईमानदारी भी शरमा जाए। लोकतंत्र में योजनाएं अक्सर बड़े इरादों के साथ जन्म लेती हैं, कागज़ों पर वे संवेदनशीलता की मिसाल होती हैं, भाषणों में वे जनकल्याण की गारंटी बन जाती हैं और विज्ञापनों में वे सरकार की “जनहितैषी” छवि का चमकदार चेहरा। लेकिन ज़मीनी हकीकत कभी-कभी इतनी विडंबनापूर्ण होती है कि वह इन दावों का मज़ाक बनाकर रख देती है। छत्तीसगढ़ में महिला एवं बाल विकास विभाग की साड़ी खरीदी का ताज़ा मामला भी कुछ ऐसा ही है जहां साड़ी की लंबाई कम हुई है, लेकिन सवालों की सूची लंबी होती जा रही है।

करीब 9.7 करोड़ रुपए की लागत से गुजरात के सूरत से खरीदी गई साड़ियां, जो आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं के सम्मान का प्रतीक बननी थीं, अब उपहास और आक्रोश का कारण बन गई हैं। जिन महिलाओं के कंधों पर पोषण, शिक्षा और समाज के सबसे निचले तबके तक सरकारी योजनाएं पहुंचाने की जिम्मेदारी है, उन्हें ऐसी साड़ियां दी गईं जिन्हें पहनना तक मुश्किल हो गया। कहीं लंबाई कम, कहीं रंग धोते ही गायब, और कहीं कपड़ा ऐसा कि बाजार में आधी कीमत पर भी लोग दो बार सोचें। यह केवल गुणवत्ता की समस्या नहीं, बल्कि नीयत की गुणवत्ता का भी आईना है। 

विडंबना देखिए वर्क ऑर्डर में साड़ी की लंबाई 6.3 मीटर तय की गई थी लेकिन वितरण के बाद यह लंबाई 5 मीटर तक सिमट गई। ऐसा लगता है जैसे साड़ी ही नहीं, पूरी व्यवस्था “डाइटिंग” पर चली गई हो। फर्क बस इतना है कि इस डाइटिंग से किसी का वजन नहीं, बल्कि जनता का भरोसा कम हो रहा है।

अब सवाल यह है कि यह सब हुआ कैसे ? क्या यह मान लिया जाए कि करोड़ों की खरीदी में गुणवत्ता जांच महज औपचारिकता थी ? या फिर यह माना जाए कि जांच करने वालों की नजरें भी उसी तरह “सिकुड़” गई थीं, जैसे साड़ी धोने के बाद सिकुड़ रही है ? सरकारी तंत्र में यह एक पुराना खेल है फाइलों में सब कुछ परफेक्ट, जमीन पर सब कुछ संदिग्ध। कागज़ों पर साड़ी पूरी लंबाई की, लेकिन हकीकत में कटौती का ऐसा हुनर कि दर्जी भी शरमा जाए।

सरकार की मंशा पर बात करना भी इस समय जरूरी है। योजनाएं बनाते वक्त सरकार यह संदेश देना चाहती है कि वह अपने जमीनी कार्यकर्ताओं के प्रति संवेदनशील है। लेकिन जब क्रियान्वयन इस स्तर का हो, तो यह संवेदनशीलता संदेह में बदल जाती है। क्या सरकार को इस गड़बड़ी की जानकारी नहीं थी ? अगर नहीं थी, तो यह प्रशासनिक विफलता है और अगर थी तो यह और भी गंभीर सवाल खड़े करता है,क्या जानबूझकर आंखें मूंद ली गईं?

राज्य की महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े का इस मसले पर बयान आया है कि “जहां-जहां खराब साड़ियाँ गई हैं, उन्हें वापस किया जाएगा।” सुनकर ऐसा लगा जैसे साड़ियों की नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों की ‘रिटर्न पॉलिसी’ लागू हो गई हो। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या मंत्री को इस खरीदी की गुणवत्ता का अंदाजा नहीं था? या फिर यह मामला उनकी प्राथमिकताओं में कहीं पीछे छूट गया? यदि मंत्री स्तर पर ही ऐसी लापरवाही नजर आए, तो नीचे के अधिकारियों से क्या उम्मीद की जा सकती है?

इस पूरे प्रकरण का सबसे दिलचस्प और दुखद पहलू यह है कि इसमें नुकसान केवल पैसों का नहीं हुआ, बल्कि भरोसे का भी हुआ है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, जो पहले से ही सीमित संसाधनों में काम करती हैं, अब खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही हैं। जिनके लिए यह साड़ी सम्मान का प्रतीक होनी चाहिए थी, वह अब उनके लिए एक “समस्या” बन गई है। यह स्थिति केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि संवेदनशीलता की कमी को भी दर्शाती है। यह साड़ी घोटाला भी कुछ ऐसा ही कर रहा है। विपक्ष के लिए यह मुद्दा तैयार है, जनता के बीच यह चर्चा का विषय बन चुका है, और सोशल मीडिया पर यह व्यंग्य का नया केंद्र बन गया है। लोग कह रहे हैं “साड़ी ही नहीं, सरकार की साख भी सिकुड़ गई है।”

 एक सवाल यह भी है कि जिस “खादी और ग्रामोद्योग” को आत्मनिर्भरता और गुणवत्ता का प्रतीक माना जाता है, उसी के जिम्मे यह खरीदी थी। यह वही खादी है, जिसे कभी स्वदेशी और स्वाभिमान का प्रतीक कहा जाता था। लेकिन इस मामले में यह प्रतीक भी सवालों के घेरे में आ गया है। क्या खादी अब केवल नाम भर रह गई है, और गुणवत्ता कहीं पीछे छूट गई है? या फिर गुजरात के सूरत शहर के जिस साड़ी निर्माता को यह ठेका दिया गया उसका खादी से कोई वास्ता ही नहीं। 

इस पूरे घटनाक्रम में एक पैटर्न भी नजर आता है, छोटी-छोटी कटौतियों का बड़ा खेल। कहीं लंबाई में कटौती, कहीं गुणवत्ता में, और कहीं जवाबदेही में। यह कटौती केवल साड़ी तक सीमित नहीं रहती, बल्कि धीरे-धीरे सिस्टम की आत्मा को भी काटने लगती है। और जब यह प्रक्रिया लंबे समय तक चलती है, तो भ्रष्टाचार “अपवाद” नहीं, बल्कि “व्यवस्था” बन जाता है।

अब सवाल यह है कि आगे क्या ? क्या इस मामले की जांच होगी ? क्या जिम्मेदारों पर कार्रवाई होगी ? या फिर यह मामला भी उन फाइलों में दफन हो जाएगा, जहां पहले से ही कई “घोटाले” धूल खा रहे हैं ? अनुभव कहता है कि शोर कुछ दिनों तक रहेगा, बयानबाजी होगी, और फिर धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य हो जाएगा। लेकिन हर बार की तरह इस बार भी एक चीज पीछे छूट जाएगी—जनता का भरोसा।

सरकार के लिए यह समय आत्ममंथन का है। योजनाएं बनाना आसान है, लेकिन उन्हें ईमानदारी से लागू करना ही असली चुनौती है। यदि जमीनी स्तर पर ही ऐसी गड़बड़ियां होती रहेंगी, तो बड़े-बड़े दावे भी खोखले साबित होंगे। और जब जनता का भरोसा डगमगाने लगे, तो कोई भी “विकास” का नारा उसे संभाल नहीं सकता।

अंततः, यह मामला हमें एक कड़वी सच्चाई की याद दिलाता है—भ्रष्टाचार हमेशा बड़े घोटालों में ही नहीं होता, वह छोटी-छोटी कटौतियों में भी छिपा होता है। और जब ये छोटी कटौतियां मिलकर एक बड़ा रूप ले लेती हैं, तो वह केवल आर्थिक नुकसान नहीं पहुंचातीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता को भी कमजोर कर देती हैं।

 इस “छोटी साड़ी” की कहानी दरअसल बहुत बड़ी है। यह केवल कपड़े की लंबाई की नहीं, बल्कि नीयत की गहराई की कहानी है। और जब नीयत ही छोटी हो जाए, तो फिर किसी भी योजना की लंबाई बढ़ाने से क्या फर्क पड़ता है? कुल मिलाकर, साड़ी का रंग भले ही फीका पड़ गया हो लेकिन इस पूरे मामले ने सिस्टम के रंग जरूर गहरे कर दिए हैं—और वो भी ऐसे कि अब धुलने से भी नहीं जाएंगे ! 

कैमरे की कलम: “मर्यादा बिकाऊ है: समाज के इस ‘सभ्य’ बाजार में आपका स्वागत है”

हाल के कुछ महीनों में देश के विभिन्न हिस्सों से सामने आई घटनाएं जिनमें कथित आध्यात्मिक व्यक्तियों पर यौन शोषण के आरोप, सार्वजनिक जीवन से जुड़े प्रभावशाली लोगों पर पद दुरुपयोग के आरोप, और निजी संबंधों में अविश्वास के चलते हिंसा एक व्यापक सामाजिक प्रवृत्ति की ओर संकेत करती हैं।  इन घटनाओं को अलग-अलग देखना आसान है लेकिन जब इन्हें एक साथ रखा जाता है, तो यह प्रश्न उठता है कि क्या समाज की नैतिक और सामाजिक संरचना किसी परिवर्तन के दौर से गुजर रही है और यदि हां, तो उसकी दिशा क्या है? 

हाल के दिनों में नासिक और सूरत से सामने आए दो अलग-अलग मामले, भले ही अपने स्वरूप में भिन्न प्रतीत होते हों, लेकिन वे एक साझा सामाजिक प्रश्न की ओर इशारा करते हैं। नासिक में एक स्वयंभू आध्यात्मिक गुरु और ज्योतिषी, अशोक खरात, के कथित यौन शोषण से जुड़े वीडियो सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से प्रसारित हुए हैं। आरोपों के अनुसार, वह महिलाओं को उनके पारिवारिक जीवन, विशेषकर पति से जुड़े संभावित “खतरों” का भय दिखाकर अपने पास बुलाता था। इसके बाद वह कथित रूप से “विशेष अनुष्ठान” के नाम पर उनका शोषण करता, इन कृत्यों को रिकॉर्ड करता और बाद में ब्लैकमेलिंग या आर्थिक लाभ के लिए इस्तेमाल करता। इस मामले की गंभीरता केवल आरोपों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भी बताया गया है कि उसके पास से बड़ी मात्रा में संपत्ति बरामद हुई है जो इस पूरे तंत्र की संगठित प्रकृति की ओर संकेत करता है।

इसी समय, सूरत से सामने आया एक अन्य मामला धार्मिक संस्थाओं की आंतरिक जवाबदेही पर प्रश्न खड़े करता है। यहां एक जैन मुनि के कथित आपत्तिजनक ऑडियो और वीडियो सामने आने के बाद, स्थानीय समुदाय की महिलाओं ने स्वयं पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि शिकायत किसी बाहरी विरोध या राजनीतिक आरोप के रूप में नहीं, बल्कि उसी धार्मिक समुदाय के भीतर से आई। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि इस तरह की घटनाएं न केवल व्यक्तिगत आचरण का प्रश्न हैं, बल्कि पूरे समुदाय और उसकी आस्था की छवि को प्रभावित करती हैं।

इसी व्यापक परिदृश्य में छत्तीसगढ़ के चर्चित आईपीएस रतनलाल डांगी के स्कैंडल को देखिये। इसी तरह राज्य के बिलासपुर, रायपुर और कवर्धा से सामने आई हाल की घटनाएं सामाजिक अस्थिरता के एक और पहलू को उजागर करती हैं। बिलासपुर जिले के रतनपुर क्षेत्र के ग्राम पेंडरवा में चरित्र संदेह को लेकर हुआ हिंसक संघर्ष हो, या रायपुर में पारिवारिक संबंधों से जुड़ी गंभीर हत्याएं, ये घटनाएं यह संकेत देती हैं कि निजी संबंधों में अविश्वास किस प्रकार हिंसक रूप ले सकता है। इसी तरह, कवर्धा में सामने आया बाल यौन शोषण का मामला यह दर्शाता है कि अपराध के स्वरूप और संदर्भ बदल रहे हैं और पारंपरिक धारणाएं इन जटिलताओं को पूरी तरह समझाने में सक्षम नहीं हैं।

कहते हैं भारत “संस्कारों का देश” है। यहां परिवार है, परंपरा है, मर्यादा है, और सबसे बढ़कर—“इज्जत” है लेकिन जरा ठहरकर आईना देखिए। क्या वाकई यह सब अब भी बचा है, या हम सिर्फ इन शब्दों की माला जपकर खुद को धोखा दे रहे हैं? सच यह है कि समाज अब “संस्कारों” से नहीं सुविधा, स्वार्थ और सन्नाटे से चल रहा है और इस नए समाज में आपका स्वागत है, जहां मर्यादा एक विचार नहीं एक बिकने वाली वस्तु है।

पहले लोग भगवान में विश्वास करते थे। अब लोग “बाबाओं के पैकेज” खरीदते हैं। “समस्या समाधान शिविर”, “विशेष अनुष्ठान” और “गुप्त साधना” नाम बदलते रहते हैं, लेकिन धंधा वही रहता है। डर बेचो, समाधान बेचो और अगर ग्राहक खास हो तो “विशेष सेवा” भी दे दो। यहां सबसे मजेदार बात यह है कि ग्राहक खुद चलकर आता है। वह अपने डर, अपनी कमजोरी और कई बार अपनी समझ तक किसी और के चरणों में रख देता है और फिर जब उसके साथ शोषण होता है तो समाज कहता है “उसे समझना चाहिए था।”

वाह! धोखा भी खाओ और दोष भी खुद पर लो। शरीर: अब आत्मा से ज्यादा उपयोगी संपत्ति। हमने हमेशा कहा कि “आत्मा अमर है, शरीर नश्वर है।” लेकिन व्यवहार में हमने क्या किया? हमने शरीर को ही सबसे बड़ा निवेश बना दिया। कहीं नौकरी के लिए, कहीं प्रमोशन के लिए, कहीं कृपा पाने के लिए— शरीर अब एक “करेंसी” बन चुका है और इस बाजार में खरीदार भी हैं, बिकने वाले भी हैं और सबसे ज्यादा देखकर चुप रहने वाले दर्शक।

कहते हैं सत्ता सेवा का माध्यम होती है लेकिन अब यह सुविधा का शॉर्टकट बन चुकी है। फाइल आगे बढ़ानी है? संपर्क चाहिए। संपर्क नहीं है? तो “समझौता” चाहिए और यह समझौता किस चीज का होता है यह बताने की जरूरत नहीं। यहां नैतिकता फाइलों में बंद रहती है और फैसले बंद कमरों में होते हैं। बाहर भाषण में “नारी सम्मान” गूंजता है, और अंदर सम्मान का सबसे सस्ता सौदा होता है।

हमने बचपन में पढ़ा था कि द्रौपदी का चीर हरण अन्याय था और पूरा सभ्य समाज उसके खिलाफ खड़ा होना चाहिए था। आज भी चीर हरण हो रहा है लेकिन फर्क यह है कि अब यह एक सिस्टम बन चुका है। कभी कैमरे के जरिए, कभी ब्लैकमेलिंग के जरिए, कभी सत्ता के दबाव से और सबसे बड़ी बात अब कोई कृष्ण नहीं आता क्योंकि आज के “कृष्ण” खुद किसी और के दरबार में खड़े हैं।

समाज को अगर किसी को खत्म करना हो तो उसे सबूत की जरूरत नहीं होती उसे सिर्फ एक शब्द चाहिए: “चरित्र” . एक बार यह शब्द किसी महिला के नाम के साथ जुड़ गया, तो फिर न उसे सफाई का मौका मिलता है न न्याय का। और अगर कोई पुरुष इस “शक” के नाम पर हत्या कर दे तो समाज धीरे से कहता है “गुस्से में गलती हो गई।” गलती? या मानसिकता? 

हम कहते हैं कि “परिवार समाज की नींव है।” लेकिन सच्चाई यह है कि अब परिवार सबसे बड़ा अभिनय मंच बन चुका है। बाहर से सब ठीक, अंदर से सब बिखरा हुआ। संवाद नहीं है, विश्वास नहीं है, लेकिन फोटो पर मुस्कान है और जब सच्चाई बाहर आती है तो या तो रिश्ता टूटता है या किसी की जान चली जाती है।

हर बार जब कोई मामला सामने आता है तो सबसे आसान सवाल पूछा जाता है “वह वहां क्यों गई?” कोई यह नहीं पूछता “उसे वहां तक लाया किसने?” समाज को एक आदत लग चुकी है दोष वहीं डालो, जहां से आवाज कम उठे और महिलाएं इस व्यवस्था में सबसे आसान निशाना हैं।

आज हर स्कैंडल एक “कंटेंट” है। वीडियो वायरल, रील तैयार, कैप्शन सनसनीखेज। किसी की जिंदगी बर्बाद हो रही है, लेकिन व्यूज बढ़ रहे हैं तो सब ठीक है। यह समाज अब संवेदनशील नहीं रहा यह मनोरंजनप्रिय हो गया है। उसे सच नहीं चाहिए, उसे मसाला चाहिए। हम खुद को निर्दोष मानते हैं। कहते हैं “हमने क्या किया?” लेकिन असली सवाल यह है— हमने क्या नहीं किया? हमने सवाल नहीं पूछा, हमने विरोध नहीं किया, हमने चुप्पी चुनी और यही चुप्पी हर अपराध की साझेदार बन गई।

समस्या यह नहीं है कि हमें सच्चाई दिखती नहीं है। समस्या यह है कि हम उसे देखना नहीं चाहते क्योंकि अगर हम सच देख लेंगे, तो हमें बदलना पड़ेगा और बदलना सबसे मुश्किल काम है। इसलिए हम क्या करते हैं? हम मर्यादा की बात करते हैं, संस्कारों की बात करते हैं और फिर चुपचाप उसी दलदल में उतर जाते हैं जिसे हम खुद कोसते हैं। जब मर्यादा बिक रही हो, आस्था व्यापार बन चुकी हो और रिश्ते समझौते में बदल गए हों तो दोष किसे दें?

कैमरे की कलम: जंगल, कानून और ‘मूल्य’ की विडंबना


जंगलों को अक्सर “कानून से परे” नहीं, बल्कि “कानून के भीतर संरक्षित” माना जाता है। यही वह जगह है जहां नियम सबसे सख्त होने चाहिए क्योंकि यहां दांव पर केवल पेड़ नहीं, बल्कि पारिस्थितिकी, वन्यजीवन और भविष्य की पीढ़ियों का संतुलन होता है लेकिन जब इन्हीं कानूनों के संरक्षक, उनके अर्थ का मूल्य तय करने लगें, तो सवाल सिर्फ भ्रष्टाचार का नहीं, बल्कि नैतिक विघटन का भी हो जाता है। 

हालिया मामले में अचानकमार टाइगर रिजर्व के सुरही रेंज में पदस्थ रेंजर पल्लव नायक और डिप्टी रेंजर मनीष श्रीवास्तव पर 50 हजार रुपये की रिश्वत लेते रंगेहाथ पकड़े जाने का आरोप इसी विडंबना को उजागर करता है। आरोप यह है कि उन्होंने एक प्रकरण में चालान जल्दी पेश करने और जब्त वाहन छोड़ने के एवज में रिश्वत मांगी। पहली नजर में यह एक “रूटीन भ्रष्टाचार” जैसा लग सकता है। एक और ट्रैप, एक और गिरफ्तारी, एक और मामला। लेकिन अगर इस घटना को जंगल और वन्यजीवन की दृष्टि से देखा जाए, तो इसका अर्थ कहीं अधिक गहरा और चिंताजनक हो जाता है।

जंगल का कानून अपने आप में अनूठा होता है। यह सिर्फ कागज पर लिखे नियमों का समूह नहीं, बल्कि एक नैतिक अनुशासन है जिसमें मनुष्य को स्वयं को सीमित रखना होता है ताकि प्रकृति अपना संतुलन बनाए रख सके। जब कोई व्यक्ति जंगल में प्रवेश करता है, तो वह केवल एक स्थान में नहीं, बल्कि एक व्यवस्था में प्रवेश करता है, जहां हर पेड़, हर जीव, हर ध्वनि का अपना महत्व है। ऐसे में, जो लोग इस व्यवस्था की रक्षा के लिए नियुक्त किए जाते हैं, उनसे अपेक्षा होती है कि वे इस अनुशासन के सबसे बड़े संरक्षक होंगे लेकिन जब यही संरक्षक “नियमों की कीमत” तय करने लगें, तो सवाल उठता है क्या जंगल का कानून भी अब मोलभाव का विषय बन चुका है?

इस मामले में जिस तरह से कथित रूप से लाखों रुपये की बात की गई और फिर 70 हजार रुपये में “समाधान” तलाशा गया, वह केवल एक लेन-देन नहीं, बल्कि एक सोच का प्रतिबिंब है। यह सोच बताती है कि कानून को एक सेवा के रूप में देखा जा रहा है—जहां नियमों का पालन नहीं, बल्कि उनका “प्रबंधन” किया जाता है। और यह प्रबंधन अक्सर उन लोगों के पक्ष में झुक जाता है, जो इसकी कीमत चुका सकते हैं।

कल्पना कीजिए एक हिरण, जो अपनी सुरक्षा के लिए कानून पर निर्भर है, लेकिन कानून की ‘कीमत’ तय हो चुकी है। या एक पेड़, जो कटने से पहले यह नहीं पूछ सकता कि उसकी रक्षा के बदले कितनी रकम तय हुई है। जंगल न तो सौदे समझता है, न रसीदें। वह सिर्फ संतुलन जानता है और वही संतुलन सबसे पहले टूटता है। एक हिरण जो जंगल में निर्भय होकर दौड़ना चाहता है, उसे क्या फर्क पड़ता है कि किसी फाइल में क्या लिखा है या किसने कितनी राशि दी? एक पक्षी, जो अपने घोंसले के लिए सुरक्षित पेड़ ढूंढ रहा है, उसे क्या पता कि उस पेड़ की सुरक्षा किसी “समझौते” का हिस्सा बन चुकी है? जंगल की दुनिया में न तो रिश्वत का कोई अर्थ है, न ही कोई वैधता। 

इस तरह की घटनाएं केवल व्यक्तिगत भ्रष्टाचार का उदाहरण नहीं हैं; वे उस व्यापक मानसिकता की ओर इशारा करती हैं, जिसमें सार्वजनिक जिम्मेदारियों को निजी अवसरों में बदल दिया जाता है। यह मानसिकता केवल वन विभाग तक सीमित नहीं है, लेकिन जंगलों के संदर्भ में इसका प्रभाव कहीं अधिक गंभीर होता है। क्योंकि यहां नुकसान केवल आर्थिक नहीं, बल्कि पारिस्थितिक होता है जो अक्सर अपूरणीय होता है।

अचानकमार जैसे संरक्षित क्षेत्र केवल भौगोलिक सीमाएं नहीं हैं; वे संरक्षण के प्रतीक हैं। यहां हर नियम, हर प्रतिबंध, हर निगरानी का उद्देश्य एक ही होता है। प्रकृति को उसके मूल स्वरूप में बनाए रखना लेकिन जब इन नियमों को लागू करने वाले ही उन्हें “लचीला” बना दें, तो संरक्षण की पूरी अवधारणा ही कमजोर पड़ने लगती है।यह भी ध्यान देने योग्य है कि इस मामले की शुरुआत एक सोशल मीडिया रील से हुई। एक ऐसी दुनिया से, जहां दृश्यता अक्सर जिम्मेदारी से अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। एक रील, एक वायरल वीडियो, और उसके बाद की कार्रवाई यह क्रम अपने आप में आधुनिक समय की एक कहानी कहता है लेकिन इस कहानी का सबसे चिंताजनक हिस्सा वह है, जहां कार्रवाई के बाद भी “समाधान” के लिए रिश्वत का रास्ता अपनाया गया।

यहां एक और सवाल उठता है क्या कानून का भय अब केवल औपचारिकता बनकर रह गया है? अगर कोई व्यक्ति यह मानकर चलता है कि नियमों को पैसे के जरिए “समायोजित” किया जा सकता है, तो यह केवल उस व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की विफलता को दर्शाता है। यह हमें हमारी ही बनाई हुई व्यवस्था का प्रतिबिंब दिखाता है जहां हम एक तरफ जंगलों की रक्षा की बात करते हैं और दूसरी तरफ उनके नियमों को कमजोर करने वाली प्रक्रियाओं को नजरअंदाज कर देते हैं। यह आईना हमें यह भी दिखाता है कि भ्रष्टाचार केवल एक लेन-देन नहीं, बल्कि एक विचारधारा है जो धीरे-धीरे संस्थाओं को भीतर से खोखला कर देती है लेकिन इस अंधेरे चित्र के बीच एक सकारात्मक पहलू भी है—कार्रवाई। एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) की इस ट्रैप कार्रवाई ने यह संकेत दिया है कि व्यवस्था में अभी भी ऐसे तंत्र मौजूद हैं, जो जवाबदेही सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहे हैं। यह एक जरूरी याद दिलाता है कि कानून केवल लागू करने वालों तक सीमित नहीं है; उसे लागू कराने वाले भी हैं।

फिर भी, सवाल बना रहता है क्या ऐसी कार्रवाइयां पर्याप्त हैं? या हमें उस मानसिकता को बदलने की जरूरत है, जो ऐसे मामलों को जन्म देती है? शायद समाधान केवल सख्त कानूनों या अधिक निगरानी में नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक चेतना में है। जब तक हम सार्वजनिक पदों को “सेवा” के बजाय “सुविधा” के रूप में देखेंगे, तब तक ऐसे मामले सामने आते रहेंगे। और जब तक जंगलों को केवल संसाधन के रूप में देखा जाएगा, तब तक उनकी रक्षा केवल कागजों तक सीमित रहेगी। अंततः, यह मामला हमें एक असहज लेकिन जरूरी सवाल के साथ छोड़ता है क्या हम अपने जंगलों की रक्षा उन लोगों के भरोसे छोड़ सकते हैं, जिनके लिए कानून एक सिद्धांत नहीं, बल्कि एक विकल्प बन चुका है?

जंगल का मौन बहुत कुछ कहता है। वह हमें यह याद दिलाता है कि प्रकृति के नियम किसी सौदे का हिस्सा नहीं हो सकते। वे या तो पालन किए जाते हैं, या फिर उनके टूटने की कीमत चुकानी पड़ती है और यह कीमत अक्सर उन लोगों को चुकानी पड़ती है, जिनकी आवाज़ सबसे कम सुनी जाती है। शायद अब समय आ गया है कि हम यह तय करें क्या हम जंगलों को बचाना चाहते हैं, या केवल उनके नाम पर चलने वाले सौदों को?

कैमरे की कलम: सख्त कानून, कमजोर भरोसा


छत्तीसगढ़ विधानसभा में हाल ही में पारित दो विधेयक, धर्मांतरण को लेकर कड़े प्रावधान और परीक्षा में पेपर लीक के खिलाफ सख्त सजा एक व्यापक प्रवृत्ति की ओर इशारा करते हैं। देश के कई राज्यों में सरकारें अब अपराधों के जवाब में कानूनों को और कठोर बनाने का रास्ता चुन रही हैं। इन कानूनों में उम्रकैद, भारी जुर्माने और संपत्ति जब्ती जैसे प्रावधान शामिल हैं। ऐसी सज़ाएं जो आमतौर पर गंभीर हिंसक अपराधों के लिए आरक्षित मानी जाती रही हैं। पहली नज़र में यह सख्ती शासन की दृढ़ता और अपराध के प्रति ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ की नीति का संकेत देती है लेकिन सवाल यह है कि क्या कानूनों की कठोरता वास्तव में समस्या का समाधान है, या यह शासन की उस अधीरता का प्रतीक है जो जटिल सामाजिक और प्रशासनिक चुनौतियों का आसान और त्वरित समाधान तलाश रही है? 

भारत में पहले से ही धर्मांतरण के मामलों में बल, प्रलोभन या धोखे के जरिए किए गए प्रयास दंडनीय हैं। इसी तरह पेपर लीक भी पहले से अपराध की श्रेणी में है। ऐसे में नए कानूनों का औचित्य तब ही मजबूत माना जा सकता है जब यह स्पष्ट किया जाए कि मौजूदा कानूनों में किस स्तर पर विफलता रही। क्या समस्या कानूनों की कमी थी, या उनके क्रियान्वयन की? अक्सर यह देखा गया है कि जांच एजेंसियों की कमजोर तैयारी, सबूतों के अभाव, गवाहों के मुकर जाने और न्यायिक प्रक्रिया की धीमी गति के कारण आरोपी छूट जाते हैं। ऐसे में सज़ा की अवधि बढ़ा देना क्या इस संरचनात्मक कमजोरी को दूर कर सकता है?

हाल के वर्षों में कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां कड़े कानूनों के बावजूद अदालतों ने लंबी अवधि के बाद आरोपियों को बरी कर दिया, क्योंकि पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए जा सके। यह स्थिति यह सवाल खड़ा करती है कि क्या समस्या कानून की ‘कठोरता’ में है या ‘प्रभावशीलता’ में? कानूनों को कठोर बनाना अक्सर सरकारों के लिए एक सशक्त राजनीतिक संदेश देने का माध्यम भी बन जाता है। यह संदेश कि वे किसी मुद्दे पर गंभीर हैं लेकिन यह गंभीरता अगर केवल कागज़ों पर सख्ती तक सीमित रह जाए, तो यह न्याय के बजाय प्रतीकात्मकता का रूप ले लेती है।

इन विधेयकों को पारित करने की प्रक्रिया भी कम चिंताजनक नहीं है। संसद और विधानसभाओं में बहस की गुंजाइश लगातार सिमटती जा रही है। कई बार विधेयक बिना पर्याप्त चर्चा के पारित हो जाते हैं, और विपक्ष अपनी असहमति दर्ज कराने के लिए सदन से बहिर्गमन का रास्ता चुनता है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या लोकतंत्र केवल बहुमत के बल पर कानून बनाने तक सीमित हो गया है, या उसमें संवाद और जवाबदेही की भी कोई भूमिका बची है? सरकारों के लिए यह आवश्यक होना चाहिए कि वे नए कानूनों की आवश्यकता और उनके प्रभाव को सरल भाषा में जनता के सामने रखें। केवल वेबसाइट पर राय मांग लेना पर्याप्त नहीं है, क्योंकि जटिल विधायी भाषा आम नागरिक की पहुंच से बाहर होती है।

लोकतंत्र में मीडिया को सत्ता और जनता के बीच एक सेतु माना जाता है। लेकिन अगर मीडिया केवल आधिकारिक बयानों को प्रसारित करने तक सीमित रह जाए और आवश्यक प्रश्न न उठाए, तो यह भूमिका अधूरी रह जाती है। कठोर कानूनों के इस दौर में यह और भी जरूरी हो जाता है कि मीडिया यह पूछे क्या नए कानून वास्तव में आवश्यक थे? क्या पुराने कानूनों का पूरा इस्तेमाल किया गया? और क्या इन कानूनों से न्याय व्यवस्था मजबूत होगी या केवल भय का माहौल बनेगा? किसी भी कानून का प्रभाव केवल अपराधियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसका असर व्यापक सामाजिक वातावरण पर पड़ता है। जब कानून अत्यधिक कठोर हो जाते हैं, तो वे केवल अपराध को नियंत्रित करने का माध्यम नहीं रहते, बल्कि समाज में भय और नियंत्रण का एक ढांचा भी निर्मित करते हैं। यह खतरा तब और बढ़ जाता है जब कानूनों का इस्तेमाल चयनात्मक रूप से होने लगे। ऐसे में कानून न्याय का उपकरण कम और सत्ता के नियंत्रण का माध्यम अधिक प्रतीत होने लगता है।

छत्तीसगढ़ के ये नए कानून केवल एक राज्य की कहानी नहीं हैं, बल्कि उस व्यापक सोच का हिस्सा हैं जिसमें समस्याओं का समाधान ‘अधिक सख्ती’ में खोजा जा रहा है। लेकिन इतिहास और अनुभव यह बताते हैं कि कानून की कठोरता से अधिक महत्वपूर्ण उसका निष्पक्ष और प्रभावी क्रियान्वयन होता है। जब तक जांच प्रणाली मजबूत नहीं होगी, अदालतों में मामलों का समयबद्ध निपटारा नहीं होगा, और प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक नए और अधिक कठोर कानून भी वही परिणाम देंगे जो पुराने कानून देते आए हैं। आखिरकार, लोकतंत्र की असली परीक्षा कानूनों की संख्या या उनकी सख्ती में नहीं, बल्कि इस बात में है कि वे नागरिकों के जीवन में न्याय, विश्वास और समानता कितनी प्रभावी ढंग से स्थापित कर पाते हैं। 

कैमरे की कलम: नशे की खेती और सत्ता की खामोशी


छत्तीसगढ़ को लंबे समय तक “धान का कटोरा” कहा जाता रहा है। यह नाम केवल कृषि उत्पादन का प्रतीक नहीं था, बल्कि उस सामाजिक पहचान का भी संकेत था जिसमें मेहनत, खेती और सादगी की संस्कृति शामिल थी। लेकिन हाल के दिनों में जिस तरह अफीम (पॉपी) की अवैध खेती के मामले सामने आ रहे हैं, वे इस पहचान पर एक असहज प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं। दुर्ग और बलरामपुर में अफीम की खेती के अब तक तीन मामले उजागर हो चुके हैं। यह घटनाएँ केवल कानून-व्यवस्था से जुड़ी सामान्य खबरें नहीं हैं; यह उस खतरनाक प्रवृत्ति की ओर इशारा करती हैं जो समय रहते न रोकी गई तो आने वाले वर्षों में सामाजिक और पीढ़ीगत संकट का रूप ले सकती है। हालांकि अवैध रूप से हो रही अफीम की खेती के खुलासे के बाद राज्य सरकार पूरी तरह एक्शन मोड में आ गई है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने इस मामले पर कड़ा रुख अपनाते हुए सभी जिलों के कलेक्टरों को सख्त निर्देश जारी किए हैं। उन्होंने कहा है कि यह सुनिश्चित किया जाए कि राज्य के किसी भी हिस्से में अवैध रूप से अफीम की खेती न हो।राज्य में अवैध मादक पदार्थों के उत्पादन और कारोबार के प्रति सरकार की नीति ‘जीरो टॉलरेंस’ की है।  

इन मामलों का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि अफीम की खेती कोई छोटी या छिपी हुई गतिविधि नहीं होती। इसके लिए जमीन, संसाधन, श्रम और समय चाहिए। पौधे अचानक रातोंरात खेतों में खड़े नहीं हो जाते। इसका अर्थ साफ है कि यह सब लंबे समय से चल रहा था और किसी न किसी स्तर पर प्रशासनिक निगाहों से बचता रहा। सवाल यही है कि क्या सचमुच यह सब नजरों से ओझल था, या फिर व्यवस्था ने देखने की जरूरत ही नहीं समझी?

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि भारत में अफीम की खेती सामान्य कृषि की तरह स्वतंत्र नहीं है। यह पूरी तरह नियंत्रित और लाइसेंस आधारित गतिविधि है। केंद्र सरकार के अधीन केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो (CBN) किसानों को लाइसेंस जारी करता है और यह अनुमति केवल कुछ निर्धारित राज्यों के सीमित क्षेत्रों तक ही दी जाती है। वर्तमान में मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों में ही चिकित्सा और वैज्ञानिक उद्देश्यों के लिए अफीम की खेती की अनुमति है। छत्तीसगढ़ इस सूची में शामिल नहीं है। इसलिए यहां अफीम की खेती का पाया जाना केवल एक कृषि अपराध नहीं बल्कि कानून की खुली अवहेलना है।

लेकिन विडंबना यह है कि यह अवैध खेती केवल खेतों तक सीमित मुद्दा नहीं बनती। इसके साथ एक पूरा अवैध आर्थिक तंत्र जुड़ जाता है—तस्करी, अवैध व्यापार, संगठित अपराध और राजनीतिक संरक्षण की आशंकाएँ। हालिया मामलों में करोड़ों रुपये की अवैध आय का अनुमान लगाया गया है और कई गिरफ्तारियाँ भी हुई हैं। इस प्रकरण में भाजपा से जुड़े नेता विनायक ताम्रकार की गिरफ्तारी हुई, वहीं कृषि विभाग की अधिकारी एकता साहू को निलंबित किया गया। इसके बाद स्वाभाविक रूप से राजनीतिक बयानबाजी शुरू हुई और विपक्ष को सरकार को घेरने का अवसर मिल गया।

लेकिन यहाँ एक मूलभूत सवाल उठता है—क्या समस्या केवल इतनी है कि किसी एक नेता या एक अधिकारी के अलावा कुछ ही लोगों की भूमिका सामने आ गई? या फिर यह मामला उस बड़े ढांचे की ओर संकेत करता है जिसमें अपराध, प्रशासनिक ढिलाई और राजनीतिक स्वार्थ एक दूसरे से टकराते भी हैं और कभी-कभी एक दूसरे को ढकते भी हैं?

भारतीय राजनीति में यह एक परिचित दृश्य है कि जैसे ही कोई बड़ा मामला सामने आता है, सत्ता और विपक्ष अपनी-अपनी भूमिकाओं में सक्रिय हो जाते हैं। सत्ता पक्ष कार्रवाई और सख्ती की बात करता है, जबकि विपक्ष इसे शासन की विफलता का प्रमाण बताता है। लेकिन अक्सर इस राजनीतिक शोर के बीच असली मुद्दा पीछे छूट जाता है—कि यह सब शुरू कैसे हुआ और इतने समय तक चलता कैसे रहा।

छत्तीसगढ़ में शराब और गांजा की अवैध खेप की खबरें पहले भी सामने आती रही हैं। यह भी कोई रहस्य नहीं कि इनका एक समानांतर नेटवर्क लंबे समय से सक्रिय है। सरकारें बदलती रहीं, लेकिन नशे के कारोबार की खबरें भी समय-समय पर सामने आती रहीं। फर्क सिर्फ इतना रहा कि हर बार मामला कुछ गिरफ्तारियों, कुछ बयानबाजियों और कुछ निलंबनों के बाद धीरे-धीरे शांत हो गया। 

इतिहास बताता है कि जब किसी समाज में नशे का कारोबार धीरे-धीरे अपनी जड़ें जमाता है, तो उसके प्रभाव केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं रहते। वह समाज की आत्मा तक को प्रभावित करता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण पंजाब है। कभी अपनी कृषि समृद्धि, मेहनतकश संस्कृति और आर्थिक मजबूती के लिए जाना जाने वाला पंजाब धीरे-धीरे नशे की समस्या से जूझने लगा। यह प्रक्रिया अचानक नहीं हुई। वर्षों तक छोटे-छोटे संकेत मिलते रहे—तस्करी की खबरें, युवाओं में बढ़ती लत, और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप। लेकिन जब तक समाज और व्यवस्था ने इसकी गंभीरता को पूरी तरह समझा, तब तक स्थिति काफी जटिल हो चुकी थी।

इसी पृष्ठभूमि में “उड़ता पंजाब” जैसा शब्द सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बना। यह केवल एक फिल्म का नाम नहीं था, बल्कि एक सामाजिक सच्चाई का प्रतीक बन गया—एक ऐसा राज्य जो कभी समृद्धि का प्रतीक था, लेकिन नशे के जाल में उलझता चला गया। छत्तीसगढ़ के सामने आज वही सवाल खड़ा होता दिखाई देता है। क्या यह केवल कुछ एकाकी घटनाएँ हैं या फिर किसी बड़े नेटवर्क की शुरुआती झलक? क्या यह केवल कुछ व्यक्तियों की गलती है या फिर उस व्यवस्था की कमजोरी का परिणाम है जो समय रहते संकेतों को समझ नहीं पाती?

अक्सर प्रशासनिक तंत्र की सबसे बड़ी समस्या यह नहीं होती कि उसे कुछ पता नहीं होता, बल्कि यह होती है कि उसे बहुत कुछ पता होने के बावजूद वह समय रहते कार्रवाई नहीं करता। जब तक मामला सार्वजनिक नहीं हो जाता, तब तक फाइलें चलती रहती हैं, नोटिंग्स होती रहती हैं और जिम्मेदारी कहीं न कहीं टलती रहती है।

जब खेतों में धान बोया जाता है तो उसे समर्थन मूल्य, बीमा योजना और कृषि विभाग की योजनाओं की जरूरत होती है। लेकिन जब उन्हीं खेतों में अफीम उगने लगती है, तो व्यवस्था को अचानक पता चलता है कि यह सब “गंभीर अपराध” है। तब छापे पड़ते हैं, बयान जारी होते हैं और कार्रवाई का प्रदर्शन शुरू हो जाता है। सवाल यह नहीं है कि कार्रवाई हुई या नहीं। सवाल यह है कि कार्रवाई इतनी देर से क्यों हुई।

किसी भी राज्य में अफीम जैसी फसल का उगना केवल अपराधियों की चतुराई का परिणाम नहीं होता। इसके पीछे जमीन, नेटवर्क, बाजार और संरक्षण की संभावनाएँ होती हैं। यदि इन संभावनाओं को समय रहते खत्म न किया जाए, तो वे धीरे-धीरे एक संगठित व्यवस्था का रूप ले लेती हैं।

छत्तीसगढ़ के लिए यह एक चेतावनी का क्षण है। यदि इसे केवल एक राजनीतिक मुद्दा बनाकर छोड़ दिया गया, तो आने वाले वर्षों में यह समस्या कहीं अधिक गंभीर रूप ले सकती है। नशे का कारोबार केवल अपराध नहीं पैदा करता, बल्कि सामाजिक विघटन भी पैदा करता है। इसका सबसे बड़ा प्रभाव युवाओं पर पड़ता है, जो किसी भी समाज की ऊर्जा और भविष्य होते हैं। इसलिए जरूरी है कि इस पूरे प्रकरण को केवल एक घटना या एक विवाद के रूप में न देखा जाए। इसकी व्यापक और निष्पक्ष जांच हो, जिम्मेदारियों को स्पष्ट किया जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि ऐसी घटनाएँ दोबारा न हों। 

कैमरे की कलम: सड़क पर अभियान नहीं, व्यवस्था और व्यवहार में बदलाव की दरकार


छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में सकरी- पेंड्रीडीह बाइपास की हालिया सड़क दुर्घटना की तस्वीरें और वीडियो किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को भीतर तक झकझोर देने के लिए काफी हैं। सड़क पर बिखरे मलबे के बीच पसरा सन्नाटा और रोते-बिलखते परिजन, ये दृश्य सिर्फ एक हादसे का नहीं बल्कि उस व्यवस्था की विफलता का आईना हैं, जो हर साल हजारों जिंदगियां निगल रही है। यह कोई इकलौती घटना नहीं है। कुछ दिन पहले ही एक पिता अपनी पत्नी और बच्चे के शव से लिपटकर विलाप करता दिखाई दिया था। कहीं तेज रफ्तार बाइक पर निकला घर का इकलौता बेटा कभी लौटकर नहीं आया। हर ऐसी खबर एक परिवार के उजड़ने की कहानी है, जिसे हम पढ़ते हैं, अफसोस जताते हैं और फिर अगली सुर्खी की ओर बढ़ जाते हैं।

देश के साथ-साथ राज्य में भी सड़क सुरक्षा को लेकर वर्षों से अभियान चलाए जा रहे हैं। पहले सड़क सुरक्षा सप्ताह मनाया गया, फिर पखवाड़ा और अब सड़क सुरक्षा माह। जगह-जगह बैनर, पोस्टर, रैलियां, शपथ ग्रहण, स्कूलों में भाषण—सब कुछ होता है। आंकड़ों की समीक्षा बैठकों में होती है, योजनाएं बनती हैं, लक्ष्य तय होते हैं। लेकिन जमीनी हकीकत यही है कि हादसों की रफ्तार कम होने के बजाय कई जगह बढ़ी है। इसका सीधा अर्थ है कि हमारे प्रयास या तो नाकाफी हैं या फिर केवल औपचारिकता तक सीमित रह गए हैं।

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि नियमों का पालन कराने की जिम्मेदारी जिन पर है, वे स्वयं कई बार नियमों की अनदेखी करते दिखाई देते हैं। मंत्री, विधायक, वरिष्ठ अधिकारी—कई बार सार्वजनिक कार्यक्रमों में बिना सीट बेल्ट या बिना हेलमेट नजर आते हैं। संदेश देने के नाम पर निकाली जाने वाली बाइक रैलियों में शामिल अधिकांश लोग हेलमेट नहीं पहनते। जब नेतृत्वकर्ता ही उदाहरण प्रस्तुत नहीं करेंगे, तो आम नागरिक से अनुशासन की अपेक्षा कैसे की जा सकती है?

सड़क दुर्घटनाओं से होने वाली मौतों के आंकड़े भयावह हैं। हर साल इतनी जिंदगियां चली जाती हैं, जितनी कई छोटे शहरों की कुल आबादी होती है। यह केवल आंकड़ा नहीं, सामाजिक त्रासदी है। हर मृतक के पीछे एक परिवार है, जिसकी आर्थिक और भावनात्मक दुनिया एक पल में बिखर जाती है। कई घरों में कमाने वाला सदस्य चला जाता है, बच्चों का भविष्य अधर में लटक जाता है।

इस स्थिति के लिए केवल तेज रफ्तार या लापरवाह चालक ही जिम्मेदार नहीं हैं। खराब सड़कें, गड्ढे, अपर्याप्त संकेतक, स्ट्रीट लाइट की कमी, ओवरलोड वाहन, और बिना उचित परीक्षण के जारी किए गए ड्राइविंग लाइसेंस भी उतने ही बड़े कारण हैं। यदि आरटीओ में लाइसेंस वास्तविक ड्राइविंग परीक्षा के बजाय कागजी प्रक्रिया बनकर रह जाए, तो सड़क पर अयोग्य चालक उतरेंगे ही। यदि सड़क निर्माण में गुणवत्ता से समझौता होगा, तो दुर्घटनाएं बढ़ेंगी ही।

जरूरत इस बात की है कि सड़क सुरक्षा को ‘अभियान’ नहीं, ‘निरंतर जिम्मेदारी’ के रूप में लिया जाए। जिस तरह स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव जैसे कार्यक्रमों का व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ, उसी तरह सड़क सुरक्षा को वर्ष भर प्राथमिकता दी जाए। पुलिस की मौजूदगी सिर्फ चालान काटने तक सीमित न रहे, बल्कि अनुशासन की संस्कृति विकसित करे। जनप्रतिनिधि और अधिकारी सार्वजनिक रूप से नियमों का पालन करते हुए उदाहरण प्रस्तुत करें। स्कूलों और कॉलेजों में सड़क सुरक्षा शिक्षा को व्यवहारिक रूप से जोड़ा जाए, केवल भाषणों तक सीमित न रखा जाए।

सड़क सुरक्षा का असली संदेश पोस्टर या मंच से नहीं, सड़क पर दिखने वाले आचरण से जाएगा। जब लोग देखेंगे कि नियम तोड़ना आसान नहीं और नियम मानना सम्मान की बात है, तभी बदलाव संभव होगा। यह समझना होगा कि सड़क पर चलने वाला हर व्यक्ति सिर्फ एक वाहन चालक नहीं, बल्कि किसी का बेटा, बेटी, पिता, मां या जीवनसाथी है। एक क्षण की लापरवाही, एक गलत निर्णय या एक प्रशासनिक ढिलाई पूरे परिवार की दुनिया बदल सकती है।

अब समय आ गया है कि सड़क सुरक्षा को औपचारिकता के दायरे से निकालकर जीवन की प्राथमिकता बनाया जाए। वरना हम हर वर्ष नए संकल्प लेते रहेंगे और हर वर्ष नई शोकसभाओं में शामिल होते रहेंगे। सवाल यह नहीं कि सड़क सुरक्षा माह कब मनाया जाएगा; सवाल यह है कि क्या हम सच में किसी घर का चिराग बुझने से बचाने के लिए तैयार हैं?

कैमरे की कलम: “नौकरी का विज्ञापन और ठगी का राष्ट्रनिर्माण”


बिलासपुर जिले के कोटा ब्लॉक मुख्यालय में जय स्तम्भ पर लगा यह पोस्टर अपने आप में केवल एक “नौकरी का विज्ञापन” नहीं, बल्कि बेरोजगारी के बाजार में चल रहे उस संगठित भ्रम उद्योग का जीवंत उदाहरण है, जिसमें शब्द रोजगार के होते हैं और परिणाम अक्सर शोषण के। इस पोस्टर में बड़े अक्षरों में लिखा है—“नौकरी चाहिए, फोन घुमाइए”। यह वाक्य सुनने में जितना सरल और आकर्षक लगता है, उतना ही खतरनाक भी हो सकता है। क्योंकि जिस देश में लाखों युवा वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं, वहां अगर केवल “फोन घुमाने” से 18,500 से 21,500 रुपये महीने की नौकरी मिलने लगे, तो यह रोजगार कम और चमत्कार अधिक प्रतीत होता है। 

पोस्टर में दावा किया गया है कि कंपनी को “हेल्पर की जरूरत है”, पोस्टर में यह भी लिखा है कि “कंपनी की तरफ से रूम फ्री” और “आने-जाने के लिए गाड़ी फ्री” होगी। यह पढ़कर ऐसा लगता है कि कंपनी को कर्मचारी नहीं, दामाद चाहिए। यह सुविधाएं किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी के पैकेज जैसी लगती हैं, लेकिन पोस्टर में कंपनी का नाम, उसका पंजीयन नंबर, लाइसेंस विवरण या कोई वैधानिक पहचान स्पष्ट रूप से उल्लेखित नहीं है। यह वही खामोशी है, जिसमें अक्सर धोखाधड़ी की आवाज छिपी होती है। इस पोस्टर में स्थानीय स्तर पर बिलासपुर (छत्तीसगढ़) का संपर्क नंबर दिया गया है, जबकि “डायरेक्टर” जिग्नेश भाई पटेल का नाम गुजरात के भरूच से जुड़ा बताया गया है। यह भौगोलिक दूरी और स्थानीय संपर्क का संयोजन ठगी के कई पुराने मामलों में देखा गया पैटर्न है जहां स्थानीय व्यक्ति केवल एक माध्यम होता है और वास्तविक संचालन कहीं और से होता है। 

दरअसल देश में बेरोजगारी अब केवल एक आंकड़ा नहीं रही, यह एक ऐसा खुला बाजार बन चुकी है, जहां नौकरी से ज्यादा नौकरी का भ्रम बिकता है। और इस भ्रम के सबसे बड़े कारोबारी वे लोग हैं, जो रोजगार नहीं देते, बल्कि रोजगार की कल्पना का प्राइवेट लिमिटेड संस्करण बेचते हैं। यह एक ऐसा स्टार्टअप इकोसिस्टम है, जहां निवेश बेरोजगारों की उम्मीदें होती हैं और मुनाफा उनके आत्मसम्मान से वसूला जाता है। आज का ठग पुराना ठग नहीं रहा। वह अब जेबकतरा नहीं, बल्कि “डिजिटल एचआर मैनेजर” बन चुका है। वह अब स्टेशन पर खड़े होकर नहीं कहता—“चलो मुंबई, नौकरी दिलाएंगे।” अब वह लिंक्डइन पर प्रोफाइल बनाता है, इंस्टाग्राम पर विज्ञापन चलाता है और वाट्सऍप  पर “Congratulations” लिखकर बेरोजगार युवक को यह एहसास दिलाता है कि देश की अर्थव्यवस्था अब उसी के भरोसे चल रही है।

विडंबना यह है कि जिस देश में एक वास्तविक नौकरी पाने के लिए युवा वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं में खप जाता है, उसी देश में एक फर्जी नौकरी देने वाला व्यक्ति मात्र एक सिम कार्ड और एक फर्जी लोगो से “मल्टीनेशनल कंपनी” बन जाता है। यह स्टार्टअप इंडिया का वह अंधेरा पक्ष है, जहां नवाचार का उपयोग रोजगार सृजन के लिए नहीं, बल्कि रोजगार भ्रम सृजन के लिए किया जा रहा है। 

इन ठगों की कार्यप्रणाली अत्यंत वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक है। वे जानते हैं कि बेरोजगार युवक को सबसे ज्यादा किस शब्द की भूख होती है—“Selected”। यह शब्द सुनते ही युवक की आंखों में वह चमक आ जाती है, जो वर्षों की असफलताओं ने बुझा दी थी। और यही वह क्षण होता है, जब ठग अपनी पहली किस्त वसूलता है—“रजिस्ट्रेशन फीस” के नाम पर। इसके बाद शुरू होता है शुल्कों का एक ऐसा सिलसिला, जो कभी समाप्त नहीं होता—ट्रेनिंग फीस, सिक्योरिटी फीस, प्रोसेसिंग फीस। यह फीस दरअसल नौकरी की नहीं, बल्कि ठगी की प्रक्रिया को वैधता देने का टैक्स होता है।

जब युवक पैसे दे देता है, तो उसे दूसरे राज्य भेज दिया जाता है। वहां उसका स्वागत किसी एयरपोर्ट मैनेजर के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे श्रमिक के रूप में होता है, जिसकी स्वतंत्रता पहले ही किस्त में गिरवी रखी जा चुकी होती है। वह समझ जाता है कि उसे नौकरी नहीं मिली, बल्कि उसे बेच दिया गया है—उसके श्रम को, उसकी मजबूरी को और उसके सपनों को।

यहां सबसे गंभीर प्रश्न ठगों की मौजूदगी नहीं, बल्कि उनकी निर्भीकता है। यह निर्भीकता उन्हें किसी अदृश्य शक्ति से नहीं, बल्कि व्यवस्था की सुस्ती से मिलती है। फर्जी विज्ञापन खुलेआम सोशल मीडिया पर चलते रहते हैं, हजारों लोगों तक पहुंचते हैं, लेकिन कार्रवाई का पहिया तब घूमता है, जब पीड़ित युवक थाने पहुंचकर अपनी मूर्खता का प्रमाण देने लगता है। व्यवस्था का रवैया भी कम व्यंग्यात्मक नहीं है। जब कोई युवक शिकायत करता है, तो उससे पूछा जाता है—“तुमने पैसे क्यों दिए?” यह प्रश्न दरअसल एक प्रशासनिक दर्शन को प्रकट करता है—कि अपराध से ज्यादा गंभीर गलती विश्वास करना है।

यह स्थिति केवल कानून-व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि सामाजिक संवेदनहीनता का भी प्रमाण है। क्योंकि ठग केवल पैसे नहीं चुराते, वे उस विश्वास को चुराते हैं, जिस पर समाज टिका होता है। वे केवल एक युवक को नहीं ठगते, बल्कि एक पूरे परिवार की आशाओं को दिवालिया घोषित कर देते हैं। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अधिक संगठित और पेशेवर अगर कोई है, तो वह ठग है। उसके पास मार्केटिंग टीम है, फर्जी रिव्यू हैं, आकर्षक वेबसाइट है, और सबसे महत्वपूर्ण—उसे यह विश्वास है कि उसके खिलाफ कार्रवाई देर से ही होगी।

इसके विपरीत, पीड़ित युवक के पास केवल एक शिकायत होती है और एक लंबा इंतजार। यह स्थिति किसी भी सभ्य समाज के लिए चिंता का विषय होनी चाहिए।क्योंकि जब अपराध तकनीकी रूप से आधुनिक हो जाए और कानून मानसिक रूप से परंपरागत बना रहे, तो न्याय हमेशा पीछे रह जाता है।

यह आवश्यक है कि व्यवस्था केवल अपराध होने के बाद सक्रिय न हो, बल्कि अपराध होने से पहले सतर्क हो। फर्जी प्लेसमेंट एजेंसियों का सत्यापन, सोशल मीडिया विज्ञापनों की निगरानी और त्वरित कार्रवाई—ये केवल प्रशासनिक विकल्प नहीं, बल्कि नैतिक दायित्व हैं। लेकिन फिलहाल स्थिति यह है कि बेरोजगार युवक नौकरी की तलाश में है और ठग बेरोजगार युवकों की तलाश में। 

क्या बिलासपुर लूटकांड राज्य की कानून-व्यवस्था पर सवाल है ?


बिलासपुर के राजकिशोर नगर में सराफा व्यापारी संतोष तिवारी पर हमले और करोड़ों की लूट की घटना केवल एक आपराधिक वारदात नहीं है; यह राज्य की कानून-व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न भी खड़ा करती है। जिस दुस्साहस के साथ नकाबपोश बदमाशों ने रिहायशी और व्यस्त इलाके में व्यापारी की कार को घेरकर जानलेवा हमला किया, हथियार लहराए और करोड़ों का माल लेकर फरार हो गए, वह आम नागरिक की सुरक्षा भावना को झकझोरने वाला है।

यह घटना कई स्तरों पर चिंताजनक है। पहला, अपराधियों का आत्मविश्वास। शहर के बीचों बीच, रात के समय, योजनाबद्ध तरीके से वारदात को अंजाम देना इस बात का संकेत देता है कि उन्हें कानून के तत्काल भय का अंदेशा नहीं था। यदि आरोप सही हैं कि रेकी कर रणनीति बनाई गई, तो यह संगठित अपराध की ओर भी इशारा करता है।

दूसरा, खुफिया और निवारक तंत्र की प्रभावशीलता। सवाल यह उठता है कि क्या शहर में अपराध की संभावनाओं को लेकर पर्याप्त सतर्कता थी? क्या संवेदनशील व्यापारिक गतिविधियों से जुड़े लोगों की सुरक्षा के लिए कोई विशेष प्रावधान या निगरानी व्यवस्था थी? यदि अपराधी चोरी के वाहन लेकर आए और उन्हें घटनास्थल पर छोड़कर आगे निकल गए, तो यह जांच एजेंसियों के लिए चुनौती के साथ-साथ व्यवस्था की खामियों का संकेत भी है।

तीसरा, सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा की धारणा। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार हथियार दिखाकर दहशत फैलाना और कथित तौर पर फायरिंग जैसी आवाजें सुनाई देना यह दर्शाता है कि अपराधियों ने भीड़भाड़ वाले इलाके को भी जोखिम नहीं माना। यह स्थिति नागरिकों के मन में भय और अविश्वास पैदा करती है।

पूरी ख़बर पढ़ें - नकाबपोशों का आतंक: व्यापारी पर जानलेवा हमला, पौने चार करोड़ का सोना लूटा; पुलिस के हाथ खाली

हालांकि पुलिस ने नाकेबंदी, विशेष टीम गठन और सीसीटीवी फुटेज की जांच जैसे कदम उठाए हैं, लेकिन यह कार्रवाई घटना के बाद की है। असली प्रश्न यह है कि क्या ऐसी घटनाओं को रोका जा सकता था? कानून-व्यवस्था केवल अपराध के बाद सक्रिय होने का नाम नहीं, बल्कि अपराध की संभावना को न्यूनतम करने की क्षमता भी है।

राजनीतिक स्तर पर आरोप-प्रत्यारोप स्वाभाविक हैं, परंतु इससे आगे बढ़कर यह आवश्यक है कि सरकार और पुलिस तंत्र इस घटना को चेतावनी के रूप में लें। व्यापारिक वर्ग की सुरक्षा, रात में गश्त की सघनता, तकनीकी निगरानी और खुफिया तंत्र की मजबूती, इन सभी पर पुनर्विचार की जरूरत है।

बिलासपुर की यह घटना एक शहर तक सीमित नहीं है। यह राज्य की व्यापक सुरक्षा व्यवस्था पर विमर्श का अवसर भी है। यदि संगठित और योजनाबद्ध अपराधों के प्रति सख्त और त्वरित प्रतिक्रिया नहीं दी गई, तो अपराधियों का मनोबल बढ़ना स्वाभाविक है।

अंततः, कानून-व्यवस्था केवल आंकड़ों का विषय नहीं, बल्कि नागरिकों के विश्वास का प्रश्न है। जब आम नागरिक स्वयं को असुरक्षित महसूस करने लगे, तो यह किसी भी शासन-व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी होती है। अब देखना यह है कि यह घटना सुधार का कारण बनती है या केवल एक और ‘फाइल’ बनकर रह जाती है।

कैमरे की कलम: चिट्टा, सट्टा और सत्ता, खाकी की उलझी कहानी


पुलिस की वर्दी केवल खाकी कपड़ा नहीं राज्य की शक्ति और जनता के भरोसे का प्रतीक है। जब वही वर्दी कटघरे में खड़ी होती है, तो केवल व्यक्ति नहीं, पूरी संस्था सवालों में घिर जाती है। पुलिस को केवल कानून लागू करने वाली संस्था नहीं, बल्कि राज्य के नैतिक प्रतिनिधि के रूप में भी देखा जाता है और इसलिए जब पुलिस व्यवस्था पर बेईमानी, मिलीभगत या पद के दुरुपयोग के आरोप लगते हैं, तो सवाल केवल व्यक्तियों पर नहीं उठते, वे वैधता की जड़ों तक पहुँचते हैं। हाल के वर्षों में देश के कई हिस्सों से ऐसी घटनाएँ सामने आईं जिनमें पुलिसकर्मियों पर महिलाओं के यौन शोषण, नशे के कारोबार में संलिप्तता से लेकर आर्थिक अनियमितताओं और सट्टा नेटवर्क से जुड़ाव तक के आरोप लगे। छत्तीसगढ़ इससे बिल्कुल भी अछूता नहीं है, छत्तीसगढ़ पुलिस में ऐसे दर्जनों आईपीएस अफसर हैं  जिन पर अपनी हवस मिटाने के लिए महिलाओं के जिस्म नोचने के आरोप लगे है। नीचे से लेकर बड़े साहबों तक नाम के साथ आरोपों की फेहरिस्त लम्बी है। फिलहाल हिमांशु बर्मन, कल्पना वर्मा और सहदेव यादव जैसे बेईमान पुलिस वालों के लिए इस आदर्श वाक्य “सेवा और सुरक्षा” के मायने ही अलग हैं। मुझे लगता है इन लोगों की पारिवारिक पृष्ठभूमि में संस्कारों की कमी रही होगी, ये तीनों ही चेहरे चरित्र की बुनियादी परीक्षा में विफल रहे ? ये रही उनकी कहानियां। 

राजधानी रायपुर में नशे के खिलाफ चल रहे अभियान के बीच एक पुलिस आरक्षक हिमांशु बर्मन की प्रतिबंधित हेरोइन (चिट्टा) के साथ गिरफ्तारी ने एक असहज प्रश्न खड़ा कर दिया है। यह प्रश्न केवल एक व्यक्ति के आचरण तक सीमित नहीं है; यह उस व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा है जो स्वयं को कानून का प्रहरी कहती है। पुलिस के अनुसार सूचना के आधार पर आरक्षक हिमांशु बर्मन को कथित रूप से हेरोइन के साथ पकड़ा गया। वरिष्ठ अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि मामले की जांच जारी है, आरोपी को रिमांड पर लेकर पूछताछ की जा रही है और सप्लाई चेन की हर कड़ी तक पहुंचने का प्रयास होगा। आधिकारिक बयान यह भी कहता है कि “कोई भी हो, बख्शा नहीं जाएगा।” राजधानी रायपुर में हाल के महीनों में सूखे नशे के खिलाफ पुलिस की सक्रियता स्पष्ट रही है। कई मामले दर्ज हुए, आरोपियों की गिरफ्तारी हुई, बड़ी मात्रा में प्रतिबंधित सामग्री जब्त की गई। ऐसे में जब उसी विभाग का एक सदस्य कथित रूप से इस अवैध कारोबार में संलिप्त पाया जाता है, तो यह विडंबना को जन्म देता है। एक ओर सख्त संदेश, दूसरी ओर अंदरूनी दरार, यह विरोधाभास केवल प्रशासनिक चुनौती नहीं, नैतिक संकट भी है। 

हर संस्था में व्यक्तिगत चूक संभव है। यह तर्क अक्सर दिया जाता है कि कुछ मामलों के आधार पर पूरे विभाग को कठघरे में नहीं खड़ा किया जा सकता। यह बात सही भी है। हजारों पुलिसकर्मी कठिन परिस्थितियों में, सीमित संसाधनों के बीच, जोखिम उठाकर अपनी ड्यूटी निभाते हैं लेकिन जब समय-समय पर विभाग के भीतर से अनियमितताओं के आरोप सामने आते हैं, चाहे वह नशे का मामला हो, कथित आर्थिक अनियमितता हो, महिलाओं के यौन शोषण का हो या गोपनीय जानकारी लीक करने का आरोप। ऐसे में पुलिस अधिकारियों ने अपराध के खिलाफ “जीरो टॉलरेंस” की नीति दोहराई है। यह नीति तब सार्थक होती है जब वह बाहरी अपराधियों के साथ-साथ विभाग के भीतर भी समान कठोरता से लागू हो। 

पुलिस और नागरिक के बीच संबंध भय पर नहीं, विश्वास पर टिके होते हैं। जब नागरिक शिकायत लेकर थाने जाता है, तो वह राज्य की निष्पक्षता पर भरोसा करता है। यदि उसी राज्य के प्रतिनिधि (पुलिस) पर गंभीर आरोप लगे हों, तो यह भरोसा डगमगाता है। विश्वास का क्षरण अचानक नहीं होता; वह घटनाओं की पुनरावृत्ति से बनता है। इसलिए प्रत्येक ऐसी घटना केवल एक केस फाइल नहीं, बल्कि सार्वजनिक धारणा का हिस्सा बन जाती है। ऐसा पहली बार नहीं है जब छत्तीसगढ़ पुलिस की छवि पर सवाल उठे हों। अक्टूबर 2025 में रायपुर क्राइम ब्रांच के छह पुलिसकर्मियों पर दुर्ग के एक कारोबारी की कार से कथित तौर पर 2 लाख रुपये चोरी करने के आरोप लगे थे। जांच के बाद एक आरक्षक को निलंबित किया गया था। इसी तरह, हाल ही में चर्चित महिला डीएसपी कल्पना वर्मा को गोपनीय जानकारी लीक करने के आरोप में निलंबित किया गया। उनके खिलाफ यह भी आरोप सामने आए कि रायपुर में पदस्थ रहते हुए उन्होंने एक कारोबारी के साथ कथित धोखाधड़ी की और उससे अवैध ढंग से दो करोड़ रूपये हासिल कर लिये। 

देशभर में चर्चित महादेव सट्टा ऐप मामले में कई नाम उछले। सैकड़ों करोड़ के इस कथित ऑनलाइन सट्टा कारोबार में राजनीतिक, कारोबारी और प्रशासनिक कड़ियों की चर्चा होती रही। इसी कड़ी में पुलिस आरक्षक सहदेव यादव का नाम महादेव सट्टा का पैनल चलाने वाले के रूप में सामने आया, सहदेव ने अकेले वर्दी को नहीं बेचा था बल्कि उसके दो अन्य भाइयों पर भी वर्दी की नीलामी के आरोप लगे। भाई जेल में हैं, सहदेव को सेवा से बर्खास्त कर जेल भेज दिया गया। यहां ये बताना भी लाज़िमी होगा कि बिलासपुर शहर के तत्कालीन एएसपी राजेंद्र जायसवाल पर हाल ही में एक स्पा सेंटर के संचालक ने मासिक वसूली के गंभीर आरोप लगाये थे। शिकायत के बाद राज्य के गृह विभाग ने उन्हें तत्काल निलंबित कर दिया। इन घटनाओं ने पुलिस व्यवस्था के भीतर जवाबदेही और निगरानी तंत्र को लेकर बहस तेज कर दी है।  

पुलिस व्यवस्था में पदानुक्रम कठोर है, कार्य-घंटे लंबे हैं, संसाधन सीमित हैं और राजनीतिक दबावों की चर्चा आम है। इन परिस्थितियों में यदि आंतरिक निगरानी ढीली हो, संपत्ति और आचरण की पारदर्शी समीक्षा औपचारिकता बन जाए, और शिकायत निवारण तंत्र स्वतंत्र न हो, तो संस्थागत दरारें गहरी होती जाती हैं। दरारों में ही भ्रष्टाचार का पानी भरता है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि उपभोक्तावाद का दबाव केवल नागरिकों पर नहीं, वर्दीधारियों पर भी है। महंगे फोन, गाड़ियाँ, प्रभावी जीवनशैली। ये आकांक्षाएँ सामाजिक परिवेश का हिस्सा हैं। पर समस्या तब शुरू होती है जब आकांक्षा और आय के बीच की खाई को पद के प्रभाव से पाटने की कोशिश की जाती है। वर्दी तब साधन बन जाती है सेवा का नहीं, सौदे का। 

कैमरे की कलम: आयुष्मान भारत बनाम चारपाई इंडिया

इस तस्वीर को देखिए। बड़े ध्यान से देखिए। यह कोई दुर्लभ, असामान्य या अपवादस्वरूप घटना नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था का आईना है जिसे हम बड़े गर्व से “स्वास्थ्य तंत्र” कहते हैं। चारपाई पर लेटा एक मरीज, कंधों पर उठाए कुछ लोग, कीचड़, पगडंडी और दूर कहीं पक्की सड़क की उम्मीद, यही आज ग्रामीण भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था की वास्तविक पहचान है। यह तस्वीर किसी एक राज्य, किसी एक जिले या किसी एक गांव की नहीं है; यह उस देश की सामूहिक तस्वीर है जो खुद को दुनिया की उभरती महाशक्ति कहने में नहीं थकता। देश में आयुष्मान भारत है, राज्य की अपनी स्वास्थ्य बीमा योजनाएं हैं, कैशलेस इलाज की लंबी-चौड़ी सूचियां हैं। कागजों में इलाज जन्म से मृत्यु तक सुरक्षित है। बस एक छोटी सी कमी है, गांव से अस्पताल तक पहुंचने का प्रावधान किसी भी योजना में स्पष्ट नहीं है। योजनाएं इलाज का खर्च उठाती हैं, लेकिन रास्ते का बोझ अब भी मरीज और उसके तीमारदार उठा रहे हैं—कंधों पर। 

इक्कीसवीं सदी के भारत में इलाज कैशलेस है, लेकिन रास्ता अब भी इंसानों के कंधों पर चलता है।

आइये इस तस्वीर पर फोकस करते है। ये तस्वीर छत्तीसगढ़ राज्य गठन के 25 बरस बाद “विकास कथा” का स्थायी फ्रेम है। कोरिया जिले के ग्राम पंचायत बंजारीडाँड़ के रोहना ठीहाई गांव में एक अनोखी, लेकिन बेहद भरोसेमंद स्वास्थ्य सेवा आज भी पूरे आत्मविश्वास के साथ चल रही है। नाम है “चारपाई एक्सप्रेस”। यह सेवा न ऐप पर मिलती है, न टोल-फ्री नंबर पर, न GPS मांगती है और न ही सड़क की ज़िद करती है। बस चार मज़बूत कंधे चाहिए, एक पुरानी खटिया और किस्मत का साथ। रोहना ठीहाई में भी यही हुआ। गांव तक सड़क नहीं है, इसलिए एम्बुलेंस वहीं तक आई, जहां सड़क खत्म होती है। उसके आगे मरीज को खटिया पर उठाकर लाने की जिम्मेदारी ग्रामीणों ने निभाई। यह जन-भागीदारी का बेहतरीन उदाहरण है, जिसे नीति आयोग की रिपोर्टों में जगह मिलनी चाहिए। मरीज का नाम लक्ष्मी नारायण है, लक्ष्मी की कृपा से दूर मरीज सिर्फ नारायण के भरोसे है। 

यह वही गांव है जहां इलाज से पहले मरीज को यह साबित करना पड़ता है कि वह सड़क तक पहुंचने लायक है। जो सड़क तक पहुंच गया, वही सिस्टम की नजर में “इलाज के योग्य” माना जाता है। यहां संविधान में “जीवन का अधिकार” तो है, लेकिन उस जीवन तक पहुंचने का रास्ता नहीं है। छत्तीसगढ़ हो, झारखंड हो, मध्यप्रदेश हो, बिहार, ओडिशा, उत्तर प्रदेश या पूर्वोत्तर के राज्य, ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सुविधा आज भी चारपाई पर लेटी हुई है। फर्क बस इतना है कि कहीं चारपाई बांस की है, कहीं लकड़ी की; कहीं उठाने वाले चार लोग हैं, कहीं दो। लेकिन व्यवस्था हर जगह एक सी बेहोश पड़ी है। 

यह तस्वीर किसी एक गांव की नहीं, उस व्यवस्था की है जो विकास को नक्शों में और मरीज को खटिया पर छोड़ देती है।

सरकारी नक्शों में सड़कें हैं, स्वास्थ्य केंद्र हैं, योजनाएं हैं, और लक्ष्य भी हैं। लेकिन रोहना ठीहाई जैसे गांवों में यह सब नक्शे पर ही रह जाता है। जमीन पर जो है, वह है कच्ची पगडंडी, नेटवर्क का सन्नाटा, बिजली की अनियमितता और इलाज की अनिश्चितता। जब बीमारी दस्तक देती है, तो न योजना काम आती है, न फाइल। काम आती है चारपाई जो यहां एम्बुलेंस है, स्ट्रेचर है और कई बार ज़िंदगी का अंतिम वाहन भी। यह कैसी विडंबना है कि जिस देश में “स्मार्ट सिटी” शब्द गर्व से बोला जाता है, उसी देश में “स्मार्ट गांव” आज भी खटिया के भरोसे है। 

इस देश में 108, 112, 104, ये सभी नंबर स्वास्थ्य सुरक्षा के प्रतीक माने जाते हैं। लेकिन इन सेवाओं का दायरा भी सड़क की सीमा तक ही है। जहां सड़क खत्म, वहीं आपातकाल समाप्त। यह व्यवस्था बड़ी ईमानदारी से मानती है कि गांव में बीमारी उतनी गंभीर नहीं होती, जितनी शहर में। इसलिए गांव का मरीज अगर बच गया, तो उसे सहनशील माना जाता है; और अगर नहीं बचा—तो फाइल में लिख दिया जाता है, “दुर्गम क्षेत्र।” 

दिल्ली से घोषित ‘सार्वभौमिक स्वास्थ्य’ गांव पहुंचते-पहुंचते चारपाई पर सिमट जाता है।

केंद्र और राज्य सरकारों ने कस्बाई इलाकों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के नाम पर दो-तीन कमरों का ढांचा खड़ा कर रखा हैं। बाहरी दीवार पर बोर्ड लगे हैं, उद्घाटन शिलाएं चमक रही हैं लेकिन भीतर डॉक्टर अक्सर अस्थायी रूप से अनुपस्थित रहते हैं, दवाएं आपूर्ति की प्रतीक्षा में होती हैं और जांच सुविधाएं जिला स्तर पर उपलब्ध बताई जाती हैं। यानि इलाज की पूरी श्रृंखला मौजूद है, बस गांव में कुछ भी नहीं। डिजिटल हेल्थ मिशन के तहत हेल्थ आईडी, ऑनलाइन रिपोर्ट और टेलीमेडिसिन का सपना दिखाया जा रहा है। रोहना ठीहाई जैसे गांव पूछ रहे है—“नेटवर्क कब मिलेगा?” जहां मोबाइल सिग्नल नहीं, वहां टेलीमेडिसिन एक प्रेरक नारा भर है। मरीज खटिया पर है और व्यवस्था ऐप डाउनलोड करने की सलाह दे रही है। रोहना ठीहाई गाँव अकेला नहीं है। देश के कई राज्यों के ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सुविधा आज भी चारपाई पर ही सफर करती है। कहीं तस्वीर सामने आ जाती है, तो कुछ दिन चर्चा का विषय बनी होती है। फिर सब कुछ सामान्य, अगली खटिया के इंतजार में। 

रोहना ठीहाई अकेला गांव नहीं है। देश के कई राज्यों के ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सुविधा आज भी चारपाई पर ही सफर करती है। जहां मोबाइल सिग्नल नहीं, वहां टेलीमेडिसिन एक प्रेरक नारा भर है। मरीज खटिया पर है और व्यवस्था ऐप डाउनलोड करने की सलाह दे रही है।

हम किसी एक सरकार या विभाग पर आरोप नहीं लगा रहे, बल्कि उस स्थायी मानसिकता पर कटाक्ष कर रहे है, जिसमें गांव को हमेशा प्राथमिकता के क्रम में आखरी पायदान पर रखा जाता है। चारपाई पर लेटा मरीज किसी योजना की विफलता नहीं, बल्कि केंद्र और राज्य सरकारों की संयुक्त स्वास्थ्य नीति की मैदानी रिपोर्ट का जीवंत प्रमाण पत्र है। चारपाई पर लेटा लोकतंत्र केवल इलाज नहीं मांग रहा। वह सत्ता से, नौकरशाहों से यह सवाल पूछ रहा है “क्या इस देश में स्वास्थ्य सेवा तक पहुंचने के लिए भी पहले सड़क पास करनी होगी?” जवाब में व्यवस्था हमेशा की तरह, खामोशी से खटिया की ओर इशारा कर देती है।  

कैमरे की कलम: न्याय की मंशा बनाम व्यवस्था की हिचक


उच्च शिक्षा के परिसरों में समानता और गरिमा का प्रश्न कोई नया नहीं है। वर्षों से यह सवाल उठता रहा है कि क्या विश्वविद्यालय ज्ञान के मंदिर हैं या सामाजिक भेदभाव की प्रयोगशाला। इसी पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट द्वारा यूजीसी के 2026 के भेदभाव-रोधी नियमों पर लगाई गई अंतरिम रोक एक साधारण न्यायिक आदेश नहीं, बल्कि व्यवस्था के अंतर्विरोधों पर तीखी टिप्पणी है। कोर्ट का कहना है कि ये नियम “दूरगामी परिणाम” पैदा कर सकते हैं और “समाज को विभाजित” कर सकते हैं। सवाल यह है कि क्या समाज पहले से विभाजित नहीं है? क्या रोहित वेमुला और डॉ. पायल तडवी की मौतें किसी काल्पनिक विभाजन की उपज थीं, या उस सच्चाई का आईना थीं जिसे लंबे समय तक संस्थागत चुप्पी ने ढक रखा था ?

इन नियमों की उत्पत्ति किसी अकादमिक प्रयोग से नहीं, बल्कि पीड़ा से हुई थी। वर्षों की याचिकाएँ, माताओं की गुहार और न्याय की उम्मीद इन्हीं से यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन के 2026 के नियम जन्मे। इनका उद्देश्य था: शिकायत की सुनवाई, जवाबदेही और संरक्षण। परंतु विरोध की तेज़ आँधी जिसमें बड़े पैमाने पर सामान्य वर्ग की असहजता दिखी,  उसने यह उजागर किया कि समानता की बात आते ही विशेषाधिकार कितने असुरक्षित हो जाते हैं।

वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह की टिप्पणी इस बहस का नैतिक केंद्र है। अगर सरकार अपने ही नियमों का बचाव नहीं कर सकती, तो यह केवल कानूनी कमजोरी नहीं संवैधानिक कर्तव्य से पलायन है। न्यायपालिका ने समिति बनाने का सुझाव देकर संतुलन साधने की कोशिश की है, पर समिति की शरण अक्सर निर्णय को टालने का सुविधाजनक रास्ता भी बन जाती है। यहां मूल टकराव स्पष्ट है: भेदभाव-रोधी व्यवस्था बनाम ‘रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन’ की आशंका। पर क्या सुरक्षा देना भेदभाव है? क्या कमजोर के लिए ढाल बनना, मज़बूत पर अन्याय है? विश्वविद्यालयों में सत्ता-संरचना आज भी वही है फर्क बस इतना है कि अब पीड़ित बोलने लगे हैं।

सुप्रीम कोर्ट की यह रोक अंतिम फैसला नहीं है, पर एक चेतावनी अवश्य है कि नियम जल्दबाज़ी में नहीं, गहन विमर्श से बनें। मगर विमर्श का अर्थ विलंब नहीं होना चाहिए। हर स्थगन के साथ कैंपस में डर का एक और दिन जुड़ जाता है। न्याय तब तक अधूरा है, जब तक वह समय पर न मिले। यह कहना गलत नहीं होगा कि नियमों की भाषा सुधारी जा सकती है, प्रक्रिया पर बहस हो सकती है, पर भेदभाव के अस्तित्व से इनकार नहीं। अगर उच्च शिक्षा में समानता को ‘विभाजन’ कहा जाएगा, तो सवाल नियमों पर नहीं हमारे सामाजिक विवेक पर उठेगा।

किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसके विश्वविद्यालयों, स्कूलों और शिक्षकों के हाथों में आकार लेता है। शिक्षा केवल डिग्री पाने का माध्यम नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा, सामाजिक न्याय की रीढ़ और आर्थिक प्रगति की बुनियाद होती है। लेकिन आज भारत में यह सवाल पहले से कहीं ज़्यादा तीखेपन के साथ खड़ा है, क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था वास्तव में नागरिक गढ़ रही है या केवल आज्ञाकारी उपभोक्ता और सुविधाजनक भीड़ तैयार कर रही है?

देश की शिक्षा व्यवस्था इस समय एक गहरे असमंजस से गुजर रही है। एक तरफ़ “विश्वगुरु” बनने के दावे हैं, नई-नई नीतियाँ हैं, तकनीक और नवाचार की भाषा है; दूसरी ओर जर्जर स्कूल, खाली पद, असमान अवसर, बढ़ता निजीकरण और विश्वविद्यालय परिसरों में भय का माहौल। यह विरोधाभास किसी दुर्घटना का नतीजा नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही राजनीतिक प्राथमिकताओं का परिणाम है। 

सरकारें अक्सर शिक्षा नीतियों का हवाला देती हैं। नई शिक्षा नीति (NEP) को ऐतिहासिक बताया गया, लचीलापन, बहुविषयकता और मातृभाषा में शिक्षा जैसे वादे किए गए। लेकिन नीति और ज़मीनी हकीकत के बीच की खाई लगातार चौड़ी होती गई। शिक्षा पर सार्वजनिक खर्च आज भी जीडीपी के उस स्तर तक नहीं पहुँचा, जिसकी सिफ़ारिश दशकों से होती रही है। नई इमारतें और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म दिखाने में आसान हैं, लेकिन शिक्षक भर्ती, शोध अनुदान और छात्रवृत्तियाँ राजनीतिक प्राथमिकताओं की सूची में नीचे खिसकती चली गईं। इससे यह सवाल उठता है क्या सरकारें शिक्षा को सशक्तिकरण का औज़ार मानती हैं, या केवल एक प्रबंधन योग्य तंत्र?

शिक्षा में निजीकरण अब अपवाद नहीं, बल्कि मुख्यधारा बन चुका है। मेडिकल, इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट हर जगह फीस आसमान छू रही है। छात्र ऋण लेकर पढ़ने को मजबूर हैं और डिग्री पूरी होते ही रोज़गार की अनिश्चितता उनका इंतज़ार करती है। इस व्यवस्था में शिक्षा सामाजिक गतिशीलता का साधन कम और आर्थिक बोझ ज़्यादा बनती जा रही है। सरकारें निजी निवेश को समाधान के रूप में पेश करती हैं, लेकिन यह भूल जाती हैं कि बाज़ार का पहला लक्ष्य लाभ होता है, समानता नहीं। जब शिक्षा लाभ का साधन बनती है, तो हाशिये पर खड़े समुदाय सबसे पहले बाहर धकेले जाते हैं। 

विश्वविद्यालयों का हाल इससे भी ज़्यादा चिंताजनक है। कभी जिन परिसरों में बहस, असहमति और विचारों की टकराहट होती थी, आज वहाँ नोटिस, जांच और निलंबन का डर छाया रहता है। प्रशासनिक नियंत्रण इतना बढ़ चुका है कि विश्वविद्यालय अब ज्ञान के केंद्र नहीं, बल्कि सत्ता की प्रयोगशाला बनते जा रहे हैं। जब छात्र सवाल पूछते हैं, तो उन्हें “राष्ट्रविरोधी” कहा जाता है। जब शिक्षक असहमति जताते हैं, तो उन्हें “अनुशासनहीन”। यह कोई संयोग नहीं कि आलोचनात्मक सोच को पाठ्यक्रम से धीरे-धीरे हटाया जा रहा है। इतिहास को सुविधाजनक बनाया जा रहा है, समाजशास्त्र को संदिग्ध और दर्शन को अनुपयोगी। यह सब किसी अज्ञानवश नहीं हो रहा। यह एक स्पष्ट संकेत है कि सरकारें ऐसे नागरिक नहीं चाहतीं जो सोचें, बल्कि ऐसे जो मानें।

जातिगत भेदभाव, मानसिक उत्पीड़न और संस्थागत उपेक्षा ये विश्वविद्यालयों की कड़वी सच्चाइयाँ हैं। जब इन्हें रोकने के लिए नियम बनाए जाते हैं, तो हंगामा मचता है कि “समाज बँट जाएगा।” जैसे समाज पहले से बराबरी पर खड़ा हो ! 

कैमरे की कलम: शोर का लोकतंत्र और आस्था की राजनीति


आज का भारत बहसों से नहीं, शोर से चल रहा है। यह शोर टीवी स्टूडियो से लेकर सोशल मीडिया तक फैला है। हर मुद्दा तात्कालिक है, हर गुस्सा प्रायोजित, और हर बहस अधूरी। धर्म, जाति और पहचान ये अब सामाजिक विमर्श नहीं रहे, ये राजनीतिक औज़ार बन चुके हैं। जिस दिन कोई मुद्दा जनसरोकार के सवालों की ओर बढ़ने लगता है, उसी दिन नया शोर पैदा कर दिया जाता है। समाज, धर्म और जाति जो कभी पहचान और सह-अस्तित्व के आधार थे अब टकराव की रेखाओं में बदलते दिख रहे हैं। भीड़ के शोर में व्यक्ति की आवाज़ गुम होती जा रही है। हर मुद्दा दो ध्रुवों में बँट जाता है समर्थन या विरोध, बीच की विवेकपूर्ण आवाज़ के लिए कोई जगह नहीं बचती। यह हालात लोकतंत्र के लिए खतरनाक हैं, क्योंकि लोकतंत्र बहस से मजबूत होता है, उन्माद से नहीं।

पिछले एक सप्ताह से देश में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से जुड़े मुद्दों पर गरमाई बहस यह दिखाती है कि आज आस्था भी राजनीतिक हथियार बनती जा रही है। कोई समर्थन में खड़ा है, कोई विरोध में। लेकिन बहुत कम लोग सवाल पूछने की जगह बचा पा रहे हैं। धर्म जब संवाद के बजाय दमन का माध्यम बन जाए, तो समस्या धर्म में नहीं उसके राजनीतिक इस्तेमाल में होती है। यह विवाद असल में इस बात का प्रतीक है कि हम असहमति को अपमान समझने लगे हैं। जैसा कि सभी जानते हैं प्रयागराज में मौनी अमावस्या के अवसर पर संगम स्नान को लेकर ज्योतिष पीठ बद्रीनाथ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और मेला प्रशासन के बीच टकराव देखने को मिला। इस दौरान शंकराचार्य के स्नान कार्यक्रम और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर प्रशासन और उनके समर्थकों के बीच मतभेद सामने आए। मौनी अमावस्या के दिन मेला प्रशासन ने शंकराचार्य को पालकी पर सवार होकर स्नान के लिए जाने से रोक दिया। प्रशासन का कहना था कि सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन को देखते हुए विशेष व्यवस्था लागू की गई थी। वहीं शंकराचार्य समर्थकों ने इसे परंपराओं का अपमान बताया। स्थिति उस समय तनावपूर्ण हो गई जब शंकराचार्य समर्थकों और पुलिस के बीच धक्का-मुक्की की खबरें सामने आईं। इसके बाद शंकराचार्य ने मेला और स्थानीय प्रशासन के खिलाफ धरना शुरू कर दिया। इस घटनाक्रम ने न सिर्फ प्रयागराज बल्कि देशभर में ध्यान खींचा और सोशल मीडिया से लेकर टीवी चैनलों तक यह मुद्दा चर्चा का विषय बन गया। हालांकि यह पहला मौका नहीं है जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सार्वजनिक विवादों में आए हों। इससे पहले भी उनके कई बयान और हस्तक्षेप चर्चा और विवाद का कारण बन चुके हैं।

वैसे भी भारत में विवाद कोई नई चीज़ नहीं है। यहाँ विवाद जन्म लेते हैं, पलते हैं, मीडिया में जवान होते हैं और फिर किसी अगले विवाद की आहट में खो जाते हैं। लेकिन कुछ विवाद ऐसे होते हैं जो सिर्फ किसी व्यक्ति या बयान तक सीमित नहीं रहते वे समाज के भीतर चल रहे गहरे अंतर्विरोधों को उजागर कर देते हैं। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को लेकर देशभर में जो बहस चल रही है, वह भी ऐसा ही एक मामला है। कोई उनके शंकराचार्य होने पर सवाल खड़े करता है, कोई उनके अहंकारी तेवर का हवाला देकर गलत ठहराता है। ऐसा लगता है यह विवाद किसी एक बयान का नहीं, बल्कि उस भूमिका का है जो एक धार्मिक पदाधिकारी आज के भारत में निभा रहा है या निभाना चाहता है। 

भारतीय परंपरा में शंकराचार्य केवल एक धार्मिक गुरु नहीं होता। वह विचार की परंपरा का वाहक होता है संयम, विवेक और तटस्थता का प्रतीक। ऐसे में जब कोई शंकराचार्य बार-बार समकालीन राजनीति, सरकार, नीतियों या सामाजिक समूहों पर तीखे वक्तव्य देता है, तो प्रश्न उठना स्वाभाविक है क्या यह आध्यात्मिक मार्गदर्शन है या वैचारिक हस्तक्षेप ? स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के हालिया वक्तव्यों ने यही प्रश्न फिर से केंद्र में ला दिया है। कभी गाय, कभी संविधान, कभी राष्ट्रवाद, कभी सरकार, विषयों की सूची लंबी है। समस्या यह नहीं कि वे बोल रहे हैं; समस्या यह है कि वे किस स्वर, किस भाषा और किस उद्देश्य से बोल रहे हैं। सदियों से व्यंग्य और कटाक्ष भारतीय बौद्धिक परंपरा का हिस्सा रहे हैं। कबीर ने भी किया, तुलसी ने भी संकेत दिए। लेकिन वहाँ व्यंग्य आत्ममंथन के लिए था, न कि तालियाँ बटोरने के लिए। आज जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का कोई बयान आता है, तो वह टीवी बहसों की हेडलाइन बनता है, सोशल मीडिया के ट्रेंड में बदल जाता है और फिर राजनीतिक खेमों में बाँट दिया जाता है। एक पक्ष उन्हें “सच्चा धर्मरक्षक” बताता है, दूसरा “राजनीतिक एजेंडा चलाने वाला साधु”। यह विभाजन बताता है कि उनका वक्तव्य अब आध्यात्मिक संवाद नहीं रह गया, वह राजनीतिक हथियार बन चुका है। 

यहाँ एक असहज प्रश्न खड़ा होता है, क्या एक साधु की भाषा उतनी ही कठोर हो सकती है जितनी एक राजनीतिक नेता की? जब धर्माचार्य सरकार पर सीधा हमला करते हैं, तो एक वर्ग इसे “साहस” कहता है। लेकिन जब वही धर्माचार्य किसी विशेष सामाजिक या वैचारिक समूह के प्रति कठोर रुख अपनाते हैं, तो वही वर्ग “धर्म की रक्षा” का तर्क देता है। यह दोहरा मापदंड ही विवाद की असली जड़ है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के कुछ वक्तव्यों में यह स्पष्ट दिखता है कि वे खुद को नैतिक सत्ता के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। एक ऐसी सत्ता जो चुनी नहीं गई, लेकिन जो चुनी हुई सत्ता को चुनौती देती है। 

आज स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की चर्चा केवल इसलिए भी नहीं है कि वे एक शंकराचार्य हैं, बल्कि इसलिए भी कि वे उस बदलती भूमिका का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसमें धर्माचार्य आध्यात्मिक मार्गदर्शन से आगे बढ़कर सामाजिक और राजनीतिक विमर्श में सक्रिय दिखाई देते हैं। यह भूमिका भारतीय लोकतंत्र और समाज, दोनों के लिए नए सवाल खड़े करती है। क्या धर्माचार्यों की यह सक्रियता समय की मांग है, या इससे धार्मिक पदों की तटस्थता प्रभावित होती है यह बहस अभी जारी है। लेकिन इतना स्पष्ट है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद आज के भारत में धर्म, राजनीति और सार्वजनिक विमर्श के संगम पर खड़े एक ऐसे व्यक्ति हैं, जिनकी हर टिप्पणी केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक अर्थ भी ग्रहण कर लेती है। 

इस पूरे विवाद में मीडिया की भूमिका भी कम दिलचस्प नहीं है। हर बयान को ब्रेकिंग न्यूज़, हर कटाक्ष को राष्ट्रीय बहस और हर प्रतिक्रिया को टकराव बना दिया गया। टीवी स्टूडियो में बैठे एंकर पूछते हैं— “क्या स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती देश की आवाज़ हैं?” “क्या वे राजनीति में हस्तक्षेप कर रहे हैं?” लेकिन शायद ही कोई यह पूछता है कि क्या हम धर्माचार्यों को इस भूमिका में धकेल रहे हैं, क्योंकि हमें शोर चाहिए, समाधान नहीं? 


कैमरे की कलम: चूहे, दीमक और सात करोड़ की लोकतांत्रिक भूख


छत्तीसगढ़ के कवर्धा जिले में जो हुआ, वह घोटाला नहीं घोटाले का सरकारी विज्ञापन है। फर्क बस इतना है कि इस बार पोस्टर पर नेता नहीं, चूहे मुस्कुरा रहे हैं। 26 हजार क्विंटल धान, सात करोड़ रुपये और जवाब चूहा, दीमक, मौसम। यानी चोरी भी प्रकृति ने की, गिनती भी प्रकृति ने बिगाड़ी और जवाबदेही भी प्रकृति ले जाएगी। यह घटना उस व्यवस्था का चरित्र प्रमाणपत्र है, जो हर बड़े घोटाले के बाद और ज्यादा बेशर्म, ज्यादा आत्मविश्वासी और ज्यादा रचनात्मक होती जा रही है। सात करोड़ रुपये का धान न आग में जला, न बाढ़ में बहा, न ही किसी युद्ध में लुटा बस चूहों, दीमकों और मौसम ने खा लिया। यह सफाई इतनी मासूम है कि अपराध भी खुद को ठगा हुआ महसूस करे।

यह पहला मौका है जब सरकारी बयान ने जीव-जंतुओं को भ्रष्टाचार की अग्रिम पंक्ति में ला खड़ा किया है। अब तक घोटालों में नेता, अफसर, दलाल और ठेकेदार बदनाम होते थे, लेकिन कवर्धा ने इतिहास रच दिया यहाँ चूहे मुख्य अभियुक्त हैं। वे भी ऐसे चूहे, जो क्विंटल में खाते हैं, रजिस्टर में एंट्री करवाते हैं, फर्जी बिल बनवाते हैं और जाते-जाते CCTV की आंखों पर पट्टी भी बाँध देते हैं। यह कोई साधारण चूहा नहीं, बल्कि सिस्टम-अनुकूल चूहा है।

प्रश्न यह नहीं है कि 26 हजार क्विंटल धान कैसे गायब हुआ। असली प्रश्न यह है कि इतना धान गायब होने के बाद भी सिस्टम कैसे खड़ा है? गोदामों में धान आता है, तौला जाता है, सील होता है, निरीक्षण होता है, रिपोर्ट बनती है और फिर एक दिन पता चलता है कि धान था ही नहीं। यह जादू नहीं, यह प्रशासनिक कला है। इसे भ्रष्टाचार कहना इस कला का अपमान होगा; यह तो प्रशासनिक शिल्प है।

प्रशासन की सफाई बताती है कि चूहे और दीमक अब सिर्फ अनाज या लकड़ी नहीं खाते, वे जवाबदेही भी खाते हैं। मौसम सिर्फ फसल नहीं खराब करता, वह फाइलें भी साफ कर देता है। यह वही मौसम है जो हर घोटाले के बाद अचानक सक्रिय हो जाता है कभी बारिश बनकर, कभी नमी बनकर, कभी “लंबे समय तक भंडारण” के बहाने। लगता है प्रकृति भी अब सरकारी तंत्र का हिस्सा बन चुकी है।

विपक्ष ने इसे घोटाला कहा, जनता ने मज़ाक बनाया और प्रशासन ने औपचारिक कार्रवाई। कुछ निलंबन, कुछ नोटिस यानी संस्कार अनुसार शोकसभा । असली दोषी वहीं सुरक्षित हैं, जहाँ हर घोटाले के बाद रहते हैं फ़ाइलों के पीछे, पदों के ऊपर और व्यवस्था की छाया में। निलंबन यहाँ सज़ा नहीं, रिवाज़ है। नोटिस यहाँ सवाल नहीं, ढाल है।

यह पूरा प्रकरण बताता है कि भ्रष्टाचार अब चोरी नहीं करता, वह प्रक्रिया का पालन करता है। सब कुछ नियमों के भीतर होता है काग़ज़ पूरे, हस्ताक्षर पूरे, मुहरें पूरी। कमी सिर्फ गोदाम में होती है। और जब कमी पकड़ में आती है, तो कारण इतने प्राकृतिक होते हैं कि मानव जिम्मेदारी की जरूरत ही नहीं पड़ती।

कल्पना कीजिए यदि किसी किसान के घर से एक बोरी धान गायब हो जाए, तो क्या वह यह कह सकता है कि “चूहे खा गए”? शायद नहीं। उससे पूछा जाएगा लापरवाही क्यों की, सुरक्षा क्यों नहीं की। लेकिन जब सरकारी गोदाम से सात करोड़ का धान गायब होता है, तो सवाल उल्टा हो जाता है बेचारे चूहे क्या करें ? यही तो शासन और आम आदमी का फर्क है। आम आदमी दोषी होता है, सिस्टम हमेशा पीड़ित।

यह मामला यह भी बताता है कि निगरानी तंत्र सिर्फ काग़ज़ पर जिंदा है। CCTV कैमरे थे, लेकिन उन्होंने कुछ नहीं देखा। रजिस्टर थे, लेकिन उन्होंने सब कुछ सही बताया। निरीक्षण हुए, लेकिन किसी को कमी नहीं दिखी। यह सामूहिक अंधापन नहीं, सहमति से ओढ़ी गई पट्टी है। जब सबको पता हो कि क्या नहीं देखना है, तब कुछ भी नहीं दिखता।

कवर्धा का यह प्रकरण एक जिले की कहानी नहीं है। यह उस राज्य और उस व्यवस्था का प्रतीक है, जहाँ धान खरीदी किसान के नाम पर होती है, लेकिन फायदा हमेशा किसी और को मिलता है। किसान खेत में खड़ा रहता है, धूप में, कर्ज़ में, इंतज़ार में और धान गोदाम पहुँचते ही अदृश्य हो जाता है। न किसान को जवाब, न जनता को हिसाब। आज चूहे हैं, कल कुछ और होगा। कभी कहा जाएगा नमी ज्यादा थी। कभी रिकॉर्ड पुराना था। कभी मानव भूल। लेकिन एक बात स्थायी रहेगी ऊपर तक कोई जिम्मेदार नहीं। क्योंकि जिम्मेदारी वहीं मर जाती है, जहाँ सत्ता शुरू होती है।

सबसे खतरनाक यह नहीं कि धान गायब हुआ। सबसे खतरनाक यह है कि इसे लेकर सिस्टम शर्मिंदा नहीं है। वह सफाई दे रहा है, तर्क दे रहा है, बहस कर रहा है और आगे बढ़ रहा है। यह निर्लज्जता ही असली संकट है। जब घोटाला भी रूटीन हो जाए, तब लोकतंत्र सिर्फ चुनावी रस्म बनकर रह जाता है।

कवर्धा ने हमें यह सिखाया है कि आज के शासन में चूहा सबसे सुरक्षित पात्र है। न उसे गिरफ्तार किया जा सकता है, न उससे पूछताछ। वह हर बार बच निकलता है बिल्कुल वैसे ही जैसे असली दोषी। फर्क सिर्फ इतना है कि चूहा भूखा होता है, और व्यवस्था लालची।

मेरा यह कथन किसी चूहे के खिलाफ नहीं है। यह उस तंत्र के खिलाफ है, जिसने चूहे को बहाना बना लिया है। क्योंकि सच यह है कि धान चूहों ने नहीं खाया धान व्यवस्था ने खाया है। और जब व्यवस्था खुद खाने लगे, तब देश सिर्फ गोदाम नहीं खोता, विश्वास भी खो देता है। 

आज सवाल यह नहीं है कि 26 हजार क्विंटल धान कहाँ गया। सवाल यह है कि हमारी जवाबदेही, हमारी नैतिकता और हमारी शासन व्यवस्था कब और कहाँ गायब हुई ? और उसका जवाब शायद किसी गोदाम में नहीं मिलेगा वह कहीं फाइलों के बीच, नोटिसों के नीचे और चूहों की आड़ में दफन है।

कैमरे की कलम: राष्ट्रीय परिसंवाद या मौन सम्मेलन ?


किसी विश्वविद्यालय का सभागार आमतौर पर ज्ञान, संवाद और असहमति का सुरक्षित स्थल माना जाता है। यहाँ सवाल पूछे जाते हैं, बहस होती है और कभी-कभी तीखी असहमति भी सामने आती है लेकिन वही असहमति विश्वविद्यालय को विश्वविद्यालय बनाती है। यदि वहाँ सिर्फ़ ताली बजाने वाले श्रोता चाहिए हों, तो वह मंच अकादमिक नहीं, मनोरंजनात्मक हो जाता है। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर स्थित गुरू घासीदास सेंट्रल यूनिवर्सिटी में हाल में जो हुआ, उसने यही बुनियादी सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या हमारे विश्वविद्यालय अब संवाद के लिए हैं या केवल कुर्सियों की पूजा के लिए।

घटना एक राष्ट्रीय परिसंवाद की है, विषय था ‘समकालीन हिन्दी कहानी : बदलते जीवन संदर्भ’। यानी ऐसा विषय जिसमें जीवन की जटिलताएँ, विडंबनाएँ और असहमति स्वाभाविक हैं। आयोजन साहित्य अकादमी, दिल्ली के सहयोग से था। मंच पर देश के कई प्रतिष्ठित साहित्यकार मौजूद थे, जिनमें कथाकार मनोज रूपड़ा भी शामिल थे। लेकिन परिसंवाद साहित्य से अधिक सत्ता और संवेदनशीलता के टकराव का मंच बन गया।

बताया जाता है कि विश्वविद्यालय के कुलपति आलोक कुमार चक्रवाल अपने वक्तव्य में विषय से भटकते हुए चुटकुलों के सहारे श्रोताओं को संबोधित कर रहे थे। यह कोई अपराध नहीं है जब तक कि चुटकुले ज्ञान का विकल्प न बनने लगें। लेकिन जब कुलपति ने मंच पर बैठे कथाकार से यह पूछ लिया कि वे कहीं बोर तो नहीं हो रहे, तो मानो उन्होंने स्वयं संवाद का दरवाज़ा खोल दिया। कथाकार ने भी उसी खुले दरवाज़े से भीतर कदम रखते हुए सिर्फ़ इतना कहा “आप विषय पर नहीं बोल रहे हैं।”

यहीं से विश्वविद्यालय का सभागार अचानक अदालत में बदल गया, जहाँ जज भी वही थे, अभियोजक भी वही और फ़ैसला सुनाने वाले भी वही। एक साधारण-सी टिप्पणी को असहिष्णुता का ऐसा झोंका लगा कि कुलपति ने सार्वजनिक मंच से ही अतिथि लेखक को अनुशासनहीन, बदतमीज़ और अवांछित घोषित कर दिया। फिर आदेश आया बाहर जाइए। मानो यह कोई विश्वविद्यालय नहीं, निजी ड्रॉइंग रूम हो, जहाँ मेहमान वही टिक सकता है जो मेज़बान की हर बात पर सिर हिलाए।

विडंबना यह है कि विश्वविद्यालय में कुलपति को पहला विद्वान माना जाता है, पहला शिक्षक, पहला श्रोता भी। लेकिन यहाँ तो पहला श्रोता ही सवाल सुनने को तैयार नहीं था। सवाल सुनते ही कुर्सी ने अपनी असली शक्ति दिखा दी। यह वही कुर्सी है जो आदमी को ऊँचा नहीं करती, लेकिन उसे यह भ्रम ज़रूर दे देती है कि वह ऊँचा हो गया है।

वीडियो में दिखता है कि कुछ श्रोता कथाकार के साथ सभागृह से बाहर निकल गए। यह दृश्य किसी विरोध प्रदर्शन जैसा नहीं था, बल्कि एक मौन असहमति थी जैसे कोई कह रहा हो, “अगर सवाल पूछना अपराध है, तो हम इस अदालत में नहीं बैठेंगे।” यह शायद उस दिन की सबसे सार्थक प्रतिक्रिया थी।

अब सवाल उठता है क्या विश्वविद्यालयों में असहमति की कोई जगह बची है? क्या ‘राष्ट्रीय परिसंवाद’ का अर्थ यह है कि मंच से केवल वही बोला जाए जो सत्ता को अच्छा लगे? अगर ऐसा ही है, तो फिर विश्वविद्यालय और सरकारी दफ़्तर में क्या अंतर रह जाता है?

कुलपति का पद केवल प्रशासनिक नहीं होता, वह नैतिक और बौद्धिक नेतृत्व का भी प्रतीक होता है। गुरु घासीदास जैसे संत के नाम पर बने विश्वविद्यालय से यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वहाँ विनम्रता और संवाद की परंपरा होगी। लेकिन यहाँ तो हाथ हिलाकर अतिथि को बाहर निकालना ही संवाद का अंतिम रूप बन गया।

यह तर्क दिया जा सकता है कि मंच की मर्यादा बनाए रखना ज़रूरी है। यह बात सही है। लेकिन मर्यादा केवल अतिथि के लिए नहीं होती, मेज़बान के लिए भी होती है। और जब मर्यादा की परिभाषा यह हो जाए कि “आप हमारी बात से असहमत नहीं हो सकते”, तो वह मर्यादा नहीं, मौन का अनुशासन कहलाता है।

कुलपति बनने से पहले वे गुजरात के सौराष्ट्र विश्वविद्यालय में प्राध्यापक रह चुके हैं। यानी अकादमिक जीवन में बहस, सवाल और आलोचना से उनका परिचय नया नहीं होना चाहिए। फिर भी यदि एक टिप्पणी से इतना विचलन हो जाए कि सार्वजनिक अपमान का रास्ता चुना जाए, तो समस्या टिप्पणी में नहीं, संवेदनशीलता के अभाव में है।

यह घटना केवल एक लेखक और एक कुलपति के बीच का विवाद नहीं है। यह उस व्यापक संकट का लक्षण है, जिसमें संस्थानों की कुर्सियाँ व्यक्तियों से बड़ी हो गई हैं। जहाँ आलोचना को दुश्मनी समझा जाने लगा है और असहमति को अनुशासनहीनता। विश्वविद्यालयों में उत्कृष्टता इसी वजह से घट रही है क्योंकि सवाल पूछने वाले कम होते जा रहे हैं और ताली बजाने वाले बढ़ते जा रहे हैं।

अचरज की बात यह भी है कि ऐसी घटनाओं पर व्यवस्था की चुप्पी अब असामान्य नहीं रही। न केंद्र सरकार से कोई प्रतिक्रिया, न राज्यपाल स्तर से कोई सवाल। शायद इसलिए कि बदतमीजी अब अपवाद नहीं रही, बल्कि धीरे-धीरे ‘नया सामान्य’ बनती जा रही है। गरिमा जैसे शब्द अब भाषणों में ज़्यादा मिलते हैं, व्यवहार में कम।

ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या साहित्यकारों, शिक्षाविदों और पत्रकारों को ऐसे कुलपतियों के रहते विश्वविद्यालयों का बहिष्कार नहीं करना चाहिए? यह बहिष्कार किसी विचारधारा के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि व्यवहार के ख़िलाफ़ होना चाहिए। यह किसी वाम-दक्षिण की लड़ाई नहीं, बल्कि न्यूनतम इंसानियत की माँग है। कहा जाता है कि वाम और दक्षिण के बीच कहीं एक मानवपंथ भी होना चाहिए। शायद वही मानवपंथ हमें यह सिखाता है कि सत्ता अस्थायी होती है, लेकिन शब्द स्थायी। और शब्दों के साथ किया गया अन्याय देर-सबेर इतिहास में दर्ज हो जाता है।

यदि छत्तीसगढ़ के राज्यपाल को अपनी संवैधानिक भूमिका का ज़रा भी अहसास है, तो उन्हें इस घटना के वीडियो को केवल देखना नहीं चाहिए, बल्कि यह सवाल भी पूछना चाहिए कि विश्वविद्यालयों को भय और अहंकार का प्रयोगशाला बनाने का अधिकार आखिर किसने दिया ?

फिलहाल, समाज के पास ऐसे अहंकार का कोई बड़ा इलाज नहीं है। न अदालतें, न आयोग, न समितियाँ। लेकिन एक छोटा-सा लोकतांत्रिक उपाय अब भी बचा है स्मृति। लोग याद रखें कि किसने सवाल को अपमान समझा और किसने अपमान को सवाल बना दिया। और अगर कोई चिट्ठी भेजनी ही हो, तो उसमें लंबे भाषण की ज़रूरत नहीं। कभी-कभी एक वाक्य भी पर्याप्त होता है  “आप कुर्सी पर तो बैठे हैं, लेकिन गरिमा अभी बाहर खड़ी है।”

छत्तीसगढ़ के पर्यावरण इतिहास में एक नया अध्याय: रामसर का ताज, ज़मीन पर सन्नाटा


12 दिसंबर 2025, इस तारीख़ ने छत्तीसगढ़ के पर्यावरण इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ा। बिलासपुर जिले का कोपरा जलाशय राज्य का पहला रामसर स्थल घोषित हुआ। काग़ज़ों में यह क्षण गौरव का था। ऐसा गौरव, जिसे माथे पर तिलक की तरह सजाया जाना चाहिए था पर विडंबना देखिए कि तिलक लगते ही आईना धुंधला कर दिया गया। शोर बहुत हुआ, सार गुम हो गया।

रामसर का तमगा मिलते ही श्रेय की होड़ शुरू हो गई सियासत ने माइक पकड़ा, विभागीय दांव-पेंचों ने फाइलें तेज़ दौड़ाईं, और ठेकेदारों की चाल अचानक फुर्तीली हो गई। सरकारी बोर्ड रातों-रात उग आए; जलाशय के किनारे पक्षियों की तस्वीरें टंगीं, जिसे गायब होते भी समय नहीं लगा । काम सरकारी था, इसलिए अंदाज़ भी वही दिखावटी, जल्दबाज़, आत्मसंतुष्ट ।

कोपरा को रामसर का गौरव हासिल होने मौके पर एक आयोजन का तम्बू सजाने के लिये 9 जनवरी 2026 को वन विभाग ने ‘बर्ड वॉक’ और संगोष्ठी का आयोजन किया। सरकारी आमंत्रण कार्ड छपे, अतिथियों की सूची लंबी थी बस एक चीज़ कम थी: कोपरा। संगोष्ठी सकरी के वन चेतना केंद्र में हुई कोपरा से चार किलोमीटर दूर। यह दूरी केवल भौगोलिक नहीं थी; यह उस सोच की दूरी थी, जो मानती है कि सम्मान मंच पर बँटता है, ज़मीन पर नहीं।

बर्ड वॉक में कुछ पक्षी प्रेमी और फोटोग्राफ़र दिखे वे ही, जो बरसों से बिना तामझाम, बिना फंड, बिना बोर्ड के कोपरा को समझते रहे। संगोष्ठी में भीड़ थी, पर कोपरा के लोग नहीं थे। जिस गाँव को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली, वहाँ का नज़ारा हर रोज़ जैसा ही रहा। जिन युवाओं और स्कूली बच्चों के बीच संरक्षण का बीज बोया जाना था, वे आयोजन के शोर से दूर खड़े रहे या यूँ कहें, खड़ा कर दिए गए। 

सबसे पीड़ादायक उपेक्षा उन वरिष्ठ लोगों की रही, जो तथ्य, धैर्य और ज़मीन से जुड़ी समझ रखते हैं वे जो कोपरा के गौरव को संरक्षित करने में मील का पत्थर बन सकते थे। उन्हें आमंत्रण नहीं मिला; शायद इसलिए कि वे तालियाँ नहीं, सवाल पूछते हैं। सवाल जो तस्वीरों से नहीं, सच से डराते हैं। मुझे इस आयोजन का निमंत्रण भी मिला, विभाग के अधिकारियों ने भरपूर तवज्जो भी दी, लेकिन कोपरा की गैर मौजूदगी ने मुझे न सिर्फ परेशान किया बल्कि कईयों सवाल सोचने पर मजबूर कर दिया, व्यक्तिगत मेरे लिये 12 दिसंबर 2025 बड़ी ख़ुशी का दिन रहा। कोपरा को रामसर का दर्जा मिलने के साथ केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव से लेकर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, वन मंत्री केदार कश्यप के ट्वीटर पर शुभकामनाओं के सन्देश समेत अन्य स्थानों पर जिन तस्वीरों को शेयर किया गया वो मेरी खींची हुई थी लेकिन आयोजन स्थल पर कोपरा गाँव की अनुपस्थिति से मेरी भावनाएँ  व्यक्तिगत आहत हुईं। सच यह है कि वन विभाग को संरक्षण से ज़्यादा क्रेडिट मैनेजमेंट आता है। पहले अनदेखी, फिर घोषणा, फिर समारोह और अंत में आत्ममुग्धता। यकीनन संरक्षण को ‘इवेंट’ बना दिया गया है। 

यह वही कोपरा है, जिसकी महत्ता को लेकर पिछले एक दशक से कुछ पक्षी प्रेमी और फ़ोटोग्राफ़र लगातार चेताते रहे। अतिक्रमण, प्रदूषण, शिकार, असामाजिक गतिविधियाँ सब कुछ प्रशासन के संज्ञान में था। मुरुम का अवैध उत्खनन, कोलवॉशरी के लिए टैंकरों से पानी की चोरी, सूचनाएँ वन विभाग से लेकर जिला प्रशासन तक पहुँचीं पर कानों में जूँ तक न रेंगी। मछली मारने की पुरानी रवायतें चलीं, और संरक्षण की नई भाषा फाइलों में सोती रही।

रामसर का दर्जा, यह केवल एक पदक नहीं, एक जिम्मेदारी है। यह याद दिलाता है कि आर्द्रभूमि कोई सजावटी वस्तु नहीं, जीवन-रेखा है। पर हमारे यहाँ जीवन-रेखाएँ भी तब तक दिखती नहीं, जब तक उन पर रिबन न बँध जाए। और रिबन बँधते ही, कैंची खोजी जाने लगती है काटने के लिए, जोड़ने के लिए नहीं।

12 दिसंबर से पहले सिर्फ सुगबुगाहटें थीं, उहापोह था। अब जब घोषणा हो चुकी है। संरक्षण बोर्ड से नहीं, सबकी सहभागिता से होता है। संगोष्ठी केंद्रों से नहीं, गाँव की चौपाल से जन्म लेती है। बर्ड वॉक कैमरे से नहीं, चेतना से पूरी होती है। अगर रामसर का ताज सच में पहनना है, तो उसे संभालने के लिए सिर भी चाहिए वह सिर, जो झुके नहीं; वह आँख, जो दिखावे के परे देखे; और वह दिल, जो कोपरा को तस्वीर नहीं, जीवित तंत्र माने। वरना इतिहास यही लिखेगा कि हमने गौरव तो पाया, पर उसे बचाने की हिम्मत खो दी। 

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