कैमरे की कलम: नशे की खेती और सत्ता की खामोशी
कैमरे की कलम: सड़क पर अभियान नहीं, व्यवस्था और व्यवहार में बदलाव की दरकार
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में सकरी- पेंड्रीडीह बाइपास की हालिया सड़क दुर्घटना की तस्वीरें और वीडियो किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को भीतर तक झकझोर देने के लिए काफी हैं। सड़क पर बिखरे मलबे के बीच पसरा सन्नाटा और रोते-बिलखते परिजन, ये दृश्य सिर्फ एक हादसे का नहीं बल्कि उस व्यवस्था की विफलता का आईना हैं, जो हर साल हजारों जिंदगियां निगल रही है। यह कोई इकलौती घटना नहीं है। कुछ दिन पहले ही एक पिता अपनी पत्नी और बच्चे के शव से लिपटकर विलाप करता दिखाई दिया था। कहीं तेज रफ्तार बाइक पर निकला घर का इकलौता बेटा कभी लौटकर नहीं आया। हर ऐसी खबर एक परिवार के उजड़ने की कहानी है, जिसे हम पढ़ते हैं, अफसोस जताते हैं और फिर अगली सुर्खी की ओर बढ़ जाते हैं।
देश के साथ-साथ राज्य में भी सड़क सुरक्षा को लेकर वर्षों से अभियान चलाए जा रहे हैं। पहले सड़क सुरक्षा सप्ताह मनाया गया, फिर पखवाड़ा और अब सड़क सुरक्षा माह। जगह-जगह बैनर, पोस्टर, रैलियां, शपथ ग्रहण, स्कूलों में भाषण—सब कुछ होता है। आंकड़ों की समीक्षा बैठकों में होती है, योजनाएं बनती हैं, लक्ष्य तय होते हैं। लेकिन जमीनी हकीकत यही है कि हादसों की रफ्तार कम होने के बजाय कई जगह बढ़ी है। इसका सीधा अर्थ है कि हमारे प्रयास या तो नाकाफी हैं या फिर केवल औपचारिकता तक सीमित रह गए हैं।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि नियमों का पालन कराने की जिम्मेदारी जिन पर है, वे स्वयं कई बार नियमों की अनदेखी करते दिखाई देते हैं। मंत्री, विधायक, वरिष्ठ अधिकारी—कई बार सार्वजनिक कार्यक्रमों में बिना सीट बेल्ट या बिना हेलमेट नजर आते हैं। संदेश देने के नाम पर निकाली जाने वाली बाइक रैलियों में शामिल अधिकांश लोग हेलमेट नहीं पहनते। जब नेतृत्वकर्ता ही उदाहरण प्रस्तुत नहीं करेंगे, तो आम नागरिक से अनुशासन की अपेक्षा कैसे की जा सकती है?
सड़क दुर्घटनाओं से होने वाली मौतों के आंकड़े भयावह हैं। हर साल इतनी जिंदगियां चली जाती हैं, जितनी कई छोटे शहरों की कुल आबादी होती है। यह केवल आंकड़ा नहीं, सामाजिक त्रासदी है। हर मृतक के पीछे एक परिवार है, जिसकी आर्थिक और भावनात्मक दुनिया एक पल में बिखर जाती है। कई घरों में कमाने वाला सदस्य चला जाता है, बच्चों का भविष्य अधर में लटक जाता है।
इस स्थिति के लिए केवल तेज रफ्तार या लापरवाह चालक ही जिम्मेदार नहीं हैं। खराब सड़कें, गड्ढे, अपर्याप्त संकेतक, स्ट्रीट लाइट की कमी, ओवरलोड वाहन, और बिना उचित परीक्षण के जारी किए गए ड्राइविंग लाइसेंस भी उतने ही बड़े कारण हैं। यदि आरटीओ में लाइसेंस वास्तविक ड्राइविंग परीक्षा के बजाय कागजी प्रक्रिया बनकर रह जाए, तो सड़क पर अयोग्य चालक उतरेंगे ही। यदि सड़क निर्माण में गुणवत्ता से समझौता होगा, तो दुर्घटनाएं बढ़ेंगी ही।
जरूरत इस बात की है कि सड़क सुरक्षा को ‘अभियान’ नहीं, ‘निरंतर जिम्मेदारी’ के रूप में लिया जाए। जिस तरह स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव जैसे कार्यक्रमों का व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ, उसी तरह सड़क सुरक्षा को वर्ष भर प्राथमिकता दी जाए। पुलिस की मौजूदगी सिर्फ चालान काटने तक सीमित न रहे, बल्कि अनुशासन की संस्कृति विकसित करे। जनप्रतिनिधि और अधिकारी सार्वजनिक रूप से नियमों का पालन करते हुए उदाहरण प्रस्तुत करें। स्कूलों और कॉलेजों में सड़क सुरक्षा शिक्षा को व्यवहारिक रूप से जोड़ा जाए, केवल भाषणों तक सीमित न रखा जाए।
सड़क सुरक्षा का असली संदेश पोस्टर या मंच से नहीं, सड़क पर दिखने वाले आचरण से जाएगा। जब लोग देखेंगे कि नियम तोड़ना आसान नहीं और नियम मानना सम्मान की बात है, तभी बदलाव संभव होगा। यह समझना होगा कि सड़क पर चलने वाला हर व्यक्ति सिर्फ एक वाहन चालक नहीं, बल्कि किसी का बेटा, बेटी, पिता, मां या जीवनसाथी है। एक क्षण की लापरवाही, एक गलत निर्णय या एक प्रशासनिक ढिलाई पूरे परिवार की दुनिया बदल सकती है।
अब समय आ गया है कि सड़क सुरक्षा को औपचारिकता के दायरे से निकालकर जीवन की प्राथमिकता बनाया जाए। वरना हम हर वर्ष नए संकल्प लेते रहेंगे और हर वर्ष नई शोकसभाओं में शामिल होते रहेंगे। सवाल यह नहीं कि सड़क सुरक्षा माह कब मनाया जाएगा; सवाल यह है कि क्या हम सच में किसी घर का चिराग बुझने से बचाने के लिए तैयार हैं?
कैमरे की कलम: “नौकरी का विज्ञापन और ठगी का राष्ट्रनिर्माण”
बिलासपुर जिले के कोटा ब्लॉक मुख्यालय में जय स्तम्भ पर लगा यह पोस्टर अपने आप में केवल एक “नौकरी का विज्ञापन” नहीं, बल्कि बेरोजगारी के बाजार में चल रहे उस संगठित भ्रम उद्योग का जीवंत उदाहरण है, जिसमें शब्द रोजगार के होते हैं और परिणाम अक्सर शोषण के। इस पोस्टर में बड़े अक्षरों में लिखा है—“नौकरी चाहिए, फोन घुमाइए”। यह वाक्य सुनने में जितना सरल और आकर्षक लगता है, उतना ही खतरनाक भी हो सकता है। क्योंकि जिस देश में लाखों युवा वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं, वहां अगर केवल “फोन घुमाने” से 18,500 से 21,500 रुपये महीने की नौकरी मिलने लगे, तो यह रोजगार कम और चमत्कार अधिक प्रतीत होता है।
पोस्टर में दावा किया गया है कि कंपनी को “हेल्पर की जरूरत है”, पोस्टर में यह भी लिखा है कि “कंपनी की तरफ से रूम फ्री” और “आने-जाने के लिए गाड़ी फ्री” होगी। यह पढ़कर ऐसा लगता है कि कंपनी को कर्मचारी नहीं, दामाद चाहिए। यह सुविधाएं किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी के पैकेज जैसी लगती हैं, लेकिन पोस्टर में कंपनी का नाम, उसका पंजीयन नंबर, लाइसेंस विवरण या कोई वैधानिक पहचान स्पष्ट रूप से उल्लेखित नहीं है। यह वही खामोशी है, जिसमें अक्सर धोखाधड़ी की आवाज छिपी होती है। इस पोस्टर में स्थानीय स्तर पर बिलासपुर (छत्तीसगढ़) का संपर्क नंबर दिया गया है, जबकि “डायरेक्टर” जिग्नेश भाई पटेल का नाम गुजरात के भरूच से जुड़ा बताया गया है। यह भौगोलिक दूरी और स्थानीय संपर्क का संयोजन ठगी के कई पुराने मामलों में देखा गया पैटर्न है जहां स्थानीय व्यक्ति केवल एक माध्यम होता है और वास्तविक संचालन कहीं और से होता है।
दरअसल देश में बेरोजगारी अब केवल एक आंकड़ा नहीं रही, यह एक ऐसा खुला बाजार बन चुकी है, जहां नौकरी से ज्यादा नौकरी का भ्रम बिकता है। और इस भ्रम के सबसे बड़े कारोबारी वे लोग हैं, जो रोजगार नहीं देते, बल्कि रोजगार की कल्पना का प्राइवेट लिमिटेड संस्करण बेचते हैं। यह एक ऐसा स्टार्टअप इकोसिस्टम है, जहां निवेश बेरोजगारों की उम्मीदें होती हैं और मुनाफा उनके आत्मसम्मान से वसूला जाता है। आज का ठग पुराना ठग नहीं रहा। वह अब जेबकतरा नहीं, बल्कि “डिजिटल एचआर मैनेजर” बन चुका है। वह अब स्टेशन पर खड़े होकर नहीं कहता—“चलो मुंबई, नौकरी दिलाएंगे।” अब वह लिंक्डइन पर प्रोफाइल बनाता है, इंस्टाग्राम पर विज्ञापन चलाता है और वाट्सऍप पर “Congratulations” लिखकर बेरोजगार युवक को यह एहसास दिलाता है कि देश की अर्थव्यवस्था अब उसी के भरोसे चल रही है।
विडंबना यह है कि जिस देश में एक वास्तविक नौकरी पाने के लिए युवा वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं में खप जाता है, उसी देश में एक फर्जी नौकरी देने वाला व्यक्ति मात्र एक सिम कार्ड और एक फर्जी लोगो से “मल्टीनेशनल कंपनी” बन जाता है। यह स्टार्टअप इंडिया का वह अंधेरा पक्ष है, जहां नवाचार का उपयोग रोजगार सृजन के लिए नहीं, बल्कि रोजगार भ्रम सृजन के लिए किया जा रहा है।
इन ठगों की कार्यप्रणाली अत्यंत वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक है। वे जानते हैं कि बेरोजगार युवक को सबसे ज्यादा किस शब्द की भूख होती है—“Selected”। यह शब्द सुनते ही युवक की आंखों में वह चमक आ जाती है, जो वर्षों की असफलताओं ने बुझा दी थी। और यही वह क्षण होता है, जब ठग अपनी पहली किस्त वसूलता है—“रजिस्ट्रेशन फीस” के नाम पर। इसके बाद शुरू होता है शुल्कों का एक ऐसा सिलसिला, जो कभी समाप्त नहीं होता—ट्रेनिंग फीस, सिक्योरिटी फीस, प्रोसेसिंग फीस। यह फीस दरअसल नौकरी की नहीं, बल्कि ठगी की प्रक्रिया को वैधता देने का टैक्स होता है।
जब युवक पैसे दे देता है, तो उसे दूसरे राज्य भेज दिया जाता है। वहां उसका स्वागत किसी एयरपोर्ट मैनेजर के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे श्रमिक के रूप में होता है, जिसकी स्वतंत्रता पहले ही किस्त में गिरवी रखी जा चुकी होती है। वह समझ जाता है कि उसे नौकरी नहीं मिली, बल्कि उसे बेच दिया गया है—उसके श्रम को, उसकी मजबूरी को और उसके सपनों को।
यहां सबसे गंभीर प्रश्न ठगों की मौजूदगी नहीं, बल्कि उनकी निर्भीकता है। यह निर्भीकता उन्हें किसी अदृश्य शक्ति से नहीं, बल्कि व्यवस्था की सुस्ती से मिलती है। फर्जी विज्ञापन खुलेआम सोशल मीडिया पर चलते रहते हैं, हजारों लोगों तक पहुंचते हैं, लेकिन कार्रवाई का पहिया तब घूमता है, जब पीड़ित युवक थाने पहुंचकर अपनी मूर्खता का प्रमाण देने लगता है। व्यवस्था का रवैया भी कम व्यंग्यात्मक नहीं है। जब कोई युवक शिकायत करता है, तो उससे पूछा जाता है—“तुमने पैसे क्यों दिए?” यह प्रश्न दरअसल एक प्रशासनिक दर्शन को प्रकट करता है—कि अपराध से ज्यादा गंभीर गलती विश्वास करना है।
यह स्थिति केवल कानून-व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि सामाजिक संवेदनहीनता का भी प्रमाण है। क्योंकि ठग केवल पैसे नहीं चुराते, वे उस विश्वास को चुराते हैं, जिस पर समाज टिका होता है। वे केवल एक युवक को नहीं ठगते, बल्कि एक पूरे परिवार की आशाओं को दिवालिया घोषित कर देते हैं। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अधिक संगठित और पेशेवर अगर कोई है, तो वह ठग है। उसके पास मार्केटिंग टीम है, फर्जी रिव्यू हैं, आकर्षक वेबसाइट है, और सबसे महत्वपूर्ण—उसे यह विश्वास है कि उसके खिलाफ कार्रवाई देर से ही होगी।
इसके विपरीत, पीड़ित युवक के पास केवल एक शिकायत होती है और एक लंबा इंतजार। यह स्थिति किसी भी सभ्य समाज के लिए चिंता का विषय होनी चाहिए।क्योंकि जब अपराध तकनीकी रूप से आधुनिक हो जाए और कानून मानसिक रूप से परंपरागत बना रहे, तो न्याय हमेशा पीछे रह जाता है।
यह आवश्यक है कि व्यवस्था केवल अपराध होने के बाद सक्रिय न हो, बल्कि अपराध होने से पहले सतर्क हो। फर्जी प्लेसमेंट एजेंसियों का सत्यापन, सोशल मीडिया विज्ञापनों की निगरानी और त्वरित कार्रवाई—ये केवल प्रशासनिक विकल्प नहीं, बल्कि नैतिक दायित्व हैं। लेकिन फिलहाल स्थिति यह है कि बेरोजगार युवक नौकरी की तलाश में है और ठग बेरोजगार युवकों की तलाश में।
क्या बिलासपुर लूटकांड राज्य की कानून-व्यवस्था पर सवाल है ?
बिलासपुर के राजकिशोर नगर में सराफा व्यापारी संतोष तिवारी पर हमले और करोड़ों की लूट की घटना केवल एक आपराधिक वारदात नहीं है; यह राज्य की कानून-व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न भी खड़ा करती है। जिस दुस्साहस के साथ नकाबपोश बदमाशों ने रिहायशी और व्यस्त इलाके में व्यापारी की कार को घेरकर जानलेवा हमला किया, हथियार लहराए और करोड़ों का माल लेकर फरार हो गए, वह आम नागरिक की सुरक्षा भावना को झकझोरने वाला है।
यह घटना कई स्तरों पर चिंताजनक है। पहला, अपराधियों का आत्मविश्वास। शहर के बीचों बीच, रात के समय, योजनाबद्ध तरीके से वारदात को अंजाम देना इस बात का संकेत देता है कि उन्हें कानून के तत्काल भय का अंदेशा नहीं था। यदि आरोप सही हैं कि रेकी कर रणनीति बनाई गई, तो यह संगठित अपराध की ओर भी इशारा करता है।
दूसरा, खुफिया और निवारक तंत्र की प्रभावशीलता। सवाल यह उठता है कि क्या शहर में अपराध की संभावनाओं को लेकर पर्याप्त सतर्कता थी? क्या संवेदनशील व्यापारिक गतिविधियों से जुड़े लोगों की सुरक्षा के लिए कोई विशेष प्रावधान या निगरानी व्यवस्था थी? यदि अपराधी चोरी के वाहन लेकर आए और उन्हें घटनास्थल पर छोड़कर आगे निकल गए, तो यह जांच एजेंसियों के लिए चुनौती के साथ-साथ व्यवस्था की खामियों का संकेत भी है।
तीसरा, सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा की धारणा। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार हथियार दिखाकर दहशत फैलाना और कथित तौर पर फायरिंग जैसी आवाजें सुनाई देना यह दर्शाता है कि अपराधियों ने भीड़भाड़ वाले इलाके को भी जोखिम नहीं माना। यह स्थिति नागरिकों के मन में भय और अविश्वास पैदा करती है।
हालांकि पुलिस ने नाकेबंदी, विशेष टीम गठन और सीसीटीवी फुटेज की जांच जैसे कदम उठाए हैं, लेकिन यह कार्रवाई घटना के बाद की है। असली प्रश्न यह है कि क्या ऐसी घटनाओं को रोका जा सकता था? कानून-व्यवस्था केवल अपराध के बाद सक्रिय होने का नाम नहीं, बल्कि अपराध की संभावना को न्यूनतम करने की क्षमता भी है।
राजनीतिक स्तर पर आरोप-प्रत्यारोप स्वाभाविक हैं, परंतु इससे आगे बढ़कर यह आवश्यक है कि सरकार और पुलिस तंत्र इस घटना को चेतावनी के रूप में लें। व्यापारिक वर्ग की सुरक्षा, रात में गश्त की सघनता, तकनीकी निगरानी और खुफिया तंत्र की मजबूती, इन सभी पर पुनर्विचार की जरूरत है।
बिलासपुर की यह घटना एक शहर तक सीमित नहीं है। यह राज्य की व्यापक सुरक्षा व्यवस्था पर विमर्श का अवसर भी है। यदि संगठित और योजनाबद्ध अपराधों के प्रति सख्त और त्वरित प्रतिक्रिया नहीं दी गई, तो अपराधियों का मनोबल बढ़ना स्वाभाविक है।
अंततः, कानून-व्यवस्था केवल आंकड़ों का विषय नहीं, बल्कि नागरिकों के विश्वास का प्रश्न है। जब आम नागरिक स्वयं को असुरक्षित महसूस करने लगे, तो यह किसी भी शासन-व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी होती है। अब देखना यह है कि यह घटना सुधार का कारण बनती है या केवल एक और ‘फाइल’ बनकर रह जाती है।
कैमरे की कलम: चिट्टा, सट्टा और सत्ता, खाकी की उलझी कहानी
पुलिस की वर्दी केवल खाकी कपड़ा नहीं राज्य की शक्ति और जनता के भरोसे का प्रतीक है। जब वही वर्दी कटघरे में खड़ी होती है, तो केवल व्यक्ति नहीं, पूरी संस्था सवालों में घिर जाती है। पुलिस को केवल कानून लागू करने वाली संस्था नहीं, बल्कि राज्य के नैतिक प्रतिनिधि के रूप में भी देखा जाता है और इसलिए जब पुलिस व्यवस्था पर बेईमानी, मिलीभगत या पद के दुरुपयोग के आरोप लगते हैं, तो सवाल केवल व्यक्तियों पर नहीं उठते, वे वैधता की जड़ों तक पहुँचते हैं। हाल के वर्षों में देश के कई हिस्सों से ऐसी घटनाएँ सामने आईं जिनमें पुलिसकर्मियों पर महिलाओं के यौन शोषण, नशे के कारोबार में संलिप्तता से लेकर आर्थिक अनियमितताओं और सट्टा नेटवर्क से जुड़ाव तक के आरोप लगे। छत्तीसगढ़ इससे बिल्कुल भी अछूता नहीं है, छत्तीसगढ़ पुलिस में ऐसे दर्जनों आईपीएस अफसर हैं जिन पर अपनी हवस मिटाने के लिए महिलाओं के जिस्म नोचने के आरोप लगे है। नीचे से लेकर बड़े साहबों तक नाम के साथ आरोपों की फेहरिस्त लम्बी है। फिलहाल हिमांशु बर्मन, कल्पना वर्मा और सहदेव यादव जैसे बेईमान पुलिस वालों के लिए इस आदर्श वाक्य “सेवा और सुरक्षा” के मायने ही अलग हैं। मुझे लगता है इन लोगों की पारिवारिक पृष्ठभूमि में संस्कारों की कमी रही होगी, ये तीनों ही चेहरे चरित्र की बुनियादी परीक्षा में विफल रहे ? ये रही उनकी कहानियां।
राजधानी रायपुर में नशे के खिलाफ चल रहे अभियान के बीच एक पुलिस आरक्षक हिमांशु बर्मन की प्रतिबंधित हेरोइन (चिट्टा) के साथ गिरफ्तारी ने एक असहज प्रश्न खड़ा कर दिया है। यह प्रश्न केवल एक व्यक्ति के आचरण तक सीमित नहीं है; यह उस व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा है जो स्वयं को कानून का प्रहरी कहती है। पुलिस के अनुसार सूचना के आधार पर आरक्षक हिमांशु बर्मन को कथित रूप से हेरोइन के साथ पकड़ा गया। वरिष्ठ अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि मामले की जांच जारी है, आरोपी को रिमांड पर लेकर पूछताछ की जा रही है और सप्लाई चेन की हर कड़ी तक पहुंचने का प्रयास होगा। आधिकारिक बयान यह भी कहता है कि “कोई भी हो, बख्शा नहीं जाएगा।” राजधानी रायपुर में हाल के महीनों में सूखे नशे के खिलाफ पुलिस की सक्रियता स्पष्ट रही है। कई मामले दर्ज हुए, आरोपियों की गिरफ्तारी हुई, बड़ी मात्रा में प्रतिबंधित सामग्री जब्त की गई। ऐसे में जब उसी विभाग का एक सदस्य कथित रूप से इस अवैध कारोबार में संलिप्त पाया जाता है, तो यह विडंबना को जन्म देता है। एक ओर सख्त संदेश, दूसरी ओर अंदरूनी दरार, यह विरोधाभास केवल प्रशासनिक चुनौती नहीं, नैतिक संकट भी है।
हर संस्था में व्यक्तिगत चूक संभव है। यह तर्क अक्सर दिया जाता है कि कुछ मामलों के आधार पर पूरे विभाग को कठघरे में नहीं खड़ा किया जा सकता। यह बात सही भी है। हजारों पुलिसकर्मी कठिन परिस्थितियों में, सीमित संसाधनों के बीच, जोखिम उठाकर अपनी ड्यूटी निभाते हैं लेकिन जब समय-समय पर विभाग के भीतर से अनियमितताओं के आरोप सामने आते हैं, चाहे वह नशे का मामला हो, कथित आर्थिक अनियमितता हो, महिलाओं के यौन शोषण का हो या गोपनीय जानकारी लीक करने का आरोप। ऐसे में पुलिस अधिकारियों ने अपराध के खिलाफ “जीरो टॉलरेंस” की नीति दोहराई है। यह नीति तब सार्थक होती है जब वह बाहरी अपराधियों के साथ-साथ विभाग के भीतर भी समान कठोरता से लागू हो।
पुलिस और नागरिक के बीच संबंध भय पर नहीं, विश्वास पर टिके होते हैं। जब नागरिक शिकायत लेकर थाने जाता है, तो वह राज्य की निष्पक्षता पर भरोसा करता है। यदि उसी राज्य के प्रतिनिधि (पुलिस) पर गंभीर आरोप लगे हों, तो यह भरोसा डगमगाता है। विश्वास का क्षरण अचानक नहीं होता; वह घटनाओं की पुनरावृत्ति से बनता है। इसलिए प्रत्येक ऐसी घटना केवल एक केस फाइल नहीं, बल्कि सार्वजनिक धारणा का हिस्सा बन जाती है। ऐसा पहली बार नहीं है जब छत्तीसगढ़ पुलिस की छवि पर सवाल उठे हों। अक्टूबर 2025 में रायपुर क्राइम ब्रांच के छह पुलिसकर्मियों पर दुर्ग के एक कारोबारी की कार से कथित तौर पर 2 लाख रुपये चोरी करने के आरोप लगे थे। जांच के बाद एक आरक्षक को निलंबित किया गया था। इसी तरह, हाल ही में चर्चित महिला डीएसपी कल्पना वर्मा को गोपनीय जानकारी लीक करने के आरोप में निलंबित किया गया। उनके खिलाफ यह भी आरोप सामने आए कि रायपुर में पदस्थ रहते हुए उन्होंने एक कारोबारी के साथ कथित धोखाधड़ी की और उससे अवैध ढंग से दो करोड़ रूपये हासिल कर लिये।
देशभर में चर्चित महादेव सट्टा ऐप मामले में कई नाम उछले। सैकड़ों करोड़ के इस कथित ऑनलाइन सट्टा कारोबार में राजनीतिक, कारोबारी और प्रशासनिक कड़ियों की चर्चा होती रही। इसी कड़ी में पुलिस आरक्षक सहदेव यादव का नाम महादेव सट्टा का पैनल चलाने वाले के रूप में सामने आया, सहदेव ने अकेले वर्दी को नहीं बेचा था बल्कि उसके दो अन्य भाइयों पर भी वर्दी की नीलामी के आरोप लगे। भाई जेल में हैं, सहदेव को सेवा से बर्खास्त कर जेल भेज दिया गया। यहां ये बताना भी लाज़िमी होगा कि बिलासपुर शहर के तत्कालीन एएसपी राजेंद्र जायसवाल पर हाल ही में एक स्पा सेंटर के संचालक ने मासिक वसूली के गंभीर आरोप लगाये थे। शिकायत के बाद राज्य के गृह विभाग ने उन्हें तत्काल निलंबित कर दिया। इन घटनाओं ने पुलिस व्यवस्था के भीतर जवाबदेही और निगरानी तंत्र को लेकर बहस तेज कर दी है।
पुलिस व्यवस्था में पदानुक्रम कठोर है, कार्य-घंटे लंबे हैं, संसाधन सीमित हैं और राजनीतिक दबावों की चर्चा आम है। इन परिस्थितियों में यदि आंतरिक निगरानी ढीली हो, संपत्ति और आचरण की पारदर्शी समीक्षा औपचारिकता बन जाए, और शिकायत निवारण तंत्र स्वतंत्र न हो, तो संस्थागत दरारें गहरी होती जाती हैं। दरारों में ही भ्रष्टाचार का पानी भरता है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि उपभोक्तावाद का दबाव केवल नागरिकों पर नहीं, वर्दीधारियों पर भी है। महंगे फोन, गाड़ियाँ, प्रभावी जीवनशैली। ये आकांक्षाएँ सामाजिक परिवेश का हिस्सा हैं। पर समस्या तब शुरू होती है जब आकांक्षा और आय के बीच की खाई को पद के प्रभाव से पाटने की कोशिश की जाती है। वर्दी तब साधन बन जाती है सेवा का नहीं, सौदे का।
कैमरे की कलम: आयुष्मान भारत बनाम चारपाई इंडिया
इक्कीसवीं सदी के भारत में इलाज कैशलेस है, लेकिन रास्ता अब भी इंसानों के कंधों पर चलता है।
आइये इस तस्वीर पर फोकस करते है। ये तस्वीर छत्तीसगढ़ राज्य गठन के 25 बरस बाद “विकास कथा” का स्थायी फ्रेम है। कोरिया जिले के ग्राम पंचायत बंजारीडाँड़ के रोहना ठीहाई गांव में एक अनोखी, लेकिन बेहद भरोसेमंद स्वास्थ्य सेवा आज भी पूरे आत्मविश्वास के साथ चल रही है। नाम है “चारपाई एक्सप्रेस”। यह सेवा न ऐप पर मिलती है, न टोल-फ्री नंबर पर, न GPS मांगती है और न ही सड़क की ज़िद करती है। बस चार मज़बूत कंधे चाहिए, एक पुरानी खटिया और किस्मत का साथ। रोहना ठीहाई में भी यही हुआ। गांव तक सड़क नहीं है, इसलिए एम्बुलेंस वहीं तक आई, जहां सड़क खत्म होती है। उसके आगे मरीज को खटिया पर उठाकर लाने की जिम्मेदारी ग्रामीणों ने निभाई। यह जन-भागीदारी का बेहतरीन उदाहरण है, जिसे नीति आयोग की रिपोर्टों में जगह मिलनी चाहिए। मरीज का नाम लक्ष्मी नारायण है, लक्ष्मी की कृपा से दूर मरीज सिर्फ नारायण के भरोसे है।
यह वही गांव है जहां इलाज से पहले मरीज को यह साबित करना पड़ता है कि वह सड़क तक पहुंचने लायक है। जो सड़क तक पहुंच गया, वही सिस्टम की नजर में “इलाज के योग्य” माना जाता है। यहां संविधान में “जीवन का अधिकार” तो है, लेकिन उस जीवन तक पहुंचने का रास्ता नहीं है। छत्तीसगढ़ हो, झारखंड हो, मध्यप्रदेश हो, बिहार, ओडिशा, उत्तर प्रदेश या पूर्वोत्तर के राज्य, ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सुविधा आज भी चारपाई पर लेटी हुई है। फर्क बस इतना है कि कहीं चारपाई बांस की है, कहीं लकड़ी की; कहीं उठाने वाले चार लोग हैं, कहीं दो। लेकिन व्यवस्था हर जगह एक सी बेहोश पड़ी है।
यह तस्वीर किसी एक गांव की नहीं, उस व्यवस्था की है जो विकास को नक्शों में और मरीज को खटिया पर छोड़ देती है।
सरकारी नक्शों में सड़कें हैं, स्वास्थ्य केंद्र हैं, योजनाएं हैं, और लक्ष्य भी हैं। लेकिन रोहना ठीहाई जैसे गांवों में यह सब नक्शे पर ही रह जाता है। जमीन पर जो है, वह है कच्ची पगडंडी, नेटवर्क का सन्नाटा, बिजली की अनियमितता और इलाज की अनिश्चितता। जब बीमारी दस्तक देती है, तो न योजना काम आती है, न फाइल। काम आती है चारपाई जो यहां एम्बुलेंस है, स्ट्रेचर है और कई बार ज़िंदगी का अंतिम वाहन भी। यह कैसी विडंबना है कि जिस देश में “स्मार्ट सिटी” शब्द गर्व से बोला जाता है, उसी देश में “स्मार्ट गांव” आज भी खटिया के भरोसे है।
इस देश में 108, 112, 104, ये सभी नंबर स्वास्थ्य सुरक्षा के प्रतीक माने जाते हैं। लेकिन इन सेवाओं का दायरा भी सड़क की सीमा तक ही है। जहां सड़क खत्म, वहीं आपातकाल समाप्त। यह व्यवस्था बड़ी ईमानदारी से मानती है कि गांव में बीमारी उतनी गंभीर नहीं होती, जितनी शहर में। इसलिए गांव का मरीज अगर बच गया, तो उसे सहनशील माना जाता है; और अगर नहीं बचा—तो फाइल में लिख दिया जाता है, “दुर्गम क्षेत्र।”
दिल्ली से घोषित ‘सार्वभौमिक स्वास्थ्य’ गांव पहुंचते-पहुंचते चारपाई पर सिमट जाता है।
केंद्र और राज्य सरकारों ने कस्बाई इलाकों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के नाम पर दो-तीन कमरों का ढांचा खड़ा कर रखा हैं। बाहरी दीवार पर बोर्ड लगे हैं, उद्घाटन शिलाएं चमक रही हैं लेकिन भीतर डॉक्टर अक्सर अस्थायी रूप से अनुपस्थित रहते हैं, दवाएं आपूर्ति की प्रतीक्षा में होती हैं और जांच सुविधाएं जिला स्तर पर उपलब्ध बताई जाती हैं। यानि इलाज की पूरी श्रृंखला मौजूद है, बस गांव में कुछ भी नहीं। डिजिटल हेल्थ मिशन के तहत हेल्थ आईडी, ऑनलाइन रिपोर्ट और टेलीमेडिसिन का सपना दिखाया जा रहा है। रोहना ठीहाई जैसे गांव पूछ रहे है—“नेटवर्क कब मिलेगा?” जहां मोबाइल सिग्नल नहीं, वहां टेलीमेडिसिन एक प्रेरक नारा भर है। मरीज खटिया पर है और व्यवस्था ऐप डाउनलोड करने की सलाह दे रही है। रोहना ठीहाई गाँव अकेला नहीं है। देश के कई राज्यों के ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सुविधा आज भी चारपाई पर ही सफर करती है। कहीं तस्वीर सामने आ जाती है, तो कुछ दिन चर्चा का विषय बनी होती है। फिर सब कुछ सामान्य, अगली खटिया के इंतजार में।
रोहना ठीहाई अकेला गांव नहीं है। देश के कई राज्यों के ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सुविधा आज भी चारपाई पर ही सफर करती है। जहां मोबाइल सिग्नल नहीं, वहां टेलीमेडिसिन एक प्रेरक नारा भर है। मरीज खटिया पर है और व्यवस्था ऐप डाउनलोड करने की सलाह दे रही है।
हम किसी एक सरकार या विभाग पर आरोप नहीं लगा रहे, बल्कि उस स्थायी मानसिकता पर कटाक्ष कर रहे है, जिसमें गांव को हमेशा प्राथमिकता के क्रम में आखरी पायदान पर रखा जाता है। चारपाई पर लेटा मरीज किसी योजना की विफलता नहीं, बल्कि केंद्र और राज्य सरकारों की संयुक्त स्वास्थ्य नीति की मैदानी रिपोर्ट का जीवंत प्रमाण पत्र है। चारपाई पर लेटा लोकतंत्र केवल इलाज नहीं मांग रहा। वह सत्ता से, नौकरशाहों से यह सवाल पूछ रहा है “क्या इस देश में स्वास्थ्य सेवा तक पहुंचने के लिए भी पहले सड़क पास करनी होगी?” जवाब में व्यवस्था हमेशा की तरह, खामोशी से खटिया की ओर इशारा कर देती है।
कैमरे की कलम: न्याय की मंशा बनाम व्यवस्था की हिचक
उच्च शिक्षा के परिसरों में समानता और गरिमा का प्रश्न कोई नया नहीं है। वर्षों से यह सवाल उठता रहा है कि क्या विश्वविद्यालय ज्ञान के मंदिर हैं या सामाजिक भेदभाव की प्रयोगशाला। इसी पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट द्वारा यूजीसी के 2026 के भेदभाव-रोधी नियमों पर लगाई गई अंतरिम रोक एक साधारण न्यायिक आदेश नहीं, बल्कि व्यवस्था के अंतर्विरोधों पर तीखी टिप्पणी है। कोर्ट का कहना है कि ये नियम “दूरगामी परिणाम” पैदा कर सकते हैं और “समाज को विभाजित” कर सकते हैं। सवाल यह है कि क्या समाज पहले से विभाजित नहीं है? क्या रोहित वेमुला और डॉ. पायल तडवी की मौतें किसी काल्पनिक विभाजन की उपज थीं, या उस सच्चाई का आईना थीं जिसे लंबे समय तक संस्थागत चुप्पी ने ढक रखा था ?
इन नियमों की उत्पत्ति किसी अकादमिक प्रयोग से नहीं, बल्कि पीड़ा से हुई थी। वर्षों की याचिकाएँ, माताओं की गुहार और न्याय की उम्मीद इन्हीं से यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन के 2026 के नियम जन्मे। इनका उद्देश्य था: शिकायत की सुनवाई, जवाबदेही और संरक्षण। परंतु विरोध की तेज़ आँधी जिसमें बड़े पैमाने पर सामान्य वर्ग की असहजता दिखी, उसने यह उजागर किया कि समानता की बात आते ही विशेषाधिकार कितने असुरक्षित हो जाते हैं।
वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह की टिप्पणी इस बहस का नैतिक केंद्र है। अगर सरकार अपने ही नियमों का बचाव नहीं कर सकती, तो यह केवल कानूनी कमजोरी नहीं संवैधानिक कर्तव्य से पलायन है। न्यायपालिका ने समिति बनाने का सुझाव देकर संतुलन साधने की कोशिश की है, पर समिति की शरण अक्सर निर्णय को टालने का सुविधाजनक रास्ता भी बन जाती है। यहां मूल टकराव स्पष्ट है: भेदभाव-रोधी व्यवस्था बनाम ‘रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन’ की आशंका। पर क्या सुरक्षा देना भेदभाव है? क्या कमजोर के लिए ढाल बनना, मज़बूत पर अन्याय है? विश्वविद्यालयों में सत्ता-संरचना आज भी वही है फर्क बस इतना है कि अब पीड़ित बोलने लगे हैं।
सुप्रीम कोर्ट की यह रोक अंतिम फैसला नहीं है, पर एक चेतावनी अवश्य है कि नियम जल्दबाज़ी में नहीं, गहन विमर्श से बनें। मगर विमर्श का अर्थ विलंब नहीं होना चाहिए। हर स्थगन के साथ कैंपस में डर का एक और दिन जुड़ जाता है। न्याय तब तक अधूरा है, जब तक वह समय पर न मिले। यह कहना गलत नहीं होगा कि नियमों की भाषा सुधारी जा सकती है, प्रक्रिया पर बहस हो सकती है, पर भेदभाव के अस्तित्व से इनकार नहीं। अगर उच्च शिक्षा में समानता को ‘विभाजन’ कहा जाएगा, तो सवाल नियमों पर नहीं हमारे सामाजिक विवेक पर उठेगा।
किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसके विश्वविद्यालयों, स्कूलों और शिक्षकों के हाथों में आकार लेता है। शिक्षा केवल डिग्री पाने का माध्यम नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा, सामाजिक न्याय की रीढ़ और आर्थिक प्रगति की बुनियाद होती है। लेकिन आज भारत में यह सवाल पहले से कहीं ज़्यादा तीखेपन के साथ खड़ा है, क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था वास्तव में नागरिक गढ़ रही है या केवल आज्ञाकारी उपभोक्ता और सुविधाजनक भीड़ तैयार कर रही है?
देश की शिक्षा व्यवस्था इस समय एक गहरे असमंजस से गुजर रही है। एक तरफ़ “विश्वगुरु” बनने के दावे हैं, नई-नई नीतियाँ हैं, तकनीक और नवाचार की भाषा है; दूसरी ओर जर्जर स्कूल, खाली पद, असमान अवसर, बढ़ता निजीकरण और विश्वविद्यालय परिसरों में भय का माहौल। यह विरोधाभास किसी दुर्घटना का नतीजा नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही राजनीतिक प्राथमिकताओं का परिणाम है।
सरकारें अक्सर शिक्षा नीतियों का हवाला देती हैं। नई शिक्षा नीति (NEP) को ऐतिहासिक बताया गया, लचीलापन, बहुविषयकता और मातृभाषा में शिक्षा जैसे वादे किए गए। लेकिन नीति और ज़मीनी हकीकत के बीच की खाई लगातार चौड़ी होती गई। शिक्षा पर सार्वजनिक खर्च आज भी जीडीपी के उस स्तर तक नहीं पहुँचा, जिसकी सिफ़ारिश दशकों से होती रही है। नई इमारतें और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म दिखाने में आसान हैं, लेकिन शिक्षक भर्ती, शोध अनुदान और छात्रवृत्तियाँ राजनीतिक प्राथमिकताओं की सूची में नीचे खिसकती चली गईं। इससे यह सवाल उठता है क्या सरकारें शिक्षा को सशक्तिकरण का औज़ार मानती हैं, या केवल एक प्रबंधन योग्य तंत्र?
शिक्षा में निजीकरण अब अपवाद नहीं, बल्कि मुख्यधारा बन चुका है। मेडिकल, इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट हर जगह फीस आसमान छू रही है। छात्र ऋण लेकर पढ़ने को मजबूर हैं और डिग्री पूरी होते ही रोज़गार की अनिश्चितता उनका इंतज़ार करती है। इस व्यवस्था में शिक्षा सामाजिक गतिशीलता का साधन कम और आर्थिक बोझ ज़्यादा बनती जा रही है। सरकारें निजी निवेश को समाधान के रूप में पेश करती हैं, लेकिन यह भूल जाती हैं कि बाज़ार का पहला लक्ष्य लाभ होता है, समानता नहीं। जब शिक्षा लाभ का साधन बनती है, तो हाशिये पर खड़े समुदाय सबसे पहले बाहर धकेले जाते हैं।
विश्वविद्यालयों का हाल इससे भी ज़्यादा चिंताजनक है। कभी जिन परिसरों में बहस, असहमति और विचारों की टकराहट होती थी, आज वहाँ नोटिस, जांच और निलंबन का डर छाया रहता है। प्रशासनिक नियंत्रण इतना बढ़ चुका है कि विश्वविद्यालय अब ज्ञान के केंद्र नहीं, बल्कि सत्ता की प्रयोगशाला बनते जा रहे हैं। जब छात्र सवाल पूछते हैं, तो उन्हें “राष्ट्रविरोधी” कहा जाता है। जब शिक्षक असहमति जताते हैं, तो उन्हें “अनुशासनहीन”। यह कोई संयोग नहीं कि आलोचनात्मक सोच को पाठ्यक्रम से धीरे-धीरे हटाया जा रहा है। इतिहास को सुविधाजनक बनाया जा रहा है, समाजशास्त्र को संदिग्ध और दर्शन को अनुपयोगी। यह सब किसी अज्ञानवश नहीं हो रहा। यह एक स्पष्ट संकेत है कि सरकारें ऐसे नागरिक नहीं चाहतीं जो सोचें, बल्कि ऐसे जो मानें।
जातिगत भेदभाव, मानसिक उत्पीड़न और संस्थागत उपेक्षा ये विश्वविद्यालयों की कड़वी सच्चाइयाँ हैं। जब इन्हें रोकने के लिए नियम बनाए जाते हैं, तो हंगामा मचता है कि “समाज बँट जाएगा।” जैसे समाज पहले से बराबरी पर खड़ा हो !
कैमरे की कलम: शोर का लोकतंत्र और आस्था की राजनीति
आज का भारत बहसों से नहीं, शोर से चल रहा है। यह शोर टीवी स्टूडियो से लेकर सोशल मीडिया तक फैला है। हर मुद्दा तात्कालिक है, हर गुस्सा प्रायोजित, और हर बहस अधूरी। धर्म, जाति और पहचान ये अब सामाजिक विमर्श नहीं रहे, ये राजनीतिक औज़ार बन चुके हैं। जिस दिन कोई मुद्दा जनसरोकार के सवालों की ओर बढ़ने लगता है, उसी दिन नया शोर पैदा कर दिया जाता है। समाज, धर्म और जाति जो कभी पहचान और सह-अस्तित्व के आधार थे अब टकराव की रेखाओं में बदलते दिख रहे हैं। भीड़ के शोर में व्यक्ति की आवाज़ गुम होती जा रही है। हर मुद्दा दो ध्रुवों में बँट जाता है समर्थन या विरोध, बीच की विवेकपूर्ण आवाज़ के लिए कोई जगह नहीं बचती। यह हालात लोकतंत्र के लिए खतरनाक हैं, क्योंकि लोकतंत्र बहस से मजबूत होता है, उन्माद से नहीं।
पिछले एक सप्ताह से देश में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से जुड़े मुद्दों पर गरमाई बहस यह दिखाती है कि आज आस्था भी राजनीतिक हथियार बनती जा रही है। कोई समर्थन में खड़ा है, कोई विरोध में। लेकिन बहुत कम लोग सवाल पूछने की जगह बचा पा रहे हैं। धर्म जब संवाद के बजाय दमन का माध्यम बन जाए, तो समस्या धर्म में नहीं उसके राजनीतिक इस्तेमाल में होती है। यह विवाद असल में इस बात का प्रतीक है कि हम असहमति को अपमान समझने लगे हैं। जैसा कि सभी जानते हैं प्रयागराज में मौनी अमावस्या के अवसर पर संगम स्नान को लेकर ज्योतिष पीठ बद्रीनाथ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और मेला प्रशासन के बीच टकराव देखने को मिला। इस दौरान शंकराचार्य के स्नान कार्यक्रम और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर प्रशासन और उनके समर्थकों के बीच मतभेद सामने आए। मौनी अमावस्या के दिन मेला प्रशासन ने शंकराचार्य को पालकी पर सवार होकर स्नान के लिए जाने से रोक दिया। प्रशासन का कहना था कि सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन को देखते हुए विशेष व्यवस्था लागू की गई थी। वहीं शंकराचार्य समर्थकों ने इसे परंपराओं का अपमान बताया। स्थिति उस समय तनावपूर्ण हो गई जब शंकराचार्य समर्थकों और पुलिस के बीच धक्का-मुक्की की खबरें सामने आईं। इसके बाद शंकराचार्य ने मेला और स्थानीय प्रशासन के खिलाफ धरना शुरू कर दिया। इस घटनाक्रम ने न सिर्फ प्रयागराज बल्कि देशभर में ध्यान खींचा और सोशल मीडिया से लेकर टीवी चैनलों तक यह मुद्दा चर्चा का विषय बन गया। हालांकि यह पहला मौका नहीं है जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सार्वजनिक विवादों में आए हों। इससे पहले भी उनके कई बयान और हस्तक्षेप चर्चा और विवाद का कारण बन चुके हैं।
वैसे भी भारत में विवाद कोई नई चीज़ नहीं है। यहाँ विवाद जन्म लेते हैं, पलते हैं, मीडिया में जवान होते हैं और फिर किसी अगले विवाद की आहट में खो जाते हैं। लेकिन कुछ विवाद ऐसे होते हैं जो सिर्फ किसी व्यक्ति या बयान तक सीमित नहीं रहते वे समाज के भीतर चल रहे गहरे अंतर्विरोधों को उजागर कर देते हैं। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को लेकर देशभर में जो बहस चल रही है, वह भी ऐसा ही एक मामला है। कोई उनके शंकराचार्य होने पर सवाल खड़े करता है, कोई उनके अहंकारी तेवर का हवाला देकर गलत ठहराता है। ऐसा लगता है यह विवाद किसी एक बयान का नहीं, बल्कि उस भूमिका का है जो एक धार्मिक पदाधिकारी आज के भारत में निभा रहा है या निभाना चाहता है।
भारतीय परंपरा में शंकराचार्य केवल एक धार्मिक गुरु नहीं होता। वह विचार की परंपरा का वाहक होता है संयम, विवेक और तटस्थता का प्रतीक। ऐसे में जब कोई शंकराचार्य बार-बार समकालीन राजनीति, सरकार, नीतियों या सामाजिक समूहों पर तीखे वक्तव्य देता है, तो प्रश्न उठना स्वाभाविक है क्या यह आध्यात्मिक मार्गदर्शन है या वैचारिक हस्तक्षेप ? स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के हालिया वक्तव्यों ने यही प्रश्न फिर से केंद्र में ला दिया है। कभी गाय, कभी संविधान, कभी राष्ट्रवाद, कभी सरकार, विषयों की सूची लंबी है। समस्या यह नहीं कि वे बोल रहे हैं; समस्या यह है कि वे किस स्वर, किस भाषा और किस उद्देश्य से बोल रहे हैं। सदियों से व्यंग्य और कटाक्ष भारतीय बौद्धिक परंपरा का हिस्सा रहे हैं। कबीर ने भी किया, तुलसी ने भी संकेत दिए। लेकिन वहाँ व्यंग्य आत्ममंथन के लिए था, न कि तालियाँ बटोरने के लिए। आज जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का कोई बयान आता है, तो वह टीवी बहसों की हेडलाइन बनता है, सोशल मीडिया के ट्रेंड में बदल जाता है और फिर राजनीतिक खेमों में बाँट दिया जाता है। एक पक्ष उन्हें “सच्चा धर्मरक्षक” बताता है, दूसरा “राजनीतिक एजेंडा चलाने वाला साधु”। यह विभाजन बताता है कि उनका वक्तव्य अब आध्यात्मिक संवाद नहीं रह गया, वह राजनीतिक हथियार बन चुका है।
यहाँ एक असहज प्रश्न खड़ा होता है, क्या एक साधु की भाषा उतनी ही कठोर हो सकती है जितनी एक राजनीतिक नेता की? जब धर्माचार्य सरकार पर सीधा हमला करते हैं, तो एक वर्ग इसे “साहस” कहता है। लेकिन जब वही धर्माचार्य किसी विशेष सामाजिक या वैचारिक समूह के प्रति कठोर रुख अपनाते हैं, तो वही वर्ग “धर्म की रक्षा” का तर्क देता है। यह दोहरा मापदंड ही विवाद की असली जड़ है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के कुछ वक्तव्यों में यह स्पष्ट दिखता है कि वे खुद को नैतिक सत्ता के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। एक ऐसी सत्ता जो चुनी नहीं गई, लेकिन जो चुनी हुई सत्ता को चुनौती देती है।
आज स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की चर्चा केवल इसलिए भी नहीं है कि वे एक शंकराचार्य हैं, बल्कि इसलिए भी कि वे उस बदलती भूमिका का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसमें धर्माचार्य आध्यात्मिक मार्गदर्शन से आगे बढ़कर सामाजिक और राजनीतिक विमर्श में सक्रिय दिखाई देते हैं। यह भूमिका भारतीय लोकतंत्र और समाज, दोनों के लिए नए सवाल खड़े करती है। क्या धर्माचार्यों की यह सक्रियता समय की मांग है, या इससे धार्मिक पदों की तटस्थता प्रभावित होती है यह बहस अभी जारी है। लेकिन इतना स्पष्ट है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद आज के भारत में धर्म, राजनीति और सार्वजनिक विमर्श के संगम पर खड़े एक ऐसे व्यक्ति हैं, जिनकी हर टिप्पणी केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक अर्थ भी ग्रहण कर लेती है।
इस पूरे विवाद में मीडिया की भूमिका भी कम दिलचस्प नहीं है। हर बयान को ब्रेकिंग न्यूज़, हर कटाक्ष को राष्ट्रीय बहस और हर प्रतिक्रिया को टकराव बना दिया गया। टीवी स्टूडियो में बैठे एंकर पूछते हैं— “क्या स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती देश की आवाज़ हैं?” “क्या वे राजनीति में हस्तक्षेप कर रहे हैं?” लेकिन शायद ही कोई यह पूछता है कि क्या हम धर्माचार्यों को इस भूमिका में धकेल रहे हैं, क्योंकि हमें शोर चाहिए, समाधान नहीं?
कैमरे की कलम: चूहे, दीमक और सात करोड़ की लोकतांत्रिक भूख
छत्तीसगढ़ के कवर्धा जिले में जो हुआ, वह घोटाला नहीं घोटाले का सरकारी विज्ञापन है। फर्क बस इतना है कि इस बार पोस्टर पर नेता नहीं, चूहे मुस्कुरा रहे हैं। 26 हजार क्विंटल धान, सात करोड़ रुपये और जवाब चूहा, दीमक, मौसम। यानी चोरी भी प्रकृति ने की, गिनती भी प्रकृति ने बिगाड़ी और जवाबदेही भी प्रकृति ले जाएगी। यह घटना उस व्यवस्था का चरित्र प्रमाणपत्र है, जो हर बड़े घोटाले के बाद और ज्यादा बेशर्म, ज्यादा आत्मविश्वासी और ज्यादा रचनात्मक होती जा रही है। सात करोड़ रुपये का धान न आग में जला, न बाढ़ में बहा, न ही किसी युद्ध में लुटा बस चूहों, दीमकों और मौसम ने खा लिया। यह सफाई इतनी मासूम है कि अपराध भी खुद को ठगा हुआ महसूस करे।
यह पहला मौका है जब सरकारी बयान ने जीव-जंतुओं को भ्रष्टाचार की अग्रिम पंक्ति में ला खड़ा किया है। अब तक घोटालों में नेता, अफसर, दलाल और ठेकेदार बदनाम होते थे, लेकिन कवर्धा ने इतिहास रच दिया यहाँ चूहे मुख्य अभियुक्त हैं। वे भी ऐसे चूहे, जो क्विंटल में खाते हैं, रजिस्टर में एंट्री करवाते हैं, फर्जी बिल बनवाते हैं और जाते-जाते CCTV की आंखों पर पट्टी भी बाँध देते हैं। यह कोई साधारण चूहा नहीं, बल्कि सिस्टम-अनुकूल चूहा है।
प्रश्न यह नहीं है कि 26 हजार क्विंटल धान कैसे गायब हुआ। असली प्रश्न यह है कि इतना धान गायब होने के बाद भी सिस्टम कैसे खड़ा है? गोदामों में धान आता है, तौला जाता है, सील होता है, निरीक्षण होता है, रिपोर्ट बनती है और फिर एक दिन पता चलता है कि धान था ही नहीं। यह जादू नहीं, यह प्रशासनिक कला है। इसे भ्रष्टाचार कहना इस कला का अपमान होगा; यह तो प्रशासनिक शिल्प है।
प्रशासन की सफाई बताती है कि चूहे और दीमक अब सिर्फ अनाज या लकड़ी नहीं खाते, वे जवाबदेही भी खाते हैं। मौसम सिर्फ फसल नहीं खराब करता, वह फाइलें भी साफ कर देता है। यह वही मौसम है जो हर घोटाले के बाद अचानक सक्रिय हो जाता है कभी बारिश बनकर, कभी नमी बनकर, कभी “लंबे समय तक भंडारण” के बहाने। लगता है प्रकृति भी अब सरकारी तंत्र का हिस्सा बन चुकी है।
विपक्ष ने इसे घोटाला कहा, जनता ने मज़ाक बनाया और प्रशासन ने औपचारिक कार्रवाई। कुछ निलंबन, कुछ नोटिस यानी संस्कार अनुसार शोकसभा । असली दोषी वहीं सुरक्षित हैं, जहाँ हर घोटाले के बाद रहते हैं फ़ाइलों के पीछे, पदों के ऊपर और व्यवस्था की छाया में। निलंबन यहाँ सज़ा नहीं, रिवाज़ है। नोटिस यहाँ सवाल नहीं, ढाल है।
यह पूरा प्रकरण बताता है कि भ्रष्टाचार अब चोरी नहीं करता, वह प्रक्रिया का पालन करता है। सब कुछ नियमों के भीतर होता है काग़ज़ पूरे, हस्ताक्षर पूरे, मुहरें पूरी। कमी सिर्फ गोदाम में होती है। और जब कमी पकड़ में आती है, तो कारण इतने प्राकृतिक होते हैं कि मानव जिम्मेदारी की जरूरत ही नहीं पड़ती।
कल्पना कीजिए यदि किसी किसान के घर से एक बोरी धान गायब हो जाए, तो क्या वह यह कह सकता है कि “चूहे खा गए”? शायद नहीं। उससे पूछा जाएगा लापरवाही क्यों की, सुरक्षा क्यों नहीं की। लेकिन जब सरकारी गोदाम से सात करोड़ का धान गायब होता है, तो सवाल उल्टा हो जाता है बेचारे चूहे क्या करें ? यही तो शासन और आम आदमी का फर्क है। आम आदमी दोषी होता है, सिस्टम हमेशा पीड़ित।
यह मामला यह भी बताता है कि निगरानी तंत्र सिर्फ काग़ज़ पर जिंदा है। CCTV कैमरे थे, लेकिन उन्होंने कुछ नहीं देखा। रजिस्टर थे, लेकिन उन्होंने सब कुछ सही बताया। निरीक्षण हुए, लेकिन किसी को कमी नहीं दिखी। यह सामूहिक अंधापन नहीं, सहमति से ओढ़ी गई पट्टी है। जब सबको पता हो कि क्या नहीं देखना है, तब कुछ भी नहीं दिखता।
कवर्धा का यह प्रकरण एक जिले की कहानी नहीं है। यह उस राज्य और उस व्यवस्था का प्रतीक है, जहाँ धान खरीदी किसान के नाम पर होती है, लेकिन फायदा हमेशा किसी और को मिलता है। किसान खेत में खड़ा रहता है, धूप में, कर्ज़ में, इंतज़ार में और धान गोदाम पहुँचते ही अदृश्य हो जाता है। न किसान को जवाब, न जनता को हिसाब। आज चूहे हैं, कल कुछ और होगा। कभी कहा जाएगा नमी ज्यादा थी। कभी रिकॉर्ड पुराना था। कभी मानव भूल। लेकिन एक बात स्थायी रहेगी ऊपर तक कोई जिम्मेदार नहीं। क्योंकि जिम्मेदारी वहीं मर जाती है, जहाँ सत्ता शुरू होती है।
सबसे खतरनाक यह नहीं कि धान गायब हुआ। सबसे खतरनाक यह है कि इसे लेकर सिस्टम शर्मिंदा नहीं है। वह सफाई दे रहा है, तर्क दे रहा है, बहस कर रहा है और आगे बढ़ रहा है। यह निर्लज्जता ही असली संकट है। जब घोटाला भी रूटीन हो जाए, तब लोकतंत्र सिर्फ चुनावी रस्म बनकर रह जाता है।
कवर्धा ने हमें यह सिखाया है कि आज के शासन में चूहा सबसे सुरक्षित पात्र है। न उसे गिरफ्तार किया जा सकता है, न उससे पूछताछ। वह हर बार बच निकलता है बिल्कुल वैसे ही जैसे असली दोषी। फर्क सिर्फ इतना है कि चूहा भूखा होता है, और व्यवस्था लालची।
मेरा यह कथन किसी चूहे के खिलाफ नहीं है। यह उस तंत्र के खिलाफ है, जिसने चूहे को बहाना बना लिया है। क्योंकि सच यह है कि धान चूहों ने नहीं खाया धान व्यवस्था ने खाया है। और जब व्यवस्था खुद खाने लगे, तब देश सिर्फ गोदाम नहीं खोता, विश्वास भी खो देता है।
आज सवाल यह नहीं है कि 26 हजार क्विंटल धान कहाँ गया। सवाल यह है कि हमारी जवाबदेही, हमारी नैतिकता और हमारी शासन व्यवस्था कब और कहाँ गायब हुई ? और उसका जवाब शायद किसी गोदाम में नहीं मिलेगा वह कहीं फाइलों के बीच, नोटिसों के नीचे और चूहों की आड़ में दफन है।
कैमरे की कलम: राष्ट्रीय परिसंवाद या मौन सम्मेलन ?
किसी विश्वविद्यालय का सभागार आमतौर पर ज्ञान, संवाद और असहमति का सुरक्षित स्थल माना जाता है। यहाँ सवाल पूछे जाते हैं, बहस होती है और कभी-कभी तीखी असहमति भी सामने आती है लेकिन वही असहमति विश्वविद्यालय को विश्वविद्यालय बनाती है। यदि वहाँ सिर्फ़ ताली बजाने वाले श्रोता चाहिए हों, तो वह मंच अकादमिक नहीं, मनोरंजनात्मक हो जाता है। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर स्थित गुरू घासीदास सेंट्रल यूनिवर्सिटी में हाल में जो हुआ, उसने यही बुनियादी सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या हमारे विश्वविद्यालय अब संवाद के लिए हैं या केवल कुर्सियों की पूजा के लिए।
घटना एक राष्ट्रीय परिसंवाद की है, विषय था ‘समकालीन हिन्दी कहानी : बदलते जीवन संदर्भ’। यानी ऐसा विषय जिसमें जीवन की जटिलताएँ, विडंबनाएँ और असहमति स्वाभाविक हैं। आयोजन साहित्य अकादमी, दिल्ली के सहयोग से था। मंच पर देश के कई प्रतिष्ठित साहित्यकार मौजूद थे, जिनमें कथाकार मनोज रूपड़ा भी शामिल थे। लेकिन परिसंवाद साहित्य से अधिक सत्ता और संवेदनशीलता के टकराव का मंच बन गया।
बताया जाता है कि विश्वविद्यालय के कुलपति आलोक कुमार चक्रवाल अपने वक्तव्य में विषय से भटकते हुए चुटकुलों के सहारे श्रोताओं को संबोधित कर रहे थे। यह कोई अपराध नहीं है जब तक कि चुटकुले ज्ञान का विकल्प न बनने लगें। लेकिन जब कुलपति ने मंच पर बैठे कथाकार से यह पूछ लिया कि वे कहीं बोर तो नहीं हो रहे, तो मानो उन्होंने स्वयं संवाद का दरवाज़ा खोल दिया। कथाकार ने भी उसी खुले दरवाज़े से भीतर कदम रखते हुए सिर्फ़ इतना कहा “आप विषय पर नहीं बोल रहे हैं।”
यहीं से विश्वविद्यालय का सभागार अचानक अदालत में बदल गया, जहाँ जज भी वही थे, अभियोजक भी वही और फ़ैसला सुनाने वाले भी वही। एक साधारण-सी टिप्पणी को असहिष्णुता का ऐसा झोंका लगा कि कुलपति ने सार्वजनिक मंच से ही अतिथि लेखक को अनुशासनहीन, बदतमीज़ और अवांछित घोषित कर दिया। फिर आदेश आया बाहर जाइए। मानो यह कोई विश्वविद्यालय नहीं, निजी ड्रॉइंग रूम हो, जहाँ मेहमान वही टिक सकता है जो मेज़बान की हर बात पर सिर हिलाए।
विडंबना यह है कि विश्वविद्यालय में कुलपति को पहला विद्वान माना जाता है, पहला शिक्षक, पहला श्रोता भी। लेकिन यहाँ तो पहला श्रोता ही सवाल सुनने को तैयार नहीं था। सवाल सुनते ही कुर्सी ने अपनी असली शक्ति दिखा दी। यह वही कुर्सी है जो आदमी को ऊँचा नहीं करती, लेकिन उसे यह भ्रम ज़रूर दे देती है कि वह ऊँचा हो गया है।
वीडियो में दिखता है कि कुछ श्रोता कथाकार के साथ सभागृह से बाहर निकल गए। यह दृश्य किसी विरोध प्रदर्शन जैसा नहीं था, बल्कि एक मौन असहमति थी जैसे कोई कह रहा हो, “अगर सवाल पूछना अपराध है, तो हम इस अदालत में नहीं बैठेंगे।” यह शायद उस दिन की सबसे सार्थक प्रतिक्रिया थी।
अब सवाल उठता है क्या विश्वविद्यालयों में असहमति की कोई जगह बची है? क्या ‘राष्ट्रीय परिसंवाद’ का अर्थ यह है कि मंच से केवल वही बोला जाए जो सत्ता को अच्छा लगे? अगर ऐसा ही है, तो फिर विश्वविद्यालय और सरकारी दफ़्तर में क्या अंतर रह जाता है?
कुलपति का पद केवल प्रशासनिक नहीं होता, वह नैतिक और बौद्धिक नेतृत्व का भी प्रतीक होता है। गुरु घासीदास जैसे संत के नाम पर बने विश्वविद्यालय से यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वहाँ विनम्रता और संवाद की परंपरा होगी। लेकिन यहाँ तो हाथ हिलाकर अतिथि को बाहर निकालना ही संवाद का अंतिम रूप बन गया।
यह तर्क दिया जा सकता है कि मंच की मर्यादा बनाए रखना ज़रूरी है। यह बात सही है। लेकिन मर्यादा केवल अतिथि के लिए नहीं होती, मेज़बान के लिए भी होती है। और जब मर्यादा की परिभाषा यह हो जाए कि “आप हमारी बात से असहमत नहीं हो सकते”, तो वह मर्यादा नहीं, मौन का अनुशासन कहलाता है।
कुलपति बनने से पहले वे गुजरात के सौराष्ट्र विश्वविद्यालय में प्राध्यापक रह चुके हैं। यानी अकादमिक जीवन में बहस, सवाल और आलोचना से उनका परिचय नया नहीं होना चाहिए। फिर भी यदि एक टिप्पणी से इतना विचलन हो जाए कि सार्वजनिक अपमान का रास्ता चुना जाए, तो समस्या टिप्पणी में नहीं, संवेदनशीलता के अभाव में है।
यह घटना केवल एक लेखक और एक कुलपति के बीच का विवाद नहीं है। यह उस व्यापक संकट का लक्षण है, जिसमें संस्थानों की कुर्सियाँ व्यक्तियों से बड़ी हो गई हैं। जहाँ आलोचना को दुश्मनी समझा जाने लगा है और असहमति को अनुशासनहीनता। विश्वविद्यालयों में उत्कृष्टता इसी वजह से घट रही है क्योंकि सवाल पूछने वाले कम होते जा रहे हैं और ताली बजाने वाले बढ़ते जा रहे हैं।
अचरज की बात यह भी है कि ऐसी घटनाओं पर व्यवस्था की चुप्पी अब असामान्य नहीं रही। न केंद्र सरकार से कोई प्रतिक्रिया, न राज्यपाल स्तर से कोई सवाल। शायद इसलिए कि बदतमीजी अब अपवाद नहीं रही, बल्कि धीरे-धीरे ‘नया सामान्य’ बनती जा रही है। गरिमा जैसे शब्द अब भाषणों में ज़्यादा मिलते हैं, व्यवहार में कम।
ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या साहित्यकारों, शिक्षाविदों और पत्रकारों को ऐसे कुलपतियों के रहते विश्वविद्यालयों का बहिष्कार नहीं करना चाहिए? यह बहिष्कार किसी विचारधारा के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि व्यवहार के ख़िलाफ़ होना चाहिए। यह किसी वाम-दक्षिण की लड़ाई नहीं, बल्कि न्यूनतम इंसानियत की माँग है। कहा जाता है कि वाम और दक्षिण के बीच कहीं एक मानवपंथ भी होना चाहिए। शायद वही मानवपंथ हमें यह सिखाता है कि सत्ता अस्थायी होती है, लेकिन शब्द स्थायी। और शब्दों के साथ किया गया अन्याय देर-सबेर इतिहास में दर्ज हो जाता है।
यदि छत्तीसगढ़ के राज्यपाल को अपनी संवैधानिक भूमिका का ज़रा भी अहसास है, तो उन्हें इस घटना के वीडियो को केवल देखना नहीं चाहिए, बल्कि यह सवाल भी पूछना चाहिए कि विश्वविद्यालयों को भय और अहंकार का प्रयोगशाला बनाने का अधिकार आखिर किसने दिया ?
फिलहाल, समाज के पास ऐसे अहंकार का कोई बड़ा इलाज नहीं है। न अदालतें, न आयोग, न समितियाँ। लेकिन एक छोटा-सा लोकतांत्रिक उपाय अब भी बचा है स्मृति। लोग याद रखें कि किसने सवाल को अपमान समझा और किसने अपमान को सवाल बना दिया। और अगर कोई चिट्ठी भेजनी ही हो, तो उसमें लंबे भाषण की ज़रूरत नहीं। कभी-कभी एक वाक्य भी पर्याप्त होता है “आप कुर्सी पर तो बैठे हैं, लेकिन गरिमा अभी बाहर खड़ी है।”
छत्तीसगढ़ के पर्यावरण इतिहास में एक नया अध्याय: रामसर का ताज, ज़मीन पर सन्नाटा
12 दिसंबर 2025, इस तारीख़ ने छत्तीसगढ़ के पर्यावरण इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ा। बिलासपुर जिले का कोपरा जलाशय राज्य का पहला रामसर स्थल घोषित हुआ। काग़ज़ों में यह क्षण गौरव का था। ऐसा गौरव, जिसे माथे पर तिलक की तरह सजाया जाना चाहिए था पर विडंबना देखिए कि तिलक लगते ही आईना धुंधला कर दिया गया। शोर बहुत हुआ, सार गुम हो गया।
रामसर का तमगा मिलते ही श्रेय की होड़ शुरू हो गई सियासत ने माइक पकड़ा, विभागीय दांव-पेंचों ने फाइलें तेज़ दौड़ाईं, और ठेकेदारों की चाल अचानक फुर्तीली हो गई। सरकारी बोर्ड रातों-रात उग आए; जलाशय के किनारे पक्षियों की तस्वीरें टंगीं, जिसे गायब होते भी समय नहीं लगा । काम सरकारी था, इसलिए अंदाज़ भी वही दिखावटी, जल्दबाज़, आत्मसंतुष्ट ।
कोपरा को रामसर का गौरव हासिल होने मौके पर एक आयोजन का तम्बू सजाने के लिये 9 जनवरी 2026 को वन विभाग ने ‘बर्ड वॉक’ और संगोष्ठी का आयोजन किया। सरकारी आमंत्रण कार्ड छपे, अतिथियों की सूची लंबी थी बस एक चीज़ कम थी: कोपरा। संगोष्ठी सकरी के वन चेतना केंद्र में हुई कोपरा से चार किलोमीटर दूर। यह दूरी केवल भौगोलिक नहीं थी; यह उस सोच की दूरी थी, जो मानती है कि सम्मान मंच पर बँटता है, ज़मीन पर नहीं।
बर्ड वॉक में कुछ पक्षी प्रेमी और फोटोग्राफ़र दिखे वे ही, जो बरसों से बिना तामझाम, बिना फंड, बिना बोर्ड के कोपरा को समझते रहे। संगोष्ठी में भीड़ थी, पर कोपरा के लोग नहीं थे। जिस गाँव को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली, वहाँ का नज़ारा हर रोज़ जैसा ही रहा। जिन युवाओं और स्कूली बच्चों के बीच संरक्षण का बीज बोया जाना था, वे आयोजन के शोर से दूर खड़े रहे या यूँ कहें, खड़ा कर दिए गए।
सबसे पीड़ादायक उपेक्षा उन वरिष्ठ लोगों की रही, जो तथ्य, धैर्य और ज़मीन से जुड़ी समझ रखते हैं वे जो कोपरा के गौरव को संरक्षित करने में मील का पत्थर बन सकते थे। उन्हें आमंत्रण नहीं मिला; शायद इसलिए कि वे तालियाँ नहीं, सवाल पूछते हैं। सवाल जो तस्वीरों से नहीं, सच से डराते हैं। मुझे इस आयोजन का निमंत्रण भी मिला, विभाग के अधिकारियों ने भरपूर तवज्जो भी दी, लेकिन कोपरा की गैर मौजूदगी ने मुझे न सिर्फ परेशान किया बल्कि कईयों सवाल सोचने पर मजबूर कर दिया, व्यक्तिगत मेरे लिये 12 दिसंबर 2025 बड़ी ख़ुशी का दिन रहा। कोपरा को रामसर का दर्जा मिलने के साथ केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव से लेकर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, वन मंत्री केदार कश्यप के ट्वीटर पर शुभकामनाओं के सन्देश समेत अन्य स्थानों पर जिन तस्वीरों को शेयर किया गया वो मेरी खींची हुई थी लेकिन आयोजन स्थल पर कोपरा गाँव की अनुपस्थिति से मेरी भावनाएँ व्यक्तिगत आहत हुईं। सच यह है कि वन विभाग को संरक्षण से ज़्यादा क्रेडिट मैनेजमेंट आता है। पहले अनदेखी, फिर घोषणा, फिर समारोह और अंत में आत्ममुग्धता। यकीनन संरक्षण को ‘इवेंट’ बना दिया गया है।
यह वही कोपरा है, जिसकी महत्ता को लेकर पिछले एक दशक से कुछ पक्षी प्रेमी और फ़ोटोग्राफ़र लगातार चेताते रहे। अतिक्रमण, प्रदूषण, शिकार, असामाजिक गतिविधियाँ सब कुछ प्रशासन के संज्ञान में था। मुरुम का अवैध उत्खनन, कोलवॉशरी के लिए टैंकरों से पानी की चोरी, सूचनाएँ वन विभाग से लेकर जिला प्रशासन तक पहुँचीं पर कानों में जूँ तक न रेंगी। मछली मारने की पुरानी रवायतें चलीं, और संरक्षण की नई भाषा फाइलों में सोती रही।
रामसर का दर्जा, यह केवल एक पदक नहीं, एक जिम्मेदारी है। यह याद दिलाता है कि आर्द्रभूमि कोई सजावटी वस्तु नहीं, जीवन-रेखा है। पर हमारे यहाँ जीवन-रेखाएँ भी तब तक दिखती नहीं, जब तक उन पर रिबन न बँध जाए। और रिबन बँधते ही, कैंची खोजी जाने लगती है काटने के लिए, जोड़ने के लिए नहीं।
12 दिसंबर से पहले सिर्फ सुगबुगाहटें थीं, उहापोह था। अब जब घोषणा हो चुकी है। संरक्षण बोर्ड से नहीं, सबकी सहभागिता से होता है। संगोष्ठी केंद्रों से नहीं, गाँव की चौपाल से जन्म लेती है। बर्ड वॉक कैमरे से नहीं, चेतना से पूरी होती है। अगर रामसर का ताज सच में पहनना है, तो उसे संभालने के लिए सिर भी चाहिए वह सिर, जो झुके नहीं; वह आँख, जो दिखावे के परे देखे; और वह दिल, जो कोपरा को तस्वीर नहीं, जीवित तंत्र माने। वरना इतिहास यही लिखेगा कि हमने गौरव तो पाया, पर उसे बचाने की हिम्मत खो दी।
कैमरे की कलम: वर्दी नोची गई, व्यवस्था खामोश रही
छत्तीसगढ़ के तमनार से सामने आई यह घटना केवल एक अपराध नहीं है यह हमारे समाज के चेहरे पर पड़ा एक गहरा तमाचा है। जेपीएल कोयला खदान के विरोध में हो रहे प्रदर्शन के दौरान ड्यूटी पर तैनात एक महिला आरक्षक को खेत-खलिहानों में दौड़ाया जाना, फिर थककर गिरने के बाद उसके साथ मारपीट करना और उसके कपड़े फाड़कर अर्धनग्न कर देना यह विवरण पढ़ना भी शर्मनाक है, देखना तो असहनीय रहा होगा और उससे भी ज़्यादा विचलित करने वाली बात यह है कि उस दौरान वह महिला आरक्षक लोगों के सामने छोड़ देने की गुहार लगाती रही, गिड़गिड़ाती रही और वहीं मौजूद कुछ लोग उसे बचाने के बजाय इस अमानवीय कृत्य का वीडियो बनाते रहे। यह दृश्य केवल एक महिला की बेबसी नहीं दिखाता, यह हमारे सामूहिक पतन का आईना है। मामले का खुलासा भी सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो के बाद हुआ, चर्चा है शासन-प्रशासन के कुछ लोग मामले में चुप्पी साधने का इशारा करते रहे।
तमनार की तस्वीर: लोकतंत्र का सबसे शर्मनाक फ्रेम
ड्यूटी निभा रही एक महिला के कपड़े फाड़े जाना, उसके साथ बदसलूकी और उसके सम्मान को सार्वजनिक रूप से रौंदा जाना यह किसी भी परिस्थिति में, किसी भी तर्क के साथ, किसी भी आंदोलन या असंतोष के नाम पर कभी जायज़ नहीं ठहराया जा सकता। अगर कोई समाज यह बहस करने लगे कि “हालात ऐसे थे” या “भीड़ उग्र थी”, तो समझ लेना चाहिए कि वह समाज अपने नैतिक आधार खो चुका है।
लोकतंत्र में विरोध एक मौलिक अधिकार है। असहमति, आंदोलन, प्रदर्शन ये सब लोकतांत्रिक ढाँचे की ताकत हैं लेकिन जब विरोध हिंसा में बदल जाए और वह हिंसा किसी महिला की देह और गरिमा पर हमला बन जाए, तो वह विरोध नहीं रहता वह अराजकता बन जाता है। जब एक थकी हुई महिला आरक्षक खेत में गिरती है और भीड़ उसे घेर लेती है तो वह सत्ता का प्रतीक नहीं रहती, वह सिर्फ़ एक असहाय महिला रह जाती है और उस क्षण अगर समाज उसे बचाने के बजाय तमाशा देखे, तो समझ लेना चाहिए कि समस्या सिर्फ़ अपराधियों की नहीं, हम सबकी है।
तमनार में उस महिला के कपड़े नहीं फटे, राज्य की साख फटी है। भीड़ ने वर्दीधारी महिला को अर्धनग्न नहीं किया गया बल्कि पूरा प्रशासन नंगा हुआ है।
तमनार की घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या आज विरोध का अर्थ सिर्फ़ आक्रोश उगलना रह गया है ? क्या अब विरोध में यह भी शामिल है कि सामने खड़ी महिला वर्दीधारी है तो उसे “टारगेट” बनाया जाए ? और अगर वर्दी में खड़ी महिला भी सुरक्षित नहीं, तो फिर आम महिलाओं के लिए यह समाज कितना सुरक्षित है ? इस तरह की घटनाओं में सबसे डरावनी चीज़ सिर्फ़ अपराध नहीं होती, बल्कि आसपास खड़ी भीड़ की चुप्पी होती है। कितने लोगों ने रोका ? कितनों ने कहा कि “यह गलत है” ? कितनों ने आगे बढ़कर उस महिला की मदद की ? तमनार की घटना ने एक बार फिर यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि भारत में महिला सशक्तिकरण की वास्तविक स्थिति क्या है। यह घटना उस व्यापक सामाजिक दावे को भी चुनौती देती है, जिसके तहत यह कहा जाता है कि भारत में महिलाएँ अब पहले से कहीं अधिक सशक्त हो चुकी हैं।
अक्सर कहा जाता है कि वर्दी सत्ता का प्रतीक होती है। लेकिन यहाँ यह तर्क भी खोखला साबित होता है। क्योंकि अगर यह केवल सत्ता का विरोध होता, तो हमला प्रतीकात्मक होता नारे, प्रतिरोध, गिरफ्तारी, पर यहाँ हमला महिला पर था उसके शरीर पर, उसके सम्मान पर। यह फर्क समझना ज़रूरी है। यह घटना बताती है कि हमारे समाज में आज भी महिला को सबसे आसान निशाना माना जाता है, चाहे वह आम नागरिक हो या वर्दी में खड़ी राज्य की प्रतिनिधि।
यह मत कहिए कि छत्तीसगढ़ हिंसक हो गया है। छत्तीसगढ़ आज भी उतना ही सरल, आत्मीय और मानवीय है। बदली है तो व्यवस्था, जिसने लोगों के आक्रोश को संवाद नहीं, हिंसा में बदल दिया है। बदले हैं तो शासक, जो उद्योगपतियों के लिए रेड कार्पेट बिछाते हैं और जनता के लिए पुलिस की लाठी छोड़ देते हैं।
तमनार की घटना छत्तीसगढ़ के सामने कई कठिन सवाल रखती है—क्या बढ़ता आक्रोश राज्य की पारंपरिक सामाजिक सहनशीलता को पीछे छोड़ रहा है? और क्या विकास, विरोध और कानून-व्यवस्था के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए नई सोच की ज़रूरत है ? क्या इस विरोध प्रदर्शन के मद्देनज़र मौके पर पुलिस अफसरों के अलावा सैकड़ों पुलिस कर्मी उस पीड़ित महिला सहकर्मी की मदद करने में नाकाम नहीं रहे ? क्या पुलिस सत्ता के इशारे पर केवल पूंजीपतियों की ढाल बनकर हक़ मांगने वालों के सामने खड़ी रहेगी ? पिछले कई दिनों से शांति पूर्ण तरीके से चल रहे विरोध प्रदर्शन में उस दिन (27 दिसंबर) आखिर वो कौन लोग थे जिन्होंने प्रदर्शनकारियों और प्रशासन के बीच अपनी रोटी सेंकी ? शासन-प्रशासन की भद्द पिट जाने के बाद पुलिस हरकत में आई है ऐसी ख़बरें हैं। अब मामलें में दोषियों की गिरफ्तारी और जरूरी कार्रवाही होगी। कुछ गिरफ्तारियां भी हुई हैं।
इस घटना को केवल एक अलग-थलग मामला मानकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं होगा। यह एक चेतावनी है कि यदि आक्रोश को दिशा नहीं मिली और संवेदनशीलता कमजोर पड़ी, तो उसका सबसे बड़ा असर समाज के सबसे असुरक्षित वर्गों पर पड़ता है।
कैमरे की कलम: जब सवाल अपराध बन जाएँ
भारत के लोकतांत्रिक परिदृश्य में आज सबसे गंभीर संकट यह नहीं है कि सत्ता से सवाल उठ रहे हैं, बल्कि यह है कि सवाल पूछना ही सत्ता के लिए असहज और संदिग्ध गतिविधि बनता जा रहा है। इस असहजता के केंद्र में राज्य-व्यवस्था और मुख्यधारा मीडिया के बीच वर्षों से विकसित होता आया वह गठजोड़ है, जिसने आलोचना को अवांछनीय और सहमति को ‘राष्ट्रीय ज़िम्मेदारी’ का दर्जा दे दिया है।
हर सत्ता को संवाद की नहीं, वैधता की भूख होती है और हर संस्थागत मीडिया को निर्बाध संचालन के लिए संरक्षण चाहिए। यहीं से वह सौदा शुरू होता है, जिसमें राज्य को एक अनाक्रमणीय छवि मिलती है और मीडिया को विज्ञापन, पहुँच और सुरक्षा। इस लेन-देन में पत्रकारिता का मूल धर्म—सत्ता से सवाल—धीरे-धीरे अप्रासंगिक कर दिया जाता है।
इतिहास गवाह है कि सत्ता हमेशा अपने अनुकूल मीडिया चाहती रही है। राजाओं के दौर में यह भूमिका दरबारी कवियों और चारण-भाटों ने निभाई। आधुनिक लोकतंत्र में वही भूमिका अक्सर कॉरपोरेट-विज्ञापन आधारित, रजिस्टर्ड मीडिया संस्थानों ने संभाल ली है। माध्यम बदले, पर चरित्र प्रायः वही रहा—सत्ता के प्रति विनम्रता।
इस पृष्ठभूमि में सोशल मीडिया एक दुर्घटना की तरह उभरा एक ऐसा मंच जो न संपादकीय नियंत्रण से बंधा है, न विज्ञापन नीति से, न ही सत्ता की भाषा सीखने को बाध्य। यही कारण है कि तमाम अव्यवस्थाओं और जोखिमों के बावजूद, सोशल मीडिया आज राज्य और उसके पोषित मीडिया—दोनों के लिए सबसे असहज क्षेत्र बन गया है।
इसी असहजता की अभिव्यक्ति हालिया घटनाक्रम में दिखती है, जब नवोदित सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर आकांक्षा टोप्पो को हिरासत में लिया गया। यह कार्रवाई केवल किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है। यह उस संस्थागत मानसिकता को उजागर करती है, जिसमें असुविधाजनक भाषा और असहज सवालों को कानून-व्यवस्था का मुद्दा बना दिया जाता है।
यह ध्यान देने योग्य है कि इस प्रकरण में विवाद का केंद्र तथ्य नहीं, बल्कि भाषा और शैली रही। जब सवालों का तथ्यात्मक खंडन संभव नहीं होता, तब अक्सर अभिव्यक्ति की मर्यादा, शालीनता और अनुशासन को हथियार बनाया जाता है। यह लोकतांत्रिक बहस नहीं, बल्कि विमर्श का दमन है।
विडंबना यह है कि जिन मीडिया संस्थानों ने वर्षों तक सत्ता की हर प्रेस-कॉन्फ्रेंस को बिना सवाल किए प्रसारित किया, नीतिगत विफलताओं को शब्दजाल में ढका और जनसरोकारों के स्थान पर प्रायोजित बहसों को प्राथमिकता दी वही संस्थान आज सोशल मीडिया को पत्रकारिता के मानक सिखाने में अग्रणी बने हुए हैं।
यह दोहरा मापदंड अब छिपा नहीं रहा। मुख्यधारा मीडिया का बड़ा हिस्सा व्यवहार में राज्य का संचार तंत्र बन चुका है जहाँ आलोचना ‘नकारात्मकता’ और प्रश्न ‘अराजकता’ माने जाते हैं। इसीलिए जब सोशल मीडिया से उठती स्वतंत्र आवाज़ें सत्ता की विफलताओं को सीधा संबोधित करती हैं, तो राज्य और मीडिया—दोनों एक सुर में असहज हो जाते हैं।
सोशल मीडिया पर उभरे कई नाम—जिनमें कमला नेताम जैसे लोग भी शामिल हैं—इस गठजोड़ के बाहर खड़े हैं। इनके पास न संस्थागत सुरक्षा है, न कानूनी कवच, न कॉरपोरेट समर्थन। इनके पास केवल सवाल हैं और यही इनका सबसे बड़ा अपराध बनता जा रहा है।
यह स्वीकार किया जाना चाहिए कि सोशल मीडिया पत्रकारिता अपरिपक्व है, कई बार गैर-जिम्मेदार भी। लेकिन यह अपरिपक्वता उस संस्थागत चुप्पी से कम खतरनाक है, जिसने मुख्यधारा मीडिया को जकड़ रखा है। यहाँ सुधार की आवश्यकता है दमन की नहीं।
लोकतंत्र में राज्य की शक्ति इस बात से नहीं मापी जाती कि वह कितनी प्रशंसा अर्जित करता है, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि वह कितनी तीखी आलोचना सहन कर सकता है। और मीडिया की साख इस बात से तय होती है कि वह सत्ता की भाषा बोलता है या उसे कटघरे में खड़ा करता है।
यदि राज्य-व्यवस्था और मीडिया का यह गठजोड़ असहज सवालों को दबाने का स्थायी औज़ार बन गया, तो इसका नुकसान किसी एक इंफ्लुएंसर या मंच तक सीमित नहीं रहेगा। यह उस लोकतांत्रिक स्पेस को संकुचित कर देगा, जहाँ से जनता सत्ता को आईना दिखा सकती है और जब लोकतंत्र में आईने टूटते हैं, तो चेहरे नहीं बदलते इतिहास बदलता है।
कैमरे की कलम: वर्दी, विवेक और व्यवस्था
इस पोस्ट में दिखाई दे रही तस्वीरें दो अलग-अलग मामलों की हैं, लेकिन संदेश एक ही है—कानून का मखौल। लाल घेरे में कल्पना वर्मा हैं, जबकि बाकी तीन तस्वीरें दंतेवाड़ा के बीच बाजार की हैं, जहाँ एक रिटायर्ड फौजी और पुलिस अफसर तोमेश वर्मा खुलेआम अपनी-अपनी ताकत का प्रदर्शन करते दिखते हैं।
छत्तीसगढ़ में कुछ पुलिस अफसर इन दिनों सुर्खियों में हैं—वैसे इसमें नया कुछ भी नहीं है। फर्क सिर्फ इतना है कि सालों पुरानी बदरंग परंपरा को अब महकमे की नई पीढ़ी आगे बढ़ा रही है।
छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा क्षेत्र में पुलिस अधिकारी (डीएसपी) तोमेश वर्मा पर हुआ प्राणघातक हमला महज एक आपराधिक घटना नहीं । यह उस गहरे और खतरनाक अविश्वास का संकेत था, जो पुलिस और जनता के बीच लगातार पनपता जा रहा है। यह मान लेना आसान होगा कि यह गुस्सा किसी एक घटना की उपज है, लेकिन सच्चाई कहीं अधिक असहज है। यह हमला उस सड़ांध का विस्फोट था, जो लंबे समय से वर्दी के भीतर पल रही है।
यह घटना वर्दी के पीछे छिपे उन बददिमाग चेहरों का आईना है, जिनकी करतूतों ने अब जनता के धैर्य की सीमा तोड़ दी है। गुस्सा अब सिर्फ बातचीत में नहीं, सड़कों पर पीछा करता दिखने लगा है। प्रदेश में कई पुलिस अधिकारी देह शोषण जैसे गंभीर आरोपों में जांच के घेरे में हैं। कहीं रिश्वतखोरी खुलेआम व्यवस्था का हिस्सा बन चुकी है, तो कहीं वर्दीधारी चेहरा देखकर कानून पर तिलक लगाने की परंपरा को ही धर्म मान चुके हैं।
कुछ पुलिस अफसरों के कारण यहां कानून अब किताबों में नहीं, कंधों पर टंगे सितारों और जेब में भरी हैसियत से चलता है। वर्दी पहनते ही कुछ अफसर यह मान लेते हैं कि संविधान ने उन्हें नहीं, बल्कि संविधान ने खुद को उनके हवाले कर दिया है। लोकतंत्र में सबसे खतरनाक स्थिति वह नहीं होती जब अपराध बढ़ते हैं, बल्कि वह होती है जब अपराध सामान्य लगने लगते हैं। उससे भी खतरनाक तब होता है, जब कानून की रखवाली करने वाली वर्दी सवालों से ऊपर बैठ जाए।
आज संकट अपराधियों का नहीं, अधिकार के नशे का है और यह नशा सबसे ज्यादा वहीं दिखाई देता है, जहां न्याय की पहली दस्तक होनी चाहिए।
छत्तीसगढ़ में कुछ पुलिस अधिकारियों पर लगे देह शोषण, घूसखोरी और पद के दुरुपयोग जैसे आरोप कोई अपवाद नहीं हैं। देश के कई राज्यों में इसी तरह के मामले सामने आते रहे हैं। छत्तीसगढ़ की महिला डीएसपी कल्पना वर्मा पर होटल कारोबारी दीपक टंडन द्वारा लगाए गये करोड़ों रुपये की ठगी के आरोप हों या डीएसपी तोमेश वर्मा का हालिया मामला। छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के DSP तोमेश वर्मा 19 दिसंबर को कोर्ट के काम से सुकमा से दंतेवाड़ा आए थे। जहां बीच शहर में दुर्ग जिले की रहने वाली एक महिला ने अपने पुरुष दोस्त रिटायर्ड फौजी रमाशंकर साहू के साथ मिलकर उन पर चाकू से वार कर दिया। अपुष्ट ख़बरें तो ये भी हैं कि इसके लिये महिला करीब 400 किलोमीटर सफर तय कर DSP को मारने दुर्ग से दंतेवाड़ा पहुंची थी। वारदात में शामिल ये वही महिला है जिसने करीब 1 साल पहले DSP तोमेश वर्मा पर रेप का आरोप लगाया था। महिला का आरोप है कि वर्ष 2024 में दुर्ग जिले के मोहन नगर थाने में पदस्थापना के दौरान पुलिस अफसर तोमेश वर्मा ने घर में घुसकर उसके साथ दुष्कर्म व मारपीट की थी । मोहननगर थाने में पुलिस अफसर के खिलाफ FIR भी दर्ज है।
कोई भी हमला अपराध है—इस पर कोई बहस नहीं। लेकिन हर अपराध की एक पृष्ठभूमि भी होती है और जब पृष्ठभूमि खुद अफसर के फैसलों से बनी हो, तो कटघरे में सिर्फ आरोपी नहीं, निर्णय भी खड़े होते हैं।
आज ऐसे हालात हैं कि जिसके कंधों पर कानून-व्यवस्था की ज़िम्मेदारी टंगी है, वही पुलिस अक्सर उस बोझ को सत्ता, सिफ़ारिश और सुविधा के तराज़ू पर तौलती नज़र आती है। थाने की चौखट पर न्याय नहीं, पहचान पूछी जाती है—नाम से पहले जाति, दर्द से पहले पहुँच और अपराध से पहले राजनीतिक समीकरण।
जनता के सवाल पुलिस को शोर लगते हैं, जबकि सत्ता की फुसफुसाहट आदेश बन जाती है। जिस हाथ को पीड़ित की ढाल बनना था, वही हाथ वसूली की रसीद थमा देता है। जिस वर्दी का रंग भरोसे का प्रतीक था, वह अब डर का पर्याय बन चुकी है। कानून की किताबें अलमारी में बंद हैं, और ज़मीर फ़ाइलों के नीचे दबा पड़ा है। थाने में सच की एंट्री मुश्किल है, लेकिन झूठ की FIR तुरंत दर्ज हो जाती है—बस सही जेब से निकलनी चाहिए। लोकतंत्र में वर्दी को सम्मान इसलिए मिलता है क्योंकि वह कानून की प्रतिनिधि मानी जाती है। लेकिन जब वही वर्दी कानून से भारी पड़ने लगे, तो सवाल केवल व्यवस्था पर नहीं, हमारी सामूहिक चुप्पी पर भी उठता है।
आज सबसे असुरक्षित व्यक्ति अपराधी नहीं, बल्कि सवाल करने वाला नागरिक है। सवाल पूछते ही व्यवस्था चौकन्नी हो जाती है। कानून अचानक बहुत सक्रिय हो जाता है। धाराएं याद आने लगती हैं, नोटिस चलने लगते हैं, और नागरिक को अनुशासन का पाठ पढ़ाया जाता है। लोकतंत्र में सवाल डर का कारण नहीं होते—डर तब होता है, जब जवाब देने की क्षमता खत्म हो जाए।
विडंबना यह है कि इसी ढांचे में हजारों ईमानदार पुलिस कर्मी भी काम कर रहे हैं। वे नियम मानते हैं, ड्यूटी निभाते हैं और भरोसा बचाने की कोशिश करते हैं। लेकिन उन्हें आगे रखने की जगह पीछे खड़ा कर दिया जाता है, ताकि तस्वीर “मैनेज” रहे। एक सड़ी मछली पूरे तालाब को न सिर्फ गंदा करती है बल्कि उसे बदनाम कर देती है । यह कटाक्ष किसी व्यक्ति, पद या संस्था के खिलाफ आरोप पत्र नहीं है। यह उस मानसिकता पर सवाल है, जिसने जवाबदेही को बोझ और सत्ता को अधिकार समझ लिया है। यह उस चुप्पी पर सवाल है, जो हर बार “प्रक्रिया” के नाम पर ओढ़ ली जाती है।
कैमरे की कलम: 'फोटो फ्रेम में सत्ता, फुटनोट में जनता'
इन दिनों सोशल मीडिया पर यह तस्वीर कुछ इस तरह वायरल है, जैसे किसी सूबे में बाढ़ आ गई हो और हज़ारों परिवारों से आशियाने छिन गए हों। हालाँकि इस तस्वीर में सिर्फ मुस्कानें हैं - महँगी, सुरक्षित और वातानुकूलित। यह तस्वीर एक शादी समारोह की है। यहां सत्ता और ताक़तवर लोग केंद्र में हैं। दूल्हा है —अमन सिंह (रिटायर्ड आईआरएस ) का बेटा । अमन सिंह, छत्तीसगढ़ में डॉ. रमन सिंह की सरकार में सर्वशक्तिमान मुख्य सचिव रहे। राज्य की राजनीति जिनकी भौंहों की हरकत से दिशा तय करती थी और नौकरशाही जिनसे नज़र मिलाने से पहले कैलेंडर देखती थी। रिटायर हुए तो देश के सबसे ताकतवर पूंजीपतियों में शुमार अडानी समूह से जुड़ गये। यानि सरकारी फाइल से कॉरपोरेट फोल्डर तक की यात्रा, बिना किसी ब्रेकडाउन के।
इतने प्रभावशाली व्यक्ति के बेटे की शादी हो और सरकार बहादुर न पहुँचे — ऐसा सोचना लोकतंत्र के विरुद्ध है। दिल्ली दरबार से लेकर अलग-अलग सूबों के सियासतदान, चाहे सत्ता में हों या विपक्ष में। सब बारात में शरीक हुये। इस महफ़िल में वे पत्रकार भी मौजूद थे जो सत्ता और पूंजी के बीच पुल नहीं — फ्लाईओवर की भूमिका में हैं। ख़ुशनुमा माहौल में कैमरे क्लिक होते रहे, इतिहास सुरक्षित होता रहा और इन सबके बीच सैकड़ों सवाल कहीं बाहर छूट जाते हैं।
मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में हुई यह शाही शादी आज के संदर्भ में इसलिए खास है क्योंकि तस्वीर में जो हँसी है वह छत्तीसगढ़ की हालिया सूरत से सीधा टकराती है। तस्वीर के केंद्र में — गौतम अडानी है। उनके इर्द-गिर्द — छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री और विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह, वर्तमान मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, दिल्ली दरबार के बड़े नेता राजीव प्रताप रूड़ी, संगठन की कमान से सियासी अखाड़े में तीरंदाजी करने वाले सौदान सिंह, पूर्व सांसद और भाजपा की प्रभावशाली नेत्री सरोज पांडेय के अलावा सत्ता की निरंतरता के अन्य गवाह बैठे हैं।
यह पारिवारिक फोटो नहीं है। यह उस गठजोड़ का सामूहिक चित्र है जो चुनावों से नहीं बदलता। कहावत यूँ ही नहीं बनी — सियासत और पूंजीपतियों का हनीमून कभी खत्म नहीं होता। यह रिश्ता सात फेरों से नहीं, नीतियों, परियोजनाओं और एमओयू से बंधा होता है। यहाँ जनता की भूमिका साफ़ है, वह सिर्फ फोटोग्राफ़र है। वो तस्वीर खींचती है, जो हमेशा फ्रेम से बाहर रहती है। सरकारें बदलती हैं, घोषणापत्र बदलते हैं, नारे बदलते हैं लेकिन निवेशक वही रहते हैं। बस कुर्सी के सामने बैठने वाला चेहरा बदल जाता है।
शादी समारोह में भोजन की मेज पर जमी सत्ता और पूंजी की यह महफ़िल आगे और कितने गुल खिलाएगी यह भविष्य नहीं, बस्तर तय करेगा। फिलहाल तो राज्य के जंगल, खासकर हसदेव इस तस्वीर को देखकर सिहर रहा हैं। छत्तीसगढ़ के जंगल इन दिनों किसी प्राकृतिक आपदा से नहीं, बल्कि तथाकथित विकास पुरुषों की दृष्टि से सबसे अधिक संकट में हैं। फर्क बस इतना है कि इस आपदा को सरकारी फाइलों में “परियोजना”, कॉरपोरेट प्रस्तुतियों में “निवेश” और मीडिया की सुर्खियों में “रोज़गार सृजन” कहा जा रहा है। इनके लिये जंगल अब पेड़ों का समूह नहीं “अवरोध” बन चुके हैं। नदियाँ जीवनदायिनी नहीं बल्कि “अनुपयोगी संसाधन” हैं। आदिवासी समाज संस्कृति नहीं, बल्कि “पुनर्वास की समस्या” है और वन्यजीव ? वे तो विकास के रास्ते में आने वाले आंकड़े भर हैं।
जिस देश में संविधान ने आदिवासियों को जंगलों का संरक्षक माना, उसी देश में उन्हें अपने ही घर में अवैध घोषित किया जा रहा है। ग्राम सभा की सहमति अब एक औपचारिक मुहर भर है, जिसे परियोजना की गति के अनुसार लगाया या हटाया जा सकता है। विडंबना यह है कि जिन लोगों ने सदियों तक जंगल बचाया, वे आज “वन भूमि पर अतिक्रमणकारी” कहलाते हैं, और जिनका जंगल से रिश्ता सिर्फ मुनाफ़े का है, वे विकास दूत बन गये हैं।
जब तस्वीरों में सब बहुत सुरक्षित, बहुत खुश और बहुत संतुष्ट दिखें तो समझ लीजिए कहीं न कहीं कोई जंगल कट चुका है, कोई नदी दम तोड़ चुकी है और कोई आदिवासी पुनर्वास के वादे में गायब हो चुका है। यह मुलाक़ात शिष्टाचार की मिसाल भी हो सकती है लेकिन छत्तीसगढ़ के जंगलों, नदियों और ज़मीनों को विकास की रफ्तार में समय से भी तेज़ चलते देखकर मुझे तो डर लगता है। आपका पता नहीं ...
कैमरे की कलम : ... जो तल रहा है, वही चल रहा है !
छत्तीसगढ़ की राजनीति इन दिनों नए-नए रंग बिखेर रही है। रंग भी ऐसे जो बेरोज़गारों के घरों में नहीं, मगर नेताओं के ठहराव वाले ढाबों और होटलों में ज़रूर मिल जाते हैं। हाल ही में छत्तीसगढ़ सरकार के दो मंत्री और भाजपा संगठन के कुछ महत्वपूर्ण पदाधिकारी राजधानी रायपुर से अंबिकापुर प्रवास के दौरान सड़क किनारे एक होटल में ठहरे। ठहरना कोई मुद्दा नहीं था, देश की राजनीति सड़क से ही चलती है और कभी-कभी सड़क किनारे सोती भी है।
सफ़रनामा, सत्यप्रकाश के साथ : मैं मुसाफिर हूँ, मेरी सुबह कहीं शाम कहीं ...
ये यायावर पशुपालक आज यहाँ कल कहीं और... । बीते 11 नवम्बर को मेरे जिले (बिलासपुर) की सरहद से करीब 130 किलोमीटर दूर ग्राम तरच (मध्यप्रदेश) के घुमावदार मोड़ पर इन यायावरों से मेरा अचानक आमना-सामना हुआ। हम काले हिरणों की शरण स्थली, कारोपानी जा रहे थे और ये उसी रास्ते से 24 किलोमीटर का सफर और तय कर छत्तीसगढ़ की सीमा में प्रवेश करने वाले थे। अक्सर इनके काफ़िले को देखकर मैं रुक जाता हूँ, जिज्ञासा इनको जी भरकर देखने की और लालच कुछ तस्वीरों का।
हर साल की तरह इस बरस भी हजारों मील की दूरी क़दमों से नाप देने वाले यायावर अपने अस्थाई ठिकानों को लौट रहे थे । उस मोड़ पर इनको देख मैंने कार रोकी और सड़क किनारे रुका, ये चलते रहे। कुछ तस्वीरों के बाद चलते-चलते मेरी बात उस युवा से हुई जिसके कदमों के पीछे ऊंटों का रेला कदमताल कर रहा था । बातचीत की औपचारिकता में पता चला कि काफ़िल राजस्थान से मई माह के अंतिम सप्ताह में चला है। राजस्थान के जोधपुर से 65 किलोमीटर दूर भेंलड़ गाँव के रहने वाले तेजसिंग कुनबे के अगवा हैं, उन्होंने बताया उनके सूबे में पशुओं के चारों का संकट दशकों पुरानी समस्या है लिहाज हर साल गर्मी की शुरुआत होते ही वे दूसरे राज्यों की ओर निकल पड़ते हैं।
तेजसिंह कहते हैं उनके जैसे सैकड़ों परिवार हैं जो हर बरस देश के दूसरे प्रांतों का रुख करते हैं । राजस्थानी जहाज ऊँट, भेड़, कुत्तों के बीच जिंदगी जीने की तमाम जरूरतों के साथ सैकड़ों किलोमीटर का सफर पैदल तय करते हैं । ये यायावर पूरी जिंदगी सफ़र पर होते हैं जो प्रकृति के रौद्र रूप और उसके सौंदर्य को काफी करीब से देखते और भोगते हैं । पशुचारा की आड़ में व्यवसाय पर निकले ये लोग शिक्षा से कोसो दूर होते हैं । हालांकि अशिक्षा इनके व्यवसाय में आड़े नहीं आती ।
आपको बता दें कि राजस्थान और गुजरात में पशुपालन का व्यवसाय रायका-रैबारी, बागरी ओर बावरिया समाज से जुड़े हुए लोग करते हैं। ये समाज सालों से यही काम कर रहा हैं। भारत में ऊंट पालने का काम ये सभी जातियां करती हैं किन्तु इनकी ब्रीडिंग रायका- रैबारी लोग ही करवाते हैं। ये ब्रीडिंग राजस्थान के मारवाड़ के साथ-साथ गुजरात के कच्छ में भी होती है। कहते हैं ऊंट रेगिस्तान का जहाज है तो बकरी गरीब की गाय है। भेंड़-बकरी को थोड़ा सा चराकर कभी भी दूध निकाला जा सकता है। मरुभूमि में गरीब व्यक्ति के पोषण का आधार भेंड़-बकरी ही है जो उसके जीवन और अस्तित्व से जुड़ी है।
जानकार ये भी बताते हैं सैकड़ों भेड़ और ऊँट लेकर हजारों मील सफ़र तय करने वाले ये लोग रंगमंच की वो कठपुतलियां हैं जिनकी डोर दूर देश में बैठे इनके आकाओं के पास होती है । इनको तो बस चलते जाना है... बस चलते जाना । रास्ता कब ख़त्म होगा ये जानने की ख्वाहिश में पीढियां गुजर गई ।
ऊंट से सीखें जीवन जीने की कला -
ऊंट रेगिस्तान का जहाज कहलाता है. कठोर वातावरण में भी जिंदगी जीने का हुनर रखने वाला ये जीव हमें जीवन के कई अनमोल पाठ सिखाता है.
O रेगिस्तान की भीषण गर्मी और पानी की कमी को सहने वाला ऊंट हमें संयम और कठिन परिस्थितियों में धैर्य रखना सिखाता है.
O ऊंट अपने शरीर में वसा का संचय करके लंबे समय तक भोजन और पानी के बिना रह सकता है. यह हमें दीर्घकालिक लक्ष्य निर्धारित करने और उन्हें पाने के लिए संसाधनों का समझदारी से इस्तेमाल करने की सीख देता है.
O रेगिस्तान के कठिन रास्तों पर चलने वाला ऊंट हमें कठिन परिश्रम और दृढ़ निश्चय का महत्व समझाता है.
O ऊंटों का एक समूह मिलकर चलता है. यह हमें सहयोग और टीम वर्क के बल पर किसी भी चुनौती का सामना करने की सीख देता है.
O ऊंट रेगिस्तान के सीमित संसाधनों में ही अपना जीवन यापन कर लेता है. यह हमें सादगी से जीना और संतुष्ट रहना सिखाता है.
O रेगिस्तान के बदलते तापमान और वातावरण में रहने वाला ऊंट हमें परिस्थिति के अनुसार खुद को ढालना सिखाता है.
O ऊंट अपने चौड़े पैरों से रेत में आसानी से चल सकता है. यह हमें समस्याओं का समाधान खोजने और चुनौतियों से पार पाने की सीख देता है.
O रेगिस्तान में भटकते हुए भी ऊंट पानी की तलाश जारी रखता है. यह हमें धैर्य न खोने और आशा बनाए रखने का पाठ देता है.
O ऊंट भारी सामान ले जाने में सक्षम है. यह हमें शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत बनने की सीख देता है.
O ऊंट आमतौर पर शांत और मिलनसार स्वभाव का होता है. यह हमें दूसरों के साथ सद्भाव से रहने का पाठ देता है.
O ऊंटों की चराई से रेगिस्तान की मिट्टी मजबूत होती है, जिससे मरुस्थलीकरण रुकता है. यह हमें पर्यावरण संरक्षण के महत्व का बोध कराता है.
O ऊंट पालने वाले समुदाय रेगिस्तान में रहने के लिए सदियों से अनूठ तरीके अपनाते आए हैं. यह हमें पारंपरिक ज्ञान के सम्मान का पाठ देता है.
O ऊंट रेगिस्तान में कम पानी और भोजन में ही अपना गुजारा कर लेता है. यह हमें आत्मनिर्भर बनने और संसाधनों का प्रबंधन करने की सीख देता है.
O ऊंट रेगिस्तान में लगातार चलता रहता है. यह हमें जीवन में निरंतर प्रगति करते रहने और सीखने का पाठ देता है.
आंसू, गम, गुस्सा : करवा चौथ पर अधूरी वीडियो कॉल... गांदरबल में आतंक के दर्द की 4 कहानियां
चांद दिखने पर किया वीडियो कॉल, लेकिन...दर्द की पहली कहानी
जम्मू के तालाब तिल्लो के रहने वाले शशि अबरोल की पत्नी रुचि ने करवाचौथ का व्रत रखा था. आर्किटेक्ट पति गांदरबल में एक प्रोजेक्ट साइट पर काम करने के लिए गए थे. उनका शाम को घर आ पाना संभव नहीं था. ऐसे में रुचि ने शाम को मंदिर में पूजा करने के लिए जाने से पहले पति से बात की थी. शशि ने पत्नी से वादा किया था कि वह चांद निकलने पर वीडियो कॉल करेंगे. आसमान में चांद निकला, लेकिन शशि अबरोल का फोन नहीं आया. शशि ने जब वीडियो कॉल किया, तब भी शशि अबरोल ने फोन नहीं उठाया. रुचि को लगा कि किसी काम में व्यस्त होंगे. कुछ समय बाद फिर रुचि ने फोन किया, लेकिन फिर घंटी बजती रही. रात 12 बजे तक रुचि अपने पति को फोन करती रही, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. 12 बजे के बाद फोन बंद हो गया. सुबह खबर आई कि शशि अबरोल की आतंकी हमले में मौत हो गई है. इसके बाद शशि अबरोल के घर में जो मातक छाया, वो अब भी नजर आता है. रुचि और उनकी 8 साल की बेटी का रो-रोकर बुरा हाल है. बेटी मां के आंखों से आंसू पोंछती है और कहती है- मम्मी मत रोना..., लेकिन मासूम की आंखों से भी आंसू रुक नहीं रहे हैं.
फोन पर बताया- मुझे गोली लगी है.... दर्द की दूसरी कहानी
पंजाब के बटाला के रहने वाले 40 वर्षीय गुरमीत अपनी पत्नी चरनजीत के साथ बात कर रहे थे. पत्नी ने करवाचौथ का व्रत रखा था और शाम का समय था. गुरमीत भी काम खत्म कर चुका था. दोनों बातें कर रहे थे, तभी चरनजीत को पटाखे चलाने की आवाज फोन से आने लगी. चरनजीत ने गुरमीत से पूछा कि ये आवाजें कैसी आ रही हैं? गुरमीत ने बताया कि ऐसा लग रहा है कि साइट पर आतंकियों ने हमला कर दिया है. ये पटाखों की नहीं गोलियों के चलने की आवाज है. इसके बाद गुरमीत से मुंह से एक चीख की आवाज आई. चरनजीत ने पूछा- क्या हुआ..? गुरमीत ने बताया कि हाथ में गोली लगी है, फोन रखो. इसके बाद फोन बंद हो गया. चरनजीत ने सोचा नहीं होगा कि पति गुरमीत से ये उनकी आखिरी बातचीत है. इसके बाद वह कभी पति से बात नहीं कर पाएंगी. चरनजीत का अब रो-रोकर बुरा हाल है, वह बार-बार उस फोन कॉल का जिक्र कर रही हैं.
पिता शाहनवाज गए, बेटे का ख्वाब रह गया अधूरा- दर्द की तीसरी कहानी
कश्मीर के बड़गाम जिले के डॉ. शाहनवाज अब इस दुनिया में नहीं रहे. इसके साथ ही उनके बेटे मोहसिन का ख्वाब भी टूट गया है. शाहनवाज अपने बेटे मोहसिन को आइएएस ऑफिसर बनाना चाहते थे. पिता की मौत पर बेटे मोहसिन के आंखू थम नहीं रहे हैं. वह बोले, 'पिता के साथ मेरा ख्वाब भी टूट गया है. मैं आइएएस बनना चाहता था. पिता इसके लिए बहुत मेहनत करते थे. कई बार मैं उनसे कहता था कि इतनी मेहनत क्यों करते हैं, थोड़ा आराम भी कर लिया कीजिए. इस पर वह कहते थे- एक बार तुम आइएएस अधिकारी बन जाओ, इसके बाद मैं आराम करूंगा.' मोहसिन कहते हैं कि अब मेरा ख्वाब कभी पूरा नहीं होगा, क्योंकि इसे पूरा करने वाला ही चला गया है. मोहसिन में घर में भी मातम छाया हुआ है. परिवार के लोगों को रो-रोकर बुरा हाल है. गांदरबल में हुए आतंकी हमले में डॉ. शाहनवाज की भी मौत हो गई है.
मेरे पापा कब आएंगे...?- दर्द की चौथी कहानी
गांदरबल के आतंकी हमले में मारे गए शशि अबरोल की एक 8 साल की बेटी है. वह बार-बार अपनी दादी से पूछ रही थी- पापा कब आएंगे. मां और दादी ने जब उसे समझाया कि उसके पापा अब कभी नहीं आएंगे, आतंकियों ने उसके पापा को मार दिया है, तो उसकी आंखों में आंसू और चेहरे पर गुस्सा था. उसने कहा, "आतंकवादी बहुत बुरे हैं, उन्होंने मेरे पापा को मार डाला." आतंकवादी कौन होते हैं, शायद अभी इस मासूम को पता भी नहीं होगा. लेकिन आतंकियों ने जो दर्द इस मासूम को दिया है, उसे वह शायद कभी नहीं भुला पाएंगी. पापा को याद करते हुए इसके आंसू थम नहीं रहे हैं.
जम्मू-कश्मीर के गांदरबल जिले के गगनगीर इलाके में आतंकियों ने बीते रविवार रात को एक डॉक्टर समेत 7 लोगों की हत्या कर दी थी. आतंकी हमले में बिहार के तीन मजदूरों की मौत हुई है, जिनकी पहचान फहीमन नासिर (सेफ्टी मैनेजर), मोहम्मद हनीफ और कलीम के तौर पर हुई है. इस आतंकी हमले में 5 मजदूर भी जख्मी हुए हैं. वहीं, गांदरबल आतंकी हमला की जांच अब एनआईए करेगी. (साभार / तिलकराज NDTV)
खुद पर सज़ा की तलवार और कर्मचारियों पर सौगातों की बौछार ...

मुखिया यूं तो तीन शब्दों का छोटा सा संगठन है, लेकिन मुखिया की चिंताएं बहुत बड़ी होती हैं| मुखिया एक छाते की तरह होता है, जो बारिश में पूरे परिवार पर तन जाता है | मुखिया तूफ़ान में उम्मीद की नाव होता है, जिसमें परिवार बचा रहता है| जिस मुखिया के साथ उसका परिवार एकजुट होकर हर दुःख दर्द में खड़ा रहता है, वह परिवार एक मिसाल बनकर रह जाता है | लेकिन दुखों की बारिश में छाते की तरह तना कोई मुखिया तब बहुत उदास और हैरान होता है, जब सुखों की धूप में मदमस्त परिवार के लोग उसे भूलकर खुले आकाश में लोप हो जाते हैं, परंतु एक ज़िम्मेदार मुखिया अगली बारिश के लिए चिंतित रहता है| मैं आपका ध्यान हिमाचल प्रदेश सचिवालय सेवाएं संगठन के अध्यक्ष संजीव शर्मा की तरफ आकर्षित करना चाहता हूँ |
(हिमाचल के एक नौजवान नेता संजीव शर्मा के लिए प्रकाश बादल 'खामखा' की आदरांजलि)
मैं कौन.. आप सभी लोग जानते हैं.. मैं खामखा.. खामखा का मतलब तो आप जानते ही होंगे.... संजीव शर्मा को मैं अधिक समय से नहीं जानता.. लेकिन थोड़े समय में बहुत अधिक जान गया हूँ.... एक नौजवान नेता.. जिसे सचिवालय के कर्मचारियों ने बार-बार आकर कहा.. की सरकार के समक्ष आवाज़ उठाए.... संजीव शर्मा ने सबसे पहले अपनी ज़िम्मेदारी का परिचय देते हुए एक अद्भुत पहल की कि वो प्रदेश के मुख्यमंत्री के समक्ष शपथ लेंगे कि कर्मचारी हितों में वो सरकार और सचिवालय के कर्मचारियों बीच एक सशक्त पुल बनाएंगे.. एक खुशी का माहौल था.. एक तरफ नव निर्वाचित मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू थे, जिहोंने ओपीएस लागू कर हिमाचल के कर्मचारियों को प्रफुल्लित किया था, दूसरी तरफ संजीव शर्मा अपने अनुभवों और संकल्पों के साथ कर्मचारियों का प्रतिनिधत्व करते हुए खड़े | आर्थिक संकट की बात कहकर यह पहली बार हुआ था कि कर्मचारियों ने अपने लंबित डीए की घोषणा न होने के बाद भी निराशा महसूस नहीं की, क्योंकि सरकारी वित्तीय बोझ को कर्मचारी बखूबी समझ सकते थे | संजीव शर्मा एक ज़िम्मेदार मुखिया की तरह डटे रहे | लगभग पच्चीस वर्षों की सरकारी नौकरी में कर्मचारी संगठनों को अपनी मांगों और वर्चस्व के लिए लड़ते हुए देखा है | लेकिन समय के साथ-साथ महत्वाकांक्षी और दिशाविहीन होते कर्मचारी संगठनों के बीच संजीव शर्मा को किसी उम्मीद की तरह देखा जा सकता है,निर्भय और निष्कपट होकर अपने परिवार के दुःख दर्द को बयान करते हुए | एक तरफ कुकरमुत्तों की तरह अपने-अपने स्वार्थों के लिए बन रहे संगठन हैं, जो मुख्यमंत्री के इर्द-गिर्द चक्कर काट रहे हैं, दूसरी ओर कर्मचारियों के हक़ हुकूक के लिए चिंतित संजीव शर्मा | अब नेता कौन है, यह आप तय करें| मैं सचिवालय सेवाएं संगठन या सचिवालय के सभी संगठनों में सिर्फ संजीव का नाम इसलिए ले रहा हूँ कि एक अध्यक्ष में पूरा संगठन समाहित होता है, और एक सजग संगठन की शक्ति को एक कुशल अध्यक्ष ही कार्यान्वित कर सकता है | इसलिए जब मैं संजीव शर्मा का नाम लूं तो सचिवायल के सभी कर्मचारी और सचिवालय के सभी संगठन खुद को इसमें शामिल समझें | मुख्यमंत्री के चक्कर काटते नेताओं और कुकरमुत्तों की तरह बनते कर्मचारी संगठनों से क्या ये सवाल पूछा जा सकता है कि आखिर उनका एजेंडा क्या है | अगर उनका एजेंडा वही है जो संजीव शर्मा का एजेंडा है, तो वो एक नया संगठन बनाने के बजाए संजीव शर्मा के साथ क्यों नहीं जुड़ जाते |
हिमाचल में गठित दो-तीन कर्मचारी महासंघों का गठन किस आधार पर हो रहा है ? एक कर्मचारी संगठन दूसरे से बात क्यों नहीं करता और सबका एक ही अध्यक्ष क्यों नहीं होता | मतलब सीधा है, सत्तासीन सरकार के आगे-पीछे घूमने की ललक रखने वाले तथाकथित कर्मचारी नेता अपना स्वार्थ तो साध सकते हैं परंतु कर्मचारियों की आवाज़ नहीं बन पाते | मैं मुद्दे की बात पर आता हूँ | सचिवायल के प्रांगण का वो बूढा पेड़ (शायद चिनार का पेड़) सभी सुखों-दुखों का गवाह है, उस आन्दोलन के बिगुल का भी गवाह क्यों नहीं होगा.. जिसकी शुरूआत संजीव शर्मा की दहाड़ से हुई थी. इस दहाड़ में पूरा सचिवालय शामिल था.. एक कोने से दूसरे कोने तक कर्मचारियों का सैलाब | सब संजीव की वाहवाही कर रहे थे | यह भी पहली बार हुआ था कि सचिवालय के कर्मचारियों ने एक और पहल कर दी कि दो-दो तीन तीन कर्मचारी महासंघों की स्वघोषणा के वावजूद एक भी महासंघ कर्मचारियों की समस्याओं को लेकर मुखर नहीं हुआ तो संजीव ने सचिवालय से प्रदेश भर के कर्मचारियों की आवाज़ उठाई | यह एक नेता की दूरदर्शिता का प्रमाण है कि कर्मचारी सचिवालय का हो या किसी दूर दराज क्षेत्र का, कर्मचारी, कर्मचारी होता है। दूसरी ओर कर्मचारियों में परम्परागत तरीके से फूट डालने की नीयत लिए सरकार की तरफ से केवल उन्हीं संगठनों को बुलाया जाना, जो कहीं भी किसी विरोध में नहीं थे, भी यह स्पष्ट करता है कि कर्मचारियों को अलग-अलग टुकड़ों में बांटा जा रहा है | बावजूद इसके संजीव बेपरवाह डटे रहे.. कर्मचारियों के लिए चिंतन उनके चेहरे पर स्पष्ट देखा जा सकता है |
कोई कर्मचारी संगठन इतना हौसला नहीं कर सका कि अकेले राजाओं और वजीरों के भालों के बीच में दहाड़ते संजीव के साथ खड़ा हो | परन्तु संजीव अकेला खड़ा रहा और वजीरों और राजाओं के भाले बेअसर होकर लौट गए।| सचिवालय कर्मचारियों की भी दाद देनी होगी कि चट्टान की तरह सामने खड़े रहे और सरकार को गुमराह कर रहे वजीरों को तुरंत प्रभाव से एक-एक करके फिजूलखर्ची कम करने के आदेश करने पड़े| कमर्चारियों में असंतोष पैदा करने के लिए कई तरह के हथकंडे अपनाए गए.. कर्मचारियों को उकसाने के लिए कई तरह की भड़काऊ टिप्पणियाँ की गईं, ताकि संजीव और उसकी टीम के खिलाफ प्रिविलेज मोशन जैसी दमनकारी भभकी से न केवल संजीव को, बल्कि पूरे कर्मचारियों को डराया जा सके | परन्तु संजीव नाम का अर्थ खंगालने पर पता चला कि संजीव उसी कुम्भ राशि से सम्बन्ध रखने वाला ऊर्जावान नौजवान है, जिसके अराध्य देव शनि और हनुमान हैं... शनि और हनुमान जहाँ संजीव में साहस और शौर्य भरते हैं, वहीं यह भी ज्ञात रहे कि शास्त्रों के अनुसार संजीव नाम का संचालन सूर्य के सातवें ग्रह यूरेनस द्वारा किया जाता है | ऐसे में जहाँ संजीव को शनि और हनुमान की शक्तियां क्रांतिकारी बनाती हैं, वहीं यूरेनस का परिसंचालन उन्हें शीतल, शांत, सूझ-बूझ और ठहराव से भर देता है | इसी का प्रमाण है की संजीव के हौसले ने कर्मचारियों को वो हक़ एक महीने में ही दिला दिए, जिन्हें सरकार 6 मास में देने की बात कह रही थी | इस का श्रेय संजीव को कोई दे न दे, एक कर्मचारी के नाते मैं तो अपना सर झुका कर उन्हें देता हूँ | प्रदेश के मुख्यमत्री श्री सुखविंदर सुक्खू जहाँ कर्मचारियों के दुःख दर्द को समझने वाले प्रतीत होते दिखाई दिए, वहीं संजीव से उनके द्वारा दूरी बनाने का कारण समझ नहीं आया। क्या माननीय मुख्यमंत्री उस शपथ ग्रहण कार्यक्रम को भी भूल बैठे जहां संजीव ने मुख्यमंत्री से आशीष लिया था? बताया यह भी जाता है कि मुख्यमंत्री के करीब बैठी शीर्ष लेकिन कमज़ोर नौकरशाही सरकार को गुमराह करने और खुद की मौज मनवाने में सफल तो रही है, लेकिन कर्मचारियों के हकों को लेकर इस लचर नौकरशाही ने मुख्यमंत्री की आंखों में मात्र धूल झोंकी है..
मुझे लगता है कि प्रदेश की नौकरशाही में ओंकार शर्मा जैसे ख्रांट तेज तर्रार और उन जैसे अनेक कतारबद्ध प्रशासनिक अधिकारियों को मोर्चे पर न लाया जाना भी इस दयनीय स्थिति का एक मुख्य कारण हो सकता है | ( मैं ओंकार शर्मा को न तो व्यक्तिगत तौर पर जानता, न ही मैं उनसे सहानुभूति रखता हूँ, लेकिन उनके कामों और प्रशासनिक कार्यकुशलता का अवलोकन ज़रूर करता रहा हूँ ) विषय से न भटकता हुआ मैं सफलता के उन्माद में मस्त संजीव शर्मा की टीम को 15 अक्टूबर को उसी बूढ़े पेड़ के नीचे देख रहा था, जहाँ जनरल हाउस में उपस्थित न होकर अपनी अपनी कुर्सियों पर बैठे सचिवालय के आधे कर्मचारी 4 प्रतिशत डीए मिलने को लेकर ऐसी टिप्पणी कर रहे थे कि ‘चलो कुछ तो मिला’ लेकिन सचिवालय का वो प्रांगण खाली था, जहाँ आन्दोलन के पहले दिन पाँव धरने की जगह भी नहीं थी और सीटियों और नारों की गूंज के कारण बूढ़े पेड़ ने अपने कानों पर उंगलियां रख दीं थी और वह बुजुर्ग इस सारे प्रकरण का सशक्त गवाह बना लेकिन यह बूढा पेड़ संजीव को शीतल छाया का आशीर्वाद देता रहा। कर्मचारियों की निराशाजनक उपस्थिति के बाद संजीव की दहाड़ अब उनकी आवाज़ में नहीं उनकी आँखों में चमक रही थी | खुद की नौकरी पर प्रिविलेज मोशन जैसी सख्त सज़ा के मंडराते ग्रहण के बावजूद लाखों पेंशनरों और कर्मचारियों की झोली में खुशी भरने वाले संजीव शर्मा को अकेला छोड़ देने की बजाए उन्हें बचाए रखने तथा और ताकतवर बनाने की ज़रुरत है | मैं संजीव का कद्रदान इसलिए भी हो गया कि उनकी शेर जैसी आँखों के पिछले कोर में अपने परिवार और बच्चों के भविष्य की चिंता भी है, परंतु वो बेफिक्र और बिंदास होकर कर्मचारियों के हकों के लिए लड़ रहे हैं.. बूढ़े चिनार के साथ l ऐसे नेता का साथ हम बेशक छोड़ दें.. लेकिन ईश्वर हमेशा ऐसे जुझारू के साथ रहता है...... संजीव शर्मा तक मेरी शुभकामनाएं पहुंचे और मेरी यह अनुभूति भी कि वो एक ज़िम्मेदार मुखिया हैं.. और उन्होंने अपनी भूमिका को बड़ी ज़िम्मेदारी और हौसले के साथ निभाया है... मुझे संजीव शर्मा के अध्यक्ष होने पर गर्व है, मैं भी ऐसा ही बनना चाहता हूं । मुझे संजीव इकबाल साजिद साहब के इस शेर की तरह लगते हैं :- सूरज हूँ ज़िंदगी की रमक़ छोड़ जाऊँगा मैं डूब भी गया तो शफ़क़ छोड़ जाऊँगा





















