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कैमरे की कलम: "आईना तोड़ो, व्यवस्था बचाओ"

बिलासपुर में एक वीडियो वायरल हुआ। वीडियो में एक पुलिसकर्मी थाने के भीतर जमीन पर लेटा दिखाई देता है। आसपास कुछ शराब की बोतलें भी नजर आती हैं। वीडियो की सत्यता क्या है, उसमें दिख रहा दृश्य किस परिस्थिति का है, उसे किसने रिकॉर्ड किया और किसने वायरल किया—ये सब जांच का विषय हैं। होना भी चाहिए। किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले तथ्यों की पड़ताल आवश्यक है लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बाद जो सबसे दिलचस्प दृश्य सामने आया, वह वीडियो में नहीं बल्कि उसके बाद की प्रतिक्रिया में था।

जिले के पुलिस कप्तान ने कड़े शब्दों में कहा कि यदि कोई व्यक्ति लाइक, कमेंट्स और व्यूअरशिप बढ़ाने के लिए फर्जी वीडियो बनाएगा या बिना प्रमाणिकता के वायरल करेगा तो उसके खिलाफ अपराध दर्ज किया जाएगा। यह बात बिल्कुल उचित है। झूठ फैलाना, किसी की छवि खराब करना और सोशल मीडिया को अफवाहों का अखाड़ा बनाना किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं हो सकता। मगर समस्या यह है कि हमारे यहां अक्सर अपराध की परिभाषा घटना से नहीं, व्यक्ति से तय होती दिखाई देती है।  

इतिहास बताता है कि संस्थाएँ आईना तोड़कर नहीं, आईने में दिख रही खामियों को सुधारकर मजबूत होती हैं। क्योंकि अंततः किसी भी लोकतंत्र में सबसे बड़ा अपराध सच दिखाना नहीं, सच से आँख चुराना होता है।

यही कारण है कि इस मामले में सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं बन पाया कि वीडियो में क्या है, बल्कि यह बन गया कि वीडियो किसने बनाया। यानी अगर किसी थाने के भीतर कुछ असामान्य दिख रहा है तो उससे ज्यादा गंभीर विषय यह है कि किसी ने उसे रिकॉर्ड कैसे कर लिया। यह वही मानसिकता है जिसमें दीवार पर उभरी सीलन से ज्यादा गुस्सा उस आदमी पर आता है जिसने सीलन की तस्वीर खींच ली।

विडंबना यह है कि यही व्यवस्था वर्षों से जनता से अपील करती रही है कि कहीं अपराध दिखे, भ्रष्टाचार दिखे, अवैध वसूली दिखे, सार्वजनिक व्यवस्था का उल्लंघन दिखे तो वीडियो बनाइए, सबूत दीजिए, शिकायत कीजिए। लेकिन जैसे ही कैमरे का कोण व्यवस्था की ओर घूम जाता है, अचानक कैमरा संदिग्ध हो जाता है और रिकॉर्डिंग अपराध के करीब पहुंच जाती है। ऐसा लगता है मानो समस्या बीमारी नहीं, एक्स-रे मशीन हो। हमारे यहां कानून की एक बड़ी खूबी यह है कि वह सबके लिए समान बताया जाता है और उसकी सबसे बड़ी विडंबना भी यही है कि व्यवहार में वह सबके लिए समान दिखाई नहीं देता।

यदि कोई सामान्य नागरिक सार्वजनिक स्थान पर शराब के नशे में मिलता है तो उसके वीडियो सोशल मीडिया पर घंटों घूमते रहते हैं। लोग उसे नैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं, पुलिस उसे कानून का पाठ पढ़ाती है और समाज उसे संस्कारों का पाठ पढ़ाता है। लेकिन जब चर्चा में कोई सफेदपोश या वर्दीधारी आता है तो अचानक निजता, प्रतिष्ठा, गरिमा और प्रक्रिया जैसे शब्द शब्दकोश से निकलकर प्रेस कॉन्फ्रेंस की मेज पर सज जाते हैं।

ऐसा नहीं है कि पुलिसकर्मी को गरिमा का अधिकार नहीं है, बिल्कुल है। बल्कि उतना ही है जितना किसी आम नागरिक को है लेकिन प्रश्न यह है कि क्या यह अधिकार सभी को समान रूप से मिलता है? यदि हां, तो फिर आम आदमी की गरिमा की रक्षा के समय यही तीखापन अक्सर दिखाई क्यों नहीं देता? दरअसल समस्या वीडियो नहीं है। समस्या वह असहजता है जो वीडियो पैदा करता है। आईना हमेशा सुंदर चेहरा नहीं दिखाता। कभी-कभी वह चेहरे पर जमी धूल भी दिखाता है। और इतिहास गवाह है कि धूल साफ करने की तुलना में आईना तोड़ना हमेशा आसान काम रहा है।

पुलिस महकमा भी आखिर इसी समाज का हिस्सा है। वहां भी अच्छे लोग हैं, ईमानदार लोग हैं, कर्तव्यनिष्ठ लोग हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जहां शक्ति होती है, वहां जवाबदेही की आवश्यकता और बढ़ जाती है। क्योंकि जनता पुलिस को केवल एक कर्मचारी के रूप में नहीं देखती। वह उसे कानून के प्रतिनिधि के रूप में देखती है।

यही वजह है कि पुलिसकर्मी की छोटी गलती भी बड़ी खबर बन जाती है लेकिन यहां एक और रोचक प्रवृत्ति देखने को मिलती है। जब कोई नागरिक पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाता है तो उसे कानून समझाया जाता है। जब कोई पत्रकार सवाल उठाता है तो उसे जिम्मेदारी समझाई जाती है। जब कोई सामाजिक कार्यकर्ता सवाल उठाता है तो उसे प्रक्रिया समझाई जाती है। और जब सोशल मीडिया सवाल उठाता है तो उसे आईटी एक्ट समझाया जाता है। कुल मिलाकर हर सवाल पूछने वाले के लिए कोई न कोई धारा तैयार रहती है। सवालों के जवाब कभी-कभी तैयार नहीं होते। 

"लोकतंत्र में कैमरा अपराधी नहीं होता, वह केवल घटनाओं का दस्तावेज़ होता है। यदि कोई वीडियो फर्जी है तो उस पर कार्रवाई होना स्वाभाविक है"

यहां यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि फर्जी वीडियो बनाना अपराध है और होना भी चाहिए। किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा से खिलवाड़ की अनुमति नहीं दी जा सकती। लेकिन उसी सांस में यह भी उतना ही जरूरी है कि हर असुविधाजनक वीडियो को "फर्जी", "भ्रामक" या "वायरल गैंग" की श्रेणी में डाल देने की प्रवृत्ति से बचा जाए क्योंकि अगर हर असहज करने वाला तथ्य फर्जी घोषित कर दिया जाएगा तो फिर सत्य की पहचान कौन करेगा?

आज सोशल मीडिया का दौर है। यहां अफवाहें भी दौड़ती हैं और सच्चाइयां भी। चुनौती यह है कि दोनों के बीच फर्क किया जाए। लेकिन अक्सर ऐसा प्रतीत होता है कि व्यवस्था की प्राथमिकता फर्क करना नहीं, नियंत्रण स्थापित करना होती है। नियंत्रण हमेशा आकर्षक होता है। सवालों को नियंत्रित करो। वीडियो को नियंत्रित करो। सूचना को नियंत्रित करो। चर्चा को नियंत्रित करो और यदि संभव हो तो आईने को भी नियंत्रित कर लो। मगर लोकतंत्र का स्वभाव नियंत्रण नहीं, संवाद है। लोकतंत्र में संस्थाओं का सम्मान इसलिए नहीं होता कि वे शक्तिशाली हैं। उनका सम्मान इसलिए होता है क्योंकि वे आलोचना सहने की क्षमता रखती हैं। जिस दिन कोई संस्था आलोचना से डरने लगे, उस दिन उसकी ताकत पर नहीं, उसके आत्मविश्वास पर सवाल उठने लगते हैं।

विडंबना यह भी है कि हमारे यहां अक्सर जांच की दिशा भी बड़ी दिलचस्प होती है। कभी-कभी घटना से ज्यादा ऊर्जा इस बात में लगती है कि जानकारी बाहर कैसे आई। फाइल में क्या लिखा था, यह बाद की बात है; फाइल लीक किसने की, यह पहले जांचा जाता है। कमरे में क्या हुआ, यह बाद में देखा जाता है; कमरे का वीडियो किसने बनाया, यह पहले पूछा जाता है। मानो व्यवस्था का सबसे बड़ा संकट घटना नहीं, उसकी सार्वजनिक जानकारी हो।

बिलासपुर की यह घटना भी उसी व्यापक मानसिकता की एक झलक बन गई है। यहां बहस कानून और जवाबदेही के बीच संतुलन की होनी चाहिए थी। चर्चा इस बात पर होनी चाहिए थी कि यदि वीडियो गलत है तो उसे तथ्यात्मक रूप से गलत साबित किया जाए, और यदि उसमें कोई सच्चाई है तो उसे स्वीकार कर सुधार की प्रक्रिया शुरू की जाए लेकिन हमारे यहां अक्सर सुधार से पहले संदेश दिया जाता है। संदेश यह कि व्यवस्था को देखने का अधिकार सीमित है। संदेश यह कि सवाल पूछने से पहले सावधान रहिए। संदेश यह कि कैमरा उठाने से पहले सोचिए और धीरे-धीरे यह संदेश समाज के भीतर एक भय में बदलने लगता है। हालांकि इतिहास बताता है कि समाज कैमरों से नहीं बदलते, बल्कि उन कारणों को दूर करने से बदलते हैं जिनकी वजह से कैमरे उठते हैं। यदि संस्थाएं पारदर्शी हों तो वीडियो सनसनी नहीं बनते। यदि जवाबदेही मजबूत हो तो वायरल पोस्ट व्यवस्था के लिए खतरा नहीं बनते। यदि जनता का विश्वास बना रहे तो अफवाहें भी ज्यादा दूर तक नहीं जातीं। 

यदि हर असुविधाजनक वीडियो के जवाब में पहला सवाल यह पूछा जाए कि उसे बनाया किसने, तो संदेह पैदा होता है कि व्यवस्था की चिंता सच्चाई से अधिक उसके सार्वजनिक होने को लेकर है।

आखिर में सवाल केवल बिलासपुर का नहीं है। सवाल उस सोच का है जिसमें व्यक्ति देखकर अपराध की गंभीरता तय की जाती है। जहां वर्दी, पद और प्रभाव के अनुसार संवेदनशीलता का स्तर बदलता रहता है। जहां कभी-कभी कानून की किताब एक ही रहती है, लेकिन उसका वजन अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग महसूस होता है।

लोकतंत्र में पुलिस का सम्मान होना चाहिए, क्योंकि वह कानून की रक्षक है। लेकिन उसी लोकतंत्र में जनता के सवालों का भी सम्मान होना चाहिए, क्योंकि वही कानून की अंतिम मालिक है, इसलिए आवश्यकता वीडियो से डरने की नहीं, सच्चाई से सामना करने की है क्योंकि जिस समाज में आईना दिखाना अपराध और आईना छिपाना कर्तव्य बन जाए, वहां समस्या कैमरे में नहीं होती। समस्या चेहरे पर होती है और चेहरों की मरम्मत आईना तोड़कर नहीं, आत्मनिरीक्षण करके की जाती है। 

कैमरे की कलम: तिलचट्टों का गणतंत्र और सपनों की लीक होती हुई परीक्षा

देश में इन दिनों सबसे सुरक्षित चीज़ क्या है? न संविधान, न नौकरियाँ, न युवाओं के सपने। अगर कुछ सुरक्षित है तो वह है सरकारों का यह विश्वास कि जनता सब कुछ भूल जाएगी। कल देश की राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर में लाखों लोग उस आंदोलन से जुड़े जो सरकारों से सीधे सवाल पूछ रही है, देश के हालात और युवाओं के मन में सुलगते सैकड़ों सवालों के बीच शान्ति पूर्ण आंदोलन का आह्वान। आंदोलन में शामिल लोगों की भीड़ के बीच कहीं जय भीम के नारे, कहीं आरएसएस के खिलाफ हल्ला तो किसी कोने से आजादी के लिए उठता शोर। ये शोर कॉकरोच जनता पार्टी के मंच से उठा जिसे देश ने देखा, बिना डरे बिना हल्ला मचाये।  

एक समय था जब तिलचट्टे रसोई में मिलते थे। अब वे राजनीति में मिल रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि रसोई वाले तिलचट्टे देखकर लोग चीखते थे, राजनीतिक तिलचट्टों को देखकर लोग सेल्फी लेते हैं। और देश की हालत ऐसी हो चुकी है कि अब युवा यह तय नहीं कर पा रहा कि वह नौकरी ढूंढे, परीक्षा की तैयारी करे, या किसी नए आंदोलन का सदस्य बन जाए।

भारत आज दुनिया की सबसे युवा आबादी वाला देश कहलाता है। यह अलग बात है कि इस युवा आबादी का बड़ा हिस्सा रोजगार कार्यालयों, कोचिंग संस्थानों और सोशल मीडिया के बीच पेंडुलम की तरह झूल रहा है। सरकारें हर साल करोड़ों नौकरियों का सपना दिखाती हैं और बदले में करोड़ों युवाओं को "अगले प्रयास के लिए शुभकामनाएँ" का संदेश मिलता है। 

पेपर लीक अब कोई दुर्घटना नहीं रह गया है, यह तो हमारी परीक्षा व्यवस्था का आधिकारिक पाठ्यक्रम बन चुका है। पहले छात्र प्रश्नपत्र खोलते थे, अब प्रश्नपत्र पहले से ही छात्रों के मोबाइल खोल लेते हैं। परीक्षा केंद्रों से ज्यादा चर्चा व्हाट्सऐप ग्रुपों की होती है। कोचिंग संस्थानों से ज्यादा भरोसा टेलीग्राम चैनलों पर किया जाता है। और सरकारें हर बार ऐसे चौंक जाती हैं जैसे पहली बार उन्हें पता चला हो कि पानी गीला होता है।

देश का बेरोज़गार युवा आज सबसे बड़ा व्यंग्य बन चुका है। वह सुबह राष्ट्रनिर्माण के भाषण सुनता है, दोपहर में भर्ती परीक्षा का फार्म भरता है, शाम को परीक्षा स्थगित होने की खबर पढ़ता है और रात को पेपर लीक का वीडियो देखता है। फिर उससे कहा जाता है कि धैर्य रखो, देश आगे बढ़ रहा है। देश आगे बढ़ भी रहा है—बस समस्या यह है कि युवा पीछे छूट रहा है।

ऐसे माहौल में अगर कोई "कॉकरोच जनता पार्टी" पैदा होती है तो उसमें आश्चर्य कैसा? असली सवाल यह नहीं है कि कॉकरोच कौन हैं। असली सवाल यह है कि देश के लाखों पढ़े-लिखे नौजवान खुद को तिलचट्टों से जोड़ने में अपमान क्यों महसूस नहीं कर रहे? शायद इसलिए कि उन्हें लगने लगा है कि इस व्यवस्था में उनकी हैसियत भी किसी दीवार की दरार में छिपे जीव से ज्यादा नहीं है।

राजनीतिक दल आज कॉकरोचों की वंशावली खोज रहे हैं। कोई उन्हें सत्ता का एजेंट बता रहा है, कोई विपक्ष की साजिश। लेकिन कोई यह नहीं पूछ रहा कि आखिर वह जमीन क्यों तैयार हुई जिसमें ऐसे आंदोलन अंकुरित हो रहे हैं? जब भर्ती परीक्षाएँ मज़ाक बन जाएँ, डिग्रियाँ सजावट का सामान बन जाएँ और मेहनत का इनाम पेपर लीक हो जाए, तब राजनीति के पुराने ब्रांडों पर भरोसा टूटना स्वाभाविक है।

देश में आज हर समस्या का समाधान नैरेटिव से खोजा जा रहा है। बेरोज़गारी है तो राष्ट्रवाद की चर्चा कर लो। पेपर लीक है तो किसी और मुद्दे पर बहस करा दो। महँगाई है तो इतिहास की लड़ाई छेड़ दो। लेकिन पेट इतिहास से नहीं भरता, नौकरी नैरेटिव से नहीं मिलती और भविष्य भाषणों से नहीं बनता।

विडंबना यह है कि आज का युवा सरकार से कम, सिस्टम से ज्यादा नाराज़ है। उसे यह भरोसा नहीं रहा कि उसकी मेहनत और प्रतिभा का सम्मान होगा। उसे लगता है कि परीक्षा से पहले प्रश्नपत्र बिक सकता है, भर्ती से पहले सीटें तय हो सकती हैं और इंटरव्यू से पहले परिणाम लिखा जा सकता है।

ऐसे समय में कॉकरोच सड़क पर उतर रहे हैं। वे सफल होंगे या असफल, ईमानदार होंगे या अवसरवादी, यह भविष्य बताएगा। लेकिन उनकी लोकप्रियता एक चेतावनी है। यह उस पीढ़ी की बेचैनी का संकेत है जो वर्षों से सुन रही है कि वही देश का भविष्य है, लेकिन वर्तमान में उसके हिस्से सिर्फ प्रतीक्षा, परीक्षा और निराशा आई है और अगर व्यवस्था ने इस चेतावनी को भी मज़ाक समझ लिया, तो आने वाले समय में तिलचट्टे ही नहीं, पूरी दीवारें बोलने लगेंगी।

कैमरे की कलम: सत्ता का बैज और गुंडागर्दी का लाइसेंस

छत्तीसगढ़ के सीतापुर में जो हुआ, वह किसी एक विधायक, एक अफसर या एक जिले का मामला नहीं है। यह उस राजनीतिक बीमारी का लक्षण है जो लोकतंत्र के शरीर में धीरे-धीरे फैलती रही है। बीमारी का नाम है—सत्ता का अहंकार। 

एक सत्तारूढ़ दल का विधायक अपने समर्थकों के साथ सार्वजनिक स्थान पर एक नायब तहसीलदार से उलझता है। आरोप है कि बात इतनी बढ़ती है कि हाथापाई बाद में मारपीट तक पहुंच जाती है। वहां मौजूद वरिष्ठ अधिकारी रोकने की कोशिश करते हैं, लेकिन विधायक का गुस्सा, या कहिए सत्ता का नशा, किसी प्रशासनिक मर्यादा को स्वीकार करने को तैयार नहीं दिखता। यह दृश्य किसी व्यक्ति विशेष के क्रोध का नहीं, बल्कि उस मानसिकता का प्रतीक है जिसमें निर्वाचित प्रतिनिधि स्वयं को कानून का विषय नहीं, कानून का स्वामी समझने लगते हैं। 

लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि जनता की शक्ति का प्रतीक होता है, लेकिन जब वही जनप्रतिनिधि स्वयं को कानून से ऊपर समझने लगे, तब लोकतंत्र की आत्मा घायल होती है। सीतापुर के विधायक रामकुमार टोप्पो से जुड़ा हालिया विवाद इसी चिंता को सामने लाता है। मामले की सच्चाई क्या है, कौन दोषी है और किसकी बात सही है, इसका अंतिम निर्णय अदालतें और जांच एजेंसियां करेंगी। लेकिन जो दृश्य जनता ने देखा, वह अपने आप में कई गंभीर सवाल छोड़ गया है।

आरोप है कि एक सरकारी अधिकारी के साथ नेताजी के साथ साथ समर्थकों ने मारपीट की । आरोप यह भी है कि विवाद की जड़ एक ऐसे व्यक्ति की पैरोल से जुड़ी थी जिस पर हत्या जैसे गंभीर अपराध का आरोप है। हत्या जैसे संगीन अपराध में जेल की दीवारों में फंसा व्यक्ति रिश्ते में विधायक के जीजा हैं जिनकी पेरोल संबंधी कागजात को लेकर नेताजी की चचेरी बहन से नायब तहसीलदार की कहासुनी हुई । इन आरोपों की सत्यता जांच का विषय है, लेकिन इससे भी बड़ा प्रश्न उस राजनीतिक संस्कृति का है जो सत्ता को जवाबदेही नहीं, बल्कि विशेषाधिकार समझने लगती है। सवाल यह नहीं है कि अफसर सही था या गलत। सवाल यह है कि फैसला करने का अधिकार किसे है? लोकतंत्र में कानून को या सत्ता के मद में चूर किसी जनप्रतिनिधि को?

सबसे विचित्र और चिंताजनक दृश्य तब सामने आया जब विधायक ने स्वयं को गिरफ्तारी के लिए प्रस्तुत करने की बात कही। लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह एक सामान्य कानूनी प्रक्रिया हो सकती थी। लेकिन यह प्रक्रिया अचानक शक्ति प्रदर्शन के मंच में बदल गई। समर्थकों की भीड़, राष्ट्रीय राजमार्ग पर जाम, नारेबाजी और भावनात्मक उन्माद के बीच गिरफ्तारी का प्रसंग किसी न्यायिक प्रक्रिया से अधिक राजनीतिक आयोजन जैसा प्रतीत हुआ।

विडंबना यह है कि "वंदे मातरम्" और "जय श्री राम" जैसे राष्ट्रभक्ति और आस्था के उद्घोष भी इस शक्ति प्रदर्शन का हिस्सा बने। ये नारे करोड़ों लोगों की भावनाओं से जुड़े हैं। इनका स्थान राष्ट्रीय गौरव और सांस्कृतिक चेतना के उत्सव में है, न कि किसी व्यक्ति विशेष के कानूनी संकट को जनभावनाओं की ढाल बनाने में। जब ऐसे पवित्र प्रतीकों को राजनीतिक या व्यक्तिगत बचाव के उपकरण में बदला जाता है, तब नुकसान केवल राजनीति का नहीं, सामाजिक विश्वास का भी होता है। 

सवाल यह भी है कि यदि कोई जनप्रतिनिधि स्वयं को निर्दोष मानता है तो उसे कानून की प्रक्रिया का सम्मान करते हुए जांच में सहयोग करना चाहिए। निर्दोषता का सबसे मजबूत प्रमाण अदालत होती है, सड़क पर जुटी भीड़ नहीं। लोकतंत्र में न्यायालय का फैसला भीड़ के आकार से तय नहीं होता। लेकिन दुर्भाग्य से हमारे राजनीतिक जीवन में भीड़ को नैतिक वैधता का प्रमाणपत्र मानने की प्रवृत्ति लगातार बढ़ती जा रही है। यह बीमारी किसी एक दल तक सीमित नहीं है। भाजपा हो, कांग्रेस हो या कोई क्षेत्रीय दल—सत्ता मिलते ही बहुत से नेताओं के पांव जमीन छोड़ देते हैं। लोकतंत्र उन्हें जनता का सेवक बनाता है, लेकिन वे स्वयं को इलाके का शासक समझने लगते हैं। सांसद-विधायक बनने के बाद कुछ लोगों का व्यवहार ऐसा हो जाता है मानो जनता ने उन्हें संविधान से ऊपर बैठाने का जनादेश दिया हो।

देश भर में ऐसे अनगिनत वीडियो मौजूद हैं जिनमें नेता अफसरों को फोन पर गालियां देते सुनाई देते हैं। कहीं धमकियां हैं, कहीं तबादले की चेतावनी है, कहीं नौकरी खाने की भाषा है। मोबाइल कैमरों ने लोकतंत्र का एक नया सच उजागर किया है—जनप्रतिनिधियों के चेहरे पर चढ़ा सत्ता का मुखौटा अब रिकॉर्ड होने लगा है। पहले ऐसे किस्से बंद कमरों में दफन हो जाते थे। अब वे वायरल होते हैं। जनता देखती है कि मंचों पर संविधान की दुहाई देने वाले लोग व्यवहार में किस हद तक सामंती मानसिकता से भरे हुए हैं।

सत्तारूढ़ दलों के लिए ऐसी घटनाएं और अधिक शर्मनाक होती हैं। विपक्षी दल का नेता हंगामा करे तो सरकार कार्रवाई कर सकती है, पुलिस सक्रिय हो सकती है, कानून अपना रास्ता ले सकता है। लेकिन जब सत्ताधारी दल का विधायक ही आरोपों के घेरे में हो, तब सरकार एक असहज दुविधा में फंस जाती है। कार्रवाई करे तो अपनी ही राजनीतिक बिरादरी नाराज होती है, कार्रवाई न करे तो कानून के राज पर सवाल उठते हैं और यहीं किसी सरकार की असली परीक्षा होती है।

यदि सरकार अपने विधायक के खिलाफ भी वही कठोरता दिखा सके जो वह विपक्ष के नेताओं के खिलाफ दिखाती है, तभी "कानून का राज" एक विश्वसनीय अवधारणा बनता है। अन्यथा कानून केवल कमजोर लोगों के लिए और शक्ति केवल सत्ताधारियों के लिए बच जाती है।

सीतापुर की घटना इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि एक विधायक और एक अफसर के बीच विवाद हुआ। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसने लोकतंत्र के सामने खड़ा वह पुराना सवाल फिर जीवित कर दिया है—क्या जनप्रतिनिधि कानून के अधीन हैं, या कानून जनप्रतिनिधियों के अधीन है?

लोकतंत्र की ताकत चुनाव जीतने में नहीं, चुनाव जीतने के बाद भी कानून के सामने सिर झुकाने में होती है। लेकिन जब जनादेश को कुछ लोग दंडमुक्ति का प्रमाणपत्र समझने लगते हैं, तब लोकतंत्र का चरित्र बदलने लगता है। तब जनता का प्रतिनिधि, जनता का सेवक नहीं रह जाता; वह सत्ता का स्थानीय ठेकेदार बन जाता है और किसी भी लोकतंत्र के लिए इससे अधिक खतरनाक स्थिति दूसरी नहीं हो सकती क्योंकि जिस दिन जनता यह मान ले कि कानून का पालन केवल आम आदमी के लिए है और सत्ता में बैठे लोगों के लिए नहीं, उसी दिन लोकतंत्र की नैतिक नींव में पहली बड़ी दरार पड़ जाती है। सीतापुर की घटना उसी दरार की एक तेज़ और चिंताजनक आवाज़ है। 

कैमरे की कलम: 'सरकार के कंधे कमजोर, बहू की पीठ मजबूत'

“डिजिटल इंडिया” का सपना अब गांव-गांव तक पहुंच चुका है। सरकारी विज्ञापनों में बुजुर्गों के चेहरे पर मुस्कान है, मोबाइल पर अंगूठा लगाते ही पेंशन खाते में आ जाती है, और ‘घर-पहुंच सेवा’ का दावा यह भरोसा देता है कि अब सरकार गरीब के दरवाजे तक उतर आई है लेकिन छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के मैनपाट से आई एक तस्वीर ने इन तमाम दावों की चमक को उतारकर धरती की धूल में पटक दिया है।

राज्य में सुशासन तिहार के बीच एक बहू अपनी 90 वर्षीय बूढ़ी सास को पीठ पर लादकर पाँच किलोमीटर पैदल चल रही है। रास्ते में नदी-नाले हैं, पथरीली चढ़ाइयां हैं, जंगल है, थकान है, बेबसी है। यह कोई तीर्थयात्रा नहीं थी, न किसी अस्पताल की आपात स्थिति। यह यात्रा सिर्फ 500 रुपये की वृद्धावस्था पेंशन के लिए थी। कल्पना कीजिए, जिस देश में करोड़ों रुपये के डिजिटल ट्रांजैक्शन सेकंडों में हो रहे हों, वहां एक वृद्ध महिला को अपने ही हक के पाँच सौ रुपये पाने के लिए इंसानी बोझ बन जाना पड़े — इससे बड़ा व्यंग्य लोकतंत्र पर और क्या होगा?

सरकार कहती है कि अब सबकुछ “ऑनलाइन” है। मगर सवाल यह है कि क्या इंसानियत भी ऑनलाइन हो चुकी है? क्या संवेदनाएं भी अब सर्वर से चलती हैं? और क्या गरीब की पीड़ा भी अब “केवाईसी अपडेट नहीं” के संदेश में बदल दी गई है? यह घटना सिर्फ एक परिवार की गरीबी नहीं दिखाती, बल्कि उस व्यवस्था का चेहरा उजागर करती है जो योजनाओं की फाइलों में बहुत दयालु दिखती है, लेकिन जमीन पर पहुंचते-पहुंचते पत्थर हो जाती है।

बहू सुखमनिया रोते हुए कहती है कि पहले बैंक मित्र घर आकर पैसे दे जाता था। फिर अचानक उसने आना बंद कर दिया। किसी ने कारण नहीं बताया। पेंशन रुक गई। केवाईसी का बहाना सामने आ गया। अब सोचिए, जंगलपारा जैसे दूरस्थ गांव में रहने वाली एक अशिक्षित महिला को कौन समझाएगा कि केवाईसी क्या होता है?
उसके लिए तो बैंक ही एक ऐसा भवन है, जहां जाने भर से डर लगता है। वहां की भाषा अलग, प्रक्रिया अलग, चेहरे अलग। वह केवल इतना जानती है कि सरकार ने बुजुर्गों के लिए कुछ पैसे तय किए हैं और वही पैसे अब नहीं मिल रहे।

व्यवस्था का सबसे क्रूर चेहरा यही होता है — जब वह अपनी असफलताओं को नियमों के पीछे छिपा देती है। बैंक प्रबंधन ने सफाई दी है कि “अगर सूचना दे दी जाती, तो बैंक मित्र घर पहुंच जाता।” वाह! यानी अब गरीब को यह भी पता होना चाहिए कि सुविधा मांगने की प्रक्रिया क्या है, जो महिला अपने गांव से बाहर की दुनिया नहीं जानती, उससे यह उम्मीद की जा रही है कि वह बैंकिंग नियमों की जानकारी रखे, आवेदन करे, सूचना दे, अनुरोध करे और फिर इंतजार करे। ये कड़वी सच्चाई है कि व्यवस्था ने गरीब को नागरिक नहीं, फाइल बना दिया है।

आज गांवों में सबसे बड़ा संकट गरीबी नहीं, बल्कि “सूचना की गरीबी” है। योजनाएं हैं, लेकिन जानकारी नहीं। अधिकार हैं, लेकिन पहुंच नहीं। सरकारें मान बैठी हैं कि योजना घोषित कर देने भर से उसका लाभ लोगों तक पहुंच जाता है। असलियत यह है कि योजना और जरूरतमंद के बीच सबसे लंबा रास्ता “व्यवस्था” का होता है।

विडंबना देखिए, देश चांद पर पहुंच गया, लेकिन सरगुजा की एक बूढ़ी महिला अपने बैंक तक नहीं पहुंच पाई। सरकारी भाषणों में अक्सर कहा जाता है कि “अब कोई पीछे नहीं छूटेगा, लेकिन हकीकत यह है कि सबसे पहले वही लोग छूट जाते हैं, जिनके नाम पर योजनाएं बनती हैं — गरीब, आदिवासी, बुजुर्ग, विधवा और अशिक्षित।

दरअसल हमारी व्यवस्था में गरीब को सुविधा नहीं, प्रमाण देना पड़ता है। उसे हर बार साबित करना पड़ता है कि वह जिंदा है, गरीब है, पात्र है, और मदद के लायक है। कितनी विचित्र बात है कि 90 वर्षीय सोमारी बाई जो चलने-फिरने में असमर्थ है उसे यह साबित करने बैंक जाना पड़ रहा है कि वह अब भी जीवित है। मानो सरकार कह रही हो — “जब तक तुम खुद चलकर हमारे सामने नहीं आओगी, हमें यकीन नहीं होगा कि तुम्हें पेंशन चाहिए।” यह संवेदनहीनता केवल प्रशासनिक नहीं, नैतिक भी है।

आज गांवों में बैंक मित्र, पंचायत सचिव, पटवारी, राशन दुकानदार — यही सरकार का चेहरा हैं। लेकिन अक्सर यही चेहरे सबसे अधिक निराश करते हैं। क्योंकि व्यवस्था की निगरानी ऊपर से होती है, मगर पीड़ा नीचे पैदा होती है और नीचे पैदा हुई पीड़ा अक्सर ऊपर तक पहुंचती ही नहीं। यहां सवाल केवल एक बैंक मित्र की लापरवाही का नहीं है। सवाल उस सोच का है, जिसमें गरीब की तकलीफ को “सामान्य” मान लिया गया है। अगर किसी महानगर में किसी बुजुर्ग को बैंक में लाइन में खड़ा होना पड़े, तो टीवी डिबेट शुरू हो जाती है। लेकिन जंगलपारा की एक महिला अपनी सास को पीठ पर ढोकर बैंक ले जाए, तो उसे “ग्रामीण कठिनाई” कहकर सामान्य बना दिया जाता है। गरीबी इस देश में अब संवेदना नहीं जगाती, वह सिर्फ आंकड़ा बनकर रह गई है।

सरकारें योजनाओं के नाम बदलने में तेज हैं। हर नई योजना के साथ नया नारा, नया लोगो, नया प्रचार आता है। लेकिन जिन लोगों के लिए ये योजनाएं बनाई जाती हैं, उनकी जिंदगी में कुछ नहीं बदलता। उनके हिस्से में वही टूटी सड़कें, वही अधूरी जानकारी, वही बंद दफ्तर और वही इंतजार आता है। सबसे दुखद बात यह है कि इस पूरी घटना में किसी को अपराधबोध नहीं है।

बैंक कह रहा है — “हमें बताया नहीं गया।”  प्रशासन कहेगा — “मामला संज्ञान में आया है।” नेता कहेंगे — “जांच होगी।” और फिर कुछ दिनों बाद यह खबर किसी नई वायरल घटना के नीचे दब जाएगी लेकिन उस बूढ़ी महिला की पीठ का दर्द, उस बहू की थकान और उनकी बेबसी किसी सरकारी रिपोर्ट में दर्ज नहीं होगी। हमारे लोकतंत्र की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि यहां गरीब की तकलीफ खबर बनती है, समाधान नहीं। अगर सचमुच सरकार “घर-पहुंच सेवा” देना चाहती है, तो उसे पहले यह समझना होगा कि सुविधा का मतलब केवल तकनीक नहीं होता।

एक बुजुर्ग महिला को पेंशन देने के लिए बैंक मित्र का घर तक जाना “कृपा” नहीं, उसकी जिम्मेदारी है और यदि वह जिम्मेदारी निभाई नहीं गई, तो जवाबदेही तय होनी चाहिए। आज जरूरत इस बात की नहीं है कि इस घटना पर दुख जताया जाए। जरूरत इस बात की है कि व्यवस्था अपने भीतर झांके, क्योंकि यह सिर्फ सरगुजा की कहानी नहीं है। यह देश के हजारों गांवों की कहानी है, जहां योजनाएं कागज पर दौड़ती हैं और लोग पथरीले रास्तों पर।

हमें यह तय करना होगा कि “डिजिटल इंडिया” का मतलब क्या है। क्या यह सिर्फ शहरों के लिए तेज इंटरनेट है?
या फिर उस बुजुर्ग महिला तक सम्मानपूर्वक पेंशन पहुंचाना भी इसका हिस्सा है? किसी भी सभ्य समाज की पहचान इस बात से नहीं होती कि उसके शहर कितने चमकदार हैं। उसकी पहचान इससे होती है कि वह अपने सबसे कमजोर नागरिक के साथ कैसा व्यवहार करता है। सरगुजा की यह तस्वीर हमें आईना दिखाती है। उस आईने में सरकार भी है, बैंक भी, प्रशासन भी और हम सब भी, क्योंकि हम सब धीरे-धीरे ऐसे समाज में बदलते जा रहे हैं, जहां गरीब की पीड़ा देखकर कुछ क्षण दुख तो होता है, लेकिन व्यवस्था बदलने की बेचैनी नहीं होती। शायद यही सबसे बड़ा खतरा है और अंत में, उस बहू की पीठ पर बैठी बूढ़ी सासू मां सिर्फ अपनी पेंशन लेने नहीं जा रही थी। वह इस देश की विकास यात्रा, सुशासन तिहार का सच ढो रही थी। एक ऐसा सच, जो बताता है कि सरकार अभी भी गरीब के घर तक नहीं पहुंची है। दावे कुछ भी हों लेकिन हकीकत ये है कि सरकार आज भी गरीब की पीठ पर लदी हुई चल रही है।

कैमरे की कलम: देशभक्ति अब पेट्रोल पंप पर मापी जाएगी !


देश एक बार फिर संकट में है। यह जानकारी हमें किसी अर्थशास्त्री, रणनीतिक विशेषज्ञ या संसद की बहस से नहीं मिली, बल्कि सीधे उस अपील से मिली जिसमें देशवासियों से कहा गया कि पेट्रोल बचाइए, डीजल कम खर्च कीजिए, विदेश यात्रा रोक दीजिए और फिलहाल सोना खरीदने का विचार त्याग दीजिए। यानी अब देशभक्ति का नया पैमाना तय हो चुका है—जिसने बाइक कम चलाई, वही सच्चा राष्ट्रभक्त; जिसने दुबई की टिकट कैंसिल की, वही असली देशसेवक; और जिसने पत्नी को सोने का हार नहीं दिलाया, वही आधुनिक बलिदानी नागरिक।

भारत बड़ा अद्भुत देश है। यहाँ हर संकट का समाधान अंततः आम आदमी की जेब से ही निकलता है। सरकारें योजनाएँ बनाती हैं, भाषण देती हैं, नारे गढ़ती हैं और अंत में जनता से कहती हैं—"थोड़ा और त्याग कर लीजिए, देश मुश्किल में है।" जनता भी वर्षों से इस संवाद की अभ्यस्त हो चुकी है। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले त्याग स्वतंत्रता के लिए होता था, अब पेट्रोल की कीमतों और विदेशी मुद्रा भंडार के लिए होने लगा है।

दरअसल, यह संकट केवल आर्थिक नहीं, मानसिक भी है। हम एक ऐसे समाज में बदल चुके हैं जहाँ दिखावा राष्ट्रीय चरित्र बन चुका है। घर में राशन कम हो सकता है, लेकिन एसयूवी गाड़ी चमचमाती रहनी चाहिए। मोहल्ले में पानी की समस्या हो सकती है, लेकिन इंस्टाग्राम पर विदेश यात्रा की तस्वीरें जरूरी हैं। शादी में कर्ज लेकर सोना खरीदना अब सामाजिक प्रतिष्ठा का हिस्सा है। ऐसे समाज से जब अचानक कहा जाता है कि “संयम रखिए”, तो यह वैसा ही है जैसे किसी बच्चे से मिठाई की दुकान के सामने उपवास रखने को कहा जाए।

पेट्रोल बचाने की अपील सुनकर सबसे अधिक दुख शायद उन लोगों को हुआ होगा जिन्होंने दो किलोमीटर दूर जिम जाने के लिए भी कार खरीद रखी है। भारत में अब पैदल चलना स्वास्थ्य का नहीं, गरीबी का प्रतीक माना जाने लगा है। अगर कोई आदमी बाजार तक पैदल चला जाए, तो लोग पूछते हैं—"गाड़ी खराब हो गई क्या?" ऐसे दौर में ईंधन बचत का संदेश केवल आर्थिक सलाह नहीं, सामाजिक क्रांति जैसा लगता है।

विडंबना देखिए, एक तरफ विज्ञापनों में नई-नई कारें खरीदने को सफलता का प्रतीक बताया जाता है, दूसरी तरफ नागरिकों से कहा जाता है कि पेट्रोल बचाइए। यानी पहले उपभोग को जीवन का लक्ष्य बनाइए, फिर संकट आने पर त्याग को राष्ट्रधर्म घोषित कर दीजिए। यह ठीक वैसा ही है जैसे पहले किसी को मिठाइयों की थाली परोस दी जाए और बाद में डायबिटीज़ के लिए उसे ही जिम्मेदार ठहरा दिया जाए।

असल प्रश्न यह है कि क्या केवल जनता के संयम से देश आर्थिक संकटों से उबर जाएगा? अगर ऐसा होता, तो भारत अब तक दुनिया की सबसे मजबूत अर्थव्यवस्था बन चुका होता। यहाँ आम आदमी पहले ही टैक्स, महंगाई, बेरोजगारी और बढ़ते खर्चों के बीच अपनी इच्छाओं का गला घोंटकर जी रहा है। मध्यम वर्ग की स्थिति तो ऐसी है कि वह पेट्रोल भरवाते समय मीटर नहीं, अपनी धड़कनें देखता है।

आज हालत यह है कि आदमी बाइक की टंकी फुल कराने से पहले बैंक बैलेंस चेक करता है। पेट्रोल पंप अब केवल ईंधन भरवाने की जगह नहीं, मानसिक साहस की परीक्षा केंद्र बन चुके हैं। कर्मचारी पूछता है—"कितने का डालूँ?" और ग्राहक मन ही मन देश की अर्थव्यवस्था, अपनी सैलरी और महीने के बाकी खर्चों का गणित लगाने लगता है।

लेकिन संकट केवल तेल का नहीं है। विदेश यात्राओं पर रोक की अपील भी कम दिलचस्प नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में विदेशी यात्रा भारतीय मध्यवर्ग के लिए नई सामाजिक प्रतिष्ठा बन चुकी है। अब लोग घूमने कम, सोशल मीडिया पर साबित करने ज्यादा जाते हैं कि वे “ग्लोबल” हो चुके हैं। बैंक लोन लेकर यूरोप घूम आना आधुनिक सफलता का नया प्रमाणपत्र है। ऐसे में जब सरकार कहती है कि विदेश यात्रा टाल दीजिए, तो यह सीधे भारतीय इंस्टाग्राम संस्कृति पर हमला प्रतीत होता है।

हालाँकि, इसमें विडंबना भी कम नहीं है। जिस देश में लाखों युवा रोजगार और बेहतर भविष्य के लिए विदेश जाने का सपना देख रहे हों, वहाँ विदेशी मुद्रा बचाने के नाम पर विदेश यात्राएँ रोकने की अपील एक अजीब विरोधाभास पैदा करती है। एक तरफ हम वैश्विक शक्ति बनने के सपने देखते हैं, दूसरी तरफ नागरिकों से कहते हैं कि फिलहाल दुनिया देखने मत जाइए।

अब बात सोने की। भारत में सोना केवल धातु नहीं, भावनात्मक धर्म है। यहाँ बेटी के जन्म के साथ ही परिवार सोना जोड़ना शुरू कर देता है। शादी में रिश्तेदार दूल्हे से कम, सोने के सेट से ज्यादा प्रभावित होते हैं। भारतीय परिवारों के लिए बैंक बैलेंस से अधिक भरोसेमंद चीज अगर कोई है, तो वह अलमारी के लॉकर में रखा सोना है। ऐसे समाज से कहना कि “सोना मत खरीदिए”, लगभग वैसा ही है जैसे क्रिकेट प्रेमियों से कहना कि विश्वकप के दौरान टीवी मत देखिए।

लेकिन सच यह भी है कि भारत हर वर्ष अरबों डॉलर का सोना आयात करता है। विदेशी मुद्रा का बड़ा हिस्सा इसी चमकती धातु में दफन हो जाता है। दुखद बात यह है कि हम उत्पादन, अनुसंधान और उद्योग में निवेश करने से अधिक संतोष निष्क्रिय सोना खरीदने में महसूस करते हैं। यानी अर्थव्यवस्था को गति देने के बजाय हम अपनी बचत तिजोरियों में बंद कर देते हैं और फिर शिकायत करते हैं कि रोजगार क्यों नहीं बढ़ रहे।

हालाँकि, केवल जनता को दोष देना आसान रास्ता है। असली सवाल यह भी है कि क्या शासन और व्यवस्था खुद उतनी ही मितव्ययी है जितनी अपेक्षा जनता से की जा रही है? क्या सरकारी फिजूलखर्ची रुकी? क्या राजनीतिक रैलियों, विज्ञापनों और दिखावटी आयोजनों पर खर्च कम हुआ? क्या सत्ता प्रतिष्ठान ने अपने वैभव में कटौती की? क्योंकि त्याग का उपदेश तभी प्रभावी लगता है जब नेतृत्व स्वयं उदाहरण प्रस्तुत करे।

भारत में समस्या यह है कि त्याग हमेशा नीचे वालों से माँगा जाता है। ऊपर वालों के लिए “राष्ट्रीय हित” अक्सर वातानुकूलित सभागारों में दिया गया भाषण बनकर रह जाता है। आम आदमी से कहा जाता है कि वह पेट्रोल बचाए, लेकिन वीआईपी काफिले पूरे शहर का ट्रैफिक रोककर दर्जनों गाड़ियों के साथ निकलते रहते हैं। जनता से कहा जाता है कि खर्च कम करें, लेकिन सत्ता की चमक-दमक में कोई कमी दिखाई नहीं देती। यही विरोधाभास नागरिकों के भीतर अविश्वास पैदा करता है।

फिर भी, यह भी सच है कि संकट वास्तविक है। दुनिया अस्थिर दौर से गुजर रही है। युद्ध, वैश्विक मंदी, बढ़ती महंगाई और ऊर्जा संकट का असर भारत पर भी पड़ रहा है। ऐसे समय में यदि नागरिक जिम्मेदारी नहीं दिखाएँगे, तो स्थिति और कठिन हो सकती है। लेकिन जिम्मेदारी केवल जनता की नहीं, शासन की भी होनी चाहिए। देशभक्ति का अर्थ केवल जनता से त्याग करवाना नहीं, बल्कि संसाधनों के ईमानदार उपयोग का भरोसा देना भी है।

आज जरूरत केवल पेट्रोल बचाने की नहीं, बल्कि उस मानसिकता को बदलने की है जिसने उपभोग को ही विकास मान लिया है। हम जितना कमाते नहीं, उससे ज्यादा दिखाने की कोशिश करते हैं। हमारी अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा दिखावे की संस्कृति में फँस चुका है। बड़ी गाड़ी, बड़ा मोबाइल, विदेशी छुट्टियाँ और भारी-भरकम शादियाँ अब सामाजिक सम्मान का पैमाना बन चुकी हैं। ऐसे समाज में आर्थिक संकट केवल बाजार से नहीं, मानसिकता से पैदा होता है।

सवाल यह भी है कि क्या हम हर बार संकट आने पर ही जागेंगे? क्या ऊर्जा बचत केवल आपातकालीन अपील का विषय रहेगी? क्या आत्मनिर्भरता केवल भाषणों का शब्द बनी रहेगी? यदि देश वास्तव में मजबूत बनना चाहता है, तो नागरिकों और सरकार दोनों को उपभोग की अंधी दौड़ से बाहर निकलना होगा।

देशभक्ति का सबसे आसान तरीका सोशल मीडिया पर झंडा लगाना है, लेकिन सबसे कठिन तरीका है अपने व्यवहार में अनुशासन लाना। कम ईंधन खर्च करना, स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देना, अनावश्यक दिखावे से बचना और आर्थिक संयम अपनाना—ये बातें सुनने में साधारण लगती हैं, लेकिन किसी भी राष्ट्र की वास्तविक ताकत इन्हीं से बनती है।

लेकिन भारत का दुर्भाग्य यह है कि यहाँ हर गंभीर बात भी अंततः नारे में बदल जाती है। कुछ दिन लोग पेट्रोल बचाने की बात करेंगे, फिर वही ट्रैफिक जाम, वही दिखावा, वही फिजूलखर्ची लौट आएगी। संकट बीत जाएगा, लेकिन आदतें नहीं बदलेंगी। हम फिर किसी अगले संकट का इंतजार करेंगे, जब हमें दोबारा बताया जाएगा कि देश कठिन दौर में है और अब त्याग की जरूरत है।

दरअसल, यह समय केवल आर्थिक आत्मनिरीक्षण का नहीं, सामाजिक आत्मचिंतन का भी है। हमें तय करना होगा कि हम जिम्मेदार नागरिक बनना चाहते हैं या केवल उपभोक्ता। क्योंकि उपभोक्ता केवल खरीदता है, जबकि नागरिक भविष्य बचाता है।

आज देश को भाषणों से अधिक ईमानदार व्यवहार की जरूरत है। जनता को भी समझना होगा कि संसाधन असीमित नहीं हैं, और सरकार को भी यह साबित करना होगा कि जनता का त्याग केवल आंकड़ों में नहीं, राष्ट्रीय हित में बदल रहा है। वरना वह दिन दूर नहीं जब देशभक्ति की अगली परीक्षा बिजली, पानी और रसोई गैस की बचत से आगे बढ़कर सांस लेने की सीमा तय करने तक पहुँच जाएगी।

और तब शायद कोई नया नारा गढ़ा जाएगा— “कम सांस लीजिए, देश संकट में है।”

कैमरे की कलम: अंधेरे का आत्मनिर्भर भारत


छत्तीसगढ़ के दूसरे बड़े शहर के रूप में अपनी पहचान रखने वाले बिलासपुर ने पिछले दिनों आखिरकार विकास की उस ऊंचाई को छू ही लिया, जहां आदमी को यह समझ में आ जाता है कि असली सभ्यता बिजली नहीं, मोमबत्ती है। बात पिछले मंगलवार की है, शहर और आस-पास के इलाकों में 95 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से हवा चली और पूरा शहर ऐसी विनम्रता से अंधेरे में समा गया, जैसे किसी सरकारी दफ्तर में आम आदमी की अर्जी समा जाती है। गाँवों का हाल तो पूछिए ही मत। 

आंधी आई। पेड़ गिरे। तार टूटे। खंभे झुके। और उसके साथ ही “जीरो पॉवर कट” का दावा भी कहीं उड़ गया। हालांकि सरकार को धन्यवाद देना चाहिए कि उसने जनता को इतिहास से जोड़ दिया। नई पीढ़ी को पहली बार पता चला कि बिना वाई-फाई, बिना चार्जर और बिना एसी के भी इंसान जिंदा रह सकता है। कुछ बच्चों ने तो पहली बार अपने माता-पिता से बातचीत तक कर ली। यह सामाजिक क्रांति बिजली विभाग के बिना संभव नहीं थी। शुरू में लोगों ने धैर्य रखा। उन्हें भरोसा था कि बिजली विभाग है, कर्मचारी हैं, सिस्टम है। फिर धीरे-धीरे उन्हें याद आया कि यही सबसे बड़ी समस्या है।

पहले छह घंटे बीते। फिर बारह। फिर चौबीस। कुछ इलाकों में तो तीस घंटे बाद बिजली आई। तब तक लोग आधुनिक नागरिक से बदलकर आदिम मानव बन चुके थे। फ्रिज में रखा दूध दही बन चुका था, दही खट्टा होकर विज्ञान प्रयोगशाला का नमूना लगने लगा था और बच्चे मोबाइल चार्ज न होने के कारण पहली बार अपने माता-पिता का चेहरा पहचानने लगे थे। शहर अंधेरे में डूबा रहा और बिजली विभाग “स्थिति पर नजर” रखता रहा। हमारे यहां “स्थिति पर नजर रखना” बहुत महत्वपूर्ण सरकारी काम है। सड़क टूटे—नजर रखो। पुल गिरे—नजर रखो। बिजली जाए—नजर रखो। ऐसा लगता है कि पूरा प्रशासन किसी दूरबीन के सहारे चल रहा है।

सबसे महान संस्था साबित हुआ फ्यूज कॉल सेंटर। जनता फोन लगाती रही और उधर से वही सन्नाटा मिलता रहा, जो चुनाव के बाद जनता को अपने नेता के फोन में मिलता है। कभी-कभी फोन उठ भी गया तो जवाब आया—“टीम काम कर रही है।” यह टीम भारतीय लोकतंत्र की तरह रहस्यमयी होती है। सब उसका नाम लेते हैं, मगर किसी ने उसे काम करते नहीं देखा। फिर मोबाइल पर संदेश आया—“आपकी समस्या का समाधान कर दिया गया है।” यह संदेश पढ़कर अंधेरे में बैठे आदमी के भीतर आध्यात्मिक ऊर्जा जाग उठी। उसने महसूस किया कि असली रोशनी भीतर होती है। बाहर का अंधेरा तो मोह-माया है। पंखा बंद है, फ्रिज सड़ चुका है, पानी नहीं आ रहा, मच्छर खूनदान शिविर चला रहे हैं, लेकिन विभाग कह रहा है—समस्या हल हो गई। यही डिजिटल इंडिया है।

दरअसल, हमारी बिजली व्यवस्था बहुत भावुक है। हल्की हवा चले तो नाराज हो जाती है। बारिश हो तो बैठ जाती है। पेड़ हिले तो बेहोश हो जाती है। और यदि 95 किलोमीटर की हवा चल जाए, तो फिर पूरा सिस्टम सामूहिक अवकाश पर चला जाता है। मगर सबसे बड़ी कला सरकार की भाषा में है। जनता अंधेरे में तड़प रही होती है और बयान आता है—“बिजली व्यवस्था तेजी से बहाल की जा रही है।” यह “तेजी” इतनी अद्भुत होती है कि कछुआ भी शर्म से इस्तीफा दे दे। सरकारें दावा करती हैं कि हमने गांव-गांव बिजली पहुंचा दी। बिल्कुल पहुंचाई। फिर वापस भी ले ली।

स्थानीय प्रशासन बिजली व्यवस्था को की बुनियादी खामियों को दूर करने के लिए गंभीरता का परिचय देता है, सवाल यह है कि जनता भी आखिर कब तक गंभीर रहे? तीस घंटे बिजली न हो तो आदमी लोकतंत्र से ज्यादा मच्छरों पर विश्वास करने लगता है।

कैमरे की कलम: लापरवाही, लालच और लाचार व्यवस्था


कभी चिकित्सा को सेवा कहा जाता था। डॉक्टरों को भगवान का दर्जा दिया जाता था। अस्पतालों को वह स्थान माना जाता था जहां जीवन को दूसरा अवसर मिलता है। लेकिन आज का कटु यथार्थ इस आदर्श से उतना ही दूर है जितना विश्वास और अनुभव के बीच की खाई। ताजा मामला श्रीराम केयर अस्पताल का है, जहां एक पुलिसकर्मी सत्यकुमार पाटले की मौत ने फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या अब अस्पताल इलाज के केंद्र हैं या व्यवस्थित ‘राजस्व मशीन’? 

एक सामान्य पथरी का ऑपरेशन जिसे चिकित्सा जगत में रूटीन प्रक्रिया माना जाता है। उसके बाद मरीज की हालत स्थिर बताई जाती है, परिजनों को भरोसा दिया जाता है, और फिर अचानक मौत। उसके बाद शुरू होता है वही पुराना खेल कारणों का उलझाव, बयान बदलते डॉक्टर, और जिम्मेदारी से बचने की अदृश्य दौड़। अस्पताल कहता है ‘हार्ट अटैक’, परिजन कहते हैं ‘लापरवाही’। सच्चाई पोस्टमार्टम रिपोर्ट में दबी रह जाती है, और न्याय अक्सर फाइलों में।

लेकिन सवाल सिर्फ एक मौत का नहीं है। सवाल उस व्यवस्था का है जहां मरीज को इंसान नहीं, बल्कि ‘केस’ कहा जाता है। जहां भर्ती होते ही उसकी पहचान नाम से नहीं, फाइल नंबर से होती है। जहां इलाज की प्रक्रिया से पहले पैकेज तय होता है, और संवेदनशीलता से पहले अग्रिम जमा।

निजी अस्पतालों के गलियारों में एक अदृश्य अर्थशास्त्र चलता है—हर टेस्ट की कीमत है, हर घंटे की कीमत है, हर बेड की कीमत है, यहां तक कि हर सांस की भी कीमत तय होती दिखाई देती है। मरीज जितना अधिक समय अस्पताल में रहेगा, उतना अधिक ‘राजस्व’ उत्पन्न करेगा। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या इलाज की प्राथमिकता मरीज की जरूरत से तय होती है या अस्पताल के लाभ से?

परिजनों के आरोप—चार घंटे तक इलाज नहीं मिला—यदि सही हैं, तो यह केवल एक चिकित्सकीय चूक नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं का पतन है। अस्पताल, जो जीवन बचाने का स्थान होना चाहिए, यदि वहां मरीज तड़पता रह जाए और मशीनें मौन रहें, तो यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि एक प्रकार का संस्थागत अमानवीकरण है।

इस अस्पताल का अतीत भी विवादों से अछूता नहीं रहा है। आईसीयू में सुरक्षा जैसी बुनियादी जिम्मेदारी में चूक, कोरोना काल में कथित आर्थिक शोषण, और अब एक मौत पर उठते सवाल—यह सब मिलकर एक पैटर्न की ओर इशारा करते हैं। लेकिन इससे भी बड़ा सवाल यह है कि ऐसे संस्थान बार-बार सवालों के घेरे में आने के बावजूद निर्बाध रूप से कैसे चलते रहते हैं?

उत्तर स्पष्ट है—क्योंकि हमारी व्यवस्था में जवाबदेही का अभाव है।

स्वास्थ्य क्षेत्र में नियमों की कमी नहीं है। लाइसेंस, निरीक्षण, मानक, प्रोटोकॉल—सब कुछ मौजूद है। लेकिन इनका पालन कितना होता है? निरीक्षण अक्सर औपचारिकता बनकर रह जाते हैं। नोटिस जारी होते हैं, जवाब मांगा जाता है, और फिर फाइल बंद। इस प्रक्रिया में न तो किसी की जिम्मेदारी तय होती है, न ही किसी को सख्त दंड मिलता है। यह ढीलापन केवल प्रशासनिक कमजोरी नहीं, बल्कि एक प्रकार की मौन स्वीकृति है—कि ‘जो चल रहा है, चलने दो।’

एक आम नागरिक के लिए स्थिति और भी विडंबनापूर्ण है। सरकारी अस्पतालों में भीड़, संसाधनों की कमी और लंबी प्रतीक्षा उसे निजी अस्पतालों की ओर धकेलती है। लेकिन वहां पहुंचकर उसे राहत नहीं, बल्कि एक नए संघर्ष का सामना करना पड़ता है—आर्थिक शोषण का।

इलाज के नाम पर अनावश्यक जांच, महंगे पैकेज, अस्पष्ट बिलिंग, और हर कदम पर अतिरिक्त शुल्क—यह सब मिलकर एक ऐसा जाल बनाते हैं जिसमें मरीज और उसका परिवार फंस जाता है। बीमारी से ज्यादा डर अब अस्पताल के बिल का होता है।

कई परिवार इलाज के बाद केवल एक मरीज नहीं खोते, बल्कि अपनी वर्षों की जमा पूंजी भी खो देते हैं। कर्ज लेकर इलाज करवाना, जमीन गिरवी रखना, गहने बेच देना—यह सब अब असामान्य नहीं रहा।

यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है। हर डॉक्टर को दोषी ठहराना न तो उचित है, न ही न्यायसंगत। चिकित्सा क्षेत्र में आज भी ऐसे हजारों डॉक्टर हैं जो ईमानदारी और समर्पण से काम कर रहे हैं। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब चिकित्सा संस्थान ‘कॉर्पोरेट मॉडल’ पर चलने लगते हैं।

जब डॉक्टरों पर ‘टारगेट’ का दबाव होता है—इतने टेस्ट, इतने एडमिशन, इतनी सर्जरी—तो चिकित्सा निर्णय भी प्रभावित होते हैं। इलाज का केंद्र मरीज नहीं, बल्कि ‘प्रदर्शन’ बन जाता है। ऐसे में संवेदनशीलता धीरे-धीरे ‘प्रोफेशनल व्यवहार’ के पीछे छिप जाती है।

स्वास्थ्य सेवा का बाजारीकरण शायद इस पूरे संकट की जड़ है। जब स्वास्थ्य को ‘सेवा’ से ‘उद्योग’ में बदल दिया जाता है, तो प्राथमिकताएं स्वतः बदल जाती हैं। जहां पहले जीवन बचाना उद्देश्य था, वहां अब लाभ कमाना भी समानांतर लक्ष्य बन जाता है और जब लाभ और जीवन के बीच चयन करना हो, तो परिणाम अक्सर दुखद होते हैं।

हर बड़ी घटना के बाद वही प्रक्रिया दोहराई जाती है—जांच के आदेश, कमेटी का गठन, रिपोर्ट का इंतजार। लेकिन इन रिपोर्टों का क्या होता है? कितने मामलों में दोषियों को सजा मिलती है? कितने अस्पतालों का लाइसेंस रद्द होता है? सच यह है कि बहुत कम। यह स्थिति केवल लापरवाही नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता को दर्शाती है। जब तक दंड का भय नहीं होगा, तब तक सुधार की उम्मीद करना भी व्यर्थ है। यह केवल प्रशासन या अस्पतालों की जिम्मेदारी नहीं है। समाज को भी जागरूक होना होगा। मरीज के अधिकारों को जानना, बिलिंग पर सवाल उठाना, पारदर्शिता की मांग करना—यह सब आवश्यक है, चुप रहना अब विकल्प नहीं है।

इस घटना को केवल एक खबर की तरह पढ़कर भूल जाना आसान है। लेकिन यह समझना जरूरी है कि यह सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं है। यह उस व्यवस्था की विफलता का प्रतीक है जो हर दिन हजारों लोगों को प्रभावित करती है। यदि आज सवाल नहीं उठे, तो कल कोई और परिवार इसी दर्द से गुजरेगा।

कैमरे की कलम: गुमनामी के साये में सुबह का सिपाही


सुबह की पहली किरण जब क्षितिज पर दस्तक देती है, तब शहर अब भी आधी नींद में होता है। कहीं चाय चढ़ रही होती है, कहीं अलार्म बजने की तैयारी में होता है, और कहीं लोग अभी सपनों में खोए रहते हैं। लेकिन इसी अधजगी दुनिया में कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिनका दिन बहुत पहले शुरू हो चुका होता है। ये वे लोग हैं, जो हमारे दरवाजे तक हर सुबह अखबार पहुँचाते हैं—अखबार हॉकर।

हमारे लिए अखबार महज़ खबरों का पुलिंदा हो सकता है, लेकिन उनके लिए यह रोज़ी-रोटी का जरिया है, जीवन का संघर्ष है और जिम्मेदारी का एक ऐसा बोझ है, जिसे वे बिना किसी शोर-शराबे के ढोते रहते हैं। जब शहर सो रहा होता है, तब हॉकर जाग चुके होते हैं। सुबह के तीन या चार बजे का समय—जब ठंड हड्डियों तक चुभती है या गर्मी की रात अभी ढली नहीं होती—वे अपने दिन की शुरुआत करते हैं। नींद अधूरी होती है, शरीर थका हुआ होता है, लेकिन जिम्मेदारियाँ उन्हें आगे बढ़ने को मजबूर करती हैं।

अखबार एजेंसी तक पहुँचना, बंडल उठाना, उन्हें अलग-अलग मोहल्लों के हिसाब से बांटना—यह सब काम इतनी तेजी और सटीकता से होता है कि मानो यह कोई अभ्यास किया हुआ युद्ध हो। हर अखबार सही घर तक पहुँचना चाहिए, हर ग्राहक की अपेक्षा पूरी होनी चाहिए। एक छोटी सी चूक भी शिकायत में बदल सकती है। हॉकर का सबसे बड़ा दुश्मन समय होता है। उन्हें हर हाल में सूरज निकलने से पहले अपना काम पूरा करना होता है। साइकिल, मोटरसाइकिल या कभी-कभी पैदल—वे गलियों, सड़कों और मोहल्लों में दौड़ते रहते हैं। बारिश हो तो अखबार बचाना भी चुनौती बन जाता है। हवा तेज हो तो पन्ने उड़ने का डर रहता है। ठंड में उंगलियां सुन्न हो जाती हैं और गर्मी में पसीना आँखों में चुभता है। लेकिन इन सबके बावजूद, उनके काम की रफ्तार कभी धीमी नहीं पड़ती।

यह विडंबना ही है कि जो व्यक्ति हर सुबह हमें देश-दुनिया की खबरों से जोड़ता है, उसकी अपनी आर्थिक स्थिति अक्सर कमजोर होती है। अखबार बांटने के बदले उन्हें बहुत कम पैसा मिलता है—इतना कि उससे गुजारा करना भी मुश्किल हो जाता है। अक्सर यह काम वे किसी और नौकरी के साथ करते हैं, या फिर उनके परिवार के अन्य सदस्य भी किसी छोटे-मोटे काम में लगे होते हैं। कई बार बच्चों की पढ़ाई भी इसी संघर्ष में पीछे छूट जाती है।

समाज में हर काम का एक महत्व होता है, लेकिन हर काम को समान सम्मान नहीं मिलता। हॉकर का काम भी ऐसा ही है—जरूरी तो है, लेकिन सम्मान के मामले में पीछे छूट जाता है। हम अक्सर दरवाजा खोलते ही अखबार उठा लेते हैं, बिना यह सोचे कि उसे वहाँ तक पहुँचाने में कितनी मेहनत लगी होगी। कभी-कभी शिकायतें भी कर देते हैं—अखबार देर से आया, गीला था या सही जगह नहीं रखा गया। लेकिन क्या हम कभी उनके हालात समझने की कोशिश करते हैं?

अखबार हॉकर सिर्फ अखबार नहीं बाँटते, वे विश्वास भी बाँटते हैं। हर घर उनसे एक तय समय पर अखबार की उम्मीद करता है। यह भरोसा उनके कंधों पर एक अदृश्य जिम्मेदारी की तरह होता है। कई बार वे बीमार होते हुए भी काम पर निकलते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि अगर वे नहीं गए, तो कई घरों में सुबह अधूरी रह जाएगी। यह सिर्फ काम नहीं, बल्कि एक आदत और एक भरोसा है, जिसे वे निभाते हैं।

आज के डिजिटल युग में, जब खबरें मोबाइल स्क्रीन पर पल भर में उपलब्ध हो जाती हैं, अखबार हॉकर का काम और भी कठिन हो गया है। लोगों ने अखबार पढ़ना कम कर दिया है, जिससे उनकी आय पर सीधा असर पड़ा है। लेकिन इसके बावजूद, वे हार नहीं मानते। वे जानते हैं कि अभी भी बहुत से लोग सुबह की चाय के साथ कागज़ की खुशबू और छपी हुई खबरों का आनंद लेना पसंद करते हैं।

अगर हम गहराई से सोचें, तो हॉकर समाज को जोड़ने में एक अहम भूमिका निभाते हैं। वे हर दिन लाखों लोगों तक जानकारी पहुँचाते हैं, जागरूकता फैलाते हैं और लोकतंत्र की नींव को मजबूत करते हैं। उनका काम भले ही छोटा लगे, लेकिन उसका प्रभाव बहुत बड़ा होता है। वे उस सूचना श्रृंखला की पहली कड़ी हैं, जिसके बिना खबरें लोगों तक नहीं पहुँच सकतीं।

इन सबके बीच, हॉकर भी इंसान हैं—उनके भी सपने हैं, इच्छाएँ हैं और परेशानियाँ हैं। कोई अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देना चाहता है, कोई अपने घर की हालत सुधारना चाहता है, तो कोई सिर्फ एक स्थिर जीवन की उम्मीद करता है लेकिन अक्सर ये सपने जिम्मेदारियों और संघर्षों के बोझ तले दब जाते हैं। यह जरूरी है कि हम इन गुमनाम नायकों को पहचानें और उनके प्रति संवेदनशील बनें। एक छोटी सी मुस्कान, एक धन्यवाद, या उनके काम की सराहना—यह सब उनके लिए बहुत मायने रखता है। सरकार और समाज को भी उनके लिए बेहतर योजनाएँ बनानी चाहिए—जैसे बीमा, स्वास्थ्य सुविधाएँ और उचित वेतन। क्योंकि जब तक उनके जीवन में सुधार नहीं होगा, तब तक इस व्यवस्था की नींव कमजोर ही रहेगी।



कैमरे की कलम: बादाम, बाबू और बेबस नागरिक


बिलासपुर के हाउसिंग बोर्ड कार्यालय में घटी हालिया घटना ने प्रशासनिक तंत्र की उस पुरानी बीमारी को फिर उजागर कर दिया है, जिसे हम सब जानते तो हैं, पर अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। तोरण साहु नाम का युवक अपनी फाइल के महीनों से अटके होने से त्रस्त जब महिला अधिकारी की मेज पर बादाम उड़ेलते हुए यह कहता है कि “इसे खाइए, याद आ जाएगा फाइल कहां रखी है”, तो यह केवल एक क्षणिक आवेश या अनोखा विरोध नहीं रह जाता; यह व्यवस्था पर सीधा, तीखा और असहज सवाल बन जाता है।

यह घटना हंसी का विषय बन सकती है, सोशल मीडिया पर मनोरंजन का साधन भी। लेकिन यदि इसे केवल एक वायरल वीडियो के रूप में देख लिया गया, तो हम उस गहरे संकट को नजरअंदाज कर देंगे, जिसकी ओर यह इशारा करती है। 

उसके बादाम सिर्फ मेज पर नहीं गिरे थे वे उस पूरी व्यवस्था पर गिरे थे जो वर्षों से “याददाश्त खोने” का नाटक कर रही है।

सरकारी दफ्तरों में “फाइल नहीं मिल रही” अब अपवाद नहीं, लगभग एक स्वीकृत सत्य बन चुका है। यह स्थिति उतनी ही चिंताजनक है, जितनी सामान्य लगने लगी है। सवाल यह नहीं कि फाइलें क्यों खो जाती हैं, सवाल यह है कि उनके खो जाने के बाद भी व्यवस्था क्यों नहीं हिलती? एक नागरिक जब अपनी वैध प्रक्रिया पूरी कर चुका हो, दस्तावेज जमा कर चुका हो, और फिर भी महीनों तक केवल यह सुनता रहे कि उसकी फाइल “ढूंढी जा रही है”, तो यह केवल प्रशासनिक ढिलाई नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों का प्रत्यक्ष हनन है।

प्रशासनिक प्रक्रियाओं में समयसीमा तय होती है, कम से कम कागजों पर लेकिन व्यवहार में यह समयसीमा अक्सर एक औपचारिकता भर रह जाती है। एक-दो महीने में पूरा होने वाला काम सात महीने तक भी अधूरा रह जाए, तो यह केवल देरी नहीं, बल्कि जवाबदेही की विफलता है। इस विफलता की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसका कोई स्पष्ट उत्तरदायी नहीं होता। फाइल एक टेबल से दूसरी टेबल तक घूमती रहती है, और अंततः “कहीं” अटक जाती है बिना किसी के जिम्मेदार ठहराए।

यह विचारणीय है कि एक नागरिक को अपने वैध अधिकार के लिए व्यंग्य का सहारा क्यों लेना पड़ता है। बादाम का प्रतीकात्मक उपयोग केवल हास्य नहीं था यह उस संवेदनहीनता पर चोट थी, जो प्रशासनिक व्यवहार में गहराई तक समा चुकी है। जब सीधी शिकायतें अनसुनी रह जाती हैं, जब आवेदन और अनुस्मारक (रिमाइंडर) निष्प्रभावी हो जाते हैं, तब नागरिक के पास ऐसे ही प्रतीकात्मक तरीकों का सहारा बचता है। यह स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए स्वस्थ संकेत नहीं मानी जा सकती।

इस पूरे प्रकरण में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि मामला तब चर्चा में आया, जब उसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। यह दर्शाता है कि पारंपरिक शिकायत तंत्र की तुलना में सार्वजनिक दबाव अब अधिक प्रभावी होता जा रहा है लेकिन क्या किसी नागरिक को न्याय या समाधान पाने के लिए अपने मुद्दे को वायरल करना आवश्यक होना चाहिए? यदि हां, तो यह प्रशासनिक तंत्र की गंभीर कमजोरी का संकेत है।

किसी भी प्रशासनिक व्यवस्था की विश्वसनीयता उसकी जवाबदेही पर निर्भर करती है। यदि फाइल गुम होती है, तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि इसके लिए कौन जिम्मेदार है। यदि तय समय में काम नहीं होता, तो इसके परिणाम क्या होंगे। वर्तमान स्थिति में, इन दोनों प्रश्नों के उत्तर अक्सर धुंधले होते हैं। यही धुंधलापन लापरवाही को बढ़ावा देता है और नागरिक को असहाय बनाता है। 

यह मान लेना आसान है कि यह सिर्फ एक अलग घटना है लेकिन सच्चाई यह है कि यह हर शहर, हर कस्बे, हर दफ्तर की कहानी है—बस तरीके अलग-अलग हैं।

इस पूरी व्यवस्था में सबसे अधिक प्रभावित वह नागरिक है, जिसके पास न तो संसाधन हैं और न ही प्रभाव। वह केवल प्रक्रिया का पालन करता है, निर्देशों का अनुपालन करता है, और बदले में अपेक्षा करता है कि उसका काम समय पर हो जाएगा लेकिन जब उसे बार-बार दफ्तर के चक्कर लगाने पड़ते हैं, जब उसे हर बार नया बहाना सुनने को मिलता है, तो यह केवल असुविधा नहीं—यह उसके आत्मसम्मान पर भी चोट है।

इस घटना को एक अपवाद मानकर भुला देना आसान होगा, लेकिन इससे समस्या समाप्त नहीं होगी। आवश्यक है कि इसे एक संकेत के रूप में देखा जाए और सुधार की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं। प्रक्रियाओं का पूर्ण डिजिटलीकरण, ताकि फाइलों के गुम होने की संभावना समाप्त हो, समयबद्ध सेवा की सख्त निगरानी, प्रत्येक स्तर पर स्पष्ट जवाबदेही और सबसे महत्वपूर्ण, नागरिक के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण होना जरूरी है। 

बिलासपुर की यह घटना केवल एक युवक के विरोध की कहानी नहीं है; यह उस व्यापक असंतोष की अभिव्यक्ति है, जो लंबे समय से प्रशासनिक उदासीनता के कारण पनप रहा है।बादाम यहां एक प्रतीक बन गए हैं—याददाश्त बढ़ाने का नहीं, बल्कि व्यवस्था को उसकी जिम्मेदारियों की याद दिलाने का। 

कैमरे की कलम: “साड़ी में भी ‘फीका’ पड़ गया सिस्टम !”


छत्तीसगढ़ में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं की साड़ियों का मामला अब रंग से ज्यादा ‘ढंग’ दिखाने लगा है। साड़ियाँ क्या आईं, जैसे मानो सरकारी वादों की तरह पहले चमकदार, फिर धीरे-धीरे फीकी! कहीं लंबाई कम, कहीं चौड़ाई गायब, तो कहीं कपड़ा इतना पतला कि पारदर्शिता में ईमानदारी भी शरमा जाए। लोकतंत्र में योजनाएं अक्सर बड़े इरादों के साथ जन्म लेती हैं, कागज़ों पर वे संवेदनशीलता की मिसाल होती हैं, भाषणों में वे जनकल्याण की गारंटी बन जाती हैं और विज्ञापनों में वे सरकार की “जनहितैषी” छवि का चमकदार चेहरा। लेकिन ज़मीनी हकीकत कभी-कभी इतनी विडंबनापूर्ण होती है कि वह इन दावों का मज़ाक बनाकर रख देती है। छत्तीसगढ़ में महिला एवं बाल विकास विभाग की साड़ी खरीदी का ताज़ा मामला भी कुछ ऐसा ही है जहां साड़ी की लंबाई कम हुई है, लेकिन सवालों की सूची लंबी होती जा रही है।

करीब 9.7 करोड़ रुपए की लागत से गुजरात के सूरत से खरीदी गई साड़ियां, जो आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं के सम्मान का प्रतीक बननी थीं, अब उपहास और आक्रोश का कारण बन गई हैं। जिन महिलाओं के कंधों पर पोषण, शिक्षा और समाज के सबसे निचले तबके तक सरकारी योजनाएं पहुंचाने की जिम्मेदारी है, उन्हें ऐसी साड़ियां दी गईं जिन्हें पहनना तक मुश्किल हो गया। कहीं लंबाई कम, कहीं रंग धोते ही गायब, और कहीं कपड़ा ऐसा कि बाजार में आधी कीमत पर भी लोग दो बार सोचें। यह केवल गुणवत्ता की समस्या नहीं, बल्कि नीयत की गुणवत्ता का भी आईना है। 

विडंबना देखिए वर्क ऑर्डर में साड़ी की लंबाई 6.3 मीटर तय की गई थी लेकिन वितरण के बाद यह लंबाई 5 मीटर तक सिमट गई। ऐसा लगता है जैसे साड़ी ही नहीं, पूरी व्यवस्था “डाइटिंग” पर चली गई हो। फर्क बस इतना है कि इस डाइटिंग से किसी का वजन नहीं, बल्कि जनता का भरोसा कम हो रहा है।

अब सवाल यह है कि यह सब हुआ कैसे ? क्या यह मान लिया जाए कि करोड़ों की खरीदी में गुणवत्ता जांच महज औपचारिकता थी ? या फिर यह माना जाए कि जांच करने वालों की नजरें भी उसी तरह “सिकुड़” गई थीं, जैसे साड़ी धोने के बाद सिकुड़ रही है ? सरकारी तंत्र में यह एक पुराना खेल है फाइलों में सब कुछ परफेक्ट, जमीन पर सब कुछ संदिग्ध। कागज़ों पर साड़ी पूरी लंबाई की, लेकिन हकीकत में कटौती का ऐसा हुनर कि दर्जी भी शरमा जाए।

सरकार की मंशा पर बात करना भी इस समय जरूरी है। योजनाएं बनाते वक्त सरकार यह संदेश देना चाहती है कि वह अपने जमीनी कार्यकर्ताओं के प्रति संवेदनशील है। लेकिन जब क्रियान्वयन इस स्तर का हो, तो यह संवेदनशीलता संदेह में बदल जाती है। क्या सरकार को इस गड़बड़ी की जानकारी नहीं थी ? अगर नहीं थी, तो यह प्रशासनिक विफलता है और अगर थी तो यह और भी गंभीर सवाल खड़े करता है,क्या जानबूझकर आंखें मूंद ली गईं?

राज्य की महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े का इस मसले पर बयान आया है कि “जहां-जहां खराब साड़ियाँ गई हैं, उन्हें वापस किया जाएगा।” सुनकर ऐसा लगा जैसे साड़ियों की नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों की ‘रिटर्न पॉलिसी’ लागू हो गई हो। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या मंत्री को इस खरीदी की गुणवत्ता का अंदाजा नहीं था? या फिर यह मामला उनकी प्राथमिकताओं में कहीं पीछे छूट गया? यदि मंत्री स्तर पर ही ऐसी लापरवाही नजर आए, तो नीचे के अधिकारियों से क्या उम्मीद की जा सकती है?

इस पूरे प्रकरण का सबसे दिलचस्प और दुखद पहलू यह है कि इसमें नुकसान केवल पैसों का नहीं हुआ, बल्कि भरोसे का भी हुआ है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, जो पहले से ही सीमित संसाधनों में काम करती हैं, अब खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही हैं। जिनके लिए यह साड़ी सम्मान का प्रतीक होनी चाहिए थी, वह अब उनके लिए एक “समस्या” बन गई है। यह स्थिति केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि संवेदनशीलता की कमी को भी दर्शाती है। यह साड़ी घोटाला भी कुछ ऐसा ही कर रहा है। विपक्ष के लिए यह मुद्दा तैयार है, जनता के बीच यह चर्चा का विषय बन चुका है, और सोशल मीडिया पर यह व्यंग्य का नया केंद्र बन गया है। लोग कह रहे हैं “साड़ी ही नहीं, सरकार की साख भी सिकुड़ गई है।”

 एक सवाल यह भी है कि जिस “खादी और ग्रामोद्योग” को आत्मनिर्भरता और गुणवत्ता का प्रतीक माना जाता है, उसी के जिम्मे यह खरीदी थी। यह वही खादी है, जिसे कभी स्वदेशी और स्वाभिमान का प्रतीक कहा जाता था। लेकिन इस मामले में यह प्रतीक भी सवालों के घेरे में आ गया है। क्या खादी अब केवल नाम भर रह गई है, और गुणवत्ता कहीं पीछे छूट गई है? या फिर गुजरात के सूरत शहर के जिस साड़ी निर्माता को यह ठेका दिया गया उसका खादी से कोई वास्ता ही नहीं। 

इस पूरे घटनाक्रम में एक पैटर्न भी नजर आता है, छोटी-छोटी कटौतियों का बड़ा खेल। कहीं लंबाई में कटौती, कहीं गुणवत्ता में, और कहीं जवाबदेही में। यह कटौती केवल साड़ी तक सीमित नहीं रहती, बल्कि धीरे-धीरे सिस्टम की आत्मा को भी काटने लगती है। और जब यह प्रक्रिया लंबे समय तक चलती है, तो भ्रष्टाचार “अपवाद” नहीं, बल्कि “व्यवस्था” बन जाता है।

अब सवाल यह है कि आगे क्या ? क्या इस मामले की जांच होगी ? क्या जिम्मेदारों पर कार्रवाई होगी ? या फिर यह मामला भी उन फाइलों में दफन हो जाएगा, जहां पहले से ही कई “घोटाले” धूल खा रहे हैं ? अनुभव कहता है कि शोर कुछ दिनों तक रहेगा, बयानबाजी होगी, और फिर धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य हो जाएगा। लेकिन हर बार की तरह इस बार भी एक चीज पीछे छूट जाएगी—जनता का भरोसा।

सरकार के लिए यह समय आत्ममंथन का है। योजनाएं बनाना आसान है, लेकिन उन्हें ईमानदारी से लागू करना ही असली चुनौती है। यदि जमीनी स्तर पर ही ऐसी गड़बड़ियां होती रहेंगी, तो बड़े-बड़े दावे भी खोखले साबित होंगे। और जब जनता का भरोसा डगमगाने लगे, तो कोई भी “विकास” का नारा उसे संभाल नहीं सकता।

अंततः, यह मामला हमें एक कड़वी सच्चाई की याद दिलाता है—भ्रष्टाचार हमेशा बड़े घोटालों में ही नहीं होता, वह छोटी-छोटी कटौतियों में भी छिपा होता है। और जब ये छोटी कटौतियां मिलकर एक बड़ा रूप ले लेती हैं, तो वह केवल आर्थिक नुकसान नहीं पहुंचातीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता को भी कमजोर कर देती हैं।

 इस “छोटी साड़ी” की कहानी दरअसल बहुत बड़ी है। यह केवल कपड़े की लंबाई की नहीं, बल्कि नीयत की गहराई की कहानी है। और जब नीयत ही छोटी हो जाए, तो फिर किसी भी योजना की लंबाई बढ़ाने से क्या फर्क पड़ता है? कुल मिलाकर, साड़ी का रंग भले ही फीका पड़ गया हो लेकिन इस पूरे मामले ने सिस्टम के रंग जरूर गहरे कर दिए हैं—और वो भी ऐसे कि अब धुलने से भी नहीं जाएंगे ! 

कैमरे की कलम: “मर्यादा बिकाऊ है: समाज के इस ‘सभ्य’ बाजार में आपका स्वागत है”

हाल के कुछ महीनों में देश के विभिन्न हिस्सों से सामने आई घटनाएं जिनमें कथित आध्यात्मिक व्यक्तियों पर यौन शोषण के आरोप, सार्वजनिक जीवन से जुड़े प्रभावशाली लोगों पर पद दुरुपयोग के आरोप, और निजी संबंधों में अविश्वास के चलते हिंसा एक व्यापक सामाजिक प्रवृत्ति की ओर संकेत करती हैं।  इन घटनाओं को अलग-अलग देखना आसान है लेकिन जब इन्हें एक साथ रखा जाता है, तो यह प्रश्न उठता है कि क्या समाज की नैतिक और सामाजिक संरचना किसी परिवर्तन के दौर से गुजर रही है और यदि हां, तो उसकी दिशा क्या है? 

हाल के दिनों में नासिक और सूरत से सामने आए दो अलग-अलग मामले, भले ही अपने स्वरूप में भिन्न प्रतीत होते हों, लेकिन वे एक साझा सामाजिक प्रश्न की ओर इशारा करते हैं। नासिक में एक स्वयंभू आध्यात्मिक गुरु और ज्योतिषी, अशोक खरात, के कथित यौन शोषण से जुड़े वीडियो सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से प्रसारित हुए हैं। आरोपों के अनुसार, वह महिलाओं को उनके पारिवारिक जीवन, विशेषकर पति से जुड़े संभावित “खतरों” का भय दिखाकर अपने पास बुलाता था। इसके बाद वह कथित रूप से “विशेष अनुष्ठान” के नाम पर उनका शोषण करता, इन कृत्यों को रिकॉर्ड करता और बाद में ब्लैकमेलिंग या आर्थिक लाभ के लिए इस्तेमाल करता। इस मामले की गंभीरता केवल आरोपों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भी बताया गया है कि उसके पास से बड़ी मात्रा में संपत्ति बरामद हुई है जो इस पूरे तंत्र की संगठित प्रकृति की ओर संकेत करता है।

इसी समय, सूरत से सामने आया एक अन्य मामला धार्मिक संस्थाओं की आंतरिक जवाबदेही पर प्रश्न खड़े करता है। यहां एक जैन मुनि के कथित आपत्तिजनक ऑडियो और वीडियो सामने आने के बाद, स्थानीय समुदाय की महिलाओं ने स्वयं पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि शिकायत किसी बाहरी विरोध या राजनीतिक आरोप के रूप में नहीं, बल्कि उसी धार्मिक समुदाय के भीतर से आई। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि इस तरह की घटनाएं न केवल व्यक्तिगत आचरण का प्रश्न हैं, बल्कि पूरे समुदाय और उसकी आस्था की छवि को प्रभावित करती हैं।

इसी व्यापक परिदृश्य में छत्तीसगढ़ के चर्चित आईपीएस रतनलाल डांगी के स्कैंडल को देखिये। इसी तरह राज्य के बिलासपुर, रायपुर और कवर्धा से सामने आई हाल की घटनाएं सामाजिक अस्थिरता के एक और पहलू को उजागर करती हैं। बिलासपुर जिले के रतनपुर क्षेत्र के ग्राम पेंडरवा में चरित्र संदेह को लेकर हुआ हिंसक संघर्ष हो, या रायपुर में पारिवारिक संबंधों से जुड़ी गंभीर हत्याएं, ये घटनाएं यह संकेत देती हैं कि निजी संबंधों में अविश्वास किस प्रकार हिंसक रूप ले सकता है। इसी तरह, कवर्धा में सामने आया बाल यौन शोषण का मामला यह दर्शाता है कि अपराध के स्वरूप और संदर्भ बदल रहे हैं और पारंपरिक धारणाएं इन जटिलताओं को पूरी तरह समझाने में सक्षम नहीं हैं।

कहते हैं भारत “संस्कारों का देश” है। यहां परिवार है, परंपरा है, मर्यादा है, और सबसे बढ़कर—“इज्जत” है लेकिन जरा ठहरकर आईना देखिए। क्या वाकई यह सब अब भी बचा है, या हम सिर्फ इन शब्दों की माला जपकर खुद को धोखा दे रहे हैं? सच यह है कि समाज अब “संस्कारों” से नहीं सुविधा, स्वार्थ और सन्नाटे से चल रहा है और इस नए समाज में आपका स्वागत है, जहां मर्यादा एक विचार नहीं एक बिकने वाली वस्तु है।

पहले लोग भगवान में विश्वास करते थे। अब लोग “बाबाओं के पैकेज” खरीदते हैं। “समस्या समाधान शिविर”, “विशेष अनुष्ठान” और “गुप्त साधना” नाम बदलते रहते हैं, लेकिन धंधा वही रहता है। डर बेचो, समाधान बेचो और अगर ग्राहक खास हो तो “विशेष सेवा” भी दे दो। यहां सबसे मजेदार बात यह है कि ग्राहक खुद चलकर आता है। वह अपने डर, अपनी कमजोरी और कई बार अपनी समझ तक किसी और के चरणों में रख देता है और फिर जब उसके साथ शोषण होता है तो समाज कहता है “उसे समझना चाहिए था।”

वाह! धोखा भी खाओ और दोष भी खुद पर लो। शरीर: अब आत्मा से ज्यादा उपयोगी संपत्ति। हमने हमेशा कहा कि “आत्मा अमर है, शरीर नश्वर है।” लेकिन व्यवहार में हमने क्या किया? हमने शरीर को ही सबसे बड़ा निवेश बना दिया। कहीं नौकरी के लिए, कहीं प्रमोशन के लिए, कहीं कृपा पाने के लिए— शरीर अब एक “करेंसी” बन चुका है और इस बाजार में खरीदार भी हैं, बिकने वाले भी हैं और सबसे ज्यादा देखकर चुप रहने वाले दर्शक।

कहते हैं सत्ता सेवा का माध्यम होती है लेकिन अब यह सुविधा का शॉर्टकट बन चुकी है। फाइल आगे बढ़ानी है? संपर्क चाहिए। संपर्क नहीं है? तो “समझौता” चाहिए और यह समझौता किस चीज का होता है यह बताने की जरूरत नहीं। यहां नैतिकता फाइलों में बंद रहती है और फैसले बंद कमरों में होते हैं। बाहर भाषण में “नारी सम्मान” गूंजता है, और अंदर सम्मान का सबसे सस्ता सौदा होता है।

हमने बचपन में पढ़ा था कि द्रौपदी का चीर हरण अन्याय था और पूरा सभ्य समाज उसके खिलाफ खड़ा होना चाहिए था। आज भी चीर हरण हो रहा है लेकिन फर्क यह है कि अब यह एक सिस्टम बन चुका है। कभी कैमरे के जरिए, कभी ब्लैकमेलिंग के जरिए, कभी सत्ता के दबाव से और सबसे बड़ी बात अब कोई कृष्ण नहीं आता क्योंकि आज के “कृष्ण” खुद किसी और के दरबार में खड़े हैं।

समाज को अगर किसी को खत्म करना हो तो उसे सबूत की जरूरत नहीं होती उसे सिर्फ एक शब्द चाहिए: “चरित्र” . एक बार यह शब्द किसी महिला के नाम के साथ जुड़ गया, तो फिर न उसे सफाई का मौका मिलता है न न्याय का। और अगर कोई पुरुष इस “शक” के नाम पर हत्या कर दे तो समाज धीरे से कहता है “गुस्से में गलती हो गई।” गलती? या मानसिकता? 

हम कहते हैं कि “परिवार समाज की नींव है।” लेकिन सच्चाई यह है कि अब परिवार सबसे बड़ा अभिनय मंच बन चुका है। बाहर से सब ठीक, अंदर से सब बिखरा हुआ। संवाद नहीं है, विश्वास नहीं है, लेकिन फोटो पर मुस्कान है और जब सच्चाई बाहर आती है तो या तो रिश्ता टूटता है या किसी की जान चली जाती है।

हर बार जब कोई मामला सामने आता है तो सबसे आसान सवाल पूछा जाता है “वह वहां क्यों गई?” कोई यह नहीं पूछता “उसे वहां तक लाया किसने?” समाज को एक आदत लग चुकी है दोष वहीं डालो, जहां से आवाज कम उठे और महिलाएं इस व्यवस्था में सबसे आसान निशाना हैं।

आज हर स्कैंडल एक “कंटेंट” है। वीडियो वायरल, रील तैयार, कैप्शन सनसनीखेज। किसी की जिंदगी बर्बाद हो रही है, लेकिन व्यूज बढ़ रहे हैं तो सब ठीक है। यह समाज अब संवेदनशील नहीं रहा यह मनोरंजनप्रिय हो गया है। उसे सच नहीं चाहिए, उसे मसाला चाहिए। हम खुद को निर्दोष मानते हैं। कहते हैं “हमने क्या किया?” लेकिन असली सवाल यह है— हमने क्या नहीं किया? हमने सवाल नहीं पूछा, हमने विरोध नहीं किया, हमने चुप्पी चुनी और यही चुप्पी हर अपराध की साझेदार बन गई।

समस्या यह नहीं है कि हमें सच्चाई दिखती नहीं है। समस्या यह है कि हम उसे देखना नहीं चाहते क्योंकि अगर हम सच देख लेंगे, तो हमें बदलना पड़ेगा और बदलना सबसे मुश्किल काम है। इसलिए हम क्या करते हैं? हम मर्यादा की बात करते हैं, संस्कारों की बात करते हैं और फिर चुपचाप उसी दलदल में उतर जाते हैं जिसे हम खुद कोसते हैं। जब मर्यादा बिक रही हो, आस्था व्यापार बन चुकी हो और रिश्ते समझौते में बदल गए हों तो दोष किसे दें?

कैमरे की कलम: जंगल, कानून और ‘मूल्य’ की विडंबना


जंगलों को अक्सर “कानून से परे” नहीं, बल्कि “कानून के भीतर संरक्षित” माना जाता है। यही वह जगह है जहां नियम सबसे सख्त होने चाहिए क्योंकि यहां दांव पर केवल पेड़ नहीं, बल्कि पारिस्थितिकी, वन्यजीवन और भविष्य की पीढ़ियों का संतुलन होता है लेकिन जब इन्हीं कानूनों के संरक्षक, उनके अर्थ का मूल्य तय करने लगें, तो सवाल सिर्फ भ्रष्टाचार का नहीं, बल्कि नैतिक विघटन का भी हो जाता है। 

हालिया मामले में अचानकमार टाइगर रिजर्व के सुरही रेंज में पदस्थ रेंजर पल्लव नायक और डिप्टी रेंजर मनीष श्रीवास्तव पर 50 हजार रुपये की रिश्वत लेते रंगेहाथ पकड़े जाने का आरोप इसी विडंबना को उजागर करता है। आरोप यह है कि उन्होंने एक प्रकरण में चालान जल्दी पेश करने और जब्त वाहन छोड़ने के एवज में रिश्वत मांगी। पहली नजर में यह एक “रूटीन भ्रष्टाचार” जैसा लग सकता है। एक और ट्रैप, एक और गिरफ्तारी, एक और मामला। लेकिन अगर इस घटना को जंगल और वन्यजीवन की दृष्टि से देखा जाए, तो इसका अर्थ कहीं अधिक गहरा और चिंताजनक हो जाता है।

जंगल का कानून अपने आप में अनूठा होता है। यह सिर्फ कागज पर लिखे नियमों का समूह नहीं, बल्कि एक नैतिक अनुशासन है जिसमें मनुष्य को स्वयं को सीमित रखना होता है ताकि प्रकृति अपना संतुलन बनाए रख सके। जब कोई व्यक्ति जंगल में प्रवेश करता है, तो वह केवल एक स्थान में नहीं, बल्कि एक व्यवस्था में प्रवेश करता है, जहां हर पेड़, हर जीव, हर ध्वनि का अपना महत्व है। ऐसे में, जो लोग इस व्यवस्था की रक्षा के लिए नियुक्त किए जाते हैं, उनसे अपेक्षा होती है कि वे इस अनुशासन के सबसे बड़े संरक्षक होंगे लेकिन जब यही संरक्षक “नियमों की कीमत” तय करने लगें, तो सवाल उठता है क्या जंगल का कानून भी अब मोलभाव का विषय बन चुका है?

इस मामले में जिस तरह से कथित रूप से लाखों रुपये की बात की गई और फिर 70 हजार रुपये में “समाधान” तलाशा गया, वह केवल एक लेन-देन नहीं, बल्कि एक सोच का प्रतिबिंब है। यह सोच बताती है कि कानून को एक सेवा के रूप में देखा जा रहा है—जहां नियमों का पालन नहीं, बल्कि उनका “प्रबंधन” किया जाता है। और यह प्रबंधन अक्सर उन लोगों के पक्ष में झुक जाता है, जो इसकी कीमत चुका सकते हैं।

कल्पना कीजिए एक हिरण, जो अपनी सुरक्षा के लिए कानून पर निर्भर है, लेकिन कानून की ‘कीमत’ तय हो चुकी है। या एक पेड़, जो कटने से पहले यह नहीं पूछ सकता कि उसकी रक्षा के बदले कितनी रकम तय हुई है। जंगल न तो सौदे समझता है, न रसीदें। वह सिर्फ संतुलन जानता है और वही संतुलन सबसे पहले टूटता है। एक हिरण जो जंगल में निर्भय होकर दौड़ना चाहता है, उसे क्या फर्क पड़ता है कि किसी फाइल में क्या लिखा है या किसने कितनी राशि दी? एक पक्षी, जो अपने घोंसले के लिए सुरक्षित पेड़ ढूंढ रहा है, उसे क्या पता कि उस पेड़ की सुरक्षा किसी “समझौते” का हिस्सा बन चुकी है? जंगल की दुनिया में न तो रिश्वत का कोई अर्थ है, न ही कोई वैधता। 

इस तरह की घटनाएं केवल व्यक्तिगत भ्रष्टाचार का उदाहरण नहीं हैं; वे उस व्यापक मानसिकता की ओर इशारा करती हैं, जिसमें सार्वजनिक जिम्मेदारियों को निजी अवसरों में बदल दिया जाता है। यह मानसिकता केवल वन विभाग तक सीमित नहीं है, लेकिन जंगलों के संदर्भ में इसका प्रभाव कहीं अधिक गंभीर होता है। क्योंकि यहां नुकसान केवल आर्थिक नहीं, बल्कि पारिस्थितिक होता है जो अक्सर अपूरणीय होता है।

अचानकमार जैसे संरक्षित क्षेत्र केवल भौगोलिक सीमाएं नहीं हैं; वे संरक्षण के प्रतीक हैं। यहां हर नियम, हर प्रतिबंध, हर निगरानी का उद्देश्य एक ही होता है। प्रकृति को उसके मूल स्वरूप में बनाए रखना लेकिन जब इन नियमों को लागू करने वाले ही उन्हें “लचीला” बना दें, तो संरक्षण की पूरी अवधारणा ही कमजोर पड़ने लगती है।यह भी ध्यान देने योग्य है कि इस मामले की शुरुआत एक सोशल मीडिया रील से हुई। एक ऐसी दुनिया से, जहां दृश्यता अक्सर जिम्मेदारी से अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। एक रील, एक वायरल वीडियो, और उसके बाद की कार्रवाई यह क्रम अपने आप में आधुनिक समय की एक कहानी कहता है लेकिन इस कहानी का सबसे चिंताजनक हिस्सा वह है, जहां कार्रवाई के बाद भी “समाधान” के लिए रिश्वत का रास्ता अपनाया गया।

यहां एक और सवाल उठता है क्या कानून का भय अब केवल औपचारिकता बनकर रह गया है? अगर कोई व्यक्ति यह मानकर चलता है कि नियमों को पैसे के जरिए “समायोजित” किया जा सकता है, तो यह केवल उस व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की विफलता को दर्शाता है। यह हमें हमारी ही बनाई हुई व्यवस्था का प्रतिबिंब दिखाता है जहां हम एक तरफ जंगलों की रक्षा की बात करते हैं और दूसरी तरफ उनके नियमों को कमजोर करने वाली प्रक्रियाओं को नजरअंदाज कर देते हैं। यह आईना हमें यह भी दिखाता है कि भ्रष्टाचार केवल एक लेन-देन नहीं, बल्कि एक विचारधारा है जो धीरे-धीरे संस्थाओं को भीतर से खोखला कर देती है लेकिन इस अंधेरे चित्र के बीच एक सकारात्मक पहलू भी है—कार्रवाई। एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) की इस ट्रैप कार्रवाई ने यह संकेत दिया है कि व्यवस्था में अभी भी ऐसे तंत्र मौजूद हैं, जो जवाबदेही सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहे हैं। यह एक जरूरी याद दिलाता है कि कानून केवल लागू करने वालों तक सीमित नहीं है; उसे लागू कराने वाले भी हैं।

फिर भी, सवाल बना रहता है क्या ऐसी कार्रवाइयां पर्याप्त हैं? या हमें उस मानसिकता को बदलने की जरूरत है, जो ऐसे मामलों को जन्म देती है? शायद समाधान केवल सख्त कानूनों या अधिक निगरानी में नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक चेतना में है। जब तक हम सार्वजनिक पदों को “सेवा” के बजाय “सुविधा” के रूप में देखेंगे, तब तक ऐसे मामले सामने आते रहेंगे। और जब तक जंगलों को केवल संसाधन के रूप में देखा जाएगा, तब तक उनकी रक्षा केवल कागजों तक सीमित रहेगी। अंततः, यह मामला हमें एक असहज लेकिन जरूरी सवाल के साथ छोड़ता है क्या हम अपने जंगलों की रक्षा उन लोगों के भरोसे छोड़ सकते हैं, जिनके लिए कानून एक सिद्धांत नहीं, बल्कि एक विकल्प बन चुका है?

जंगल का मौन बहुत कुछ कहता है। वह हमें यह याद दिलाता है कि प्रकृति के नियम किसी सौदे का हिस्सा नहीं हो सकते। वे या तो पालन किए जाते हैं, या फिर उनके टूटने की कीमत चुकानी पड़ती है और यह कीमत अक्सर उन लोगों को चुकानी पड़ती है, जिनकी आवाज़ सबसे कम सुनी जाती है। शायद अब समय आ गया है कि हम यह तय करें क्या हम जंगलों को बचाना चाहते हैं, या केवल उनके नाम पर चलने वाले सौदों को?

कैमरे की कलम: सख्त कानून, कमजोर भरोसा


छत्तीसगढ़ विधानसभा में हाल ही में पारित दो विधेयक, धर्मांतरण को लेकर कड़े प्रावधान और परीक्षा में पेपर लीक के खिलाफ सख्त सजा एक व्यापक प्रवृत्ति की ओर इशारा करते हैं। देश के कई राज्यों में सरकारें अब अपराधों के जवाब में कानूनों को और कठोर बनाने का रास्ता चुन रही हैं। इन कानूनों में उम्रकैद, भारी जुर्माने और संपत्ति जब्ती जैसे प्रावधान शामिल हैं। ऐसी सज़ाएं जो आमतौर पर गंभीर हिंसक अपराधों के लिए आरक्षित मानी जाती रही हैं। पहली नज़र में यह सख्ती शासन की दृढ़ता और अपराध के प्रति ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ की नीति का संकेत देती है लेकिन सवाल यह है कि क्या कानूनों की कठोरता वास्तव में समस्या का समाधान है, या यह शासन की उस अधीरता का प्रतीक है जो जटिल सामाजिक और प्रशासनिक चुनौतियों का आसान और त्वरित समाधान तलाश रही है? 

भारत में पहले से ही धर्मांतरण के मामलों में बल, प्रलोभन या धोखे के जरिए किए गए प्रयास दंडनीय हैं। इसी तरह पेपर लीक भी पहले से अपराध की श्रेणी में है। ऐसे में नए कानूनों का औचित्य तब ही मजबूत माना जा सकता है जब यह स्पष्ट किया जाए कि मौजूदा कानूनों में किस स्तर पर विफलता रही। क्या समस्या कानूनों की कमी थी, या उनके क्रियान्वयन की? अक्सर यह देखा गया है कि जांच एजेंसियों की कमजोर तैयारी, सबूतों के अभाव, गवाहों के मुकर जाने और न्यायिक प्रक्रिया की धीमी गति के कारण आरोपी छूट जाते हैं। ऐसे में सज़ा की अवधि बढ़ा देना क्या इस संरचनात्मक कमजोरी को दूर कर सकता है?

हाल के वर्षों में कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां कड़े कानूनों के बावजूद अदालतों ने लंबी अवधि के बाद आरोपियों को बरी कर दिया, क्योंकि पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए जा सके। यह स्थिति यह सवाल खड़ा करती है कि क्या समस्या कानून की ‘कठोरता’ में है या ‘प्रभावशीलता’ में? कानूनों को कठोर बनाना अक्सर सरकारों के लिए एक सशक्त राजनीतिक संदेश देने का माध्यम भी बन जाता है। यह संदेश कि वे किसी मुद्दे पर गंभीर हैं लेकिन यह गंभीरता अगर केवल कागज़ों पर सख्ती तक सीमित रह जाए, तो यह न्याय के बजाय प्रतीकात्मकता का रूप ले लेती है।

इन विधेयकों को पारित करने की प्रक्रिया भी कम चिंताजनक नहीं है। संसद और विधानसभाओं में बहस की गुंजाइश लगातार सिमटती जा रही है। कई बार विधेयक बिना पर्याप्त चर्चा के पारित हो जाते हैं, और विपक्ष अपनी असहमति दर्ज कराने के लिए सदन से बहिर्गमन का रास्ता चुनता है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या लोकतंत्र केवल बहुमत के बल पर कानून बनाने तक सीमित हो गया है, या उसमें संवाद और जवाबदेही की भी कोई भूमिका बची है? सरकारों के लिए यह आवश्यक होना चाहिए कि वे नए कानूनों की आवश्यकता और उनके प्रभाव को सरल भाषा में जनता के सामने रखें। केवल वेबसाइट पर राय मांग लेना पर्याप्त नहीं है, क्योंकि जटिल विधायी भाषा आम नागरिक की पहुंच से बाहर होती है।

लोकतंत्र में मीडिया को सत्ता और जनता के बीच एक सेतु माना जाता है। लेकिन अगर मीडिया केवल आधिकारिक बयानों को प्रसारित करने तक सीमित रह जाए और आवश्यक प्रश्न न उठाए, तो यह भूमिका अधूरी रह जाती है। कठोर कानूनों के इस दौर में यह और भी जरूरी हो जाता है कि मीडिया यह पूछे क्या नए कानून वास्तव में आवश्यक थे? क्या पुराने कानूनों का पूरा इस्तेमाल किया गया? और क्या इन कानूनों से न्याय व्यवस्था मजबूत होगी या केवल भय का माहौल बनेगा? किसी भी कानून का प्रभाव केवल अपराधियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसका असर व्यापक सामाजिक वातावरण पर पड़ता है। जब कानून अत्यधिक कठोर हो जाते हैं, तो वे केवल अपराध को नियंत्रित करने का माध्यम नहीं रहते, बल्कि समाज में भय और नियंत्रण का एक ढांचा भी निर्मित करते हैं। यह खतरा तब और बढ़ जाता है जब कानूनों का इस्तेमाल चयनात्मक रूप से होने लगे। ऐसे में कानून न्याय का उपकरण कम और सत्ता के नियंत्रण का माध्यम अधिक प्रतीत होने लगता है।

छत्तीसगढ़ के ये नए कानून केवल एक राज्य की कहानी नहीं हैं, बल्कि उस व्यापक सोच का हिस्सा हैं जिसमें समस्याओं का समाधान ‘अधिक सख्ती’ में खोजा जा रहा है। लेकिन इतिहास और अनुभव यह बताते हैं कि कानून की कठोरता से अधिक महत्वपूर्ण उसका निष्पक्ष और प्रभावी क्रियान्वयन होता है। जब तक जांच प्रणाली मजबूत नहीं होगी, अदालतों में मामलों का समयबद्ध निपटारा नहीं होगा, और प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक नए और अधिक कठोर कानून भी वही परिणाम देंगे जो पुराने कानून देते आए हैं। आखिरकार, लोकतंत्र की असली परीक्षा कानूनों की संख्या या उनकी सख्ती में नहीं, बल्कि इस बात में है कि वे नागरिकों के जीवन में न्याय, विश्वास और समानता कितनी प्रभावी ढंग से स्थापित कर पाते हैं। 

कैमरे की कलम: नशे की खेती और सत्ता की खामोशी


छत्तीसगढ़ को लंबे समय तक “धान का कटोरा” कहा जाता रहा है। यह नाम केवल कृषि उत्पादन का प्रतीक नहीं था, बल्कि उस सामाजिक पहचान का भी संकेत था जिसमें मेहनत, खेती और सादगी की संस्कृति शामिल थी। लेकिन हाल के दिनों में जिस तरह अफीम (पॉपी) की अवैध खेती के मामले सामने आ रहे हैं, वे इस पहचान पर एक असहज प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं। दुर्ग और बलरामपुर में अफीम की खेती के अब तक तीन मामले उजागर हो चुके हैं। यह घटनाएँ केवल कानून-व्यवस्था से जुड़ी सामान्य खबरें नहीं हैं; यह उस खतरनाक प्रवृत्ति की ओर इशारा करती हैं जो समय रहते न रोकी गई तो आने वाले वर्षों में सामाजिक और पीढ़ीगत संकट का रूप ले सकती है। हालांकि अवैध रूप से हो रही अफीम की खेती के खुलासे के बाद राज्य सरकार पूरी तरह एक्शन मोड में आ गई है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने इस मामले पर कड़ा रुख अपनाते हुए सभी जिलों के कलेक्टरों को सख्त निर्देश जारी किए हैं। उन्होंने कहा है कि यह सुनिश्चित किया जाए कि राज्य के किसी भी हिस्से में अवैध रूप से अफीम की खेती न हो।राज्य में अवैध मादक पदार्थों के उत्पादन और कारोबार के प्रति सरकार की नीति ‘जीरो टॉलरेंस’ की है।  

इन मामलों का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि अफीम की खेती कोई छोटी या छिपी हुई गतिविधि नहीं होती। इसके लिए जमीन, संसाधन, श्रम और समय चाहिए। पौधे अचानक रातोंरात खेतों में खड़े नहीं हो जाते। इसका अर्थ साफ है कि यह सब लंबे समय से चल रहा था और किसी न किसी स्तर पर प्रशासनिक निगाहों से बचता रहा। सवाल यही है कि क्या सचमुच यह सब नजरों से ओझल था, या फिर व्यवस्था ने देखने की जरूरत ही नहीं समझी?

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि भारत में अफीम की खेती सामान्य कृषि की तरह स्वतंत्र नहीं है। यह पूरी तरह नियंत्रित और लाइसेंस आधारित गतिविधि है। केंद्र सरकार के अधीन केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो (CBN) किसानों को लाइसेंस जारी करता है और यह अनुमति केवल कुछ निर्धारित राज्यों के सीमित क्षेत्रों तक ही दी जाती है। वर्तमान में मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों में ही चिकित्सा और वैज्ञानिक उद्देश्यों के लिए अफीम की खेती की अनुमति है। छत्तीसगढ़ इस सूची में शामिल नहीं है। इसलिए यहां अफीम की खेती का पाया जाना केवल एक कृषि अपराध नहीं बल्कि कानून की खुली अवहेलना है।

लेकिन विडंबना यह है कि यह अवैध खेती केवल खेतों तक सीमित मुद्दा नहीं बनती। इसके साथ एक पूरा अवैध आर्थिक तंत्र जुड़ जाता है—तस्करी, अवैध व्यापार, संगठित अपराध और राजनीतिक संरक्षण की आशंकाएँ। हालिया मामलों में करोड़ों रुपये की अवैध आय का अनुमान लगाया गया है और कई गिरफ्तारियाँ भी हुई हैं। इस प्रकरण में भाजपा से जुड़े नेता विनायक ताम्रकार की गिरफ्तारी हुई, वहीं कृषि विभाग की अधिकारी एकता साहू को निलंबित किया गया। इसके बाद स्वाभाविक रूप से राजनीतिक बयानबाजी शुरू हुई और विपक्ष को सरकार को घेरने का अवसर मिल गया।

लेकिन यहाँ एक मूलभूत सवाल उठता है—क्या समस्या केवल इतनी है कि किसी एक नेता या एक अधिकारी के अलावा कुछ ही लोगों की भूमिका सामने आ गई? या फिर यह मामला उस बड़े ढांचे की ओर संकेत करता है जिसमें अपराध, प्रशासनिक ढिलाई और राजनीतिक स्वार्थ एक दूसरे से टकराते भी हैं और कभी-कभी एक दूसरे को ढकते भी हैं?

भारतीय राजनीति में यह एक परिचित दृश्य है कि जैसे ही कोई बड़ा मामला सामने आता है, सत्ता और विपक्ष अपनी-अपनी भूमिकाओं में सक्रिय हो जाते हैं। सत्ता पक्ष कार्रवाई और सख्ती की बात करता है, जबकि विपक्ष इसे शासन की विफलता का प्रमाण बताता है। लेकिन अक्सर इस राजनीतिक शोर के बीच असली मुद्दा पीछे छूट जाता है—कि यह सब शुरू कैसे हुआ और इतने समय तक चलता कैसे रहा।

छत्तीसगढ़ में शराब और गांजा की अवैध खेप की खबरें पहले भी सामने आती रही हैं। यह भी कोई रहस्य नहीं कि इनका एक समानांतर नेटवर्क लंबे समय से सक्रिय है। सरकारें बदलती रहीं, लेकिन नशे के कारोबार की खबरें भी समय-समय पर सामने आती रहीं। फर्क सिर्फ इतना रहा कि हर बार मामला कुछ गिरफ्तारियों, कुछ बयानबाजियों और कुछ निलंबनों के बाद धीरे-धीरे शांत हो गया। 

इतिहास बताता है कि जब किसी समाज में नशे का कारोबार धीरे-धीरे अपनी जड़ें जमाता है, तो उसके प्रभाव केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं रहते। वह समाज की आत्मा तक को प्रभावित करता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण पंजाब है। कभी अपनी कृषि समृद्धि, मेहनतकश संस्कृति और आर्थिक मजबूती के लिए जाना जाने वाला पंजाब धीरे-धीरे नशे की समस्या से जूझने लगा। यह प्रक्रिया अचानक नहीं हुई। वर्षों तक छोटे-छोटे संकेत मिलते रहे—तस्करी की खबरें, युवाओं में बढ़ती लत, और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप। लेकिन जब तक समाज और व्यवस्था ने इसकी गंभीरता को पूरी तरह समझा, तब तक स्थिति काफी जटिल हो चुकी थी।

इसी पृष्ठभूमि में “उड़ता पंजाब” जैसा शब्द सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बना। यह केवल एक फिल्म का नाम नहीं था, बल्कि एक सामाजिक सच्चाई का प्रतीक बन गया—एक ऐसा राज्य जो कभी समृद्धि का प्रतीक था, लेकिन नशे के जाल में उलझता चला गया। छत्तीसगढ़ के सामने आज वही सवाल खड़ा होता दिखाई देता है। क्या यह केवल कुछ एकाकी घटनाएँ हैं या फिर किसी बड़े नेटवर्क की शुरुआती झलक? क्या यह केवल कुछ व्यक्तियों की गलती है या फिर उस व्यवस्था की कमजोरी का परिणाम है जो समय रहते संकेतों को समझ नहीं पाती?

अक्सर प्रशासनिक तंत्र की सबसे बड़ी समस्या यह नहीं होती कि उसे कुछ पता नहीं होता, बल्कि यह होती है कि उसे बहुत कुछ पता होने के बावजूद वह समय रहते कार्रवाई नहीं करता। जब तक मामला सार्वजनिक नहीं हो जाता, तब तक फाइलें चलती रहती हैं, नोटिंग्स होती रहती हैं और जिम्मेदारी कहीं न कहीं टलती रहती है।

जब खेतों में धान बोया जाता है तो उसे समर्थन मूल्य, बीमा योजना और कृषि विभाग की योजनाओं की जरूरत होती है। लेकिन जब उन्हीं खेतों में अफीम उगने लगती है, तो व्यवस्था को अचानक पता चलता है कि यह सब “गंभीर अपराध” है। तब छापे पड़ते हैं, बयान जारी होते हैं और कार्रवाई का प्रदर्शन शुरू हो जाता है। सवाल यह नहीं है कि कार्रवाई हुई या नहीं। सवाल यह है कि कार्रवाई इतनी देर से क्यों हुई।

किसी भी राज्य में अफीम जैसी फसल का उगना केवल अपराधियों की चतुराई का परिणाम नहीं होता। इसके पीछे जमीन, नेटवर्क, बाजार और संरक्षण की संभावनाएँ होती हैं। यदि इन संभावनाओं को समय रहते खत्म न किया जाए, तो वे धीरे-धीरे एक संगठित व्यवस्था का रूप ले लेती हैं।

छत्तीसगढ़ के लिए यह एक चेतावनी का क्षण है। यदि इसे केवल एक राजनीतिक मुद्दा बनाकर छोड़ दिया गया, तो आने वाले वर्षों में यह समस्या कहीं अधिक गंभीर रूप ले सकती है। नशे का कारोबार केवल अपराध नहीं पैदा करता, बल्कि सामाजिक विघटन भी पैदा करता है। इसका सबसे बड़ा प्रभाव युवाओं पर पड़ता है, जो किसी भी समाज की ऊर्जा और भविष्य होते हैं। इसलिए जरूरी है कि इस पूरे प्रकरण को केवल एक घटना या एक विवाद के रूप में न देखा जाए। इसकी व्यापक और निष्पक्ष जांच हो, जिम्मेदारियों को स्पष्ट किया जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि ऐसी घटनाएँ दोबारा न हों। 

कैमरे की कलम: सड़क पर अभियान नहीं, व्यवस्था और व्यवहार में बदलाव की दरकार


छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में सकरी- पेंड्रीडीह बाइपास की हालिया सड़क दुर्घटना की तस्वीरें और वीडियो किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को भीतर तक झकझोर देने के लिए काफी हैं। सड़क पर बिखरे मलबे के बीच पसरा सन्नाटा और रोते-बिलखते परिजन, ये दृश्य सिर्फ एक हादसे का नहीं बल्कि उस व्यवस्था की विफलता का आईना हैं, जो हर साल हजारों जिंदगियां निगल रही है। यह कोई इकलौती घटना नहीं है। कुछ दिन पहले ही एक पिता अपनी पत्नी और बच्चे के शव से लिपटकर विलाप करता दिखाई दिया था। कहीं तेज रफ्तार बाइक पर निकला घर का इकलौता बेटा कभी लौटकर नहीं आया। हर ऐसी खबर एक परिवार के उजड़ने की कहानी है, जिसे हम पढ़ते हैं, अफसोस जताते हैं और फिर अगली सुर्खी की ओर बढ़ जाते हैं।

देश के साथ-साथ राज्य में भी सड़क सुरक्षा को लेकर वर्षों से अभियान चलाए जा रहे हैं। पहले सड़क सुरक्षा सप्ताह मनाया गया, फिर पखवाड़ा और अब सड़क सुरक्षा माह। जगह-जगह बैनर, पोस्टर, रैलियां, शपथ ग्रहण, स्कूलों में भाषण—सब कुछ होता है। आंकड़ों की समीक्षा बैठकों में होती है, योजनाएं बनती हैं, लक्ष्य तय होते हैं। लेकिन जमीनी हकीकत यही है कि हादसों की रफ्तार कम होने के बजाय कई जगह बढ़ी है। इसका सीधा अर्थ है कि हमारे प्रयास या तो नाकाफी हैं या फिर केवल औपचारिकता तक सीमित रह गए हैं।

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि नियमों का पालन कराने की जिम्मेदारी जिन पर है, वे स्वयं कई बार नियमों की अनदेखी करते दिखाई देते हैं। मंत्री, विधायक, वरिष्ठ अधिकारी—कई बार सार्वजनिक कार्यक्रमों में बिना सीट बेल्ट या बिना हेलमेट नजर आते हैं। संदेश देने के नाम पर निकाली जाने वाली बाइक रैलियों में शामिल अधिकांश लोग हेलमेट नहीं पहनते। जब नेतृत्वकर्ता ही उदाहरण प्रस्तुत नहीं करेंगे, तो आम नागरिक से अनुशासन की अपेक्षा कैसे की जा सकती है?

सड़क दुर्घटनाओं से होने वाली मौतों के आंकड़े भयावह हैं। हर साल इतनी जिंदगियां चली जाती हैं, जितनी कई छोटे शहरों की कुल आबादी होती है। यह केवल आंकड़ा नहीं, सामाजिक त्रासदी है। हर मृतक के पीछे एक परिवार है, जिसकी आर्थिक और भावनात्मक दुनिया एक पल में बिखर जाती है। कई घरों में कमाने वाला सदस्य चला जाता है, बच्चों का भविष्य अधर में लटक जाता है।

इस स्थिति के लिए केवल तेज रफ्तार या लापरवाह चालक ही जिम्मेदार नहीं हैं। खराब सड़कें, गड्ढे, अपर्याप्त संकेतक, स्ट्रीट लाइट की कमी, ओवरलोड वाहन, और बिना उचित परीक्षण के जारी किए गए ड्राइविंग लाइसेंस भी उतने ही बड़े कारण हैं। यदि आरटीओ में लाइसेंस वास्तविक ड्राइविंग परीक्षा के बजाय कागजी प्रक्रिया बनकर रह जाए, तो सड़क पर अयोग्य चालक उतरेंगे ही। यदि सड़क निर्माण में गुणवत्ता से समझौता होगा, तो दुर्घटनाएं बढ़ेंगी ही।

जरूरत इस बात की है कि सड़क सुरक्षा को ‘अभियान’ नहीं, ‘निरंतर जिम्मेदारी’ के रूप में लिया जाए। जिस तरह स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव जैसे कार्यक्रमों का व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ, उसी तरह सड़क सुरक्षा को वर्ष भर प्राथमिकता दी जाए। पुलिस की मौजूदगी सिर्फ चालान काटने तक सीमित न रहे, बल्कि अनुशासन की संस्कृति विकसित करे। जनप्रतिनिधि और अधिकारी सार्वजनिक रूप से नियमों का पालन करते हुए उदाहरण प्रस्तुत करें। स्कूलों और कॉलेजों में सड़क सुरक्षा शिक्षा को व्यवहारिक रूप से जोड़ा जाए, केवल भाषणों तक सीमित न रखा जाए।

सड़क सुरक्षा का असली संदेश पोस्टर या मंच से नहीं, सड़क पर दिखने वाले आचरण से जाएगा। जब लोग देखेंगे कि नियम तोड़ना आसान नहीं और नियम मानना सम्मान की बात है, तभी बदलाव संभव होगा। यह समझना होगा कि सड़क पर चलने वाला हर व्यक्ति सिर्फ एक वाहन चालक नहीं, बल्कि किसी का बेटा, बेटी, पिता, मां या जीवनसाथी है। एक क्षण की लापरवाही, एक गलत निर्णय या एक प्रशासनिक ढिलाई पूरे परिवार की दुनिया बदल सकती है।

अब समय आ गया है कि सड़क सुरक्षा को औपचारिकता के दायरे से निकालकर जीवन की प्राथमिकता बनाया जाए। वरना हम हर वर्ष नए संकल्प लेते रहेंगे और हर वर्ष नई शोकसभाओं में शामिल होते रहेंगे। सवाल यह नहीं कि सड़क सुरक्षा माह कब मनाया जाएगा; सवाल यह है कि क्या हम सच में किसी घर का चिराग बुझने से बचाने के लिए तैयार हैं?

कैमरे की कलम: “नौकरी का विज्ञापन और ठगी का राष्ट्रनिर्माण”


बिलासपुर जिले के कोटा ब्लॉक मुख्यालय में जय स्तम्भ पर लगा यह पोस्टर अपने आप में केवल एक “नौकरी का विज्ञापन” नहीं, बल्कि बेरोजगारी के बाजार में चल रहे उस संगठित भ्रम उद्योग का जीवंत उदाहरण है, जिसमें शब्द रोजगार के होते हैं और परिणाम अक्सर शोषण के। इस पोस्टर में बड़े अक्षरों में लिखा है—“नौकरी चाहिए, फोन घुमाइए”। यह वाक्य सुनने में जितना सरल और आकर्षक लगता है, उतना ही खतरनाक भी हो सकता है। क्योंकि जिस देश में लाखों युवा वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं, वहां अगर केवल “फोन घुमाने” से 18,500 से 21,500 रुपये महीने की नौकरी मिलने लगे, तो यह रोजगार कम और चमत्कार अधिक प्रतीत होता है। 

पोस्टर में दावा किया गया है कि कंपनी को “हेल्पर की जरूरत है”, पोस्टर में यह भी लिखा है कि “कंपनी की तरफ से रूम फ्री” और “आने-जाने के लिए गाड़ी फ्री” होगी। यह पढ़कर ऐसा लगता है कि कंपनी को कर्मचारी नहीं, दामाद चाहिए। यह सुविधाएं किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी के पैकेज जैसी लगती हैं, लेकिन पोस्टर में कंपनी का नाम, उसका पंजीयन नंबर, लाइसेंस विवरण या कोई वैधानिक पहचान स्पष्ट रूप से उल्लेखित नहीं है। यह वही खामोशी है, जिसमें अक्सर धोखाधड़ी की आवाज छिपी होती है। इस पोस्टर में स्थानीय स्तर पर बिलासपुर (छत्तीसगढ़) का संपर्क नंबर दिया गया है, जबकि “डायरेक्टर” जिग्नेश भाई पटेल का नाम गुजरात के भरूच से जुड़ा बताया गया है। यह भौगोलिक दूरी और स्थानीय संपर्क का संयोजन ठगी के कई पुराने मामलों में देखा गया पैटर्न है जहां स्थानीय व्यक्ति केवल एक माध्यम होता है और वास्तविक संचालन कहीं और से होता है। 

दरअसल देश में बेरोजगारी अब केवल एक आंकड़ा नहीं रही, यह एक ऐसा खुला बाजार बन चुकी है, जहां नौकरी से ज्यादा नौकरी का भ्रम बिकता है। और इस भ्रम के सबसे बड़े कारोबारी वे लोग हैं, जो रोजगार नहीं देते, बल्कि रोजगार की कल्पना का प्राइवेट लिमिटेड संस्करण बेचते हैं। यह एक ऐसा स्टार्टअप इकोसिस्टम है, जहां निवेश बेरोजगारों की उम्मीदें होती हैं और मुनाफा उनके आत्मसम्मान से वसूला जाता है। आज का ठग पुराना ठग नहीं रहा। वह अब जेबकतरा नहीं, बल्कि “डिजिटल एचआर मैनेजर” बन चुका है। वह अब स्टेशन पर खड़े होकर नहीं कहता—“चलो मुंबई, नौकरी दिलाएंगे।” अब वह लिंक्डइन पर प्रोफाइल बनाता है, इंस्टाग्राम पर विज्ञापन चलाता है और वाट्सऍप  पर “Congratulations” लिखकर बेरोजगार युवक को यह एहसास दिलाता है कि देश की अर्थव्यवस्था अब उसी के भरोसे चल रही है।

विडंबना यह है कि जिस देश में एक वास्तविक नौकरी पाने के लिए युवा वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं में खप जाता है, उसी देश में एक फर्जी नौकरी देने वाला व्यक्ति मात्र एक सिम कार्ड और एक फर्जी लोगो से “मल्टीनेशनल कंपनी” बन जाता है। यह स्टार्टअप इंडिया का वह अंधेरा पक्ष है, जहां नवाचार का उपयोग रोजगार सृजन के लिए नहीं, बल्कि रोजगार भ्रम सृजन के लिए किया जा रहा है। 

इन ठगों की कार्यप्रणाली अत्यंत वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक है। वे जानते हैं कि बेरोजगार युवक को सबसे ज्यादा किस शब्द की भूख होती है—“Selected”। यह शब्द सुनते ही युवक की आंखों में वह चमक आ जाती है, जो वर्षों की असफलताओं ने बुझा दी थी। और यही वह क्षण होता है, जब ठग अपनी पहली किस्त वसूलता है—“रजिस्ट्रेशन फीस” के नाम पर। इसके बाद शुरू होता है शुल्कों का एक ऐसा सिलसिला, जो कभी समाप्त नहीं होता—ट्रेनिंग फीस, सिक्योरिटी फीस, प्रोसेसिंग फीस। यह फीस दरअसल नौकरी की नहीं, बल्कि ठगी की प्रक्रिया को वैधता देने का टैक्स होता है।

जब युवक पैसे दे देता है, तो उसे दूसरे राज्य भेज दिया जाता है। वहां उसका स्वागत किसी एयरपोर्ट मैनेजर के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे श्रमिक के रूप में होता है, जिसकी स्वतंत्रता पहले ही किस्त में गिरवी रखी जा चुकी होती है। वह समझ जाता है कि उसे नौकरी नहीं मिली, बल्कि उसे बेच दिया गया है—उसके श्रम को, उसकी मजबूरी को और उसके सपनों को।

यहां सबसे गंभीर प्रश्न ठगों की मौजूदगी नहीं, बल्कि उनकी निर्भीकता है। यह निर्भीकता उन्हें किसी अदृश्य शक्ति से नहीं, बल्कि व्यवस्था की सुस्ती से मिलती है। फर्जी विज्ञापन खुलेआम सोशल मीडिया पर चलते रहते हैं, हजारों लोगों तक पहुंचते हैं, लेकिन कार्रवाई का पहिया तब घूमता है, जब पीड़ित युवक थाने पहुंचकर अपनी मूर्खता का प्रमाण देने लगता है। व्यवस्था का रवैया भी कम व्यंग्यात्मक नहीं है। जब कोई युवक शिकायत करता है, तो उससे पूछा जाता है—“तुमने पैसे क्यों दिए?” यह प्रश्न दरअसल एक प्रशासनिक दर्शन को प्रकट करता है—कि अपराध से ज्यादा गंभीर गलती विश्वास करना है।

यह स्थिति केवल कानून-व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि सामाजिक संवेदनहीनता का भी प्रमाण है। क्योंकि ठग केवल पैसे नहीं चुराते, वे उस विश्वास को चुराते हैं, जिस पर समाज टिका होता है। वे केवल एक युवक को नहीं ठगते, बल्कि एक पूरे परिवार की आशाओं को दिवालिया घोषित कर देते हैं। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अधिक संगठित और पेशेवर अगर कोई है, तो वह ठग है। उसके पास मार्केटिंग टीम है, फर्जी रिव्यू हैं, आकर्षक वेबसाइट है, और सबसे महत्वपूर्ण—उसे यह विश्वास है कि उसके खिलाफ कार्रवाई देर से ही होगी।

इसके विपरीत, पीड़ित युवक के पास केवल एक शिकायत होती है और एक लंबा इंतजार। यह स्थिति किसी भी सभ्य समाज के लिए चिंता का विषय होनी चाहिए।क्योंकि जब अपराध तकनीकी रूप से आधुनिक हो जाए और कानून मानसिक रूप से परंपरागत बना रहे, तो न्याय हमेशा पीछे रह जाता है।

यह आवश्यक है कि व्यवस्था केवल अपराध होने के बाद सक्रिय न हो, बल्कि अपराध होने से पहले सतर्क हो। फर्जी प्लेसमेंट एजेंसियों का सत्यापन, सोशल मीडिया विज्ञापनों की निगरानी और त्वरित कार्रवाई—ये केवल प्रशासनिक विकल्प नहीं, बल्कि नैतिक दायित्व हैं। लेकिन फिलहाल स्थिति यह है कि बेरोजगार युवक नौकरी की तलाश में है और ठग बेरोजगार युवकों की तलाश में। 

क्या बिलासपुर लूटकांड राज्य की कानून-व्यवस्था पर सवाल है ?


बिलासपुर के राजकिशोर नगर में सराफा व्यापारी संतोष तिवारी पर हमले और करोड़ों की लूट की घटना केवल एक आपराधिक वारदात नहीं है; यह राज्य की कानून-व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न भी खड़ा करती है। जिस दुस्साहस के साथ नकाबपोश बदमाशों ने रिहायशी और व्यस्त इलाके में व्यापारी की कार को घेरकर जानलेवा हमला किया, हथियार लहराए और करोड़ों का माल लेकर फरार हो गए, वह आम नागरिक की सुरक्षा भावना को झकझोरने वाला है।

यह घटना कई स्तरों पर चिंताजनक है। पहला, अपराधियों का आत्मविश्वास। शहर के बीचों बीच, रात के समय, योजनाबद्ध तरीके से वारदात को अंजाम देना इस बात का संकेत देता है कि उन्हें कानून के तत्काल भय का अंदेशा नहीं था। यदि आरोप सही हैं कि रेकी कर रणनीति बनाई गई, तो यह संगठित अपराध की ओर भी इशारा करता है।

दूसरा, खुफिया और निवारक तंत्र की प्रभावशीलता। सवाल यह उठता है कि क्या शहर में अपराध की संभावनाओं को लेकर पर्याप्त सतर्कता थी? क्या संवेदनशील व्यापारिक गतिविधियों से जुड़े लोगों की सुरक्षा के लिए कोई विशेष प्रावधान या निगरानी व्यवस्था थी? यदि अपराधी चोरी के वाहन लेकर आए और उन्हें घटनास्थल पर छोड़कर आगे निकल गए, तो यह जांच एजेंसियों के लिए चुनौती के साथ-साथ व्यवस्था की खामियों का संकेत भी है।

तीसरा, सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा की धारणा। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार हथियार दिखाकर दहशत फैलाना और कथित तौर पर फायरिंग जैसी आवाजें सुनाई देना यह दर्शाता है कि अपराधियों ने भीड़भाड़ वाले इलाके को भी जोखिम नहीं माना। यह स्थिति नागरिकों के मन में भय और अविश्वास पैदा करती है।

पूरी ख़बर पढ़ें - नकाबपोशों का आतंक: व्यापारी पर जानलेवा हमला, पौने चार करोड़ का सोना लूटा; पुलिस के हाथ खाली

हालांकि पुलिस ने नाकेबंदी, विशेष टीम गठन और सीसीटीवी फुटेज की जांच जैसे कदम उठाए हैं, लेकिन यह कार्रवाई घटना के बाद की है। असली प्रश्न यह है कि क्या ऐसी घटनाओं को रोका जा सकता था? कानून-व्यवस्था केवल अपराध के बाद सक्रिय होने का नाम नहीं, बल्कि अपराध की संभावना को न्यूनतम करने की क्षमता भी है।

राजनीतिक स्तर पर आरोप-प्रत्यारोप स्वाभाविक हैं, परंतु इससे आगे बढ़कर यह आवश्यक है कि सरकार और पुलिस तंत्र इस घटना को चेतावनी के रूप में लें। व्यापारिक वर्ग की सुरक्षा, रात में गश्त की सघनता, तकनीकी निगरानी और खुफिया तंत्र की मजबूती, इन सभी पर पुनर्विचार की जरूरत है।

बिलासपुर की यह घटना एक शहर तक सीमित नहीं है। यह राज्य की व्यापक सुरक्षा व्यवस्था पर विमर्श का अवसर भी है। यदि संगठित और योजनाबद्ध अपराधों के प्रति सख्त और त्वरित प्रतिक्रिया नहीं दी गई, तो अपराधियों का मनोबल बढ़ना स्वाभाविक है।

अंततः, कानून-व्यवस्था केवल आंकड़ों का विषय नहीं, बल्कि नागरिकों के विश्वास का प्रश्न है। जब आम नागरिक स्वयं को असुरक्षित महसूस करने लगे, तो यह किसी भी शासन-व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी होती है। अब देखना यह है कि यह घटना सुधार का कारण बनती है या केवल एक और ‘फाइल’ बनकर रह जाती है।

कैमरे की कलम: चिट्टा, सट्टा और सत्ता, खाकी की उलझी कहानी


पुलिस की वर्दी केवल खाकी कपड़ा नहीं राज्य की शक्ति और जनता के भरोसे का प्रतीक है। जब वही वर्दी कटघरे में खड़ी होती है, तो केवल व्यक्ति नहीं, पूरी संस्था सवालों में घिर जाती है। पुलिस को केवल कानून लागू करने वाली संस्था नहीं, बल्कि राज्य के नैतिक प्रतिनिधि के रूप में भी देखा जाता है और इसलिए जब पुलिस व्यवस्था पर बेईमानी, मिलीभगत या पद के दुरुपयोग के आरोप लगते हैं, तो सवाल केवल व्यक्तियों पर नहीं उठते, वे वैधता की जड़ों तक पहुँचते हैं। हाल के वर्षों में देश के कई हिस्सों से ऐसी घटनाएँ सामने आईं जिनमें पुलिसकर्मियों पर महिलाओं के यौन शोषण, नशे के कारोबार में संलिप्तता से लेकर आर्थिक अनियमितताओं और सट्टा नेटवर्क से जुड़ाव तक के आरोप लगे। छत्तीसगढ़ इससे बिल्कुल भी अछूता नहीं है, छत्तीसगढ़ पुलिस में ऐसे दर्जनों आईपीएस अफसर हैं  जिन पर अपनी हवस मिटाने के लिए महिलाओं के जिस्म नोचने के आरोप लगे है। नीचे से लेकर बड़े साहबों तक नाम के साथ आरोपों की फेहरिस्त लम्बी है। फिलहाल हिमांशु बर्मन, कल्पना वर्मा और सहदेव यादव जैसे बेईमान पुलिस वालों के लिए इस आदर्श वाक्य “सेवा और सुरक्षा” के मायने ही अलग हैं। मुझे लगता है इन लोगों की पारिवारिक पृष्ठभूमि में संस्कारों की कमी रही होगी, ये तीनों ही चेहरे चरित्र की बुनियादी परीक्षा में विफल रहे ? ये रही उनकी कहानियां। 

राजधानी रायपुर में नशे के खिलाफ चल रहे अभियान के बीच एक पुलिस आरक्षक हिमांशु बर्मन की प्रतिबंधित हेरोइन (चिट्टा) के साथ गिरफ्तारी ने एक असहज प्रश्न खड़ा कर दिया है। यह प्रश्न केवल एक व्यक्ति के आचरण तक सीमित नहीं है; यह उस व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा है जो स्वयं को कानून का प्रहरी कहती है। पुलिस के अनुसार सूचना के आधार पर आरक्षक हिमांशु बर्मन को कथित रूप से हेरोइन के साथ पकड़ा गया। वरिष्ठ अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि मामले की जांच जारी है, आरोपी को रिमांड पर लेकर पूछताछ की जा रही है और सप्लाई चेन की हर कड़ी तक पहुंचने का प्रयास होगा। आधिकारिक बयान यह भी कहता है कि “कोई भी हो, बख्शा नहीं जाएगा।” राजधानी रायपुर में हाल के महीनों में सूखे नशे के खिलाफ पुलिस की सक्रियता स्पष्ट रही है। कई मामले दर्ज हुए, आरोपियों की गिरफ्तारी हुई, बड़ी मात्रा में प्रतिबंधित सामग्री जब्त की गई। ऐसे में जब उसी विभाग का एक सदस्य कथित रूप से इस अवैध कारोबार में संलिप्त पाया जाता है, तो यह विडंबना को जन्म देता है। एक ओर सख्त संदेश, दूसरी ओर अंदरूनी दरार, यह विरोधाभास केवल प्रशासनिक चुनौती नहीं, नैतिक संकट भी है। 

हर संस्था में व्यक्तिगत चूक संभव है। यह तर्क अक्सर दिया जाता है कि कुछ मामलों के आधार पर पूरे विभाग को कठघरे में नहीं खड़ा किया जा सकता। यह बात सही भी है। हजारों पुलिसकर्मी कठिन परिस्थितियों में, सीमित संसाधनों के बीच, जोखिम उठाकर अपनी ड्यूटी निभाते हैं लेकिन जब समय-समय पर विभाग के भीतर से अनियमितताओं के आरोप सामने आते हैं, चाहे वह नशे का मामला हो, कथित आर्थिक अनियमितता हो, महिलाओं के यौन शोषण का हो या गोपनीय जानकारी लीक करने का आरोप। ऐसे में पुलिस अधिकारियों ने अपराध के खिलाफ “जीरो टॉलरेंस” की नीति दोहराई है। यह नीति तब सार्थक होती है जब वह बाहरी अपराधियों के साथ-साथ विभाग के भीतर भी समान कठोरता से लागू हो। 

पुलिस और नागरिक के बीच संबंध भय पर नहीं, विश्वास पर टिके होते हैं। जब नागरिक शिकायत लेकर थाने जाता है, तो वह राज्य की निष्पक्षता पर भरोसा करता है। यदि उसी राज्य के प्रतिनिधि (पुलिस) पर गंभीर आरोप लगे हों, तो यह भरोसा डगमगाता है। विश्वास का क्षरण अचानक नहीं होता; वह घटनाओं की पुनरावृत्ति से बनता है। इसलिए प्रत्येक ऐसी घटना केवल एक केस फाइल नहीं, बल्कि सार्वजनिक धारणा का हिस्सा बन जाती है। ऐसा पहली बार नहीं है जब छत्तीसगढ़ पुलिस की छवि पर सवाल उठे हों। अक्टूबर 2025 में रायपुर क्राइम ब्रांच के छह पुलिसकर्मियों पर दुर्ग के एक कारोबारी की कार से कथित तौर पर 2 लाख रुपये चोरी करने के आरोप लगे थे। जांच के बाद एक आरक्षक को निलंबित किया गया था। इसी तरह, हाल ही में चर्चित महिला डीएसपी कल्पना वर्मा को गोपनीय जानकारी लीक करने के आरोप में निलंबित किया गया। उनके खिलाफ यह भी आरोप सामने आए कि रायपुर में पदस्थ रहते हुए उन्होंने एक कारोबारी के साथ कथित धोखाधड़ी की और उससे अवैध ढंग से दो करोड़ रूपये हासिल कर लिये। 

देशभर में चर्चित महादेव सट्टा ऐप मामले में कई नाम उछले। सैकड़ों करोड़ के इस कथित ऑनलाइन सट्टा कारोबार में राजनीतिक, कारोबारी और प्रशासनिक कड़ियों की चर्चा होती रही। इसी कड़ी में पुलिस आरक्षक सहदेव यादव का नाम महादेव सट्टा का पैनल चलाने वाले के रूप में सामने आया, सहदेव ने अकेले वर्दी को नहीं बेचा था बल्कि उसके दो अन्य भाइयों पर भी वर्दी की नीलामी के आरोप लगे। भाई जेल में हैं, सहदेव को सेवा से बर्खास्त कर जेल भेज दिया गया। यहां ये बताना भी लाज़िमी होगा कि बिलासपुर शहर के तत्कालीन एएसपी राजेंद्र जायसवाल पर हाल ही में एक स्पा सेंटर के संचालक ने मासिक वसूली के गंभीर आरोप लगाये थे। शिकायत के बाद राज्य के गृह विभाग ने उन्हें तत्काल निलंबित कर दिया। इन घटनाओं ने पुलिस व्यवस्था के भीतर जवाबदेही और निगरानी तंत्र को लेकर बहस तेज कर दी है।  

पुलिस व्यवस्था में पदानुक्रम कठोर है, कार्य-घंटे लंबे हैं, संसाधन सीमित हैं और राजनीतिक दबावों की चर्चा आम है। इन परिस्थितियों में यदि आंतरिक निगरानी ढीली हो, संपत्ति और आचरण की पारदर्शी समीक्षा औपचारिकता बन जाए, और शिकायत निवारण तंत्र स्वतंत्र न हो, तो संस्थागत दरारें गहरी होती जाती हैं। दरारों में ही भ्रष्टाचार का पानी भरता है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि उपभोक्तावाद का दबाव केवल नागरिकों पर नहीं, वर्दीधारियों पर भी है। महंगे फोन, गाड़ियाँ, प्रभावी जीवनशैली। ये आकांक्षाएँ सामाजिक परिवेश का हिस्सा हैं। पर समस्या तब शुरू होती है जब आकांक्षा और आय के बीच की खाई को पद के प्रभाव से पाटने की कोशिश की जाती है। वर्दी तब साधन बन जाती है सेवा का नहीं, सौदे का। 

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