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कैमरे की कलम: लापरवाही, लालच और लाचार व्यवस्था


कभी चिकित्सा को सेवा कहा जाता था। डॉक्टरों को भगवान का दर्जा दिया जाता था। अस्पतालों को वह स्थान माना जाता था जहां जीवन को दूसरा अवसर मिलता है। लेकिन आज का कटु यथार्थ इस आदर्श से उतना ही दूर है जितना विश्वास और अनुभव के बीच की खाई। ताजा मामला श्रीराम केयर अस्पताल का है, जहां एक पुलिसकर्मी सत्यकुमार पाटले की मौत ने फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या अब अस्पताल इलाज के केंद्र हैं या व्यवस्थित ‘राजस्व मशीन’? 

एक सामान्य पथरी का ऑपरेशन जिसे चिकित्सा जगत में रूटीन प्रक्रिया माना जाता है। उसके बाद मरीज की हालत स्थिर बताई जाती है, परिजनों को भरोसा दिया जाता है, और फिर अचानक मौत। उसके बाद शुरू होता है वही पुराना खेल कारणों का उलझाव, बयान बदलते डॉक्टर, और जिम्मेदारी से बचने की अदृश्य दौड़। अस्पताल कहता है ‘हार्ट अटैक’, परिजन कहते हैं ‘लापरवाही’। सच्चाई पोस्टमार्टम रिपोर्ट में दबी रह जाती है, और न्याय अक्सर फाइलों में।

लेकिन सवाल सिर्फ एक मौत का नहीं है। सवाल उस व्यवस्था का है जहां मरीज को इंसान नहीं, बल्कि ‘केस’ कहा जाता है। जहां भर्ती होते ही उसकी पहचान नाम से नहीं, फाइल नंबर से होती है। जहां इलाज की प्रक्रिया से पहले पैकेज तय होता है, और संवेदनशीलता से पहले अग्रिम जमा।

निजी अस्पतालों के गलियारों में एक अदृश्य अर्थशास्त्र चलता है—हर टेस्ट की कीमत है, हर घंटे की कीमत है, हर बेड की कीमत है, यहां तक कि हर सांस की भी कीमत तय होती दिखाई देती है। मरीज जितना अधिक समय अस्पताल में रहेगा, उतना अधिक ‘राजस्व’ उत्पन्न करेगा। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या इलाज की प्राथमिकता मरीज की जरूरत से तय होती है या अस्पताल के लाभ से?

परिजनों के आरोप—चार घंटे तक इलाज नहीं मिला—यदि सही हैं, तो यह केवल एक चिकित्सकीय चूक नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं का पतन है। अस्पताल, जो जीवन बचाने का स्थान होना चाहिए, यदि वहां मरीज तड़पता रह जाए और मशीनें मौन रहें, तो यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि एक प्रकार का संस्थागत अमानवीकरण है।

इस अस्पताल का अतीत भी विवादों से अछूता नहीं रहा है। आईसीयू में सुरक्षा जैसी बुनियादी जिम्मेदारी में चूक, कोरोना काल में कथित आर्थिक शोषण, और अब एक मौत पर उठते सवाल—यह सब मिलकर एक पैटर्न की ओर इशारा करते हैं। लेकिन इससे भी बड़ा सवाल यह है कि ऐसे संस्थान बार-बार सवालों के घेरे में आने के बावजूद निर्बाध रूप से कैसे चलते रहते हैं?

उत्तर स्पष्ट है—क्योंकि हमारी व्यवस्था में जवाबदेही का अभाव है।

स्वास्थ्य क्षेत्र में नियमों की कमी नहीं है। लाइसेंस, निरीक्षण, मानक, प्रोटोकॉल—सब कुछ मौजूद है। लेकिन इनका पालन कितना होता है? निरीक्षण अक्सर औपचारिकता बनकर रह जाते हैं। नोटिस जारी होते हैं, जवाब मांगा जाता है, और फिर फाइल बंद। इस प्रक्रिया में न तो किसी की जिम्मेदारी तय होती है, न ही किसी को सख्त दंड मिलता है। यह ढीलापन केवल प्रशासनिक कमजोरी नहीं, बल्कि एक प्रकार की मौन स्वीकृति है—कि ‘जो चल रहा है, चलने दो।’

एक आम नागरिक के लिए स्थिति और भी विडंबनापूर्ण है। सरकारी अस्पतालों में भीड़, संसाधनों की कमी और लंबी प्रतीक्षा उसे निजी अस्पतालों की ओर धकेलती है। लेकिन वहां पहुंचकर उसे राहत नहीं, बल्कि एक नए संघर्ष का सामना करना पड़ता है—आर्थिक शोषण का।

इलाज के नाम पर अनावश्यक जांच, महंगे पैकेज, अस्पष्ट बिलिंग, और हर कदम पर अतिरिक्त शुल्क—यह सब मिलकर एक ऐसा जाल बनाते हैं जिसमें मरीज और उसका परिवार फंस जाता है। बीमारी से ज्यादा डर अब अस्पताल के बिल का होता है।

कई परिवार इलाज के बाद केवल एक मरीज नहीं खोते, बल्कि अपनी वर्षों की जमा पूंजी भी खो देते हैं। कर्ज लेकर इलाज करवाना, जमीन गिरवी रखना, गहने बेच देना—यह सब अब असामान्य नहीं रहा।

यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है। हर डॉक्टर को दोषी ठहराना न तो उचित है, न ही न्यायसंगत। चिकित्सा क्षेत्र में आज भी ऐसे हजारों डॉक्टर हैं जो ईमानदारी और समर्पण से काम कर रहे हैं। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब चिकित्सा संस्थान ‘कॉर्पोरेट मॉडल’ पर चलने लगते हैं।

जब डॉक्टरों पर ‘टारगेट’ का दबाव होता है—इतने टेस्ट, इतने एडमिशन, इतनी सर्जरी—तो चिकित्सा निर्णय भी प्रभावित होते हैं। इलाज का केंद्र मरीज नहीं, बल्कि ‘प्रदर्शन’ बन जाता है। ऐसे में संवेदनशीलता धीरे-धीरे ‘प्रोफेशनल व्यवहार’ के पीछे छिप जाती है।

स्वास्थ्य सेवा का बाजारीकरण शायद इस पूरे संकट की जड़ है। जब स्वास्थ्य को ‘सेवा’ से ‘उद्योग’ में बदल दिया जाता है, तो प्राथमिकताएं स्वतः बदल जाती हैं। जहां पहले जीवन बचाना उद्देश्य था, वहां अब लाभ कमाना भी समानांतर लक्ष्य बन जाता है और जब लाभ और जीवन के बीच चयन करना हो, तो परिणाम अक्सर दुखद होते हैं।

हर बड़ी घटना के बाद वही प्रक्रिया दोहराई जाती है—जांच के आदेश, कमेटी का गठन, रिपोर्ट का इंतजार। लेकिन इन रिपोर्टों का क्या होता है? कितने मामलों में दोषियों को सजा मिलती है? कितने अस्पतालों का लाइसेंस रद्द होता है? सच यह है कि बहुत कम। यह स्थिति केवल लापरवाही नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता को दर्शाती है। जब तक दंड का भय नहीं होगा, तब तक सुधार की उम्मीद करना भी व्यर्थ है। यह केवल प्रशासन या अस्पतालों की जिम्मेदारी नहीं है। समाज को भी जागरूक होना होगा। मरीज के अधिकारों को जानना, बिलिंग पर सवाल उठाना, पारदर्शिता की मांग करना—यह सब आवश्यक है, चुप रहना अब विकल्प नहीं है।

इस घटना को केवल एक खबर की तरह पढ़कर भूल जाना आसान है। लेकिन यह समझना जरूरी है कि यह सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं है। यह उस व्यवस्था की विफलता का प्रतीक है जो हर दिन हजारों लोगों को प्रभावित करती है। यदि आज सवाल नहीं उठे, तो कल कोई और परिवार इसी दर्द से गुजरेगा।

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