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कैमरे की कलम: जंगल, कानून और ‘मूल्य’ की विडंबना


जंगलों को अक्सर “कानून से परे” नहीं, बल्कि “कानून के भीतर संरक्षित” माना जाता है। यही वह जगह है जहां नियम सबसे सख्त होने चाहिए क्योंकि यहां दांव पर केवल पेड़ नहीं, बल्कि पारिस्थितिकी, वन्यजीवन और भविष्य की पीढ़ियों का संतुलन होता है लेकिन जब इन्हीं कानूनों के संरक्षक, उनके अर्थ का मूल्य तय करने लगें, तो सवाल सिर्फ भ्रष्टाचार का नहीं, बल्कि नैतिक विघटन का भी हो जाता है। 

हालिया मामले में अचानकमार टाइगर रिजर्व के सुरही रेंज में पदस्थ रेंजर पल्लव नायक और डिप्टी रेंजर मनीष श्रीवास्तव पर 50 हजार रुपये की रिश्वत लेते रंगेहाथ पकड़े जाने का आरोप इसी विडंबना को उजागर करता है। आरोप यह है कि उन्होंने एक प्रकरण में चालान जल्दी पेश करने और जब्त वाहन छोड़ने के एवज में रिश्वत मांगी। पहली नजर में यह एक “रूटीन भ्रष्टाचार” जैसा लग सकता है। एक और ट्रैप, एक और गिरफ्तारी, एक और मामला। लेकिन अगर इस घटना को जंगल और वन्यजीवन की दृष्टि से देखा जाए, तो इसका अर्थ कहीं अधिक गहरा और चिंताजनक हो जाता है।

जंगल का कानून अपने आप में अनूठा होता है। यह सिर्फ कागज पर लिखे नियमों का समूह नहीं, बल्कि एक नैतिक अनुशासन है जिसमें मनुष्य को स्वयं को सीमित रखना होता है ताकि प्रकृति अपना संतुलन बनाए रख सके। जब कोई व्यक्ति जंगल में प्रवेश करता है, तो वह केवल एक स्थान में नहीं, बल्कि एक व्यवस्था में प्रवेश करता है, जहां हर पेड़, हर जीव, हर ध्वनि का अपना महत्व है। ऐसे में, जो लोग इस व्यवस्था की रक्षा के लिए नियुक्त किए जाते हैं, उनसे अपेक्षा होती है कि वे इस अनुशासन के सबसे बड़े संरक्षक होंगे लेकिन जब यही संरक्षक “नियमों की कीमत” तय करने लगें, तो सवाल उठता है क्या जंगल का कानून भी अब मोलभाव का विषय बन चुका है?

इस मामले में जिस तरह से कथित रूप से लाखों रुपये की बात की गई और फिर 70 हजार रुपये में “समाधान” तलाशा गया, वह केवल एक लेन-देन नहीं, बल्कि एक सोच का प्रतिबिंब है। यह सोच बताती है कि कानून को एक सेवा के रूप में देखा जा रहा है—जहां नियमों का पालन नहीं, बल्कि उनका “प्रबंधन” किया जाता है। और यह प्रबंधन अक्सर उन लोगों के पक्ष में झुक जाता है, जो इसकी कीमत चुका सकते हैं।

कल्पना कीजिए एक हिरण, जो अपनी सुरक्षा के लिए कानून पर निर्भर है, लेकिन कानून की ‘कीमत’ तय हो चुकी है। या एक पेड़, जो कटने से पहले यह नहीं पूछ सकता कि उसकी रक्षा के बदले कितनी रकम तय हुई है। जंगल न तो सौदे समझता है, न रसीदें। वह सिर्फ संतुलन जानता है और वही संतुलन सबसे पहले टूटता है। एक हिरण जो जंगल में निर्भय होकर दौड़ना चाहता है, उसे क्या फर्क पड़ता है कि किसी फाइल में क्या लिखा है या किसने कितनी राशि दी? एक पक्षी, जो अपने घोंसले के लिए सुरक्षित पेड़ ढूंढ रहा है, उसे क्या पता कि उस पेड़ की सुरक्षा किसी “समझौते” का हिस्सा बन चुकी है? जंगल की दुनिया में न तो रिश्वत का कोई अर्थ है, न ही कोई वैधता। 

इस तरह की घटनाएं केवल व्यक्तिगत भ्रष्टाचार का उदाहरण नहीं हैं; वे उस व्यापक मानसिकता की ओर इशारा करती हैं, जिसमें सार्वजनिक जिम्मेदारियों को निजी अवसरों में बदल दिया जाता है। यह मानसिकता केवल वन विभाग तक सीमित नहीं है, लेकिन जंगलों के संदर्भ में इसका प्रभाव कहीं अधिक गंभीर होता है। क्योंकि यहां नुकसान केवल आर्थिक नहीं, बल्कि पारिस्थितिक होता है जो अक्सर अपूरणीय होता है।

अचानकमार जैसे संरक्षित क्षेत्र केवल भौगोलिक सीमाएं नहीं हैं; वे संरक्षण के प्रतीक हैं। यहां हर नियम, हर प्रतिबंध, हर निगरानी का उद्देश्य एक ही होता है। प्रकृति को उसके मूल स्वरूप में बनाए रखना लेकिन जब इन नियमों को लागू करने वाले ही उन्हें “लचीला” बना दें, तो संरक्षण की पूरी अवधारणा ही कमजोर पड़ने लगती है।यह भी ध्यान देने योग्य है कि इस मामले की शुरुआत एक सोशल मीडिया रील से हुई। एक ऐसी दुनिया से, जहां दृश्यता अक्सर जिम्मेदारी से अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। एक रील, एक वायरल वीडियो, और उसके बाद की कार्रवाई यह क्रम अपने आप में आधुनिक समय की एक कहानी कहता है लेकिन इस कहानी का सबसे चिंताजनक हिस्सा वह है, जहां कार्रवाई के बाद भी “समाधान” के लिए रिश्वत का रास्ता अपनाया गया।

यहां एक और सवाल उठता है क्या कानून का भय अब केवल औपचारिकता बनकर रह गया है? अगर कोई व्यक्ति यह मानकर चलता है कि नियमों को पैसे के जरिए “समायोजित” किया जा सकता है, तो यह केवल उस व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की विफलता को दर्शाता है। यह हमें हमारी ही बनाई हुई व्यवस्था का प्रतिबिंब दिखाता है जहां हम एक तरफ जंगलों की रक्षा की बात करते हैं और दूसरी तरफ उनके नियमों को कमजोर करने वाली प्रक्रियाओं को नजरअंदाज कर देते हैं। यह आईना हमें यह भी दिखाता है कि भ्रष्टाचार केवल एक लेन-देन नहीं, बल्कि एक विचारधारा है जो धीरे-धीरे संस्थाओं को भीतर से खोखला कर देती है लेकिन इस अंधेरे चित्र के बीच एक सकारात्मक पहलू भी है—कार्रवाई। एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) की इस ट्रैप कार्रवाई ने यह संकेत दिया है कि व्यवस्था में अभी भी ऐसे तंत्र मौजूद हैं, जो जवाबदेही सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहे हैं। यह एक जरूरी याद दिलाता है कि कानून केवल लागू करने वालों तक सीमित नहीं है; उसे लागू कराने वाले भी हैं।

फिर भी, सवाल बना रहता है क्या ऐसी कार्रवाइयां पर्याप्त हैं? या हमें उस मानसिकता को बदलने की जरूरत है, जो ऐसे मामलों को जन्म देती है? शायद समाधान केवल सख्त कानूनों या अधिक निगरानी में नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक चेतना में है। जब तक हम सार्वजनिक पदों को “सेवा” के बजाय “सुविधा” के रूप में देखेंगे, तब तक ऐसे मामले सामने आते रहेंगे। और जब तक जंगलों को केवल संसाधन के रूप में देखा जाएगा, तब तक उनकी रक्षा केवल कागजों तक सीमित रहेगी। अंततः, यह मामला हमें एक असहज लेकिन जरूरी सवाल के साथ छोड़ता है क्या हम अपने जंगलों की रक्षा उन लोगों के भरोसे छोड़ सकते हैं, जिनके लिए कानून एक सिद्धांत नहीं, बल्कि एक विकल्प बन चुका है?

जंगल का मौन बहुत कुछ कहता है। वह हमें यह याद दिलाता है कि प्रकृति के नियम किसी सौदे का हिस्सा नहीं हो सकते। वे या तो पालन किए जाते हैं, या फिर उनके टूटने की कीमत चुकानी पड़ती है और यह कीमत अक्सर उन लोगों को चुकानी पड़ती है, जिनकी आवाज़ सबसे कम सुनी जाती है। शायद अब समय आ गया है कि हम यह तय करें क्या हम जंगलों को बचाना चाहते हैं, या केवल उनके नाम पर चलने वाले सौदों को?

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