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कैमरे की कलम: “साड़ी में भी ‘फीका’ पड़ गया सिस्टम !”


छत्तीसगढ़ में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं की साड़ियों का मामला अब रंग से ज्यादा ‘ढंग’ दिखाने लगा है। साड़ियाँ क्या आईं, जैसे मानो सरकारी वादों की तरह पहले चमकदार, फिर धीरे-धीरे फीकी! कहीं लंबाई कम, कहीं चौड़ाई गायब, तो कहीं कपड़ा इतना पतला कि पारदर्शिता में ईमानदारी भी शरमा जाए। लोकतंत्र में योजनाएं अक्सर बड़े इरादों के साथ जन्म लेती हैं, कागज़ों पर वे संवेदनशीलता की मिसाल होती हैं, भाषणों में वे जनकल्याण की गारंटी बन जाती हैं और विज्ञापनों में वे सरकार की “जनहितैषी” छवि का चमकदार चेहरा। लेकिन ज़मीनी हकीकत कभी-कभी इतनी विडंबनापूर्ण होती है कि वह इन दावों का मज़ाक बनाकर रख देती है। छत्तीसगढ़ में महिला एवं बाल विकास विभाग की साड़ी खरीदी का ताज़ा मामला भी कुछ ऐसा ही है जहां साड़ी की लंबाई कम हुई है, लेकिन सवालों की सूची लंबी होती जा रही है।

करीब 9.7 करोड़ रुपए की लागत से गुजरात के सूरत से खरीदी गई साड़ियां, जो आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं के सम्मान का प्रतीक बननी थीं, अब उपहास और आक्रोश का कारण बन गई हैं। जिन महिलाओं के कंधों पर पोषण, शिक्षा और समाज के सबसे निचले तबके तक सरकारी योजनाएं पहुंचाने की जिम्मेदारी है, उन्हें ऐसी साड़ियां दी गईं जिन्हें पहनना तक मुश्किल हो गया। कहीं लंबाई कम, कहीं रंग धोते ही गायब, और कहीं कपड़ा ऐसा कि बाजार में आधी कीमत पर भी लोग दो बार सोचें। यह केवल गुणवत्ता की समस्या नहीं, बल्कि नीयत की गुणवत्ता का भी आईना है। 

विडंबना देखिए वर्क ऑर्डर में साड़ी की लंबाई 6.3 मीटर तय की गई थी लेकिन वितरण के बाद यह लंबाई 5 मीटर तक सिमट गई। ऐसा लगता है जैसे साड़ी ही नहीं, पूरी व्यवस्था “डाइटिंग” पर चली गई हो। फर्क बस इतना है कि इस डाइटिंग से किसी का वजन नहीं, बल्कि जनता का भरोसा कम हो रहा है।

अब सवाल यह है कि यह सब हुआ कैसे ? क्या यह मान लिया जाए कि करोड़ों की खरीदी में गुणवत्ता जांच महज औपचारिकता थी ? या फिर यह माना जाए कि जांच करने वालों की नजरें भी उसी तरह “सिकुड़” गई थीं, जैसे साड़ी धोने के बाद सिकुड़ रही है ? सरकारी तंत्र में यह एक पुराना खेल है फाइलों में सब कुछ परफेक्ट, जमीन पर सब कुछ संदिग्ध। कागज़ों पर साड़ी पूरी लंबाई की, लेकिन हकीकत में कटौती का ऐसा हुनर कि दर्जी भी शरमा जाए।

सरकार की मंशा पर बात करना भी इस समय जरूरी है। योजनाएं बनाते वक्त सरकार यह संदेश देना चाहती है कि वह अपने जमीनी कार्यकर्ताओं के प्रति संवेदनशील है। लेकिन जब क्रियान्वयन इस स्तर का हो, तो यह संवेदनशीलता संदेह में बदल जाती है। क्या सरकार को इस गड़बड़ी की जानकारी नहीं थी ? अगर नहीं थी, तो यह प्रशासनिक विफलता है और अगर थी तो यह और भी गंभीर सवाल खड़े करता है,क्या जानबूझकर आंखें मूंद ली गईं?

राज्य की महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े का इस मसले पर बयान आया है कि “जहां-जहां खराब साड़ियाँ गई हैं, उन्हें वापस किया जाएगा।” सुनकर ऐसा लगा जैसे साड़ियों की नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों की ‘रिटर्न पॉलिसी’ लागू हो गई हो। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या मंत्री को इस खरीदी की गुणवत्ता का अंदाजा नहीं था? या फिर यह मामला उनकी प्राथमिकताओं में कहीं पीछे छूट गया? यदि मंत्री स्तर पर ही ऐसी लापरवाही नजर आए, तो नीचे के अधिकारियों से क्या उम्मीद की जा सकती है?

इस पूरे प्रकरण का सबसे दिलचस्प और दुखद पहलू यह है कि इसमें नुकसान केवल पैसों का नहीं हुआ, बल्कि भरोसे का भी हुआ है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, जो पहले से ही सीमित संसाधनों में काम करती हैं, अब खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही हैं। जिनके लिए यह साड़ी सम्मान का प्रतीक होनी चाहिए थी, वह अब उनके लिए एक “समस्या” बन गई है। यह स्थिति केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि संवेदनशीलता की कमी को भी दर्शाती है। यह साड़ी घोटाला भी कुछ ऐसा ही कर रहा है। विपक्ष के लिए यह मुद्दा तैयार है, जनता के बीच यह चर्चा का विषय बन चुका है, और सोशल मीडिया पर यह व्यंग्य का नया केंद्र बन गया है। लोग कह रहे हैं “साड़ी ही नहीं, सरकार की साख भी सिकुड़ गई है।”

 एक सवाल यह भी है कि जिस “खादी और ग्रामोद्योग” को आत्मनिर्भरता और गुणवत्ता का प्रतीक माना जाता है, उसी के जिम्मे यह खरीदी थी। यह वही खादी है, जिसे कभी स्वदेशी और स्वाभिमान का प्रतीक कहा जाता था। लेकिन इस मामले में यह प्रतीक भी सवालों के घेरे में आ गया है। क्या खादी अब केवल नाम भर रह गई है, और गुणवत्ता कहीं पीछे छूट गई है? या फिर गुजरात के सूरत शहर के जिस साड़ी निर्माता को यह ठेका दिया गया उसका खादी से कोई वास्ता ही नहीं। 

इस पूरे घटनाक्रम में एक पैटर्न भी नजर आता है, छोटी-छोटी कटौतियों का बड़ा खेल। कहीं लंबाई में कटौती, कहीं गुणवत्ता में, और कहीं जवाबदेही में। यह कटौती केवल साड़ी तक सीमित नहीं रहती, बल्कि धीरे-धीरे सिस्टम की आत्मा को भी काटने लगती है। और जब यह प्रक्रिया लंबे समय तक चलती है, तो भ्रष्टाचार “अपवाद” नहीं, बल्कि “व्यवस्था” बन जाता है।

अब सवाल यह है कि आगे क्या ? क्या इस मामले की जांच होगी ? क्या जिम्मेदारों पर कार्रवाई होगी ? या फिर यह मामला भी उन फाइलों में दफन हो जाएगा, जहां पहले से ही कई “घोटाले” धूल खा रहे हैं ? अनुभव कहता है कि शोर कुछ दिनों तक रहेगा, बयानबाजी होगी, और फिर धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य हो जाएगा। लेकिन हर बार की तरह इस बार भी एक चीज पीछे छूट जाएगी—जनता का भरोसा।

सरकार के लिए यह समय आत्ममंथन का है। योजनाएं बनाना आसान है, लेकिन उन्हें ईमानदारी से लागू करना ही असली चुनौती है। यदि जमीनी स्तर पर ही ऐसी गड़बड़ियां होती रहेंगी, तो बड़े-बड़े दावे भी खोखले साबित होंगे। और जब जनता का भरोसा डगमगाने लगे, तो कोई भी “विकास” का नारा उसे संभाल नहीं सकता।

अंततः, यह मामला हमें एक कड़वी सच्चाई की याद दिलाता है—भ्रष्टाचार हमेशा बड़े घोटालों में ही नहीं होता, वह छोटी-छोटी कटौतियों में भी छिपा होता है। और जब ये छोटी कटौतियां मिलकर एक बड़ा रूप ले लेती हैं, तो वह केवल आर्थिक नुकसान नहीं पहुंचातीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता को भी कमजोर कर देती हैं।

 इस “छोटी साड़ी” की कहानी दरअसल बहुत बड़ी है। यह केवल कपड़े की लंबाई की नहीं, बल्कि नीयत की गहराई की कहानी है। और जब नीयत ही छोटी हो जाए, तो फिर किसी भी योजना की लंबाई बढ़ाने से क्या फर्क पड़ता है? कुल मिलाकर, साड़ी का रंग भले ही फीका पड़ गया हो लेकिन इस पूरे मामले ने सिस्टम के रंग जरूर गहरे कर दिए हैं—और वो भी ऐसे कि अब धुलने से भी नहीं जाएंगे ! 

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