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कैमरे की कलम: न्याय की मंशा बनाम व्यवस्था की हिचक


उच्च शिक्षा के परिसरों में समानता और गरिमा का प्रश्न कोई नया नहीं है। वर्षों से यह सवाल उठता रहा है कि क्या विश्वविद्यालय ज्ञान के मंदिर हैं या सामाजिक भेदभाव की प्रयोगशाला। इसी पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट द्वारा यूजीसी के 2026 के भेदभाव-रोधी नियमों पर लगाई गई अंतरिम रोक एक साधारण न्यायिक आदेश नहीं, बल्कि व्यवस्था के अंतर्विरोधों पर तीखी टिप्पणी है। कोर्ट का कहना है कि ये नियम “दूरगामी परिणाम” पैदा कर सकते हैं और “समाज को विभाजित” कर सकते हैं। सवाल यह है कि क्या समाज पहले से विभाजित नहीं है? क्या रोहित वेमुला और डॉ. पायल तडवी की मौतें किसी काल्पनिक विभाजन की उपज थीं, या उस सच्चाई का आईना थीं जिसे लंबे समय तक संस्थागत चुप्पी ने ढक रखा था ?

इन नियमों की उत्पत्ति किसी अकादमिक प्रयोग से नहीं, बल्कि पीड़ा से हुई थी। वर्षों की याचिकाएँ, माताओं की गुहार और न्याय की उम्मीद इन्हीं से यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन के 2026 के नियम जन्मे। इनका उद्देश्य था: शिकायत की सुनवाई, जवाबदेही और संरक्षण। परंतु विरोध की तेज़ आँधी जिसमें बड़े पैमाने पर सामान्य वर्ग की असहजता दिखी,  उसने यह उजागर किया कि समानता की बात आते ही विशेषाधिकार कितने असुरक्षित हो जाते हैं।

वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह की टिप्पणी इस बहस का नैतिक केंद्र है। अगर सरकार अपने ही नियमों का बचाव नहीं कर सकती, तो यह केवल कानूनी कमजोरी नहीं संवैधानिक कर्तव्य से पलायन है। न्यायपालिका ने समिति बनाने का सुझाव देकर संतुलन साधने की कोशिश की है, पर समिति की शरण अक्सर निर्णय को टालने का सुविधाजनक रास्ता भी बन जाती है। यहां मूल टकराव स्पष्ट है: भेदभाव-रोधी व्यवस्था बनाम ‘रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन’ की आशंका। पर क्या सुरक्षा देना भेदभाव है? क्या कमजोर के लिए ढाल बनना, मज़बूत पर अन्याय है? विश्वविद्यालयों में सत्ता-संरचना आज भी वही है फर्क बस इतना है कि अब पीड़ित बोलने लगे हैं।

सुप्रीम कोर्ट की यह रोक अंतिम फैसला नहीं है, पर एक चेतावनी अवश्य है कि नियम जल्दबाज़ी में नहीं, गहन विमर्श से बनें। मगर विमर्श का अर्थ विलंब नहीं होना चाहिए। हर स्थगन के साथ कैंपस में डर का एक और दिन जुड़ जाता है। न्याय तब तक अधूरा है, जब तक वह समय पर न मिले। यह कहना गलत नहीं होगा कि नियमों की भाषा सुधारी जा सकती है, प्रक्रिया पर बहस हो सकती है, पर भेदभाव के अस्तित्व से इनकार नहीं। अगर उच्च शिक्षा में समानता को ‘विभाजन’ कहा जाएगा, तो सवाल नियमों पर नहीं हमारे सामाजिक विवेक पर उठेगा।

किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसके विश्वविद्यालयों, स्कूलों और शिक्षकों के हाथों में आकार लेता है। शिक्षा केवल डिग्री पाने का माध्यम नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा, सामाजिक न्याय की रीढ़ और आर्थिक प्रगति की बुनियाद होती है। लेकिन आज भारत में यह सवाल पहले से कहीं ज़्यादा तीखेपन के साथ खड़ा है, क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था वास्तव में नागरिक गढ़ रही है या केवल आज्ञाकारी उपभोक्ता और सुविधाजनक भीड़ तैयार कर रही है?

देश की शिक्षा व्यवस्था इस समय एक गहरे असमंजस से गुजर रही है। एक तरफ़ “विश्वगुरु” बनने के दावे हैं, नई-नई नीतियाँ हैं, तकनीक और नवाचार की भाषा है; दूसरी ओर जर्जर स्कूल, खाली पद, असमान अवसर, बढ़ता निजीकरण और विश्वविद्यालय परिसरों में भय का माहौल। यह विरोधाभास किसी दुर्घटना का नतीजा नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही राजनीतिक प्राथमिकताओं का परिणाम है। 

सरकारें अक्सर शिक्षा नीतियों का हवाला देती हैं। नई शिक्षा नीति (NEP) को ऐतिहासिक बताया गया, लचीलापन, बहुविषयकता और मातृभाषा में शिक्षा जैसे वादे किए गए। लेकिन नीति और ज़मीनी हकीकत के बीच की खाई लगातार चौड़ी होती गई। शिक्षा पर सार्वजनिक खर्च आज भी जीडीपी के उस स्तर तक नहीं पहुँचा, जिसकी सिफ़ारिश दशकों से होती रही है। नई इमारतें और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म दिखाने में आसान हैं, लेकिन शिक्षक भर्ती, शोध अनुदान और छात्रवृत्तियाँ राजनीतिक प्राथमिकताओं की सूची में नीचे खिसकती चली गईं। इससे यह सवाल उठता है क्या सरकारें शिक्षा को सशक्तिकरण का औज़ार मानती हैं, या केवल एक प्रबंधन योग्य तंत्र?

शिक्षा में निजीकरण अब अपवाद नहीं, बल्कि मुख्यधारा बन चुका है। मेडिकल, इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट हर जगह फीस आसमान छू रही है। छात्र ऋण लेकर पढ़ने को मजबूर हैं और डिग्री पूरी होते ही रोज़गार की अनिश्चितता उनका इंतज़ार करती है। इस व्यवस्था में शिक्षा सामाजिक गतिशीलता का साधन कम और आर्थिक बोझ ज़्यादा बनती जा रही है। सरकारें निजी निवेश को समाधान के रूप में पेश करती हैं, लेकिन यह भूल जाती हैं कि बाज़ार का पहला लक्ष्य लाभ होता है, समानता नहीं। जब शिक्षा लाभ का साधन बनती है, तो हाशिये पर खड़े समुदाय सबसे पहले बाहर धकेले जाते हैं। 

विश्वविद्यालयों का हाल इससे भी ज़्यादा चिंताजनक है। कभी जिन परिसरों में बहस, असहमति और विचारों की टकराहट होती थी, आज वहाँ नोटिस, जांच और निलंबन का डर छाया रहता है। प्रशासनिक नियंत्रण इतना बढ़ चुका है कि विश्वविद्यालय अब ज्ञान के केंद्र नहीं, बल्कि सत्ता की प्रयोगशाला बनते जा रहे हैं। जब छात्र सवाल पूछते हैं, तो उन्हें “राष्ट्रविरोधी” कहा जाता है। जब शिक्षक असहमति जताते हैं, तो उन्हें “अनुशासनहीन”। यह कोई संयोग नहीं कि आलोचनात्मक सोच को पाठ्यक्रम से धीरे-धीरे हटाया जा रहा है। इतिहास को सुविधाजनक बनाया जा रहा है, समाजशास्त्र को संदिग्ध और दर्शन को अनुपयोगी। यह सब किसी अज्ञानवश नहीं हो रहा। यह एक स्पष्ट संकेत है कि सरकारें ऐसे नागरिक नहीं चाहतीं जो सोचें, बल्कि ऐसे जो मानें।

जातिगत भेदभाव, मानसिक उत्पीड़न और संस्थागत उपेक्षा ये विश्वविद्यालयों की कड़वी सच्चाइयाँ हैं। जब इन्हें रोकने के लिए नियम बनाए जाते हैं, तो हंगामा मचता है कि “समाज बँट जाएगा।” जैसे समाज पहले से बराबरी पर खड़ा हो ! 

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