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कैमरे की कलम: दीयों की रोशनी में छिपे सवाल


कश्मीर से कन्याकुमारी तक दीये जले। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर ‘आशीर्वाद का दीया’ अभियान के तहत लोगों से दीप जलाकर उनके स्वस्थ और दीर्घायु जीवन की कामना करने की अपील की गई। लेकिन इसी रोशनी के बीच कुछ ऐसे सवाल भी हैं, जिन्हें लोकतंत्र में पूछना जरूरी है।

17 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर देश के विभिन्न हिस्सों में दीपोत्सव आयोजित किए गए। भारतीय जनता पार्टी ने लोगों से अपने घरों में ‘आशीर्वाद का दीया’ जलाने की अपील की थी। पार्टी अध्यक्ष नितिन नबीन ने इसे प्रधानमंत्री के दीर्घायु, स्वस्थ जीवन और निरंतर सफलता के लिए शुभकामना का अभियान बताया था।

बिहार के दरभंगा में हजारों दीये जलाए गए। नेहरू स्टेडियम और दरभंगा राज परिसर में आयोजित कार्यक्रमों में भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया और प्रधानमंत्री के लिए शुभाशीष मांगा। प्रधानमंत्री के लिए छत्तीसगढ़ में भी 'आशीर्वाद का दीया' लाखों की संख्या में प्रज्वलित हुआ। 

मध्य प्रदेश के उज्जैन में लाखों दीये जलाने और राज्यभर में करोड़ों दीप प्रज्वलित किए जाने की खबरें भी सामने आईं। बिहार के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में भी दीपोत्सव आयोजित किए गए। एक रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार में 20 लाख से अधिक दीये जलाए गए।

दीप जलाना भारतीय संस्कृति में शुभता और मंगलकामना का प्रतीक है। इसलिए किसी नेता के जन्मदिन पर उनके समर्थकों द्वारा दीप जलाना अपने आप में असामान्य बात नहीं है। सवाल उत्सव मनाने के अधिकार का नहीं है। सवाल उस सार्वजनिक संदेश और उसकी सुसंगति का है, जो इस पूरे आयोजन से निकलता है।

मई 2026 में पश्चिम एशिया संकट और विदेशी मुद्रा पर दबाव के बीच प्रधानमंत्री मोदी ने देशवासियों से कई तरह की मितव्ययिता अपनाने की अपील की थी। इसमें खाद्य तेल की खपत कम करने का आग्रह भी शामिल था।

प्रधानमंत्री ने कहा था कि भारत खाद्य तेल का बड़ा हिस्सा आयात करता है और यदि प्रत्येक परिवार खाद्य तेल के इस्तेमाल में कमी करता है तो यह देश के लिए बड़ी मदद होगी। उन्होंने खाद्य तेल की कम खपत को देशभक्ति से भी जोड़ा था। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार भारत अपनी खाद्य तेल जरूरत का लगभग 55-57 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है।

प्रधानमंत्री की इस अपील को बाद में केंद्र सरकार के स्तर पर भी मितव्ययिता, संसाधन संरक्षण और आत्मनिर्भरता के अभियान से जोड़ा गया। कृषि मंत्रालय ने खाद्य तेल की खपत कम करने के लिए अभियान चलाने की बात कही।

यानी नागरिक से संदेश था—जहां संभव हो, खपत घटाइए; देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम कीजिए; मितव्ययिता को देशहित से जोड़िए। अब उसी वर्ष प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर बड़े पैमाने पर दीपोत्सव का दृश्य सामने आता है। यहीं से एक असहज लेकिन जायज सवाल पैदा होता है।

यह कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा कि जन्मदिन के दीपोत्सव में इस्तेमाल हुआ सारा तेल खाद्य तेल था या कि जितने खाद्य तेल की बचत का आह्वान किया गया था, उसका सीधा संबंध इन दीयों में इस्तेमाल तेल से है। ऐसी तुलना के लिए प्रमाणित आंकड़े उपलब्ध होना जरूरी है लेकिन बात केवल गणित की नहीं है। बात सार्वजनिक संदेश की विश्वसनीयता की है।

जब देश के हर परिवार से कहा जाता है कि वह अपने घर की रसोई में तेल की खपत कम करे और इसे देशभक्ति का योगदान बताया जाता है, तब उसी नागरिक के सामने बड़े पैमाने पर तेल के दीये जलाने का दृश्य स्वाभाविक रूप से यह सवाल पैदा करता है कि मितव्ययिता की कसौटी क्या केवल आम आदमी के लिए है? सार्वजनिक जीवन में संदेश तभी प्रभावशाली होता है जब उसका पालन करने का उदाहरण भी दिखाई दे।

इस पूरे प्रसंग का सबसे संवेदनशील पहलू बिहार है। बिहार में इस साल बाढ़ ने बड़ी आबादी को प्रभावित किया। इसी दौरान प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर ‘आशीर्वाद का दीया’ जलाने का अभियान चलाया गया। विपक्षी नेताओं ने इस पर सवाल उठाए। आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने बाढ़ से प्रभावित लोगों की संख्या और दीपोत्सव पर संभावित खर्च को लेकर सरकार पर निशाना साधा। ये उनके राजनीतिक आरोप हैं; खर्च की उनकी बताई राशि की स्वतंत्र पुष्टि अलग से जरूरी है।

पूर्णिया के सांसद पप्पू यादव ने भी सवाल उठाया कि जब बिहार के कई जिले बाढ़ से प्रभावित हैं, तब लोगों और सरकारी कर्मचारियों से प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर दीप जलाने की अपेक्षा क्यों की जा रही है। उन्होंने सरकारी स्कूलों में कार्यक्रम के लिए जारी निर्देश का भी मुद्दा उठाया।

यहां फिर वही फर्क समझना जरूरी है—दीप जलाने का कार्यक्रम और बाढ़ राहत कार्य पर खर्च एक-दूसरे के सीधे विकल्प नहीं हैं। किसी आयोजन पर खर्च होने वाला प्रत्येक रुपया बाढ़ राहत में लगाया जा सकता था, ऐसा मान लेना भी उचित नहीं होगा लेकिन आपदा की घड़ी में सरकार और राजनीतिक संगठनों की प्राथमिकताओं का प्रतीकात्मक महत्व जरूर होता है, जिस समय हजारों परिवारों के सामने घर, भोजन, पशु, फसल और रोजमर्रा के जीवन को बचाने की चुनौती हो, उस समय सत्ता के आसपास होने वाला कोई भी बड़ा उत्सव स्वाभाविक रूप से सवालों के घेरे में आएगा।

इस बहस का दूसरा पहलू इससे भी महत्वपूर्ण है—क्या ऐसे आयोजनों में सरकारी तंत्र की भूमिका थी? बिहार में इसको लेकर विरोधाभासी तस्वीर सामने आई। कुछ स्थानों पर सरकारी स्कूलों और संस्थानों में ‘आशीर्वाद का दीया’ कार्यक्रम आयोजित करने संबंधी निर्देशों की रिपोर्ट सामने आई। दूसरी ओर लखीसराय में अंतिम समय पर मुख्य सचिव के निर्देश के बाद प्रशासनिक अधिकारियों को कार्यक्रम से अलग रहने को कहा गया और जिला प्रशासन द्वारा तैयार किया गया कार्यक्रम स्थगित कर दिया गया। रिपोर्ट के अनुसार वहां एक लाख से अधिक मिट्टी के दीयों की तैयारी की गई थी। यह घटनाक्रम अपने आप में एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक प्रश्न खड़ा करता है।

प्रधानमंत्री देश के निर्वाचित प्रधानमंत्री हैं, लेकिन उनका जन्मदिन किसी राजनीतिक दल के लिए राजनीतिक कार्यक्रम भी हो सकता है। इसलिए यदि कोई आयोजन पार्टी कर रही है तो उसे पार्टी कार्यक्रम के रूप में स्पष्ट रखना लोकतांत्रिक दृष्टि से अधिक पारदर्शी है। यदि उसमें सरकारी विभाग, सरकारी कर्मचारी, स्कूल या सार्वजनिक धन शामिल होता है तो उसकी प्रकृति और वित्तीय स्रोत भी स्पष्ट होने चाहिए। यही पारदर्शिता लोकतंत्र में भरोसा पैदा करती है । देश में प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर उत्सव मनाने वाले नागरिकों को यह अधिकार है कि वे अपनी श्रद्धा और समर्थन व्यक्त करें। किसी नेता के समर्थकों की भावनाओं को भी लोकतांत्रिक विमर्श में स्थान मिलना चाहिए लेकिन लोकतंत्र का दूसरा पक्ष यह भी है कि सार्वजनिक आयोजन पर सवाल पूछे जा सकें और यह सवाल केवल विपक्ष का सवाल नहीं होना चाहिए।

यदि कोई सरकार नागरिकों से कहती है कि खाद्य तेल बचाना देशभक्ति है, तो उसी देशभक्ति के दूसरे पहलू—सार्वजनिक मितव्ययिता—पर सवाल उठना स्वाभाविक है। यदि सरकार या राजनीतिक संगठन ‘सेवा’ को प्रधानमंत्री के जन्मदिन का केंद्रीय संदेश बनाते हैं, तो बाढ़, बीमारी, बेरोजगारी या अन्य संकटों से जूझ रहे लोगों के बीच सेवा का प्रत्यक्ष स्वरूप क्या होना चाहिए—इस पर बहस भी स्वाभाविक है और यदि प्रधानमंत्री का जन्मदिन करोड़ों लोगों तक पहुंचने वाले अभियान में बदलता है, तो यह भी पूछा जाना चाहिए कि उस अभियान में सरकारी और राजनीतिक भूमिकाओं का विभाजन कितना स्पष्ट है।

इस पूरे मामले को ‘दीया बनाम बाढ़ राहत’ जैसे सरल द्वंद्व में बदलना उचित नहीं होगा। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में उत्सव और आपदा राहत दोनों साथ-साथ चल सकते हैं। किसी एक के होने से दूसरे की आवश्यकता समाप्त नहीं होती लेकिन सार्वजनिक जीवन में प्रतीकों का महत्व होता है। बाढ़ के बीच एक परिवार के लिए एक पैकेट भोजन, पीने का पानी, दवा या सुरक्षित आश्रय शायद उस समय सबसे बड़ा ‘दीया’ हो सकता है। किसी कुम्हार के लिए हजारों दीयों का ऑर्डर रोजगार का अवसर हो सकता है। दूसरी तरफ बाढ़ में फंसे परिवार के लिए वही समय जीवन बचाने का संघर्ष हो सकता है, इसलिए बहस यह नहीं कि दीया जलना चाहिए था या नहीं। बहस यह है कि क्या उस समय दीपोत्सव से ज्यादा ताकतवर प्रतीक राहत, पुनर्वास और पीड़ितों के साथ खड़े होने का नहीं हो सकता था?

अब जब उसी देश में प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर लाखों-करोड़ों दीयों की रोशनी दिखाई देती है, और उसी समय बिहार का एक बड़ा हिस्सा बाढ़ की मार से जूझ रहा था, तब सवाल उठना स्वाभाविक है— क्या देशभक्ति का अर्थ केवल आम नागरिक द्वारा अपनी खपत कम करना है, या सार्वजनिक जीवन में भी संयम, सादगी और प्राथमिकताओं का वही पैमाना लागू होना चाहिए?

शायद इस सवाल का सबसे ईमानदार उत्तर किसी राजनीतिक भाषण में नहीं, बल्कि उस नागरिक के अनुभव में मिलेगा जो एक हाथ से अपना चूल्हा बचाने के लिए तेल नाप रहा है और दूसरे हाथ से बाढ़ में डूबे घर को बचाने की कोशिश कर रहा है। दीये जलते रहें—यह भारतीय परंपरा की खूबसूरती है,लेकिन लोकतंत्र की असली रोशनी तब होगी, जब उत्सव की चमक के साथ उन सवालों को भी जगह मिले जो उस चमक के पीछे खड़े हैं।

कैमरे की कलम: पर्चा नहीं, भरोसा लीक हो रहा है

भारत में इम्तिहान अब सिर्फ़ इम्तिहान नहीं रह गए हैं। वे लाखों नौजवानों के लिए नौकरी, दाख़िले और बेहतर ज़िंदगी तक पहुंचने का रास्ता हैं। इसलिए जब किसी इम्तिहान का पर्चा लीक होता है, तो सिर्फ़ कुछ सवालों के जवाब पहले से बाज़ार में नहीं पहुंचते, बल्कि मेहनत, योग्यता और बराबरी के पूरे विचार पर चोट होती है।

पिछले कुछ वर्षों में देश ने पेपर लीक के ऐसे मामले देखे हैं जिन्होंने व्यवस्था को कठघरे में खड़ा किया। मेडिकल दाख़िले की नीट परीक्षा से लेकर सरकारी नौकरियों की भर्ती परीक्षाओं तक, पर्चा लीक एक ऐसा मुद्दा बन गया है जिसने संसद से लेकर अदालत और सड़कों तक गहरी नाराज़गी पैदा की। सरकार ने भी इसे गंभीरता से लिया और 2024 में पेपर लीक और नकल के संगठित अपराध के ख़िलाफ़ कड़े प्रावधानों वाला क़ानून बनाया। अब 2026 में इसमें और सख़्ती का प्रस्ताव सामने है, लेकिन छत्तीसगढ़ की एक घटना इस पूरी बहस के बीच एक असहज सवाल खड़ा करती है—क्या सिर्फ़ सख़्त सज़ा लिख देने से अपराध रुक जाता है?

इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय की परीक्षा के प्रश्नपत्र की तस्वीरें निकालकर उसे बेचने के आरोप में दुर्ग के एक निजी कृषि कॉलेज के प्रोफेसर समेत कई लोगों की गिरफ्तारी हुई है। आरोप है कि प्रश्नपत्र लेकर आने-जाने की जिम्मेदारी निभाने वाले प्रोफेसर ने लिफ़ाफ़े में बारीक छेद कर छोटा कैमरा भीतर पहुंचाया, प्रश्नपत्र की तस्वीरें खींचीं और उसे महज़ 11 हज़ार रुपये में बेच दिया। जिस काग़ज़ की वजह से सैकड़ों-हज़ारों छात्रों की मेहनत और भविष्य प्रभावित हो सकते थे, उसकी कीमत अपराधी के लिए 11 हज़ार रुपये थी। यही इस मामले की सबसे डरावनी बात है।

एक कॉलेज शिक्षक, जिसे परीक्षा व्यवस्था की गोपनीयता और छात्रों के भविष्य की ज़िम्मेदारी समझनी चाहिए, इतनी छोटी रकम के लिए उस भरोसे को बेच देता है। यह केवल लालच का मामला नहीं है। यह उस मानसिकता का मामला है जिसमें अपराधी को लगता है कि पकड़े जाने का ख़तरा कम है और अगर पकड़ा भी गया तो व्यवस्था से बच निकलने की गुंजाइश बनी रहेगी।

क़ानून की किताब में पांच साल, दस साल या उससे अधिक की सज़ा लिख देने से यह मानसिकता नहीं बदलती। अपराधी के लिए असली सवाल यह होता है कि पकड़े जाने की संभावना कितनी है, जांच कितनी पक्की होगी, मुकदमा कितने साल चलेगा और आख़िर में सज़ा होगी भी या नहीं।

भारत की न्याय व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक यही है कि सज़ा की कठोरता से ज्यादा उसकी निश्चितता अपराध को रोकती है। अगर किसी को यह भरोसा हो कि वह वर्षों तक मुकदमा लड़ सकता है और शायद बच भी सकता है, तो काग़ज़ पर लिखी कठोर सज़ा उसका बहुत कम डर पैदा करती है।

पेपर लीक में एक और नैतिक पहलू है जिसे अक्सर कानूनी बहस के बीच हम भूल जाते हैं। इसमें नुकसान सिर्फ़ उस छात्र का नहीं होता जिसने प्रश्नपत्र नहीं खरीदा। नुकसान उन तमाम ईमानदार छात्रों का होता है जिन्होंने महीनों और वर्षों तक पढ़ाई की, परिवार की बचत लगाई, अपनी नींद और सुविधाएं छोड़ीं और यह भरोसा किया कि परीक्षा के दिन सबके सामने एक जैसा प्रश्नपत्र होगा।

जब कोई छात्र पैसे देकर पहले से प्रश्नपत्र हासिल करता है, तो वह केवल अपने लिए फायदा नहीं खरीदता। वह किसी दूसरे के हिस्से का अवसर भी छीनता है। इसीलिए पेपर लीक को सामान्य भ्रष्टाचार मानना भूल होगी। यह समान अवसर के सिद्धांत पर हमला है।

भारत में प्रतियोगी परीक्षाओं का महत्व इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि बेरोज़गारी और सीमित सरकारी नौकरियों के बीच एक सीट के लिए हजारों-लाखों युवा मुकाबला करते हैं। ऐसे में अगर उन्हें यह लगने लगे कि परीक्षा में मेहनत से ज्यादा पैसा, पहचान या जुगाड़ काम करता है, तो सबसे पहले योग्यता पर विश्वास टूटता है और उसके बाद मेहनत पर।

अगर एक नौजवान को लगे कि वह चाहे जितना पढ़ ले, कोई दूसरा व्यक्ति पैसे देकर उससे आगे निकल जाएगा, तो उसके भीतर सिर्फ़ गुस्सा पैदा नहीं होता, एक गहरी निराशा भी पैदा होती है। यही वह सामाजिक मनोविज्ञान है जिसे पेपर लीक के हर मामले में समझना ज़रूरी है।

नीट विवाद ने इस संकट की भयावहता पूरे देश के सामने रख दी थी। परीक्षा की विश्वसनीयता पर सवाल उठने के बाद लाखों छात्रों और उनके परिवारों में पैदा हुई बेचैनी इस बात का सबूत थी कि परीक्षा व्यवस्था में भरोसा कितना नाज़ुक होता है। एक बार यह भरोसा टूट जाए तो केवल दोबारा परीक्षा करा देना पर्याप्त नहीं होता।

इसीलिए छत्तीसगढ़ का यह मामला संख्या में छोटा होकर भी महत्व में छोटा नहीं है। एक विश्वविद्यालय के एक प्रश्नपत्र से शायद कुछ सौ या कुछ हजार छात्र प्रभावित होते हों, लेकिन ऐसी घटनाएं मिलकर पूरे समाज को यह संदेश देती हैं कि व्यवस्था निष्पक्ष नहीं है।

छत्तीसगढ़ खुद इसका एक बड़ा उदाहरण है। राज्य लोक सेवा आयोग से जुड़े भ्रष्टाचार के मामलों ने यह सवाल पहले ही खड़ा कर दिया है कि सरकारी नौकरी जैसी सार्वजनिक संपत्ति को अगर पैसे और पहुंच के आधार पर बांटा जाने लगे, तो मेहनत करने वाले नौजवान किस पर भरोसा करें।

पेपर लीक की बीमारी का इलाज इसलिए केवल अपराधियों को जेल भेजना नहीं है। जेल ज़रूरी है, कड़ी सज़ा भी ज़रूरी है, लेकिन उससे पहले और उसके साथ परीक्षा व्यवस्था की ऐसी संरचना बनानी होगी जिसमें एक व्यक्ति के लिए पर्चा चुराना मुश्किल हो, उसे बाहर पहुंचाना लगभग असंभव हो और पकड़े जाने की संभावना बहुत अधिक हो।

प्रश्नपत्रों की छपाई से लेकर उनके परिवहन, सुरक्षित भंडारण और परीक्षा केंद्र पर खोलने तक हर चरण में जवाबदेही तय करनी होगी। डिजिटल निगरानी, सुरक्षित पैकेजिंग, कैमरों और स्वतंत्र ऑडिट जैसी व्यवस्थाएं सिर्फ़ काग़ज़ पर नहीं, व्यवहार में लागू करनी होंगी। परीक्षा केंद्रों और उनसे जुड़े कर्मचारियों की जिम्मेदारी भी स्पष्ट होनी चाहिए और सबसे महत्वपूर्ण—जांच और मुकदमे की गति ऐसी हो कि आरोपी को वर्षों तक कानून से खेलते रहने का अवसर न मिले।

2024 के कड़े क़ानून और 2026 में प्रस्तावित और कड़े प्रावधान इस समस्या को गंभीरता से लेने की राजनीतिक इच्छा दिखाते हैं। लेकिन क़ानून की असली ताकत उसकी धाराओं में नहीं, उसके लागू होने में दिखाई देती है। अगर एक व्यक्ति को पता हो कि अपराध करते ही गिरफ्तारी, तेज़ जांच, संपत्ति और आर्थिक लाभ की जब्ती तथा निश्चित सज़ा उसका इंतज़ार कर रही है, तो अपराध का जोखिम उसके लिए वास्तविक हो जाता है। इसके उलट अगर कानून केवल डरावने आंकड़ों का संग्रह बनकर रह जाए, तो अपराधी उससे डरना बंद कर देते हैं।

इसलिए लोकसभा में प्रस्तावित संशोधन पर बहस केवल इस बात तक सीमित नहीं होनी चाहिए कि सज़ा कितनी बढ़ाई जाए। असली सवाल यह होना चाहिए कि सज़ा निश्चित कैसे होगी और परीक्षा प्रणाली इतनी मजबूत कैसे होगी कि अपराध होने से पहले ही उसकी गुंजाइश खत्म हो जाए।

क्योंकि पेपर लीक करने वाले लोग हर बार कोई नया रास्ता खोजेंगे। कभी लिफ़ाफ़े में कैमरा जाएगा, कभी डिजिटल तस्वीर बाहर आएगी, कभी कोई कर्मचारी बिकेगा और कभी कोई अधिकारी अपनी जिम्मेदारी बेचेगा। अपराधी तरीके बदलेंगे। व्यवस्था को उनसे एक कदम आगे रहना होगा।

छत्तीसगढ़ के इस मामले में 11 हज़ार रुपये ने एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा किया है। अगर किसी शिक्षक के लिए 11 हज़ार रुपये इतने आकर्षक हो सकते हैं कि वह सैकड़ों छात्रों के भविष्य और अपने पेशे की प्रतिष्ठा को दांव पर लगा दे, तो समस्या सिर्फ़ उस व्यक्ति की नहीं है। समस्या उस व्यवस्था की भी है जिसने उसे ऐसा करने का अवसर दिया और शायद उसके मन में यह भरोसा पैदा किया कि वह बच सकता है।

इम्तिहान की मेज़ पर बैठा छात्र यह उम्मीद नहीं करता कि व्यवस्था उसके लिए चमत्कार करेगी। वह सिर्फ़ बराबरी चाहता है। उसे चाहिए कि जिस प्रश्नपत्र को वह परीक्षा केंद्र में पहली बार देख रहा है, उसे किसी दूसरे छात्र ने एक रात पहले पैसे देकर न खरीद लिया हो। यह बहुत बड़ी मांग नहीं है। यह किसी भी सभ्य परीक्षा व्यवस्था की न्यूनतम शर्त है।

भारत के नौजवानों को आज नौकरी से पहले भरोसे की ज़रूरत है—इस भरोसे की कि उनकी मेहनत बेकार नहीं जाएगी। दाख़िले और नौकरी की हर सीट किसी की जागीर नहीं, सार्वजनिक अवसर है। उसे बेचने, खरीदने या चोरी करने वाले सिर्फ़ कानून नहीं तोड़ते, वे उस भरोसे को तोड़ते हैं जिस पर प्रतियोगी समाज टिका हुआ है।

इसलिए पेपर लीक के खिलाफ़ लड़ाई में कड़ा कानून ज़रूरी है, तेज़ न्याय ज़रूरी है और अपराधियों को कठोर सज़ा भी ज़रूरी है। लेकिन उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है ऐसी परीक्षा व्यवस्था बनाना जिसमें ईमानदार छात्र को यह विश्वास हो कि उसकी मेहनत का मुकाबला किसी बंद लिफ़ाफ़े, छिपे कैमरे या 11 हज़ार रुपये से नहीं किया जा सकता क्योंकि परीक्षा का पर्चा सिर्फ़ काग़ज़ नहीं होता। वह लाखों नौजवानों के भविष्य पर लिखी हुई उम्मीद होती है और उस उम्मीद को बेचने वालों के लिए समाज की तरफ़ से सबसे कड़ा संदेश यही होना चाहिए—मेहनत के मुकाबले में बेईमानी की कोई जगह नहीं है।

कैमरे की कलम: इंटरव्यू में ईमानदारी, कुर्सी पर सौदेबाजी?

पुराना वीडियो, नए आरोप और एक असहज सवाल—क्या सिविल सेवा में प्रवेश के समय बोले गए आदर्श सरकारी कुर्सी तक पहुंचते-पहुंचते रास्ता भूल जाते हैं?

सिविल सेवा की परीक्षा पास करने वाले युवाओं से जब पूछा जाता है कि वे आईएएस, आईपीएस क्यों बनना चाहते हैं, तो जवाबों में अक्सर देश सेवा, भ्रष्टाचार से लड़ाई, कमजोर तबकों की मदद और शासन व्यवस्था में सुधार जैसे बड़े-बड़े शब्द सुनाई देते हैं। सुनने वाले को कुछ क्षणों के लिए लगता है कि देश की प्रशासनिक व्यवस्था का कायाकल्प बस अब होने ही वाला है। फिर वही युवा अधिकारी बनते हैं। फाइलें आती हैं, सरकारी गाड़ियां आती हैं, लालफीताशाही आती है, पद आता है, अधिकार आता है और कभी-कभी—आरोप भी आते हैं। 

UPSC में 377वीं रैंक, इंटरव्यू में 138 अंक और फिर पुलिस सेवा की कुर्सी—आज वही राहुल बंसल भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के कारण चर्चा में हैं। आरोप साबित होना बाकी है, लेकिन एक पुराना सवाल फिर सामने है: सिविल सेवा में नैतिकता पढ़ाई जाती है या निभाई भी जाती है? कभी-कभी किसी सरकारी अधिकारी की कहानी इतनी तेजी से करवट लेती है कि लगता है, सरकारी फाइल से ज्यादा तेज तो जिंदगी की टिप्पणी चल रही है। आईपीएस राहुल बंसल की कहानी भी फिलहाल कुछ ऐसी ही दिखाई दे रही है।

साल 2021 में यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा में 377वीं रैंक। कुल 939 अंक। पर्सनैलिटी टेस्ट में 275 में से 138 अंक। पांचवें प्रयास में सफलता। फिर भारतीय पुलिस सेवा। छत्तीसगढ़ कैडर। एक युवा के लिए इससे ज्यादा प्रेरक कहानी क्या होगी? चार प्रयासों में असफलता के बाद पांचवें प्रयास में सफलता। मैथ्स जैसे विषय में मजबूत प्रदर्शन। संघर्ष के बाद चयन और फिर वह सरकारी वर्दी, जिसे देखकर आम आदमी उम्मीद करता है कि अब कानून थोड़ा और मजबूत होगा लेकिन कुछ साल बाद यही नाम एक करोड़ रुपये की कथित रिश्वत के मामले में चर्चा में है। यही वह जगह है जहां कहानी अचानक प्रेरक कथा से व्यंग्य में बदल जाती है। हालांकि सबसे पहले जरूरी सावधानी।

राहुल बंसल पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं। आरोपों की जांच चल रही है। किसी आरोप को अदालत में सिद्ध हुए अपराध के बराबर मान लेना न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ होगा। इसलिए अभी यह कहना गलत होगा कि उन्होंने रिश्वत ली ही थी। अदालत और जांच एजेंसियों को तथ्य सामने रखने होंगे लेकिन सवाल पूछना तो लोकतंत्र का काम है और इस मामले में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि एक करोड़ रुपये का आरोप सही है या गलत।

सवाल यह भी है कि जिस व्यवस्था में प्रवेश करने वाले युवाओं से ईमानदारी, नैतिकता और जनसेवा की अपेक्षा की जाती है, उस व्यवस्था में कुछ ही वर्षों बाद भ्रष्टाचार के इतने गंभीर आरोप सामने कैसे आ जाते हैं?

छत्तीसगढ़ कैडर के आईपीएस अधिकारी राहुल बंसल से जुड़ा मामला इसी विरोधाभास को लेकर इन दिनों चर्चा में है। उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप सामने आए हैं। इन आरोपों की जांच जारी है और आरोप अभी साबित नहीं हुए हैं। लेकिन इस बीच उनके सिविल सेवा की तैयारी के दिनों का एक पुराना मॉक इंटरव्यू वीडियो फिर सोशल मीडिया पर घूम रहा है और इस वीडियो ने विवाद को एक अजीब नैतिक मोड़ दे दिया है, क्योंकि वीडियो में वही अधिकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलते दिखाई देते हैं।

मामला सिर्फ इतना नहीं कि उन्होंने भ्रष्टाचार के विरोध में कोई सामान्य बात कही थी। उन्होंने अपने परिवार से जुड़ा एक अनुभव सुनाया था। उनके मुताबिक, उनके भाई आईआईटी कानपुर में पढ़ते थे और अमेरिका में रिसर्च पेपर पेश करने के लिए वीजा आवेदन हेतु जन्म प्रमाण पत्र की जरूरत थी। जल्दी दस्तावेज हासिल करने के लिए पंचायत अधिकारी ने कथित तौर पर 500 रुपये मांगे थे। आईपीएस बंसल ने उस समय कहा था कि 500 रुपये की रिश्वत देने से उन्हें बहुत बुरा लगा। वाकई, 500 रुपये की रिश्वत बुरी चीज है।

इतनी बुरी कि उस पर मॉक इंटरव्यू में बात की जा सकती है, व्यवस्था की खामियों पर चिंता जताई जा सकती है और यह सवाल उठाया जा सकता है कि आखिर एक नागरिक को अपने ही अधिकार का दस्तावेज पाने के लिए पैसे क्यों देने पड़ें लेकिन आज वही वीडियो इसलिए वायरल है क्योंकि बंसल पर एक करोड़ रुपये की रिश्वत स्वीकार करने के आरोपों ने पुराने शब्दों को एक नए संदर्भ में ला खड़ा किया है। यही सवाल सोशल मीडिया पूछ रहा है। हालांकि सोशल मीडिया का न्यायालय अक्सर बहुत तेज चलता है। वहां एफआईआर फैसला बन जाती है, आरोप सजा और वायरल वीडियो चरित्र प्रमाणपत्र। इसलिए वहां चल रही बहस को अंतिम सत्य मानना भी उतना ही खतरनाक है। फिर भी, सवाल को खारिज नहीं किया जा सकता, क्योंकि भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे प्रभावशाली भाषण वही होता है जिसे बोलने वाला अपने आचरण से साबित करे।

सिविल सेवा में नैतिकता का मतलब सिर्फ यह नहीं कि अधिकारी भ्रष्टाचार पर भाषण दे सकता है। असली परीक्षा तब होती है जब उसके सामने अधिकार हो, पैसा हो, दबाव हो और यह भरोसा हो कि शायद कोई देख नहीं रहा।  मॉक इंटरव्यू के कमरे में ईमानदारी कहना आसान है। सरकारी कमरे में ईमानदार रहना मुश्किल और शायद यही भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक है।

सिविल सेवा की तैयारी के दौरान अभ्यर्थी से पूछा जाता है—“आप व्यवस्था में क्या सुधार करेंगे?” नौकरी मिलने के बाद नागरिक पूछता है—“साहब, मेरा काम कब होगा?” पहले सवाल का उत्तर होता है—“पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाऊंगा।” दूसरे का उत्तर कई बार होता है—“फाइल देखनी पड़ेगी।” और फाइल शायद इसलिए भी नहीं चलती क्योंकि वह अकेली चलना नहीं जानती। उसे कभी-कभी किसी ‘प्रोत्साहन’ की जरूरत पड़ती है। यहीं से व्यवस्था और व्यक्ति के बीच की कहानी शुरू होती है।

अगर आईपीएस बंसल के खिलाफ लगे आरोप जांच में सही साबित होते हैं, तो सवाल केवल एक अधिकारी तक सीमित नहीं रहेगा। तब यह सवाल भी पूछा जाएगा कि जिस व्यवस्था में भ्रष्टाचार से लड़ने की शपथ लेकर अधिकारी आते हैं, वही व्यवस्था उन्हें भ्रष्टाचार का हिस्सा बनने की गुंजाइश कैसे देती है? और अगर आरोप साबित नहीं होते, तब भी यह पूरा प्रकरण एक दूसरी समस्या सामने रखेगा—सार्वजनिक जीवन में विश्वास कितनी तेजी से टूटता है।

एक आम नागरिक के लिए आईएएस,आईपीएस अधिकारी कोई सामान्य सरकारी कर्मचारी नहीं होता। वह राज्य की शक्ति का चेहरा होता है। उसके हस्ताक्षर से फाइल आगे बढ़ सकती है, रुक सकती है, किसी को राहत मिल सकती है और किसी का काम वर्षों तक अटक सकता है। इसलिए नागरिक अधिकारी से केवल दक्षता नहीं चाहता। वह उससे चरित्र की उम्मीद भी करता है। यही कारण है कि किसी अधिकारी पर भ्रष्टाचार का आरोप आम नागरिक को अधिक निराश करता है क्योंकि यहां निराशा सिर्फ पैसों की नहीं होती। यह उस भरोसे की होती है जो संविधान, प्रशासन और सार्वजनिक संस्थाओं के बीच नागरिक को जोड़ता है। 

मॉक इंटरव्यू में बंसल ने व्यवस्था में भ्रष्टाचार और अक्षमता की बात की थी। यह बात गलत नहीं है। भारत में भ्रष्टाचार को केवल व्यक्तिगत लालच से समझना अधूरा होगा। प्रक्रियाओं की जटिलता, विवेकाधिकार, कमजोर निगरानी, राजनीतिक और प्रशासनिक दबाव, धीमी शिकायत व्यवस्था और जवाबदेही की कमी—ये सभी इसके कारणों में शामिल हो सकते हैं लेकिन एक अधिकारी यदि यह कहकर बच निकलना चाहे कि “व्यवस्था ही खराब है”, तो यह तर्क खतरनाक होगा क्योंकि व्यवस्था कोई एलियन नहीं है। व्यवस्था हमसे बनती है। फाइल पर हस्ताक्षर करने वाला भी व्यवस्था है। आदेश जारी करने वाला भी व्यवस्था है। रिश्वत मांगने वाला भी व्यवस्था है। और रिश्वत रोकने वाला भी, जिस दिन हम भ्रष्टाचार को केवल “सिस्टम की समस्या” कहकर छोड़ देते हैं, उसी दिन भ्रष्टाचार को एक अनाथ बीमारी बना देते हैं—जिसका कोई जिम्मेदार नहीं।

शायद सिविल सेवा का सबसे महत्वपूर्ण इंटरव्यू यूपीएससी भवन में नहीं होता। वह उस दिन होता है जब अधिकारी के सामने कोई गरीब व्यक्ति अपनी फाइल लेकर खड़ा होता है। वह उस दिन होता है जब कोई ठेकेदार किसी सुविधा का प्रस्ताव लेकर आता है। वह उस दिन होता है जब ऊपर से दबाव आता है। वह उस दिन होता है जब कोई कर्मचारी कहता है—“साहब, यहां तो ऐसे ही चलता है" और वह उस दिन भी होता है जब अधिकारी के सामने यह विकल्प होता है कि वह नियम के रास्ते चले या उस रास्ते पर, जहां काम जल्दी होता है और सवाल देर से। यूपीएससी का इंटरव्यू कुछ घंटे का होता है। सरकारी कुर्सी का इंटरव्यू कई साल चलता है और उसका पैनल जनता होती है। इसलिए पुराने वीडियो का वायरल होना महज सोशल मीडिया की सनसनी नहीं है। यह उस असहज अंतर की ओर इशारा करता है जो सार्वजनिक जीवन में कही गई बातों और निभाई गई जिम्मेदारियों के बीच पैदा हो सकता है। 500 रुपये की रिश्वत पर दुख जताना तब सही था। अगर आज एक करोड़ रुपये की रिश्वत के आरोप सही साबित होते हैं, तो वह दुख और भी ज्यादा अर्थपूर्ण हो जाएगा—लेकिन एक कटु अर्थ में।

तब सवाल यह नहीं होगा कि पांच सौ रुपये गलत थे या एक करोड़। सवाल होगा कि क्या भ्रष्टाचार की नैतिकता रकम देखकर बदलती है? क्या 500 रुपये लेने वाला भ्रष्ट है, लेकिन एक करोड़ का सवाल आने पर हम पहले पूछते हैं कि “किसने पकड़ा?” क्या भ्रष्टाचार का विरोध तब तक आसान है जब तक रिश्वत किसी और ने ली हो? और क्या ईमानदारी का सबसे कठिन हिस्सा यह नहीं है कि जब अवसर आपके पास हो, तब भी आप उसे ठुकरा दें? इन सवालों के जवाब किसी वायरल वीडियो में नहीं मिलेंगे। न जांच एजेंसी के प्रेस नोट में। न सोशल मीडिया की भीड़ में। इनका जवाब उस जांच में मिलेगा जो निष्पक्ष हो, पारदर्शी हो और समय पर पूरी हो।

अगर आरोप गलत हैं तो अधिकारी को उसी मजबूती से निर्दोष साबित होने का अधिकार मिलना चाहिए, जिस मजबूती से आरोपों की जांच हो रही है और अगर आरोप सही साबित होते हैं, तो फिर पुराना वीडियो केवल वायरल क्लिप नहीं रहेगा। वह भारतीय प्रशासनिक सेवा के नैतिक प्रशिक्षण और वास्तविक प्रशासनिक संस्कृति के बीच खड़ी एक विडंबना का दस्तावेज बन जाएगा क्योंकि भ्रष्टाचार पर सबसे सुंदर भाषण वही होता है, जिसे बोलने की जरूरत न पड़े। काम करने का तरीका ही भाषण बन जाए। शायद सिविल सेवा का असली सुधार भी वहीं से शुरू होगा—जहां अधिकारी को यह याद दिलाने की जरूरत न पड़े कि जनता की सेवा करनी है और नागरिक को यह डर न रहे कि अपना जन्म प्रमाण पत्र पाने के लिए उसे 500 रुपये देने पड़ेंगे या उससे भी ज्यादा बड़ी रकम। फर्क सिर्फ रकम का नहीं है। फर्क इस बात का है कि सरकारी कुर्सी पर बैठा व्यक्ति उस कुर्सी को सेवा का साधन मानता है या सौदे का और इस सवाल का जवाब किसी मॉक इंटरव्यू में नहीं, असली जिंदगी में देना पड़ता है।

कैमरे की कलम: वर्दी का रौब, सुप्रीम कोर्ट का तमाचा

कानून की किताबों में पुलिस को नागरिकों की सुरक्षा का प्रहरी कहा गया है। संविधान पुलिस को असीमित शक्ति नहीं देता, बल्कि उसे कानून की सीमाओं में काम करने की जिम्मेदारी देता है। लेकिन जब हिरासत में लिया गया एक व्यक्ति तीन दिन बाद अस्पताल में दम तोड़ देता है, उसके सिर में लगी चोट उसकी मौत की वजह बताई जाती है और उसकी मौत की आपराधिक जांच के लिए FIR दर्ज करने में ढाई साल से अधिक समय लग जाता है, तब सवाल सिर्फ एक मौत का नहीं रह जाता—सवाल पूरी पुलिस व्यवस्था की संवेदनशीलता, जवाबदेही और कार्यक्षमता का बन जाता है।

छत्तीसगढ़ से सामने आया यह मामला इसी सवाल को कटघरे में खड़ा करता है। और इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने तो पुलिस प्रशासन के शीर्ष स्तर पर ही ऐसा प्रश्नचिह्न लगा दिया है, जिसे नजरअंदाज करना मुश्किल है।

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की कथित लापरवाही पर कड़ी नाराजगी जताते हुए छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक (DGP) पर बेहद तल्ख टिप्पणी की। अदालत ने कहा— “हमें यह कहते हुए दुख हो रहा है कि हमें यह दर्ज करना होगा कि छत्तीसगढ़ के DGP पूरी तरह से अयोग्य हैं!”

किसी राज्य के पुलिस महानिदेशक के लिए देश की सर्वोच्च अदालत से ऐसी टिप्पणी आना अपने आप में असाधारण है। लेकिन इस टिप्पणी के पीछे जिस घटनाक्रम की परतें हैं, वे उससे भी अधिक गंभीर हैं।

मामले के अनुसार, 34 वर्षीय व्यक्ति को उसकी किराने की दुकान के सामने बिक्री के लिए शराब रखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। शराब की कथित कीमत लगभग 1,200 रुपये थी। 18 जनवरी 2024 को उसे हिरासत में लिया गया। सवाल यह नहीं है कि वह अपराधी था या नहीं। सवाल यह है कि पुलिस की हिरासत में जाने के बाद उसकी जान कैसे चली गई। गिरफ्तारी के समय उसकी मेडिकल जांच की गई थी। राज्य ने हाईकोर्ट के सामने बताया कि उस समय उसके शरीर पर कोई गंभीर चोट नहीं थी—सिर्फ लगभग 15 दिन पुरानी बताई गई थोड़ी सूजन का उल्लेख था, लेकिन महज तीन दिन बाद तस्वीर बदल चुकी थी।

21 जनवरी 2024 को उसकी तबीयत बिगड़ने पर उसे अस्पताल ले जाया गया और सुबह करीब छह बजे उसकी मौत हो गई। एक व्यक्ति पुलिस की हिरासत में गया था। तीन दिन बाद वह मृत अवस्था में बाहर आया। यहीं से राज्य की जवाबदेही शुरू होती है। 

22 जनवरी को जेल अधीक्षक ने सेशन जज को पत्र लिखकर मृतक की मौत की न्यायिक जांच कराने का अनुरोध किया। इसके बाद चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ने CrPC की धारा 176 के तहत जांच शुरू की। जांच आगे बढ़ी और संबंधित JMFC ने जुलाई 2024 में अपनी रिपोर्ट दी। रिपोर्ट में राय दी गई कि मौत सिर की चोट से उत्पन्न जटिलताओं के कारण हुई थी। यह तथ्य बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि हिरासत में हुई मौत के मामले में सबसे पहला और सबसे जरूरी सवाल यही होता है कि चोट लगी कैसे? अगर गिरफ्तारी के समय गंभीर चोट नहीं थी और हिरासत के कुछ ही दिनों बाद व्यक्ति की मौत सिर की चोट की जटिलताओं से हुई, तो यह पता लगाना राज्य की कानूनी जिम्मेदारी बन जाती है कि वह चोट किन परिस्थितियों में लगी, लेकिन यहां सवालों के जवाब तलाशने के बजाय व्यवस्था मानो फाइलों के पीछे छिप गई। यह पुलिसिंग की गति है या फाइलों की तपस्या?

मृतक की पत्नी और दो बेटियों ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। परिवार ने मांग की कि हिरासत में हुई मौत की निष्पक्ष जांच कराई जाए और उन्हें 50 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य को एक लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया। अदालत ने माना कि राज्य उन कर्मचारियों का नियोक्ता है जिनकी लापरवाही के कारण मृतक की जान गई और इसलिए मुआवजा देने की जिम्मेदारी राज्य की है।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि इस तरह के मुआवजे का उद्देश्य पुलिस और जेल अधिकारियों पर ऐसा प्रभाव डालना होना चाहिए कि भविष्य में वे ऐसी हरकत न करें जिनसे किसी व्यक्ति की जान चली जाए, लेकिन यहां एक बुनियादी सवाल रह जाता है— क्या किसी नागरिक की हिरासत में मौत की कीमत वास्तव में एक लाख रुपये हो सकती है?

मुआवजा जीवन की कीमत नहीं है। वह राज्य की जिम्मेदारी स्वीकार करने का एक सार्वजनिक कानून संबंधी उपाय है। सर्वोच्च न्यायालय भी लंबे समय से यह स्पष्ट करता रहा है कि हिरासत में मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर दिया गया मुआवजा किसी अन्य आपराधिक या कानूनी जिम्मेदारी को समाप्त नहीं करता इसलिए परिवार के लिए असली सवाल रकम का नहीं, न्याय का है।

यही वह बिंदु है जहां पूरा मामला और ज्यादा गंभीर हो जाता है। मृत्यु जनवरी 2024 में हुई। न्यायिक जांच शुरू हुई। जुलाई 2024 में जांच रिपोर्ट सामने आई, जिसमें सिर की चोट से हुई मौत की बात कही गई फिर भी पुलिस ने मौत की जांच के लिए FIR 30 जुलाई 2026 को दर्ज की यानी जिस मौत की परिस्थितियों की आपराधिक जांच समय रहते होनी चाहिए थी, उसके लिए FIR दर्ज करने में लगभग ढाई साल निकल गए। यह देरी सिर्फ प्रशासनिक सुस्ती नहीं कही जा सकती। हिरासत में मौत जैसे मामले में समय स्वयं एक सबूत होता है। समय बीतने के साथ CCTV फुटेज गायब हो सकते हैं, रिकॉर्ड बदल सकते हैं, गवाहों की याद कमजोर हो सकती है और परिस्थितिजन्य साक्ष्य नष्ट हो सकते हैं और यही कारण है कि हिरासत में हुई मौत के मामलों में पुलिस से सामान्य मामलों की तुलना में कहीं अधिक पारदर्शिता और तत्परता की अपेक्षा होती है। 

इस वर्ष जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य को नोटिस जारी किया। राज्य की ओर से जवाबी हलफनामा दाखिल किया गया, लेकिन अदालत के सामने वह सबसे बुनियादी सवाल का संतोषजनक उत्तर नहीं दे सका—FIR दर्ज करने और मृतक की हिरासत में हुई मौत की जांच के लिए आखिर क्या कदम उठाए गए? यहीं सुप्रीम कोर्ट का धैर्य टूटता दिखाई दिया। किसी राज्य का सर्वोच्च पुलिस अधिकारी यदि अपने अधीनस्थ तंत्र में हुई हिरासत में मौत के मामले में यह सुनिश्चित नहीं कर पाता कि समय पर FIR हो, स्वतंत्र जांच हो और अदालत को स्पष्ट जवाब दिया जाए, तो फिर सवाल सिर्फ नीचे के स्तर के पुलिसकर्मियों पर क्यों रुके? यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें अदालत ने DGP को “पूरी तरह से अयोग्य” तक कह दिया। 

छत्तीसगढ़ में पुलिसिंग को लेकर अक्सर अपराध नियंत्रण, नक्सल विरोधी अभियान, कानून-व्यवस्था और पुलिस की कठोर छवि की चर्चा होती है लेकिन पुलिस की असली परीक्षा अपराधी को पकड़ने में नहीं, हिरासत में लिए गए व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा करने में होती है। जिस व्यक्ति को पुलिस ने पकड़ लिया, वह उसकी निजी संपत्ति नहीं हो जाता। हथकड़ी संविधान को नहीं रोकती। पुलिस स्टेशन संविधान से बाहर की जगह नहीं है और हिरासत न्यायपालिका से बाहर का क्षेत्र नहीं है। अगर पुलिस के पास किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने की शक्ति है तो उसी के साथ उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी आती है। यही लोकतांत्रिक पुलिसिंग और सत्ता के बल पर चलने वाली पुलिसिंग के बीच अंतर है।

पुलिस की वर्दी का उद्देश्य नागरिक को डराना नहीं, उसे कानून पर भरोसा दिलाना है लेकिन जब हिरासत में कोई व्यक्ति मर जाता है और उसके परिवार को न्याय के लिए हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक जाना पड़ता है, तो जनता के मन में स्वाभाविक सवाल उठता है— अगर पुलिस हिरासत में हमारी सुरक्षा की गारंटी नहीं दे सकती, तो पुलिस की शक्ति का औचित्य क्या है? एक लोकतंत्र में पुलिस सबसे शक्तिशाली संस्था नहीं होती। पुलिस संविधान की अधीनस्थ संस्था होती है। उसकी ताकत कानून से आती है और उसकी सीमा भी कानून ही तय करता है इसलिए हिरासत में मौत का हर मामला पुलिस के लिए सिर्फ एक विभागीय घटना नहीं होना चाहिए। वह पूरे बल के लिए संवैधानिक जवाबदेही की परीक्षा होना चाहिए। 

“पूरी तरह से अयोग्य” जैसी टिप्पणी को केवल अदालत की नाराजगी मानकर आगे बढ़ जाना खतरनाक होगा। यह टिप्पणी पुलिस नेतृत्व के लिए चेतावनी है कि वरिष्ठ पद केवल पदनाम और प्रोटोकॉल का विषय नहीं है। DGP का मतलब सिर्फ राज्य की पुलिस का सर्वोच्च अधिकारी होना नहीं है। इसका अर्थ यह भी है कि राज्य की पुलिस में होने वाली गंभीर घटनाओं पर अंतिम प्रशासनिक जवाबदेही तय हो।

छत्तीसगढ़ के इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अदालत ने केवल एक मौत पर सवाल नहीं उठाया है। उसने उस मानसिकता पर चोट की है जिसमें पुलिस की गलती को विभागीय प्रक्रिया, देरी और कागजी जवाबों के नीचे दबा देने की उम्मीद की जाती है।

अब सवाल यह है कि इस टिप्पणी के बाद छत्तीसगढ़ पुलिस बदलेगी या केवल एक और जवाबी हलफनामा दाखिल होगा? क्योंकि वर्दी की ताकत तभी सम्मान पैदा करती है, जब उसके पीछे जवाबदेही हो। वरना 1,200 रुपये की शराब के लिए दिखाई गई तत्परता और एक इंसान की हिरासत में हुई मौत पर दिखाई गई सुस्ती के बीच का अंतर जनता को बहुत कुछ समझा देता है और शायद यही इस मामले का सबसे कड़वा निष्कर्ष है— पुलिस अगर नागरिक को गिरफ्तार करने में तेज है, लेकिन अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करने में धीमी, तो समस्या सिर्फ पुलिसिंग की नहीं, पुलिस संस्कृति की है।

कैमरे की कलम: जब कैमरा गवाह बन जाए

कभी कहा जाता था कि "दीवारों के भी कान होते हैं।" इक्कीसवीं सदी ने इस कहावत को बदल दिया है। अब दीवारों के सिर्फ कान नहीं, आंखें भी हैं। जेब में रखा मोबाइल फोन, सड़क पर लगा सीसीटीवी कैमरा और पुलिस की वर्दी पर लगा बॉडी कैमरा आज लोकतंत्र के सबसे निष्पक्ष गवाह बनते जा रहे हैं। इनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इन्हें न सत्ता का भय होता है, न विपक्ष का मोह और न ही किसी दल या व्यक्ति के प्रति पूर्वाग्रह। कैमरा वही दिखाता है जो उसके सामने घटता है।

पिछले कुछ वर्षों में देश में जितने बड़े राजनीतिक, प्रशासनिक और सामाजिक विवाद सामने आए हैं, उनमें से अधिकांश की शुरुआत किसी वीडियो, ऑडियो या सीसीटीवी फुटेज से हुई। कहीं कोई मंत्री अपने पद के अहंकार में दिखाई दिया, कहीं कोई अधिकारी जनता से दुर्व्यवहार करता मिला, कहीं पुलिस की बर्बरता कैमरे में कैद हुई, तो कहीं अस्पताल में डॉक्टरों से मारपीट करते जनप्रतिनिधि की हेकड़ी कुछ ही घंटों में अदालत तक पहुंच गई। यदि ये कैमरे न होते तो अधिकांश मामलों में वही पुराना सरकारी वाक्य सुनाई देता—"आरोप निराधार हैं। जांच कराई जाएगी।"

दरअसल, तकनीक ने लोकतंत्र को वह ताकत दे दी है, जिसे कभी केवल अखबार, अदालत और विपक्ष मिलकर भी नहीं दे पाते थे—तथ्य का निर्विवाद प्रमाण।

यही कारण है कि कैमरे से सबसे अधिक असहज वही लोग होते हैं जो अधिकार को जवाबदेही से ऊपर मानते हैं। आम नागरिक कैमरे से इसलिए नहीं डरता क्योंकि उसके पास छिपाने को बहुत कम होता है। लेकिन सत्ता, चाहे वह राजनीतिक हो या प्रशासनिक, अक्सर रिकॉर्डिंग से असहज हो जाती है। जैसे ही कोई नागरिक मोबाइल निकालता है, कई जगह सबसे पहला आदेश सुनाई देता है—"वीडियो बंद करो। मोबाइल रखो। रिकॉर्डिंग मत करो।"

सवाल यह है कि क्यों?

यदि सरकारी अधिकारी नियमों के अनुसार काम कर रहा है, पुलिस कानून के दायरे में कार्रवाई कर रही है और जनप्रतिनिधि जनता के प्रति मर्यादित व्यवहार कर रहा है, तो रिकॉर्डिंग से डर किस बात का?

लोकतंत्र में सत्ता जनता से ताकत लेती है। इसलिए जनता को यह अधिकार भी होना चाहिए कि वह सत्ता के व्यवहार का दस्तावेज तैयार कर सके।

विडंबना यह है कि सरकार नागरिकों को तो हर जगह कैमरों की निगरानी में रखती है। रेलवे स्टेशन, हवाई अड्डे, टोल प्लाजा, बैंक, सरकारी कार्यालय, अस्पताल, बाजार, चौराहे—हर जगह सीसीटीवी लगे हैं। नागरिक की हर गतिविधि रिकॉर्ड होती है। लेकिन जैसे ही नागरिक सरकार की गतिविधि रिकॉर्ड करना चाहता है, उसे अनुशासन, गोपनीयता और कानून का पाठ पढ़ाया जाने लगता है। लोकतंत्र में यह दोहरा मापदंड नहीं चल सकता।

दुनिया के अनेक लोकतांत्रिक देशों में पुलिस के लिए बॉडी कैमरा अनिवार्य है। इसका उद्देश्य केवल पुलिस की निगरानी करना नहीं, बल्कि पुलिस को झूठे आरोपों से बचाना भी है। यदि कोई आरोपी पुलिस पर मारपीट का आरोप लगाता है और रिकॉर्डिंग कुछ और कहती है, तो वही वीडियो पुलिस की ढाल बन जाता है। इसी प्रकार यदि पुलिस अपनी शक्ति का दुरुपयोग करती है तो वही कैमरा जनता के अधिकारों का प्रहरी बन जाता है।

अर्थात कैमरा किसी एक पक्ष का नहीं, सत्य का पक्षधर होता है।

भारत में भी समय-समय पर पुलिस को बॉडी कैमरे दिए गए, लेकिन उनका उपयोग अपेक्षित स्तर पर नहीं हो सका। कहीं उपकरण अलमारियों में बंद रह गए, कहीं बैटरी खत्म रही और कहीं कैमरे चालू ही नहीं किए गए। तकनीक उपलब्ध थी, लेकिन पारदर्शिता की इच्छा अनुपस्थित रही।

असल प्रश्न यह है कि क्या केवल पुलिस ही क्यों?

सरकारी कार्यालयों में होने वाली प्रत्येक औपचारिक बातचीत की रिकॉर्डिंग क्यों न हो?

तहसील, नगर निगम, पंचायत, आरटीओ, राजस्व कार्यालय, पुलिस थाना, विकासखंड, बिजली कार्यालय—जहां भी नागरिक अपने अधिकार के लिए सरकारी कर्मचारी के सामने खड़ा होता है, वहां उसकी बातचीत रिकॉर्ड करने का अधिकार उसे क्यों न मिले?

आज अधिकांश भ्रष्टाचार फाइलों में नहीं, मौखिक आदेशों में होता है।

कई वरिष्ठ अधिकारी अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को विवादास्पद निर्देश कभी लिखित में नहीं देते। आदेश हमेशा मौखिक होता है। बाद में जब जांच होती है तो वही अधिकारी कह देता है—"मैंने ऐसा कोई निर्देश नहीं दिया।"

यदि ऐसे संवाद रिकॉर्ड किए जा सकें, तो न केवल गलत आदेश देने की प्रवृत्ति कम होगी, बल्कि ईमानदार कर्मचारी भी सुरक्षित रहेगा।

भारतीय प्रशासन में "मौखिक आदेश" शायद सबसे बड़ा अदृश्य भ्रष्टाचार है। फाइलें साफ रहती हैं और जिम्मेदारी हवा में गायब हो जाती है।

तकनीक इस बीमारी का इलाज बन सकती है।

बेशक, इसका अर्थ यह नहीं कि निजी जीवन की गोपनीयता समाप्त कर दी जाए। लोकतंत्र में निजता मौलिक अधिकार है। किसी के घर, निजी बातचीत या व्यक्तिगत जीवन में अनधिकृत रिकॉर्डिंग स्वीकार्य नहीं हो सकती। लेकिन जब कोई व्यक्ति सरकारी पद पर बैठकर सार्वजनिक दायित्व निभा रहा हो, तब उसके आधिकारिक व्यवहार पर पारदर्शिता का सिद्धांत लागू होना चाहिए।

लोकतंत्र में सरकारी पद निजी संपत्ति नहीं होता।

यह जनता का विश्वास होता है।

और विश्वास का सबसे मजबूत आधार पारदर्शिता है।

सुप्रीम कोर्ट पहले ही देश के सभी थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाने के निर्देश दे चुका है। कई राज्यों में इस दिशा में काम भी हुआ है। अदालतों की कार्यवाही रिकॉर्ड होती है। संसद और विधानसभाओं की हर गतिविधि रिकॉर्ड होती है। नगर निगम की बैठकों का भी वीडियो बनता है। यदि लोकतंत्र के सर्वोच्च संस्थानों की कार्यवाही रिकॉर्ड हो सकती है तो फिर सरकारी दफ्तरों में जनता और अधिकारियों के बीच होने वाली औपचारिक बातचीत रिकॉर्ड होने में आपत्ति कैसी?

जो व्यवस्था स्वयं को ईमानदार मानती है, उसे कैमरे से नहीं, कैमरे की अनुपस्थिति से डरना चाहिए।

यह भी सच है कि कैमरा हर समस्या का समाधान नहीं है। कैमरा रिश्वतखोरी समाप्त नहीं कर सकता। कैमरा भ्रष्टाचार की मानसिकता नहीं बदल सकता। कैमरा कानून का विकल्प नहीं है। लेकिन कैमरा सत्य का ऐसा दस्तावेज अवश्य बन सकता है जिसे झुठलाना कठिन हो।

लोकतंत्र में झूठ सबसे अधिक वहीं फलता-फूलता है जहां प्रमाण नहीं होते।

कैमरा प्रमाण पैदा करता है।

इसलिए वह लोकतंत्र का शत्रु नहीं, सहयोगी है।

अब समय आ गया है कि सरकार स्पष्ट नीति बनाए। नागरिकों को यह कानूनी अधिकार मिले कि वे सरकारी कार्यालयों में अपने आधिकारिक कामकाज के दौरान होने वाली बातचीत रिकॉर्ड कर सकें। पुलिस कार्रवाई में बॉडी कैमरा अनिवार्य रूप से चालू रहे। सरकारी बैठकों में मौखिक निर्देशों के बजाय रिकॉर्डेड या लिखित आदेशों की व्यवस्था हो। और यदि कोई अधिकारी बिना वैध कारण रिकॉर्डिंग रोकता है या नागरिक का मोबाइल छीनता है, तो इसे भी अनुशासनहीनता माना जाए।

इक्कीसवीं सदी में लोकतंत्र का नया प्रहरी कोई व्यक्ति नहीं, तकनीक है।

कैमरा न पक्षधर होता है, न विरोधी। वह न सरकार के लिए वोट मांगता है, न विपक्ष के लिए नारे लगाता है। वह केवल सच दर्ज करता है।

शायद यही कारण है कि जो लोग सच के साथ खड़े हैं, उन्हें कैमरे से डर नहीं लगता।

और जो कैमरे से डरते हैं, वे अनजाने में यह स्वीकार कर देते हैं कि उन्हें सच से असुविधा है। 

कैमरे की कलम: इम्तिहान में फेल सिस्टम

"जब व्यवस्था नकल करने लगे, तो ईमानदार छात्र सबसे बड़ा अपराधी दिखाई देने लगता है।"

देश में एक अजीब परंपरा विकसित हो गई है। यहां हर साल लाखों छात्र परीक्षा देते हैं, लेकिन असली परीक्षा छात्रों की नहीं, व्यवस्था की होती है। दुर्भाग्य यह है कि हर बार छात्र पास हो जाएं या फेल, व्यवस्था अपनी ही कॉपी जांचती है और खुद को 'उत्तीर्ण' घोषित कर देती है। फिर एक दिन कोई पेपर लीक हो जाता है। सरकार कहती है—"दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।" जांच एजेंसी कहती है—"जांच जारी है।" अधिकारी कहते हैं—"यह एक अलग-थलग घटना है" और छात्र सोचता है—"क्या मेरा भविष्य भी अलग-थलग घटना है?" 

दिल्ली के जंतर-मंतर पर उमड़ा छात्र सैलाब केवल एक परीक्षा का विरोध नहीं था। वह उन लाखों युवाओं का जमा हुआ आक्रोश था, जिन्होंने वर्षों तक किताबों में सिर झुकाया, कोचिंग संस्थानों में लाखों रुपये खर्च किए, परिवारों की उम्मीदों का बोझ उठाया और अंत में पाया कि उनका मुकाबला प्रतिभा से नहीं, बल्कि पेपर लीक, दलालों और परीक्षा माफिया से कराया जा रहा है। छात्र आंदोलन के दबाव के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दिया। यह लोकतंत्र में जवाबदेही का एक महत्वपूर्ण क्षण था, लेकिन क्या केवल इस्तीफे से शिक्षा व्यवस्था का उपचार हो जाएगा? शायद नहीं। असल सवाल यह है कि भारत में परीक्षा अब ज्ञान की परीक्षा कम और धैर्य की परीक्षा अधिक क्यों बन गई है? हमारा शिक्षा तंत्र आज उस डॉक्टर की तरह हो गया है, जो हर मरीज को यही सलाह देता है—"अगली बार ध्यान रखिए।" 

सरकारें अक्सर कहती हैं कि युवा देश का भविष्य हैं। लेकिन व्यवहार में लगता है कि युवा केवल चुनावी भाषणों का भविष्य हैं। चुनाव के समय युवाओं को रोजगार का सपना दिखाइए, परीक्षा कराइए, फिर पेपर लीक होने दीजिए, जांच बैठाइए, समिति बनाइए, रिपोर्ट मंगाइए और अगले चुनाव तक सब भूल जाइए। 

आज आवश्यकता केवल कठोर कानून बनाने की नहीं है। कानून पहले भी थे। आवश्यकता उनके निष्पक्ष और त्वरित क्रियान्वयन की है। पेपर लीक को केवल आपराधिक घटना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संसाधनों और युवाओं के भविष्य पर सुनियोजित हमला माना जाना चाहिए। इसमें शामिल लोगों के खिलाफ ऐसी कार्रवाई होनी चाहिए कि आने वाले वर्षों में कोई इस अपराध की कल्पना भी न कर सके।

राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी सहित सभी परीक्षा संस्थाओं की स्वतंत्र तकनीकी और प्रशासनिक ऑडिट व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए। प्रश्नपत्र सुरक्षा, डिजिटल निगरानी, साइबर सुरक्षा और जवाबदेही के मानकों को अंतरराष्ट्रीय स्तर का बनाया जाना चाहिए। परीक्षा प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी बनाने के लिए समयबद्ध सुधार आवश्यक हैं लेकिन सुधार केवल संस्थागत नहीं, राजनीतिक भी होना चाहिए।

सरकारों को यह समझना होगा कि युवा केवल चुनावी घोषणापत्र का विषय नहीं हैं। वे राष्ट्र की उत्पादक शक्ति हैं। उनका विश्वास खो देना किसी भी सरकार की सबसे बड़ी राजनीतिक और नैतिक विफलता होगी।

शिक्षा को राजनीति का अखाड़ा बनाने की प्रवृत्ति भी समाप्त करनी होगी। परीक्षा में हुई हर गड़बड़ी पर सत्ता और विपक्ष यदि केवल एक-दूसरे पर आरोप लगाने में व्यस्त रहेंगे, तो सबसे बड़ी कीमत वह छात्र चुकाएगा, जिसका इन आरोपों से कोई संबंध नहीं है।

भारत दुनिया का सबसे युवा देश बनने का दावा करता है। यदि यह दावा वास्तविक है, तो सबसे अधिक निवेश भी युवाओं के विश्वास में होना चाहिए। सड़कें, पुल और इमारतें बाद में भी बन सकती हैं, लेकिन यदि एक पीढ़ी का भरोसा टूट गया, तो उसे दोबारा बनाने में दशकों लग जाते हैं।

यह आंदोलन एक मंत्री के इस्तीफे पर समाप्त नहीं होना चाहिए। इसकी परिणति परीक्षा सुधारों की व्यापक प्रक्रिया में होनी चाहिए। देश का हर छात्र यह महसूस करे कि उसका मुकाबला केवल प्रश्नपत्र से है, किसी माफिया, किसी दलाल और किसी भ्रष्ट तंत्र से नहीं।

किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी परीक्षा उसके छात्र नहीं देते, उसकी व्यवस्था देती है। आज यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि उस परीक्षा में हमारी व्यवस्था अपेक्षित अंक नहीं ला सकी है।

अब समय उत्तरपुस्तिका बदलने का नहीं, पूरी परीक्षा प्रणाली को सुधारने का है। तभी यह विश्वास लौटेगा कि भारत में सफलता का रास्ता मेहनत से होकर जाता है, न कि पेपर लीक की अंधेरी गलियों से।

कैमरे की कलम: 'डूबा बिलासपुर, तैरा भ्रष्टाचार'

बिलासपुर के नागरिकों को बधाई। आखिरकार हमारा शहर उस मुकाम पर पहुंच ही गया, जिसकी कल्पना शायद किसी ने नहीं की थी। अब हम केवल सड़क मार्ग से नहीं, बल्कि जलमार्ग से भी आवागमन करने लगे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि यह उपलब्धि किसी दूरदर्शी योजना का परिणाम नहीं, बल्कि दूरदर्शिता की लगातार हत्या का प्रतिफल है।

जिन लोगों ने कभी वेनिस शहर की तस्वीरें देखकर आह भरी होगी कि "काश हमारे शहर में भी नाव चलती", उनकी इच्छा पूरे 20 साल बाद इस मानसून में पूरी हो गई। कॉलोनियों में नाव चल रही है, लोग घरों की छतों पर शरण लिए बैठे हैं, बच्चे स्कूल नहीं बल्कि बाढ़ का भूगोल पढ़ रहे हैं, और प्रशासन इस उपलब्धि पर शायद यही सोच रहा होगा कि "देखिए, हमने जल पर्यटन की संभावनाएं भी विकसित कर दीं।"

बिलासपुर सचमुच स्मार्ट हो गया है। इतना स्मार्ट कि पानी ने भी समझ लिया कि उसे अब नालियों से नहीं, सीधे लोगों के ड्राइंग रूम से होकर गुजरना चाहिए।

कहते हैं प्रकृति कभी अन्याय नहीं करती। पानी वहीं जाता है, जहां उसके लिए रास्ता छोड़ा जाता है। लेकिन हमारे शहर के योजनाकारों ने प्रकृति को भी चुनौती दे दी। जहां तालाब थे, वहां कॉलोनियां उगा दीं। जहां नाले थे, वहां कॉम्प्लेक्स खड़े कर दिए। जहां पानी बहता था, वहां प्लॉट काट दिए। अब पानी बेचारा करे भी तो क्या करे? वह भी आखिर सरकारी फाइल नहीं है कि वर्षों तक दबा रहे। उसे रास्ता चाहिए। रास्ता नहीं मिला तो उसने घरों का दरवाजा खटखटा दिया।

हमारे यहां विकास का एक बड़ा वैज्ञानिक सिद्धांत है—पहले निर्माण करो, बाद में सोचो कि पानी जाएगा कहां। अगर कोई सवाल पूछे तो मास्टर प्लान दिखा दो। अगर ज्यादा सवाल पूछे तो अगली समिति बना दो। और अगर फिर भी न माने तो कह दो कि "इतनी बारिश सौ साल में पहली बार हुई है।"

यह "सौ साल में पहली बार" वाला वाक्य भी बड़ा दिलचस्प है। पिछले दस वर्षों से हर साल सुन रहे हैं। लगता है हमारे यहां हर मानसून सौ साल पुराना रिकॉर्ड तोड़ देता है, लेकिन हमारी तैयारी हर बार शून्य वर्ष से शुरू होती है।

सबसे मजेदार दृश्य तब सामने आया जब शहर के बड़े अधिकारियों के सरकारी बंगलों में भी पानी भर गया। लोकतंत्र में समानता का इससे सुंदर उदाहरण शायद ही मिले। इस बार पानी ने गरीब-अमीर, नेता-अफसर, बंगला-झोपड़ी में कोई भेदभाव नहीं किया। फर्क बस इतना था कि आम आदमी अपने घर का पानी खुद निकाल रहा था, जबकि सरकारी बंगलों का पानी निकालने के लिए पूरा सरकारी अमला जुट गया।

कभी-कभी लगता है कि पानी भी बड़ा ईमानदार होता है। उसे किसी का पद नहीं दिखता, केवल ढलान दिखती है।

स्मार्ट सिटी मिशन पर सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च हुए। भूमिगत सीवरेज पर भी करोड़ों बहाए गए। शहर के बजट का आकार लगातार बढ़ता गया। कागजों में परियोजनाएं पूरी होती रहीं। शिलान्यास के पत्थर लगते रहे। उद्घाटन के फीते कटते रहे। प्रेस विज्ञप्तियां छपती रहीं। सोशल मीडिया पर तस्वीरें आती रहीं। बस एक छोटी-सी भूल हो गई—बारिश को आमंत्रण भेजना भूल गए। जैसे ही बारिश आई, उसने सारे उद्घाटन भाषण बहा दिए।

हमारे यहां विकास का पैमाना बड़ा सरल है। सड़क कितनी टिकाऊ है, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि उद्घाटन किसने किया। नाली कितनी चौड़ी है, इससे ज्यादा जरूरी है कि शिलापट्ट पर नाम किसका लिखा है। सीवरेज काम कर रहा है या नहीं, यह बाद की बात है; पहले यह सुनिश्चित होना चाहिए कि परियोजना की तस्वीरें रंगीन हों।

नगर नियोजन का हाल भी कम रोचक नहीं है। नक्शे में चौड़ी सड़कें, आधुनिक ड्रेनेज और हरित क्षेत्र दिखाई देते हैं। जमीन पर वही सड़क आधी पार्किंग बन जाती है, नाली आधी अतिक्रमण में गायब हो जाती है और हरित क्षेत्र पर धीरे-धीरे कंक्रीट का जंगल उग आता है। फिर एक दिन बारिश आती है और पूछती है—"मुझे जाना किधर है?" जवाब में पूरा शहर चुप रहता है।

अवैध निर्माणों की कहानी भी बड़ी प्रेरणादायक है। नियमों के अनुसार जो काम नहीं हो सकता, वह थोड़ी-सी कृपा, थोड़ी-सी पहचान और थोड़ी-सी सुविधा शुल्क के बाद पूरी तरह वैध महसूस होने लगता है। नक्शे बदल जाते हैं, मंजिलें बढ़ जाती हैं, नाले सिकुड़ जाते हैं और सरकारी फाइलों में सब कुछ "नियमों के अनुरूप" दर्ज हो जाता है। आखिर कागज पर तो पानी नहीं भरता।

हर साल मानसून से पहले नालों की सफाई का अभियान चलता है। कैमरे आते हैं। अधिकारी फावड़ा पकड़ते हैं। दो-चार टोकरियां गाद निकलती हैं। तस्वीरें अखबारों में छपती हैं। फिर फावड़ा वापस वाहन में रख दिया जाता है और गाद अगले मानसून तक वहीं आराम करती रहती है। यह परंपरा इतनी पवित्र हो चुकी है कि इसे शायद अमूर्त सांस्कृतिक विरासत घोषित कर देना चाहिए।

फिर कंट्रोल रूम खुलता है। हेल्पलाइन नंबर जारी होते हैं। अपील की जाती है कि "घबराएं नहीं।" नागरिक सोचता है—घबराएं नहीं, तो क्या तैरना शुरू कर दें? कंट्रोल रूम तब सक्रिय होता है जब पानी लोगों के घरों में पहुंच चुका होता है। यानी बीमारी फैलने के बाद दवा की दुकान खोलने जैसी दूरदर्शिता।

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इस पूरे घटनाक्रम में किसी की जिम्मेदारी तय नहीं होती। बारिश दोषी, बादल दोषी, मौसम दोषी, जलवायु परिवर्तन दोषी, पिछली सरकार दोषी, अगली सरकार दोषी—बस वे लोग निर्दोष रहते हैं, जिनके हस्ताक्षरों से शहर का भविष्य तय हुआ। हमारे यहां जवाबदेही भी शायद भूमिगत सीवरेज की तरह है—कागजों में मौजूद, जमीन पर गायब। 

आज भी मकान और व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स तेजी से बन रहे हैं, लेकिन नालियां वर्षों पुरानी क्षमता के साथ जस की तस हैं। नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कार्रवाई करने के बजाय उन्हें संरक्षण दिया गया। परिणाम आज पूरे शहर के सामने है।

शहर का मास्टर प्लान बदलने से पहले शायद मास्टर मानसिकता बदलने की जरूरत है। नगर नियोजन का मतलब केवल प्लॉट बेचना नहीं होता। विकास का अर्थ केवल कंक्रीट बिछाना नहीं होता। शहर इमारतों से नहीं, व्यवस्थाओं से बनता है। सड़कें, नालियां, तालाब, जलनिकासी, हरित क्षेत्र और नियमों का पालन—ये सब विकास के उतने ही जरूरी स्तंभ हैं, जितने फ्लाईओवर और चमकदार चौक। 

दुनिया के अनेक शहरों ने पुराने इलाकों में रेट्रोफिटिंग कर ड्रेनेज व्यवस्था सुधारी। जहां जरूरत पड़ी, वहां पुनर्विकास किया। जलग्रहण क्षेत्रों को संरक्षित रखा। वर्षा जल के प्राकृतिक प्रवाह को बाधित नहीं होने दिया। हमने भी इन शब्दों को बड़े-बड़े सेमिनारों और प्रस्तुतियों में खूब दोहराया। फर्क सिर्फ इतना रहा कि वहां इन पर काम हुआ, यहां इन पर ताली बजी।

अब भी समय है। राहत सामग्री बांटने, नाव चलाने और सर्वे कराने से आगे बढ़ना होगा। शहर का वैज्ञानिक जलनिकासी मानचित्र तैयार करना होगा। नालों पर हुए अतिक्रमण हटाने होंगे। नियम तोड़ने वालों और नियम तोड़ने देने वालों—दोनों की जवाबदेही तय करनी होगी। जिन परियोजनाओं पर जनता का पैसा खर्च हुआ है, उनका स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट होना चाहिए। आखिर जनता को यह जानने का अधिकार है कि करोड़ों रुपये पानी में बहे या पानी रोकने में लगे।

वरना अगले साल फिर यही होगा। अखबारों में वही तस्वीरें होंगी। नेता वही आश्वासन देंगे। अधिकारी वही समीक्षा बैठक करेंगे। नागरिक वही बाल्टियां भरेंगे। और हम फिर गर्व से कहेंगे—"हमारी स्मार्ट सिटी अब और भी स्मार्ट हो गई है। इस बार पानी पहली मंजिल तक पहुंच गया।"

कहावत है कि डूबते को तिनके का सहारा होता है। बिलासपुर की जनता अब तिनका नहीं, जवाबदेही तलाश रही है। क्योंकि शहर को बारिश ने नहीं डुबोया। उसे डुबोया है वर्षों की लापरवाही, भ्रष्टाचार, योजनाहीन विकास और उस मानसिकता ने, जो हर आपदा के बाद दोष बादलों पर डालकर अपने दामन को सूखा साबित करने में लगी रहती है। 

अब समय केवल राहत कार्यों का नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने का है। जब तक गलत योजना, भ्रष्टाचार और नियमों की अनदेखी पर कठोर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक हर मानसून के साथ यही त्रासदी दोहराई जाती रहेगी।

शहर को नाव नहीं, नियत चाहिए। पंप नहीं, योजना चाहिए। राहत शिविर नहीं, जिम्मेदार शासन चाहिए। जिस दिन यह समझ सत्ता और व्यवस्था दोनों को आ जाएगी, उस दिन बिलासपुर सचमुच स्मार्ट कहलाने का हकदार होगा। तब तक नागरिकों से यही निवेदन है—बरसात शुरू होने से पहले राशन, मोमबत्ती और जरूरी दवाइयों के साथ एक लाइफ जैकेट भी संभालकर रखिए। क्या पता, अगली स्मार्ट योजना किस गली से होकर गुजरे।

कैमरे की कलम: "माइलेज नहीं, भरोसा घटा है"

लोकतंत्र में नागरिक का सबसे बड़ा सुख यह है कि उसे हर बात पर भरोसा रखने की सलाह दी जाती है। सरकार कहे कि अर्थव्यवस्था दौड़ रही है, तो आपको दौड़ती हुई दिखनी चाहिए। सरकार कहे कि महंगाई नियंत्रण में है, तो सब्जी खरीदते समय अपनी जेब पर नहीं, सरकार के बयान पर भरोसा करना चाहिए। और अब सरकार कह रही है कि पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिलाने से न आपकी गाड़ी को कोई फर्क पड़ रहा है, न माइलेज घट रहा है, न आपकी जेब पर कोई अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। अगर आपको कुछ और महसूस हो रहा है, तो संभव है कि गलती आपकी गाड़ी की नहीं, आपकी अनुभूति की हो।

देश में अब एक नया विज्ञान विकसित हो रहा है। इसमें प्रयोगशाला की जगह प्रेस कॉन्फ्रेंस होती है और शोधपत्रों की जगह सरकारी बयान। वैज्ञानिक निष्कर्ष यह है कि यदि करोड़ों लोग कोई शिकायत कर रहे हों, लेकिन सरकार उसे स्वीकार न करे, तो शिकायत अपने-आप अमान्य हो जाती है।

अजीब विडंबना है। पेट्रोल का दाम वर्षों से दुनिया के कई देशों की तुलना में कहीं अधिक चुकाने वाला भारतीय उपभोक्ता अब यह भी सुन रहा है कि जिस ईंधन के लिए वह पूरा पैसा दे रहा है, उसमें क्या मिलाया जाएगा, इसका निर्णय भी उसकी राय के बिना होगा। लोकतंत्र में वोट आपका है, लेकिन पेट्रोल कैसा होगा, यह अधिकार आपका नहीं है।

कहा जा रहा है कि एथेनॉल से देश का विदेशी मुद्रा भंडार बचेगा। यह स्वागतयोग्य उद्देश्य है। लेकिन क्या हर राष्ट्रीय लक्ष्य नागरिक की जेब से ही पूरा होगा? यदि किसी नीति का आर्थिक लाभ है, तो उसके दुष्प्रभावों का ईमानदार आकलन भी होना चाहिए। यदि माइलेज घटता है, तो कितना? किन वाहनों पर? किन परिस्थितियों में? यदि कोई नुकसान नहीं है, तो स्वतंत्र और सार्वजनिक परीक्षणों से इसे सिद्ध करने में हिचक क्यों?

सरकार का तर्क है कि उद्योग जगत आश्वस्त है। यह सुनकर मुस्कुराने का मन करता है। जिन कंपनियों पर नीति लागू करनी है, उनसे ही प्रमाणपत्र भी ले लिया गया। यह वैसा ही है जैसे छात्र अपनी उत्तरपुस्तिका स्वयं जांचकर प्रथम श्रेणी घोषित कर दे और प्रधानाचार्य कहें—"देखिए, परिणाम पूरी तरह निष्पक्ष है।"

इस पूरे विवाद का सबसे दिलचस्प पक्ष भरोसे का है। किसी भी लोकतंत्र में सरकार की सबसे बड़ी पूंजी जनता का विश्वास होती है। लेकिन विश्वास आदेश से पैदा नहीं होता। वह पारदर्शिता, स्वतंत्र जांच और ईमानदार संवाद से बनता है। यदि लाखों वाहन मालिक यह कह रहे हैं कि उन्हें फर्क महसूस हो रहा है, तो सबसे आसान रास्ता यह नहीं कि उन्हें भ्रमित घोषित कर दिया जाए। सबसे उचित रास्ता यह है कि किसी स्वतंत्र और विश्वसनीय संस्था से व्यापक परीक्षण कराया जाए और उसके निष्कर्ष सार्वजनिक किए जाएं।

एथेनॉल की कहानी केवल माइलेज की नहीं है। यह खेती, पानी और पर्यावरण की भी कहानी है। यदि एथेनॉल का उत्पादन उन फसलों से बढ़ेगा जिनमें भारी मात्रा में सिंचाई की आवश्यकता होती है, तो यह प्रश्न पूछना असंगत नहीं कि आज हम विदेशी तेल बचा रहे हैं या कल का भूजल खर्च कर रहे हैं। राष्ट्रीय नीति का मूल्यांकन केवल तत्काल आर्थिक लाभ से नहीं, उसके दीर्घकालिक पर्यावरणीय प्रभावों से भी होना चाहिए।

दुर्भाग्य यह है कि पिछले कुछ वर्षों में नीति निर्माण का एक नया चलन विकसित हुआ है। पहले निर्णय होता है, फिर उसका प्रचार होता है और अंत में यदि जनता सवाल पूछे तो उसे बताया जाता है कि प्रश्न पूछना ही अनावश्यक है। मानो लोकतंत्र में नागरिक की भूमिका केवल ताली बजाने की रह गई हो।

परिवहन मंत्री ने चुनौती दी है कि कोई एक व्यक्ति सामने आए जिसकी गाड़ी को नुकसान हुआ हो। यह चुनौती सुनकर सोशल मीडिया शायद मुस्कुरा रहा होगा, क्योंकि वहां ऐसे अनेक अनुभव दर्ज हैं। व्यक्तिगत अनुभव वैज्ञानिक प्रमाण नहीं होते, लेकिन वे जांच का आधार अवश्य बन सकते हैं। यदि सरकार अपने निर्णय को लेकर इतनी ही आश्वस्त है, तो उसे स्वतंत्र परीक्षणों से डरना नहीं चाहिए। सच को प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं होती; प्रमाणपत्र की आवश्यकता केवल संदेह को होती है।

यह विवाद अंततः एथेनॉल का नहीं, शासन शैली का है। जनता को विश्वास में लेकर लागू की गई नीति और जनता पर थोपी गई नीति में वही अंतर है जो सलाह और आदेश में होता है। लोकतंत्र आदेश से नहीं, सहमति से चलता है।

सरकार यदि वास्तव में मानती है कि ई-20 भविष्य का ईंधन है, तो उसे सबसे पहले भविष्य जैसा आचरण भी दिखाना होगा—पारदर्शिता, स्वतंत्र परीक्षण, सार्वजनिक आंकड़े और आलोचना को सम्मान। अन्यथा यह आशंका बनी रहेगी कि पेट्रोल में केवल एथेनॉल ही नहीं मिलाया गया, बल्कि उसमें जनता के भरोसे की भी कुछ मात्रा घुल गई है। और भरोसा एक बार जल जाए, तो उसे किसी भी ईंधन से दोबारा नहीं चलाया जा सकता।

कैमरे की कलम: 'लोकतंत्र के माथे पर नकटी का मलबा'


लोकतंत्र की असली परीक्षा चुनाव जीतने में नहीं होती, बल्कि उस दिन होती है, जब सत्ता के सामने एक गरीब खड़ा होता है। जब एक ओर सरकार होती है और दूसरी ओर वह आदमी, जिसकी पूरी जिंदगी उसकी दो कमरों की झोपड़ी या पक्के मकान में सिमटी होती है। राजधानी रायपुर के नकटी गांव में 29 जून की सुबह जो कुछ हुआ, उसने सिर्फ दर्जनों मकानों को नहीं गिराया, बल्कि शासन, प्रशासन और राजनीति के संवेदनशील होने के दावों को भी मलबे में दबा दिया।

कहा गया कि यह सरकारी जमीन थी। कहा गया कि अतिक्रमण हटाया गया। कहा गया कि कानून अपना काम कर रहा था। लेकिन सवाल यह है कि क्या कानून का चेहरा हमेशा बुलडोजर ही होता है? क्या संविधान की आत्मा सिर्फ सरकारी फाइलों में रहती है, उन लोगों के जीवन में नहीं, जिनके सिर से एक ही दिन में छत छीन ली गई?

नकटी में टूटी सिर्फ दीवारें नहीं थीं। वहां बच्चों के सपने टूटे, बुजुर्गों की उम्रभर की जमा-पूंजी टूटी, महिलाओं का घर बसाने का संघर्ष टूटा। खुले आसमान के नीचे बिखरी स्टील की थालियां, स्कूल बैग, भगवान की तस्वीरें, शादी के एलबम और बिस्तर सिर्फ सामान नहीं थे, वे उन परिवारों की पूरी जिंदगी थे, जिन्हें कुछ घंटों में सड़क पर ला दिया गया। 

नकटी की तस्वीरें किसी प्राकृतिक आपदा की नहीं थीं। वहां न भूकंप आया था, न बाढ़ और न ही कोई युद्ध हुआ था। वहां यह सब लोकतांत्रिक सरकार के आदेश पर हुआ। फर्क सिर्फ इतना है कि किसी विदेशी सेना की जगह बुलडोजर पर सरकारी मोहर लगी हुई थी।

विडंबना देखिए। जिन लोगों को सरकार वर्षों तक नागरिक मानती रही, उन्हें बिजली का कनेक्शन दिया गया, पानी की सुविधा दी गई, राशन कार्ड दिए गए, प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ मिला, उन्हीं लोगों को अचानक एक दिन यह बता दिया गया कि वे अवैध हैं। यदि वे वास्तव में अवैध कब्जाधारी थे तो आखिर इतने वर्षों तक पूरा सरकारी तंत्र क्या कर रहा था? क्या बिजली विभाग अवैध था? क्या जल विभाग अवैध था? क्या प्रधानमंत्री आवास योजना अवैध थी? या फिर आज की कार्रवाई सवालों से बचने के लिए कानून का सुविधाजनक इस्तेमाल भर है? सरकार के पास इस प्रश्न का अब तक कोई स्पष्ट उत्तर नहीं है।

सबसे पीड़ादायक बात यह नहीं कि मकान टूटे। सबसे पीड़ादायक बात यह है कि यह सब मानसून की दहलीज पर हुआ। जब बादल बरसने को तैयार हैं, तब सैकड़ों लोग अपने ही घरों के मलबे पर बैठकर यह सोच रहे हैं कि अगली बारिश में उनके बच्चों का सिर कहां छिपेगा। प्रशासन के लिए यह एक फाइल का निस्तारण होगा, लेकिन उन परिवारों के लिए यह जीवनभर न भरने वाला घाव है।

प्रशासन कहता है कि पुनर्वास किया जा रहा है। लेकिन यदि पुनर्वास इतना ही उत्कृष्ट था तो लोग सड़कों पर प्रदर्शन क्यों कर रहे हैं? वे कलेक्टोरेट क्यों पहुंचे? मंत्री के बंगले के बाहर क्यों बैठे? मुख्यमंत्री निवास तक क्यों गए? क्या कोई परिवार सिर्फ राजनीति करने के लिए अपने टूटे हुए घर के मलबे पर बैठा रहता है?

सरकार कहती है कि सब कुछ कानून के मुताबिक हुआ। लेकिन लोकतंत्र केवल कानून से नहीं चलता, संवेदना से भी चलता है। कानून सरकार को अतिक्रमण हटाने का अधिकार देता है, लेकिन क्या वह सरकार को संवेदनहीन होने का भी अधिकार देता है? क्या पुनर्वास पूरा होने से पहले लोगों को बेघर करना प्रशासनिक सफलता कहलाएगा? 

सबसे दुखद दृश्य वे बच्चे थे जो अपने टूटे हुए घरों के बीच अपना स्कूल बैग खोज रहे थे। उन्हें कानून नहीं मालूम। उन्हें भू-राजस्व संहिता की धारा 248 नहीं पता। वे सिर्फ इतना जानते हैं कि कल तक उनका घर था, आज नहीं है।

इस पूरे घटनाक्रम में सरकार की राजनीतिक कार्यशैली भी कई सवाल खड़े करती है। जिन जनप्रतिनिधियों का पहला कर्तव्य जनता का विश्वास जीतना और उसे बनाए रखना होता है, वे इस पूरे मामले में या तो चुप दिखाई दिए या फिर सरकारी निर्णयों के पक्ष में खड़े नजर आए। सत्ता का दायित्व सिर्फ सरकारी आदेशों का बचाव करना नहीं होता, बल्कि जनता और सरकार के बीच पुल बनने का भी होता है। लेकिन नकटी में यह पुल कहीं दिखाई नहीं दिया।

सबसे अधिक चर्चा भाजपा सांसद बृजमोहन अग्रवाल के बयान की हुई। प्रभावित परिवारों का दावा है कि कार्रवाई से पहले उन्होंने भरोसा दिलाया था कि किसी का घर नहीं टूटेगा। लेकिन जब बुलडोजर चल गए, तब उन्होंने जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग कर दी। सवाल यह है कि यदि उन्हें कार्रवाई की जानकारी नहीं थी, तो यह सरकार और संगठन के बीच संवादहीनता का संकेत है। और यदि जानकारी थी, तो फिर लोगों को आश्वासन क्यों दिया गया? दोनों ही स्थितियां चिंताजनक हैं।

क्षेत्रीय विधायक अनुज शर्मा की भूमिका भी कठघरे में है। लोकतंत्र में विधायक सिर्फ विधानसभा में बैठने के लिए नहीं चुने जाते। वे जनता की आवाज होते हैं। यदि उनके क्षेत्र के लोग खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं, यदि उनके बयान लोगों के आक्रोश का कारण बन रहे हैं, तो यह केवल राजनीतिक असहमति नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व के संकट का संकेत है।

सरकार के मंत्रियों ने दावा किया कि किसी के साथ अन्याय नहीं हुआ और पुनर्वास उत्कृष्ट है। लेकिन शासन की उत्कृष्टता का प्रमाण प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं होती, बल्कि वह संतोष होता है जो प्रभावित लोगों के चेहरों पर दिखाई देता है। यदि पुनर्वास वास्तव में इतना बेहतर है तो फिर लोग उसे स्वीकार करने में हिचक क्यों रहे हैं? यह सवाल सरकार को स्वयं से पूछना चाहिए।

इस पूरे मामले में प्रशासन की भूमिका सबसे अधिक कठोर दिखाई देती है। प्रशासन कानून लागू करने वाली संस्था है, लेकिन उसका चरित्र मानवीय भी होना चाहिए। बुलडोजर चलाने से पहले यह सुनिश्चित करना कि प्रत्येक परिवार सम्मानपूर्वक पुनर्वासित हो चुका है, शायद किसी कानून में अनिवार्य न लिखा हो, लेकिन सुशासन का यही मूल सिद्धांत है।

एक और सवाल लगातार पीछा करता है। यदि यह जमीन वर्षों से सरकारी थी तो कार्रवाई ठीक उसी समय क्यों हुई, जब वहां विधायक कॉलोनी बनाने की योजना सामने आई? क्या सरकारी जमीन केवल तब याद आती है, जब उस पर कोई बड़ी परियोजना प्रस्तावित होती है? यदि अतिक्रमण इतना ही गंभीर था तो दशकों तक प्रशासन की आंखें क्यों बंद रहीं? 

नकटी की घटना सरकार के लिए चेतावनी है। सत्ता यह भूल रही है कि जनता केवल वोट नहीं देती, याद भी रखती है। जिन बच्चों ने अपने घर टूटते देखे हैं, वे बड़े होकर शायद यह भूल जाएं कि बुलडोजर किस कंपनी का था, लेकिन यह कभी नहीं भूलेंगे कि वह किस सरकार के आदेश पर आया था।

सरकारें विकास करती हैं। उन्हें सड़कें बनानी हैं, अस्पताल बनाने हैं, कॉलोनियां भी बनानी हैं। लेकिन विकास का अर्थ केवल सीमेंट और कंक्रीट नहीं होता। विकास का सबसे बड़ा पैमाना यह होता है कि उसके कारण सबसे कमजोर व्यक्ति कितना सुरक्षित महसूस करता है।

नकटी की घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हमारे यहां विकास की परिभाषा में गरीब की गरिमा के लिए कोई स्थान बचा है? क्या योजनाओं की सफलता का पैमाना सिर्फ समय पर परियोजना पूरी करना है या यह भी देखना चाहिए कि उसके लिए कितने लोगों की जिंदगी उजड़ गई?

लोकतंत्र की ताकत बुलडोजर की ताकत से कहीं बड़ी होती है। बुलडोजर दीवारें गिरा सकता है, लेकिन जनता का विश्वास टूट जाए तो उसे दोबारा खड़ा करना सबसे कठिन होता है। नकटी के लोग शायद कुछ वर्षों बाद नए मकानों में बस जाएंगे। लेकिन उनके बच्चों की स्मृतियों में हमेशा यह दर्ज रहेगा कि एक सुबह सरकार आई थी और उनका घर ले गई थी।

सरकारों को यह नहीं भूलना चाहिए कि सत्ता का सबसे बड़ा आभूषण संवेदनशीलता है। कानून का पालन आवश्यक है, लेकिन कानून की आत्मा करुणा है। यदि विकास की कीमत किसी परिवार के सिर से छत छिन जाना है, यदि पुनर्वास बाद में और बुलडोजर पहले आता है, तो इतिहास उसे विकास नहीं, बल्कि प्रशासनिक असंवेदनशीलता के उदाहरण के रूप में याद रखेगा।

मलबे के ढेर में तब्दील नकटी आज केवल एक गांव नहीं है। वह एक आईना है, जिसमें सरकार, प्रशासन और राजनीति—तीनों अपना चेहरा देख सकते हैं। प्रश्न केवल इतना है कि क्या उनमें उस आईने में झांकने का साहस है?

कैमरे की कलम: भवन बन गया, अस्पताल कब बनेगा?

सरकारें अक्सर विकास को ईंट, सीमेंट और कंक्रीट से मापती हैं। जनता विकास को अपने जीवन से मापती है। सरकार के लिए अस्पताल का उद्घाटन एक उपलब्धि हो सकता है, लेकिन एक गरीब मरीज के लिए अस्पताल तभी अस्तित्व में आता है जब वहां डॉक्टर हों, मशीनें चलती हों, आईसीयू तैयार हो, ऑक्सीजन उपलब्ध हो और इलाज बिना भटकाव के मिल जाए। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर के कोनी का मल्टी सुपर स्पेशलिटी अस्पताल आज इसी विडंबना का सबसे बड़ा प्रतीक बनकर खड़ा है। चिकित्सा व्यवस्था को लेकर खड़े हुए गंभीर संकट पर कांग्रेस नेता विजय केशरवानी ने सरकार को कटघरे में खड़ा किया है, उन्होंने सराकर से ये भी सवाल पूछा है कि कहीं जगदलपुर की तरह बिलासपुर के स्वर्गीय दिलीप सिंह जूदेव मल्टी सुपर स्पेशलिटी अस्पताल को कहीं निजी हाथों में सौंपने की तैयारी तो नहीं है।      

एक भव्य भवन है। करोड़ों रुपये की लागत है। प्रधानमंत्री के हाथों लोकार्पण है। मुख्यमंत्री का निरीक्षण है। सरकारी विज्ञापनों में उपलब्धियों की लंबी सूची है। लेकिन यदि किसी हार्ट अटैक के मरीज को वहां से दूसरे अस्पताल रेफर कर दिया जाए, यदि किडनी या ब्रेन से जुड़ा गंभीर मरीज इलाज के बजाय केवल कागजी प्रक्रिया का हिस्सा बन जाए, तो फिर यह सवाल पूछना जनता का अधिकार है कि आखिर यह अस्पताल है या केवल उद्घाटन का स्मारक? आज राजनीति का सबसे बड़ा संकट यही है कि सरकारें उद्घाटन को उपलब्धि मान लेती हैं, संचालन को नहीं।

देश में पिछले कुछ वर्षों में एक नई राजनीतिक संस्कृति विकसित हुई है। किसी भी परियोजना का शिलान्यास हो जाए, लोकार्पण हो जाए, फोटो खिंच जाए, मंच सज जाए और सोशल मीडिया पर वीडियो चल जाए, तो मान लिया जाता है कि जनता का काम पूरा हो गया। जबकि असली परीक्षा उसके बाद शुरू होती है। दुर्भाग्य यह है कि वही परीक्षा सबसे ज्यादा उपेक्षित रहती है।

एक सुपर स्पेशलिटी अस्पताल केवल दीवारों का नाम नहीं होता। वह विशेषज्ञ डॉक्टरों, प्रशिक्षित नर्सों, आधुनिक मशीनों, कैथ लैब, आईसीयू, ऑक्सीजन प्लांट, ब्लड बैंक, इमरजेंसी सेवाओं और चौबीसों घंटे चलने वाली स्वास्थ्य व्यवस्था का नाम है। यदि इनमें से अधिकांश सुविधाएं अनुपस्थित हों तो भवन चाहे कितना भी भव्य हो, वह जनता के लिए केवल एक प्रतीक्षा कक्ष बनकर रह जाता है।

विडंबना यह है कि जब अस्पताल का उद्घाटन हुआ था तब जनता को भरोसा दिलाया गया था कि अब बिलासपुर संभाग के लोगों को रायपुर, नागपुर, हैदराबाद या दिल्ली की ओर नहीं भागना पड़ेगा। गरीब किसान, मजदूर और मध्यम वर्ग के परिवारों को अपने शहर में ही आधुनिक इलाज मिलेगा। लेकिन यदि आज भी गंभीर मरीजों को दूसरे अस्पतालों में रेफर करना पड़ रहा है तो जाहिर है कि भरोसे और हकीकत के बीच की दूरी बहुत बड़ी है।

यह प्रश्न किसी एक दल का नहीं है। यह प्रश्न उस व्यवस्था का है जिसमें भवन तैयार होते ही सरकारें अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेती हैं। स्वास्थ्य जैसी संवेदनशील व्यवस्था में केवल निर्माण कार्य पूरा होना सफलता नहीं कहलाता। सफलता तब है जब एक मरीज अस्पताल से स्वस्थ होकर अपने घर लौटे।

सरकार को यह भी समझना होगा कि स्वास्थ्य सेवा चुनावी भाषणों का विषय नहीं है। यहां किसी भी प्रकार की लापरवाही सीधे इंसानी जिंदगी पर असर डालती है। एक सड़क देर से बने तो असुविधा होती है, लेकिन अस्पताल अधूरा रहे तो किसी की जान जा सकती है। इसलिए स्वास्थ्य परियोजनाओं का मूल्यांकन फीता काटने से नहीं बल्कि बची हुई जिंदगियों से होना चाहिए।

और यह समस्या केवल कोनी अस्पताल तक सीमित नहीं है। प्रदेश के अधिकांश सरकारी अस्पतालों की तस्वीर लगभग यही है। कहीं डॉक्टर नहीं हैं, कहीं विशेषज्ञ नहीं हैं, कहीं मशीनें धूल खा रही हैं, कहीं करोड़ों की लागत से खरीदे गए उपकरण ऑपरेटर के अभाव में बंद पड़े हैं। कई अस्पतालों में भवन पहले बन जाते हैं, स्टाफ वर्षों बाद आता है। कहीं स्टाफ है तो दवाइयां नहीं हैं। कहीं दवाइयां हैं तो जांच की सुविधा नहीं। व्यवस्था का यह बिखराव अब सामान्य बात मान लिया गया है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि स्वास्थ्य सेवाओं में स्थायी नियुक्तियों के बजाय संविदा और अस्थायी व्यवस्थाओं पर निर्भरता लगातार बढ़ती जा रही है। डॉक्टरों, नर्सों और तकनीकी कर्मचारियों की कमी का समाधान लंबे समय की योजना से होना चाहिए, न कि अस्थायी नियुक्तियों के सहारे। जब व्यवस्था अस्थायी होगी तो सेवा भी अस्थायी ही दिखाई देगी।

सरकारें अक्सर यह तर्क देती हैं कि संसाधनों की कमी है। लेकिन जनता यह पूछने लगी है कि यदि संसाधन नहीं थे तो उद्घाटन किस बात का किया गया? यदि कैथ लैब तैयार नहीं थी, ऑक्सीजन प्लांट चालू नहीं था, आईसीयू पूर्ण रूप से संचालित नहीं था और विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध नहीं थे तो फिर जनता के सामने यह संदेश क्यों दिया गया कि अस्पताल पूरी तरह तैयार है? लोकतंत्र में प्रचार और वास्तविकता के बीच का अंतर जितना बढ़ता है, जनता का विश्वास उतना ही कम होता जाता है।

यह भी सच है कि किसी भी नई स्वास्थ्य परियोजना को पूरी तरह संचालित होने में समय लगता है। विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियुक्ति, उपकरणों की स्थापना और तकनीकी प्रक्रियाएं एक दिन में पूरी नहीं होतीं। लेकिन यदि उद्घाटन के लंबे समय बाद भी आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध न हों तो सवाल उठना स्वाभाविक है। ऐसे सवालों का जवाब विरोधियों को नहीं, सरकार को देना चाहिए।

स्वास्थ्य व्यवस्था में जवाबदेही सबसे महत्वपूर्ण तत्व है। जनता को यह जानने का अधिकार है कि अस्पताल की कौन-कौन सी सुविधाएं चालू हैं, कौन सी लंबित हैं, डॉक्टरों के कितने पद स्वीकृत हैं, कितने भरे गए हैं और शेष कब तक भरे जाएंगे। पारदर्शिता ही विश्वास पैदा करती है, प्रचार नहीं।

दुर्भाग्य यह है कि आज राजनीति में उपलब्धियों की सूची लंबी होती जा रही है, लेकिन जनता के अनुभव उससे मेल नहीं खाते। सरकारी दावों में सब कुछ उत्कृष्ट दिखाई देता है, जबकि अस्पतालों की कतारों में खड़े मरीज कुछ और कहानी कहते हैं। विज्ञापन बताते हैं कि स्वास्थ्य सेवाएं सुदृढ़ हैं, लेकिन एंबुलेंस का इंतजार करता परिवार उस दावे पर विश्वास नहीं कर पाता।

सरकार किसी भी दल की हो, उसे यह स्वीकार करना होगा कि स्वास्थ्य क्षेत्र में आधे-अधूरे काम सबसे खतरनाक होते हैं। अस्पतालों का निर्माण अंतिम लक्ष्य नहीं, बल्कि पहला कदम है। उसके बाद शुरू होती है असली जिम्मेदारी—योग्य मानव संसाधन, आधुनिक तकनीक, पर्याप्त दवाइयां, प्रभावी प्रबंधन और सतत निगरानी।

कोनी अस्पताल का मुद्दा केवल एक अस्पताल का मुद्दा नहीं है। यह उस सोच का आईना है जिसमें उपलब्धि का अर्थ उद्घाटन समारोह बन गया है। यदि यही प्रवृत्ति जारी रही तो प्रदेश में ऐसे कई अस्पताल होंगे जिनकी इमारतें चमकेंगी, लेकिन मरीजों की उम्मीदें बुझती रहेंगी।

आखिर में सवाल केवल सरकार से नहीं, पूरे प्रशासनिक तंत्र से है—क्या हम अस्पताल इसलिए बनाते हैं कि वहां रिबन कट सके, या इसलिए कि वहां जिंदगी बचाई जा सके? जब तक इस प्रश्न का ईमानदार उत्तर नहीं मिलेगा, तब तक करोड़ों की इमारतें बनती रहेंगी, उद्घाटन होते रहेंगे, भाषण गूंजते रहेंगे, लेकिन गरीब मरीज इलाज की तलाश में एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल तक भटकता रहेगा और तब इतिहास यह नहीं पूछेगा कि कितने अस्पताल बने थे। इतिहास यह पूछेगा कि उन अस्पतालों में कितनी जिंदगियां बचाई गई थीं।

कैमरे की कलम: 'स्त्री नहीं, सोच कटघरे में'


छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले के पटना थाना क्षेत्र में सामने आई घटना ने केवल कानून-व्यवस्था पर नहीं, बल्कि पूरे समाज की चेतना पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। एक पति ने अपनी पत्नी के चरित्र पर संदेह के कारण जिस तरह की अमानवीय बर्बरता की, वह किसी सभ्य समाज की कल्पना से भी परे है। महिला को बेरहमी से पीटना, उसके हाथ-पैर बांध देना, उसका मुंडन कर देना, चेहरे पर कालिख पोतना, जबरन पेशाब पिलाना और इतना ही नहीं, मासूम बच्चों से भी उसकी गरिमा को तार-तार कराने का प्रयास करना केवल एक अपराध नहीं, बल्कि मनुष्यता की हत्या है।

पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है। कानून अपना काम करेगा। अदालतें फैसला सुनाएँगी। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या केवल गिरफ्तारी से ऐसे अपराध रुक जाएंगे? क्या हर बार अपराध होने के बाद गिरफ्तारी और जेल ही समाज को सुरक्षित बना पाएंगे? यदि ऐसा होता, तो घरेलू हिंसा, दहेज हत्या, बलात्कार, ऑनर किलिंग और महिलाओं पर अत्याचार की घटनाएँ आज इतिहास बन चुकी होतीं। दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ। इसका अर्थ स्पष्ट है कि समस्या अपराधी से कहीं अधिक उस सोच की है जो ऐसे अपराधों को जन्म देती है।

आज भारत चंद्रमा पर पहुँच चुका है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल क्रांति की बातें हो रही हैं, लेकिन समाज का एक बड़ा वर्ग आज भी मानसिक रूप से सदियों पीछे खड़ा दिखाई देता है। विज्ञान आधुनिक हो गया, लेकिन सोच मध्ययुगीन बनी हुई है। मोबाइल फोन स्मार्ट हो गए, लेकिन दिमाग अब भी संकीर्णता के पुराने सॉफ़्टवेयर पर चल रहे हैं।

सबसे विडंबनापूर्ण बात यह है कि जिस पुरुष को समाज "घर का मुखिया" कहकर सम्मान देता है, वही कई बार अपने घर की महिला के सम्मान का सबसे बड़ा दुश्मन बन जाता है। पत्नी को जीवनसंगिनी नहीं, बल्कि अपनी निजी संपत्ति मानने की प्रवृत्ति आज भी समाज के एक बड़े हिस्से में मौजूद है। यह सोच मानती है कि पत्नी की हँसी, उसके रिश्ते, उसका आना-जाना, उसका पहनावा, उसकी स्वतंत्रता और यहाँ तक कि उसकी साँसों पर भी पति का अधिकार है। यदि वह इस अधिकार को चुनौती देती दिखाई दे, तो उसे अपमानित करना, पीटना या प्रताड़ित करना जैसे पति का जन्मसिद्ध अधिकार हो।

दरअसल, चरित्र पर संदेह अधिकांश मामलों में महिला के व्यवहार से अधिक पुरुष की मानसिक असुरक्षा का परिणाम होता है। जो व्यक्ति स्वयं पर विश्वास नहीं करता, जो अपने रिश्ते को विश्वास की नींव पर खड़ा नहीं कर पाता, वही शक की दीवारें खड़ी करता है। शक प्रेम का प्रमाण नहीं, बल्कि असुरक्षा, स्वामित्व और अहंकार का दूसरा नाम है।

समाज में एक विचित्र विरोधाभास भी दिखाई देता है। पुरुष स्वयं अपने लिए हर प्रकार की स्वतंत्रता चाहता है। मित्रता करे तो आधुनिकता, देर रात बाहर रहे तो काम की मजबूरी, किसी से बात करे तो सामाजिक व्यवहार; लेकिन यदि पत्नी किसी से सामान्य बातचीत भी कर ले, तो उसके चरित्र पर प्रश्नचिह्न लगा दिया जाता है। यह दोहरा मापदंड केवल महिलाओं का नहीं, बल्कि पूरे समाज का अपमान है।

और यह पहली घटना नहीं है। लगभग हर सप्ताह देश के किसी न किसी हिस्से से ऐसी खबरें सामने आती हैं जहाँ पति ने शक के आधार पर पत्नी की हत्या कर दी, तेजाब फेंक दिया, सार्वजनिक रूप से अपमानित किया या उसे आत्महत्या के लिए मजबूर कर दिया। हर बार समाज कुछ दिनों तक आक्रोश व्यक्त करता है, मीडिया बहस करता है, पुलिस गिरफ्तारी करती है और फिर सब कुछ सामान्य हो जाता है। अगले अपराध तक।

इस घटना का सबसे भयावह पक्ष वह है, जिसमें बच्चों को भी इस अपराध का सहभागी बनाया गया। सोचिए, जिन बच्चों के लिए माँ संसार की पहली गुरु होती है, उन्हीं बच्चों के सामने उसकी गरिमा को कुचला गया। इससे बड़ा मानसिक अपराध और क्या हो सकता है? ऐसे बच्चे बड़े होकर क्या सीखेंगे? वे सम्मान सीखेंगे या हिंसा? वे समानता समझेंगे या प्रभुत्व? वे प्रेम करेंगे या अपमान?

समाजशास्त्री वर्षों से कहते रहे हैं कि हिंसा सीखी जाती है। कोई भी बच्चा हिंसक पैदा नहीं होता। वह अपने घर, अपने परिवेश और अपने अनुभवों से सीखता है। यदि घर में माँ का सम्मान नहीं होगा, तो समाज में किसी महिला का सम्मान कैसे होगा?

विडंबना यह भी है कि हमारे समाज में बेटी बचाने की बात तो खूब होती है, लेकिन बेटे को संस्कार देने की चर्चा बहुत कम होती है। बेटी को बचाना आवश्यक है, लेकिन उससे कहीं अधिक आवश्यक है बेटे को यह सिखाना कि स्त्री कोई वस्तु नहीं, कोई संपत्ति नहीं, कोई गुलाम नहीं; वह एक स्वतंत्र व्यक्तित्व है, जिसके अपने अधिकार, अपनी गरिमा और अपनी इच्छाएँ हैं।

शिक्षा केवल डिग्री देने का माध्यम नहीं होनी चाहिए। यदि कोई व्यक्ति उच्च शिक्षित होकर भी अपनी पत्नी को सार्वजनिक रूप से अपमानित करता है, तो उसकी डिग्री समाज के लिए किसी काम की नहीं। वास्तविक शिक्षा वह है जो व्यक्ति को संवेदनशील बनाए, बराबरी का सम्मान करना सिखाए और संबंधों में विश्वास का मूल्य समझाए।

दुर्भाग्य यह भी है कि हमारे समाज में पुरुषों को बचपन से ही एक झूठी श्रेष्ठता का पाठ पढ़ाया जाता है। "लड़के रोते नहीं", "घर की इज्जत तुम्हारे हाथ में है", "औरत को काबू में रखना पड़ता है"—ऐसी बातें मज़ाक या परंपरा के नाम पर पीढ़ी-दर-पीढ़ी दोहराई जाती हैं। यही कथन आगे चलकर हिंसा का आधार बन जाते हैं। जब पुरुष यह मानने लगता है कि नियंत्रण उसका अधिकार है, तब असहमति उसे विद्रोह लगने लगती है और विद्रोह का उत्तर वह हिंसा से देने लगता है।

कानून की भूमिका भी यहाँ अत्यंत महत्वपूर्ण है। गिरफ्तारी आवश्यक है, लेकिन पर्याप्त नहीं। ऐसे मामलों में त्वरित सुनवाई, कठोर दंड और पीड़िता के पुनर्वास की मजबूत व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी है। केवल अपराधी को जेल भेज देना समाधान नहीं है। पीड़ित महिला को सामाजिक सुरक्षा, मनोवैज्ञानिक सहायता, आर्थिक संबल और न्याय की वास्तविक अनुभूति भी मिलनी चाहिए।

साथ ही पुलिस और प्रशासन को घरेलू हिंसा को "पति-पत्नी का निजी मामला" मानने की पुरानी सोच से बाहर निकलना होगा। घरेलू हिंसा निजी नहीं, सामाजिक अपराध है। जब घर की चारदीवारी के भीतर किसी महिला की गरिमा कुचली जाती है, तब पूरा समाज असफल होता है।

मीडिया की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। ऐसी घटनाओं को केवल सनसनीखेज शीर्षकों तक सीमित कर देना पर्याप्त नहीं। मीडिया को समाज में संवाद पैदा करना होगा। विद्यालयों, महाविद्यालयों, पंचायतों और सामाजिक संगठनों को भी इस विषय पर खुलकर चर्चा करनी होगी। महिलाओं के सम्मान की शिक्षा केवल महिला दिवस के भाषणों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।

आज आवश्यकता पुरुष विरोध की नहीं, बल्कि पुरुष मानसिकता के सुधार की है। सभी पुरुष एक जैसे नहीं होते। असंख्य पुरुष अपनी पत्नी, बहन, माँ और बेटियों का सम्मान करते हैं। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि समाज के भीतर एक ऐसा वर्ग मौजूद है, जो अपनी कुंठा, असुरक्षा और अहंकार को पुरुषत्व समझ बैठा है। यही वर्ग पूरे पुरुष समाज की छवि को धूमिल करता है। इसलिए संवेदनशील पुरुषों की भी जिम्मेदारी है कि वे ऐसी मानसिकता का खुलकर विरोध करें। मौन समर्थन भी अपराध को शक्ति देता है।

यह भी समझना होगा कि सम्मान किसी रिश्ते की भीख नहीं होता। सम्मान अधिकार है। विश्वास किसी विवाह का सबसे मजबूत स्तंभ है। जहाँ विश्वास समाप्त हो जाता है, वहाँ विवाह केवल सामाजिक समझौता बनकर रह जाता है। और जहाँ अहंकार प्रेम से बड़ा हो जाए, वहाँ हिंसा जन्म लेती है।

सवाल केवल कोरिया का नहीं है। सवाल पूरे समाज का है। यदि आज भी किसी पुरुष को लगता है कि वह पत्नी का मुंडन कर सकता है, उसे नंगा कर सकता है, उसे अपमानित कर सकता है, तो दोष केवल उस व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस सामाजिक व्यवस्था का भी है जिसने उसे यह विश्वास दिलाया कि वह ऐसा कर सकता है।

आज समय की मांग है कि हम केवल कानून बदलने की बात न करें, बल्कि सोच बदलने का राष्ट्रीय अभियान चलाएँ। स्कूलों में लैंगिक समानता पढ़ाई जाए। परिवारों में बेटियों और बेटों के लिए समान नियम हों। धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक नेतृत्व भी स्पष्ट संदेश दे कि स्त्री का अपमान किसी संस्कृति, किसी परंपरा और किसी धर्म का हिस्सा नहीं हो सकता।

सभ्यता की पहचान ऊँची इमारतों, चौड़ी सड़कों और आधुनिक तकनीक से नहीं होती। सभ्यता का वास्तविक पैमाना यह है कि वहाँ महिलाओं के साथ कैसा व्यवहार होता है। यदि किसी समाज में स्त्री आज भी शक के नाम पर अपमानित, प्रताड़ित और अमानवीय यातनाओं की शिकार हो रही है, तो उस समाज को स्वयं को विकसित कहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।

कोरिया की यह घटना एक चेतावनी है। यह केवल पुलिस की फाइल का मामला नहीं, बल्कि समाज के आत्ममंथन का अवसर है। आरोपी की गिरफ्तारी आवश्यक थी और उसका कठोर दंड भी आवश्यक है, किंतु उससे कहीं अधिक आवश्यक है उस सोच को कठघरे में खड़ा करना, जो स्त्री को इंसान नहीं, पुरुष की जागीर समझती है।

कानून अपराधी को सजा दे सकता है, लेकिन समाज ही मानसिकता बदल सकता है। जिस दिन हर परिवार अपने बेटे को यह सिखा देगा कि पत्नी पर अधिकार नहीं, सम्मान होता है; संदेह नहीं, विश्वास होता है; और पुरुषत्व का अर्थ हिंसा नहीं, संवेदनशीलता है—उसी दिन ऐसी खबरें अखबारों की सुर्खियाँ नहीं, इतिहास के काले पन्ने बन जाएँगी।

कैमरे की कलम: "आईना तोड़ो, व्यवस्था बचाओ"

बिलासपुर में एक वीडियो वायरल हुआ। वीडियो में एक पुलिसकर्मी थाने के भीतर जमीन पर लेटा दिखाई देता है। आसपास कुछ शराब की बोतलें भी नजर आती हैं। वीडियो की सत्यता क्या है, उसमें दिख रहा दृश्य किस परिस्थिति का है, उसे किसने रिकॉर्ड किया और किसने वायरल किया—ये सब जांच का विषय हैं। होना भी चाहिए। किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले तथ्यों की पड़ताल आवश्यक है लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बाद जो सबसे दिलचस्प दृश्य सामने आया, वह वीडियो में नहीं बल्कि उसके बाद की प्रतिक्रिया में था।

जिले के पुलिस कप्तान ने कड़े शब्दों में कहा कि यदि कोई व्यक्ति लाइक, कमेंट्स और व्यूअरशिप बढ़ाने के लिए फर्जी वीडियो बनाएगा या बिना प्रमाणिकता के वायरल करेगा तो उसके खिलाफ अपराध दर्ज किया जाएगा। यह बात बिल्कुल उचित है। झूठ फैलाना, किसी की छवि खराब करना और सोशल मीडिया को अफवाहों का अखाड़ा बनाना किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं हो सकता। मगर समस्या यह है कि हमारे यहां अक्सर अपराध की परिभाषा घटना से नहीं, व्यक्ति से तय होती दिखाई देती है।  

इतिहास बताता है कि संस्थाएँ आईना तोड़कर नहीं, आईने में दिख रही खामियों को सुधारकर मजबूत होती हैं। क्योंकि अंततः किसी भी लोकतंत्र में सबसे बड़ा अपराध सच दिखाना नहीं, सच से आँख चुराना होता है।

यही कारण है कि इस मामले में सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं बन पाया कि वीडियो में क्या है, बल्कि यह बन गया कि वीडियो किसने बनाया। यानी अगर किसी थाने के भीतर कुछ असामान्य दिख रहा है तो उससे ज्यादा गंभीर विषय यह है कि किसी ने उसे रिकॉर्ड कैसे कर लिया। यह वही मानसिकता है जिसमें दीवार पर उभरी सीलन से ज्यादा गुस्सा उस आदमी पर आता है जिसने सीलन की तस्वीर खींच ली।

विडंबना यह है कि यही व्यवस्था वर्षों से जनता से अपील करती रही है कि कहीं अपराध दिखे, भ्रष्टाचार दिखे, अवैध वसूली दिखे, सार्वजनिक व्यवस्था का उल्लंघन दिखे तो वीडियो बनाइए, सबूत दीजिए, शिकायत कीजिए। लेकिन जैसे ही कैमरे का कोण व्यवस्था की ओर घूम जाता है, अचानक कैमरा संदिग्ध हो जाता है और रिकॉर्डिंग अपराध के करीब पहुंच जाती है। ऐसा लगता है मानो समस्या बीमारी नहीं, एक्स-रे मशीन हो। हमारे यहां कानून की एक बड़ी खूबी यह है कि वह सबके लिए समान बताया जाता है और उसकी सबसे बड़ी विडंबना भी यही है कि व्यवहार में वह सबके लिए समान दिखाई नहीं देता।

यदि कोई सामान्य नागरिक सार्वजनिक स्थान पर शराब के नशे में मिलता है तो उसके वीडियो सोशल मीडिया पर घंटों घूमते रहते हैं। लोग उसे नैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं, पुलिस उसे कानून का पाठ पढ़ाती है और समाज उसे संस्कारों का पाठ पढ़ाता है। लेकिन जब चर्चा में कोई सफेदपोश या वर्दीधारी आता है तो अचानक निजता, प्रतिष्ठा, गरिमा और प्रक्रिया जैसे शब्द शब्दकोश से निकलकर प्रेस कॉन्फ्रेंस की मेज पर सज जाते हैं।

ऐसा नहीं है कि पुलिसकर्मी को गरिमा का अधिकार नहीं है, बिल्कुल है। बल्कि उतना ही है जितना किसी आम नागरिक को है लेकिन प्रश्न यह है कि क्या यह अधिकार सभी को समान रूप से मिलता है? यदि हां, तो फिर आम आदमी की गरिमा की रक्षा के समय यही तीखापन अक्सर दिखाई क्यों नहीं देता? दरअसल समस्या वीडियो नहीं है। समस्या वह असहजता है जो वीडियो पैदा करता है। आईना हमेशा सुंदर चेहरा नहीं दिखाता। कभी-कभी वह चेहरे पर जमी धूल भी दिखाता है। और इतिहास गवाह है कि धूल साफ करने की तुलना में आईना तोड़ना हमेशा आसान काम रहा है।

पुलिस महकमा भी आखिर इसी समाज का हिस्सा है। वहां भी अच्छे लोग हैं, ईमानदार लोग हैं, कर्तव्यनिष्ठ लोग हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जहां शक्ति होती है, वहां जवाबदेही की आवश्यकता और बढ़ जाती है। क्योंकि जनता पुलिस को केवल एक कर्मचारी के रूप में नहीं देखती। वह उसे कानून के प्रतिनिधि के रूप में देखती है।

यही वजह है कि पुलिसकर्मी की छोटी गलती भी बड़ी खबर बन जाती है लेकिन यहां एक और रोचक प्रवृत्ति देखने को मिलती है। जब कोई नागरिक पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाता है तो उसे कानून समझाया जाता है। जब कोई पत्रकार सवाल उठाता है तो उसे जिम्मेदारी समझाई जाती है। जब कोई सामाजिक कार्यकर्ता सवाल उठाता है तो उसे प्रक्रिया समझाई जाती है। और जब सोशल मीडिया सवाल उठाता है तो उसे आईटी एक्ट समझाया जाता है। कुल मिलाकर हर सवाल पूछने वाले के लिए कोई न कोई धारा तैयार रहती है। सवालों के जवाब कभी-कभी तैयार नहीं होते। 

"लोकतंत्र में कैमरा अपराधी नहीं होता, वह केवल घटनाओं का दस्तावेज़ होता है। यदि कोई वीडियो फर्जी है तो उस पर कार्रवाई होना स्वाभाविक है"

यहां यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि फर्जी वीडियो बनाना अपराध है और होना भी चाहिए। किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा से खिलवाड़ की अनुमति नहीं दी जा सकती। लेकिन उसी सांस में यह भी उतना ही जरूरी है कि हर असुविधाजनक वीडियो को "फर्जी", "भ्रामक" या "वायरल गैंग" की श्रेणी में डाल देने की प्रवृत्ति से बचा जाए क्योंकि अगर हर असहज करने वाला तथ्य फर्जी घोषित कर दिया जाएगा तो फिर सत्य की पहचान कौन करेगा?

आज सोशल मीडिया का दौर है। यहां अफवाहें भी दौड़ती हैं और सच्चाइयां भी। चुनौती यह है कि दोनों के बीच फर्क किया जाए। लेकिन अक्सर ऐसा प्रतीत होता है कि व्यवस्था की प्राथमिकता फर्क करना नहीं, नियंत्रण स्थापित करना होती है। नियंत्रण हमेशा आकर्षक होता है। सवालों को नियंत्रित करो। वीडियो को नियंत्रित करो। सूचना को नियंत्रित करो। चर्चा को नियंत्रित करो और यदि संभव हो तो आईने को भी नियंत्रित कर लो। मगर लोकतंत्र का स्वभाव नियंत्रण नहीं, संवाद है। लोकतंत्र में संस्थाओं का सम्मान इसलिए नहीं होता कि वे शक्तिशाली हैं। उनका सम्मान इसलिए होता है क्योंकि वे आलोचना सहने की क्षमता रखती हैं। जिस दिन कोई संस्था आलोचना से डरने लगे, उस दिन उसकी ताकत पर नहीं, उसके आत्मविश्वास पर सवाल उठने लगते हैं।

विडंबना यह भी है कि हमारे यहां अक्सर जांच की दिशा भी बड़ी दिलचस्प होती है। कभी-कभी घटना से ज्यादा ऊर्जा इस बात में लगती है कि जानकारी बाहर कैसे आई। फाइल में क्या लिखा था, यह बाद की बात है; फाइल लीक किसने की, यह पहले जांचा जाता है। कमरे में क्या हुआ, यह बाद में देखा जाता है; कमरे का वीडियो किसने बनाया, यह पहले पूछा जाता है। मानो व्यवस्था का सबसे बड़ा संकट घटना नहीं, उसकी सार्वजनिक जानकारी हो।

बिलासपुर की यह घटना भी उसी व्यापक मानसिकता की एक झलक बन गई है। यहां बहस कानून और जवाबदेही के बीच संतुलन की होनी चाहिए थी। चर्चा इस बात पर होनी चाहिए थी कि यदि वीडियो गलत है तो उसे तथ्यात्मक रूप से गलत साबित किया जाए, और यदि उसमें कोई सच्चाई है तो उसे स्वीकार कर सुधार की प्रक्रिया शुरू की जाए लेकिन हमारे यहां अक्सर सुधार से पहले संदेश दिया जाता है। संदेश यह कि व्यवस्था को देखने का अधिकार सीमित है। संदेश यह कि सवाल पूछने से पहले सावधान रहिए। संदेश यह कि कैमरा उठाने से पहले सोचिए और धीरे-धीरे यह संदेश समाज के भीतर एक भय में बदलने लगता है। हालांकि इतिहास बताता है कि समाज कैमरों से नहीं बदलते, बल्कि उन कारणों को दूर करने से बदलते हैं जिनकी वजह से कैमरे उठते हैं। यदि संस्थाएं पारदर्शी हों तो वीडियो सनसनी नहीं बनते। यदि जवाबदेही मजबूत हो तो वायरल पोस्ट व्यवस्था के लिए खतरा नहीं बनते। यदि जनता का विश्वास बना रहे तो अफवाहें भी ज्यादा दूर तक नहीं जातीं। 

यदि हर असुविधाजनक वीडियो के जवाब में पहला सवाल यह पूछा जाए कि उसे बनाया किसने, तो संदेह पैदा होता है कि व्यवस्था की चिंता सच्चाई से अधिक उसके सार्वजनिक होने को लेकर है।

आखिर में सवाल केवल बिलासपुर का नहीं है। सवाल उस सोच का है जिसमें व्यक्ति देखकर अपराध की गंभीरता तय की जाती है। जहां वर्दी, पद और प्रभाव के अनुसार संवेदनशीलता का स्तर बदलता रहता है। जहां कभी-कभी कानून की किताब एक ही रहती है, लेकिन उसका वजन अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग महसूस होता है।

लोकतंत्र में पुलिस का सम्मान होना चाहिए, क्योंकि वह कानून की रक्षक है। लेकिन उसी लोकतंत्र में जनता के सवालों का भी सम्मान होना चाहिए, क्योंकि वही कानून की अंतिम मालिक है, इसलिए आवश्यकता वीडियो से डरने की नहीं, सच्चाई से सामना करने की है क्योंकि जिस समाज में आईना दिखाना अपराध और आईना छिपाना कर्तव्य बन जाए, वहां समस्या कैमरे में नहीं होती। समस्या चेहरे पर होती है और चेहरों की मरम्मत आईना तोड़कर नहीं, आत्मनिरीक्षण करके की जाती है। 

कैमरे की कलम: तिलचट्टों का गणतंत्र और सपनों की लीक होती हुई परीक्षा

देश में इन दिनों सबसे सुरक्षित चीज़ क्या है? न संविधान, न नौकरियाँ, न युवाओं के सपने। अगर कुछ सुरक्षित है तो वह है सरकारों का यह विश्वास कि जनता सब कुछ भूल जाएगी। कल देश की राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर में लाखों लोग उस आंदोलन से जुड़े जो सरकारों से सीधे सवाल पूछ रही है, देश के हालात और युवाओं के मन में सुलगते सैकड़ों सवालों के बीच शान्ति पूर्ण आंदोलन का आह्वान। आंदोलन में शामिल लोगों की भीड़ के बीच कहीं जय भीम के नारे, कहीं आरएसएस के खिलाफ हल्ला तो किसी कोने से आजादी के लिए उठता शोर। ये शोर कॉकरोच जनता पार्टी के मंच से उठा जिसे देश ने देखा, बिना डरे बिना हल्ला मचाये।  

एक समय था जब तिलचट्टे रसोई में मिलते थे। अब वे राजनीति में मिल रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि रसोई वाले तिलचट्टे देखकर लोग चीखते थे, राजनीतिक तिलचट्टों को देखकर लोग सेल्फी लेते हैं। और देश की हालत ऐसी हो चुकी है कि अब युवा यह तय नहीं कर पा रहा कि वह नौकरी ढूंढे, परीक्षा की तैयारी करे, या किसी नए आंदोलन का सदस्य बन जाए।

भारत आज दुनिया की सबसे युवा आबादी वाला देश कहलाता है। यह अलग बात है कि इस युवा आबादी का बड़ा हिस्सा रोजगार कार्यालयों, कोचिंग संस्थानों और सोशल मीडिया के बीच पेंडुलम की तरह झूल रहा है। सरकारें हर साल करोड़ों नौकरियों का सपना दिखाती हैं और बदले में करोड़ों युवाओं को "अगले प्रयास के लिए शुभकामनाएँ" का संदेश मिलता है। 

पेपर लीक अब कोई दुर्घटना नहीं रह गया है, यह तो हमारी परीक्षा व्यवस्था का आधिकारिक पाठ्यक्रम बन चुका है। पहले छात्र प्रश्नपत्र खोलते थे, अब प्रश्नपत्र पहले से ही छात्रों के मोबाइल खोल लेते हैं। परीक्षा केंद्रों से ज्यादा चर्चा व्हाट्सऐप ग्रुपों की होती है। कोचिंग संस्थानों से ज्यादा भरोसा टेलीग्राम चैनलों पर किया जाता है। और सरकारें हर बार ऐसे चौंक जाती हैं जैसे पहली बार उन्हें पता चला हो कि पानी गीला होता है।

देश का बेरोज़गार युवा आज सबसे बड़ा व्यंग्य बन चुका है। वह सुबह राष्ट्रनिर्माण के भाषण सुनता है, दोपहर में भर्ती परीक्षा का फार्म भरता है, शाम को परीक्षा स्थगित होने की खबर पढ़ता है और रात को पेपर लीक का वीडियो देखता है। फिर उससे कहा जाता है कि धैर्य रखो, देश आगे बढ़ रहा है। देश आगे बढ़ भी रहा है—बस समस्या यह है कि युवा पीछे छूट रहा है।

ऐसे माहौल में अगर कोई "कॉकरोच जनता पार्टी" पैदा होती है तो उसमें आश्चर्य कैसा? असली सवाल यह नहीं है कि कॉकरोच कौन हैं। असली सवाल यह है कि देश के लाखों पढ़े-लिखे नौजवान खुद को तिलचट्टों से जोड़ने में अपमान क्यों महसूस नहीं कर रहे? शायद इसलिए कि उन्हें लगने लगा है कि इस व्यवस्था में उनकी हैसियत भी किसी दीवार की दरार में छिपे जीव से ज्यादा नहीं है।

राजनीतिक दल आज कॉकरोचों की वंशावली खोज रहे हैं। कोई उन्हें सत्ता का एजेंट बता रहा है, कोई विपक्ष की साजिश। लेकिन कोई यह नहीं पूछ रहा कि आखिर वह जमीन क्यों तैयार हुई जिसमें ऐसे आंदोलन अंकुरित हो रहे हैं? जब भर्ती परीक्षाएँ मज़ाक बन जाएँ, डिग्रियाँ सजावट का सामान बन जाएँ और मेहनत का इनाम पेपर लीक हो जाए, तब राजनीति के पुराने ब्रांडों पर भरोसा टूटना स्वाभाविक है।

देश में आज हर समस्या का समाधान नैरेटिव से खोजा जा रहा है। बेरोज़गारी है तो राष्ट्रवाद की चर्चा कर लो। पेपर लीक है तो किसी और मुद्दे पर बहस करा दो। महँगाई है तो इतिहास की लड़ाई छेड़ दो। लेकिन पेट इतिहास से नहीं भरता, नौकरी नैरेटिव से नहीं मिलती और भविष्य भाषणों से नहीं बनता।

विडंबना यह है कि आज का युवा सरकार से कम, सिस्टम से ज्यादा नाराज़ है। उसे यह भरोसा नहीं रहा कि उसकी मेहनत और प्रतिभा का सम्मान होगा। उसे लगता है कि परीक्षा से पहले प्रश्नपत्र बिक सकता है, भर्ती से पहले सीटें तय हो सकती हैं और इंटरव्यू से पहले परिणाम लिखा जा सकता है।

ऐसे समय में कॉकरोच सड़क पर उतर रहे हैं। वे सफल होंगे या असफल, ईमानदार होंगे या अवसरवादी, यह भविष्य बताएगा। लेकिन उनकी लोकप्रियता एक चेतावनी है। यह उस पीढ़ी की बेचैनी का संकेत है जो वर्षों से सुन रही है कि वही देश का भविष्य है, लेकिन वर्तमान में उसके हिस्से सिर्फ प्रतीक्षा, परीक्षा और निराशा आई है और अगर व्यवस्था ने इस चेतावनी को भी मज़ाक समझ लिया, तो आने वाले समय में तिलचट्टे ही नहीं, पूरी दीवारें बोलने लगेंगी।

कैमरे की कलम: सत्ता का बैज और गुंडागर्दी का लाइसेंस

छत्तीसगढ़ के सीतापुर में जो हुआ, वह किसी एक विधायक, एक अफसर या एक जिले का मामला नहीं है। यह उस राजनीतिक बीमारी का लक्षण है जो लोकतंत्र के शरीर में धीरे-धीरे फैलती रही है। बीमारी का नाम है—सत्ता का अहंकार। 

एक सत्तारूढ़ दल का विधायक अपने समर्थकों के साथ सार्वजनिक स्थान पर एक नायब तहसीलदार से उलझता है। आरोप है कि बात इतनी बढ़ती है कि हाथापाई बाद में मारपीट तक पहुंच जाती है। वहां मौजूद वरिष्ठ अधिकारी रोकने की कोशिश करते हैं, लेकिन विधायक का गुस्सा, या कहिए सत्ता का नशा, किसी प्रशासनिक मर्यादा को स्वीकार करने को तैयार नहीं दिखता। यह दृश्य किसी व्यक्ति विशेष के क्रोध का नहीं, बल्कि उस मानसिकता का प्रतीक है जिसमें निर्वाचित प्रतिनिधि स्वयं को कानून का विषय नहीं, कानून का स्वामी समझने लगते हैं। 

लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि जनता की शक्ति का प्रतीक होता है, लेकिन जब वही जनप्रतिनिधि स्वयं को कानून से ऊपर समझने लगे, तब लोकतंत्र की आत्मा घायल होती है। सीतापुर के विधायक रामकुमार टोप्पो से जुड़ा हालिया विवाद इसी चिंता को सामने लाता है। मामले की सच्चाई क्या है, कौन दोषी है और किसकी बात सही है, इसका अंतिम निर्णय अदालतें और जांच एजेंसियां करेंगी। लेकिन जो दृश्य जनता ने देखा, वह अपने आप में कई गंभीर सवाल छोड़ गया है।

आरोप है कि एक सरकारी अधिकारी के साथ नेताजी के साथ साथ समर्थकों ने मारपीट की । आरोप यह भी है कि विवाद की जड़ एक ऐसे व्यक्ति की पैरोल से जुड़ी थी जिस पर हत्या जैसे गंभीर अपराध का आरोप है। हत्या जैसे संगीन अपराध में जेल की दीवारों में फंसा व्यक्ति रिश्ते में विधायक के जीजा हैं जिनकी पेरोल संबंधी कागजात को लेकर नेताजी की चचेरी बहन से नायब तहसीलदार की कहासुनी हुई । इन आरोपों की सत्यता जांच का विषय है, लेकिन इससे भी बड़ा प्रश्न उस राजनीतिक संस्कृति का है जो सत्ता को जवाबदेही नहीं, बल्कि विशेषाधिकार समझने लगती है। सवाल यह नहीं है कि अफसर सही था या गलत। सवाल यह है कि फैसला करने का अधिकार किसे है? लोकतंत्र में कानून को या सत्ता के मद में चूर किसी जनप्रतिनिधि को?

सबसे विचित्र और चिंताजनक दृश्य तब सामने आया जब विधायक ने स्वयं को गिरफ्तारी के लिए प्रस्तुत करने की बात कही। लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह एक सामान्य कानूनी प्रक्रिया हो सकती थी। लेकिन यह प्रक्रिया अचानक शक्ति प्रदर्शन के मंच में बदल गई। समर्थकों की भीड़, राष्ट्रीय राजमार्ग पर जाम, नारेबाजी और भावनात्मक उन्माद के बीच गिरफ्तारी का प्रसंग किसी न्यायिक प्रक्रिया से अधिक राजनीतिक आयोजन जैसा प्रतीत हुआ।

विडंबना यह है कि "वंदे मातरम्" और "जय श्री राम" जैसे राष्ट्रभक्ति और आस्था के उद्घोष भी इस शक्ति प्रदर्शन का हिस्सा बने। ये नारे करोड़ों लोगों की भावनाओं से जुड़े हैं। इनका स्थान राष्ट्रीय गौरव और सांस्कृतिक चेतना के उत्सव में है, न कि किसी व्यक्ति विशेष के कानूनी संकट को जनभावनाओं की ढाल बनाने में। जब ऐसे पवित्र प्रतीकों को राजनीतिक या व्यक्तिगत बचाव के उपकरण में बदला जाता है, तब नुकसान केवल राजनीति का नहीं, सामाजिक विश्वास का भी होता है। 

सवाल यह भी है कि यदि कोई जनप्रतिनिधि स्वयं को निर्दोष मानता है तो उसे कानून की प्रक्रिया का सम्मान करते हुए जांच में सहयोग करना चाहिए। निर्दोषता का सबसे मजबूत प्रमाण अदालत होती है, सड़क पर जुटी भीड़ नहीं। लोकतंत्र में न्यायालय का फैसला भीड़ के आकार से तय नहीं होता। लेकिन दुर्भाग्य से हमारे राजनीतिक जीवन में भीड़ को नैतिक वैधता का प्रमाणपत्र मानने की प्रवृत्ति लगातार बढ़ती जा रही है। यह बीमारी किसी एक दल तक सीमित नहीं है। भाजपा हो, कांग्रेस हो या कोई क्षेत्रीय दल—सत्ता मिलते ही बहुत से नेताओं के पांव जमीन छोड़ देते हैं। लोकतंत्र उन्हें जनता का सेवक बनाता है, लेकिन वे स्वयं को इलाके का शासक समझने लगते हैं। सांसद-विधायक बनने के बाद कुछ लोगों का व्यवहार ऐसा हो जाता है मानो जनता ने उन्हें संविधान से ऊपर बैठाने का जनादेश दिया हो।

देश भर में ऐसे अनगिनत वीडियो मौजूद हैं जिनमें नेता अफसरों को फोन पर गालियां देते सुनाई देते हैं। कहीं धमकियां हैं, कहीं तबादले की चेतावनी है, कहीं नौकरी खाने की भाषा है। मोबाइल कैमरों ने लोकतंत्र का एक नया सच उजागर किया है—जनप्रतिनिधियों के चेहरे पर चढ़ा सत्ता का मुखौटा अब रिकॉर्ड होने लगा है। पहले ऐसे किस्से बंद कमरों में दफन हो जाते थे। अब वे वायरल होते हैं। जनता देखती है कि मंचों पर संविधान की दुहाई देने वाले लोग व्यवहार में किस हद तक सामंती मानसिकता से भरे हुए हैं।

सत्तारूढ़ दलों के लिए ऐसी घटनाएं और अधिक शर्मनाक होती हैं। विपक्षी दल का नेता हंगामा करे तो सरकार कार्रवाई कर सकती है, पुलिस सक्रिय हो सकती है, कानून अपना रास्ता ले सकता है। लेकिन जब सत्ताधारी दल का विधायक ही आरोपों के घेरे में हो, तब सरकार एक असहज दुविधा में फंस जाती है। कार्रवाई करे तो अपनी ही राजनीतिक बिरादरी नाराज होती है, कार्रवाई न करे तो कानून के राज पर सवाल उठते हैं और यहीं किसी सरकार की असली परीक्षा होती है।

यदि सरकार अपने विधायक के खिलाफ भी वही कठोरता दिखा सके जो वह विपक्ष के नेताओं के खिलाफ दिखाती है, तभी "कानून का राज" एक विश्वसनीय अवधारणा बनता है। अन्यथा कानून केवल कमजोर लोगों के लिए और शक्ति केवल सत्ताधारियों के लिए बच जाती है।

सीतापुर की घटना इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि एक विधायक और एक अफसर के बीच विवाद हुआ। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसने लोकतंत्र के सामने खड़ा वह पुराना सवाल फिर जीवित कर दिया है—क्या जनप्रतिनिधि कानून के अधीन हैं, या कानून जनप्रतिनिधियों के अधीन है?

लोकतंत्र की ताकत चुनाव जीतने में नहीं, चुनाव जीतने के बाद भी कानून के सामने सिर झुकाने में होती है। लेकिन जब जनादेश को कुछ लोग दंडमुक्ति का प्रमाणपत्र समझने लगते हैं, तब लोकतंत्र का चरित्र बदलने लगता है। तब जनता का प्रतिनिधि, जनता का सेवक नहीं रह जाता; वह सत्ता का स्थानीय ठेकेदार बन जाता है और किसी भी लोकतंत्र के लिए इससे अधिक खतरनाक स्थिति दूसरी नहीं हो सकती क्योंकि जिस दिन जनता यह मान ले कि कानून का पालन केवल आम आदमी के लिए है और सत्ता में बैठे लोगों के लिए नहीं, उसी दिन लोकतंत्र की नैतिक नींव में पहली बड़ी दरार पड़ जाती है। सीतापुर की घटना उसी दरार की एक तेज़ और चिंताजनक आवाज़ है। 

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