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कैमरे की कलम: जब कैमरा गवाह बन जाए

कभी कहा जाता था कि "दीवारों के भी कान होते हैं।" इक्कीसवीं सदी ने इस कहावत को बदल दिया है। अब दीवारों के सिर्फ कान नहीं, आंखें भी हैं। जेब में रखा मोबाइल फोन, सड़क पर लगा सीसीटीवी कैमरा और पुलिस की वर्दी पर लगा बॉडी कैमरा आज लोकतंत्र के सबसे निष्पक्ष गवाह बनते जा रहे हैं। इनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इन्हें न सत्ता का भय होता है, न विपक्ष का मोह और न ही किसी दल या व्यक्ति के प्रति पूर्वाग्रह। कैमरा वही दिखाता है जो उसके सामने घटता है।

पिछले कुछ वर्षों में देश में जितने बड़े राजनीतिक, प्रशासनिक और सामाजिक विवाद सामने आए हैं, उनमें से अधिकांश की शुरुआत किसी वीडियो, ऑडियो या सीसीटीवी फुटेज से हुई। कहीं कोई मंत्री अपने पद के अहंकार में दिखाई दिया, कहीं कोई अधिकारी जनता से दुर्व्यवहार करता मिला, कहीं पुलिस की बर्बरता कैमरे में कैद हुई, तो कहीं अस्पताल में डॉक्टरों से मारपीट करते जनप्रतिनिधि की हेकड़ी कुछ ही घंटों में अदालत तक पहुंच गई। यदि ये कैमरे न होते तो अधिकांश मामलों में वही पुराना सरकारी वाक्य सुनाई देता—"आरोप निराधार हैं। जांच कराई जाएगी।"

दरअसल, तकनीक ने लोकतंत्र को वह ताकत दे दी है, जिसे कभी केवल अखबार, अदालत और विपक्ष मिलकर भी नहीं दे पाते थे—तथ्य का निर्विवाद प्रमाण।

यही कारण है कि कैमरे से सबसे अधिक असहज वही लोग होते हैं जो अधिकार को जवाबदेही से ऊपर मानते हैं। आम नागरिक कैमरे से इसलिए नहीं डरता क्योंकि उसके पास छिपाने को बहुत कम होता है। लेकिन सत्ता, चाहे वह राजनीतिक हो या प्रशासनिक, अक्सर रिकॉर्डिंग से असहज हो जाती है। जैसे ही कोई नागरिक मोबाइल निकालता है, कई जगह सबसे पहला आदेश सुनाई देता है—"वीडियो बंद करो। मोबाइल रखो। रिकॉर्डिंग मत करो।"

सवाल यह है कि क्यों?

यदि सरकारी अधिकारी नियमों के अनुसार काम कर रहा है, पुलिस कानून के दायरे में कार्रवाई कर रही है और जनप्रतिनिधि जनता के प्रति मर्यादित व्यवहार कर रहा है, तो रिकॉर्डिंग से डर किस बात का?

लोकतंत्र में सत्ता जनता से ताकत लेती है। इसलिए जनता को यह अधिकार भी होना चाहिए कि वह सत्ता के व्यवहार का दस्तावेज तैयार कर सके।

विडंबना यह है कि सरकार नागरिकों को तो हर जगह कैमरों की निगरानी में रखती है। रेलवे स्टेशन, हवाई अड्डे, टोल प्लाजा, बैंक, सरकारी कार्यालय, अस्पताल, बाजार, चौराहे—हर जगह सीसीटीवी लगे हैं। नागरिक की हर गतिविधि रिकॉर्ड होती है। लेकिन जैसे ही नागरिक सरकार की गतिविधि रिकॉर्ड करना चाहता है, उसे अनुशासन, गोपनीयता और कानून का पाठ पढ़ाया जाने लगता है। लोकतंत्र में यह दोहरा मापदंड नहीं चल सकता।

दुनिया के अनेक लोकतांत्रिक देशों में पुलिस के लिए बॉडी कैमरा अनिवार्य है। इसका उद्देश्य केवल पुलिस की निगरानी करना नहीं, बल्कि पुलिस को झूठे आरोपों से बचाना भी है। यदि कोई आरोपी पुलिस पर मारपीट का आरोप लगाता है और रिकॉर्डिंग कुछ और कहती है, तो वही वीडियो पुलिस की ढाल बन जाता है। इसी प्रकार यदि पुलिस अपनी शक्ति का दुरुपयोग करती है तो वही कैमरा जनता के अधिकारों का प्रहरी बन जाता है।

अर्थात कैमरा किसी एक पक्ष का नहीं, सत्य का पक्षधर होता है।

भारत में भी समय-समय पर पुलिस को बॉडी कैमरे दिए गए, लेकिन उनका उपयोग अपेक्षित स्तर पर नहीं हो सका। कहीं उपकरण अलमारियों में बंद रह गए, कहीं बैटरी खत्म रही और कहीं कैमरे चालू ही नहीं किए गए। तकनीक उपलब्ध थी, लेकिन पारदर्शिता की इच्छा अनुपस्थित रही।

असल प्रश्न यह है कि क्या केवल पुलिस ही क्यों?

सरकारी कार्यालयों में होने वाली प्रत्येक औपचारिक बातचीत की रिकॉर्डिंग क्यों न हो?

तहसील, नगर निगम, पंचायत, आरटीओ, राजस्व कार्यालय, पुलिस थाना, विकासखंड, बिजली कार्यालय—जहां भी नागरिक अपने अधिकार के लिए सरकारी कर्मचारी के सामने खड़ा होता है, वहां उसकी बातचीत रिकॉर्ड करने का अधिकार उसे क्यों न मिले?

आज अधिकांश भ्रष्टाचार फाइलों में नहीं, मौखिक आदेशों में होता है।

कई वरिष्ठ अधिकारी अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को विवादास्पद निर्देश कभी लिखित में नहीं देते। आदेश हमेशा मौखिक होता है। बाद में जब जांच होती है तो वही अधिकारी कह देता है—"मैंने ऐसा कोई निर्देश नहीं दिया।"

यदि ऐसे संवाद रिकॉर्ड किए जा सकें, तो न केवल गलत आदेश देने की प्रवृत्ति कम होगी, बल्कि ईमानदार कर्मचारी भी सुरक्षित रहेगा।

भारतीय प्रशासन में "मौखिक आदेश" शायद सबसे बड़ा अदृश्य भ्रष्टाचार है। फाइलें साफ रहती हैं और जिम्मेदारी हवा में गायब हो जाती है।

तकनीक इस बीमारी का इलाज बन सकती है।

बेशक, इसका अर्थ यह नहीं कि निजी जीवन की गोपनीयता समाप्त कर दी जाए। लोकतंत्र में निजता मौलिक अधिकार है। किसी के घर, निजी बातचीत या व्यक्तिगत जीवन में अनधिकृत रिकॉर्डिंग स्वीकार्य नहीं हो सकती। लेकिन जब कोई व्यक्ति सरकारी पद पर बैठकर सार्वजनिक दायित्व निभा रहा हो, तब उसके आधिकारिक व्यवहार पर पारदर्शिता का सिद्धांत लागू होना चाहिए।

लोकतंत्र में सरकारी पद निजी संपत्ति नहीं होता।

यह जनता का विश्वास होता है।

और विश्वास का सबसे मजबूत आधार पारदर्शिता है।

सुप्रीम कोर्ट पहले ही देश के सभी थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाने के निर्देश दे चुका है। कई राज्यों में इस दिशा में काम भी हुआ है। अदालतों की कार्यवाही रिकॉर्ड होती है। संसद और विधानसभाओं की हर गतिविधि रिकॉर्ड होती है। नगर निगम की बैठकों का भी वीडियो बनता है। यदि लोकतंत्र के सर्वोच्च संस्थानों की कार्यवाही रिकॉर्ड हो सकती है तो फिर सरकारी दफ्तरों में जनता और अधिकारियों के बीच होने वाली औपचारिक बातचीत रिकॉर्ड होने में आपत्ति कैसी?

जो व्यवस्था स्वयं को ईमानदार मानती है, उसे कैमरे से नहीं, कैमरे की अनुपस्थिति से डरना चाहिए।

यह भी सच है कि कैमरा हर समस्या का समाधान नहीं है। कैमरा रिश्वतखोरी समाप्त नहीं कर सकता। कैमरा भ्रष्टाचार की मानसिकता नहीं बदल सकता। कैमरा कानून का विकल्प नहीं है। लेकिन कैमरा सत्य का ऐसा दस्तावेज अवश्य बन सकता है जिसे झुठलाना कठिन हो।

लोकतंत्र में झूठ सबसे अधिक वहीं फलता-फूलता है जहां प्रमाण नहीं होते।

कैमरा प्रमाण पैदा करता है।

इसलिए वह लोकतंत्र का शत्रु नहीं, सहयोगी है।

अब समय आ गया है कि सरकार स्पष्ट नीति बनाए। नागरिकों को यह कानूनी अधिकार मिले कि वे सरकारी कार्यालयों में अपने आधिकारिक कामकाज के दौरान होने वाली बातचीत रिकॉर्ड कर सकें। पुलिस कार्रवाई में बॉडी कैमरा अनिवार्य रूप से चालू रहे। सरकारी बैठकों में मौखिक निर्देशों के बजाय रिकॉर्डेड या लिखित आदेशों की व्यवस्था हो। और यदि कोई अधिकारी बिना वैध कारण रिकॉर्डिंग रोकता है या नागरिक का मोबाइल छीनता है, तो इसे भी अनुशासनहीनता माना जाए।

इक्कीसवीं सदी में लोकतंत्र का नया प्रहरी कोई व्यक्ति नहीं, तकनीक है।

कैमरा न पक्षधर होता है, न विरोधी। वह न सरकार के लिए वोट मांगता है, न विपक्ष के लिए नारे लगाता है। वह केवल सच दर्ज करता है।

शायद यही कारण है कि जो लोग सच के साथ खड़े हैं, उन्हें कैमरे से डर नहीं लगता।

और जो कैमरे से डरते हैं, वे अनजाने में यह स्वीकार कर देते हैं कि उन्हें सच से असुविधा है। 

कैमरे की कलम: इम्तिहान में फेल सिस्टम

"जब व्यवस्था नकल करने लगे, तो ईमानदार छात्र सबसे बड़ा अपराधी दिखाई देने लगता है।"

देश में एक अजीब परंपरा विकसित हो गई है। यहां हर साल लाखों छात्र परीक्षा देते हैं, लेकिन असली परीक्षा छात्रों की नहीं, व्यवस्था की होती है। दुर्भाग्य यह है कि हर बार छात्र पास हो जाएं या फेल, व्यवस्था अपनी ही कॉपी जांचती है और खुद को 'उत्तीर्ण' घोषित कर देती है। फिर एक दिन कोई पेपर लीक हो जाता है। सरकार कहती है—"दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।" जांच एजेंसी कहती है—"जांच जारी है।" अधिकारी कहते हैं—"यह एक अलग-थलग घटना है" और छात्र सोचता है—"क्या मेरा भविष्य भी अलग-थलग घटना है?" 

दिल्ली के जंतर-मंतर पर उमड़ा छात्र सैलाब केवल एक परीक्षा का विरोध नहीं था। वह उन लाखों युवाओं का जमा हुआ आक्रोश था, जिन्होंने वर्षों तक किताबों में सिर झुकाया, कोचिंग संस्थानों में लाखों रुपये खर्च किए, परिवारों की उम्मीदों का बोझ उठाया और अंत में पाया कि उनका मुकाबला प्रतिभा से नहीं, बल्कि पेपर लीक, दलालों और परीक्षा माफिया से कराया जा रहा है। छात्र आंदोलन के दबाव के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दिया। यह लोकतंत्र में जवाबदेही का एक महत्वपूर्ण क्षण था, लेकिन क्या केवल इस्तीफे से शिक्षा व्यवस्था का उपचार हो जाएगा? शायद नहीं। असल सवाल यह है कि भारत में परीक्षा अब ज्ञान की परीक्षा कम और धैर्य की परीक्षा अधिक क्यों बन गई है? हमारा शिक्षा तंत्र आज उस डॉक्टर की तरह हो गया है, जो हर मरीज को यही सलाह देता है—"अगली बार ध्यान रखिए।" 

सरकारें अक्सर कहती हैं कि युवा देश का भविष्य हैं। लेकिन व्यवहार में लगता है कि युवा केवल चुनावी भाषणों का भविष्य हैं। चुनाव के समय युवाओं को रोजगार का सपना दिखाइए, परीक्षा कराइए, फिर पेपर लीक होने दीजिए, जांच बैठाइए, समिति बनाइए, रिपोर्ट मंगाइए और अगले चुनाव तक सब भूल जाइए। 

आज आवश्यकता केवल कठोर कानून बनाने की नहीं है। कानून पहले भी थे। आवश्यकता उनके निष्पक्ष और त्वरित क्रियान्वयन की है। पेपर लीक को केवल आपराधिक घटना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संसाधनों और युवाओं के भविष्य पर सुनियोजित हमला माना जाना चाहिए। इसमें शामिल लोगों के खिलाफ ऐसी कार्रवाई होनी चाहिए कि आने वाले वर्षों में कोई इस अपराध की कल्पना भी न कर सके।

राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी सहित सभी परीक्षा संस्थाओं की स्वतंत्र तकनीकी और प्रशासनिक ऑडिट व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए। प्रश्नपत्र सुरक्षा, डिजिटल निगरानी, साइबर सुरक्षा और जवाबदेही के मानकों को अंतरराष्ट्रीय स्तर का बनाया जाना चाहिए। परीक्षा प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी बनाने के लिए समयबद्ध सुधार आवश्यक हैं लेकिन सुधार केवल संस्थागत नहीं, राजनीतिक भी होना चाहिए।

सरकारों को यह समझना होगा कि युवा केवल चुनावी घोषणापत्र का विषय नहीं हैं। वे राष्ट्र की उत्पादक शक्ति हैं। उनका विश्वास खो देना किसी भी सरकार की सबसे बड़ी राजनीतिक और नैतिक विफलता होगी।

शिक्षा को राजनीति का अखाड़ा बनाने की प्रवृत्ति भी समाप्त करनी होगी। परीक्षा में हुई हर गड़बड़ी पर सत्ता और विपक्ष यदि केवल एक-दूसरे पर आरोप लगाने में व्यस्त रहेंगे, तो सबसे बड़ी कीमत वह छात्र चुकाएगा, जिसका इन आरोपों से कोई संबंध नहीं है।

भारत दुनिया का सबसे युवा देश बनने का दावा करता है। यदि यह दावा वास्तविक है, तो सबसे अधिक निवेश भी युवाओं के विश्वास में होना चाहिए। सड़कें, पुल और इमारतें बाद में भी बन सकती हैं, लेकिन यदि एक पीढ़ी का भरोसा टूट गया, तो उसे दोबारा बनाने में दशकों लग जाते हैं।

यह आंदोलन एक मंत्री के इस्तीफे पर समाप्त नहीं होना चाहिए। इसकी परिणति परीक्षा सुधारों की व्यापक प्रक्रिया में होनी चाहिए। देश का हर छात्र यह महसूस करे कि उसका मुकाबला केवल प्रश्नपत्र से है, किसी माफिया, किसी दलाल और किसी भ्रष्ट तंत्र से नहीं।

किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी परीक्षा उसके छात्र नहीं देते, उसकी व्यवस्था देती है। आज यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि उस परीक्षा में हमारी व्यवस्था अपेक्षित अंक नहीं ला सकी है।

अब समय उत्तरपुस्तिका बदलने का नहीं, पूरी परीक्षा प्रणाली को सुधारने का है। तभी यह विश्वास लौटेगा कि भारत में सफलता का रास्ता मेहनत से होकर जाता है, न कि पेपर लीक की अंधेरी गलियों से।

कैमरे की कलम: 'डूबा बिलासपुर, तैरा भ्रष्टाचार'

बिलासपुर के नागरिकों को बधाई। आखिरकार हमारा शहर उस मुकाम पर पहुंच ही गया, जिसकी कल्पना शायद किसी ने नहीं की थी। अब हम केवल सड़क मार्ग से नहीं, बल्कि जलमार्ग से भी आवागमन करने लगे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि यह उपलब्धि किसी दूरदर्शी योजना का परिणाम नहीं, बल्कि दूरदर्शिता की लगातार हत्या का प्रतिफल है।

जिन लोगों ने कभी वेनिस शहर की तस्वीरें देखकर आह भरी होगी कि "काश हमारे शहर में भी नाव चलती", उनकी इच्छा पूरे 20 साल बाद इस मानसून में पूरी हो गई। कॉलोनियों में नाव चल रही है, लोग घरों की छतों पर शरण लिए बैठे हैं, बच्चे स्कूल नहीं बल्कि बाढ़ का भूगोल पढ़ रहे हैं, और प्रशासन इस उपलब्धि पर शायद यही सोच रहा होगा कि "देखिए, हमने जल पर्यटन की संभावनाएं भी विकसित कर दीं।"

बिलासपुर सचमुच स्मार्ट हो गया है। इतना स्मार्ट कि पानी ने भी समझ लिया कि उसे अब नालियों से नहीं, सीधे लोगों के ड्राइंग रूम से होकर गुजरना चाहिए।

कहते हैं प्रकृति कभी अन्याय नहीं करती। पानी वहीं जाता है, जहां उसके लिए रास्ता छोड़ा जाता है। लेकिन हमारे शहर के योजनाकारों ने प्रकृति को भी चुनौती दे दी। जहां तालाब थे, वहां कॉलोनियां उगा दीं। जहां नाले थे, वहां कॉम्प्लेक्स खड़े कर दिए। जहां पानी बहता था, वहां प्लॉट काट दिए। अब पानी बेचारा करे भी तो क्या करे? वह भी आखिर सरकारी फाइल नहीं है कि वर्षों तक दबा रहे। उसे रास्ता चाहिए। रास्ता नहीं मिला तो उसने घरों का दरवाजा खटखटा दिया।

हमारे यहां विकास का एक बड़ा वैज्ञानिक सिद्धांत है—पहले निर्माण करो, बाद में सोचो कि पानी जाएगा कहां। अगर कोई सवाल पूछे तो मास्टर प्लान दिखा दो। अगर ज्यादा सवाल पूछे तो अगली समिति बना दो। और अगर फिर भी न माने तो कह दो कि "इतनी बारिश सौ साल में पहली बार हुई है।"

यह "सौ साल में पहली बार" वाला वाक्य भी बड़ा दिलचस्प है। पिछले दस वर्षों से हर साल सुन रहे हैं। लगता है हमारे यहां हर मानसून सौ साल पुराना रिकॉर्ड तोड़ देता है, लेकिन हमारी तैयारी हर बार शून्य वर्ष से शुरू होती है।

सबसे मजेदार दृश्य तब सामने आया जब शहर के बड़े अधिकारियों के सरकारी बंगलों में भी पानी भर गया। लोकतंत्र में समानता का इससे सुंदर उदाहरण शायद ही मिले। इस बार पानी ने गरीब-अमीर, नेता-अफसर, बंगला-झोपड़ी में कोई भेदभाव नहीं किया। फर्क बस इतना था कि आम आदमी अपने घर का पानी खुद निकाल रहा था, जबकि सरकारी बंगलों का पानी निकालने के लिए पूरा सरकारी अमला जुट गया।

कभी-कभी लगता है कि पानी भी बड़ा ईमानदार होता है। उसे किसी का पद नहीं दिखता, केवल ढलान दिखती है।

स्मार्ट सिटी मिशन पर सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च हुए। भूमिगत सीवरेज पर भी करोड़ों बहाए गए। शहर के बजट का आकार लगातार बढ़ता गया। कागजों में परियोजनाएं पूरी होती रहीं। शिलान्यास के पत्थर लगते रहे। उद्घाटन के फीते कटते रहे। प्रेस विज्ञप्तियां छपती रहीं। सोशल मीडिया पर तस्वीरें आती रहीं। बस एक छोटी-सी भूल हो गई—बारिश को आमंत्रण भेजना भूल गए। जैसे ही बारिश आई, उसने सारे उद्घाटन भाषण बहा दिए।

हमारे यहां विकास का पैमाना बड़ा सरल है। सड़क कितनी टिकाऊ है, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि उद्घाटन किसने किया। नाली कितनी चौड़ी है, इससे ज्यादा जरूरी है कि शिलापट्ट पर नाम किसका लिखा है। सीवरेज काम कर रहा है या नहीं, यह बाद की बात है; पहले यह सुनिश्चित होना चाहिए कि परियोजना की तस्वीरें रंगीन हों।

नगर नियोजन का हाल भी कम रोचक नहीं है। नक्शे में चौड़ी सड़कें, आधुनिक ड्रेनेज और हरित क्षेत्र दिखाई देते हैं। जमीन पर वही सड़क आधी पार्किंग बन जाती है, नाली आधी अतिक्रमण में गायब हो जाती है और हरित क्षेत्र पर धीरे-धीरे कंक्रीट का जंगल उग आता है। फिर एक दिन बारिश आती है और पूछती है—"मुझे जाना किधर है?" जवाब में पूरा शहर चुप रहता है।

अवैध निर्माणों की कहानी भी बड़ी प्रेरणादायक है। नियमों के अनुसार जो काम नहीं हो सकता, वह थोड़ी-सी कृपा, थोड़ी-सी पहचान और थोड़ी-सी सुविधा शुल्क के बाद पूरी तरह वैध महसूस होने लगता है। नक्शे बदल जाते हैं, मंजिलें बढ़ जाती हैं, नाले सिकुड़ जाते हैं और सरकारी फाइलों में सब कुछ "नियमों के अनुरूप" दर्ज हो जाता है। आखिर कागज पर तो पानी नहीं भरता।

हर साल मानसून से पहले नालों की सफाई का अभियान चलता है। कैमरे आते हैं। अधिकारी फावड़ा पकड़ते हैं। दो-चार टोकरियां गाद निकलती हैं। तस्वीरें अखबारों में छपती हैं। फिर फावड़ा वापस वाहन में रख दिया जाता है और गाद अगले मानसून तक वहीं आराम करती रहती है। यह परंपरा इतनी पवित्र हो चुकी है कि इसे शायद अमूर्त सांस्कृतिक विरासत घोषित कर देना चाहिए।

फिर कंट्रोल रूम खुलता है। हेल्पलाइन नंबर जारी होते हैं। अपील की जाती है कि "घबराएं नहीं।" नागरिक सोचता है—घबराएं नहीं, तो क्या तैरना शुरू कर दें? कंट्रोल रूम तब सक्रिय होता है जब पानी लोगों के घरों में पहुंच चुका होता है। यानी बीमारी फैलने के बाद दवा की दुकान खोलने जैसी दूरदर्शिता।

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इस पूरे घटनाक्रम में किसी की जिम्मेदारी तय नहीं होती। बारिश दोषी, बादल दोषी, मौसम दोषी, जलवायु परिवर्तन दोषी, पिछली सरकार दोषी, अगली सरकार दोषी—बस वे लोग निर्दोष रहते हैं, जिनके हस्ताक्षरों से शहर का भविष्य तय हुआ। हमारे यहां जवाबदेही भी शायद भूमिगत सीवरेज की तरह है—कागजों में मौजूद, जमीन पर गायब। 

आज भी मकान और व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स तेजी से बन रहे हैं, लेकिन नालियां वर्षों पुरानी क्षमता के साथ जस की तस हैं। नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कार्रवाई करने के बजाय उन्हें संरक्षण दिया गया। परिणाम आज पूरे शहर के सामने है।

शहर का मास्टर प्लान बदलने से पहले शायद मास्टर मानसिकता बदलने की जरूरत है। नगर नियोजन का मतलब केवल प्लॉट बेचना नहीं होता। विकास का अर्थ केवल कंक्रीट बिछाना नहीं होता। शहर इमारतों से नहीं, व्यवस्थाओं से बनता है। सड़कें, नालियां, तालाब, जलनिकासी, हरित क्षेत्र और नियमों का पालन—ये सब विकास के उतने ही जरूरी स्तंभ हैं, जितने फ्लाईओवर और चमकदार चौक। 

दुनिया के अनेक शहरों ने पुराने इलाकों में रेट्रोफिटिंग कर ड्रेनेज व्यवस्था सुधारी। जहां जरूरत पड़ी, वहां पुनर्विकास किया। जलग्रहण क्षेत्रों को संरक्षित रखा। वर्षा जल के प्राकृतिक प्रवाह को बाधित नहीं होने दिया। हमने भी इन शब्दों को बड़े-बड़े सेमिनारों और प्रस्तुतियों में खूब दोहराया। फर्क सिर्फ इतना रहा कि वहां इन पर काम हुआ, यहां इन पर ताली बजी।

अब भी समय है। राहत सामग्री बांटने, नाव चलाने और सर्वे कराने से आगे बढ़ना होगा। शहर का वैज्ञानिक जलनिकासी मानचित्र तैयार करना होगा। नालों पर हुए अतिक्रमण हटाने होंगे। नियम तोड़ने वालों और नियम तोड़ने देने वालों—दोनों की जवाबदेही तय करनी होगी। जिन परियोजनाओं पर जनता का पैसा खर्च हुआ है, उनका स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट होना चाहिए। आखिर जनता को यह जानने का अधिकार है कि करोड़ों रुपये पानी में बहे या पानी रोकने में लगे।

वरना अगले साल फिर यही होगा। अखबारों में वही तस्वीरें होंगी। नेता वही आश्वासन देंगे। अधिकारी वही समीक्षा बैठक करेंगे। नागरिक वही बाल्टियां भरेंगे। और हम फिर गर्व से कहेंगे—"हमारी स्मार्ट सिटी अब और भी स्मार्ट हो गई है। इस बार पानी पहली मंजिल तक पहुंच गया।"

कहावत है कि डूबते को तिनके का सहारा होता है। बिलासपुर की जनता अब तिनका नहीं, जवाबदेही तलाश रही है। क्योंकि शहर को बारिश ने नहीं डुबोया। उसे डुबोया है वर्षों की लापरवाही, भ्रष्टाचार, योजनाहीन विकास और उस मानसिकता ने, जो हर आपदा के बाद दोष बादलों पर डालकर अपने दामन को सूखा साबित करने में लगी रहती है। 

अब समय केवल राहत कार्यों का नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने का है। जब तक गलत योजना, भ्रष्टाचार और नियमों की अनदेखी पर कठोर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक हर मानसून के साथ यही त्रासदी दोहराई जाती रहेगी।

शहर को नाव नहीं, नियत चाहिए। पंप नहीं, योजना चाहिए। राहत शिविर नहीं, जिम्मेदार शासन चाहिए। जिस दिन यह समझ सत्ता और व्यवस्था दोनों को आ जाएगी, उस दिन बिलासपुर सचमुच स्मार्ट कहलाने का हकदार होगा। तब तक नागरिकों से यही निवेदन है—बरसात शुरू होने से पहले राशन, मोमबत्ती और जरूरी दवाइयों के साथ एक लाइफ जैकेट भी संभालकर रखिए। क्या पता, अगली स्मार्ट योजना किस गली से होकर गुजरे।

कैमरे की कलम: "माइलेज नहीं, भरोसा घटा है"

लोकतंत्र में नागरिक का सबसे बड़ा सुख यह है कि उसे हर बात पर भरोसा रखने की सलाह दी जाती है। सरकार कहे कि अर्थव्यवस्था दौड़ रही है, तो आपको दौड़ती हुई दिखनी चाहिए। सरकार कहे कि महंगाई नियंत्रण में है, तो सब्जी खरीदते समय अपनी जेब पर नहीं, सरकार के बयान पर भरोसा करना चाहिए। और अब सरकार कह रही है कि पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिलाने से न आपकी गाड़ी को कोई फर्क पड़ रहा है, न माइलेज घट रहा है, न आपकी जेब पर कोई अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। अगर आपको कुछ और महसूस हो रहा है, तो संभव है कि गलती आपकी गाड़ी की नहीं, आपकी अनुभूति की हो।

देश में अब एक नया विज्ञान विकसित हो रहा है। इसमें प्रयोगशाला की जगह प्रेस कॉन्फ्रेंस होती है और शोधपत्रों की जगह सरकारी बयान। वैज्ञानिक निष्कर्ष यह है कि यदि करोड़ों लोग कोई शिकायत कर रहे हों, लेकिन सरकार उसे स्वीकार न करे, तो शिकायत अपने-आप अमान्य हो जाती है।

अजीब विडंबना है। पेट्रोल का दाम वर्षों से दुनिया के कई देशों की तुलना में कहीं अधिक चुकाने वाला भारतीय उपभोक्ता अब यह भी सुन रहा है कि जिस ईंधन के लिए वह पूरा पैसा दे रहा है, उसमें क्या मिलाया जाएगा, इसका निर्णय भी उसकी राय के बिना होगा। लोकतंत्र में वोट आपका है, लेकिन पेट्रोल कैसा होगा, यह अधिकार आपका नहीं है।

कहा जा रहा है कि एथेनॉल से देश का विदेशी मुद्रा भंडार बचेगा। यह स्वागतयोग्य उद्देश्य है। लेकिन क्या हर राष्ट्रीय लक्ष्य नागरिक की जेब से ही पूरा होगा? यदि किसी नीति का आर्थिक लाभ है, तो उसके दुष्प्रभावों का ईमानदार आकलन भी होना चाहिए। यदि माइलेज घटता है, तो कितना? किन वाहनों पर? किन परिस्थितियों में? यदि कोई नुकसान नहीं है, तो स्वतंत्र और सार्वजनिक परीक्षणों से इसे सिद्ध करने में हिचक क्यों?

सरकार का तर्क है कि उद्योग जगत आश्वस्त है। यह सुनकर मुस्कुराने का मन करता है। जिन कंपनियों पर नीति लागू करनी है, उनसे ही प्रमाणपत्र भी ले लिया गया। यह वैसा ही है जैसे छात्र अपनी उत्तरपुस्तिका स्वयं जांचकर प्रथम श्रेणी घोषित कर दे और प्रधानाचार्य कहें—"देखिए, परिणाम पूरी तरह निष्पक्ष है।"

इस पूरे विवाद का सबसे दिलचस्प पक्ष भरोसे का है। किसी भी लोकतंत्र में सरकार की सबसे बड़ी पूंजी जनता का विश्वास होती है। लेकिन विश्वास आदेश से पैदा नहीं होता। वह पारदर्शिता, स्वतंत्र जांच और ईमानदार संवाद से बनता है। यदि लाखों वाहन मालिक यह कह रहे हैं कि उन्हें फर्क महसूस हो रहा है, तो सबसे आसान रास्ता यह नहीं कि उन्हें भ्रमित घोषित कर दिया जाए। सबसे उचित रास्ता यह है कि किसी स्वतंत्र और विश्वसनीय संस्था से व्यापक परीक्षण कराया जाए और उसके निष्कर्ष सार्वजनिक किए जाएं।

एथेनॉल की कहानी केवल माइलेज की नहीं है। यह खेती, पानी और पर्यावरण की भी कहानी है। यदि एथेनॉल का उत्पादन उन फसलों से बढ़ेगा जिनमें भारी मात्रा में सिंचाई की आवश्यकता होती है, तो यह प्रश्न पूछना असंगत नहीं कि आज हम विदेशी तेल बचा रहे हैं या कल का भूजल खर्च कर रहे हैं। राष्ट्रीय नीति का मूल्यांकन केवल तत्काल आर्थिक लाभ से नहीं, उसके दीर्घकालिक पर्यावरणीय प्रभावों से भी होना चाहिए।

दुर्भाग्य यह है कि पिछले कुछ वर्षों में नीति निर्माण का एक नया चलन विकसित हुआ है। पहले निर्णय होता है, फिर उसका प्रचार होता है और अंत में यदि जनता सवाल पूछे तो उसे बताया जाता है कि प्रश्न पूछना ही अनावश्यक है। मानो लोकतंत्र में नागरिक की भूमिका केवल ताली बजाने की रह गई हो।

परिवहन मंत्री ने चुनौती दी है कि कोई एक व्यक्ति सामने आए जिसकी गाड़ी को नुकसान हुआ हो। यह चुनौती सुनकर सोशल मीडिया शायद मुस्कुरा रहा होगा, क्योंकि वहां ऐसे अनेक अनुभव दर्ज हैं। व्यक्तिगत अनुभव वैज्ञानिक प्रमाण नहीं होते, लेकिन वे जांच का आधार अवश्य बन सकते हैं। यदि सरकार अपने निर्णय को लेकर इतनी ही आश्वस्त है, तो उसे स्वतंत्र परीक्षणों से डरना नहीं चाहिए। सच को प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं होती; प्रमाणपत्र की आवश्यकता केवल संदेह को होती है।

यह विवाद अंततः एथेनॉल का नहीं, शासन शैली का है। जनता को विश्वास में लेकर लागू की गई नीति और जनता पर थोपी गई नीति में वही अंतर है जो सलाह और आदेश में होता है। लोकतंत्र आदेश से नहीं, सहमति से चलता है।

सरकार यदि वास्तव में मानती है कि ई-20 भविष्य का ईंधन है, तो उसे सबसे पहले भविष्य जैसा आचरण भी दिखाना होगा—पारदर्शिता, स्वतंत्र परीक्षण, सार्वजनिक आंकड़े और आलोचना को सम्मान। अन्यथा यह आशंका बनी रहेगी कि पेट्रोल में केवल एथेनॉल ही नहीं मिलाया गया, बल्कि उसमें जनता के भरोसे की भी कुछ मात्रा घुल गई है। और भरोसा एक बार जल जाए, तो उसे किसी भी ईंधन से दोबारा नहीं चलाया जा सकता।

कैमरे की कलम: 'लोकतंत्र के माथे पर नकटी का मलबा'


लोकतंत्र की असली परीक्षा चुनाव जीतने में नहीं होती, बल्कि उस दिन होती है, जब सत्ता के सामने एक गरीब खड़ा होता है। जब एक ओर सरकार होती है और दूसरी ओर वह आदमी, जिसकी पूरी जिंदगी उसकी दो कमरों की झोपड़ी या पक्के मकान में सिमटी होती है। राजधानी रायपुर के नकटी गांव में 29 जून की सुबह जो कुछ हुआ, उसने सिर्फ दर्जनों मकानों को नहीं गिराया, बल्कि शासन, प्रशासन और राजनीति के संवेदनशील होने के दावों को भी मलबे में दबा दिया।

कहा गया कि यह सरकारी जमीन थी। कहा गया कि अतिक्रमण हटाया गया। कहा गया कि कानून अपना काम कर रहा था। लेकिन सवाल यह है कि क्या कानून का चेहरा हमेशा बुलडोजर ही होता है? क्या संविधान की आत्मा सिर्फ सरकारी फाइलों में रहती है, उन लोगों के जीवन में नहीं, जिनके सिर से एक ही दिन में छत छीन ली गई?

नकटी में टूटी सिर्फ दीवारें नहीं थीं। वहां बच्चों के सपने टूटे, बुजुर्गों की उम्रभर की जमा-पूंजी टूटी, महिलाओं का घर बसाने का संघर्ष टूटा। खुले आसमान के नीचे बिखरी स्टील की थालियां, स्कूल बैग, भगवान की तस्वीरें, शादी के एलबम और बिस्तर सिर्फ सामान नहीं थे, वे उन परिवारों की पूरी जिंदगी थे, जिन्हें कुछ घंटों में सड़क पर ला दिया गया। 

नकटी की तस्वीरें किसी प्राकृतिक आपदा की नहीं थीं। वहां न भूकंप आया था, न बाढ़ और न ही कोई युद्ध हुआ था। वहां यह सब लोकतांत्रिक सरकार के आदेश पर हुआ। फर्क सिर्फ इतना है कि किसी विदेशी सेना की जगह बुलडोजर पर सरकारी मोहर लगी हुई थी।

विडंबना देखिए। जिन लोगों को सरकार वर्षों तक नागरिक मानती रही, उन्हें बिजली का कनेक्शन दिया गया, पानी की सुविधा दी गई, राशन कार्ड दिए गए, प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ मिला, उन्हीं लोगों को अचानक एक दिन यह बता दिया गया कि वे अवैध हैं। यदि वे वास्तव में अवैध कब्जाधारी थे तो आखिर इतने वर्षों तक पूरा सरकारी तंत्र क्या कर रहा था? क्या बिजली विभाग अवैध था? क्या जल विभाग अवैध था? क्या प्रधानमंत्री आवास योजना अवैध थी? या फिर आज की कार्रवाई सवालों से बचने के लिए कानून का सुविधाजनक इस्तेमाल भर है? सरकार के पास इस प्रश्न का अब तक कोई स्पष्ट उत्तर नहीं है।

सबसे पीड़ादायक बात यह नहीं कि मकान टूटे। सबसे पीड़ादायक बात यह है कि यह सब मानसून की दहलीज पर हुआ। जब बादल बरसने को तैयार हैं, तब सैकड़ों लोग अपने ही घरों के मलबे पर बैठकर यह सोच रहे हैं कि अगली बारिश में उनके बच्चों का सिर कहां छिपेगा। प्रशासन के लिए यह एक फाइल का निस्तारण होगा, लेकिन उन परिवारों के लिए यह जीवनभर न भरने वाला घाव है।

प्रशासन कहता है कि पुनर्वास किया जा रहा है। लेकिन यदि पुनर्वास इतना ही उत्कृष्ट था तो लोग सड़कों पर प्रदर्शन क्यों कर रहे हैं? वे कलेक्टोरेट क्यों पहुंचे? मंत्री के बंगले के बाहर क्यों बैठे? मुख्यमंत्री निवास तक क्यों गए? क्या कोई परिवार सिर्फ राजनीति करने के लिए अपने टूटे हुए घर के मलबे पर बैठा रहता है?

सरकार कहती है कि सब कुछ कानून के मुताबिक हुआ। लेकिन लोकतंत्र केवल कानून से नहीं चलता, संवेदना से भी चलता है। कानून सरकार को अतिक्रमण हटाने का अधिकार देता है, लेकिन क्या वह सरकार को संवेदनहीन होने का भी अधिकार देता है? क्या पुनर्वास पूरा होने से पहले लोगों को बेघर करना प्रशासनिक सफलता कहलाएगा? 

सबसे दुखद दृश्य वे बच्चे थे जो अपने टूटे हुए घरों के बीच अपना स्कूल बैग खोज रहे थे। उन्हें कानून नहीं मालूम। उन्हें भू-राजस्व संहिता की धारा 248 नहीं पता। वे सिर्फ इतना जानते हैं कि कल तक उनका घर था, आज नहीं है।

इस पूरे घटनाक्रम में सरकार की राजनीतिक कार्यशैली भी कई सवाल खड़े करती है। जिन जनप्रतिनिधियों का पहला कर्तव्य जनता का विश्वास जीतना और उसे बनाए रखना होता है, वे इस पूरे मामले में या तो चुप दिखाई दिए या फिर सरकारी निर्णयों के पक्ष में खड़े नजर आए। सत्ता का दायित्व सिर्फ सरकारी आदेशों का बचाव करना नहीं होता, बल्कि जनता और सरकार के बीच पुल बनने का भी होता है। लेकिन नकटी में यह पुल कहीं दिखाई नहीं दिया।

सबसे अधिक चर्चा भाजपा सांसद बृजमोहन अग्रवाल के बयान की हुई। प्रभावित परिवारों का दावा है कि कार्रवाई से पहले उन्होंने भरोसा दिलाया था कि किसी का घर नहीं टूटेगा। लेकिन जब बुलडोजर चल गए, तब उन्होंने जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग कर दी। सवाल यह है कि यदि उन्हें कार्रवाई की जानकारी नहीं थी, तो यह सरकार और संगठन के बीच संवादहीनता का संकेत है। और यदि जानकारी थी, तो फिर लोगों को आश्वासन क्यों दिया गया? दोनों ही स्थितियां चिंताजनक हैं।

क्षेत्रीय विधायक अनुज शर्मा की भूमिका भी कठघरे में है। लोकतंत्र में विधायक सिर्फ विधानसभा में बैठने के लिए नहीं चुने जाते। वे जनता की आवाज होते हैं। यदि उनके क्षेत्र के लोग खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं, यदि उनके बयान लोगों के आक्रोश का कारण बन रहे हैं, तो यह केवल राजनीतिक असहमति नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व के संकट का संकेत है।

सरकार के मंत्रियों ने दावा किया कि किसी के साथ अन्याय नहीं हुआ और पुनर्वास उत्कृष्ट है। लेकिन शासन की उत्कृष्टता का प्रमाण प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं होती, बल्कि वह संतोष होता है जो प्रभावित लोगों के चेहरों पर दिखाई देता है। यदि पुनर्वास वास्तव में इतना बेहतर है तो फिर लोग उसे स्वीकार करने में हिचक क्यों रहे हैं? यह सवाल सरकार को स्वयं से पूछना चाहिए।

इस पूरे मामले में प्रशासन की भूमिका सबसे अधिक कठोर दिखाई देती है। प्रशासन कानून लागू करने वाली संस्था है, लेकिन उसका चरित्र मानवीय भी होना चाहिए। बुलडोजर चलाने से पहले यह सुनिश्चित करना कि प्रत्येक परिवार सम्मानपूर्वक पुनर्वासित हो चुका है, शायद किसी कानून में अनिवार्य न लिखा हो, लेकिन सुशासन का यही मूल सिद्धांत है।

एक और सवाल लगातार पीछा करता है। यदि यह जमीन वर्षों से सरकारी थी तो कार्रवाई ठीक उसी समय क्यों हुई, जब वहां विधायक कॉलोनी बनाने की योजना सामने आई? क्या सरकारी जमीन केवल तब याद आती है, जब उस पर कोई बड़ी परियोजना प्रस्तावित होती है? यदि अतिक्रमण इतना ही गंभीर था तो दशकों तक प्रशासन की आंखें क्यों बंद रहीं? 

नकटी की घटना सरकार के लिए चेतावनी है। सत्ता यह भूल रही है कि जनता केवल वोट नहीं देती, याद भी रखती है। जिन बच्चों ने अपने घर टूटते देखे हैं, वे बड़े होकर शायद यह भूल जाएं कि बुलडोजर किस कंपनी का था, लेकिन यह कभी नहीं भूलेंगे कि वह किस सरकार के आदेश पर आया था।

सरकारें विकास करती हैं। उन्हें सड़कें बनानी हैं, अस्पताल बनाने हैं, कॉलोनियां भी बनानी हैं। लेकिन विकास का अर्थ केवल सीमेंट और कंक्रीट नहीं होता। विकास का सबसे बड़ा पैमाना यह होता है कि उसके कारण सबसे कमजोर व्यक्ति कितना सुरक्षित महसूस करता है।

नकटी की घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हमारे यहां विकास की परिभाषा में गरीब की गरिमा के लिए कोई स्थान बचा है? क्या योजनाओं की सफलता का पैमाना सिर्फ समय पर परियोजना पूरी करना है या यह भी देखना चाहिए कि उसके लिए कितने लोगों की जिंदगी उजड़ गई?

लोकतंत्र की ताकत बुलडोजर की ताकत से कहीं बड़ी होती है। बुलडोजर दीवारें गिरा सकता है, लेकिन जनता का विश्वास टूट जाए तो उसे दोबारा खड़ा करना सबसे कठिन होता है। नकटी के लोग शायद कुछ वर्षों बाद नए मकानों में बस जाएंगे। लेकिन उनके बच्चों की स्मृतियों में हमेशा यह दर्ज रहेगा कि एक सुबह सरकार आई थी और उनका घर ले गई थी।

सरकारों को यह नहीं भूलना चाहिए कि सत्ता का सबसे बड़ा आभूषण संवेदनशीलता है। कानून का पालन आवश्यक है, लेकिन कानून की आत्मा करुणा है। यदि विकास की कीमत किसी परिवार के सिर से छत छिन जाना है, यदि पुनर्वास बाद में और बुलडोजर पहले आता है, तो इतिहास उसे विकास नहीं, बल्कि प्रशासनिक असंवेदनशीलता के उदाहरण के रूप में याद रखेगा।

मलबे के ढेर में तब्दील नकटी आज केवल एक गांव नहीं है। वह एक आईना है, जिसमें सरकार, प्रशासन और राजनीति—तीनों अपना चेहरा देख सकते हैं। प्रश्न केवल इतना है कि क्या उनमें उस आईने में झांकने का साहस है?

कैमरे की कलम: भवन बन गया, अस्पताल कब बनेगा?

सरकारें अक्सर विकास को ईंट, सीमेंट और कंक्रीट से मापती हैं। जनता विकास को अपने जीवन से मापती है। सरकार के लिए अस्पताल का उद्घाटन एक उपलब्धि हो सकता है, लेकिन एक गरीब मरीज के लिए अस्पताल तभी अस्तित्व में आता है जब वहां डॉक्टर हों, मशीनें चलती हों, आईसीयू तैयार हो, ऑक्सीजन उपलब्ध हो और इलाज बिना भटकाव के मिल जाए। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर के कोनी का मल्टी सुपर स्पेशलिटी अस्पताल आज इसी विडंबना का सबसे बड़ा प्रतीक बनकर खड़ा है। चिकित्सा व्यवस्था को लेकर खड़े हुए गंभीर संकट पर कांग्रेस नेता विजय केशरवानी ने सरकार को कटघरे में खड़ा किया है, उन्होंने सराकर से ये भी सवाल पूछा है कि कहीं जगदलपुर की तरह बिलासपुर के स्वर्गीय दिलीप सिंह जूदेव मल्टी सुपर स्पेशलिटी अस्पताल को कहीं निजी हाथों में सौंपने की तैयारी तो नहीं है।      

एक भव्य भवन है। करोड़ों रुपये की लागत है। प्रधानमंत्री के हाथों लोकार्पण है। मुख्यमंत्री का निरीक्षण है। सरकारी विज्ञापनों में उपलब्धियों की लंबी सूची है। लेकिन यदि किसी हार्ट अटैक के मरीज को वहां से दूसरे अस्पताल रेफर कर दिया जाए, यदि किडनी या ब्रेन से जुड़ा गंभीर मरीज इलाज के बजाय केवल कागजी प्रक्रिया का हिस्सा बन जाए, तो फिर यह सवाल पूछना जनता का अधिकार है कि आखिर यह अस्पताल है या केवल उद्घाटन का स्मारक? आज राजनीति का सबसे बड़ा संकट यही है कि सरकारें उद्घाटन को उपलब्धि मान लेती हैं, संचालन को नहीं।

देश में पिछले कुछ वर्षों में एक नई राजनीतिक संस्कृति विकसित हुई है। किसी भी परियोजना का शिलान्यास हो जाए, लोकार्पण हो जाए, फोटो खिंच जाए, मंच सज जाए और सोशल मीडिया पर वीडियो चल जाए, तो मान लिया जाता है कि जनता का काम पूरा हो गया। जबकि असली परीक्षा उसके बाद शुरू होती है। दुर्भाग्य यह है कि वही परीक्षा सबसे ज्यादा उपेक्षित रहती है।

एक सुपर स्पेशलिटी अस्पताल केवल दीवारों का नाम नहीं होता। वह विशेषज्ञ डॉक्टरों, प्रशिक्षित नर्सों, आधुनिक मशीनों, कैथ लैब, आईसीयू, ऑक्सीजन प्लांट, ब्लड बैंक, इमरजेंसी सेवाओं और चौबीसों घंटे चलने वाली स्वास्थ्य व्यवस्था का नाम है। यदि इनमें से अधिकांश सुविधाएं अनुपस्थित हों तो भवन चाहे कितना भी भव्य हो, वह जनता के लिए केवल एक प्रतीक्षा कक्ष बनकर रह जाता है।

विडंबना यह है कि जब अस्पताल का उद्घाटन हुआ था तब जनता को भरोसा दिलाया गया था कि अब बिलासपुर संभाग के लोगों को रायपुर, नागपुर, हैदराबाद या दिल्ली की ओर नहीं भागना पड़ेगा। गरीब किसान, मजदूर और मध्यम वर्ग के परिवारों को अपने शहर में ही आधुनिक इलाज मिलेगा। लेकिन यदि आज भी गंभीर मरीजों को दूसरे अस्पतालों में रेफर करना पड़ रहा है तो जाहिर है कि भरोसे और हकीकत के बीच की दूरी बहुत बड़ी है।

यह प्रश्न किसी एक दल का नहीं है। यह प्रश्न उस व्यवस्था का है जिसमें भवन तैयार होते ही सरकारें अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेती हैं। स्वास्थ्य जैसी संवेदनशील व्यवस्था में केवल निर्माण कार्य पूरा होना सफलता नहीं कहलाता। सफलता तब है जब एक मरीज अस्पताल से स्वस्थ होकर अपने घर लौटे।

सरकार को यह भी समझना होगा कि स्वास्थ्य सेवा चुनावी भाषणों का विषय नहीं है। यहां किसी भी प्रकार की लापरवाही सीधे इंसानी जिंदगी पर असर डालती है। एक सड़क देर से बने तो असुविधा होती है, लेकिन अस्पताल अधूरा रहे तो किसी की जान जा सकती है। इसलिए स्वास्थ्य परियोजनाओं का मूल्यांकन फीता काटने से नहीं बल्कि बची हुई जिंदगियों से होना चाहिए।

और यह समस्या केवल कोनी अस्पताल तक सीमित नहीं है। प्रदेश के अधिकांश सरकारी अस्पतालों की तस्वीर लगभग यही है। कहीं डॉक्टर नहीं हैं, कहीं विशेषज्ञ नहीं हैं, कहीं मशीनें धूल खा रही हैं, कहीं करोड़ों की लागत से खरीदे गए उपकरण ऑपरेटर के अभाव में बंद पड़े हैं। कई अस्पतालों में भवन पहले बन जाते हैं, स्टाफ वर्षों बाद आता है। कहीं स्टाफ है तो दवाइयां नहीं हैं। कहीं दवाइयां हैं तो जांच की सुविधा नहीं। व्यवस्था का यह बिखराव अब सामान्य बात मान लिया गया है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि स्वास्थ्य सेवाओं में स्थायी नियुक्तियों के बजाय संविदा और अस्थायी व्यवस्थाओं पर निर्भरता लगातार बढ़ती जा रही है। डॉक्टरों, नर्सों और तकनीकी कर्मचारियों की कमी का समाधान लंबे समय की योजना से होना चाहिए, न कि अस्थायी नियुक्तियों के सहारे। जब व्यवस्था अस्थायी होगी तो सेवा भी अस्थायी ही दिखाई देगी।

सरकारें अक्सर यह तर्क देती हैं कि संसाधनों की कमी है। लेकिन जनता यह पूछने लगी है कि यदि संसाधन नहीं थे तो उद्घाटन किस बात का किया गया? यदि कैथ लैब तैयार नहीं थी, ऑक्सीजन प्लांट चालू नहीं था, आईसीयू पूर्ण रूप से संचालित नहीं था और विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध नहीं थे तो फिर जनता के सामने यह संदेश क्यों दिया गया कि अस्पताल पूरी तरह तैयार है? लोकतंत्र में प्रचार और वास्तविकता के बीच का अंतर जितना बढ़ता है, जनता का विश्वास उतना ही कम होता जाता है।

यह भी सच है कि किसी भी नई स्वास्थ्य परियोजना को पूरी तरह संचालित होने में समय लगता है। विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियुक्ति, उपकरणों की स्थापना और तकनीकी प्रक्रियाएं एक दिन में पूरी नहीं होतीं। लेकिन यदि उद्घाटन के लंबे समय बाद भी आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध न हों तो सवाल उठना स्वाभाविक है। ऐसे सवालों का जवाब विरोधियों को नहीं, सरकार को देना चाहिए।

स्वास्थ्य व्यवस्था में जवाबदेही सबसे महत्वपूर्ण तत्व है। जनता को यह जानने का अधिकार है कि अस्पताल की कौन-कौन सी सुविधाएं चालू हैं, कौन सी लंबित हैं, डॉक्टरों के कितने पद स्वीकृत हैं, कितने भरे गए हैं और शेष कब तक भरे जाएंगे। पारदर्शिता ही विश्वास पैदा करती है, प्रचार नहीं।

दुर्भाग्य यह है कि आज राजनीति में उपलब्धियों की सूची लंबी होती जा रही है, लेकिन जनता के अनुभव उससे मेल नहीं खाते। सरकारी दावों में सब कुछ उत्कृष्ट दिखाई देता है, जबकि अस्पतालों की कतारों में खड़े मरीज कुछ और कहानी कहते हैं। विज्ञापन बताते हैं कि स्वास्थ्य सेवाएं सुदृढ़ हैं, लेकिन एंबुलेंस का इंतजार करता परिवार उस दावे पर विश्वास नहीं कर पाता।

सरकार किसी भी दल की हो, उसे यह स्वीकार करना होगा कि स्वास्थ्य क्षेत्र में आधे-अधूरे काम सबसे खतरनाक होते हैं। अस्पतालों का निर्माण अंतिम लक्ष्य नहीं, बल्कि पहला कदम है। उसके बाद शुरू होती है असली जिम्मेदारी—योग्य मानव संसाधन, आधुनिक तकनीक, पर्याप्त दवाइयां, प्रभावी प्रबंधन और सतत निगरानी।

कोनी अस्पताल का मुद्दा केवल एक अस्पताल का मुद्दा नहीं है। यह उस सोच का आईना है जिसमें उपलब्धि का अर्थ उद्घाटन समारोह बन गया है। यदि यही प्रवृत्ति जारी रही तो प्रदेश में ऐसे कई अस्पताल होंगे जिनकी इमारतें चमकेंगी, लेकिन मरीजों की उम्मीदें बुझती रहेंगी।

आखिर में सवाल केवल सरकार से नहीं, पूरे प्रशासनिक तंत्र से है—क्या हम अस्पताल इसलिए बनाते हैं कि वहां रिबन कट सके, या इसलिए कि वहां जिंदगी बचाई जा सके? जब तक इस प्रश्न का ईमानदार उत्तर नहीं मिलेगा, तब तक करोड़ों की इमारतें बनती रहेंगी, उद्घाटन होते रहेंगे, भाषण गूंजते रहेंगे, लेकिन गरीब मरीज इलाज की तलाश में एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल तक भटकता रहेगा और तब इतिहास यह नहीं पूछेगा कि कितने अस्पताल बने थे। इतिहास यह पूछेगा कि उन अस्पतालों में कितनी जिंदगियां बचाई गई थीं।

कैमरे की कलम: 'स्त्री नहीं, सोच कटघरे में'


छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले के पटना थाना क्षेत्र में सामने आई घटना ने केवल कानून-व्यवस्था पर नहीं, बल्कि पूरे समाज की चेतना पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। एक पति ने अपनी पत्नी के चरित्र पर संदेह के कारण जिस तरह की अमानवीय बर्बरता की, वह किसी सभ्य समाज की कल्पना से भी परे है। महिला को बेरहमी से पीटना, उसके हाथ-पैर बांध देना, उसका मुंडन कर देना, चेहरे पर कालिख पोतना, जबरन पेशाब पिलाना और इतना ही नहीं, मासूम बच्चों से भी उसकी गरिमा को तार-तार कराने का प्रयास करना केवल एक अपराध नहीं, बल्कि मनुष्यता की हत्या है।

पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है। कानून अपना काम करेगा। अदालतें फैसला सुनाएँगी। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या केवल गिरफ्तारी से ऐसे अपराध रुक जाएंगे? क्या हर बार अपराध होने के बाद गिरफ्तारी और जेल ही समाज को सुरक्षित बना पाएंगे? यदि ऐसा होता, तो घरेलू हिंसा, दहेज हत्या, बलात्कार, ऑनर किलिंग और महिलाओं पर अत्याचार की घटनाएँ आज इतिहास बन चुकी होतीं। दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ। इसका अर्थ स्पष्ट है कि समस्या अपराधी से कहीं अधिक उस सोच की है जो ऐसे अपराधों को जन्म देती है।

आज भारत चंद्रमा पर पहुँच चुका है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल क्रांति की बातें हो रही हैं, लेकिन समाज का एक बड़ा वर्ग आज भी मानसिक रूप से सदियों पीछे खड़ा दिखाई देता है। विज्ञान आधुनिक हो गया, लेकिन सोच मध्ययुगीन बनी हुई है। मोबाइल फोन स्मार्ट हो गए, लेकिन दिमाग अब भी संकीर्णता के पुराने सॉफ़्टवेयर पर चल रहे हैं।

सबसे विडंबनापूर्ण बात यह है कि जिस पुरुष को समाज "घर का मुखिया" कहकर सम्मान देता है, वही कई बार अपने घर की महिला के सम्मान का सबसे बड़ा दुश्मन बन जाता है। पत्नी को जीवनसंगिनी नहीं, बल्कि अपनी निजी संपत्ति मानने की प्रवृत्ति आज भी समाज के एक बड़े हिस्से में मौजूद है। यह सोच मानती है कि पत्नी की हँसी, उसके रिश्ते, उसका आना-जाना, उसका पहनावा, उसकी स्वतंत्रता और यहाँ तक कि उसकी साँसों पर भी पति का अधिकार है। यदि वह इस अधिकार को चुनौती देती दिखाई दे, तो उसे अपमानित करना, पीटना या प्रताड़ित करना जैसे पति का जन्मसिद्ध अधिकार हो।

दरअसल, चरित्र पर संदेह अधिकांश मामलों में महिला के व्यवहार से अधिक पुरुष की मानसिक असुरक्षा का परिणाम होता है। जो व्यक्ति स्वयं पर विश्वास नहीं करता, जो अपने रिश्ते को विश्वास की नींव पर खड़ा नहीं कर पाता, वही शक की दीवारें खड़ी करता है। शक प्रेम का प्रमाण नहीं, बल्कि असुरक्षा, स्वामित्व और अहंकार का दूसरा नाम है।

समाज में एक विचित्र विरोधाभास भी दिखाई देता है। पुरुष स्वयं अपने लिए हर प्रकार की स्वतंत्रता चाहता है। मित्रता करे तो आधुनिकता, देर रात बाहर रहे तो काम की मजबूरी, किसी से बात करे तो सामाजिक व्यवहार; लेकिन यदि पत्नी किसी से सामान्य बातचीत भी कर ले, तो उसके चरित्र पर प्रश्नचिह्न लगा दिया जाता है। यह दोहरा मापदंड केवल महिलाओं का नहीं, बल्कि पूरे समाज का अपमान है।

और यह पहली घटना नहीं है। लगभग हर सप्ताह देश के किसी न किसी हिस्से से ऐसी खबरें सामने आती हैं जहाँ पति ने शक के आधार पर पत्नी की हत्या कर दी, तेजाब फेंक दिया, सार्वजनिक रूप से अपमानित किया या उसे आत्महत्या के लिए मजबूर कर दिया। हर बार समाज कुछ दिनों तक आक्रोश व्यक्त करता है, मीडिया बहस करता है, पुलिस गिरफ्तारी करती है और फिर सब कुछ सामान्य हो जाता है। अगले अपराध तक।

इस घटना का सबसे भयावह पक्ष वह है, जिसमें बच्चों को भी इस अपराध का सहभागी बनाया गया। सोचिए, जिन बच्चों के लिए माँ संसार की पहली गुरु होती है, उन्हीं बच्चों के सामने उसकी गरिमा को कुचला गया। इससे बड़ा मानसिक अपराध और क्या हो सकता है? ऐसे बच्चे बड़े होकर क्या सीखेंगे? वे सम्मान सीखेंगे या हिंसा? वे समानता समझेंगे या प्रभुत्व? वे प्रेम करेंगे या अपमान?

समाजशास्त्री वर्षों से कहते रहे हैं कि हिंसा सीखी जाती है। कोई भी बच्चा हिंसक पैदा नहीं होता। वह अपने घर, अपने परिवेश और अपने अनुभवों से सीखता है। यदि घर में माँ का सम्मान नहीं होगा, तो समाज में किसी महिला का सम्मान कैसे होगा?

विडंबना यह भी है कि हमारे समाज में बेटी बचाने की बात तो खूब होती है, लेकिन बेटे को संस्कार देने की चर्चा बहुत कम होती है। बेटी को बचाना आवश्यक है, लेकिन उससे कहीं अधिक आवश्यक है बेटे को यह सिखाना कि स्त्री कोई वस्तु नहीं, कोई संपत्ति नहीं, कोई गुलाम नहीं; वह एक स्वतंत्र व्यक्तित्व है, जिसके अपने अधिकार, अपनी गरिमा और अपनी इच्छाएँ हैं।

शिक्षा केवल डिग्री देने का माध्यम नहीं होनी चाहिए। यदि कोई व्यक्ति उच्च शिक्षित होकर भी अपनी पत्नी को सार्वजनिक रूप से अपमानित करता है, तो उसकी डिग्री समाज के लिए किसी काम की नहीं। वास्तविक शिक्षा वह है जो व्यक्ति को संवेदनशील बनाए, बराबरी का सम्मान करना सिखाए और संबंधों में विश्वास का मूल्य समझाए।

दुर्भाग्य यह भी है कि हमारे समाज में पुरुषों को बचपन से ही एक झूठी श्रेष्ठता का पाठ पढ़ाया जाता है। "लड़के रोते नहीं", "घर की इज्जत तुम्हारे हाथ में है", "औरत को काबू में रखना पड़ता है"—ऐसी बातें मज़ाक या परंपरा के नाम पर पीढ़ी-दर-पीढ़ी दोहराई जाती हैं। यही कथन आगे चलकर हिंसा का आधार बन जाते हैं। जब पुरुष यह मानने लगता है कि नियंत्रण उसका अधिकार है, तब असहमति उसे विद्रोह लगने लगती है और विद्रोह का उत्तर वह हिंसा से देने लगता है।

कानून की भूमिका भी यहाँ अत्यंत महत्वपूर्ण है। गिरफ्तारी आवश्यक है, लेकिन पर्याप्त नहीं। ऐसे मामलों में त्वरित सुनवाई, कठोर दंड और पीड़िता के पुनर्वास की मजबूत व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी है। केवल अपराधी को जेल भेज देना समाधान नहीं है। पीड़ित महिला को सामाजिक सुरक्षा, मनोवैज्ञानिक सहायता, आर्थिक संबल और न्याय की वास्तविक अनुभूति भी मिलनी चाहिए।

साथ ही पुलिस और प्रशासन को घरेलू हिंसा को "पति-पत्नी का निजी मामला" मानने की पुरानी सोच से बाहर निकलना होगा। घरेलू हिंसा निजी नहीं, सामाजिक अपराध है। जब घर की चारदीवारी के भीतर किसी महिला की गरिमा कुचली जाती है, तब पूरा समाज असफल होता है।

मीडिया की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। ऐसी घटनाओं को केवल सनसनीखेज शीर्षकों तक सीमित कर देना पर्याप्त नहीं। मीडिया को समाज में संवाद पैदा करना होगा। विद्यालयों, महाविद्यालयों, पंचायतों और सामाजिक संगठनों को भी इस विषय पर खुलकर चर्चा करनी होगी। महिलाओं के सम्मान की शिक्षा केवल महिला दिवस के भाषणों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।

आज आवश्यकता पुरुष विरोध की नहीं, बल्कि पुरुष मानसिकता के सुधार की है। सभी पुरुष एक जैसे नहीं होते। असंख्य पुरुष अपनी पत्नी, बहन, माँ और बेटियों का सम्मान करते हैं। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि समाज के भीतर एक ऐसा वर्ग मौजूद है, जो अपनी कुंठा, असुरक्षा और अहंकार को पुरुषत्व समझ बैठा है। यही वर्ग पूरे पुरुष समाज की छवि को धूमिल करता है। इसलिए संवेदनशील पुरुषों की भी जिम्मेदारी है कि वे ऐसी मानसिकता का खुलकर विरोध करें। मौन समर्थन भी अपराध को शक्ति देता है।

यह भी समझना होगा कि सम्मान किसी रिश्ते की भीख नहीं होता। सम्मान अधिकार है। विश्वास किसी विवाह का सबसे मजबूत स्तंभ है। जहाँ विश्वास समाप्त हो जाता है, वहाँ विवाह केवल सामाजिक समझौता बनकर रह जाता है। और जहाँ अहंकार प्रेम से बड़ा हो जाए, वहाँ हिंसा जन्म लेती है।

सवाल केवल कोरिया का नहीं है। सवाल पूरे समाज का है। यदि आज भी किसी पुरुष को लगता है कि वह पत्नी का मुंडन कर सकता है, उसे नंगा कर सकता है, उसे अपमानित कर सकता है, तो दोष केवल उस व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस सामाजिक व्यवस्था का भी है जिसने उसे यह विश्वास दिलाया कि वह ऐसा कर सकता है।

आज समय की मांग है कि हम केवल कानून बदलने की बात न करें, बल्कि सोच बदलने का राष्ट्रीय अभियान चलाएँ। स्कूलों में लैंगिक समानता पढ़ाई जाए। परिवारों में बेटियों और बेटों के लिए समान नियम हों। धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक नेतृत्व भी स्पष्ट संदेश दे कि स्त्री का अपमान किसी संस्कृति, किसी परंपरा और किसी धर्म का हिस्सा नहीं हो सकता।

सभ्यता की पहचान ऊँची इमारतों, चौड़ी सड़कों और आधुनिक तकनीक से नहीं होती। सभ्यता का वास्तविक पैमाना यह है कि वहाँ महिलाओं के साथ कैसा व्यवहार होता है। यदि किसी समाज में स्त्री आज भी शक के नाम पर अपमानित, प्रताड़ित और अमानवीय यातनाओं की शिकार हो रही है, तो उस समाज को स्वयं को विकसित कहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।

कोरिया की यह घटना एक चेतावनी है। यह केवल पुलिस की फाइल का मामला नहीं, बल्कि समाज के आत्ममंथन का अवसर है। आरोपी की गिरफ्तारी आवश्यक थी और उसका कठोर दंड भी आवश्यक है, किंतु उससे कहीं अधिक आवश्यक है उस सोच को कठघरे में खड़ा करना, जो स्त्री को इंसान नहीं, पुरुष की जागीर समझती है।

कानून अपराधी को सजा दे सकता है, लेकिन समाज ही मानसिकता बदल सकता है। जिस दिन हर परिवार अपने बेटे को यह सिखा देगा कि पत्नी पर अधिकार नहीं, सम्मान होता है; संदेह नहीं, विश्वास होता है; और पुरुषत्व का अर्थ हिंसा नहीं, संवेदनशीलता है—उसी दिन ऐसी खबरें अखबारों की सुर्खियाँ नहीं, इतिहास के काले पन्ने बन जाएँगी।

कैमरे की कलम: "आईना तोड़ो, व्यवस्था बचाओ"

बिलासपुर में एक वीडियो वायरल हुआ। वीडियो में एक पुलिसकर्मी थाने के भीतर जमीन पर लेटा दिखाई देता है। आसपास कुछ शराब की बोतलें भी नजर आती हैं। वीडियो की सत्यता क्या है, उसमें दिख रहा दृश्य किस परिस्थिति का है, उसे किसने रिकॉर्ड किया और किसने वायरल किया—ये सब जांच का विषय हैं। होना भी चाहिए। किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले तथ्यों की पड़ताल आवश्यक है लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बाद जो सबसे दिलचस्प दृश्य सामने आया, वह वीडियो में नहीं बल्कि उसके बाद की प्रतिक्रिया में था।

जिले के पुलिस कप्तान ने कड़े शब्दों में कहा कि यदि कोई व्यक्ति लाइक, कमेंट्स और व्यूअरशिप बढ़ाने के लिए फर्जी वीडियो बनाएगा या बिना प्रमाणिकता के वायरल करेगा तो उसके खिलाफ अपराध दर्ज किया जाएगा। यह बात बिल्कुल उचित है। झूठ फैलाना, किसी की छवि खराब करना और सोशल मीडिया को अफवाहों का अखाड़ा बनाना किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं हो सकता। मगर समस्या यह है कि हमारे यहां अक्सर अपराध की परिभाषा घटना से नहीं, व्यक्ति से तय होती दिखाई देती है।  

इतिहास बताता है कि संस्थाएँ आईना तोड़कर नहीं, आईने में दिख रही खामियों को सुधारकर मजबूत होती हैं। क्योंकि अंततः किसी भी लोकतंत्र में सबसे बड़ा अपराध सच दिखाना नहीं, सच से आँख चुराना होता है।

यही कारण है कि इस मामले में सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं बन पाया कि वीडियो में क्या है, बल्कि यह बन गया कि वीडियो किसने बनाया। यानी अगर किसी थाने के भीतर कुछ असामान्य दिख रहा है तो उससे ज्यादा गंभीर विषय यह है कि किसी ने उसे रिकॉर्ड कैसे कर लिया। यह वही मानसिकता है जिसमें दीवार पर उभरी सीलन से ज्यादा गुस्सा उस आदमी पर आता है जिसने सीलन की तस्वीर खींच ली।

विडंबना यह है कि यही व्यवस्था वर्षों से जनता से अपील करती रही है कि कहीं अपराध दिखे, भ्रष्टाचार दिखे, अवैध वसूली दिखे, सार्वजनिक व्यवस्था का उल्लंघन दिखे तो वीडियो बनाइए, सबूत दीजिए, शिकायत कीजिए। लेकिन जैसे ही कैमरे का कोण व्यवस्था की ओर घूम जाता है, अचानक कैमरा संदिग्ध हो जाता है और रिकॉर्डिंग अपराध के करीब पहुंच जाती है। ऐसा लगता है मानो समस्या बीमारी नहीं, एक्स-रे मशीन हो। हमारे यहां कानून की एक बड़ी खूबी यह है कि वह सबके लिए समान बताया जाता है और उसकी सबसे बड़ी विडंबना भी यही है कि व्यवहार में वह सबके लिए समान दिखाई नहीं देता।

यदि कोई सामान्य नागरिक सार्वजनिक स्थान पर शराब के नशे में मिलता है तो उसके वीडियो सोशल मीडिया पर घंटों घूमते रहते हैं। लोग उसे नैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं, पुलिस उसे कानून का पाठ पढ़ाती है और समाज उसे संस्कारों का पाठ पढ़ाता है। लेकिन जब चर्चा में कोई सफेदपोश या वर्दीधारी आता है तो अचानक निजता, प्रतिष्ठा, गरिमा और प्रक्रिया जैसे शब्द शब्दकोश से निकलकर प्रेस कॉन्फ्रेंस की मेज पर सज जाते हैं।

ऐसा नहीं है कि पुलिसकर्मी को गरिमा का अधिकार नहीं है, बिल्कुल है। बल्कि उतना ही है जितना किसी आम नागरिक को है लेकिन प्रश्न यह है कि क्या यह अधिकार सभी को समान रूप से मिलता है? यदि हां, तो फिर आम आदमी की गरिमा की रक्षा के समय यही तीखापन अक्सर दिखाई क्यों नहीं देता? दरअसल समस्या वीडियो नहीं है। समस्या वह असहजता है जो वीडियो पैदा करता है। आईना हमेशा सुंदर चेहरा नहीं दिखाता। कभी-कभी वह चेहरे पर जमी धूल भी दिखाता है। और इतिहास गवाह है कि धूल साफ करने की तुलना में आईना तोड़ना हमेशा आसान काम रहा है।

पुलिस महकमा भी आखिर इसी समाज का हिस्सा है। वहां भी अच्छे लोग हैं, ईमानदार लोग हैं, कर्तव्यनिष्ठ लोग हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जहां शक्ति होती है, वहां जवाबदेही की आवश्यकता और बढ़ जाती है। क्योंकि जनता पुलिस को केवल एक कर्मचारी के रूप में नहीं देखती। वह उसे कानून के प्रतिनिधि के रूप में देखती है।

यही वजह है कि पुलिसकर्मी की छोटी गलती भी बड़ी खबर बन जाती है लेकिन यहां एक और रोचक प्रवृत्ति देखने को मिलती है। जब कोई नागरिक पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाता है तो उसे कानून समझाया जाता है। जब कोई पत्रकार सवाल उठाता है तो उसे जिम्मेदारी समझाई जाती है। जब कोई सामाजिक कार्यकर्ता सवाल उठाता है तो उसे प्रक्रिया समझाई जाती है। और जब सोशल मीडिया सवाल उठाता है तो उसे आईटी एक्ट समझाया जाता है। कुल मिलाकर हर सवाल पूछने वाले के लिए कोई न कोई धारा तैयार रहती है। सवालों के जवाब कभी-कभी तैयार नहीं होते। 

"लोकतंत्र में कैमरा अपराधी नहीं होता, वह केवल घटनाओं का दस्तावेज़ होता है। यदि कोई वीडियो फर्जी है तो उस पर कार्रवाई होना स्वाभाविक है"

यहां यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि फर्जी वीडियो बनाना अपराध है और होना भी चाहिए। किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा से खिलवाड़ की अनुमति नहीं दी जा सकती। लेकिन उसी सांस में यह भी उतना ही जरूरी है कि हर असुविधाजनक वीडियो को "फर्जी", "भ्रामक" या "वायरल गैंग" की श्रेणी में डाल देने की प्रवृत्ति से बचा जाए क्योंकि अगर हर असहज करने वाला तथ्य फर्जी घोषित कर दिया जाएगा तो फिर सत्य की पहचान कौन करेगा?

आज सोशल मीडिया का दौर है। यहां अफवाहें भी दौड़ती हैं और सच्चाइयां भी। चुनौती यह है कि दोनों के बीच फर्क किया जाए। लेकिन अक्सर ऐसा प्रतीत होता है कि व्यवस्था की प्राथमिकता फर्क करना नहीं, नियंत्रण स्थापित करना होती है। नियंत्रण हमेशा आकर्षक होता है। सवालों को नियंत्रित करो। वीडियो को नियंत्रित करो। सूचना को नियंत्रित करो। चर्चा को नियंत्रित करो और यदि संभव हो तो आईने को भी नियंत्रित कर लो। मगर लोकतंत्र का स्वभाव नियंत्रण नहीं, संवाद है। लोकतंत्र में संस्थाओं का सम्मान इसलिए नहीं होता कि वे शक्तिशाली हैं। उनका सम्मान इसलिए होता है क्योंकि वे आलोचना सहने की क्षमता रखती हैं। जिस दिन कोई संस्था आलोचना से डरने लगे, उस दिन उसकी ताकत पर नहीं, उसके आत्मविश्वास पर सवाल उठने लगते हैं।

विडंबना यह भी है कि हमारे यहां अक्सर जांच की दिशा भी बड़ी दिलचस्प होती है। कभी-कभी घटना से ज्यादा ऊर्जा इस बात में लगती है कि जानकारी बाहर कैसे आई। फाइल में क्या लिखा था, यह बाद की बात है; फाइल लीक किसने की, यह पहले जांचा जाता है। कमरे में क्या हुआ, यह बाद में देखा जाता है; कमरे का वीडियो किसने बनाया, यह पहले पूछा जाता है। मानो व्यवस्था का सबसे बड़ा संकट घटना नहीं, उसकी सार्वजनिक जानकारी हो।

बिलासपुर की यह घटना भी उसी व्यापक मानसिकता की एक झलक बन गई है। यहां बहस कानून और जवाबदेही के बीच संतुलन की होनी चाहिए थी। चर्चा इस बात पर होनी चाहिए थी कि यदि वीडियो गलत है तो उसे तथ्यात्मक रूप से गलत साबित किया जाए, और यदि उसमें कोई सच्चाई है तो उसे स्वीकार कर सुधार की प्रक्रिया शुरू की जाए लेकिन हमारे यहां अक्सर सुधार से पहले संदेश दिया जाता है। संदेश यह कि व्यवस्था को देखने का अधिकार सीमित है। संदेश यह कि सवाल पूछने से पहले सावधान रहिए। संदेश यह कि कैमरा उठाने से पहले सोचिए और धीरे-धीरे यह संदेश समाज के भीतर एक भय में बदलने लगता है। हालांकि इतिहास बताता है कि समाज कैमरों से नहीं बदलते, बल्कि उन कारणों को दूर करने से बदलते हैं जिनकी वजह से कैमरे उठते हैं। यदि संस्थाएं पारदर्शी हों तो वीडियो सनसनी नहीं बनते। यदि जवाबदेही मजबूत हो तो वायरल पोस्ट व्यवस्था के लिए खतरा नहीं बनते। यदि जनता का विश्वास बना रहे तो अफवाहें भी ज्यादा दूर तक नहीं जातीं। 

यदि हर असुविधाजनक वीडियो के जवाब में पहला सवाल यह पूछा जाए कि उसे बनाया किसने, तो संदेह पैदा होता है कि व्यवस्था की चिंता सच्चाई से अधिक उसके सार्वजनिक होने को लेकर है।

आखिर में सवाल केवल बिलासपुर का नहीं है। सवाल उस सोच का है जिसमें व्यक्ति देखकर अपराध की गंभीरता तय की जाती है। जहां वर्दी, पद और प्रभाव के अनुसार संवेदनशीलता का स्तर बदलता रहता है। जहां कभी-कभी कानून की किताब एक ही रहती है, लेकिन उसका वजन अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग महसूस होता है।

लोकतंत्र में पुलिस का सम्मान होना चाहिए, क्योंकि वह कानून की रक्षक है। लेकिन उसी लोकतंत्र में जनता के सवालों का भी सम्मान होना चाहिए, क्योंकि वही कानून की अंतिम मालिक है, इसलिए आवश्यकता वीडियो से डरने की नहीं, सच्चाई से सामना करने की है क्योंकि जिस समाज में आईना दिखाना अपराध और आईना छिपाना कर्तव्य बन जाए, वहां समस्या कैमरे में नहीं होती। समस्या चेहरे पर होती है और चेहरों की मरम्मत आईना तोड़कर नहीं, आत्मनिरीक्षण करके की जाती है। 

कैमरे की कलम: तिलचट्टों का गणतंत्र और सपनों की लीक होती हुई परीक्षा

देश में इन दिनों सबसे सुरक्षित चीज़ क्या है? न संविधान, न नौकरियाँ, न युवाओं के सपने। अगर कुछ सुरक्षित है तो वह है सरकारों का यह विश्वास कि जनता सब कुछ भूल जाएगी। कल देश की राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर में लाखों लोग उस आंदोलन से जुड़े जो सरकारों से सीधे सवाल पूछ रही है, देश के हालात और युवाओं के मन में सुलगते सैकड़ों सवालों के बीच शान्ति पूर्ण आंदोलन का आह्वान। आंदोलन में शामिल लोगों की भीड़ के बीच कहीं जय भीम के नारे, कहीं आरएसएस के खिलाफ हल्ला तो किसी कोने से आजादी के लिए उठता शोर। ये शोर कॉकरोच जनता पार्टी के मंच से उठा जिसे देश ने देखा, बिना डरे बिना हल्ला मचाये।  

एक समय था जब तिलचट्टे रसोई में मिलते थे। अब वे राजनीति में मिल रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि रसोई वाले तिलचट्टे देखकर लोग चीखते थे, राजनीतिक तिलचट्टों को देखकर लोग सेल्फी लेते हैं। और देश की हालत ऐसी हो चुकी है कि अब युवा यह तय नहीं कर पा रहा कि वह नौकरी ढूंढे, परीक्षा की तैयारी करे, या किसी नए आंदोलन का सदस्य बन जाए।

भारत आज दुनिया की सबसे युवा आबादी वाला देश कहलाता है। यह अलग बात है कि इस युवा आबादी का बड़ा हिस्सा रोजगार कार्यालयों, कोचिंग संस्थानों और सोशल मीडिया के बीच पेंडुलम की तरह झूल रहा है। सरकारें हर साल करोड़ों नौकरियों का सपना दिखाती हैं और बदले में करोड़ों युवाओं को "अगले प्रयास के लिए शुभकामनाएँ" का संदेश मिलता है। 

पेपर लीक अब कोई दुर्घटना नहीं रह गया है, यह तो हमारी परीक्षा व्यवस्था का आधिकारिक पाठ्यक्रम बन चुका है। पहले छात्र प्रश्नपत्र खोलते थे, अब प्रश्नपत्र पहले से ही छात्रों के मोबाइल खोल लेते हैं। परीक्षा केंद्रों से ज्यादा चर्चा व्हाट्सऐप ग्रुपों की होती है। कोचिंग संस्थानों से ज्यादा भरोसा टेलीग्राम चैनलों पर किया जाता है। और सरकारें हर बार ऐसे चौंक जाती हैं जैसे पहली बार उन्हें पता चला हो कि पानी गीला होता है।

देश का बेरोज़गार युवा आज सबसे बड़ा व्यंग्य बन चुका है। वह सुबह राष्ट्रनिर्माण के भाषण सुनता है, दोपहर में भर्ती परीक्षा का फार्म भरता है, शाम को परीक्षा स्थगित होने की खबर पढ़ता है और रात को पेपर लीक का वीडियो देखता है। फिर उससे कहा जाता है कि धैर्य रखो, देश आगे बढ़ रहा है। देश आगे बढ़ भी रहा है—बस समस्या यह है कि युवा पीछे छूट रहा है।

ऐसे माहौल में अगर कोई "कॉकरोच जनता पार्टी" पैदा होती है तो उसमें आश्चर्य कैसा? असली सवाल यह नहीं है कि कॉकरोच कौन हैं। असली सवाल यह है कि देश के लाखों पढ़े-लिखे नौजवान खुद को तिलचट्टों से जोड़ने में अपमान क्यों महसूस नहीं कर रहे? शायद इसलिए कि उन्हें लगने लगा है कि इस व्यवस्था में उनकी हैसियत भी किसी दीवार की दरार में छिपे जीव से ज्यादा नहीं है।

राजनीतिक दल आज कॉकरोचों की वंशावली खोज रहे हैं। कोई उन्हें सत्ता का एजेंट बता रहा है, कोई विपक्ष की साजिश। लेकिन कोई यह नहीं पूछ रहा कि आखिर वह जमीन क्यों तैयार हुई जिसमें ऐसे आंदोलन अंकुरित हो रहे हैं? जब भर्ती परीक्षाएँ मज़ाक बन जाएँ, डिग्रियाँ सजावट का सामान बन जाएँ और मेहनत का इनाम पेपर लीक हो जाए, तब राजनीति के पुराने ब्रांडों पर भरोसा टूटना स्वाभाविक है।

देश में आज हर समस्या का समाधान नैरेटिव से खोजा जा रहा है। बेरोज़गारी है तो राष्ट्रवाद की चर्चा कर लो। पेपर लीक है तो किसी और मुद्दे पर बहस करा दो। महँगाई है तो इतिहास की लड़ाई छेड़ दो। लेकिन पेट इतिहास से नहीं भरता, नौकरी नैरेटिव से नहीं मिलती और भविष्य भाषणों से नहीं बनता।

विडंबना यह है कि आज का युवा सरकार से कम, सिस्टम से ज्यादा नाराज़ है। उसे यह भरोसा नहीं रहा कि उसकी मेहनत और प्रतिभा का सम्मान होगा। उसे लगता है कि परीक्षा से पहले प्रश्नपत्र बिक सकता है, भर्ती से पहले सीटें तय हो सकती हैं और इंटरव्यू से पहले परिणाम लिखा जा सकता है।

ऐसे समय में कॉकरोच सड़क पर उतर रहे हैं। वे सफल होंगे या असफल, ईमानदार होंगे या अवसरवादी, यह भविष्य बताएगा। लेकिन उनकी लोकप्रियता एक चेतावनी है। यह उस पीढ़ी की बेचैनी का संकेत है जो वर्षों से सुन रही है कि वही देश का भविष्य है, लेकिन वर्तमान में उसके हिस्से सिर्फ प्रतीक्षा, परीक्षा और निराशा आई है और अगर व्यवस्था ने इस चेतावनी को भी मज़ाक समझ लिया, तो आने वाले समय में तिलचट्टे ही नहीं, पूरी दीवारें बोलने लगेंगी।

कैमरे की कलम: सत्ता का बैज और गुंडागर्दी का लाइसेंस

छत्तीसगढ़ के सीतापुर में जो हुआ, वह किसी एक विधायक, एक अफसर या एक जिले का मामला नहीं है। यह उस राजनीतिक बीमारी का लक्षण है जो लोकतंत्र के शरीर में धीरे-धीरे फैलती रही है। बीमारी का नाम है—सत्ता का अहंकार। 

एक सत्तारूढ़ दल का विधायक अपने समर्थकों के साथ सार्वजनिक स्थान पर एक नायब तहसीलदार से उलझता है। आरोप है कि बात इतनी बढ़ती है कि हाथापाई बाद में मारपीट तक पहुंच जाती है। वहां मौजूद वरिष्ठ अधिकारी रोकने की कोशिश करते हैं, लेकिन विधायक का गुस्सा, या कहिए सत्ता का नशा, किसी प्रशासनिक मर्यादा को स्वीकार करने को तैयार नहीं दिखता। यह दृश्य किसी व्यक्ति विशेष के क्रोध का नहीं, बल्कि उस मानसिकता का प्रतीक है जिसमें निर्वाचित प्रतिनिधि स्वयं को कानून का विषय नहीं, कानून का स्वामी समझने लगते हैं। 

लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि जनता की शक्ति का प्रतीक होता है, लेकिन जब वही जनप्रतिनिधि स्वयं को कानून से ऊपर समझने लगे, तब लोकतंत्र की आत्मा घायल होती है। सीतापुर के विधायक रामकुमार टोप्पो से जुड़ा हालिया विवाद इसी चिंता को सामने लाता है। मामले की सच्चाई क्या है, कौन दोषी है और किसकी बात सही है, इसका अंतिम निर्णय अदालतें और जांच एजेंसियां करेंगी। लेकिन जो दृश्य जनता ने देखा, वह अपने आप में कई गंभीर सवाल छोड़ गया है।

आरोप है कि एक सरकारी अधिकारी के साथ नेताजी के साथ साथ समर्थकों ने मारपीट की । आरोप यह भी है कि विवाद की जड़ एक ऐसे व्यक्ति की पैरोल से जुड़ी थी जिस पर हत्या जैसे गंभीर अपराध का आरोप है। हत्या जैसे संगीन अपराध में जेल की दीवारों में फंसा व्यक्ति रिश्ते में विधायक के जीजा हैं जिनकी पेरोल संबंधी कागजात को लेकर नेताजी की चचेरी बहन से नायब तहसीलदार की कहासुनी हुई । इन आरोपों की सत्यता जांच का विषय है, लेकिन इससे भी बड़ा प्रश्न उस राजनीतिक संस्कृति का है जो सत्ता को जवाबदेही नहीं, बल्कि विशेषाधिकार समझने लगती है। सवाल यह नहीं है कि अफसर सही था या गलत। सवाल यह है कि फैसला करने का अधिकार किसे है? लोकतंत्र में कानून को या सत्ता के मद में चूर किसी जनप्रतिनिधि को?

सबसे विचित्र और चिंताजनक दृश्य तब सामने आया जब विधायक ने स्वयं को गिरफ्तारी के लिए प्रस्तुत करने की बात कही। लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह एक सामान्य कानूनी प्रक्रिया हो सकती थी। लेकिन यह प्रक्रिया अचानक शक्ति प्रदर्शन के मंच में बदल गई। समर्थकों की भीड़, राष्ट्रीय राजमार्ग पर जाम, नारेबाजी और भावनात्मक उन्माद के बीच गिरफ्तारी का प्रसंग किसी न्यायिक प्रक्रिया से अधिक राजनीतिक आयोजन जैसा प्रतीत हुआ।

विडंबना यह है कि "वंदे मातरम्" और "जय श्री राम" जैसे राष्ट्रभक्ति और आस्था के उद्घोष भी इस शक्ति प्रदर्शन का हिस्सा बने। ये नारे करोड़ों लोगों की भावनाओं से जुड़े हैं। इनका स्थान राष्ट्रीय गौरव और सांस्कृतिक चेतना के उत्सव में है, न कि किसी व्यक्ति विशेष के कानूनी संकट को जनभावनाओं की ढाल बनाने में। जब ऐसे पवित्र प्रतीकों को राजनीतिक या व्यक्तिगत बचाव के उपकरण में बदला जाता है, तब नुकसान केवल राजनीति का नहीं, सामाजिक विश्वास का भी होता है। 

सवाल यह भी है कि यदि कोई जनप्रतिनिधि स्वयं को निर्दोष मानता है तो उसे कानून की प्रक्रिया का सम्मान करते हुए जांच में सहयोग करना चाहिए। निर्दोषता का सबसे मजबूत प्रमाण अदालत होती है, सड़क पर जुटी भीड़ नहीं। लोकतंत्र में न्यायालय का फैसला भीड़ के आकार से तय नहीं होता। लेकिन दुर्भाग्य से हमारे राजनीतिक जीवन में भीड़ को नैतिक वैधता का प्रमाणपत्र मानने की प्रवृत्ति लगातार बढ़ती जा रही है। यह बीमारी किसी एक दल तक सीमित नहीं है। भाजपा हो, कांग्रेस हो या कोई क्षेत्रीय दल—सत्ता मिलते ही बहुत से नेताओं के पांव जमीन छोड़ देते हैं। लोकतंत्र उन्हें जनता का सेवक बनाता है, लेकिन वे स्वयं को इलाके का शासक समझने लगते हैं। सांसद-विधायक बनने के बाद कुछ लोगों का व्यवहार ऐसा हो जाता है मानो जनता ने उन्हें संविधान से ऊपर बैठाने का जनादेश दिया हो।

देश भर में ऐसे अनगिनत वीडियो मौजूद हैं जिनमें नेता अफसरों को फोन पर गालियां देते सुनाई देते हैं। कहीं धमकियां हैं, कहीं तबादले की चेतावनी है, कहीं नौकरी खाने की भाषा है। मोबाइल कैमरों ने लोकतंत्र का एक नया सच उजागर किया है—जनप्रतिनिधियों के चेहरे पर चढ़ा सत्ता का मुखौटा अब रिकॉर्ड होने लगा है। पहले ऐसे किस्से बंद कमरों में दफन हो जाते थे। अब वे वायरल होते हैं। जनता देखती है कि मंचों पर संविधान की दुहाई देने वाले लोग व्यवहार में किस हद तक सामंती मानसिकता से भरे हुए हैं।

सत्तारूढ़ दलों के लिए ऐसी घटनाएं और अधिक शर्मनाक होती हैं। विपक्षी दल का नेता हंगामा करे तो सरकार कार्रवाई कर सकती है, पुलिस सक्रिय हो सकती है, कानून अपना रास्ता ले सकता है। लेकिन जब सत्ताधारी दल का विधायक ही आरोपों के घेरे में हो, तब सरकार एक असहज दुविधा में फंस जाती है। कार्रवाई करे तो अपनी ही राजनीतिक बिरादरी नाराज होती है, कार्रवाई न करे तो कानून के राज पर सवाल उठते हैं और यहीं किसी सरकार की असली परीक्षा होती है।

यदि सरकार अपने विधायक के खिलाफ भी वही कठोरता दिखा सके जो वह विपक्ष के नेताओं के खिलाफ दिखाती है, तभी "कानून का राज" एक विश्वसनीय अवधारणा बनता है। अन्यथा कानून केवल कमजोर लोगों के लिए और शक्ति केवल सत्ताधारियों के लिए बच जाती है।

सीतापुर की घटना इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि एक विधायक और एक अफसर के बीच विवाद हुआ। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसने लोकतंत्र के सामने खड़ा वह पुराना सवाल फिर जीवित कर दिया है—क्या जनप्रतिनिधि कानून के अधीन हैं, या कानून जनप्रतिनिधियों के अधीन है?

लोकतंत्र की ताकत चुनाव जीतने में नहीं, चुनाव जीतने के बाद भी कानून के सामने सिर झुकाने में होती है। लेकिन जब जनादेश को कुछ लोग दंडमुक्ति का प्रमाणपत्र समझने लगते हैं, तब लोकतंत्र का चरित्र बदलने लगता है। तब जनता का प्रतिनिधि, जनता का सेवक नहीं रह जाता; वह सत्ता का स्थानीय ठेकेदार बन जाता है और किसी भी लोकतंत्र के लिए इससे अधिक खतरनाक स्थिति दूसरी नहीं हो सकती क्योंकि जिस दिन जनता यह मान ले कि कानून का पालन केवल आम आदमी के लिए है और सत्ता में बैठे लोगों के लिए नहीं, उसी दिन लोकतंत्र की नैतिक नींव में पहली बड़ी दरार पड़ जाती है। सीतापुर की घटना उसी दरार की एक तेज़ और चिंताजनक आवाज़ है। 

कैमरे की कलम: 'सरकार के कंधे कमजोर, बहू की पीठ मजबूत'

“डिजिटल इंडिया” का सपना अब गांव-गांव तक पहुंच चुका है। सरकारी विज्ञापनों में बुजुर्गों के चेहरे पर मुस्कान है, मोबाइल पर अंगूठा लगाते ही पेंशन खाते में आ जाती है, और ‘घर-पहुंच सेवा’ का दावा यह भरोसा देता है कि अब सरकार गरीब के दरवाजे तक उतर आई है लेकिन छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के मैनपाट से आई एक तस्वीर ने इन तमाम दावों की चमक को उतारकर धरती की धूल में पटक दिया है।

राज्य में सुशासन तिहार के बीच एक बहू अपनी 90 वर्षीय बूढ़ी सास को पीठ पर लादकर पाँच किलोमीटर पैदल चल रही है। रास्ते में नदी-नाले हैं, पथरीली चढ़ाइयां हैं, जंगल है, थकान है, बेबसी है। यह कोई तीर्थयात्रा नहीं थी, न किसी अस्पताल की आपात स्थिति। यह यात्रा सिर्फ 500 रुपये की वृद्धावस्था पेंशन के लिए थी। कल्पना कीजिए, जिस देश में करोड़ों रुपये के डिजिटल ट्रांजैक्शन सेकंडों में हो रहे हों, वहां एक वृद्ध महिला को अपने ही हक के पाँच सौ रुपये पाने के लिए इंसानी बोझ बन जाना पड़े — इससे बड़ा व्यंग्य लोकतंत्र पर और क्या होगा?

सरकार कहती है कि अब सबकुछ “ऑनलाइन” है। मगर सवाल यह है कि क्या इंसानियत भी ऑनलाइन हो चुकी है? क्या संवेदनाएं भी अब सर्वर से चलती हैं? और क्या गरीब की पीड़ा भी अब “केवाईसी अपडेट नहीं” के संदेश में बदल दी गई है? यह घटना सिर्फ एक परिवार की गरीबी नहीं दिखाती, बल्कि उस व्यवस्था का चेहरा उजागर करती है जो योजनाओं की फाइलों में बहुत दयालु दिखती है, लेकिन जमीन पर पहुंचते-पहुंचते पत्थर हो जाती है।

बहू सुखमनिया रोते हुए कहती है कि पहले बैंक मित्र घर आकर पैसे दे जाता था। फिर अचानक उसने आना बंद कर दिया। किसी ने कारण नहीं बताया। पेंशन रुक गई। केवाईसी का बहाना सामने आ गया। अब सोचिए, जंगलपारा जैसे दूरस्थ गांव में रहने वाली एक अशिक्षित महिला को कौन समझाएगा कि केवाईसी क्या होता है?
उसके लिए तो बैंक ही एक ऐसा भवन है, जहां जाने भर से डर लगता है। वहां की भाषा अलग, प्रक्रिया अलग, चेहरे अलग। वह केवल इतना जानती है कि सरकार ने बुजुर्गों के लिए कुछ पैसे तय किए हैं और वही पैसे अब नहीं मिल रहे।

व्यवस्था का सबसे क्रूर चेहरा यही होता है — जब वह अपनी असफलताओं को नियमों के पीछे छिपा देती है। बैंक प्रबंधन ने सफाई दी है कि “अगर सूचना दे दी जाती, तो बैंक मित्र घर पहुंच जाता।” वाह! यानी अब गरीब को यह भी पता होना चाहिए कि सुविधा मांगने की प्रक्रिया क्या है, जो महिला अपने गांव से बाहर की दुनिया नहीं जानती, उससे यह उम्मीद की जा रही है कि वह बैंकिंग नियमों की जानकारी रखे, आवेदन करे, सूचना दे, अनुरोध करे और फिर इंतजार करे। ये कड़वी सच्चाई है कि व्यवस्था ने गरीब को नागरिक नहीं, फाइल बना दिया है।

आज गांवों में सबसे बड़ा संकट गरीबी नहीं, बल्कि “सूचना की गरीबी” है। योजनाएं हैं, लेकिन जानकारी नहीं। अधिकार हैं, लेकिन पहुंच नहीं। सरकारें मान बैठी हैं कि योजना घोषित कर देने भर से उसका लाभ लोगों तक पहुंच जाता है। असलियत यह है कि योजना और जरूरतमंद के बीच सबसे लंबा रास्ता “व्यवस्था” का होता है।

विडंबना देखिए, देश चांद पर पहुंच गया, लेकिन सरगुजा की एक बूढ़ी महिला अपने बैंक तक नहीं पहुंच पाई। सरकारी भाषणों में अक्सर कहा जाता है कि “अब कोई पीछे नहीं छूटेगा, लेकिन हकीकत यह है कि सबसे पहले वही लोग छूट जाते हैं, जिनके नाम पर योजनाएं बनती हैं — गरीब, आदिवासी, बुजुर्ग, विधवा और अशिक्षित।

दरअसल हमारी व्यवस्था में गरीब को सुविधा नहीं, प्रमाण देना पड़ता है। उसे हर बार साबित करना पड़ता है कि वह जिंदा है, गरीब है, पात्र है, और मदद के लायक है। कितनी विचित्र बात है कि 90 वर्षीय सोमारी बाई जो चलने-फिरने में असमर्थ है उसे यह साबित करने बैंक जाना पड़ रहा है कि वह अब भी जीवित है। मानो सरकार कह रही हो — “जब तक तुम खुद चलकर हमारे सामने नहीं आओगी, हमें यकीन नहीं होगा कि तुम्हें पेंशन चाहिए।” यह संवेदनहीनता केवल प्रशासनिक नहीं, नैतिक भी है।

आज गांवों में बैंक मित्र, पंचायत सचिव, पटवारी, राशन दुकानदार — यही सरकार का चेहरा हैं। लेकिन अक्सर यही चेहरे सबसे अधिक निराश करते हैं। क्योंकि व्यवस्था की निगरानी ऊपर से होती है, मगर पीड़ा नीचे पैदा होती है और नीचे पैदा हुई पीड़ा अक्सर ऊपर तक पहुंचती ही नहीं। यहां सवाल केवल एक बैंक मित्र की लापरवाही का नहीं है। सवाल उस सोच का है, जिसमें गरीब की तकलीफ को “सामान्य” मान लिया गया है। अगर किसी महानगर में किसी बुजुर्ग को बैंक में लाइन में खड़ा होना पड़े, तो टीवी डिबेट शुरू हो जाती है। लेकिन जंगलपारा की एक महिला अपनी सास को पीठ पर ढोकर बैंक ले जाए, तो उसे “ग्रामीण कठिनाई” कहकर सामान्य बना दिया जाता है। गरीबी इस देश में अब संवेदना नहीं जगाती, वह सिर्फ आंकड़ा बनकर रह गई है।

सरकारें योजनाओं के नाम बदलने में तेज हैं। हर नई योजना के साथ नया नारा, नया लोगो, नया प्रचार आता है। लेकिन जिन लोगों के लिए ये योजनाएं बनाई जाती हैं, उनकी जिंदगी में कुछ नहीं बदलता। उनके हिस्से में वही टूटी सड़कें, वही अधूरी जानकारी, वही बंद दफ्तर और वही इंतजार आता है। सबसे दुखद बात यह है कि इस पूरी घटना में किसी को अपराधबोध नहीं है।

बैंक कह रहा है — “हमें बताया नहीं गया।”  प्रशासन कहेगा — “मामला संज्ञान में आया है।” नेता कहेंगे — “जांच होगी।” और फिर कुछ दिनों बाद यह खबर किसी नई वायरल घटना के नीचे दब जाएगी लेकिन उस बूढ़ी महिला की पीठ का दर्द, उस बहू की थकान और उनकी बेबसी किसी सरकारी रिपोर्ट में दर्ज नहीं होगी। हमारे लोकतंत्र की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि यहां गरीब की तकलीफ खबर बनती है, समाधान नहीं। अगर सचमुच सरकार “घर-पहुंच सेवा” देना चाहती है, तो उसे पहले यह समझना होगा कि सुविधा का मतलब केवल तकनीक नहीं होता।

एक बुजुर्ग महिला को पेंशन देने के लिए बैंक मित्र का घर तक जाना “कृपा” नहीं, उसकी जिम्मेदारी है और यदि वह जिम्मेदारी निभाई नहीं गई, तो जवाबदेही तय होनी चाहिए। आज जरूरत इस बात की नहीं है कि इस घटना पर दुख जताया जाए। जरूरत इस बात की है कि व्यवस्था अपने भीतर झांके, क्योंकि यह सिर्फ सरगुजा की कहानी नहीं है। यह देश के हजारों गांवों की कहानी है, जहां योजनाएं कागज पर दौड़ती हैं और लोग पथरीले रास्तों पर।

हमें यह तय करना होगा कि “डिजिटल इंडिया” का मतलब क्या है। क्या यह सिर्फ शहरों के लिए तेज इंटरनेट है?
या फिर उस बुजुर्ग महिला तक सम्मानपूर्वक पेंशन पहुंचाना भी इसका हिस्सा है? किसी भी सभ्य समाज की पहचान इस बात से नहीं होती कि उसके शहर कितने चमकदार हैं। उसकी पहचान इससे होती है कि वह अपने सबसे कमजोर नागरिक के साथ कैसा व्यवहार करता है। सरगुजा की यह तस्वीर हमें आईना दिखाती है। उस आईने में सरकार भी है, बैंक भी, प्रशासन भी और हम सब भी, क्योंकि हम सब धीरे-धीरे ऐसे समाज में बदलते जा रहे हैं, जहां गरीब की पीड़ा देखकर कुछ क्षण दुख तो होता है, लेकिन व्यवस्था बदलने की बेचैनी नहीं होती। शायद यही सबसे बड़ा खतरा है और अंत में, उस बहू की पीठ पर बैठी बूढ़ी सासू मां सिर्फ अपनी पेंशन लेने नहीं जा रही थी। वह इस देश की विकास यात्रा, सुशासन तिहार का सच ढो रही थी। एक ऐसा सच, जो बताता है कि सरकार अभी भी गरीब के घर तक नहीं पहुंची है। दावे कुछ भी हों लेकिन हकीकत ये है कि सरकार आज भी गरीब की पीठ पर लदी हुई चल रही है।

कैमरे की कलम: देशभक्ति अब पेट्रोल पंप पर मापी जाएगी !


देश एक बार फिर संकट में है। यह जानकारी हमें किसी अर्थशास्त्री, रणनीतिक विशेषज्ञ या संसद की बहस से नहीं मिली, बल्कि सीधे उस अपील से मिली जिसमें देशवासियों से कहा गया कि पेट्रोल बचाइए, डीजल कम खर्च कीजिए, विदेश यात्रा रोक दीजिए और फिलहाल सोना खरीदने का विचार त्याग दीजिए। यानी अब देशभक्ति का नया पैमाना तय हो चुका है—जिसने बाइक कम चलाई, वही सच्चा राष्ट्रभक्त; जिसने दुबई की टिकट कैंसिल की, वही असली देशसेवक; और जिसने पत्नी को सोने का हार नहीं दिलाया, वही आधुनिक बलिदानी नागरिक।

भारत बड़ा अद्भुत देश है। यहाँ हर संकट का समाधान अंततः आम आदमी की जेब से ही निकलता है। सरकारें योजनाएँ बनाती हैं, भाषण देती हैं, नारे गढ़ती हैं और अंत में जनता से कहती हैं—"थोड़ा और त्याग कर लीजिए, देश मुश्किल में है।" जनता भी वर्षों से इस संवाद की अभ्यस्त हो चुकी है। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले त्याग स्वतंत्रता के लिए होता था, अब पेट्रोल की कीमतों और विदेशी मुद्रा भंडार के लिए होने लगा है।

दरअसल, यह संकट केवल आर्थिक नहीं, मानसिक भी है। हम एक ऐसे समाज में बदल चुके हैं जहाँ दिखावा राष्ट्रीय चरित्र बन चुका है। घर में राशन कम हो सकता है, लेकिन एसयूवी गाड़ी चमचमाती रहनी चाहिए। मोहल्ले में पानी की समस्या हो सकती है, लेकिन इंस्टाग्राम पर विदेश यात्रा की तस्वीरें जरूरी हैं। शादी में कर्ज लेकर सोना खरीदना अब सामाजिक प्रतिष्ठा का हिस्सा है। ऐसे समाज से जब अचानक कहा जाता है कि “संयम रखिए”, तो यह वैसा ही है जैसे किसी बच्चे से मिठाई की दुकान के सामने उपवास रखने को कहा जाए।

पेट्रोल बचाने की अपील सुनकर सबसे अधिक दुख शायद उन लोगों को हुआ होगा जिन्होंने दो किलोमीटर दूर जिम जाने के लिए भी कार खरीद रखी है। भारत में अब पैदल चलना स्वास्थ्य का नहीं, गरीबी का प्रतीक माना जाने लगा है। अगर कोई आदमी बाजार तक पैदल चला जाए, तो लोग पूछते हैं—"गाड़ी खराब हो गई क्या?" ऐसे दौर में ईंधन बचत का संदेश केवल आर्थिक सलाह नहीं, सामाजिक क्रांति जैसा लगता है।

विडंबना देखिए, एक तरफ विज्ञापनों में नई-नई कारें खरीदने को सफलता का प्रतीक बताया जाता है, दूसरी तरफ नागरिकों से कहा जाता है कि पेट्रोल बचाइए। यानी पहले उपभोग को जीवन का लक्ष्य बनाइए, फिर संकट आने पर त्याग को राष्ट्रधर्म घोषित कर दीजिए। यह ठीक वैसा ही है जैसे पहले किसी को मिठाइयों की थाली परोस दी जाए और बाद में डायबिटीज़ के लिए उसे ही जिम्मेदार ठहरा दिया जाए।

असल प्रश्न यह है कि क्या केवल जनता के संयम से देश आर्थिक संकटों से उबर जाएगा? अगर ऐसा होता, तो भारत अब तक दुनिया की सबसे मजबूत अर्थव्यवस्था बन चुका होता। यहाँ आम आदमी पहले ही टैक्स, महंगाई, बेरोजगारी और बढ़ते खर्चों के बीच अपनी इच्छाओं का गला घोंटकर जी रहा है। मध्यम वर्ग की स्थिति तो ऐसी है कि वह पेट्रोल भरवाते समय मीटर नहीं, अपनी धड़कनें देखता है।

आज हालत यह है कि आदमी बाइक की टंकी फुल कराने से पहले बैंक बैलेंस चेक करता है। पेट्रोल पंप अब केवल ईंधन भरवाने की जगह नहीं, मानसिक साहस की परीक्षा केंद्र बन चुके हैं। कर्मचारी पूछता है—"कितने का डालूँ?" और ग्राहक मन ही मन देश की अर्थव्यवस्था, अपनी सैलरी और महीने के बाकी खर्चों का गणित लगाने लगता है।

लेकिन संकट केवल तेल का नहीं है। विदेश यात्राओं पर रोक की अपील भी कम दिलचस्प नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में विदेशी यात्रा भारतीय मध्यवर्ग के लिए नई सामाजिक प्रतिष्ठा बन चुकी है। अब लोग घूमने कम, सोशल मीडिया पर साबित करने ज्यादा जाते हैं कि वे “ग्लोबल” हो चुके हैं। बैंक लोन लेकर यूरोप घूम आना आधुनिक सफलता का नया प्रमाणपत्र है। ऐसे में जब सरकार कहती है कि विदेश यात्रा टाल दीजिए, तो यह सीधे भारतीय इंस्टाग्राम संस्कृति पर हमला प्रतीत होता है।

हालाँकि, इसमें विडंबना भी कम नहीं है। जिस देश में लाखों युवा रोजगार और बेहतर भविष्य के लिए विदेश जाने का सपना देख रहे हों, वहाँ विदेशी मुद्रा बचाने के नाम पर विदेश यात्राएँ रोकने की अपील एक अजीब विरोधाभास पैदा करती है। एक तरफ हम वैश्विक शक्ति बनने के सपने देखते हैं, दूसरी तरफ नागरिकों से कहते हैं कि फिलहाल दुनिया देखने मत जाइए।

अब बात सोने की। भारत में सोना केवल धातु नहीं, भावनात्मक धर्म है। यहाँ बेटी के जन्म के साथ ही परिवार सोना जोड़ना शुरू कर देता है। शादी में रिश्तेदार दूल्हे से कम, सोने के सेट से ज्यादा प्रभावित होते हैं। भारतीय परिवारों के लिए बैंक बैलेंस से अधिक भरोसेमंद चीज अगर कोई है, तो वह अलमारी के लॉकर में रखा सोना है। ऐसे समाज से कहना कि “सोना मत खरीदिए”, लगभग वैसा ही है जैसे क्रिकेट प्रेमियों से कहना कि विश्वकप के दौरान टीवी मत देखिए।

लेकिन सच यह भी है कि भारत हर वर्ष अरबों डॉलर का सोना आयात करता है। विदेशी मुद्रा का बड़ा हिस्सा इसी चमकती धातु में दफन हो जाता है। दुखद बात यह है कि हम उत्पादन, अनुसंधान और उद्योग में निवेश करने से अधिक संतोष निष्क्रिय सोना खरीदने में महसूस करते हैं। यानी अर्थव्यवस्था को गति देने के बजाय हम अपनी बचत तिजोरियों में बंद कर देते हैं और फिर शिकायत करते हैं कि रोजगार क्यों नहीं बढ़ रहे।

हालाँकि, केवल जनता को दोष देना आसान रास्ता है। असली सवाल यह भी है कि क्या शासन और व्यवस्था खुद उतनी ही मितव्ययी है जितनी अपेक्षा जनता से की जा रही है? क्या सरकारी फिजूलखर्ची रुकी? क्या राजनीतिक रैलियों, विज्ञापनों और दिखावटी आयोजनों पर खर्च कम हुआ? क्या सत्ता प्रतिष्ठान ने अपने वैभव में कटौती की? क्योंकि त्याग का उपदेश तभी प्रभावी लगता है जब नेतृत्व स्वयं उदाहरण प्रस्तुत करे।

भारत में समस्या यह है कि त्याग हमेशा नीचे वालों से माँगा जाता है। ऊपर वालों के लिए “राष्ट्रीय हित” अक्सर वातानुकूलित सभागारों में दिया गया भाषण बनकर रह जाता है। आम आदमी से कहा जाता है कि वह पेट्रोल बचाए, लेकिन वीआईपी काफिले पूरे शहर का ट्रैफिक रोककर दर्जनों गाड़ियों के साथ निकलते रहते हैं। जनता से कहा जाता है कि खर्च कम करें, लेकिन सत्ता की चमक-दमक में कोई कमी दिखाई नहीं देती। यही विरोधाभास नागरिकों के भीतर अविश्वास पैदा करता है।

फिर भी, यह भी सच है कि संकट वास्तविक है। दुनिया अस्थिर दौर से गुजर रही है। युद्ध, वैश्विक मंदी, बढ़ती महंगाई और ऊर्जा संकट का असर भारत पर भी पड़ रहा है। ऐसे समय में यदि नागरिक जिम्मेदारी नहीं दिखाएँगे, तो स्थिति और कठिन हो सकती है। लेकिन जिम्मेदारी केवल जनता की नहीं, शासन की भी होनी चाहिए। देशभक्ति का अर्थ केवल जनता से त्याग करवाना नहीं, बल्कि संसाधनों के ईमानदार उपयोग का भरोसा देना भी है।

आज जरूरत केवल पेट्रोल बचाने की नहीं, बल्कि उस मानसिकता को बदलने की है जिसने उपभोग को ही विकास मान लिया है। हम जितना कमाते नहीं, उससे ज्यादा दिखाने की कोशिश करते हैं। हमारी अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा दिखावे की संस्कृति में फँस चुका है। बड़ी गाड़ी, बड़ा मोबाइल, विदेशी छुट्टियाँ और भारी-भरकम शादियाँ अब सामाजिक सम्मान का पैमाना बन चुकी हैं। ऐसे समाज में आर्थिक संकट केवल बाजार से नहीं, मानसिकता से पैदा होता है।

सवाल यह भी है कि क्या हम हर बार संकट आने पर ही जागेंगे? क्या ऊर्जा बचत केवल आपातकालीन अपील का विषय रहेगी? क्या आत्मनिर्भरता केवल भाषणों का शब्द बनी रहेगी? यदि देश वास्तव में मजबूत बनना चाहता है, तो नागरिकों और सरकार दोनों को उपभोग की अंधी दौड़ से बाहर निकलना होगा।

देशभक्ति का सबसे आसान तरीका सोशल मीडिया पर झंडा लगाना है, लेकिन सबसे कठिन तरीका है अपने व्यवहार में अनुशासन लाना। कम ईंधन खर्च करना, स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देना, अनावश्यक दिखावे से बचना और आर्थिक संयम अपनाना—ये बातें सुनने में साधारण लगती हैं, लेकिन किसी भी राष्ट्र की वास्तविक ताकत इन्हीं से बनती है।

लेकिन भारत का दुर्भाग्य यह है कि यहाँ हर गंभीर बात भी अंततः नारे में बदल जाती है। कुछ दिन लोग पेट्रोल बचाने की बात करेंगे, फिर वही ट्रैफिक जाम, वही दिखावा, वही फिजूलखर्ची लौट आएगी। संकट बीत जाएगा, लेकिन आदतें नहीं बदलेंगी। हम फिर किसी अगले संकट का इंतजार करेंगे, जब हमें दोबारा बताया जाएगा कि देश कठिन दौर में है और अब त्याग की जरूरत है।

दरअसल, यह समय केवल आर्थिक आत्मनिरीक्षण का नहीं, सामाजिक आत्मचिंतन का भी है। हमें तय करना होगा कि हम जिम्मेदार नागरिक बनना चाहते हैं या केवल उपभोक्ता। क्योंकि उपभोक्ता केवल खरीदता है, जबकि नागरिक भविष्य बचाता है।

आज देश को भाषणों से अधिक ईमानदार व्यवहार की जरूरत है। जनता को भी समझना होगा कि संसाधन असीमित नहीं हैं, और सरकार को भी यह साबित करना होगा कि जनता का त्याग केवल आंकड़ों में नहीं, राष्ट्रीय हित में बदल रहा है। वरना वह दिन दूर नहीं जब देशभक्ति की अगली परीक्षा बिजली, पानी और रसोई गैस की बचत से आगे बढ़कर सांस लेने की सीमा तय करने तक पहुँच जाएगी।

और तब शायद कोई नया नारा गढ़ा जाएगा— “कम सांस लीजिए, देश संकट में है।”

कैमरे की कलम: अंधेरे का आत्मनिर्भर भारत


छत्तीसगढ़ के दूसरे बड़े शहर के रूप में अपनी पहचान रखने वाले बिलासपुर ने पिछले दिनों आखिरकार विकास की उस ऊंचाई को छू ही लिया, जहां आदमी को यह समझ में आ जाता है कि असली सभ्यता बिजली नहीं, मोमबत्ती है। बात पिछले मंगलवार की है, शहर और आस-पास के इलाकों में 95 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से हवा चली और पूरा शहर ऐसी विनम्रता से अंधेरे में समा गया, जैसे किसी सरकारी दफ्तर में आम आदमी की अर्जी समा जाती है। गाँवों का हाल तो पूछिए ही मत। 

आंधी आई। पेड़ गिरे। तार टूटे। खंभे झुके। और उसके साथ ही “जीरो पॉवर कट” का दावा भी कहीं उड़ गया। हालांकि सरकार को धन्यवाद देना चाहिए कि उसने जनता को इतिहास से जोड़ दिया। नई पीढ़ी को पहली बार पता चला कि बिना वाई-फाई, बिना चार्जर और बिना एसी के भी इंसान जिंदा रह सकता है। कुछ बच्चों ने तो पहली बार अपने माता-पिता से बातचीत तक कर ली। यह सामाजिक क्रांति बिजली विभाग के बिना संभव नहीं थी। शुरू में लोगों ने धैर्य रखा। उन्हें भरोसा था कि बिजली विभाग है, कर्मचारी हैं, सिस्टम है। फिर धीरे-धीरे उन्हें याद आया कि यही सबसे बड़ी समस्या है।

पहले छह घंटे बीते। फिर बारह। फिर चौबीस। कुछ इलाकों में तो तीस घंटे बाद बिजली आई। तब तक लोग आधुनिक नागरिक से बदलकर आदिम मानव बन चुके थे। फ्रिज में रखा दूध दही बन चुका था, दही खट्टा होकर विज्ञान प्रयोगशाला का नमूना लगने लगा था और बच्चे मोबाइल चार्ज न होने के कारण पहली बार अपने माता-पिता का चेहरा पहचानने लगे थे। शहर अंधेरे में डूबा रहा और बिजली विभाग “स्थिति पर नजर” रखता रहा। हमारे यहां “स्थिति पर नजर रखना” बहुत महत्वपूर्ण सरकारी काम है। सड़क टूटे—नजर रखो। पुल गिरे—नजर रखो। बिजली जाए—नजर रखो। ऐसा लगता है कि पूरा प्रशासन किसी दूरबीन के सहारे चल रहा है।

सबसे महान संस्था साबित हुआ फ्यूज कॉल सेंटर। जनता फोन लगाती रही और उधर से वही सन्नाटा मिलता रहा, जो चुनाव के बाद जनता को अपने नेता के फोन में मिलता है। कभी-कभी फोन उठ भी गया तो जवाब आया—“टीम काम कर रही है।” यह टीम भारतीय लोकतंत्र की तरह रहस्यमयी होती है। सब उसका नाम लेते हैं, मगर किसी ने उसे काम करते नहीं देखा। फिर मोबाइल पर संदेश आया—“आपकी समस्या का समाधान कर दिया गया है।” यह संदेश पढ़कर अंधेरे में बैठे आदमी के भीतर आध्यात्मिक ऊर्जा जाग उठी। उसने महसूस किया कि असली रोशनी भीतर होती है। बाहर का अंधेरा तो मोह-माया है। पंखा बंद है, फ्रिज सड़ चुका है, पानी नहीं आ रहा, मच्छर खूनदान शिविर चला रहे हैं, लेकिन विभाग कह रहा है—समस्या हल हो गई। यही डिजिटल इंडिया है।

दरअसल, हमारी बिजली व्यवस्था बहुत भावुक है। हल्की हवा चले तो नाराज हो जाती है। बारिश हो तो बैठ जाती है। पेड़ हिले तो बेहोश हो जाती है। और यदि 95 किलोमीटर की हवा चल जाए, तो फिर पूरा सिस्टम सामूहिक अवकाश पर चला जाता है। मगर सबसे बड़ी कला सरकार की भाषा में है। जनता अंधेरे में तड़प रही होती है और बयान आता है—“बिजली व्यवस्था तेजी से बहाल की जा रही है।” यह “तेजी” इतनी अद्भुत होती है कि कछुआ भी शर्म से इस्तीफा दे दे। सरकारें दावा करती हैं कि हमने गांव-गांव बिजली पहुंचा दी। बिल्कुल पहुंचाई। फिर वापस भी ले ली।

स्थानीय प्रशासन बिजली व्यवस्था को की बुनियादी खामियों को दूर करने के लिए गंभीरता का परिचय देता है, सवाल यह है कि जनता भी आखिर कब तक गंभीर रहे? तीस घंटे बिजली न हो तो आदमी लोकतंत्र से ज्यादा मच्छरों पर विश्वास करने लगता है।

कैमरे की कलम: लापरवाही, लालच और लाचार व्यवस्था


कभी चिकित्सा को सेवा कहा जाता था। डॉक्टरों को भगवान का दर्जा दिया जाता था। अस्पतालों को वह स्थान माना जाता था जहां जीवन को दूसरा अवसर मिलता है। लेकिन आज का कटु यथार्थ इस आदर्श से उतना ही दूर है जितना विश्वास और अनुभव के बीच की खाई। ताजा मामला श्रीराम केयर अस्पताल का है, जहां एक पुलिसकर्मी सत्यकुमार पाटले की मौत ने फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या अब अस्पताल इलाज के केंद्र हैं या व्यवस्थित ‘राजस्व मशीन’? 

एक सामान्य पथरी का ऑपरेशन जिसे चिकित्सा जगत में रूटीन प्रक्रिया माना जाता है। उसके बाद मरीज की हालत स्थिर बताई जाती है, परिजनों को भरोसा दिया जाता है, और फिर अचानक मौत। उसके बाद शुरू होता है वही पुराना खेल कारणों का उलझाव, बयान बदलते डॉक्टर, और जिम्मेदारी से बचने की अदृश्य दौड़। अस्पताल कहता है ‘हार्ट अटैक’, परिजन कहते हैं ‘लापरवाही’। सच्चाई पोस्टमार्टम रिपोर्ट में दबी रह जाती है, और न्याय अक्सर फाइलों में।

लेकिन सवाल सिर्फ एक मौत का नहीं है। सवाल उस व्यवस्था का है जहां मरीज को इंसान नहीं, बल्कि ‘केस’ कहा जाता है। जहां भर्ती होते ही उसकी पहचान नाम से नहीं, फाइल नंबर से होती है। जहां इलाज की प्रक्रिया से पहले पैकेज तय होता है, और संवेदनशीलता से पहले अग्रिम जमा।

निजी अस्पतालों के गलियारों में एक अदृश्य अर्थशास्त्र चलता है—हर टेस्ट की कीमत है, हर घंटे की कीमत है, हर बेड की कीमत है, यहां तक कि हर सांस की भी कीमत तय होती दिखाई देती है। मरीज जितना अधिक समय अस्पताल में रहेगा, उतना अधिक ‘राजस्व’ उत्पन्न करेगा। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या इलाज की प्राथमिकता मरीज की जरूरत से तय होती है या अस्पताल के लाभ से?

परिजनों के आरोप—चार घंटे तक इलाज नहीं मिला—यदि सही हैं, तो यह केवल एक चिकित्सकीय चूक नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं का पतन है। अस्पताल, जो जीवन बचाने का स्थान होना चाहिए, यदि वहां मरीज तड़पता रह जाए और मशीनें मौन रहें, तो यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि एक प्रकार का संस्थागत अमानवीकरण है।

इस अस्पताल का अतीत भी विवादों से अछूता नहीं रहा है। आईसीयू में सुरक्षा जैसी बुनियादी जिम्मेदारी में चूक, कोरोना काल में कथित आर्थिक शोषण, और अब एक मौत पर उठते सवाल—यह सब मिलकर एक पैटर्न की ओर इशारा करते हैं। लेकिन इससे भी बड़ा सवाल यह है कि ऐसे संस्थान बार-बार सवालों के घेरे में आने के बावजूद निर्बाध रूप से कैसे चलते रहते हैं?

उत्तर स्पष्ट है—क्योंकि हमारी व्यवस्था में जवाबदेही का अभाव है।

स्वास्थ्य क्षेत्र में नियमों की कमी नहीं है। लाइसेंस, निरीक्षण, मानक, प्रोटोकॉल—सब कुछ मौजूद है। लेकिन इनका पालन कितना होता है? निरीक्षण अक्सर औपचारिकता बनकर रह जाते हैं। नोटिस जारी होते हैं, जवाब मांगा जाता है, और फिर फाइल बंद। इस प्रक्रिया में न तो किसी की जिम्मेदारी तय होती है, न ही किसी को सख्त दंड मिलता है। यह ढीलापन केवल प्रशासनिक कमजोरी नहीं, बल्कि एक प्रकार की मौन स्वीकृति है—कि ‘जो चल रहा है, चलने दो।’

एक आम नागरिक के लिए स्थिति और भी विडंबनापूर्ण है। सरकारी अस्पतालों में भीड़, संसाधनों की कमी और लंबी प्रतीक्षा उसे निजी अस्पतालों की ओर धकेलती है। लेकिन वहां पहुंचकर उसे राहत नहीं, बल्कि एक नए संघर्ष का सामना करना पड़ता है—आर्थिक शोषण का।

इलाज के नाम पर अनावश्यक जांच, महंगे पैकेज, अस्पष्ट बिलिंग, और हर कदम पर अतिरिक्त शुल्क—यह सब मिलकर एक ऐसा जाल बनाते हैं जिसमें मरीज और उसका परिवार फंस जाता है। बीमारी से ज्यादा डर अब अस्पताल के बिल का होता है।

कई परिवार इलाज के बाद केवल एक मरीज नहीं खोते, बल्कि अपनी वर्षों की जमा पूंजी भी खो देते हैं। कर्ज लेकर इलाज करवाना, जमीन गिरवी रखना, गहने बेच देना—यह सब अब असामान्य नहीं रहा।

यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है। हर डॉक्टर को दोषी ठहराना न तो उचित है, न ही न्यायसंगत। चिकित्सा क्षेत्र में आज भी ऐसे हजारों डॉक्टर हैं जो ईमानदारी और समर्पण से काम कर रहे हैं। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब चिकित्सा संस्थान ‘कॉर्पोरेट मॉडल’ पर चलने लगते हैं।

जब डॉक्टरों पर ‘टारगेट’ का दबाव होता है—इतने टेस्ट, इतने एडमिशन, इतनी सर्जरी—तो चिकित्सा निर्णय भी प्रभावित होते हैं। इलाज का केंद्र मरीज नहीं, बल्कि ‘प्रदर्शन’ बन जाता है। ऐसे में संवेदनशीलता धीरे-धीरे ‘प्रोफेशनल व्यवहार’ के पीछे छिप जाती है।

स्वास्थ्य सेवा का बाजारीकरण शायद इस पूरे संकट की जड़ है। जब स्वास्थ्य को ‘सेवा’ से ‘उद्योग’ में बदल दिया जाता है, तो प्राथमिकताएं स्वतः बदल जाती हैं। जहां पहले जीवन बचाना उद्देश्य था, वहां अब लाभ कमाना भी समानांतर लक्ष्य बन जाता है और जब लाभ और जीवन के बीच चयन करना हो, तो परिणाम अक्सर दुखद होते हैं।

हर बड़ी घटना के बाद वही प्रक्रिया दोहराई जाती है—जांच के आदेश, कमेटी का गठन, रिपोर्ट का इंतजार। लेकिन इन रिपोर्टों का क्या होता है? कितने मामलों में दोषियों को सजा मिलती है? कितने अस्पतालों का लाइसेंस रद्द होता है? सच यह है कि बहुत कम। यह स्थिति केवल लापरवाही नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता को दर्शाती है। जब तक दंड का भय नहीं होगा, तब तक सुधार की उम्मीद करना भी व्यर्थ है। यह केवल प्रशासन या अस्पतालों की जिम्मेदारी नहीं है। समाज को भी जागरूक होना होगा। मरीज के अधिकारों को जानना, बिलिंग पर सवाल उठाना, पारदर्शिता की मांग करना—यह सब आवश्यक है, चुप रहना अब विकल्प नहीं है।

इस घटना को केवल एक खबर की तरह पढ़कर भूल जाना आसान है। लेकिन यह समझना जरूरी है कि यह सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं है। यह उस व्यवस्था की विफलता का प्रतीक है जो हर दिन हजारों लोगों को प्रभावित करती है। यदि आज सवाल नहीं उठे, तो कल कोई और परिवार इसी दर्द से गुजरेगा।

कैमरे की कलम: गुमनामी के साये में सुबह का सिपाही


सुबह की पहली किरण जब क्षितिज पर दस्तक देती है, तब शहर अब भी आधी नींद में होता है। कहीं चाय चढ़ रही होती है, कहीं अलार्म बजने की तैयारी में होता है, और कहीं लोग अभी सपनों में खोए रहते हैं। लेकिन इसी अधजगी दुनिया में कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिनका दिन बहुत पहले शुरू हो चुका होता है। ये वे लोग हैं, जो हमारे दरवाजे तक हर सुबह अखबार पहुँचाते हैं—अखबार हॉकर।

हमारे लिए अखबार महज़ खबरों का पुलिंदा हो सकता है, लेकिन उनके लिए यह रोज़ी-रोटी का जरिया है, जीवन का संघर्ष है और जिम्मेदारी का एक ऐसा बोझ है, जिसे वे बिना किसी शोर-शराबे के ढोते रहते हैं। जब शहर सो रहा होता है, तब हॉकर जाग चुके होते हैं। सुबह के तीन या चार बजे का समय—जब ठंड हड्डियों तक चुभती है या गर्मी की रात अभी ढली नहीं होती—वे अपने दिन की शुरुआत करते हैं। नींद अधूरी होती है, शरीर थका हुआ होता है, लेकिन जिम्मेदारियाँ उन्हें आगे बढ़ने को मजबूर करती हैं।

अखबार एजेंसी तक पहुँचना, बंडल उठाना, उन्हें अलग-अलग मोहल्लों के हिसाब से बांटना—यह सब काम इतनी तेजी और सटीकता से होता है कि मानो यह कोई अभ्यास किया हुआ युद्ध हो। हर अखबार सही घर तक पहुँचना चाहिए, हर ग्राहक की अपेक्षा पूरी होनी चाहिए। एक छोटी सी चूक भी शिकायत में बदल सकती है। हॉकर का सबसे बड़ा दुश्मन समय होता है। उन्हें हर हाल में सूरज निकलने से पहले अपना काम पूरा करना होता है। साइकिल, मोटरसाइकिल या कभी-कभी पैदल—वे गलियों, सड़कों और मोहल्लों में दौड़ते रहते हैं। बारिश हो तो अखबार बचाना भी चुनौती बन जाता है। हवा तेज हो तो पन्ने उड़ने का डर रहता है। ठंड में उंगलियां सुन्न हो जाती हैं और गर्मी में पसीना आँखों में चुभता है। लेकिन इन सबके बावजूद, उनके काम की रफ्तार कभी धीमी नहीं पड़ती।

यह विडंबना ही है कि जो व्यक्ति हर सुबह हमें देश-दुनिया की खबरों से जोड़ता है, उसकी अपनी आर्थिक स्थिति अक्सर कमजोर होती है। अखबार बांटने के बदले उन्हें बहुत कम पैसा मिलता है—इतना कि उससे गुजारा करना भी मुश्किल हो जाता है। अक्सर यह काम वे किसी और नौकरी के साथ करते हैं, या फिर उनके परिवार के अन्य सदस्य भी किसी छोटे-मोटे काम में लगे होते हैं। कई बार बच्चों की पढ़ाई भी इसी संघर्ष में पीछे छूट जाती है।

समाज में हर काम का एक महत्व होता है, लेकिन हर काम को समान सम्मान नहीं मिलता। हॉकर का काम भी ऐसा ही है—जरूरी तो है, लेकिन सम्मान के मामले में पीछे छूट जाता है। हम अक्सर दरवाजा खोलते ही अखबार उठा लेते हैं, बिना यह सोचे कि उसे वहाँ तक पहुँचाने में कितनी मेहनत लगी होगी। कभी-कभी शिकायतें भी कर देते हैं—अखबार देर से आया, गीला था या सही जगह नहीं रखा गया। लेकिन क्या हम कभी उनके हालात समझने की कोशिश करते हैं?

अखबार हॉकर सिर्फ अखबार नहीं बाँटते, वे विश्वास भी बाँटते हैं। हर घर उनसे एक तय समय पर अखबार की उम्मीद करता है। यह भरोसा उनके कंधों पर एक अदृश्य जिम्मेदारी की तरह होता है। कई बार वे बीमार होते हुए भी काम पर निकलते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि अगर वे नहीं गए, तो कई घरों में सुबह अधूरी रह जाएगी। यह सिर्फ काम नहीं, बल्कि एक आदत और एक भरोसा है, जिसे वे निभाते हैं।

आज के डिजिटल युग में, जब खबरें मोबाइल स्क्रीन पर पल भर में उपलब्ध हो जाती हैं, अखबार हॉकर का काम और भी कठिन हो गया है। लोगों ने अखबार पढ़ना कम कर दिया है, जिससे उनकी आय पर सीधा असर पड़ा है। लेकिन इसके बावजूद, वे हार नहीं मानते। वे जानते हैं कि अभी भी बहुत से लोग सुबह की चाय के साथ कागज़ की खुशबू और छपी हुई खबरों का आनंद लेना पसंद करते हैं।

अगर हम गहराई से सोचें, तो हॉकर समाज को जोड़ने में एक अहम भूमिका निभाते हैं। वे हर दिन लाखों लोगों तक जानकारी पहुँचाते हैं, जागरूकता फैलाते हैं और लोकतंत्र की नींव को मजबूत करते हैं। उनका काम भले ही छोटा लगे, लेकिन उसका प्रभाव बहुत बड़ा होता है। वे उस सूचना श्रृंखला की पहली कड़ी हैं, जिसके बिना खबरें लोगों तक नहीं पहुँच सकतीं।

इन सबके बीच, हॉकर भी इंसान हैं—उनके भी सपने हैं, इच्छाएँ हैं और परेशानियाँ हैं। कोई अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देना चाहता है, कोई अपने घर की हालत सुधारना चाहता है, तो कोई सिर्फ एक स्थिर जीवन की उम्मीद करता है लेकिन अक्सर ये सपने जिम्मेदारियों और संघर्षों के बोझ तले दब जाते हैं। यह जरूरी है कि हम इन गुमनाम नायकों को पहचानें और उनके प्रति संवेदनशील बनें। एक छोटी सी मुस्कान, एक धन्यवाद, या उनके काम की सराहना—यह सब उनके लिए बहुत मायने रखता है। सरकार और समाज को भी उनके लिए बेहतर योजनाएँ बनानी चाहिए—जैसे बीमा, स्वास्थ्य सुविधाएँ और उचित वेतन। क्योंकि जब तक उनके जीवन में सुधार नहीं होगा, तब तक इस व्यवस्था की नींव कमजोर ही रहेगी।



कैमरे की कलम: बादाम, बाबू और बेबस नागरिक


बिलासपुर के हाउसिंग बोर्ड कार्यालय में घटी हालिया घटना ने प्रशासनिक तंत्र की उस पुरानी बीमारी को फिर उजागर कर दिया है, जिसे हम सब जानते तो हैं, पर अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। तोरण साहु नाम का युवक अपनी फाइल के महीनों से अटके होने से त्रस्त जब महिला अधिकारी की मेज पर बादाम उड़ेलते हुए यह कहता है कि “इसे खाइए, याद आ जाएगा फाइल कहां रखी है”, तो यह केवल एक क्षणिक आवेश या अनोखा विरोध नहीं रह जाता; यह व्यवस्था पर सीधा, तीखा और असहज सवाल बन जाता है।

यह घटना हंसी का विषय बन सकती है, सोशल मीडिया पर मनोरंजन का साधन भी। लेकिन यदि इसे केवल एक वायरल वीडियो के रूप में देख लिया गया, तो हम उस गहरे संकट को नजरअंदाज कर देंगे, जिसकी ओर यह इशारा करती है। 

उसके बादाम सिर्फ मेज पर नहीं गिरे थे वे उस पूरी व्यवस्था पर गिरे थे जो वर्षों से “याददाश्त खोने” का नाटक कर रही है।

सरकारी दफ्तरों में “फाइल नहीं मिल रही” अब अपवाद नहीं, लगभग एक स्वीकृत सत्य बन चुका है। यह स्थिति उतनी ही चिंताजनक है, जितनी सामान्य लगने लगी है। सवाल यह नहीं कि फाइलें क्यों खो जाती हैं, सवाल यह है कि उनके खो जाने के बाद भी व्यवस्था क्यों नहीं हिलती? एक नागरिक जब अपनी वैध प्रक्रिया पूरी कर चुका हो, दस्तावेज जमा कर चुका हो, और फिर भी महीनों तक केवल यह सुनता रहे कि उसकी फाइल “ढूंढी जा रही है”, तो यह केवल प्रशासनिक ढिलाई नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों का प्रत्यक्ष हनन है।

प्रशासनिक प्रक्रियाओं में समयसीमा तय होती है, कम से कम कागजों पर लेकिन व्यवहार में यह समयसीमा अक्सर एक औपचारिकता भर रह जाती है। एक-दो महीने में पूरा होने वाला काम सात महीने तक भी अधूरा रह जाए, तो यह केवल देरी नहीं, बल्कि जवाबदेही की विफलता है। इस विफलता की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसका कोई स्पष्ट उत्तरदायी नहीं होता। फाइल एक टेबल से दूसरी टेबल तक घूमती रहती है, और अंततः “कहीं” अटक जाती है बिना किसी के जिम्मेदार ठहराए।

यह विचारणीय है कि एक नागरिक को अपने वैध अधिकार के लिए व्यंग्य का सहारा क्यों लेना पड़ता है। बादाम का प्रतीकात्मक उपयोग केवल हास्य नहीं था यह उस संवेदनहीनता पर चोट थी, जो प्रशासनिक व्यवहार में गहराई तक समा चुकी है। जब सीधी शिकायतें अनसुनी रह जाती हैं, जब आवेदन और अनुस्मारक (रिमाइंडर) निष्प्रभावी हो जाते हैं, तब नागरिक के पास ऐसे ही प्रतीकात्मक तरीकों का सहारा बचता है। यह स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए स्वस्थ संकेत नहीं मानी जा सकती।

इस पूरे प्रकरण में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि मामला तब चर्चा में आया, जब उसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। यह दर्शाता है कि पारंपरिक शिकायत तंत्र की तुलना में सार्वजनिक दबाव अब अधिक प्रभावी होता जा रहा है लेकिन क्या किसी नागरिक को न्याय या समाधान पाने के लिए अपने मुद्दे को वायरल करना आवश्यक होना चाहिए? यदि हां, तो यह प्रशासनिक तंत्र की गंभीर कमजोरी का संकेत है।

किसी भी प्रशासनिक व्यवस्था की विश्वसनीयता उसकी जवाबदेही पर निर्भर करती है। यदि फाइल गुम होती है, तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि इसके लिए कौन जिम्मेदार है। यदि तय समय में काम नहीं होता, तो इसके परिणाम क्या होंगे। वर्तमान स्थिति में, इन दोनों प्रश्नों के उत्तर अक्सर धुंधले होते हैं। यही धुंधलापन लापरवाही को बढ़ावा देता है और नागरिक को असहाय बनाता है। 

यह मान लेना आसान है कि यह सिर्फ एक अलग घटना है लेकिन सच्चाई यह है कि यह हर शहर, हर कस्बे, हर दफ्तर की कहानी है—बस तरीके अलग-अलग हैं।

इस पूरी व्यवस्था में सबसे अधिक प्रभावित वह नागरिक है, जिसके पास न तो संसाधन हैं और न ही प्रभाव। वह केवल प्रक्रिया का पालन करता है, निर्देशों का अनुपालन करता है, और बदले में अपेक्षा करता है कि उसका काम समय पर हो जाएगा लेकिन जब उसे बार-बार दफ्तर के चक्कर लगाने पड़ते हैं, जब उसे हर बार नया बहाना सुनने को मिलता है, तो यह केवल असुविधा नहीं—यह उसके आत्मसम्मान पर भी चोट है।

इस घटना को एक अपवाद मानकर भुला देना आसान होगा, लेकिन इससे समस्या समाप्त नहीं होगी। आवश्यक है कि इसे एक संकेत के रूप में देखा जाए और सुधार की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं। प्रक्रियाओं का पूर्ण डिजिटलीकरण, ताकि फाइलों के गुम होने की संभावना समाप्त हो, समयबद्ध सेवा की सख्त निगरानी, प्रत्येक स्तर पर स्पष्ट जवाबदेही और सबसे महत्वपूर्ण, नागरिक के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण होना जरूरी है। 

बिलासपुर की यह घटना केवल एक युवक के विरोध की कहानी नहीं है; यह उस व्यापक असंतोष की अभिव्यक्ति है, जो लंबे समय से प्रशासनिक उदासीनता के कारण पनप रहा है।बादाम यहां एक प्रतीक बन गए हैं—याददाश्त बढ़ाने का नहीं, बल्कि व्यवस्था को उसकी जिम्मेदारियों की याद दिलाने का। 

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