देश में एक अजीब परंपरा विकसित हो गई है। यहां हर साल लाखों छात्र परीक्षा देते हैं, लेकिन असली परीक्षा छात्रों की नहीं, व्यवस्था की होती है। दुर्भाग्य यह है कि हर बार छात्र पास हो जाएं या फेल, व्यवस्था अपनी ही कॉपी जांचती है और खुद को 'उत्तीर्ण' घोषित कर देती है। फिर एक दिन कोई पेपर लीक हो जाता है। सरकार कहती है—"दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।" जांच एजेंसी कहती है—"जांच जारी है।" अधिकारी कहते हैं—"यह एक अलग-थलग घटना है" और छात्र सोचता है—"क्या मेरा भविष्य भी अलग-थलग घटना है?"
दिल्ली के जंतर-मंतर पर उमड़ा छात्र सैलाब केवल एक परीक्षा का विरोध नहीं था। वह उन लाखों युवाओं का जमा हुआ आक्रोश था, जिन्होंने वर्षों तक किताबों में सिर झुकाया, कोचिंग संस्थानों में लाखों रुपये खर्च किए, परिवारों की उम्मीदों का बोझ उठाया और अंत में पाया कि उनका मुकाबला प्रतिभा से नहीं, बल्कि पेपर लीक, दलालों और परीक्षा माफिया से कराया जा रहा है। छात्र आंदोलन के दबाव के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दिया। यह लोकतंत्र में जवाबदेही का एक महत्वपूर्ण क्षण था, लेकिन क्या केवल इस्तीफे से शिक्षा व्यवस्था का उपचार हो जाएगा? शायद नहीं। असल सवाल यह है कि भारत में परीक्षा अब ज्ञान की परीक्षा कम और धैर्य की परीक्षा अधिक क्यों बन गई है? हमारा शिक्षा तंत्र आज उस डॉक्टर की तरह हो गया है, जो हर मरीज को यही सलाह देता है—"अगली बार ध्यान रखिए।"
सरकारें अक्सर कहती हैं कि युवा देश का भविष्य हैं। लेकिन व्यवहार में लगता है कि युवा केवल चुनावी भाषणों का भविष्य हैं। चुनाव के समय युवाओं को रोजगार का सपना दिखाइए, परीक्षा कराइए, फिर पेपर लीक होने दीजिए, जांच बैठाइए, समिति बनाइए, रिपोर्ट मंगाइए और अगले चुनाव तक सब भूल जाइए।
आज आवश्यकता केवल कठोर कानून बनाने की नहीं है। कानून पहले भी थे। आवश्यकता उनके निष्पक्ष और त्वरित क्रियान्वयन की है। पेपर लीक को केवल आपराधिक घटना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संसाधनों और युवाओं के भविष्य पर सुनियोजित हमला माना जाना चाहिए। इसमें शामिल लोगों के खिलाफ ऐसी कार्रवाई होनी चाहिए कि आने वाले वर्षों में कोई इस अपराध की कल्पना भी न कर सके।
राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी सहित सभी परीक्षा संस्थाओं की स्वतंत्र तकनीकी और प्रशासनिक ऑडिट व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए। प्रश्नपत्र सुरक्षा, डिजिटल निगरानी, साइबर सुरक्षा और जवाबदेही के मानकों को अंतरराष्ट्रीय स्तर का बनाया जाना चाहिए। परीक्षा प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी बनाने के लिए समयबद्ध सुधार आवश्यक हैं लेकिन सुधार केवल संस्थागत नहीं, राजनीतिक भी होना चाहिए।
सरकारों को यह समझना होगा कि युवा केवल चुनावी घोषणापत्र का विषय नहीं हैं। वे राष्ट्र की उत्पादक शक्ति हैं। उनका विश्वास खो देना किसी भी सरकार की सबसे बड़ी राजनीतिक और नैतिक विफलता होगी।
शिक्षा को राजनीति का अखाड़ा बनाने की प्रवृत्ति भी समाप्त करनी होगी। परीक्षा में हुई हर गड़बड़ी पर सत्ता और विपक्ष यदि केवल एक-दूसरे पर आरोप लगाने में व्यस्त रहेंगे, तो सबसे बड़ी कीमत वह छात्र चुकाएगा, जिसका इन आरोपों से कोई संबंध नहीं है।
भारत दुनिया का सबसे युवा देश बनने का दावा करता है। यदि यह दावा वास्तविक है, तो सबसे अधिक निवेश भी युवाओं के विश्वास में होना चाहिए। सड़कें, पुल और इमारतें बाद में भी बन सकती हैं, लेकिन यदि एक पीढ़ी का भरोसा टूट गया, तो उसे दोबारा बनाने में दशकों लग जाते हैं।
यह आंदोलन एक मंत्री के इस्तीफे पर समाप्त नहीं होना चाहिए। इसकी परिणति परीक्षा सुधारों की व्यापक प्रक्रिया में होनी चाहिए। देश का हर छात्र यह महसूस करे कि उसका मुकाबला केवल प्रश्नपत्र से है, किसी माफिया, किसी दलाल और किसी भ्रष्ट तंत्र से नहीं।
किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी परीक्षा उसके छात्र नहीं देते, उसकी व्यवस्था देती है। आज यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि उस परीक्षा में हमारी व्यवस्था अपेक्षित अंक नहीं ला सकी है।
अब समय उत्तरपुस्तिका बदलने का नहीं, पूरी परीक्षा प्रणाली को सुधारने का है। तभी यह विश्वास लौटेगा कि भारत में सफलता का रास्ता मेहनत से होकर जाता है, न कि पेपर लीक की अंधेरी गलियों से।

