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कैमरे की कलम: दीयों की रोशनी में छिपे सवाल


कश्मीर से कन्याकुमारी तक दीये जले। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर ‘आशीर्वाद का दीया’ अभियान के तहत लोगों से दीप जलाकर उनके स्वस्थ और दीर्घायु जीवन की कामना करने की अपील की गई। लेकिन इसी रोशनी के बीच कुछ ऐसे सवाल भी हैं, जिन्हें लोकतंत्र में पूछना जरूरी है।

17 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर देश के विभिन्न हिस्सों में दीपोत्सव आयोजित किए गए। भारतीय जनता पार्टी ने लोगों से अपने घरों में ‘आशीर्वाद का दीया’ जलाने की अपील की थी। पार्टी अध्यक्ष नितिन नबीन ने इसे प्रधानमंत्री के दीर्घायु, स्वस्थ जीवन और निरंतर सफलता के लिए शुभकामना का अभियान बताया था।

बिहार के दरभंगा में हजारों दीये जलाए गए। नेहरू स्टेडियम और दरभंगा राज परिसर में आयोजित कार्यक्रमों में भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया और प्रधानमंत्री के लिए शुभाशीष मांगा। प्रधानमंत्री के लिए छत्तीसगढ़ में भी 'आशीर्वाद का दीया' लाखों की संख्या में प्रज्वलित हुआ। 

मध्य प्रदेश के उज्जैन में लाखों दीये जलाने और राज्यभर में करोड़ों दीप प्रज्वलित किए जाने की खबरें भी सामने आईं। बिहार के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में भी दीपोत्सव आयोजित किए गए। एक रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार में 20 लाख से अधिक दीये जलाए गए।

दीप जलाना भारतीय संस्कृति में शुभता और मंगलकामना का प्रतीक है। इसलिए किसी नेता के जन्मदिन पर उनके समर्थकों द्वारा दीप जलाना अपने आप में असामान्य बात नहीं है। सवाल उत्सव मनाने के अधिकार का नहीं है। सवाल उस सार्वजनिक संदेश और उसकी सुसंगति का है, जो इस पूरे आयोजन से निकलता है।

मई 2026 में पश्चिम एशिया संकट और विदेशी मुद्रा पर दबाव के बीच प्रधानमंत्री मोदी ने देशवासियों से कई तरह की मितव्ययिता अपनाने की अपील की थी। इसमें खाद्य तेल की खपत कम करने का आग्रह भी शामिल था।

प्रधानमंत्री ने कहा था कि भारत खाद्य तेल का बड़ा हिस्सा आयात करता है और यदि प्रत्येक परिवार खाद्य तेल के इस्तेमाल में कमी करता है तो यह देश के लिए बड़ी मदद होगी। उन्होंने खाद्य तेल की कम खपत को देशभक्ति से भी जोड़ा था। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार भारत अपनी खाद्य तेल जरूरत का लगभग 55-57 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है।

प्रधानमंत्री की इस अपील को बाद में केंद्र सरकार के स्तर पर भी मितव्ययिता, संसाधन संरक्षण और आत्मनिर्भरता के अभियान से जोड़ा गया। कृषि मंत्रालय ने खाद्य तेल की खपत कम करने के लिए अभियान चलाने की बात कही।

यानी नागरिक से संदेश था—जहां संभव हो, खपत घटाइए; देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम कीजिए; मितव्ययिता को देशहित से जोड़िए। अब उसी वर्ष प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर बड़े पैमाने पर दीपोत्सव का दृश्य सामने आता है। यहीं से एक असहज लेकिन जायज सवाल पैदा होता है।

यह कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा कि जन्मदिन के दीपोत्सव में इस्तेमाल हुआ सारा तेल खाद्य तेल था या कि जितने खाद्य तेल की बचत का आह्वान किया गया था, उसका सीधा संबंध इन दीयों में इस्तेमाल तेल से है। ऐसी तुलना के लिए प्रमाणित आंकड़े उपलब्ध होना जरूरी है लेकिन बात केवल गणित की नहीं है। बात सार्वजनिक संदेश की विश्वसनीयता की है।

जब देश के हर परिवार से कहा जाता है कि वह अपने घर की रसोई में तेल की खपत कम करे और इसे देशभक्ति का योगदान बताया जाता है, तब उसी नागरिक के सामने बड़े पैमाने पर तेल के दीये जलाने का दृश्य स्वाभाविक रूप से यह सवाल पैदा करता है कि मितव्ययिता की कसौटी क्या केवल आम आदमी के लिए है? सार्वजनिक जीवन में संदेश तभी प्रभावशाली होता है जब उसका पालन करने का उदाहरण भी दिखाई दे।

इस पूरे प्रसंग का सबसे संवेदनशील पहलू बिहार है। बिहार में इस साल बाढ़ ने बड़ी आबादी को प्रभावित किया। इसी दौरान प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर ‘आशीर्वाद का दीया’ जलाने का अभियान चलाया गया। विपक्षी नेताओं ने इस पर सवाल उठाए। आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने बाढ़ से प्रभावित लोगों की संख्या और दीपोत्सव पर संभावित खर्च को लेकर सरकार पर निशाना साधा। ये उनके राजनीतिक आरोप हैं; खर्च की उनकी बताई राशि की स्वतंत्र पुष्टि अलग से जरूरी है।

पूर्णिया के सांसद पप्पू यादव ने भी सवाल उठाया कि जब बिहार के कई जिले बाढ़ से प्रभावित हैं, तब लोगों और सरकारी कर्मचारियों से प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर दीप जलाने की अपेक्षा क्यों की जा रही है। उन्होंने सरकारी स्कूलों में कार्यक्रम के लिए जारी निर्देश का भी मुद्दा उठाया।

यहां फिर वही फर्क समझना जरूरी है—दीप जलाने का कार्यक्रम और बाढ़ राहत कार्य पर खर्च एक-दूसरे के सीधे विकल्प नहीं हैं। किसी आयोजन पर खर्च होने वाला प्रत्येक रुपया बाढ़ राहत में लगाया जा सकता था, ऐसा मान लेना भी उचित नहीं होगा लेकिन आपदा की घड़ी में सरकार और राजनीतिक संगठनों की प्राथमिकताओं का प्रतीकात्मक महत्व जरूर होता है, जिस समय हजारों परिवारों के सामने घर, भोजन, पशु, फसल और रोजमर्रा के जीवन को बचाने की चुनौती हो, उस समय सत्ता के आसपास होने वाला कोई भी बड़ा उत्सव स्वाभाविक रूप से सवालों के घेरे में आएगा।

इस बहस का दूसरा पहलू इससे भी महत्वपूर्ण है—क्या ऐसे आयोजनों में सरकारी तंत्र की भूमिका थी? बिहार में इसको लेकर विरोधाभासी तस्वीर सामने आई। कुछ स्थानों पर सरकारी स्कूलों और संस्थानों में ‘आशीर्वाद का दीया’ कार्यक्रम आयोजित करने संबंधी निर्देशों की रिपोर्ट सामने आई। दूसरी ओर लखीसराय में अंतिम समय पर मुख्य सचिव के निर्देश के बाद प्रशासनिक अधिकारियों को कार्यक्रम से अलग रहने को कहा गया और जिला प्रशासन द्वारा तैयार किया गया कार्यक्रम स्थगित कर दिया गया। रिपोर्ट के अनुसार वहां एक लाख से अधिक मिट्टी के दीयों की तैयारी की गई थी। यह घटनाक्रम अपने आप में एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक प्रश्न खड़ा करता है।

प्रधानमंत्री देश के निर्वाचित प्रधानमंत्री हैं, लेकिन उनका जन्मदिन किसी राजनीतिक दल के लिए राजनीतिक कार्यक्रम भी हो सकता है। इसलिए यदि कोई आयोजन पार्टी कर रही है तो उसे पार्टी कार्यक्रम के रूप में स्पष्ट रखना लोकतांत्रिक दृष्टि से अधिक पारदर्शी है। यदि उसमें सरकारी विभाग, सरकारी कर्मचारी, स्कूल या सार्वजनिक धन शामिल होता है तो उसकी प्रकृति और वित्तीय स्रोत भी स्पष्ट होने चाहिए। यही पारदर्शिता लोकतंत्र में भरोसा पैदा करती है । देश में प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर उत्सव मनाने वाले नागरिकों को यह अधिकार है कि वे अपनी श्रद्धा और समर्थन व्यक्त करें। किसी नेता के समर्थकों की भावनाओं को भी लोकतांत्रिक विमर्श में स्थान मिलना चाहिए लेकिन लोकतंत्र का दूसरा पक्ष यह भी है कि सार्वजनिक आयोजन पर सवाल पूछे जा सकें और यह सवाल केवल विपक्ष का सवाल नहीं होना चाहिए।

यदि कोई सरकार नागरिकों से कहती है कि खाद्य तेल बचाना देशभक्ति है, तो उसी देशभक्ति के दूसरे पहलू—सार्वजनिक मितव्ययिता—पर सवाल उठना स्वाभाविक है। यदि सरकार या राजनीतिक संगठन ‘सेवा’ को प्रधानमंत्री के जन्मदिन का केंद्रीय संदेश बनाते हैं, तो बाढ़, बीमारी, बेरोजगारी या अन्य संकटों से जूझ रहे लोगों के बीच सेवा का प्रत्यक्ष स्वरूप क्या होना चाहिए—इस पर बहस भी स्वाभाविक है और यदि प्रधानमंत्री का जन्मदिन करोड़ों लोगों तक पहुंचने वाले अभियान में बदलता है, तो यह भी पूछा जाना चाहिए कि उस अभियान में सरकारी और राजनीतिक भूमिकाओं का विभाजन कितना स्पष्ट है।

इस पूरे मामले को ‘दीया बनाम बाढ़ राहत’ जैसे सरल द्वंद्व में बदलना उचित नहीं होगा। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में उत्सव और आपदा राहत दोनों साथ-साथ चल सकते हैं। किसी एक के होने से दूसरे की आवश्यकता समाप्त नहीं होती लेकिन सार्वजनिक जीवन में प्रतीकों का महत्व होता है। बाढ़ के बीच एक परिवार के लिए एक पैकेट भोजन, पीने का पानी, दवा या सुरक्षित आश्रय शायद उस समय सबसे बड़ा ‘दीया’ हो सकता है। किसी कुम्हार के लिए हजारों दीयों का ऑर्डर रोजगार का अवसर हो सकता है। दूसरी तरफ बाढ़ में फंसे परिवार के लिए वही समय जीवन बचाने का संघर्ष हो सकता है, इसलिए बहस यह नहीं कि दीया जलना चाहिए था या नहीं। बहस यह है कि क्या उस समय दीपोत्सव से ज्यादा ताकतवर प्रतीक राहत, पुनर्वास और पीड़ितों के साथ खड़े होने का नहीं हो सकता था?

अब जब उसी देश में प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर लाखों-करोड़ों दीयों की रोशनी दिखाई देती है, और उसी समय बिहार का एक बड़ा हिस्सा बाढ़ की मार से जूझ रहा था, तब सवाल उठना स्वाभाविक है— क्या देशभक्ति का अर्थ केवल आम नागरिक द्वारा अपनी खपत कम करना है, या सार्वजनिक जीवन में भी संयम, सादगी और प्राथमिकताओं का वही पैमाना लागू होना चाहिए?

शायद इस सवाल का सबसे ईमानदार उत्तर किसी राजनीतिक भाषण में नहीं, बल्कि उस नागरिक के अनुभव में मिलेगा जो एक हाथ से अपना चूल्हा बचाने के लिए तेल नाप रहा है और दूसरे हाथ से बाढ़ में डूबे घर को बचाने की कोशिश कर रहा है। दीये जलते रहें—यह भारतीय परंपरा की खूबसूरती है,लेकिन लोकतंत्र की असली रोशनी तब होगी, जब उत्सव की चमक के साथ उन सवालों को भी जगह मिले जो उस चमक के पीछे खड़े हैं।

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