एक भव्य भवन है। करोड़ों रुपये की लागत है। प्रधानमंत्री के हाथों लोकार्पण है। मुख्यमंत्री का निरीक्षण है। सरकारी विज्ञापनों में उपलब्धियों की लंबी सूची है। लेकिन यदि किसी हार्ट अटैक के मरीज को वहां से दूसरे अस्पताल रेफर कर दिया जाए, यदि किडनी या ब्रेन से जुड़ा गंभीर मरीज इलाज के बजाय केवल कागजी प्रक्रिया का हिस्सा बन जाए, तो फिर यह सवाल पूछना जनता का अधिकार है कि आखिर यह अस्पताल है या केवल उद्घाटन का स्मारक? आज राजनीति का सबसे बड़ा संकट यही है कि सरकारें उद्घाटन को उपलब्धि मान लेती हैं, संचालन को नहीं।
देश में पिछले कुछ वर्षों में एक नई राजनीतिक संस्कृति विकसित हुई है। किसी भी परियोजना का शिलान्यास हो जाए, लोकार्पण हो जाए, फोटो खिंच जाए, मंच सज जाए और सोशल मीडिया पर वीडियो चल जाए, तो मान लिया जाता है कि जनता का काम पूरा हो गया। जबकि असली परीक्षा उसके बाद शुरू होती है। दुर्भाग्य यह है कि वही परीक्षा सबसे ज्यादा उपेक्षित रहती है।
एक सुपर स्पेशलिटी अस्पताल केवल दीवारों का नाम नहीं होता। वह विशेषज्ञ डॉक्टरों, प्रशिक्षित नर्सों, आधुनिक मशीनों, कैथ लैब, आईसीयू, ऑक्सीजन प्लांट, ब्लड बैंक, इमरजेंसी सेवाओं और चौबीसों घंटे चलने वाली स्वास्थ्य व्यवस्था का नाम है। यदि इनमें से अधिकांश सुविधाएं अनुपस्थित हों तो भवन चाहे कितना भी भव्य हो, वह जनता के लिए केवल एक प्रतीक्षा कक्ष बनकर रह जाता है।
विडंबना यह है कि जब अस्पताल का उद्घाटन हुआ था तब जनता को भरोसा दिलाया गया था कि अब बिलासपुर संभाग के लोगों को रायपुर, नागपुर, हैदराबाद या दिल्ली की ओर नहीं भागना पड़ेगा। गरीब किसान, मजदूर और मध्यम वर्ग के परिवारों को अपने शहर में ही आधुनिक इलाज मिलेगा। लेकिन यदि आज भी गंभीर मरीजों को दूसरे अस्पतालों में रेफर करना पड़ रहा है तो जाहिर है कि भरोसे और हकीकत के बीच की दूरी बहुत बड़ी है।
यह प्रश्न किसी एक दल का नहीं है। यह प्रश्न उस व्यवस्था का है जिसमें भवन तैयार होते ही सरकारें अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेती हैं। स्वास्थ्य जैसी संवेदनशील व्यवस्था में केवल निर्माण कार्य पूरा होना सफलता नहीं कहलाता। सफलता तब है जब एक मरीज अस्पताल से स्वस्थ होकर अपने घर लौटे।
सरकार को यह भी समझना होगा कि स्वास्थ्य सेवा चुनावी भाषणों का विषय नहीं है। यहां किसी भी प्रकार की लापरवाही सीधे इंसानी जिंदगी पर असर डालती है। एक सड़क देर से बने तो असुविधा होती है, लेकिन अस्पताल अधूरा रहे तो किसी की जान जा सकती है। इसलिए स्वास्थ्य परियोजनाओं का मूल्यांकन फीता काटने से नहीं बल्कि बची हुई जिंदगियों से होना चाहिए।
और यह समस्या केवल कोनी अस्पताल तक सीमित नहीं है। प्रदेश के अधिकांश सरकारी अस्पतालों की तस्वीर लगभग यही है। कहीं डॉक्टर नहीं हैं, कहीं विशेषज्ञ नहीं हैं, कहीं मशीनें धूल खा रही हैं, कहीं करोड़ों की लागत से खरीदे गए उपकरण ऑपरेटर के अभाव में बंद पड़े हैं। कई अस्पतालों में भवन पहले बन जाते हैं, स्टाफ वर्षों बाद आता है। कहीं स्टाफ है तो दवाइयां नहीं हैं। कहीं दवाइयां हैं तो जांच की सुविधा नहीं। व्यवस्था का यह बिखराव अब सामान्य बात मान लिया गया है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि स्वास्थ्य सेवाओं में स्थायी नियुक्तियों के बजाय संविदा और अस्थायी व्यवस्थाओं पर निर्भरता लगातार बढ़ती जा रही है। डॉक्टरों, नर्सों और तकनीकी कर्मचारियों की कमी का समाधान लंबे समय की योजना से होना चाहिए, न कि अस्थायी नियुक्तियों के सहारे। जब व्यवस्था अस्थायी होगी तो सेवा भी अस्थायी ही दिखाई देगी।
सरकारें अक्सर यह तर्क देती हैं कि संसाधनों की कमी है। लेकिन जनता यह पूछने लगी है कि यदि संसाधन नहीं थे तो उद्घाटन किस बात का किया गया? यदि कैथ लैब तैयार नहीं थी, ऑक्सीजन प्लांट चालू नहीं था, आईसीयू पूर्ण रूप से संचालित नहीं था और विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध नहीं थे तो फिर जनता के सामने यह संदेश क्यों दिया गया कि अस्पताल पूरी तरह तैयार है? लोकतंत्र में प्रचार और वास्तविकता के बीच का अंतर जितना बढ़ता है, जनता का विश्वास उतना ही कम होता जाता है।
यह भी सच है कि किसी भी नई स्वास्थ्य परियोजना को पूरी तरह संचालित होने में समय लगता है। विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियुक्ति, उपकरणों की स्थापना और तकनीकी प्रक्रियाएं एक दिन में पूरी नहीं होतीं। लेकिन यदि उद्घाटन के लंबे समय बाद भी आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध न हों तो सवाल उठना स्वाभाविक है। ऐसे सवालों का जवाब विरोधियों को नहीं, सरकार को देना चाहिए।
स्वास्थ्य व्यवस्था में जवाबदेही सबसे महत्वपूर्ण तत्व है। जनता को यह जानने का अधिकार है कि अस्पताल की कौन-कौन सी सुविधाएं चालू हैं, कौन सी लंबित हैं, डॉक्टरों के कितने पद स्वीकृत हैं, कितने भरे गए हैं और शेष कब तक भरे जाएंगे। पारदर्शिता ही विश्वास पैदा करती है, प्रचार नहीं।
दुर्भाग्य यह है कि आज राजनीति में उपलब्धियों की सूची लंबी होती जा रही है, लेकिन जनता के अनुभव उससे मेल नहीं खाते। सरकारी दावों में सब कुछ उत्कृष्ट दिखाई देता है, जबकि अस्पतालों की कतारों में खड़े मरीज कुछ और कहानी कहते हैं। विज्ञापन बताते हैं कि स्वास्थ्य सेवाएं सुदृढ़ हैं, लेकिन एंबुलेंस का इंतजार करता परिवार उस दावे पर विश्वास नहीं कर पाता।
सरकार किसी भी दल की हो, उसे यह स्वीकार करना होगा कि स्वास्थ्य क्षेत्र में आधे-अधूरे काम सबसे खतरनाक होते हैं। अस्पतालों का निर्माण अंतिम लक्ष्य नहीं, बल्कि पहला कदम है। उसके बाद शुरू होती है असली जिम्मेदारी—योग्य मानव संसाधन, आधुनिक तकनीक, पर्याप्त दवाइयां, प्रभावी प्रबंधन और सतत निगरानी।
कोनी अस्पताल का मुद्दा केवल एक अस्पताल का मुद्दा नहीं है। यह उस सोच का आईना है जिसमें उपलब्धि का अर्थ उद्घाटन समारोह बन गया है। यदि यही प्रवृत्ति जारी रही तो प्रदेश में ऐसे कई अस्पताल होंगे जिनकी इमारतें चमकेंगी, लेकिन मरीजों की उम्मीदें बुझती रहेंगी।
आखिर में सवाल केवल सरकार से नहीं, पूरे प्रशासनिक तंत्र से है—क्या हम अस्पताल इसलिए बनाते हैं कि वहां रिबन कट सके, या इसलिए कि वहां जिंदगी बचाई जा सके? जब तक इस प्रश्न का ईमानदार उत्तर नहीं मिलेगा, तब तक करोड़ों की इमारतें बनती रहेंगी, उद्घाटन होते रहेंगे, भाषण गूंजते रहेंगे, लेकिन गरीब मरीज इलाज की तलाश में एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल तक भटकता रहेगा और तब इतिहास यह नहीं पूछेगा कि कितने अस्पताल बने थे। इतिहास यह पूछेगा कि उन अस्पतालों में कितनी जिंदगियां बचाई गई थीं।
