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कैमरे की कलम: जब कैमरा गवाह बन जाए

कभी कहा जाता था कि "दीवारों के भी कान होते हैं।" इक्कीसवीं सदी ने इस कहावत को बदल दिया है। अब दीवारों के सिर्फ कान नहीं, आंखें भी हैं। जेब में रखा मोबाइल फोन, सड़क पर लगा सीसीटीवी कैमरा और पुलिस की वर्दी पर लगा बॉडी कैमरा आज लोकतंत्र के सबसे निष्पक्ष गवाह बनते जा रहे हैं। इनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इन्हें न सत्ता का भय होता है, न विपक्ष का मोह और न ही किसी दल या व्यक्ति के प्रति पूर्वाग्रह। कैमरा वही दिखाता है जो उसके सामने घटता है।

पिछले कुछ वर्षों में देश में जितने बड़े राजनीतिक, प्रशासनिक और सामाजिक विवाद सामने आए हैं, उनमें से अधिकांश की शुरुआत किसी वीडियो, ऑडियो या सीसीटीवी फुटेज से हुई। कहीं कोई मंत्री अपने पद के अहंकार में दिखाई दिया, कहीं कोई अधिकारी जनता से दुर्व्यवहार करता मिला, कहीं पुलिस की बर्बरता कैमरे में कैद हुई, तो कहीं अस्पताल में डॉक्टरों से मारपीट करते जनप्रतिनिधि की हेकड़ी कुछ ही घंटों में अदालत तक पहुंच गई। यदि ये कैमरे न होते तो अधिकांश मामलों में वही पुराना सरकारी वाक्य सुनाई देता—"आरोप निराधार हैं। जांच कराई जाएगी।"

दरअसल, तकनीक ने लोकतंत्र को वह ताकत दे दी है, जिसे कभी केवल अखबार, अदालत और विपक्ष मिलकर भी नहीं दे पाते थे—तथ्य का निर्विवाद प्रमाण।

यही कारण है कि कैमरे से सबसे अधिक असहज वही लोग होते हैं जो अधिकार को जवाबदेही से ऊपर मानते हैं। आम नागरिक कैमरे से इसलिए नहीं डरता क्योंकि उसके पास छिपाने को बहुत कम होता है। लेकिन सत्ता, चाहे वह राजनीतिक हो या प्रशासनिक, अक्सर रिकॉर्डिंग से असहज हो जाती है। जैसे ही कोई नागरिक मोबाइल निकालता है, कई जगह सबसे पहला आदेश सुनाई देता है—"वीडियो बंद करो। मोबाइल रखो। रिकॉर्डिंग मत करो।"

सवाल यह है कि क्यों?

यदि सरकारी अधिकारी नियमों के अनुसार काम कर रहा है, पुलिस कानून के दायरे में कार्रवाई कर रही है और जनप्रतिनिधि जनता के प्रति मर्यादित व्यवहार कर रहा है, तो रिकॉर्डिंग से डर किस बात का?

लोकतंत्र में सत्ता जनता से ताकत लेती है। इसलिए जनता को यह अधिकार भी होना चाहिए कि वह सत्ता के व्यवहार का दस्तावेज तैयार कर सके।

विडंबना यह है कि सरकार नागरिकों को तो हर जगह कैमरों की निगरानी में रखती है। रेलवे स्टेशन, हवाई अड्डे, टोल प्लाजा, बैंक, सरकारी कार्यालय, अस्पताल, बाजार, चौराहे—हर जगह सीसीटीवी लगे हैं। नागरिक की हर गतिविधि रिकॉर्ड होती है। लेकिन जैसे ही नागरिक सरकार की गतिविधि रिकॉर्ड करना चाहता है, उसे अनुशासन, गोपनीयता और कानून का पाठ पढ़ाया जाने लगता है। लोकतंत्र में यह दोहरा मापदंड नहीं चल सकता।

दुनिया के अनेक लोकतांत्रिक देशों में पुलिस के लिए बॉडी कैमरा अनिवार्य है। इसका उद्देश्य केवल पुलिस की निगरानी करना नहीं, बल्कि पुलिस को झूठे आरोपों से बचाना भी है। यदि कोई आरोपी पुलिस पर मारपीट का आरोप लगाता है और रिकॉर्डिंग कुछ और कहती है, तो वही वीडियो पुलिस की ढाल बन जाता है। इसी प्रकार यदि पुलिस अपनी शक्ति का दुरुपयोग करती है तो वही कैमरा जनता के अधिकारों का प्रहरी बन जाता है।

अर्थात कैमरा किसी एक पक्ष का नहीं, सत्य का पक्षधर होता है।

भारत में भी समय-समय पर पुलिस को बॉडी कैमरे दिए गए, लेकिन उनका उपयोग अपेक्षित स्तर पर नहीं हो सका। कहीं उपकरण अलमारियों में बंद रह गए, कहीं बैटरी खत्म रही और कहीं कैमरे चालू ही नहीं किए गए। तकनीक उपलब्ध थी, लेकिन पारदर्शिता की इच्छा अनुपस्थित रही।

असल प्रश्न यह है कि क्या केवल पुलिस ही क्यों?

सरकारी कार्यालयों में होने वाली प्रत्येक औपचारिक बातचीत की रिकॉर्डिंग क्यों न हो?

तहसील, नगर निगम, पंचायत, आरटीओ, राजस्व कार्यालय, पुलिस थाना, विकासखंड, बिजली कार्यालय—जहां भी नागरिक अपने अधिकार के लिए सरकारी कर्मचारी के सामने खड़ा होता है, वहां उसकी बातचीत रिकॉर्ड करने का अधिकार उसे क्यों न मिले?

आज अधिकांश भ्रष्टाचार फाइलों में नहीं, मौखिक आदेशों में होता है।

कई वरिष्ठ अधिकारी अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को विवादास्पद निर्देश कभी लिखित में नहीं देते। आदेश हमेशा मौखिक होता है। बाद में जब जांच होती है तो वही अधिकारी कह देता है—"मैंने ऐसा कोई निर्देश नहीं दिया।"

यदि ऐसे संवाद रिकॉर्ड किए जा सकें, तो न केवल गलत आदेश देने की प्रवृत्ति कम होगी, बल्कि ईमानदार कर्मचारी भी सुरक्षित रहेगा।

भारतीय प्रशासन में "मौखिक आदेश" शायद सबसे बड़ा अदृश्य भ्रष्टाचार है। फाइलें साफ रहती हैं और जिम्मेदारी हवा में गायब हो जाती है।

तकनीक इस बीमारी का इलाज बन सकती है।

बेशक, इसका अर्थ यह नहीं कि निजी जीवन की गोपनीयता समाप्त कर दी जाए। लोकतंत्र में निजता मौलिक अधिकार है। किसी के घर, निजी बातचीत या व्यक्तिगत जीवन में अनधिकृत रिकॉर्डिंग स्वीकार्य नहीं हो सकती। लेकिन जब कोई व्यक्ति सरकारी पद पर बैठकर सार्वजनिक दायित्व निभा रहा हो, तब उसके आधिकारिक व्यवहार पर पारदर्शिता का सिद्धांत लागू होना चाहिए।

लोकतंत्र में सरकारी पद निजी संपत्ति नहीं होता।

यह जनता का विश्वास होता है।

और विश्वास का सबसे मजबूत आधार पारदर्शिता है।

सुप्रीम कोर्ट पहले ही देश के सभी थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाने के निर्देश दे चुका है। कई राज्यों में इस दिशा में काम भी हुआ है। अदालतों की कार्यवाही रिकॉर्ड होती है। संसद और विधानसभाओं की हर गतिविधि रिकॉर्ड होती है। नगर निगम की बैठकों का भी वीडियो बनता है। यदि लोकतंत्र के सर्वोच्च संस्थानों की कार्यवाही रिकॉर्ड हो सकती है तो फिर सरकारी दफ्तरों में जनता और अधिकारियों के बीच होने वाली औपचारिक बातचीत रिकॉर्ड होने में आपत्ति कैसी?

जो व्यवस्था स्वयं को ईमानदार मानती है, उसे कैमरे से नहीं, कैमरे की अनुपस्थिति से डरना चाहिए।

यह भी सच है कि कैमरा हर समस्या का समाधान नहीं है। कैमरा रिश्वतखोरी समाप्त नहीं कर सकता। कैमरा भ्रष्टाचार की मानसिकता नहीं बदल सकता। कैमरा कानून का विकल्प नहीं है। लेकिन कैमरा सत्य का ऐसा दस्तावेज अवश्य बन सकता है जिसे झुठलाना कठिन हो।

लोकतंत्र में झूठ सबसे अधिक वहीं फलता-फूलता है जहां प्रमाण नहीं होते।

कैमरा प्रमाण पैदा करता है।

इसलिए वह लोकतंत्र का शत्रु नहीं, सहयोगी है।

अब समय आ गया है कि सरकार स्पष्ट नीति बनाए। नागरिकों को यह कानूनी अधिकार मिले कि वे सरकारी कार्यालयों में अपने आधिकारिक कामकाज के दौरान होने वाली बातचीत रिकॉर्ड कर सकें। पुलिस कार्रवाई में बॉडी कैमरा अनिवार्य रूप से चालू रहे। सरकारी बैठकों में मौखिक निर्देशों के बजाय रिकॉर्डेड या लिखित आदेशों की व्यवस्था हो। और यदि कोई अधिकारी बिना वैध कारण रिकॉर्डिंग रोकता है या नागरिक का मोबाइल छीनता है, तो इसे भी अनुशासनहीनता माना जाए।

इक्कीसवीं सदी में लोकतंत्र का नया प्रहरी कोई व्यक्ति नहीं, तकनीक है।

कैमरा न पक्षधर होता है, न विरोधी। वह न सरकार के लिए वोट मांगता है, न विपक्ष के लिए नारे लगाता है। वह केवल सच दर्ज करता है।

शायद यही कारण है कि जो लोग सच के साथ खड़े हैं, उन्हें कैमरे से डर नहीं लगता।

और जो कैमरे से डरते हैं, वे अनजाने में यह स्वीकार कर देते हैं कि उन्हें सच से असुविधा है। 

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