लोकतंत्र की असली परीक्षा चुनाव जीतने में नहीं होती, बल्कि उस दिन होती है, जब सत्ता के सामने एक गरीब खड़ा होता है। जब एक ओर सरकार होती है और दूसरी ओर वह आदमी, जिसकी पूरी जिंदगी उसकी दो कमरों की झोपड़ी या पक्के मकान में सिमटी होती है। राजधानी रायपुर के नकटी गांव में 29 जून की सुबह जो कुछ हुआ, उसने सिर्फ दर्जनों मकानों को नहीं गिराया, बल्कि शासन, प्रशासन और राजनीति के संवेदनशील होने के दावों को भी मलबे में दबा दिया।
कहा गया कि यह सरकारी जमीन थी। कहा गया कि अतिक्रमण हटाया गया। कहा गया कि कानून अपना काम कर रहा था। लेकिन सवाल यह है कि क्या कानून का चेहरा हमेशा बुलडोजर ही होता है? क्या संविधान की आत्मा सिर्फ सरकारी फाइलों में रहती है, उन लोगों के जीवन में नहीं, जिनके सिर से एक ही दिन में छत छीन ली गई?
नकटी में टूटी सिर्फ दीवारें नहीं थीं। वहां बच्चों के सपने टूटे, बुजुर्गों की उम्रभर की जमा-पूंजी टूटी, महिलाओं का घर बसाने का संघर्ष टूटा। खुले आसमान के नीचे बिखरी स्टील की थालियां, स्कूल बैग, भगवान की तस्वीरें, शादी के एलबम और बिस्तर सिर्फ सामान नहीं थे, वे उन परिवारों की पूरी जिंदगी थे, जिन्हें कुछ घंटों में सड़क पर ला दिया गया।
नकटी की तस्वीरें किसी प्राकृतिक आपदा की नहीं थीं। वहां न भूकंप आया था, न बाढ़ और न ही कोई युद्ध हुआ था। वहां यह सब लोकतांत्रिक सरकार के आदेश पर हुआ। फर्क सिर्फ इतना है कि किसी विदेशी सेना की जगह बुलडोजर पर सरकारी मोहर लगी हुई थी।
विडंबना देखिए। जिन लोगों को सरकार वर्षों तक नागरिक मानती रही, उन्हें बिजली का कनेक्शन दिया गया, पानी की सुविधा दी गई, राशन कार्ड दिए गए, प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ मिला, उन्हीं लोगों को अचानक एक दिन यह बता दिया गया कि वे अवैध हैं। यदि वे वास्तव में अवैध कब्जाधारी थे तो आखिर इतने वर्षों तक पूरा सरकारी तंत्र क्या कर रहा था? क्या बिजली विभाग अवैध था? क्या जल विभाग अवैध था? क्या प्रधानमंत्री आवास योजना अवैध थी? या फिर आज की कार्रवाई सवालों से बचने के लिए कानून का सुविधाजनक इस्तेमाल भर है? सरकार के पास इस प्रश्न का अब तक कोई स्पष्ट उत्तर नहीं है।
सबसे पीड़ादायक बात यह नहीं कि मकान टूटे। सबसे पीड़ादायक बात यह है कि यह सब मानसून की दहलीज पर हुआ। जब बादल बरसने को तैयार हैं, तब सैकड़ों लोग अपने ही घरों के मलबे पर बैठकर यह सोच रहे हैं कि अगली बारिश में उनके बच्चों का सिर कहां छिपेगा। प्रशासन के लिए यह एक फाइल का निस्तारण होगा, लेकिन उन परिवारों के लिए यह जीवनभर न भरने वाला घाव है।
प्रशासन कहता है कि पुनर्वास किया जा रहा है। लेकिन यदि पुनर्वास इतना ही उत्कृष्ट था तो लोग सड़कों पर प्रदर्शन क्यों कर रहे हैं? वे कलेक्टोरेट क्यों पहुंचे? मंत्री के बंगले के बाहर क्यों बैठे? मुख्यमंत्री निवास तक क्यों गए? क्या कोई परिवार सिर्फ राजनीति करने के लिए अपने टूटे हुए घर के मलबे पर बैठा रहता है?
सरकार कहती है कि सब कुछ कानून के मुताबिक हुआ। लेकिन लोकतंत्र केवल कानून से नहीं चलता, संवेदना से भी चलता है। कानून सरकार को अतिक्रमण हटाने का अधिकार देता है, लेकिन क्या वह सरकार को संवेदनहीन होने का भी अधिकार देता है? क्या पुनर्वास पूरा होने से पहले लोगों को बेघर करना प्रशासनिक सफलता कहलाएगा?
सबसे दुखद दृश्य वे बच्चे थे जो अपने टूटे हुए घरों के बीच अपना स्कूल बैग खोज रहे थे। उन्हें कानून नहीं मालूम। उन्हें भू-राजस्व संहिता की धारा 248 नहीं पता। वे सिर्फ इतना जानते हैं कि कल तक उनका घर था, आज नहीं है।
इस पूरे घटनाक्रम में सरकार की राजनीतिक कार्यशैली भी कई सवाल खड़े करती है। जिन जनप्रतिनिधियों का पहला कर्तव्य जनता का विश्वास जीतना और उसे बनाए रखना होता है, वे इस पूरे मामले में या तो चुप दिखाई दिए या फिर सरकारी निर्णयों के पक्ष में खड़े नजर आए। सत्ता का दायित्व सिर्फ सरकारी आदेशों का बचाव करना नहीं होता, बल्कि जनता और सरकार के बीच पुल बनने का भी होता है। लेकिन नकटी में यह पुल कहीं दिखाई नहीं दिया।
सबसे अधिक चर्चा भाजपा सांसद बृजमोहन अग्रवाल के बयान की हुई। प्रभावित परिवारों का दावा है कि कार्रवाई से पहले उन्होंने भरोसा दिलाया था कि किसी का घर नहीं टूटेगा। लेकिन जब बुलडोजर चल गए, तब उन्होंने जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग कर दी। सवाल यह है कि यदि उन्हें कार्रवाई की जानकारी नहीं थी, तो यह सरकार और संगठन के बीच संवादहीनता का संकेत है। और यदि जानकारी थी, तो फिर लोगों को आश्वासन क्यों दिया गया? दोनों ही स्थितियां चिंताजनक हैं।
क्षेत्रीय विधायक अनुज शर्मा की भूमिका भी कठघरे में है। लोकतंत्र में विधायक सिर्फ विधानसभा में बैठने के लिए नहीं चुने जाते। वे जनता की आवाज होते हैं। यदि उनके क्षेत्र के लोग खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं, यदि उनके बयान लोगों के आक्रोश का कारण बन रहे हैं, तो यह केवल राजनीतिक असहमति नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व के संकट का संकेत है।
सरकार के मंत्रियों ने दावा किया कि किसी के साथ अन्याय नहीं हुआ और पुनर्वास उत्कृष्ट है। लेकिन शासन की उत्कृष्टता का प्रमाण प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं होती, बल्कि वह संतोष होता है जो प्रभावित लोगों के चेहरों पर दिखाई देता है। यदि पुनर्वास वास्तव में इतना बेहतर है तो फिर लोग उसे स्वीकार करने में हिचक क्यों रहे हैं? यह सवाल सरकार को स्वयं से पूछना चाहिए।
इस पूरे मामले में प्रशासन की भूमिका सबसे अधिक कठोर दिखाई देती है। प्रशासन कानून लागू करने वाली संस्था है, लेकिन उसका चरित्र मानवीय भी होना चाहिए। बुलडोजर चलाने से पहले यह सुनिश्चित करना कि प्रत्येक परिवार सम्मानपूर्वक पुनर्वासित हो चुका है, शायद किसी कानून में अनिवार्य न लिखा हो, लेकिन सुशासन का यही मूल सिद्धांत है।
एक और सवाल लगातार पीछा करता है। यदि यह जमीन वर्षों से सरकारी थी तो कार्रवाई ठीक उसी समय क्यों हुई, जब वहां विधायक कॉलोनी बनाने की योजना सामने आई? क्या सरकारी जमीन केवल तब याद आती है, जब उस पर कोई बड़ी परियोजना प्रस्तावित होती है? यदि अतिक्रमण इतना ही गंभीर था तो दशकों तक प्रशासन की आंखें क्यों बंद रहीं?
नकटी की घटना सरकार के लिए चेतावनी है। सत्ता यह भूल रही है कि जनता केवल वोट नहीं देती, याद भी रखती है। जिन बच्चों ने अपने घर टूटते देखे हैं, वे बड़े होकर शायद यह भूल जाएं कि बुलडोजर किस कंपनी का था, लेकिन यह कभी नहीं भूलेंगे कि वह किस सरकार के आदेश पर आया था।
सरकारें विकास करती हैं। उन्हें सड़कें बनानी हैं, अस्पताल बनाने हैं, कॉलोनियां भी बनानी हैं। लेकिन विकास का अर्थ केवल सीमेंट और कंक्रीट नहीं होता। विकास का सबसे बड़ा पैमाना यह होता है कि उसके कारण सबसे कमजोर व्यक्ति कितना सुरक्षित महसूस करता है।
नकटी की घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हमारे यहां विकास की परिभाषा में गरीब की गरिमा के लिए कोई स्थान बचा है? क्या योजनाओं की सफलता का पैमाना सिर्फ समय पर परियोजना पूरी करना है या यह भी देखना चाहिए कि उसके लिए कितने लोगों की जिंदगी उजड़ गई?
लोकतंत्र की ताकत बुलडोजर की ताकत से कहीं बड़ी होती है। बुलडोजर दीवारें गिरा सकता है, लेकिन जनता का विश्वास टूट जाए तो उसे दोबारा खड़ा करना सबसे कठिन होता है। नकटी के लोग शायद कुछ वर्षों बाद नए मकानों में बस जाएंगे। लेकिन उनके बच्चों की स्मृतियों में हमेशा यह दर्ज रहेगा कि एक सुबह सरकार आई थी और उनका घर ले गई थी।
सरकारों को यह नहीं भूलना चाहिए कि सत्ता का सबसे बड़ा आभूषण संवेदनशीलता है। कानून का पालन आवश्यक है, लेकिन कानून की आत्मा करुणा है। यदि विकास की कीमत किसी परिवार के सिर से छत छिन जाना है, यदि पुनर्वास बाद में और बुलडोजर पहले आता है, तो इतिहास उसे विकास नहीं, बल्कि प्रशासनिक असंवेदनशीलता के उदाहरण के रूप में याद रखेगा।
मलबे के ढेर में तब्दील नकटी आज केवल एक गांव नहीं है। वह एक आईना है, जिसमें सरकार, प्रशासन और राजनीति—तीनों अपना चेहरा देख सकते हैं। प्रश्न केवल इतना है कि क्या उनमें उस आईने में झांकने का साहस है?

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