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नहीं रहीं पंडवानी की स्वर सम्राज्ञी तीजन बाई, 69 साल की उम्र में ली अंतिम सांस

छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को दुनिया में दिलाई थी पहचान

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छत्तीसगढ़  /  
छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को विश्व मंच पर नई पहचान दिलाने वाली पद्म विभूषण और सुप्रसिद्ध पंडवानी गायिका तीजन बाई का रविवार तड़के 3:15 बजे रायपुर एम्स में निधन हो गया। वे लंबे समय से अस्वस्थ थीं और एम्स में उनका उपचार चल रहा था। उनके निधन की खबर से पूरे देश के कला और सांस्कृतिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने रविवार रात उनके परिजनों से फोन पर बात कर उनके स्वास्थ्य की जानकारी ली थी। कुछ ही घंटों बाद उनके निधन का समाचार सामने आया।

पंडवानी को दिलाई वैश्विक पहचान

तीजन बाई ने अपनी सशक्त आवाज, अद्भुत अभिनय और प्रभावशाली प्रस्तुति शैली से पंडवानी गायन को देश ही नहीं, दुनिया भर में पहचान दिलाई। महाभारत की कथाओं को वे जिस जीवंत अंदाज और भाव-भंगिमाओं के साथ प्रस्तुत करती थीं, उसने लाखों श्रोताओं को अपना प्रशंसक बना लिया।

विशेष रूप से दुशासन वध जैसे प्रसंगों की उनकी प्रस्तुति उनकी पहचान बन गई थी। उन्होंने छत्तीसगढ़ की लोक परंपरा को अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

देश-विदेश में किया छत्तीसगढ़ का गौरव बढ़ाया

साल 1980 में सांस्कृतिक दूत के रूप में उन्होंने इंग्लैंड, फ्रांस, स्विट्ज़रलैंड, जर्मनी, तुर्की, माल्टा, साइप्रस, रोमानिया और मॉरीशस सहित कई देशों में पंडवानी की प्रस्तुतियां दीं। उनकी कला को विश्वभर में सराहा गया और छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को नई पहचान मिली।

देश के सर्वोच्च सम्मानों से हुईं सम्मानित

लोककला के क्षेत्र में उनके अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।

  • 1988 – पद्मश्री
  • 1995 – संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार
  • 2003 – पद्म भूषण
  • 2007 – नृत्य शिरोमणि सम्मान
  • 2017 – खैरागढ़ संगीत विश्वविद्यालय से मानद डी.लिट.
  • 2019 – पद्म विभूषण
  • जापान का प्रतिष्ठित फुकुओका पुरस्कार सहित अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान

उन्हें विभिन्न विश्वविद्यालयों द्वारा चार मानद डी.लिट. उपाधियां भी प्रदान की गई थीं।

गरीबी से निकलकर बनीं विश्वविख्यात कलाकार

तीजन बाई का जन्म 8 अगस्त 1956 को दुर्ग जिले के पाटन विकासखंड के अटारी गांव में हुआ था। तीजा पर्व के दिन जन्म होने के कारण उनका नाम तीजन रखा गया। उनकी मां का नाम सुखवती देवी और पिता का नाम हुनुकलाल पारधी था।

आर्थिक तंगी में बीते बचपन के दौरान मां के लोकगीत, पिता की बांसुरी और प्रकृति की ध्वनियों ने उनके भीतर संगीत के प्रति गहरा लगाव पैदा किया।

9 साल की उम्र में शुरू किया पंडवानी का सफर

तीजन बाई ने अपने चचेरे नाना बृजलाल पारधी से मात्र नौ वर्ष की उम्र में पंडवानी सीखना शुरू किया। 13 वर्ष की आयु में उन्होंने चंदखुरी गांव के सतीचौरा चौक में पहली सार्वजनिक प्रस्तुति दी। इसके बाद उनकी लोकप्रियता गांवों से निकलकर भिलाई, दुर्ग, रायपुर, भोपाल और फिर पूरे देश-दुनिया तक पहुंच गई।

भोपाल के भारत भवन में उनकी प्रस्तुति से प्रभावित होकर प्रसिद्ध रंगकर्मियों ने उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री के समक्ष प्रस्तुति का अवसर दिलाया। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

उनके निधन के साथ छत्तीसगढ़ ने अपनी लोक संस्कृति की एक ऐसी विरासत खो दी है, जिसकी भरपाई संभव नहीं है। उनकी आवाज, उनकी शैली और पंडवानी की उनकी अनूठी प्रस्तुति आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।

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