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कैमरे की कलम: "माइलेज नहीं, भरोसा घटा है"

लोकतंत्र में नागरिक का सबसे बड़ा सुख यह है कि उसे हर बात पर भरोसा रखने की सलाह दी जाती है। सरकार कहे कि अर्थव्यवस्था दौड़ रही है, तो आपको दौड़ती हुई दिखनी चाहिए। सरकार कहे कि महंगाई नियंत्रण में है, तो सब्जी खरीदते समय अपनी जेब पर नहीं, सरकार के बयान पर भरोसा करना चाहिए। और अब सरकार कह रही है कि पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिलाने से न आपकी गाड़ी को कोई फर्क पड़ रहा है, न माइलेज घट रहा है, न आपकी जेब पर कोई अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। अगर आपको कुछ और महसूस हो रहा है, तो संभव है कि गलती आपकी गाड़ी की नहीं, आपकी अनुभूति की हो।

देश में अब एक नया विज्ञान विकसित हो रहा है। इसमें प्रयोगशाला की जगह प्रेस कॉन्फ्रेंस होती है और शोधपत्रों की जगह सरकारी बयान। वैज्ञानिक निष्कर्ष यह है कि यदि करोड़ों लोग कोई शिकायत कर रहे हों, लेकिन सरकार उसे स्वीकार न करे, तो शिकायत अपने-आप अमान्य हो जाती है।

अजीब विडंबना है। पेट्रोल का दाम वर्षों से दुनिया के कई देशों की तुलना में कहीं अधिक चुकाने वाला भारतीय उपभोक्ता अब यह भी सुन रहा है कि जिस ईंधन के लिए वह पूरा पैसा दे रहा है, उसमें क्या मिलाया जाएगा, इसका निर्णय भी उसकी राय के बिना होगा। लोकतंत्र में वोट आपका है, लेकिन पेट्रोल कैसा होगा, यह अधिकार आपका नहीं है।

कहा जा रहा है कि एथेनॉल से देश का विदेशी मुद्रा भंडार बचेगा। यह स्वागतयोग्य उद्देश्य है। लेकिन क्या हर राष्ट्रीय लक्ष्य नागरिक की जेब से ही पूरा होगा? यदि किसी नीति का आर्थिक लाभ है, तो उसके दुष्प्रभावों का ईमानदार आकलन भी होना चाहिए। यदि माइलेज घटता है, तो कितना? किन वाहनों पर? किन परिस्थितियों में? यदि कोई नुकसान नहीं है, तो स्वतंत्र और सार्वजनिक परीक्षणों से इसे सिद्ध करने में हिचक क्यों?

सरकार का तर्क है कि उद्योग जगत आश्वस्त है। यह सुनकर मुस्कुराने का मन करता है। जिन कंपनियों पर नीति लागू करनी है, उनसे ही प्रमाणपत्र भी ले लिया गया। यह वैसा ही है जैसे छात्र अपनी उत्तरपुस्तिका स्वयं जांचकर प्रथम श्रेणी घोषित कर दे और प्रधानाचार्य कहें—"देखिए, परिणाम पूरी तरह निष्पक्ष है।"

इस पूरे विवाद का सबसे दिलचस्प पक्ष भरोसे का है। किसी भी लोकतंत्र में सरकार की सबसे बड़ी पूंजी जनता का विश्वास होती है। लेकिन विश्वास आदेश से पैदा नहीं होता। वह पारदर्शिता, स्वतंत्र जांच और ईमानदार संवाद से बनता है। यदि लाखों वाहन मालिक यह कह रहे हैं कि उन्हें फर्क महसूस हो रहा है, तो सबसे आसान रास्ता यह नहीं कि उन्हें भ्रमित घोषित कर दिया जाए। सबसे उचित रास्ता यह है कि किसी स्वतंत्र और विश्वसनीय संस्था से व्यापक परीक्षण कराया जाए और उसके निष्कर्ष सार्वजनिक किए जाएं।

एथेनॉल की कहानी केवल माइलेज की नहीं है। यह खेती, पानी और पर्यावरण की भी कहानी है। यदि एथेनॉल का उत्पादन उन फसलों से बढ़ेगा जिनमें भारी मात्रा में सिंचाई की आवश्यकता होती है, तो यह प्रश्न पूछना असंगत नहीं कि आज हम विदेशी तेल बचा रहे हैं या कल का भूजल खर्च कर रहे हैं। राष्ट्रीय नीति का मूल्यांकन केवल तत्काल आर्थिक लाभ से नहीं, उसके दीर्घकालिक पर्यावरणीय प्रभावों से भी होना चाहिए।

दुर्भाग्य यह है कि पिछले कुछ वर्षों में नीति निर्माण का एक नया चलन विकसित हुआ है। पहले निर्णय होता है, फिर उसका प्रचार होता है और अंत में यदि जनता सवाल पूछे तो उसे बताया जाता है कि प्रश्न पूछना ही अनावश्यक है। मानो लोकतंत्र में नागरिक की भूमिका केवल ताली बजाने की रह गई हो।

परिवहन मंत्री ने चुनौती दी है कि कोई एक व्यक्ति सामने आए जिसकी गाड़ी को नुकसान हुआ हो। यह चुनौती सुनकर सोशल मीडिया शायद मुस्कुरा रहा होगा, क्योंकि वहां ऐसे अनेक अनुभव दर्ज हैं। व्यक्तिगत अनुभव वैज्ञानिक प्रमाण नहीं होते, लेकिन वे जांच का आधार अवश्य बन सकते हैं। यदि सरकार अपने निर्णय को लेकर इतनी ही आश्वस्त है, तो उसे स्वतंत्र परीक्षणों से डरना नहीं चाहिए। सच को प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं होती; प्रमाणपत्र की आवश्यकता केवल संदेह को होती है।

यह विवाद अंततः एथेनॉल का नहीं, शासन शैली का है। जनता को विश्वास में लेकर लागू की गई नीति और जनता पर थोपी गई नीति में वही अंतर है जो सलाह और आदेश में होता है। लोकतंत्र आदेश से नहीं, सहमति से चलता है।

सरकार यदि वास्तव में मानती है कि ई-20 भविष्य का ईंधन है, तो उसे सबसे पहले भविष्य जैसा आचरण भी दिखाना होगा—पारदर्शिता, स्वतंत्र परीक्षण, सार्वजनिक आंकड़े और आलोचना को सम्मान। अन्यथा यह आशंका बनी रहेगी कि पेट्रोल में केवल एथेनॉल ही नहीं मिलाया गया, बल्कि उसमें जनता के भरोसे की भी कुछ मात्रा घुल गई है। और भरोसा एक बार जल जाए, तो उसे किसी भी ईंधन से दोबारा नहीं चलाया जा सकता।

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