बिलासपुर के नागरिकों को बधाई। आखिरकार हमारा शहर उस मुकाम पर पहुंच ही गया, जिसकी कल्पना शायद किसी ने नहीं की थी। अब हम केवल सड़क मार्ग से नहीं, बल्कि जलमार्ग से भी आवागमन करने लगे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि यह उपलब्धि किसी दूरदर्शी योजना का परिणाम नहीं, बल्कि दूरदर्शिता की लगातार हत्या का प्रतिफल है।
जिन लोगों ने कभी वेनिस शहर की तस्वीरें देखकर आह भरी होगी कि "काश हमारे शहर में भी नाव चलती", उनकी इच्छा पूरे 20 साल बाद इस मानसून में पूरी हो गई। कॉलोनियों में नाव चल रही है, लोग घरों की छतों पर शरण लिए बैठे हैं, बच्चे स्कूल नहीं बल्कि बाढ़ का भूगोल पढ़ रहे हैं, और प्रशासन इस उपलब्धि पर शायद यही सोच रहा होगा कि "देखिए, हमने जल पर्यटन की संभावनाएं भी विकसित कर दीं।"
बिलासपुर सचमुच स्मार्ट हो गया है। इतना स्मार्ट कि पानी ने भी समझ लिया कि उसे अब नालियों से नहीं, सीधे लोगों के ड्राइंग रूम से होकर गुजरना चाहिए।
कहते हैं प्रकृति कभी अन्याय नहीं करती। पानी वहीं जाता है, जहां उसके लिए रास्ता छोड़ा जाता है। लेकिन हमारे शहर के योजनाकारों ने प्रकृति को भी चुनौती दे दी। जहां तालाब थे, वहां कॉलोनियां उगा दीं। जहां नाले थे, वहां कॉम्प्लेक्स खड़े कर दिए। जहां पानी बहता था, वहां प्लॉट काट दिए। अब पानी बेचारा करे भी तो क्या करे? वह भी आखिर सरकारी फाइल नहीं है कि वर्षों तक दबा रहे। उसे रास्ता चाहिए। रास्ता नहीं मिला तो उसने घरों का दरवाजा खटखटा दिया।
हमारे यहां विकास का एक बड़ा वैज्ञानिक सिद्धांत है—पहले निर्माण करो, बाद में सोचो कि पानी जाएगा कहां। अगर कोई सवाल पूछे तो मास्टर प्लान दिखा दो। अगर ज्यादा सवाल पूछे तो अगली समिति बना दो। और अगर फिर भी न माने तो कह दो कि "इतनी बारिश सौ साल में पहली बार हुई है।"
यह "सौ साल में पहली बार" वाला वाक्य भी बड़ा दिलचस्प है। पिछले दस वर्षों से हर साल सुन रहे हैं। लगता है हमारे यहां हर मानसून सौ साल पुराना रिकॉर्ड तोड़ देता है, लेकिन हमारी तैयारी हर बार शून्य वर्ष से शुरू होती है।
सबसे मजेदार दृश्य तब सामने आया जब शहर के बड़े अधिकारियों के सरकारी बंगलों में भी पानी भर गया। लोकतंत्र में समानता का इससे सुंदर उदाहरण शायद ही मिले। इस बार पानी ने गरीब-अमीर, नेता-अफसर, बंगला-झोपड़ी में कोई भेदभाव नहीं किया। फर्क बस इतना था कि आम आदमी अपने घर का पानी खुद निकाल रहा था, जबकि सरकारी बंगलों का पानी निकालने के लिए पूरा सरकारी अमला जुट गया।
कभी-कभी लगता है कि पानी भी बड़ा ईमानदार होता है। उसे किसी का पद नहीं दिखता, केवल ढलान दिखती है।
स्मार्ट सिटी मिशन पर सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च हुए। भूमिगत सीवरेज पर भी करोड़ों बहाए गए। शहर के बजट का आकार लगातार बढ़ता गया। कागजों में परियोजनाएं पूरी होती रहीं। शिलान्यास के पत्थर लगते रहे। उद्घाटन के फीते कटते रहे। प्रेस विज्ञप्तियां छपती रहीं। सोशल मीडिया पर तस्वीरें आती रहीं। बस एक छोटी-सी भूल हो गई—बारिश को आमंत्रण भेजना भूल गए। जैसे ही बारिश आई, उसने सारे उद्घाटन भाषण बहा दिए।
हमारे यहां विकास का पैमाना बड़ा सरल है। सड़क कितनी टिकाऊ है, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि उद्घाटन किसने किया। नाली कितनी चौड़ी है, इससे ज्यादा जरूरी है कि शिलापट्ट पर नाम किसका लिखा है। सीवरेज काम कर रहा है या नहीं, यह बाद की बात है; पहले यह सुनिश्चित होना चाहिए कि परियोजना की तस्वीरें रंगीन हों।
नगर नियोजन का हाल भी कम रोचक नहीं है। नक्शे में चौड़ी सड़कें, आधुनिक ड्रेनेज और हरित क्षेत्र दिखाई देते हैं। जमीन पर वही सड़क आधी पार्किंग बन जाती है, नाली आधी अतिक्रमण में गायब हो जाती है और हरित क्षेत्र पर धीरे-धीरे कंक्रीट का जंगल उग आता है। फिर एक दिन बारिश आती है और पूछती है—"मुझे जाना किधर है?" जवाब में पूरा शहर चुप रहता है।
अवैध निर्माणों की कहानी भी बड़ी प्रेरणादायक है। नियमों के अनुसार जो काम नहीं हो सकता, वह थोड़ी-सी कृपा, थोड़ी-सी पहचान और थोड़ी-सी सुविधा शुल्क के बाद पूरी तरह वैध महसूस होने लगता है। नक्शे बदल जाते हैं, मंजिलें बढ़ जाती हैं, नाले सिकुड़ जाते हैं और सरकारी फाइलों में सब कुछ "नियमों के अनुरूप" दर्ज हो जाता है। आखिर कागज पर तो पानी नहीं भरता।
हर साल मानसून से पहले नालों की सफाई का अभियान चलता है। कैमरे आते हैं। अधिकारी फावड़ा पकड़ते हैं। दो-चार टोकरियां गाद निकलती हैं। तस्वीरें अखबारों में छपती हैं। फिर फावड़ा वापस वाहन में रख दिया जाता है और गाद अगले मानसून तक वहीं आराम करती रहती है। यह परंपरा इतनी पवित्र हो चुकी है कि इसे शायद अमूर्त सांस्कृतिक विरासत घोषित कर देना चाहिए।
फिर कंट्रोल रूम खुलता है। हेल्पलाइन नंबर जारी होते हैं। अपील की जाती है कि "घबराएं नहीं।" नागरिक सोचता है—घबराएं नहीं, तो क्या तैरना शुरू कर दें? कंट्रोल रूम तब सक्रिय होता है जब पानी लोगों के घरों में पहुंच चुका होता है। यानी बीमारी फैलने के बाद दवा की दुकान खोलने जैसी दूरदर्शिता।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इस पूरे घटनाक्रम में किसी की जिम्मेदारी तय नहीं होती। बारिश दोषी, बादल दोषी, मौसम दोषी, जलवायु परिवर्तन दोषी, पिछली सरकार दोषी, अगली सरकार दोषी—बस वे लोग निर्दोष रहते हैं, जिनके हस्ताक्षरों से शहर का भविष्य तय हुआ। हमारे यहां जवाबदेही भी शायद भूमिगत सीवरेज की तरह है—कागजों में मौजूद, जमीन पर गायब।
आज भी मकान और व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स तेजी से बन रहे हैं, लेकिन नालियां वर्षों पुरानी क्षमता के साथ जस की तस हैं। नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कार्रवाई करने के बजाय उन्हें संरक्षण दिया गया। परिणाम आज पूरे शहर के सामने है।
शहर का मास्टर प्लान बदलने से पहले शायद मास्टर मानसिकता बदलने की जरूरत है। नगर नियोजन का मतलब केवल प्लॉट बेचना नहीं होता। विकास का अर्थ केवल कंक्रीट बिछाना नहीं होता। शहर इमारतों से नहीं, व्यवस्थाओं से बनता है। सड़कें, नालियां, तालाब, जलनिकासी, हरित क्षेत्र और नियमों का पालन—ये सब विकास के उतने ही जरूरी स्तंभ हैं, जितने फ्लाईओवर और चमकदार चौक।
दुनिया के अनेक शहरों ने पुराने इलाकों में रेट्रोफिटिंग कर ड्रेनेज व्यवस्था सुधारी। जहां जरूरत पड़ी, वहां पुनर्विकास किया। जलग्रहण क्षेत्रों को संरक्षित रखा। वर्षा जल के प्राकृतिक प्रवाह को बाधित नहीं होने दिया। हमने भी इन शब्दों को बड़े-बड़े सेमिनारों और प्रस्तुतियों में खूब दोहराया। फर्क सिर्फ इतना रहा कि वहां इन पर काम हुआ, यहां इन पर ताली बजी।
अब भी समय है। राहत सामग्री बांटने, नाव चलाने और सर्वे कराने से आगे बढ़ना होगा। शहर का वैज्ञानिक जलनिकासी मानचित्र तैयार करना होगा। नालों पर हुए अतिक्रमण हटाने होंगे। नियम तोड़ने वालों और नियम तोड़ने देने वालों—दोनों की जवाबदेही तय करनी होगी। जिन परियोजनाओं पर जनता का पैसा खर्च हुआ है, उनका स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट होना चाहिए। आखिर जनता को यह जानने का अधिकार है कि करोड़ों रुपये पानी में बहे या पानी रोकने में लगे।
वरना अगले साल फिर यही होगा। अखबारों में वही तस्वीरें होंगी। नेता वही आश्वासन देंगे। अधिकारी वही समीक्षा बैठक करेंगे। नागरिक वही बाल्टियां भरेंगे। और हम फिर गर्व से कहेंगे—"हमारी स्मार्ट सिटी अब और भी स्मार्ट हो गई है। इस बार पानी पहली मंजिल तक पहुंच गया।"
कहावत है कि डूबते को तिनके का सहारा होता है। बिलासपुर की जनता अब तिनका नहीं, जवाबदेही तलाश रही है। क्योंकि शहर को बारिश ने नहीं डुबोया। उसे डुबोया है वर्षों की लापरवाही, भ्रष्टाचार, योजनाहीन विकास और उस मानसिकता ने, जो हर आपदा के बाद दोष बादलों पर डालकर अपने दामन को सूखा साबित करने में लगी रहती है।
अब समय केवल राहत कार्यों का नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने का है। जब तक गलत योजना, भ्रष्टाचार और नियमों की अनदेखी पर कठोर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक हर मानसून के साथ यही त्रासदी दोहराई जाती रहेगी।
शहर को नाव नहीं, नियत चाहिए। पंप नहीं, योजना चाहिए। राहत शिविर नहीं, जिम्मेदार शासन चाहिए। जिस दिन यह समझ सत्ता और व्यवस्था दोनों को आ जाएगी, उस दिन बिलासपुर सचमुच स्मार्ट कहलाने का हकदार होगा। तब तक नागरिकों से यही निवेदन है—बरसात शुरू होने से पहले राशन, मोमबत्ती और जरूरी दवाइयों के साथ एक लाइफ जैकेट भी संभालकर रखिए। क्या पता, अगली स्मार्ट योजना किस गली से होकर गुजरे।

