जिले के पुलिस कप्तान ने कड़े शब्दों में कहा कि यदि कोई व्यक्ति लाइक, कमेंट्स और व्यूअरशिप बढ़ाने के लिए फर्जी वीडियो बनाएगा या बिना प्रमाणिकता के वायरल करेगा तो उसके खिलाफ अपराध दर्ज किया जाएगा। यह बात बिल्कुल उचित है। झूठ फैलाना, किसी की छवि खराब करना और सोशल मीडिया को अफवाहों का अखाड़ा बनाना किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं हो सकता। मगर समस्या यह है कि हमारे यहां अक्सर अपराध की परिभाषा घटना से नहीं, व्यक्ति से तय होती दिखाई देती है।
इतिहास बताता है कि संस्थाएँ आईना तोड़कर नहीं, आईने में दिख रही खामियों को सुधारकर मजबूत होती हैं। क्योंकि अंततः किसी भी लोकतंत्र में सबसे बड़ा अपराध सच दिखाना नहीं, सच से आँख चुराना होता है।
यही कारण है कि इस मामले में सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं बन पाया कि वीडियो में क्या है, बल्कि यह बन गया कि वीडियो किसने बनाया। यानी अगर किसी थाने के भीतर कुछ असामान्य दिख रहा है तो उससे ज्यादा गंभीर विषय यह है कि किसी ने उसे रिकॉर्ड कैसे कर लिया। यह वही मानसिकता है जिसमें दीवार पर उभरी सीलन से ज्यादा गुस्सा उस आदमी पर आता है जिसने सीलन की तस्वीर खींच ली।
विडंबना यह है कि यही व्यवस्था वर्षों से जनता से अपील करती रही है कि कहीं अपराध दिखे, भ्रष्टाचार दिखे, अवैध वसूली दिखे, सार्वजनिक व्यवस्था का उल्लंघन दिखे तो वीडियो बनाइए, सबूत दीजिए, शिकायत कीजिए। लेकिन जैसे ही कैमरे का कोण व्यवस्था की ओर घूम जाता है, अचानक कैमरा संदिग्ध हो जाता है और रिकॉर्डिंग अपराध के करीब पहुंच जाती है। ऐसा लगता है मानो समस्या बीमारी नहीं, एक्स-रे मशीन हो। हमारे यहां कानून की एक बड़ी खूबी यह है कि वह सबके लिए समान बताया जाता है और उसकी सबसे बड़ी विडंबना भी यही है कि व्यवहार में वह सबके लिए समान दिखाई नहीं देता।
यदि कोई सामान्य नागरिक सार्वजनिक स्थान पर शराब के नशे में मिलता है तो उसके वीडियो सोशल मीडिया पर घंटों घूमते रहते हैं। लोग उसे नैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं, पुलिस उसे कानून का पाठ पढ़ाती है और समाज उसे संस्कारों का पाठ पढ़ाता है। लेकिन जब चर्चा में कोई सफेदपोश या वर्दीधारी आता है तो अचानक निजता, प्रतिष्ठा, गरिमा और प्रक्रिया जैसे शब्द शब्दकोश से निकलकर प्रेस कॉन्फ्रेंस की मेज पर सज जाते हैं।
ऐसा नहीं है कि पुलिसकर्मी को गरिमा का अधिकार नहीं है, बिल्कुल है। बल्कि उतना ही है जितना किसी आम नागरिक को है लेकिन प्रश्न यह है कि क्या यह अधिकार सभी को समान रूप से मिलता है? यदि हां, तो फिर आम आदमी की गरिमा की रक्षा के समय यही तीखापन अक्सर दिखाई क्यों नहीं देता? दरअसल समस्या वीडियो नहीं है। समस्या वह असहजता है जो वीडियो पैदा करता है। आईना हमेशा सुंदर चेहरा नहीं दिखाता। कभी-कभी वह चेहरे पर जमी धूल भी दिखाता है। और इतिहास गवाह है कि धूल साफ करने की तुलना में आईना तोड़ना हमेशा आसान काम रहा है।
पुलिस महकमा भी आखिर इसी समाज का हिस्सा है। वहां भी अच्छे लोग हैं, ईमानदार लोग हैं, कर्तव्यनिष्ठ लोग हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जहां शक्ति होती है, वहां जवाबदेही की आवश्यकता और बढ़ जाती है। क्योंकि जनता पुलिस को केवल एक कर्मचारी के रूप में नहीं देखती। वह उसे कानून के प्रतिनिधि के रूप में देखती है।
यही वजह है कि पुलिसकर्मी की छोटी गलती भी बड़ी खबर बन जाती है लेकिन यहां एक और रोचक प्रवृत्ति देखने को मिलती है। जब कोई नागरिक पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाता है तो उसे कानून समझाया जाता है। जब कोई पत्रकार सवाल उठाता है तो उसे जिम्मेदारी समझाई जाती है। जब कोई सामाजिक कार्यकर्ता सवाल उठाता है तो उसे प्रक्रिया समझाई जाती है। और जब सोशल मीडिया सवाल उठाता है तो उसे आईटी एक्ट समझाया जाता है। कुल मिलाकर हर सवाल पूछने वाले के लिए कोई न कोई धारा तैयार रहती है। सवालों के जवाब कभी-कभी तैयार नहीं होते।
"लोकतंत्र में कैमरा अपराधी नहीं होता, वह केवल घटनाओं का दस्तावेज़ होता है। यदि कोई वीडियो फर्जी है तो उस पर कार्रवाई होना स्वाभाविक है"
यहां यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि फर्जी वीडियो बनाना अपराध है और होना भी चाहिए। किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा से खिलवाड़ की अनुमति नहीं दी जा सकती। लेकिन उसी सांस में यह भी उतना ही जरूरी है कि हर असुविधाजनक वीडियो को "फर्जी", "भ्रामक" या "वायरल गैंग" की श्रेणी में डाल देने की प्रवृत्ति से बचा जाए क्योंकि अगर हर असहज करने वाला तथ्य फर्जी घोषित कर दिया जाएगा तो फिर सत्य की पहचान कौन करेगा?
आज सोशल मीडिया का दौर है। यहां अफवाहें भी दौड़ती हैं और सच्चाइयां भी। चुनौती यह है कि दोनों के बीच फर्क किया जाए। लेकिन अक्सर ऐसा प्रतीत होता है कि व्यवस्था की प्राथमिकता फर्क करना नहीं, नियंत्रण स्थापित करना होती है। नियंत्रण हमेशा आकर्षक होता है। सवालों को नियंत्रित करो। वीडियो को नियंत्रित करो। सूचना को नियंत्रित करो। चर्चा को नियंत्रित करो और यदि संभव हो तो आईने को भी नियंत्रित कर लो। मगर लोकतंत्र का स्वभाव नियंत्रण नहीं, संवाद है। लोकतंत्र में संस्थाओं का सम्मान इसलिए नहीं होता कि वे शक्तिशाली हैं। उनका सम्मान इसलिए होता है क्योंकि वे आलोचना सहने की क्षमता रखती हैं। जिस दिन कोई संस्था आलोचना से डरने लगे, उस दिन उसकी ताकत पर नहीं, उसके आत्मविश्वास पर सवाल उठने लगते हैं।
विडंबना यह भी है कि हमारे यहां अक्सर जांच की दिशा भी बड़ी दिलचस्प होती है। कभी-कभी घटना से ज्यादा ऊर्जा इस बात में लगती है कि जानकारी बाहर कैसे आई। फाइल में क्या लिखा था, यह बाद की बात है; फाइल लीक किसने की, यह पहले जांचा जाता है। कमरे में क्या हुआ, यह बाद में देखा जाता है; कमरे का वीडियो किसने बनाया, यह पहले पूछा जाता है। मानो व्यवस्था का सबसे बड़ा संकट घटना नहीं, उसकी सार्वजनिक जानकारी हो।
बिलासपुर की यह घटना भी उसी व्यापक मानसिकता की एक झलक बन गई है। यहां बहस कानून और जवाबदेही के बीच संतुलन की होनी चाहिए थी। चर्चा इस बात पर होनी चाहिए थी कि यदि वीडियो गलत है तो उसे तथ्यात्मक रूप से गलत साबित किया जाए, और यदि उसमें कोई सच्चाई है तो उसे स्वीकार कर सुधार की प्रक्रिया शुरू की जाए लेकिन हमारे यहां अक्सर सुधार से पहले संदेश दिया जाता है। संदेश यह कि व्यवस्था को देखने का अधिकार सीमित है। संदेश यह कि सवाल पूछने से पहले सावधान रहिए। संदेश यह कि कैमरा उठाने से पहले सोचिए और धीरे-धीरे यह संदेश समाज के भीतर एक भय में बदलने लगता है। हालांकि इतिहास बताता है कि समाज कैमरों से नहीं बदलते, बल्कि उन कारणों को दूर करने से बदलते हैं जिनकी वजह से कैमरे उठते हैं। यदि संस्थाएं पारदर्शी हों तो वीडियो सनसनी नहीं बनते। यदि जवाबदेही मजबूत हो तो वायरल पोस्ट व्यवस्था के लिए खतरा नहीं बनते। यदि जनता का विश्वास बना रहे तो अफवाहें भी ज्यादा दूर तक नहीं जातीं।
यदि हर असुविधाजनक वीडियो के जवाब में पहला सवाल यह पूछा जाए कि उसे बनाया किसने, तो संदेह पैदा होता है कि व्यवस्था की चिंता सच्चाई से अधिक उसके सार्वजनिक होने को लेकर है।
आखिर में सवाल केवल बिलासपुर का नहीं है। सवाल उस सोच का है जिसमें व्यक्ति देखकर अपराध की गंभीरता तय की जाती है। जहां वर्दी, पद और प्रभाव के अनुसार संवेदनशीलता का स्तर बदलता रहता है। जहां कभी-कभी कानून की किताब एक ही रहती है, लेकिन उसका वजन अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग महसूस होता है।
लोकतंत्र में पुलिस का सम्मान होना चाहिए, क्योंकि वह कानून की रक्षक है। लेकिन उसी लोकतंत्र में जनता के सवालों का भी सम्मान होना चाहिए, क्योंकि वही कानून की अंतिम मालिक है, इसलिए आवश्यकता वीडियो से डरने की नहीं, सच्चाई से सामना करने की है क्योंकि जिस समाज में आईना दिखाना अपराध और आईना छिपाना कर्तव्य बन जाए, वहां समस्या कैमरे में नहीं होती। समस्या चेहरे पर होती है और चेहरों की मरम्मत आईना तोड़कर नहीं, आत्मनिरीक्षण करके की जाती है।
