पुराना वीडियो, नए आरोप और एक असहज सवाल—क्या सिविल सेवा में प्रवेश के समय बोले गए आदर्श सरकारी कुर्सी तक पहुंचते-पहुंचते रास्ता भूल जाते हैं?
सिविल सेवा की परीक्षा पास करने वाले युवाओं से जब पूछा जाता है कि वे आईएएस, आईपीएस क्यों बनना चाहते हैं, तो जवाबों में अक्सर देश सेवा, भ्रष्टाचार से लड़ाई, कमजोर तबकों की मदद और शासन व्यवस्था में सुधार जैसे बड़े-बड़े शब्द सुनाई देते हैं। सुनने वाले को कुछ क्षणों के लिए लगता है कि देश की प्रशासनिक व्यवस्था का कायाकल्प बस अब होने ही वाला है। फिर वही युवा अधिकारी बनते हैं। फाइलें आती हैं, सरकारी गाड़ियां आती हैं, लालफीताशाही आती है, पद आता है, अधिकार आता है और कभी-कभी—आरोप भी आते हैं।
UPSC में 377वीं रैंक, इंटरव्यू में 138 अंक और फिर पुलिस सेवा की कुर्सी—आज वही राहुल बंसल भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के कारण चर्चा में हैं। आरोप साबित होना बाकी है, लेकिन एक पुराना सवाल फिर सामने है: सिविल सेवा में नैतिकता पढ़ाई जाती है या निभाई भी जाती है? कभी-कभी किसी सरकारी अधिकारी की कहानी इतनी तेजी से करवट लेती है कि लगता है, सरकारी फाइल से ज्यादा तेज तो जिंदगी की टिप्पणी चल रही है। आईपीएस राहुल बंसल की कहानी भी फिलहाल कुछ ऐसी ही दिखाई दे रही है।
साल 2021 में यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा में 377वीं रैंक। कुल 939 अंक। पर्सनैलिटी टेस्ट में 275 में से 138 अंक। पांचवें प्रयास में सफलता। फिर भारतीय पुलिस सेवा। छत्तीसगढ़ कैडर। एक युवा के लिए इससे ज्यादा प्रेरक कहानी क्या होगी? चार प्रयासों में असफलता के बाद पांचवें प्रयास में सफलता। मैथ्स जैसे विषय में मजबूत प्रदर्शन। संघर्ष के बाद चयन और फिर वह सरकारी वर्दी, जिसे देखकर आम आदमी उम्मीद करता है कि अब कानून थोड़ा और मजबूत होगा लेकिन कुछ साल बाद यही नाम एक करोड़ रुपये की कथित रिश्वत के मामले में चर्चा में है। यही वह जगह है जहां कहानी अचानक प्रेरक कथा से व्यंग्य में बदल जाती है। हालांकि सबसे पहले जरूरी सावधानी।
राहुल बंसल पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं। आरोपों की जांच चल रही है। किसी आरोप को अदालत में सिद्ध हुए अपराध के बराबर मान लेना न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ होगा। इसलिए अभी यह कहना गलत होगा कि उन्होंने रिश्वत ली ही थी। अदालत और जांच एजेंसियों को तथ्य सामने रखने होंगे लेकिन सवाल पूछना तो लोकतंत्र का काम है और इस मामले में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि एक करोड़ रुपये का आरोप सही है या गलत।
सवाल यह भी है कि जिस व्यवस्था में प्रवेश करने वाले युवाओं से ईमानदारी, नैतिकता और जनसेवा की अपेक्षा की जाती है, उस व्यवस्था में कुछ ही वर्षों बाद भ्रष्टाचार के इतने गंभीर आरोप सामने कैसे आ जाते हैं?
छत्तीसगढ़ कैडर के आईपीएस अधिकारी राहुल बंसल से जुड़ा मामला इसी विरोधाभास को लेकर इन दिनों चर्चा में है। उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप सामने आए हैं। इन आरोपों की जांच जारी है और आरोप अभी साबित नहीं हुए हैं। लेकिन इस बीच उनके सिविल सेवा की तैयारी के दिनों का एक पुराना मॉक इंटरव्यू वीडियो फिर सोशल मीडिया पर घूम रहा है और इस वीडियो ने विवाद को एक अजीब नैतिक मोड़ दे दिया है, क्योंकि वीडियो में वही अधिकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलते दिखाई देते हैं।
मामला सिर्फ इतना नहीं कि उन्होंने भ्रष्टाचार के विरोध में कोई सामान्य बात कही थी। उन्होंने अपने परिवार से जुड़ा एक अनुभव सुनाया था। उनके मुताबिक, उनके भाई आईआईटी कानपुर में पढ़ते थे और अमेरिका में रिसर्च पेपर पेश करने के लिए वीजा आवेदन हेतु जन्म प्रमाण पत्र की जरूरत थी। जल्दी दस्तावेज हासिल करने के लिए पंचायत अधिकारी ने कथित तौर पर 500 रुपये मांगे थे। आईपीएस बंसल ने उस समय कहा था कि 500 रुपये की रिश्वत देने से उन्हें बहुत बुरा लगा। वाकई, 500 रुपये की रिश्वत बुरी चीज है।
इतनी बुरी कि उस पर मॉक इंटरव्यू में बात की जा सकती है, व्यवस्था की खामियों पर चिंता जताई जा सकती है और यह सवाल उठाया जा सकता है कि आखिर एक नागरिक को अपने ही अधिकार का दस्तावेज पाने के लिए पैसे क्यों देने पड़ें लेकिन आज वही वीडियो इसलिए वायरल है क्योंकि बंसल पर एक करोड़ रुपये की रिश्वत स्वीकार करने के आरोपों ने पुराने शब्दों को एक नए संदर्भ में ला खड़ा किया है। यही सवाल सोशल मीडिया पूछ रहा है। हालांकि सोशल मीडिया का न्यायालय अक्सर बहुत तेज चलता है। वहां एफआईआर फैसला बन जाती है, आरोप सजा और वायरल वीडियो चरित्र प्रमाणपत्र। इसलिए वहां चल रही बहस को अंतिम सत्य मानना भी उतना ही खतरनाक है। फिर भी, सवाल को खारिज नहीं किया जा सकता, क्योंकि भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे प्रभावशाली भाषण वही होता है जिसे बोलने वाला अपने आचरण से साबित करे।
सिविल सेवा में नैतिकता का मतलब सिर्फ यह नहीं कि अधिकारी भ्रष्टाचार पर भाषण दे सकता है। असली परीक्षा तब होती है जब उसके सामने अधिकार हो, पैसा हो, दबाव हो और यह भरोसा हो कि शायद कोई देख नहीं रहा। मॉक इंटरव्यू के कमरे में ईमानदारी कहना आसान है। सरकारी कमरे में ईमानदार रहना मुश्किल और शायद यही भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक है।
सिविल सेवा की तैयारी के दौरान अभ्यर्थी से पूछा जाता है—“आप व्यवस्था में क्या सुधार करेंगे?” नौकरी मिलने के बाद नागरिक पूछता है—“साहब, मेरा काम कब होगा?” पहले सवाल का उत्तर होता है—“पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाऊंगा।” दूसरे का उत्तर कई बार होता है—“फाइल देखनी पड़ेगी।” और फाइल शायद इसलिए भी नहीं चलती क्योंकि वह अकेली चलना नहीं जानती। उसे कभी-कभी किसी ‘प्रोत्साहन’ की जरूरत पड़ती है। यहीं से व्यवस्था और व्यक्ति के बीच की कहानी शुरू होती है।
अगर आईपीएस बंसल के खिलाफ लगे आरोप जांच में सही साबित होते हैं, तो सवाल केवल एक अधिकारी तक सीमित नहीं रहेगा। तब यह सवाल भी पूछा जाएगा कि जिस व्यवस्था में भ्रष्टाचार से लड़ने की शपथ लेकर अधिकारी आते हैं, वही व्यवस्था उन्हें भ्रष्टाचार का हिस्सा बनने की गुंजाइश कैसे देती है? और अगर आरोप साबित नहीं होते, तब भी यह पूरा प्रकरण एक दूसरी समस्या सामने रखेगा—सार्वजनिक जीवन में विश्वास कितनी तेजी से टूटता है।
एक आम नागरिक के लिए आईएएस,आईपीएस अधिकारी कोई सामान्य सरकारी कर्मचारी नहीं होता। वह राज्य की शक्ति का चेहरा होता है। उसके हस्ताक्षर से फाइल आगे बढ़ सकती है, रुक सकती है, किसी को राहत मिल सकती है और किसी का काम वर्षों तक अटक सकता है। इसलिए नागरिक अधिकारी से केवल दक्षता नहीं चाहता। वह उससे चरित्र की उम्मीद भी करता है। यही कारण है कि किसी अधिकारी पर भ्रष्टाचार का आरोप आम नागरिक को अधिक निराश करता है क्योंकि यहां निराशा सिर्फ पैसों की नहीं होती। यह उस भरोसे की होती है जो संविधान, प्रशासन और सार्वजनिक संस्थाओं के बीच नागरिक को जोड़ता है।
मॉक इंटरव्यू में बंसल ने व्यवस्था में भ्रष्टाचार और अक्षमता की बात की थी। यह बात गलत नहीं है। भारत में भ्रष्टाचार को केवल व्यक्तिगत लालच से समझना अधूरा होगा। प्रक्रियाओं की जटिलता, विवेकाधिकार, कमजोर निगरानी, राजनीतिक और प्रशासनिक दबाव, धीमी शिकायत व्यवस्था और जवाबदेही की कमी—ये सभी इसके कारणों में शामिल हो सकते हैं लेकिन एक अधिकारी यदि यह कहकर बच निकलना चाहे कि “व्यवस्था ही खराब है”, तो यह तर्क खतरनाक होगा क्योंकि व्यवस्था कोई एलियन नहीं है। व्यवस्था हमसे बनती है। फाइल पर हस्ताक्षर करने वाला भी व्यवस्था है। आदेश जारी करने वाला भी व्यवस्था है। रिश्वत मांगने वाला भी व्यवस्था है। और रिश्वत रोकने वाला भी, जिस दिन हम भ्रष्टाचार को केवल “सिस्टम की समस्या” कहकर छोड़ देते हैं, उसी दिन भ्रष्टाचार को एक अनाथ बीमारी बना देते हैं—जिसका कोई जिम्मेदार नहीं।
शायद सिविल सेवा का सबसे महत्वपूर्ण इंटरव्यू यूपीएससी भवन में नहीं होता। वह उस दिन होता है जब अधिकारी के सामने कोई गरीब व्यक्ति अपनी फाइल लेकर खड़ा होता है। वह उस दिन होता है जब कोई ठेकेदार किसी सुविधा का प्रस्ताव लेकर आता है। वह उस दिन होता है जब ऊपर से दबाव आता है। वह उस दिन होता है जब कोई कर्मचारी कहता है—“साहब, यहां तो ऐसे ही चलता है" और वह उस दिन भी होता है जब अधिकारी के सामने यह विकल्प होता है कि वह नियम के रास्ते चले या उस रास्ते पर, जहां काम जल्दी होता है और सवाल देर से। यूपीएससी का इंटरव्यू कुछ घंटे का होता है। सरकारी कुर्सी का इंटरव्यू कई साल चलता है और उसका पैनल जनता होती है। इसलिए पुराने वीडियो का वायरल होना महज सोशल मीडिया की सनसनी नहीं है। यह उस असहज अंतर की ओर इशारा करता है जो सार्वजनिक जीवन में कही गई बातों और निभाई गई जिम्मेदारियों के बीच पैदा हो सकता है। 500 रुपये की रिश्वत पर दुख जताना तब सही था। अगर आज एक करोड़ रुपये की रिश्वत के आरोप सही साबित होते हैं, तो वह दुख और भी ज्यादा अर्थपूर्ण हो जाएगा—लेकिन एक कटु अर्थ में।
तब सवाल यह नहीं होगा कि पांच सौ रुपये गलत थे या एक करोड़। सवाल होगा कि क्या भ्रष्टाचार की नैतिकता रकम देखकर बदलती है? क्या 500 रुपये लेने वाला भ्रष्ट है, लेकिन एक करोड़ का सवाल आने पर हम पहले पूछते हैं कि “किसने पकड़ा?” क्या भ्रष्टाचार का विरोध तब तक आसान है जब तक रिश्वत किसी और ने ली हो? और क्या ईमानदारी का सबसे कठिन हिस्सा यह नहीं है कि जब अवसर आपके पास हो, तब भी आप उसे ठुकरा दें? इन सवालों के जवाब किसी वायरल वीडियो में नहीं मिलेंगे। न जांच एजेंसी के प्रेस नोट में। न सोशल मीडिया की भीड़ में। इनका जवाब उस जांच में मिलेगा जो निष्पक्ष हो, पारदर्शी हो और समय पर पूरी हो।
अगर आरोप गलत हैं तो अधिकारी को उसी मजबूती से निर्दोष साबित होने का अधिकार मिलना चाहिए, जिस मजबूती से आरोपों की जांच हो रही है और अगर आरोप सही साबित होते हैं, तो फिर पुराना वीडियो केवल वायरल क्लिप नहीं रहेगा। वह भारतीय प्रशासनिक सेवा के नैतिक प्रशिक्षण और वास्तविक प्रशासनिक संस्कृति के बीच खड़ी एक विडंबना का दस्तावेज बन जाएगा क्योंकि भ्रष्टाचार पर सबसे सुंदर भाषण वही होता है, जिसे बोलने की जरूरत न पड़े। काम करने का तरीका ही भाषण बन जाए। शायद सिविल सेवा का असली सुधार भी वहीं से शुरू होगा—जहां अधिकारी को यह याद दिलाने की जरूरत न पड़े कि जनता की सेवा करनी है और नागरिक को यह डर न रहे कि अपना जन्म प्रमाण पत्र पाने के लिए उसे 500 रुपये देने पड़ेंगे या उससे भी ज्यादा बड़ी रकम। फर्क सिर्फ रकम का नहीं है। फर्क इस बात का है कि सरकारी कुर्सी पर बैठा व्यक्ति उस कुर्सी को सेवा का साधन मानता है या सौदे का और इस सवाल का जवाब किसी मॉक इंटरव्यू में नहीं, असली जिंदगी में देना पड़ता है।


