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एक सदी बाद ATR लौटे हाथी: एक भूला हुआ गलियारा और संरक्षण की नई चुनौती

"करीब एक सदी बाद साल 2020 में एशियाई हाथियों का एक झुंड अचानकमार टाइगर रिज़र्व पहुंचा। कोविड लॉकडाउन के दौरान कम हुई मानवीय गतिविधियों ने उनके आवागमन को संभव बनाने में भूमिका निभाई होने की संभावना जताई गई। हाथियों की यह वापसी अचानकमार के पुराने वन्यजीव गलियारों, बदलते भू-दृश्य और मानव-हाथी संघर्ष की चुनौतियों पर नए सिरे से ध्यान खींचती है।"
एक संरक्षणवादी और वन्यजीव प्रेमी के रूप में मेरे लिए यह अत्यंत सुखद और भावुक करने वाली खबर है कि लगभग एक सदी के लंबे अंतराल के बाद एशियाई हाथियों ने छत्तीसगढ़ के अचानकमार टाइगर रिज़र्व में फिर से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। यह केवल हाथियों की वापसी की घटना नहीं है, बल्कि यह उस प्राकृतिक विरासत की वापसी का संकेत है, जिसे कभी जंगलों, रेल पटरियों, सड़कों, खनन और बढ़ती मानवीय गतिविधियों ने हमसे दूर कर दिया था।

यह घटना वर्ष 2020 के कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान हुई, जब मानव गतिविधियों और यातायात में अचानक आई कमी ने वन्यजीवों को अपेक्षाकृत निर्बाध आवागमन का अवसर दिया। उस समय की घटनाएँ आज भी मेरी स्मृतियों में उतनी ही स्पष्ट हैं।

24 मार्च 2020 — वह ऐतिहासिक दिन

24 मार्च 2020 को मुझे अचानकमार टाइगर रिज़र्व के तत्कालीन फील्ड डायरेक्टर से सूचना मिली कि 12 एशियाई जंगली हाथियों का एक झुंड तेंगनमाड़ा और बेलगहना के घने जंगलों से होते हुए अचानकमार टाइगर रिज़र्व में प्रवेश कर चुका है।

झुंड में दो छोटे बच्चे, दो उप-वयस्क नर और आठ वयस्क मादाएँ थीं। यह एक पारिवारिक झुंड था और इसकी संरचना ने स्पष्ट संकेत दिया कि हाथियों के लिए यह क्षेत्र केवल आकस्मिक पड़ाव नहीं, बल्कि उनके पारंपरिक आवागमन क्षेत्र का हिस्सा रहा होगा।

मेरे विचार से, कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान राजमार्ग और बिलासपुर–कटनी रेल मार्ग पर यातायात में आई असाधारण कमी ने इस झुंड को वह अवसर दिया, जिसका उन्हें लंबे समय से इंतजार था। जिस मार्ग पर सामान्य परिस्थितियों में तेज गति से वाहन और रेलगाड़ियाँ लगातार गुजरती थीं, वह अचानक अपेक्षाकृत शांत हो गया था। हाथियों ने इसी अवसर का लाभ उठाया और उत्तर-पूर्वी सीमा से अचानकमार के कोर क्षेत्र में प्रवेश किया। 

जनसंख्या बढ़ी, कृषि का विस्तार हुआ और औद्योगिक गतिविधियां बढ़ीं। रेलवे के विस्तार के लिए लकड़ी और कोयले की मांग ने भी जंगलों पर दबाव बढ़ाया।

अचानकमार से कान्हा–अचानकमार कॉरिडोर तक

झुंड लगभग एक सप्ताह तक अचानकमार के जंगलों में रहा। इसके बाद वह उत्तर-पश्चिम दिशा में आगे बढ़ते हुए कान्हा–अचानकमार कॉरिडोर में प्रवेश कर गया। यह क्षेत्र मध्य भारत में वन्यजीवों के आवागमन और विशेष रूप से बाघों सहित अनेक प्रजातियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। कुछ दिनों तक मध्यप्रदेश के खरिदीह गाँव और आसपास के जंगलों में रहने के बाद हाथियों का यह झुंड पुनः अचानकमार के कोर क्षेत्र में लौट आया। यह वापसी मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण संकेतों में से एक थी।

इसका अर्थ था कि अचानकमार के जंगल उन्हें अनुकूल लग रहे थे—यहाँ भोजन, पानी और अपेक्षाकृत सुरक्षित आवास उपलब्ध था। आज भी हाथियों की उपस्थिति इस बात का प्रमाण है कि यदि जंगल और उनके पारंपरिक आवागमन मार्ग सुरक्षित रहें, तो वन्यजीव अपने पुराने घरों को पहचानने और वापस लौटने की क्षमता रखते हैं। यह उनकी पहली कोशिश नहीं थी, हालाँकि वर्ष 2020 में हाथियों ने अचानकमार में सफलतापूर्वक प्रवेश किया, लेकिन यह उनकी पहली कोशिश नहीं थी।

वर्ष 2014 में भी हाथियों का एक झुंड अचानकमार की उत्तर-पूर्वी सीमा तक पहुँचा था। लेकिन सामने मौजूद व्यस्त रेल मार्ग और तेज गति से गुजरती ट्रेनों ने उनके रास्ते को रोक दिया। झुंड के अधिकांश हाथी आगे नहीं बढ़ सके। केवल एक युवा नर हाथी ने जोखिम उठाया और आगे बढ़ गया। बाद में उसे “राजू” नाम दिया गया। राजू ने अचानकमार के जंगलों से होते हुए मध्यप्रदेश के फेन वन्यजीव क्षेत्र तक यात्रा की और आगे छत्तीसगढ़ के राजनांदगाँव क्षेत्र तक पहुँचा, जहाँ उसे पकड़ लिया गया। अपने परिवार से बिछड़ने के बाद उसके झुंड ने उसे खोजने की कोशिश की। लगभग 23 हाथियों का झुंड कुछ ही दिनों में बिलासपुर और मरवाही वनमंडल की सीमा तक पहुँच गया था।

उस समय मुझे स्वयं इन हाथियों को देखने और वन विभाग के साथ क्षेत्र में सर्वे करने का अवसर मिला। स्थानीय लोगों से बातचीत के दौरान एक रोचक बात सामने आई। ग्रामीणों ने बताया कि झुंड की मुखिया मादा हाथी रेल की पटरियों पर अपनी सूँड़ रखकर कंपन महसूस करती थी—मानो वह यह जानने का प्रयास कर रही हो कि कहीं कोई ट्रेन तो नहीं आ रही। यह व्यवहार हमें बताता है कि हाथी अपने आसपास के वातावरण और संभावित खतरों को कितनी बारीकी से महसूस करते हैं।

“सोनू” की कहानी

वर्ष 2017 में एक और युवा नर हाथी, जिसे बाद में “सोनू” कहा गया, इसी क्षेत्र से आगे बढ़ते हुए भोरमदेव वन्यजीव अभयारण्य तक पहुँच गया था। लेकिन उसे भी पकड़कर वापस अचानकमार लाया गया। मेरे आकलन में, राजू और सोनू जैसे युवा नर हाथियों की कम उम्र और अपेक्षाकृत अधिक जोखिम लेने की प्रवृत्ति ने उन्हें उस बाधा को पार करने के लिए प्रेरित किया, जिससे पूरा झुंड बच रहा था लेकिन इन घटनाओं ने एक महत्वपूर्ण सवाल भी सामने रखा—यदि हाथियों का पारंपरिक मार्ग यहाँ था, तो आखिर वे इसे छोड़ने के लिए मजबूर क्यों हुए? इसका उत्तर हमें इतिहास में मिलता है। जब मैकाल की पहाड़ियों में हाथी आम हुआ करते थे, आज जिस क्षेत्र में हाथियों की उपस्थिति एक असाधारण घटना मानी जाती है, वही क्षेत्र कभी हाथियों का प्राकृतिक आवास हुआ करता था। 

अचानकमार में हाथियों का लौटना इस बात का संकेत हो सकता है कि वन्यजीव पुराने आवासों और गलियारों का इस्तेमाल फिर कर सकते हैं, बशर्ते वहां पर्याप्त जंगल, पानी, भोजन और सुरक्षित आवाजाही की सुविधा मौजूद हो।

उन्नीसवीं शताब्दी में मैकाल पहाड़ियों के उत्तरी हिस्से में हाथी सामान्य रूप से पाए जाते थे। ब्रिटिश काल के वन अधिकारी जेम्स फोर्सिथ के विवरणों में बिलासपुर के उत्तर में लगभग 3,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में करीब 200–300 हाथियों की उपस्थिति का उल्लेख मिलता है। ये हाथी मध्य भारत और पूर्वी भारत के व्यापक हाथी परिदृश्य का हिस्सा थे, जिसकी आबादी पूर्व दिशा में कटक तक फैली हुई थी, लेकिन धीरे-धीरे परिस्थितियाँ बदलने लगीं।

विकास की कीमत और जंगलों का सिकुड़ना

बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में जनसंख्या वृद्धि, कृषि विस्तार और औद्योगिक गतिविधियों के कारण जंगल तेजी से कम होने लगे। रेलवे के विस्तार के लिए लकड़ी और कोयले की बढ़ती आवश्यकता ने भी जंगलों पर भारी दबाव डाला। जंगलों के कटने के साथ-साथ हाथियों के पारंपरिक आवागमन मार्ग बाधित होते गए। सबसे बड़ी बाधाओं में से एक रेलवे नेटवर्क था। जहाँ हाथियों के लिए जंगल एक निरंतर भू-दृश्य हुआ करता था, वहीं रेल पटरियों ने उनके मार्ग को काट दिया। बाद में सड़कें, बस्तियाँ, कृषि क्षेत्र, खनन और अन्य विकास गतिविधियाँ इस विखंडन को और बढ़ाती गईं।

परिणामस्वरूप, बीसवीं शताब्दी के शुरुआती दशकों तक बिलासपुर क्षेत्र में हाथियों की संख्या तेजी से घटती गई और लगभग 1920 के दशक तक उनका स्थानीय अस्तित्व समाप्त हो गया। एक समय जो क्षेत्र हाथियों की आवाजाही से जीवंत था, वहाँ उनकी अनुपस्थिति सामान्य बात बन गई। एक सदी बाद प्रकृति ने फिर दस्तक दी, वर्ष 2020 की घटना ने इस लंबे इतिहास को एक नया मोड़ दिया।

लगभग सौ वर्षों के बाद हाथियों का अचानकमार में लौटना यह दर्शाता है कि प्रकृति के पास अपनी स्मृतियाँ होती हैं। वन्यजीव अपने पुराने आवासों और मार्गों को पीढ़ियों बाद भी पुनः खोज सकते हैं—बशर्ते वहाँ पर्याप्त वन, पानी, भोजन और सुरक्षित आवागमन की संभावना बनी रहे। अचानकमार की यह घटना केवल हाथियों की कहानी नहीं है। यह वन्यजीव गलियारों के महत्व की कहानी भी है।

कान्हा–अचानकमार परिदृश्य बाघों, हाथियों और अन्य वन्यजीवों के लिए एक बड़े परिदृश्य का हिस्सा है। यदि इस पूरे भू-दृश्य में जंगलों के बीच संपर्क बना रहे, तो वन्यजीवों के लिए नए आवासों तक पहुँचना संभव हो सकता है, लेकिन वापसी के साथ चुनौती भी आई है, हाथियों की वापसी निश्चित रूप से हमारे लिए गर्व और खुशी का विषय है, लेकिन इसके साथ एक बड़ी जिम्मेदारी भी जुड़ी है।

मानव-हाथी संघर्ष को कम करने में स्थानीय समुदायों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। समय पर चेतावनी, प्रभावी मुआवजा व्यवस्था, ग्रामीणों की जागरूकता और वन विभाग की त्वरित प्रतिक्रिया से नुकसान को कम किया जा सकता है।

जहाँ जंगल समाप्त होते हैं और गाँव शुरू होते हैं, वहीं से मानव–हाथी संघर्ष की संभावना बढ़ जाती है। भोजन और पानी की तलाश में हाथी खेतों और बस्तियों की ओर जा सकते हैं। दूसरी ओर, ग्रामीणों की फसल और आजीविका भी प्रभावित हो सकती है। इसलिए हाथियों के संरक्षण का अर्थ केवल जंगल के भीतर उन्हें सुरक्षित रखना नहीं है। हमें उनके आवागमन मार्गों, जलस्रोतों, भोजन वाले क्षेत्रों और वन से जुड़े मानव परिदृश्य को भी सुरक्षित रखना होगा। रेलवे और सड़कें जहाँ आवश्यक हैं, वहाँ वन्यजीवों की आवाजाही को ध्यान में रखते हुए सुरक्षित क्रॉसिंग, गति नियंत्रण, निगरानी और अन्य वैज्ञानिक उपायों पर गंभीरता से काम करना होगा। साथ ही स्थानीय समुदायों को संरक्षण का भागीदार बनाना होगा। हाथियों की उपस्थिति से जुड़े अवसरों और चुनौतियों के बारे में ग्रामीणों में जागरूकता बढ़ाना, त्वरित मुआवजा व्यवस्था, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और प्रभावी वन विभागीय प्रतिक्रिया मानव–हाथी संघर्ष को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

अचानकमार के सामने एक नई परीक्षा

अचानकमार ने अपने इतिहास में अनेक चुनौतियों का सामना किया है। शिकार, अवैध गतिविधियों और वनों के क्षरण से जूझते हुए इस परिदृश्य ने धीरे-धीरे अपनी प्राकृतिक पहचान वापस हासिल की है। आज बाघों की वापसी, वन्यजीवों की बढ़ती उपस्थिति और हाथियों का लगभग एक सदी बाद लौटना इस जंगल की पारिस्थितिक क्षमता का प्रमाण है। लेकिन हाथियों की वापसी के साथ अचानकमार के सामने एक नई परीक्षा भी है। क्या हम इस ऐतिहासिक वापसी को स्थायी बना पाएँगे? क्या हम हाथियों के पारंपरिक मार्गों को सुरक्षित रख पाएँगे? क्या हम विकास और संरक्षण के बीच ऐसा संतुलन बना पाएँगे, जिसमें जंगल और उसके आसपास रहने वाले लोग दोनों सुरक्षित रहें? इन सवालों के जवाब केवल वन विभाग या संरक्षण संगठनों के पास नहीं हैं। यह जिम्मेदारी हम सभी की है।

उम्मीद की एक किरण

लगभग सौ वर्षों के बाद जब हाथियों ने अचानकमार की धरती पर कदम रखा, तो मुझे ऐसा लगा जैसे जंगल ने अपने अतीत को फिर से पहचान लिया हो। यह केवल 12 हाथियों का एक झुंड नहीं था। यह इतिहास की वापसी थी। यह एक भूले हुए गलियारे की याद थी। यह प्रकृति की अद्भुत पुनर्जीवन क्षमता का प्रमाण था और साथ ही यह हमारे लिए एक चेतावनी भी थी कि यदि हम वन्यजीवों के रास्ते बंद करेंगे, तो संघर्ष बढ़ेगा; लेकिन यदि हम उनके रास्ते सुरक्षित रखेंगे, तो जंगल स्वयं अपना संतुलन पुनः स्थापित करने की क्षमता रखता है। अचानकमार ने कभी हाथियों को खोया था। लगभग एक सदी बाद हाथियों ने अचानकमार को फिर खोज लिया। अब हमारी जिम्मेदारी है कि इस बार उन्हें दोबारा खोने न दें। 

अब चुनौती यह है कि इस वापसी को सिर्फ एक ऐतिहासिक घटना बनकर न रह जाने दिया जाए, बल्कि इसे दीर्घकालीन संरक्षण की दिशा में एक अवसर बनाया जाए।

मुझे इस ऐतिहासिक वापसी को लेकर सतर्क आशावाद है। आने वाला समय बताएगा कि अचानकमार इन नए मेहमानों को स्थायी घर दे पाता है या नहीं। लेकिन एक संरक्षणवादी के रूप में मैं इतना अवश्य मानता हूँ कि हाथियों का लौटना अचानकमार के जंगलों के लिए प्रकृति की ओर से मिला एक अनमोल अवसर है—और हमें इसे हर संभव प्रयास से सुरक्षित रखना चाहिए।

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