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प्रेस क्लब विवाद : नियमों की जीत, लेकिन सवाल अब भी बाकी

सचिव संदीप करिहार और कोषाध्यक्ष किशोर कुमार सिंह को पदों पर यथावत रखने के निर्देश

निर्वाचित सचिव-कोषाध्यक्ष को हटाने का फैसला निरस्त; अब सवाल सिर्फ पदों का नहीं, संस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही का भी
TODAY छत्तीसगढ़  /  बिलासपुर प्रेस क्लब में पदाधिकारियों के बीच चल रहा विवाद अब महज आंतरिक मतभेद का मामला नहीं रह गया है। सहायक पंजीयक, फर्म्स एवं संस्थाएं, बिलासपुर संभाग का 6 अगस्त का आदेश इस पूरे प्रकरण को संस्था के संविधान, लोकतांत्रिक प्रक्रिया और वित्तीय पारदर्शिता की कसौटी पर ले आया है। आदेश में 31 जुलाई की कार्यकारिणी बैठक में सचिव संदीप करिहार और कोषाध्यक्ष किशोर कुमार सिंह के पदों में किए गए बदलाव को नियमविरुद्ध मानते हुए निरस्त कर दिया गया है। दोनों निर्वाचित पदाधिकारियों को उनके पदों पर यथावत रखने के निर्देश दिए गए हैं। 

पत्रकारिता की दुनिया में दूसरों से सवाल पूछना आसान है। मुश्किल तब होती है, जब वही सवाल अपने संगठन के दरवाजे पर खड़ा हो।

इस आदेश का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि संस्था के भीतर निर्वाचित पदों में परिवर्तन को केवल कार्यकारिणी के निर्णय से वैध नहीं माना जा सकता। पंजीकृत संविधान और सोसायटी पंजीयन कानून के तहत पदाधिकारियों की नियुक्ति, पदमुक्ति अथवा बदलाव के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है। यही वह बिंदु है जहां प्रेस क्लब का विवाद व्यक्तिगत मतभेद से आगे बढ़कर संस्थागत अनुशासन का प्रश्न बन जाता है।

कार्यकारिणी की शक्ति और उसकी सीमा

किसी भी लोकतांत्रिक संस्था में कार्यकारिणी को अधिकार प्राप्त होते हैं, लेकिन वे अधिकार असीमित नहीं होते। कार्यकारिणी संविधान और नियमावली के दायरे में रहकर ही निर्णय ले सकती है। यदि निर्वाचित पदाधिकारियों के पद में परिवर्तन के लिए सामान्य सभा अथवा अन्य निर्धारित प्रक्रिया जरूरी है, तो केवल कार्यकारिणी की बैठक में लिया गया फैसला उस प्रक्रिया का विकल्प नहीं बन सकता।

सहायक पंजीयक का आदेश इसी मूल सिद्धांत को रेखांकित करता है। यह फैसला किसी एक पदाधिकारी के पक्ष या विपक्ष में खड़े होने से अधिक महत्वपूर्ण इसलिए है, क्योंकि इससे संस्था के भीतर नियमों की सर्वोच्चता स्थापित होती है। पदाधिकारी बदलने की प्रक्रिया यदि स्पष्ट है तो उसे व्यक्तिगत असहमति, बहुमत के दबाव या आंतरिक राजनीतिक समीकरणों के आधार पर दरकिनार नहीं किया जा सकता। 

विवाद का दूसरा और अधिक गंभीर पक्ष—वित्तीय पारदर्शिता

मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू क्लब की वित्तीय व्यवस्था भी है। सहायक पंजीयक ने संस्था की निधि बैंक में सुरक्षित रखने और उसके संचालन में अध्यक्ष या सचिव तथा कोषाध्यक्ष के संयुक्त हस्ताक्षर सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही आय-व्यय का हिसाब और बैठकों की कार्यवाही नियमानुसार रखने पर भी जोर दिया गया है।  

प्रेस क्लब को यह तय करना होगा कि वह पदों की राजनीति करेगा या संस्था की प्रतिष्ठा बचाएगा।

यह निर्देश केवल वर्तमान विवाद को नियंत्रित करने की प्रशासनिक कवायद नहीं माना जाना चाहिए। किसी भी पंजीकृत संस्था के लिए आर्थिक पारदर्शिता उसकी विश्वसनीयता की बुनियादी शर्त है। खासकर पत्रकारों की संस्था में वित्तीय व्यवस्था को लेकर उठने वाले सवाल सामान्य संस्थाओं की तुलना में कहीं अधिक गंभीर होते हैं, क्योंकि ऐसी संस्था स्वयं सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता और जवाबदेही की पैरवी करती है।

इसलिए प्रेस क्लब के भीतर वित्तीय लेन-देन, आय-व्यय और निधि संचालन को लेकर यदि सवाल उठे हैं, तो उनका समाधान आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि दस्तावेजों और स्वतंत्र जांच के आधार पर होना चाहिए।

धारा 32 का रास्ता खुला, जवाबदेही अभी बाकी

सचिव और कोषाध्यक्ष की ओर से कथित वित्तीय अनियमितताओं की जांच और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग भी की गई थी। सहायक पंजीयक ने इस हिस्से पर तत्काल जांच का आदेश देने के बजाय स्पष्ट किया है कि छत्तीसगढ़ सोसायटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम की धारा 32 के तहत पंजीयक, फर्म्स एवं संस्थाएं के समक्ष आवेदन किया जा सकता है।

इसका अर्थ यह है कि वित्तीय आरोपों का अध्याय अभी बंद नहीं हुआ है। फिलहाल प्रशासनिक आदेश ने पदों को लेकर स्थिति स्पष्ट कर दी है, लेकिन यदि वित्तीय अनियमितताओं के संबंध में पर्याप्त आधार और दस्तावेज उपलब्ध हैं तो विधि में उनके परीक्षण का रास्ता खुला हुआ है।

यही इस पूरे प्रकरण का अगला महत्वपूर्ण चरण हो सकता है। आरोपों की राजनीतिक व्याख्या करने के बजाय यह देखा जाना चाहिए कि खातों, बैंक लेन-देन, स्वीकृत प्रस्तावों और खर्चों से जुड़े दस्तावेज क्या कहते हैं।

प्रेस क्लब के लिए यह आत्ममंथन का समय

इस विवाद से बिलासपुर प्रेस क्लब के सामने एक बड़ा संस्थागत सवाल भी खड़ा होता है—क्या संस्था अपने आंतरिक मतभेदों का समाधान अपने ही संविधान और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के भीतर कर सकती है?

यदि हर असहमति का समाधान प्रशासनिक हस्तक्षेप तक पहुंचने लगे तो यह संस्था की आंतरिक व्यवस्था के लिए स्वस्थ संकेत नहीं है। दूसरी ओर, यदि नियमों की अनदेखी हो रही हो और निर्वाचित पदाधिकारियों के अधिकार प्रभावित हो रहे हों, तो नियामकीय हस्तक्षेप आवश्यक भी हो जाता है।

इसलिए मौजूदा आदेश को किसी पक्ष की जीत और दूसरे पक्ष की हार के रूप में देखना इस प्रकरण को छोटा कर देना होगा। असली जीत तभी होगी जब प्रेस क्लब के भीतर नियम, संस्थागत मर्यादा और पारदर्शिता की व्यवस्था मजबूत हो।

आगे की राह क्या हो?

अब क्लब प्रबंधन के सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी टकराव को आगे बढ़ाने के बजाय व्यवस्था को सामान्य करने की है। निर्वाचित सचिव और कोषाध्यक्ष को उनके पदों पर बनाए रखने के आदेश का पालन, बैंक खाते और निधि के संचालन में निर्धारित संयुक्त हस्ताक्षर व्यवस्था, नियमित लेखा-जोखा तथा बैठकों की विधिवत कार्यवाही—इन सब पर स्पष्टता जरूरी है।

साथ ही, यदि वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों में तथ्य हैं तो संबंधित पक्ष को धारा 32 के तहत सक्षम प्राधिकारी के समक्ष दस्तावेजों के साथ जाना चाहिए। जांच का निष्कर्ष ही यह तय करे कि आरोप केवल संगठनात्मक विवाद का हिस्सा हैं या वास्तव में वित्तीय गड़बड़ी हुई है।  

समय किसी पक्ष की जीत का जश्न मनाने का नहीं, बल्कि यह साबित करने का है कि बिलासपुर प्रेस क्लब अपने ही घोषित नियमों और लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ खड़ा है।

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