छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले के पटना थाना क्षेत्र में सामने आई घटना ने केवल कानून-व्यवस्था पर नहीं, बल्कि पूरे समाज की चेतना पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। एक पति ने अपनी पत्नी के चरित्र पर संदेह के कारण जिस तरह की अमानवीय बर्बरता की, वह किसी सभ्य समाज की कल्पना से भी परे है। महिला को बेरहमी से पीटना, उसके हाथ-पैर बांध देना, उसका मुंडन कर देना, चेहरे पर कालिख पोतना, जबरन पेशाब पिलाना और इतना ही नहीं, मासूम बच्चों से भी उसकी गरिमा को तार-तार कराने का प्रयास करना केवल एक अपराध नहीं, बल्कि मनुष्यता की हत्या है।
पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है। कानून अपना काम करेगा। अदालतें फैसला सुनाएँगी। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या केवल गिरफ्तारी से ऐसे अपराध रुक जाएंगे? क्या हर बार अपराध होने के बाद गिरफ्तारी और जेल ही समाज को सुरक्षित बना पाएंगे? यदि ऐसा होता, तो घरेलू हिंसा, दहेज हत्या, बलात्कार, ऑनर किलिंग और महिलाओं पर अत्याचार की घटनाएँ आज इतिहास बन चुकी होतीं। दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ। इसका अर्थ स्पष्ट है कि समस्या अपराधी से कहीं अधिक उस सोच की है जो ऐसे अपराधों को जन्म देती है।
आज भारत चंद्रमा पर पहुँच चुका है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल क्रांति की बातें हो रही हैं, लेकिन समाज का एक बड़ा वर्ग आज भी मानसिक रूप से सदियों पीछे खड़ा दिखाई देता है। विज्ञान आधुनिक हो गया, लेकिन सोच मध्ययुगीन बनी हुई है। मोबाइल फोन स्मार्ट हो गए, लेकिन दिमाग अब भी संकीर्णता के पुराने सॉफ़्टवेयर पर चल रहे हैं।
सबसे विडंबनापूर्ण बात यह है कि जिस पुरुष को समाज "घर का मुखिया" कहकर सम्मान देता है, वही कई बार अपने घर की महिला के सम्मान का सबसे बड़ा दुश्मन बन जाता है। पत्नी को जीवनसंगिनी नहीं, बल्कि अपनी निजी संपत्ति मानने की प्रवृत्ति आज भी समाज के एक बड़े हिस्से में मौजूद है। यह सोच मानती है कि पत्नी की हँसी, उसके रिश्ते, उसका आना-जाना, उसका पहनावा, उसकी स्वतंत्रता और यहाँ तक कि उसकी साँसों पर भी पति का अधिकार है। यदि वह इस अधिकार को चुनौती देती दिखाई दे, तो उसे अपमानित करना, पीटना या प्रताड़ित करना जैसे पति का जन्मसिद्ध अधिकार हो।
दरअसल, चरित्र पर संदेह अधिकांश मामलों में महिला के व्यवहार से अधिक पुरुष की मानसिक असुरक्षा का परिणाम होता है। जो व्यक्ति स्वयं पर विश्वास नहीं करता, जो अपने रिश्ते को विश्वास की नींव पर खड़ा नहीं कर पाता, वही शक की दीवारें खड़ी करता है। शक प्रेम का प्रमाण नहीं, बल्कि असुरक्षा, स्वामित्व और अहंकार का दूसरा नाम है।
समाज में एक विचित्र विरोधाभास भी दिखाई देता है। पुरुष स्वयं अपने लिए हर प्रकार की स्वतंत्रता चाहता है। मित्रता करे तो आधुनिकता, देर रात बाहर रहे तो काम की मजबूरी, किसी से बात करे तो सामाजिक व्यवहार; लेकिन यदि पत्नी किसी से सामान्य बातचीत भी कर ले, तो उसके चरित्र पर प्रश्नचिह्न लगा दिया जाता है। यह दोहरा मापदंड केवल महिलाओं का नहीं, बल्कि पूरे समाज का अपमान है।
और यह पहली घटना नहीं है। लगभग हर सप्ताह देश के किसी न किसी हिस्से से ऐसी खबरें सामने आती हैं जहाँ पति ने शक के आधार पर पत्नी की हत्या कर दी, तेजाब फेंक दिया, सार्वजनिक रूप से अपमानित किया या उसे आत्महत्या के लिए मजबूर कर दिया। हर बार समाज कुछ दिनों तक आक्रोश व्यक्त करता है, मीडिया बहस करता है, पुलिस गिरफ्तारी करती है और फिर सब कुछ सामान्य हो जाता है। अगले अपराध तक।
इस घटना का सबसे भयावह पक्ष वह है, जिसमें बच्चों को भी इस अपराध का सहभागी बनाया गया। सोचिए, जिन बच्चों के लिए माँ संसार की पहली गुरु होती है, उन्हीं बच्चों के सामने उसकी गरिमा को कुचला गया। इससे बड़ा मानसिक अपराध और क्या हो सकता है? ऐसे बच्चे बड़े होकर क्या सीखेंगे? वे सम्मान सीखेंगे या हिंसा? वे समानता समझेंगे या प्रभुत्व? वे प्रेम करेंगे या अपमान?
समाजशास्त्री वर्षों से कहते रहे हैं कि हिंसा सीखी जाती है। कोई भी बच्चा हिंसक पैदा नहीं होता। वह अपने घर, अपने परिवेश और अपने अनुभवों से सीखता है। यदि घर में माँ का सम्मान नहीं होगा, तो समाज में किसी महिला का सम्मान कैसे होगा?
विडंबना यह भी है कि हमारे समाज में बेटी बचाने की बात तो खूब होती है, लेकिन बेटे को संस्कार देने की चर्चा बहुत कम होती है। बेटी को बचाना आवश्यक है, लेकिन उससे कहीं अधिक आवश्यक है बेटे को यह सिखाना कि स्त्री कोई वस्तु नहीं, कोई संपत्ति नहीं, कोई गुलाम नहीं; वह एक स्वतंत्र व्यक्तित्व है, जिसके अपने अधिकार, अपनी गरिमा और अपनी इच्छाएँ हैं।
शिक्षा केवल डिग्री देने का माध्यम नहीं होनी चाहिए। यदि कोई व्यक्ति उच्च शिक्षित होकर भी अपनी पत्नी को सार्वजनिक रूप से अपमानित करता है, तो उसकी डिग्री समाज के लिए किसी काम की नहीं। वास्तविक शिक्षा वह है जो व्यक्ति को संवेदनशील बनाए, बराबरी का सम्मान करना सिखाए और संबंधों में विश्वास का मूल्य समझाए।
दुर्भाग्य यह भी है कि हमारे समाज में पुरुषों को बचपन से ही एक झूठी श्रेष्ठता का पाठ पढ़ाया जाता है। "लड़के रोते नहीं", "घर की इज्जत तुम्हारे हाथ में है", "औरत को काबू में रखना पड़ता है"—ऐसी बातें मज़ाक या परंपरा के नाम पर पीढ़ी-दर-पीढ़ी दोहराई जाती हैं। यही कथन आगे चलकर हिंसा का आधार बन जाते हैं। जब पुरुष यह मानने लगता है कि नियंत्रण उसका अधिकार है, तब असहमति उसे विद्रोह लगने लगती है और विद्रोह का उत्तर वह हिंसा से देने लगता है।
कानून की भूमिका भी यहाँ अत्यंत महत्वपूर्ण है। गिरफ्तारी आवश्यक है, लेकिन पर्याप्त नहीं। ऐसे मामलों में त्वरित सुनवाई, कठोर दंड और पीड़िता के पुनर्वास की मजबूत व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी है। केवल अपराधी को जेल भेज देना समाधान नहीं है। पीड़ित महिला को सामाजिक सुरक्षा, मनोवैज्ञानिक सहायता, आर्थिक संबल और न्याय की वास्तविक अनुभूति भी मिलनी चाहिए।
साथ ही पुलिस और प्रशासन को घरेलू हिंसा को "पति-पत्नी का निजी मामला" मानने की पुरानी सोच से बाहर निकलना होगा। घरेलू हिंसा निजी नहीं, सामाजिक अपराध है। जब घर की चारदीवारी के भीतर किसी महिला की गरिमा कुचली जाती है, तब पूरा समाज असफल होता है।
मीडिया की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। ऐसी घटनाओं को केवल सनसनीखेज शीर्षकों तक सीमित कर देना पर्याप्त नहीं। मीडिया को समाज में संवाद पैदा करना होगा। विद्यालयों, महाविद्यालयों, पंचायतों और सामाजिक संगठनों को भी इस विषय पर खुलकर चर्चा करनी होगी। महिलाओं के सम्मान की शिक्षा केवल महिला दिवस के भाषणों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।
आज आवश्यकता पुरुष विरोध की नहीं, बल्कि पुरुष मानसिकता के सुधार की है। सभी पुरुष एक जैसे नहीं होते। असंख्य पुरुष अपनी पत्नी, बहन, माँ और बेटियों का सम्मान करते हैं। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि समाज के भीतर एक ऐसा वर्ग मौजूद है, जो अपनी कुंठा, असुरक्षा और अहंकार को पुरुषत्व समझ बैठा है। यही वर्ग पूरे पुरुष समाज की छवि को धूमिल करता है। इसलिए संवेदनशील पुरुषों की भी जिम्मेदारी है कि वे ऐसी मानसिकता का खुलकर विरोध करें। मौन समर्थन भी अपराध को शक्ति देता है।
यह भी समझना होगा कि सम्मान किसी रिश्ते की भीख नहीं होता। सम्मान अधिकार है। विश्वास किसी विवाह का सबसे मजबूत स्तंभ है। जहाँ विश्वास समाप्त हो जाता है, वहाँ विवाह केवल सामाजिक समझौता बनकर रह जाता है। और जहाँ अहंकार प्रेम से बड़ा हो जाए, वहाँ हिंसा जन्म लेती है।
सवाल केवल कोरिया का नहीं है। सवाल पूरे समाज का है। यदि आज भी किसी पुरुष को लगता है कि वह पत्नी का मुंडन कर सकता है, उसे नंगा कर सकता है, उसे अपमानित कर सकता है, तो दोष केवल उस व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस सामाजिक व्यवस्था का भी है जिसने उसे यह विश्वास दिलाया कि वह ऐसा कर सकता है।
आज समय की मांग है कि हम केवल कानून बदलने की बात न करें, बल्कि सोच बदलने का राष्ट्रीय अभियान चलाएँ। स्कूलों में लैंगिक समानता पढ़ाई जाए। परिवारों में बेटियों और बेटों के लिए समान नियम हों। धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक नेतृत्व भी स्पष्ट संदेश दे कि स्त्री का अपमान किसी संस्कृति, किसी परंपरा और किसी धर्म का हिस्सा नहीं हो सकता।
सभ्यता की पहचान ऊँची इमारतों, चौड़ी सड़कों और आधुनिक तकनीक से नहीं होती। सभ्यता का वास्तविक पैमाना यह है कि वहाँ महिलाओं के साथ कैसा व्यवहार होता है। यदि किसी समाज में स्त्री आज भी शक के नाम पर अपमानित, प्रताड़ित और अमानवीय यातनाओं की शिकार हो रही है, तो उस समाज को स्वयं को विकसित कहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।
कोरिया की यह घटना एक चेतावनी है। यह केवल पुलिस की फाइल का मामला नहीं, बल्कि समाज के आत्ममंथन का अवसर है। आरोपी की गिरफ्तारी आवश्यक थी और उसका कठोर दंड भी आवश्यक है, किंतु उससे कहीं अधिक आवश्यक है उस सोच को कठघरे में खड़ा करना, जो स्त्री को इंसान नहीं, पुरुष की जागीर समझती है।
कानून अपराधी को सजा दे सकता है, लेकिन समाज ही मानसिकता बदल सकता है। जिस दिन हर परिवार अपने बेटे को यह सिखा देगा कि पत्नी पर अधिकार नहीं, सम्मान होता है; संदेह नहीं, विश्वास होता है; और पुरुषत्व का अर्थ हिंसा नहीं, संवेदनशीलता है—उसी दिन ऐसी खबरें अखबारों की सुर्खियाँ नहीं, इतिहास के काले पन्ने बन जाएँगी।
