12 दिसंबर 2025, इस तारीख़ ने छत्तीसगढ़ के पर्यावरण इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ा। बिलासपुर जिले का कोपरा जलाशय राज्य का पहला रामसर स्थल घोषित हुआ। काग़ज़ों में यह क्षण गौरव का था। ऐसा गौरव, जिसे माथे पर तिलक की तरह सजाया जाना चाहिए था पर विडंबना देखिए कि तिलक लगते ही आईना धुंधला कर दिया गया। शोर बहुत हुआ, सार गुम हो गया।
रामसर का तमगा मिलते ही श्रेय की होड़ शुरू हो गई सियासत ने माइक पकड़ा, विभागीय दांव-पेंचों ने फाइलें तेज़ दौड़ाईं, और ठेकेदारों की चाल अचानक फुर्तीली हो गई। सरकारी बोर्ड रातों-रात उग आए; जलाशय के किनारे पक्षियों की तस्वीरें टंगीं, जिसे गायब होते भी समय नहीं लगा । काम सरकारी था, इसलिए अंदाज़ भी वही दिखावटी, जल्दबाज़, आत्मसंतुष्ट ।
कोपरा को रामसर का गौरव हासिल होने मौके पर एक आयोजन का तम्बू सजाने के लिये 9 जनवरी 2026 को वन विभाग ने ‘बर्ड वॉक’ और संगोष्ठी का आयोजन किया। सरकारी आमंत्रण कार्ड छपे, अतिथियों की सूची लंबी थी बस एक चीज़ कम थी: कोपरा। संगोष्ठी सकरी के वन चेतना केंद्र में हुई कोपरा से चार किलोमीटर दूर। यह दूरी केवल भौगोलिक नहीं थी; यह उस सोच की दूरी थी, जो मानती है कि सम्मान मंच पर बँटता है, ज़मीन पर नहीं।
बर्ड वॉक में कुछ पक्षी प्रेमी और फोटोग्राफ़र दिखे वे ही, जो बरसों से बिना तामझाम, बिना फंड, बिना बोर्ड के कोपरा को समझते रहे। संगोष्ठी में भीड़ थी, पर कोपरा के लोग नहीं थे। जिस गाँव को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली, वहाँ का नज़ारा हर रोज़ जैसा ही रहा। जिन युवाओं और स्कूली बच्चों के बीच संरक्षण का बीज बोया जाना था, वे आयोजन के शोर से दूर खड़े रहे या यूँ कहें, खड़ा कर दिए गए।
सबसे पीड़ादायक उपेक्षा उन वरिष्ठ लोगों की रही, जो तथ्य, धैर्य और ज़मीन से जुड़ी समझ रखते हैं वे जो कोपरा के गौरव को संरक्षित करने में मील का पत्थर बन सकते थे। उन्हें आमंत्रण नहीं मिला; शायद इसलिए कि वे तालियाँ नहीं, सवाल पूछते हैं। सवाल जो तस्वीरों से नहीं, सच से डराते हैं। मुझे इस आयोजन का निमंत्रण भी मिला, विभाग के अधिकारियों ने भरपूर तवज्जो भी दी, लेकिन कोपरा की गैर मौजूदगी ने मुझे न सिर्फ परेशान किया बल्कि कईयों सवाल सोचने पर मजबूर कर दिया, व्यक्तिगत मेरे लिये 12 दिसंबर 2025 बड़ी ख़ुशी का दिन रहा। कोपरा को रामसर का दर्जा मिलने के साथ केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव से लेकर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, वन मंत्री केदार कश्यप के ट्वीटर पर शुभकामनाओं के सन्देश समेत अन्य स्थानों पर जिन तस्वीरों को शेयर किया गया वो मेरी खींची हुई थी लेकिन आयोजन स्थल पर कोपरा गाँव की अनुपस्थिति से मेरी भावनाएँ व्यक्तिगत आहत हुईं। सच यह है कि वन विभाग को संरक्षण से ज़्यादा क्रेडिट मैनेजमेंट आता है। पहले अनदेखी, फिर घोषणा, फिर समारोह और अंत में आत्ममुग्धता। यकीनन संरक्षण को ‘इवेंट’ बना दिया गया है।
यह वही कोपरा है, जिसकी महत्ता को लेकर पिछले एक दशक से कुछ पक्षी प्रेमी और फ़ोटोग्राफ़र लगातार चेताते रहे। अतिक्रमण, प्रदूषण, शिकार, असामाजिक गतिविधियाँ सब कुछ प्रशासन के संज्ञान में था। मुरुम का अवैध उत्खनन, कोलवॉशरी के लिए टैंकरों से पानी की चोरी, सूचनाएँ वन विभाग से लेकर जिला प्रशासन तक पहुँचीं पर कानों में जूँ तक न रेंगी। मछली मारने की पुरानी रवायतें चलीं, और संरक्षण की नई भाषा फाइलों में सोती रही।
रामसर का दर्जा, यह केवल एक पदक नहीं, एक जिम्मेदारी है। यह याद दिलाता है कि आर्द्रभूमि कोई सजावटी वस्तु नहीं, जीवन-रेखा है। पर हमारे यहाँ जीवन-रेखाएँ भी तब तक दिखती नहीं, जब तक उन पर रिबन न बँध जाए। और रिबन बँधते ही, कैंची खोजी जाने लगती है काटने के लिए, जोड़ने के लिए नहीं।
12 दिसंबर से पहले सिर्फ सुगबुगाहटें थीं, उहापोह था। अब जब घोषणा हो चुकी है। संरक्षण बोर्ड से नहीं, सबकी सहभागिता से होता है। संगोष्ठी केंद्रों से नहीं, गाँव की चौपाल से जन्म लेती है। बर्ड वॉक कैमरे से नहीं, चेतना से पूरी होती है। अगर रामसर का ताज सच में पहनना है, तो उसे संभालने के लिए सिर भी चाहिए वह सिर, जो झुके नहीं; वह आँख, जो दिखावे के परे देखे; और वह दिल, जो कोपरा को तस्वीर नहीं, जीवित तंत्र माने। वरना इतिहास यही लिखेगा कि हमने गौरव तो पाया, पर उसे बचाने की हिम्मत खो दी।
