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कैमरे की कलम: बादाम, बाबू और बेबस नागरिक


बिलासपुर के हाउसिंग बोर्ड कार्यालय में घटी हालिया घटना ने प्रशासनिक तंत्र की उस पुरानी बीमारी को फिर उजागर कर दिया है, जिसे हम सब जानते तो हैं, पर अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। तोरण साहु नाम का युवक अपनी फाइल के महीनों से अटके होने से त्रस्त जब महिला अधिकारी की मेज पर बादाम उड़ेलते हुए यह कहता है कि “इसे खाइए, याद आ जाएगा फाइल कहां रखी है”, तो यह केवल एक क्षणिक आवेश या अनोखा विरोध नहीं रह जाता; यह व्यवस्था पर सीधा, तीखा और असहज सवाल बन जाता है।

यह घटना हंसी का विषय बन सकती है, सोशल मीडिया पर मनोरंजन का साधन भी। लेकिन यदि इसे केवल एक वायरल वीडियो के रूप में देख लिया गया, तो हम उस गहरे संकट को नजरअंदाज कर देंगे, जिसकी ओर यह इशारा करती है। 

उसके बादाम सिर्फ मेज पर नहीं गिरे थे वे उस पूरी व्यवस्था पर गिरे थे जो वर्षों से “याददाश्त खोने” का नाटक कर रही है।

सरकारी दफ्तरों में “फाइल नहीं मिल रही” अब अपवाद नहीं, लगभग एक स्वीकृत सत्य बन चुका है। यह स्थिति उतनी ही चिंताजनक है, जितनी सामान्य लगने लगी है। सवाल यह नहीं कि फाइलें क्यों खो जाती हैं, सवाल यह है कि उनके खो जाने के बाद भी व्यवस्था क्यों नहीं हिलती? एक नागरिक जब अपनी वैध प्रक्रिया पूरी कर चुका हो, दस्तावेज जमा कर चुका हो, और फिर भी महीनों तक केवल यह सुनता रहे कि उसकी फाइल “ढूंढी जा रही है”, तो यह केवल प्रशासनिक ढिलाई नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों का प्रत्यक्ष हनन है।

प्रशासनिक प्रक्रियाओं में समयसीमा तय होती है, कम से कम कागजों पर लेकिन व्यवहार में यह समयसीमा अक्सर एक औपचारिकता भर रह जाती है। एक-दो महीने में पूरा होने वाला काम सात महीने तक भी अधूरा रह जाए, तो यह केवल देरी नहीं, बल्कि जवाबदेही की विफलता है। इस विफलता की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसका कोई स्पष्ट उत्तरदायी नहीं होता। फाइल एक टेबल से दूसरी टेबल तक घूमती रहती है, और अंततः “कहीं” अटक जाती है बिना किसी के जिम्मेदार ठहराए।

यह विचारणीय है कि एक नागरिक को अपने वैध अधिकार के लिए व्यंग्य का सहारा क्यों लेना पड़ता है। बादाम का प्रतीकात्मक उपयोग केवल हास्य नहीं था यह उस संवेदनहीनता पर चोट थी, जो प्रशासनिक व्यवहार में गहराई तक समा चुकी है। जब सीधी शिकायतें अनसुनी रह जाती हैं, जब आवेदन और अनुस्मारक (रिमाइंडर) निष्प्रभावी हो जाते हैं, तब नागरिक के पास ऐसे ही प्रतीकात्मक तरीकों का सहारा बचता है। यह स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए स्वस्थ संकेत नहीं मानी जा सकती।

इस पूरे प्रकरण में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि मामला तब चर्चा में आया, जब उसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। यह दर्शाता है कि पारंपरिक शिकायत तंत्र की तुलना में सार्वजनिक दबाव अब अधिक प्रभावी होता जा रहा है लेकिन क्या किसी नागरिक को न्याय या समाधान पाने के लिए अपने मुद्दे को वायरल करना आवश्यक होना चाहिए? यदि हां, तो यह प्रशासनिक तंत्र की गंभीर कमजोरी का संकेत है।

किसी भी प्रशासनिक व्यवस्था की विश्वसनीयता उसकी जवाबदेही पर निर्भर करती है। यदि फाइल गुम होती है, तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि इसके लिए कौन जिम्मेदार है। यदि तय समय में काम नहीं होता, तो इसके परिणाम क्या होंगे। वर्तमान स्थिति में, इन दोनों प्रश्नों के उत्तर अक्सर धुंधले होते हैं। यही धुंधलापन लापरवाही को बढ़ावा देता है और नागरिक को असहाय बनाता है। 

यह मान लेना आसान है कि यह सिर्फ एक अलग घटना है लेकिन सच्चाई यह है कि यह हर शहर, हर कस्बे, हर दफ्तर की कहानी है—बस तरीके अलग-अलग हैं।

इस पूरी व्यवस्था में सबसे अधिक प्रभावित वह नागरिक है, जिसके पास न तो संसाधन हैं और न ही प्रभाव। वह केवल प्रक्रिया का पालन करता है, निर्देशों का अनुपालन करता है, और बदले में अपेक्षा करता है कि उसका काम समय पर हो जाएगा लेकिन जब उसे बार-बार दफ्तर के चक्कर लगाने पड़ते हैं, जब उसे हर बार नया बहाना सुनने को मिलता है, तो यह केवल असुविधा नहीं—यह उसके आत्मसम्मान पर भी चोट है।

इस घटना को एक अपवाद मानकर भुला देना आसान होगा, लेकिन इससे समस्या समाप्त नहीं होगी। आवश्यक है कि इसे एक संकेत के रूप में देखा जाए और सुधार की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं। प्रक्रियाओं का पूर्ण डिजिटलीकरण, ताकि फाइलों के गुम होने की संभावना समाप्त हो, समयबद्ध सेवा की सख्त निगरानी, प्रत्येक स्तर पर स्पष्ट जवाबदेही और सबसे महत्वपूर्ण, नागरिक के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण होना जरूरी है। 

बिलासपुर की यह घटना केवल एक युवक के विरोध की कहानी नहीं है; यह उस व्यापक असंतोष की अभिव्यक्ति है, जो लंबे समय से प्रशासनिक उदासीनता के कारण पनप रहा है।बादाम यहां एक प्रतीक बन गए हैं—याददाश्त बढ़ाने का नहीं, बल्कि व्यवस्था को उसकी जिम्मेदारियों की याद दिलाने का। 

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