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कैमरे की कलम: चिट्टा, सट्टा और सत्ता, खाकी की उलझी कहानी


पुलिस की वर्दी केवल खाकी कपड़ा नहीं राज्य की शक्ति और जनता के भरोसे का प्रतीक है। जब वही वर्दी कटघरे में खड़ी होती है, तो केवल व्यक्ति नहीं, पूरी संस्था सवालों में घिर जाती है। पुलिस को केवल कानून लागू करने वाली संस्था नहीं, बल्कि राज्य के नैतिक प्रतिनिधि के रूप में भी देखा जाता है और इसलिए जब पुलिस व्यवस्था पर बेईमानी, मिलीभगत या पद के दुरुपयोग के आरोप लगते हैं, तो सवाल केवल व्यक्तियों पर नहीं उठते, वे वैधता की जड़ों तक पहुँचते हैं। हाल के वर्षों में देश के कई हिस्सों से ऐसी घटनाएँ सामने आईं जिनमें पुलिसकर्मियों पर महिलाओं के यौन शोषण, नशे के कारोबार में संलिप्तता से लेकर आर्थिक अनियमितताओं और सट्टा नेटवर्क से जुड़ाव तक के आरोप लगे। छत्तीसगढ़ इससे बिल्कुल भी अछूता नहीं है, छत्तीसगढ़ पुलिस में ऐसे दर्जनों आईपीएस अफसर हैं  जिन पर अपनी हवस मिटाने के लिए महिलाओं के जिस्म नोचने के आरोप लगे है। नीचे से लेकर बड़े साहबों तक नाम के साथ आरोपों की फेहरिस्त लम्बी है। फिलहाल हिमांशु बर्मन, कल्पना वर्मा और सहदेव यादव जैसे बेईमान पुलिस वालों के लिए इस आदर्श वाक्य “सेवा और सुरक्षा” के मायने ही अलग हैं। मुझे लगता है इन लोगों की पारिवारिक पृष्ठभूमि में संस्कारों की कमी रही होगी, ये तीनों ही चेहरे चरित्र की बुनियादी परीक्षा में विफल रहे ? ये रही उनकी कहानियां। 

राजधानी रायपुर में नशे के खिलाफ चल रहे अभियान के बीच एक पुलिस आरक्षक हिमांशु बर्मन की प्रतिबंधित हेरोइन (चिट्टा) के साथ गिरफ्तारी ने एक असहज प्रश्न खड़ा कर दिया है। यह प्रश्न केवल एक व्यक्ति के आचरण तक सीमित नहीं है; यह उस व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा है जो स्वयं को कानून का प्रहरी कहती है। पुलिस के अनुसार सूचना के आधार पर आरक्षक हिमांशु बर्मन को कथित रूप से हेरोइन के साथ पकड़ा गया। वरिष्ठ अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि मामले की जांच जारी है, आरोपी को रिमांड पर लेकर पूछताछ की जा रही है और सप्लाई चेन की हर कड़ी तक पहुंचने का प्रयास होगा। आधिकारिक बयान यह भी कहता है कि “कोई भी हो, बख्शा नहीं जाएगा।” राजधानी रायपुर में हाल के महीनों में सूखे नशे के खिलाफ पुलिस की सक्रियता स्पष्ट रही है। कई मामले दर्ज हुए, आरोपियों की गिरफ्तारी हुई, बड़ी मात्रा में प्रतिबंधित सामग्री जब्त की गई। ऐसे में जब उसी विभाग का एक सदस्य कथित रूप से इस अवैध कारोबार में संलिप्त पाया जाता है, तो यह विडंबना को जन्म देता है। एक ओर सख्त संदेश, दूसरी ओर अंदरूनी दरार, यह विरोधाभास केवल प्रशासनिक चुनौती नहीं, नैतिक संकट भी है। 

हर संस्था में व्यक्तिगत चूक संभव है। यह तर्क अक्सर दिया जाता है कि कुछ मामलों के आधार पर पूरे विभाग को कठघरे में नहीं खड़ा किया जा सकता। यह बात सही भी है। हजारों पुलिसकर्मी कठिन परिस्थितियों में, सीमित संसाधनों के बीच, जोखिम उठाकर अपनी ड्यूटी निभाते हैं लेकिन जब समय-समय पर विभाग के भीतर से अनियमितताओं के आरोप सामने आते हैं, चाहे वह नशे का मामला हो, कथित आर्थिक अनियमितता हो, महिलाओं के यौन शोषण का हो या गोपनीय जानकारी लीक करने का आरोप। ऐसे में पुलिस अधिकारियों ने अपराध के खिलाफ “जीरो टॉलरेंस” की नीति दोहराई है। यह नीति तब सार्थक होती है जब वह बाहरी अपराधियों के साथ-साथ विभाग के भीतर भी समान कठोरता से लागू हो। 

पुलिस और नागरिक के बीच संबंध भय पर नहीं, विश्वास पर टिके होते हैं। जब नागरिक शिकायत लेकर थाने जाता है, तो वह राज्य की निष्पक्षता पर भरोसा करता है। यदि उसी राज्य के प्रतिनिधि (पुलिस) पर गंभीर आरोप लगे हों, तो यह भरोसा डगमगाता है। विश्वास का क्षरण अचानक नहीं होता; वह घटनाओं की पुनरावृत्ति से बनता है। इसलिए प्रत्येक ऐसी घटना केवल एक केस फाइल नहीं, बल्कि सार्वजनिक धारणा का हिस्सा बन जाती है। ऐसा पहली बार नहीं है जब छत्तीसगढ़ पुलिस की छवि पर सवाल उठे हों। अक्टूबर 2025 में रायपुर क्राइम ब्रांच के छह पुलिसकर्मियों पर दुर्ग के एक कारोबारी की कार से कथित तौर पर 2 लाख रुपये चोरी करने के आरोप लगे थे। जांच के बाद एक आरक्षक को निलंबित किया गया था। इसी तरह, हाल ही में चर्चित महिला डीएसपी कल्पना वर्मा को गोपनीय जानकारी लीक करने के आरोप में निलंबित किया गया। उनके खिलाफ यह भी आरोप सामने आए कि रायपुर में पदस्थ रहते हुए उन्होंने एक कारोबारी के साथ कथित धोखाधड़ी की और उससे अवैध ढंग से दो करोड़ रूपये हासिल कर लिये। 

देशभर में चर्चित महादेव सट्टा ऐप मामले में कई नाम उछले। सैकड़ों करोड़ के इस कथित ऑनलाइन सट्टा कारोबार में राजनीतिक, कारोबारी और प्रशासनिक कड़ियों की चर्चा होती रही। इसी कड़ी में पुलिस आरक्षक सहदेव यादव का नाम महादेव सट्टा का पैनल चलाने वाले के रूप में सामने आया, सहदेव ने अकेले वर्दी को नहीं बेचा था बल्कि उसके दो अन्य भाइयों पर भी वर्दी की नीलामी के आरोप लगे। भाई जेल में हैं, सहदेव को सेवा से बर्खास्त कर जेल भेज दिया गया। यहां ये बताना भी लाज़िमी होगा कि बिलासपुर शहर के तत्कालीन एएसपी राजेंद्र जायसवाल पर हाल ही में एक स्पा सेंटर के संचालक ने मासिक वसूली के गंभीर आरोप लगाये थे। शिकायत के बाद राज्य के गृह विभाग ने उन्हें तत्काल निलंबित कर दिया। इन घटनाओं ने पुलिस व्यवस्था के भीतर जवाबदेही और निगरानी तंत्र को लेकर बहस तेज कर दी है।  

पुलिस व्यवस्था में पदानुक्रम कठोर है, कार्य-घंटे लंबे हैं, संसाधन सीमित हैं और राजनीतिक दबावों की चर्चा आम है। इन परिस्थितियों में यदि आंतरिक निगरानी ढीली हो, संपत्ति और आचरण की पारदर्शी समीक्षा औपचारिकता बन जाए, और शिकायत निवारण तंत्र स्वतंत्र न हो, तो संस्थागत दरारें गहरी होती जाती हैं। दरारों में ही भ्रष्टाचार का पानी भरता है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि उपभोक्तावाद का दबाव केवल नागरिकों पर नहीं, वर्दीधारियों पर भी है। महंगे फोन, गाड़ियाँ, प्रभावी जीवनशैली। ये आकांक्षाएँ सामाजिक परिवेश का हिस्सा हैं। पर समस्या तब शुरू होती है जब आकांक्षा और आय के बीच की खाई को पद के प्रभाव से पाटने की कोशिश की जाती है। वर्दी तब साधन बन जाती है सेवा का नहीं, सौदे का। 

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