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कैमरे की कलम: सख्त कानून, कमजोर भरोसा


छत्तीसगढ़ विधानसभा में हाल ही में पारित दो विधेयक, धर्मांतरण को लेकर कड़े प्रावधान और परीक्षा में पेपर लीक के खिलाफ सख्त सजा एक व्यापक प्रवृत्ति की ओर इशारा करते हैं। देश के कई राज्यों में सरकारें अब अपराधों के जवाब में कानूनों को और कठोर बनाने का रास्ता चुन रही हैं। इन कानूनों में उम्रकैद, भारी जुर्माने और संपत्ति जब्ती जैसे प्रावधान शामिल हैं। ऐसी सज़ाएं जो आमतौर पर गंभीर हिंसक अपराधों के लिए आरक्षित मानी जाती रही हैं। पहली नज़र में यह सख्ती शासन की दृढ़ता और अपराध के प्रति ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ की नीति का संकेत देती है लेकिन सवाल यह है कि क्या कानूनों की कठोरता वास्तव में समस्या का समाधान है, या यह शासन की उस अधीरता का प्रतीक है जो जटिल सामाजिक और प्रशासनिक चुनौतियों का आसान और त्वरित समाधान तलाश रही है? 

भारत में पहले से ही धर्मांतरण के मामलों में बल, प्रलोभन या धोखे के जरिए किए गए प्रयास दंडनीय हैं। इसी तरह पेपर लीक भी पहले से अपराध की श्रेणी में है। ऐसे में नए कानूनों का औचित्य तब ही मजबूत माना जा सकता है जब यह स्पष्ट किया जाए कि मौजूदा कानूनों में किस स्तर पर विफलता रही। क्या समस्या कानूनों की कमी थी, या उनके क्रियान्वयन की? अक्सर यह देखा गया है कि जांच एजेंसियों की कमजोर तैयारी, सबूतों के अभाव, गवाहों के मुकर जाने और न्यायिक प्रक्रिया की धीमी गति के कारण आरोपी छूट जाते हैं। ऐसे में सज़ा की अवधि बढ़ा देना क्या इस संरचनात्मक कमजोरी को दूर कर सकता है?

हाल के वर्षों में कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां कड़े कानूनों के बावजूद अदालतों ने लंबी अवधि के बाद आरोपियों को बरी कर दिया, क्योंकि पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए जा सके। यह स्थिति यह सवाल खड़ा करती है कि क्या समस्या कानून की ‘कठोरता’ में है या ‘प्रभावशीलता’ में? कानूनों को कठोर बनाना अक्सर सरकारों के लिए एक सशक्त राजनीतिक संदेश देने का माध्यम भी बन जाता है। यह संदेश कि वे किसी मुद्दे पर गंभीर हैं लेकिन यह गंभीरता अगर केवल कागज़ों पर सख्ती तक सीमित रह जाए, तो यह न्याय के बजाय प्रतीकात्मकता का रूप ले लेती है।

इन विधेयकों को पारित करने की प्रक्रिया भी कम चिंताजनक नहीं है। संसद और विधानसभाओं में बहस की गुंजाइश लगातार सिमटती जा रही है। कई बार विधेयक बिना पर्याप्त चर्चा के पारित हो जाते हैं, और विपक्ष अपनी असहमति दर्ज कराने के लिए सदन से बहिर्गमन का रास्ता चुनता है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या लोकतंत्र केवल बहुमत के बल पर कानून बनाने तक सीमित हो गया है, या उसमें संवाद और जवाबदेही की भी कोई भूमिका बची है? सरकारों के लिए यह आवश्यक होना चाहिए कि वे नए कानूनों की आवश्यकता और उनके प्रभाव को सरल भाषा में जनता के सामने रखें। केवल वेबसाइट पर राय मांग लेना पर्याप्त नहीं है, क्योंकि जटिल विधायी भाषा आम नागरिक की पहुंच से बाहर होती है।

लोकतंत्र में मीडिया को सत्ता और जनता के बीच एक सेतु माना जाता है। लेकिन अगर मीडिया केवल आधिकारिक बयानों को प्रसारित करने तक सीमित रह जाए और आवश्यक प्रश्न न उठाए, तो यह भूमिका अधूरी रह जाती है। कठोर कानूनों के इस दौर में यह और भी जरूरी हो जाता है कि मीडिया यह पूछे क्या नए कानून वास्तव में आवश्यक थे? क्या पुराने कानूनों का पूरा इस्तेमाल किया गया? और क्या इन कानूनों से न्याय व्यवस्था मजबूत होगी या केवल भय का माहौल बनेगा? किसी भी कानून का प्रभाव केवल अपराधियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसका असर व्यापक सामाजिक वातावरण पर पड़ता है। जब कानून अत्यधिक कठोर हो जाते हैं, तो वे केवल अपराध को नियंत्रित करने का माध्यम नहीं रहते, बल्कि समाज में भय और नियंत्रण का एक ढांचा भी निर्मित करते हैं। यह खतरा तब और बढ़ जाता है जब कानूनों का इस्तेमाल चयनात्मक रूप से होने लगे। ऐसे में कानून न्याय का उपकरण कम और सत्ता के नियंत्रण का माध्यम अधिक प्रतीत होने लगता है।

छत्तीसगढ़ के ये नए कानून केवल एक राज्य की कहानी नहीं हैं, बल्कि उस व्यापक सोच का हिस्सा हैं जिसमें समस्याओं का समाधान ‘अधिक सख्ती’ में खोजा जा रहा है। लेकिन इतिहास और अनुभव यह बताते हैं कि कानून की कठोरता से अधिक महत्वपूर्ण उसका निष्पक्ष और प्रभावी क्रियान्वयन होता है। जब तक जांच प्रणाली मजबूत नहीं होगी, अदालतों में मामलों का समयबद्ध निपटारा नहीं होगा, और प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक नए और अधिक कठोर कानून भी वही परिणाम देंगे जो पुराने कानून देते आए हैं। आखिरकार, लोकतंत्र की असली परीक्षा कानूनों की संख्या या उनकी सख्ती में नहीं, बल्कि इस बात में है कि वे नागरिकों के जीवन में न्याय, विश्वास और समानता कितनी प्रभावी ढंग से स्थापित कर पाते हैं। 

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