बिलासपुर के राजकिशोर नगर में सराफा व्यापारी संतोष तिवारी पर हमले और करोड़ों की लूट की घटना केवल एक आपराधिक वारदात नहीं है; यह राज्य की कानून-व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न भी खड़ा करती है। जिस दुस्साहस के साथ नकाबपोश बदमाशों ने रिहायशी और व्यस्त इलाके में व्यापारी की कार को घेरकर जानलेवा हमला किया, हथियार लहराए और करोड़ों का माल लेकर फरार हो गए, वह आम नागरिक की सुरक्षा भावना को झकझोरने वाला है।
यह घटना कई स्तरों पर चिंताजनक है। पहला, अपराधियों का आत्मविश्वास। शहर के बीचों बीच, रात के समय, योजनाबद्ध तरीके से वारदात को अंजाम देना इस बात का संकेत देता है कि उन्हें कानून के तत्काल भय का अंदेशा नहीं था। यदि आरोप सही हैं कि रेकी कर रणनीति बनाई गई, तो यह संगठित अपराध की ओर भी इशारा करता है।
दूसरा, खुफिया और निवारक तंत्र की प्रभावशीलता। सवाल यह उठता है कि क्या शहर में अपराध की संभावनाओं को लेकर पर्याप्त सतर्कता थी? क्या संवेदनशील व्यापारिक गतिविधियों से जुड़े लोगों की सुरक्षा के लिए कोई विशेष प्रावधान या निगरानी व्यवस्था थी? यदि अपराधी चोरी के वाहन लेकर आए और उन्हें घटनास्थल पर छोड़कर आगे निकल गए, तो यह जांच एजेंसियों के लिए चुनौती के साथ-साथ व्यवस्था की खामियों का संकेत भी है।
तीसरा, सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा की धारणा। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार हथियार दिखाकर दहशत फैलाना और कथित तौर पर फायरिंग जैसी आवाजें सुनाई देना यह दर्शाता है कि अपराधियों ने भीड़भाड़ वाले इलाके को भी जोखिम नहीं माना। यह स्थिति नागरिकों के मन में भय और अविश्वास पैदा करती है।
हालांकि पुलिस ने नाकेबंदी, विशेष टीम गठन और सीसीटीवी फुटेज की जांच जैसे कदम उठाए हैं, लेकिन यह कार्रवाई घटना के बाद की है। असली प्रश्न यह है कि क्या ऐसी घटनाओं को रोका जा सकता था? कानून-व्यवस्था केवल अपराध के बाद सक्रिय होने का नाम नहीं, बल्कि अपराध की संभावना को न्यूनतम करने की क्षमता भी है।
राजनीतिक स्तर पर आरोप-प्रत्यारोप स्वाभाविक हैं, परंतु इससे आगे बढ़कर यह आवश्यक है कि सरकार और पुलिस तंत्र इस घटना को चेतावनी के रूप में लें। व्यापारिक वर्ग की सुरक्षा, रात में गश्त की सघनता, तकनीकी निगरानी और खुफिया तंत्र की मजबूती, इन सभी पर पुनर्विचार की जरूरत है।
बिलासपुर की यह घटना एक शहर तक सीमित नहीं है। यह राज्य की व्यापक सुरक्षा व्यवस्था पर विमर्श का अवसर भी है। यदि संगठित और योजनाबद्ध अपराधों के प्रति सख्त और त्वरित प्रतिक्रिया नहीं दी गई, तो अपराधियों का मनोबल बढ़ना स्वाभाविक है।
अंततः, कानून-व्यवस्था केवल आंकड़ों का विषय नहीं, बल्कि नागरिकों के विश्वास का प्रश्न है। जब आम नागरिक स्वयं को असुरक्षित महसूस करने लगे, तो यह किसी भी शासन-व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी होती है। अब देखना यह है कि यह घटना सुधार का कारण बनती है या केवल एक और ‘फाइल’ बनकर रह जाती है।
