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बाघ संरक्षण और जनभागीदारी पर केंद्रित रहा अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस कार्यक्रम

मुंगेली।
  TODAY छत्तीसगढ़  /  अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस के अवसर पर बुधवार को शिवतराई बैगा रिसॉर्ट में अचानकमार टाइगर रिजर्व द्वारा जनजागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, कार्यक्रम का उद्देश्य बाघ संरक्षण, वन्यजीवों की सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ाना था।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि उपमुख्यमंत्री अरुण साव और विशिष्ट अतिथि जिला पंचायत अध्यक्ष श्रीकांत पाण्डेय सहित अन्य जनप्रतिनिधि उपस्थित रहे। कार्यक्रम की शुरुआत उपमुख्यमंत्री द्वारा WWF की ओर से अचानकमार टाइगर रिजर्व को उपलब्ध कराए गए स्निफर डॉग रैपिड एक्शन फोर्स पेट्रोलिंग वाहन (बोलेरो कैंपर) को हरी झंडी दिखाकर रवाना करने के साथ हुई।

अचानकमार टाइगर रिजर्व की स्निफर डॉग 'नीतू' वर्ष 2025 में राष्ट्रीय डॉग प्रशिक्षण केंद्र, पंचकूला (हरियाणा) से प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद वन एवं वन्यजीव संरक्षण कार्य में तैनात है। विभाग का दावा है कि नीतू ने अब तक छत्तीसगढ़ के पांच वनमंडलों में छह गंभीर वन्यजीव अपराधों के खुलासे में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

कार्यक्रम में अचानकमार टाइगर रिजर्व के उप संचालक अभिनव कुमार ने बाघ संरक्षण के लिए किए जा रहे प्रयासों की जानकारी दी। कलेक्टर कुंदन कुमार ने बाघों को वन पारिस्थितिकी तंत्र का प्रमुख संरक्षक बताते हुए जिला प्रशासन की ओर से संरक्षण कार्यों में सहयोग का भरोसा दिलाया। वहीं, मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) एवं क्षेत्रीय निदेशक प्रियंका पाण्डेय ने बाघों की गणना, सुरक्षा तकनीकों और संरक्षण अभियानों की जानकारी साझा करते हुए स्थानीय वनग्रामों के लोगों से संरक्षण में सक्रिय भागीदारी की अपील की।

अपने संबोधन में उपमुख्यमंत्री अरुण साव ने कहा कि बाघ केवल एक वन्यजीव नहीं, बल्कि स्वस्थ जंगलों और पर्यावरण संतुलन के प्रतीक हैं। उन्होंने कहा कि बाघों का संरक्षण जल स्रोतों, जैव विविधता और पर्यावरण सुरक्षा से सीधे जुड़ा हुआ है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'एक पेड़ मां के नाम' अभियान का उल्लेख करते हुए अधिक से अधिक वृक्षारोपण और पौधों के संरक्षण का भी संदेश दिया। साथ ही अचानकमार टाइगर रिजर्व में बाघ संरक्षण, पर्यटन विकास और स्थानीय लोगों के रोजगार सृजन के प्रयासों की सराहना की। 

कार्यक्रम के दौरान बाघिन 'झुमरी' की बांधवगढ़ से अचानकमार तक की यात्रा और उसके प्रजनन पर आधारित एक लघु फिल्म भी प्रदर्शित की गई, जिसमें वन्यजीव कॉरिडोर और बाघ संरक्षण के महत्व को दर्शाया गया।

आधिकारिक जानकारी के अनुसार, कार्यक्रम में WWF के वरिष्ठ परियोजना अधिकारी उपेन्द्र दूबे, गोंड एवं गोदना कला के लिए रागिनी ध्रुव और तान्या मरावी सहित विभिन्न क्षेत्रों में योगदान देने वाले लोगों को सम्मानित किया गया। इसके अलावा अचानकमार टाइगर रिजर्व के 20 उत्कृष्ट वनकर्मियों को मेडल, प्रशस्ति पत्र और ₹1,000 की प्रोत्साहन राशि प्रदान की गई। वनग्रामों के विद्यार्थियों के लिए आयोजित चित्रकला प्रतियोगिता के विजेताओं को भी पुरस्कार एवं प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया।

कार्यक्रम में जनप्रतिनिधियों, वन विभाग एवं जिला प्रशासन के अधिकारियों, पूर्व आईएफएस अधिकारी, स्कूली छात्र-छात्राओं, ग्रामीणों और पर्यावरण प्रेमियों ने भाग लिया।



मैं हूँ बीजापुर टाइगर... बताइए, मैं भाग्यशाली हूँ या दुर्भाग्यशाली?

"क्या मैं भाग्यशाली हूँ कि आज भी जिंदा हूँ? या दुर्भाग्यशाली हूँ कि स्वस्थ होने के बावजूद आज़ादी से वंचित हूँ? यह फैसला मैं आप पर छोड़ता हूँ।"
मैं अभी युवा बाघ हूं। मार्च 2025 की बात है, तारीख मुझे याद नहीं। तब मैं छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बस्तर के बीजापुर के घने जंगलों में मजे से रहता था। एक दिन शिकारियों द्वारा बिछाये गए लोहे के तार के फंदे में मेरे पीछे के दोनों पाँव फंस गए, जख्म हो गया। दिन पर दिन घाव गहरा होता गया, मवाद और कीड़े पड़ने लगे, दर्द इतना कि मैं बता नहीं सकता। कुछ दिन बाद शिकारियों में से एक मेरी तरफ भाला लेकर आते दिखा। अपने को बचाने के लिए मैं उस पर झपटा और वह वहीं ढेर हो गया। ग्रामीणों ने वन विभाग के अधिकारियों को बताया कि जंगल में एक बाघ घायल पड़ा है। कुछ अधिकारियों ने आरोपों से बचने के लिए कह दिया कि मेरे पैर पत्थरों के बीच फंस गए होंगे। 

मैं अभी युवा बाघ हूँ। मार्च 2025 की बात है। तब मैं छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बस्तर संभाग के बीजापुर के घने जंगलों में आज़ाद घूमता था। जंगल ही मेरा घर था और वही मेरी दुनिया। फिर एक दिन सब कुछ बदल गया ...

खैर, ताबड़तोड़ मुझे रेस्क्यू कर 16 अप्रैल को रायपुर के जंगल सफारी जू में लाया गया। इलाज शुरू हुआ, 30 जुलाई को मेरी सर्जरी भी हुई। मुझे बिल्कुल अलग रखा गया, सिर्फ केयर टेकर आता है ताकि मानव से मेरा सीधा संपर्क न हो सके। धीरे-धीरे मैं ठीक होने लगा, जीने की आस जागने लगी।

नवंबर तक मैं लगभग पूरी तरह ठीक हो गया। चार डॉक्टर आये, उन्होंने काफी देर तक मेरी जांच की और रिपोर्ट बनाई। मैंने केयर टेकर से रिपोर्ट लेकर पढ़ी। मैं खुशी से उछल पड़ा। रिपोर्ट में लिखा था कि मैं स्वस्थ हूं, जागरूक रहता हूं, सर्जरी का चीरा पूरी तरह भर गया है, बाल भी आ गए हैं। ऑपरेशन किए गए पैर पर शरीर का पूरा भार डाल सकता हूं, चल सकता हूं, घायल पंजा भी सामान्य हो गया है। चलने, दौड़ने या बैठकर उठते समय डॉक्टरों को दर्द के कोई लक्षण नहीं दिखे। केवल कभी-कभी हल्की लंगड़ाहट दिखाई दी, जो उनके अनुसार समय के साथ ठीक हो जाएगी, या बनी भी रह सकती है परंतु दौड़ने में कोई लंगड़ाहट नहीं थी। डॉक्टर आपस में चर्चा कर रहे थे कि पहले मुझे एक बड़े बाड़े में रखा जाएगा, वहां मेरी शिकार करने और प्राकृतिक जीवन जीने की क्षमता जांची जाएगी और उसके बाद मुझे जंगल में छोड़ दिया जाएगा। वे किसी सॉफ्ट रिलीज की बात कर रहे थे। 

ग्रामीणों ने वन विभाग को सूचना दी कि जंगल में एक घायल बाघ पड़ा है। बाद में कुछ अधिकारियों ने यह कहकर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया कि शायद मेरे पैर पत्थरों के बीच फँस गए होंगे।

मैं आपको नहीं बता सकता उस दिन मैं कितना खुश था। लगा कि अब फिर वही जिंदगी मिलेगी, मजे से जियूंगा। केयर टेकर ने बताया कि बड़े साहब के आदेश के बाद ही मुझे छोड़ा जाएगा। कोई भी कदमों की आहट होती तो मुझे लगता आदेश आ गया होगा, लेकिन मेरा इंतजार जारी रहा। एक दिन मैंने केयर टेकर से पूछा कि आदेश आ क्यों नहीं रहा? उसने कहा कि विभाग अभी इको-टूरिज्म, विकास और लोगों को रोजगार देने में लगा है, आदेश निकालने का समय नहीं है।

खाली बैठे-बैठे मैंने वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम भी पढ़ लिया। उसमें तो कहीं भी इको-टूरिज्म, विकास और रोजगार जैसे शब्द नहीं लिखे दिखे। दो महीने बीत गए। मैंने फिर पूछा तो केयर टेकर ने बताया कि मेरी हेल्थ रिपोर्ट में तो सब कुछ ठीक लिखा था, लेकिन डॉक्टरों ने न जाने क्यों रिपोर्ट में सॉफ्ट रिलीज़ की कोई चर्चा नहीं की।

इस बीच वन्यजीव प्रेमियों ने मेरे बारे में पूछा तो मेरे पूरी तरह स्वस्थ घोषित होने के दो महीने बाद बड़े साहब को याद आया कि यहां एक टाइगर भी पड़ा हुआ है। फरवरी में देहरादून के एक संस्थान, जिसका नाम कुछ डब्ल्यू.आई.आई. जैसा है, को पत्र लिखा गया कि डॉक्टरों ने सुझाव दिया है कि मुझे जंगल में छोड़ने से पहले यह परख लिया जाए कि मैं फिर से जंगल के जीवन में ढल पाऊँगा या नहीं, इसलिए विशेषज्ञ भेजे जाएँ। मैंने अपनी हेल्थ रिपोर्ट कई बार पढ़ी, लेकिन उसमें तो डॉक्टरों ने ऐसा कोई सुझाव नहीं दिया था। साहब लोगों ने डॉक्टरों का नाम लेकर यह बात कहाँ से जोड़ दी, मुझे आज तक समझ में नहीं आया। शायद उन्हें अपने ही डॉक्टरों पर भरोसा नहीं रहा होगा। वन्यजीव प्रेमियों ने भी मुझे छोड़ने के लिए चिट्ठी लिखी, लेकिन डब्ल्यू.आई.आई. को न कोई रिमाइंडर भेजा गया और न विशेषज्ञ आए। महीने पर महीने बीतते गए। मैं निराश हो गया। अब तो कदमों की आहट पर आदेश का इंतजार भी खत्म हो चुका था। 

अंतर्राष्टीय बाघ दिवस (29 जुलाई) की पूर्व संध्या पर यह लेख सुप्रसिद्ध वन्यजीव और पर्यावरण प्रेमी नितिन सिंघवी द्वारा लिखा गया है। इस लेख में वर्णित घटनाएँ वास्तविक हैं तथा तथ्य उपलब्ध अभिलेखों पर आधारित हैं। 

वन्यजीव प्रेमी ने अधिकारियों से कहा कि मुझे कम से कम सॉफ्ट रिलीज वाले बाड़े में ही छोड़ दें। एक अधिकारी ने बताया कि ऐसा बाड़ा केवल अचानकमार टाइगर रिजर्व में है और वहां मुझे नहीं रखा जा सकता क्योंकि वहां पहले से बहुत बाघ हैं। कहीं और नया बाड़ा बनाने की तैयारी भी शुरू नहीं हुई है।

फरवरी से जून आ गया। नए साहब आ गए। वन्यजीव प्रेमियों ने मेरी रिहाई की मांग की। परन्तु फाइल में विशेषज्ञों की राय लेने की बात लिखी थी। नए साहब ने 24 जून को फिर डब्ल्यू.आई.आई. को पत्र लिखा। विशेषज्ञ तो नहीं आए, लेकिन अगले ही दिन चार विशेषज्ञों की समिति बनाने की सलाह आ गई। मालूम नहीं जिसने तीन महीने तक जवाब नहीं दिया, उस डब्ल्यू.आई.आई. ने दूसरे ही दिन समिति बनाने की सलाह कैसे दे दी। जो भी हो, समिति बन गई है और आपको अपना दुखड़ा सुनाने के दिन तक वह मुझे देखने नहीं आई है। केयर टेकर बता रहा था कि मुझे लेकर 2 दिन पहले शायद कोई वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग हुई है और मुझे छोड़े जाने की संभावना नकारात्मक है। 

इस बीच कई बार अखबारों में पढ़ा कि साहब लोग पड़ोसी राज्य से तीन बाघ लाने की तैयारी कर रहे हैं। मेरा दिल टूट गया। खुद के घर के टाइगर को तो छोड़ नहीं रहे और बाहर से तीन लाने की तैयारी कर रहे हैं। बाघ जितने लंबे समय तक मानव संपर्क और कैद में रहता है, उसके मनुष्यों के प्रति अभ्यस्त होने का जोखिम उतना बढ़ जाता है, जिससे उसे दोबारा जंगल में सफलतापूर्वक प्राकृतिक जीवन अपनाने की संभावना कम हो सकती है। 

आज, मेरे कैद होने के पंद्रह महीने बाद, वहीं पिछले कुछ महीनों में चार-पाँच बाघों का शिकार हो चुका है। केयर टेकर बताता है कि शायद अब वहाँ केवल एक बाघ बचा है। अगर मैं वहीं होता... तो शायद मेरा भी शिकार हो चुका होता।

मेरा गणित थोड़ा कमजोर है। जब मैं बीजापुर-नारायणपुर के जंगलों में घूमता था, तब वहां   10-12 बाघ थे। जो भी हो, मेरा शिकार करने का प्रयास किए पंद्रह महीने हो गए। मुझे स्वस्थ घोषित किए सात महीने हो गए। मैं जिंदा हूं, भले ही कैद में हूं, पर उसी बीजापुर और आसपास के इलाके में पिछले कुछ महीनों में चार से पांच बाघों का शिकार हो चुका है। केयर टेकर बता रहा था वहां सिर्फ एक बचा है। अगर मैं वहीं रहता रहा होता, तो हो सकता है मेरा भी शिकार हो जाता, मैं मर गया होता। ऐसे में आप बताइए, मैं यहां कैद में भाग्यशाली हूं या दुर्भाग्यशाली?

-सही-

बीजापुर टाइगर, 28 जुलाई 2026 

छत्तीसगढ़ की पहली राजकीय तितली के चयन के लिए ऑनलाइन वोटिंग शुरू

रायपुर।  TODAY छत्तीसगढ़  / छत्तीसगढ़ के वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग ने राज्य की पहली राजकीय तितली घोषित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। राज्य सरकार के अनुसार, इस पहल का उद्देश्य प्रदेश की समृद्ध जैव विविधता और तितलियों के संरक्षण को बढ़ावा देना है। इसके लिए आम नागरिकों से 31 अगस्त 2026 तक ऑनलाइन मतदान के माध्यम से राय मांगी गई है।

आधिकारिक जानकारी के अनुसार, वन मंत्री केदार कश्यप ने प्रदेशवासियों से इस अभियान में अधिक से अधिक संख्या में भाग लेने की अपील की है। उन्होंने कहा कि जैव विविधता संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का दायित्व है। उनका कहना है कि जनभागीदारी से राजकीय तितली का चयन होने पर लोगों में प्रकृति और वन्यजीव संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ेगी।

प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, विशेषज्ञ समिति ने वैज्ञानिक और पारिस्थितिक मानकों के आधार पर तीन तितली प्रजातियों को अंतिम सूची में शामिल किया है। इनमें कॉमन बैंडेड पीकॉक (Common Banded Peacock), ऑरेंज ओकलीफ (Orange Oakleaf) और स्पॉट स्वोर्डटेल (Spot Swordtail) शामिल हैं। इनका चयन पारिस्थितिक महत्व, राज्य में उपलब्धता, संरक्षण मूल्य, विशिष्टता, पहचान की सरलता और जनसामान्य में आकर्षण जैसे मानकों के आधार पर किया गया है।

सरकार के अनुसार, प्रदेश का प्रत्येक नागरिक गूगल फॉर्म के माध्यम से अपनी पसंद की तितली के पक्ष में मतदान कर सकता है। प्राप्त जनमत और विशेषज्ञ समिति की अनुशंसाओं के आधार पर अंतिम प्रस्ताव तैयार कर नियमानुसार आगे की प्रक्रिया पूरी की जाएगी।

मतदान के लिए विभाग ने अपनी वेबसाइट और गूगल फॉर्म उपलब्ध कराया है। इच्छुक नागरिक वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग की वेबसाइट  https://forest.cg.gov.in/  या ऑनलाइन मतदान Google Form : (https://forms.gle/7Mqa1kBLx4dnFA6b7)  के माध्यम से 31 अगस्त 2026 तक मतदान कर सकते हैं। 


रामसर क्षेत्र की गतिविधियों का सर्वे पूरा, राज्य सरकार को भेजी गई रिपोर्ट

बिलासपुर: TODAY छत्तीसगढ़  / छत्तीसगढ़ के इकलौते 'रामसर स्थल' (Ramsar Site) कोपरा जलाशय के आसपास चल रही औद्योगिक गतिविधियों को लेकर एक अहम जानकारी सामने आई है। वन विभाग ने इस क्षेत्र को लेकर अपनी पहली आधिकारिक प्रारंभिक सर्वे रिपोर्ट तैयार कर ली है। इस रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि अंतरराष्ट्रीय महत्व के इस पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र के बेहद करीब कोल वाशरी और कई कोल डिपो संचालित किए जा रहे हैं।

वन विभाग ने यह प्राथमिक रिपोर्ट 'ज़िला वेटलैंड समिति' के माध्यम से राज्य सरकार को सौंप दी है। अब इसके आधार पर जलाशय के संरक्षण की आगे की दिशा तय की जाएगी।

वन विभाग की रिपोर्ट के मुख्य बिंदु

वन विभाग द्वारा कोपरा जलाशय के कैचमेंट क्षेत्र (जल ग्रहण क्षेत्र) और उसके आसपास की गतिविधियों का जो प्रारंभिक सर्वे कराया गया है, उसके तथ्य चिंताजनक हैं:

  • 5 किलोमीटर के दायरे में उद्योग: रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि रामसर साइट के महज़ 5 किलोमीटर के संवेदनशील दायरे में 2 कोल वाशरी और 9 कोल डिपो का संचालन किया जा रहा है।

  • प्रभावित इलाके: ये औद्योगिक गतिविधियां मुख्य रूप से कोपरा, बेलमुंडी, सैदा और संबलपुरी-बहतराई क्षेत्र में चल रही हैं।

क्यों मंडरा रहा है रामसर साइट पर ख़तरा?

पर्यावरण के लिहाज़ से सबसे बड़ी चिंता का कारण इन इलाकों की भौगोलिक स्थिति है। वन विभाग ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि जिन स्थानों (कोपरा, बेलमुंडी, सैदा आदि) पर कोल वाशरी और डिपो संचालित हैं, वे जलाशय की तुलना में अपेक्षाकृत ऊंचाई पर स्थित हैं।

बारिश के मौसम में इन ऊंचाई वाले इलाकों का पानी सीधे बहकर कोपरा जलाशय के कैचमेंट तक पहुंचता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस बारिश के पानी के साथ कोयले की धूल और अन्य खतरनाक औद्योगिक प्रदूषक भी जलाशय में मिल सकते हैं, जिससे पानी की गुणवत्ता और वहां का पूरा पारिस्थितिकी तंत्र बुरी तरह प्रभावित हो सकता है।

अब आगे क्या होगा? (मास्टर प्लान की तैयारी)

वन विभाग की इस प्राथमिक रिपोर्ट के राज्य सरकार तक पहुंचने के बाद अब संरक्षण के कड़े कदम उठाए जाने की तैयारी है:

  • संयुक्त टीम करेगी विस्तृत सर्वे: अब राज्य सरकार और केंद्र सरकार की एक संयुक्त विशेष टीम इस पूरे क्षेत्र का एक विस्तृत और गहन सर्वे करेगी।

  • बनेगा मास्टर प्लान: इस विस्तृत अध्ययन के आधार पर ही कोपरा रामसर साइट के संरक्षण के लिए एक 'मास्टर प्लान' तैयार किया जाएगा।

  • किन चीज़ों पर होगा फोकस: तैयार होने वाले मास्टर प्लान में मुख्य रूप से जलाशय के जल की गुणवत्ता, कैचमेंट क्षेत्र के प्रबंधन और आसपास चल रही औद्योगिक गतिविधियों के दीर्घकालिक प्रभावों का आकलन किया जाएगा। इसी के आधार पर भविष्य में उद्योगों को हटाने या उनके प्रबंधन को लेकर बड़े निर्णय लिए जाएंगे।

कोपरा रामसर साइट: एक नज़र में

  • क्षेत्रफल: यह जलाशय लगभग 210 हेक्टेयर (2.10 वर्ग किलोमीटर) के विशाल क्षेत्र में फैला हुआ है।

  • रामसर का दर्ज़ा: इसे हाल ही में 12 दिसंबर 2025 को वैश्विक स्तर पर 'रामसर स्थल' का प्रतिष्ठित दर्ज़ा प्राप्त हुआ है, जिसके बाद से इसके संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय नियम लागू हो गए हैं।

अब सभी की निगाहें राज्य और केंद्र की संयुक्त टीम की विस्तृत रिपोर्ट और उसके बाद बनने वाले मास्टर प्लान पर टिकी हैं, जिससे यह तय होगा कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच इस अहम मामले में सरकार क्या कदम उठाती है। 

जलाशय के आसपास भी सक्रिय हैं कई कोल डिपो और वाशरी

वन विभाग की रिपोर्ट के अनुसार रामसर जलाशय तक जाने वाली सड़क के दोनों ओर कई कोल डिपो संचालित हो रहे हैं। इनमें तीन डिपो जलाशय की सीमा से सटे हुए हैं, जिनमें एक सड़क के दाईं ओर और दो बाईं ओर स्थित हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक सड़क की बाईं ओर करीब 500 मीटर की दूरी पर एक बड़ी कोल वाशरी संचालित है, जहां बड़े पैमाने पर कोयले की लोडिंग-अनलोडिंग की जाती है। इसी क्षेत्र में तीन अन्य बड़े कोल डिपो भी मौजूद हैं। इसके अलावा फोरलेन सड़क की दूसरी ओर भी एक कोल डिपो रामसर जलाशय के कैचमेंट क्षेत्र से महज 100 से 200 मीटर की दूरी पर स्थित है।

विशेषज्ञों का मानना है कि जलाशय और उसके कैचमेंट क्षेत्र के इतने निकट कोयला भंडारण, परिवहन और वाशरी गतिविधियों से उड़ने वाली कोयले की धूल तथा अपशिष्ट का असर जल गुणवत्ता और पर्यावरण पर पड़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

दिल्ली और राज्य की संयुक्त टीम तैयार करेगी रामसर का मास्टर प्लान

रामसर वेटलैंड घोषित होने के बाद इसके संरक्षण और वैज्ञानिक प्रबंधन के लिए विस्तृत मास्टर प्लान तैयार किया जाएगा। वन विभाग के अनुसार यह योजना राज्य जैव विविधता बोर्ड और दिल्ली के विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में बनाई जाएगी। इसके लिए दिल्ली और राज्य की संयुक्त टीम स्थल का विस्तृत सर्वे करेगी। सर्वे में पक्षियों की प्रजातियां, उनके प्राकृतिक आवास, प्रवास मार्ग, कैचमेंट क्षेत्र और संरक्षण के लिए आवश्यक उपायों का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाएगा।

स्थानीय और प्रवासी पक्षियों का महत्वपूर्ण बसेरा

रामसर वेटलैंड स्थानीय और प्रवासी पक्षियों का प्रमुख आश्रय स्थल है। यहां मार्श हैरियर, यूरेशियन कूट, जलमुर्गी, गर्गनी, नॉर्दर्न शोवलर, नॉर्दर्न पिनटेल, ब्लूथ्रोट, भारतीय पिट्टा, भारतीय स्वर्गीय फ्लायकैचर, नदी टिटिहरी और सफेद-दुम शामा सहित अनेक दुर्लभ एवं महत्वपूर्ण पक्षी प्रजातियां दर्ज की गई हैं। हर वर्ष बड़ी संख्या में प्रवासी पक्षियों का यहां आगमन होता है।

कैचमेंट क्षेत्र का प्राथमिक सर्वे पूरा

वन विभाग ने रामसर घोषित होने के बाद इसके कैचमेंट क्षेत्र और पांच किलोमीटर के दायरे में संचालित उद्योगों, कोल डिपो, कोल वाशरी तथा अन्य गतिविधियों का प्राथमिक सर्वे कराया है। सर्वे रिपोर्ट जिला वेटलैंड समिति को भेज दी गई है, जहां से इसे राज्य स्तर पर अग्रेषित किया गया है।

डीएफओ बिलासपुर मंडल नीरज यादव ने बताया कि रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई और संरक्षण संबंधी निर्णय राज्य स्तर पर लिए जाएंगे। उन्होंने कहा कि रामसर वेटलैंड के संरक्षण और प्रबंधन के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाया जाएगा।

क्या सच में हाथी ने बचाई बाघ की जान? फैक्ट-चेक में हुआ बड़ा खुलासा

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो में दावा किया जा रहा है कि इंडोनेशिया के सुमात्रा में बाढ़ में फंसे बाघ की जान एक हाथी ने बचाई। 
नई दिल्ली।  TODAY छत्तीसगढ़  / सोशल मीडिया पर इन दिनों एक भावुक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में दावा किया जा रहा है कि इंडोनेशिया के सुमात्रा में आई बाढ़ के दौरान एक हाथी ने तेज बहाव में फंसे बाघ की जान बचाई। इस दृश्य को देखकर लाखों लोग भावुक हो रहे हैं और इसे इंसानियत तथा जीवों के बीच सहयोग का अनूठा उदाहरण बता रहे हैं। हालांकि, अब इस वीडियो की सच्चाई पर सवाल उठने लगे हैं।

वायरल वीडियो में दिखाई देता है कि एक बाघ बाढ़ के तेज बहाव में संघर्ष कर रहा है। तभी एक हाथी पानी के बीच खड़ा होकर अपनी सूंड उसकी ओर बढ़ाता है। बाघ सूंड का सहारा लेकर छलांग लगाता है और हाथी की पीठ पर चढ़ जाता है। इसके बाद हाथी उसे सुरक्षित स्थान की ओर ले जाता हुआ दिखाई देता है।

वीडियो के वायरल होने के बाद बड़ी संख्या में सोशल मीडिया यूजर्स ने इसकी प्रामाणिकता पर सवाल उठाए। कई लोगों का कहना है कि वीडियो में जानवरों की गतिविधियां और दृश्य अस्वाभाविक लगते हैं। वहीं, कुछ फैक्ट-चेक प्लेटफॉर्म और मीडिया रिपोर्टों में भी दावा किया गया है कि यह वीडियो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से तैयार किया गया है और किसी वास्तविक घटना का वीडियो नहीं है।

विशेषज्ञों का कहना है कि एआई तकनीक के तेजी से विकसित होने के कारण ऐसे वीडियो बेहद वास्तविक दिखाई देते हैं, जिससे आम लोगों के लिए असली और नकली सामग्री में अंतर करना मुश्किल हो जाता है। इसलिए सोशल मीडिया पर वायरल होने वाले ऐसे भावनात्मक या चौंकाने वाले वीडियो को बिना पुष्टि के सच मानने या साझा करने से बचना चाहिए।

नोट: उपलब्ध फैक्ट-चेक रिपोर्टों के अनुसार, इस वायरल वीडियो के वास्तविक घटना होने की पुष्टि नहीं हुई है और इसे एआई जनरेटेड वीडियो बताया गया है।

छत्तीसगढ़ के वाइल्डलाइफ़ फ़ोटोग्राफ़र्स ने रच दिया इतिहास ! मध्य भारत में पहली बार दिखा दुर्लभ 'कैस्पियन प्लोवर'

TODAY छत्तीसगढ़  / छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में पक्षी प्रेमियों (बर्ड वॉचर्स) और वाइल्डलाइफ़ फ़ोटोग्राफ़रों के हाथ एक बड़ी कामयाबी लगी है. प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल 'इंडियन बर्ड्स' (Indian Birds) ने 29 जून 2026 को प्रकाशित अपने ताज़ा अंक में बिलासपुर में देखे गए एक अत्यंत दुर्लभ पक्षी 'कैस्पियन प्लोवर' (Caspian Plover) की खोज को प्रमुखता से स्थान दिया है.

विशेषज्ञों का मानना है कि यह रिसर्च पेपर मध्य भारत में बर्ड फ़ोटोग्राफ़ी और बर्ड वॉचिंग के इतिहास में एक बड़ा मील का पत्थर साबित होगा.

मध्य भारत का पहला आधिकारिक रिकॉर्ड

पक्षी वैज्ञानिकों (Ornithologists) के अनुसार, छत्तीसगढ़ और पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश सहित पूरे मध्य भारत के इतिहास में 'कैस्पियन प्लोवर' का इससे पहले कोई आधिकारिक रिकॉर्ड दर्ज नहीं था.

छत्तीसगढ़ में इस प्रवासी प्रजाति की चिड़िया का पहली बार देखा जाना एक दुर्लभ घटना है. इस ऐतिहासिक खोज ने देश और दुनिया भर के पक्षी विशेषज्ञों का ध्यान छत्तीसगढ़ की समृद्ध जैव विविधता की ओर खींचा है. 

मोहनभाटा के मैदान में कैसे हुई यह खोज?

इस दुर्लभ पक्षी की खोज पिछले साल 4 सितंबर 2025 को हुई थी.

  • बर्ड वॉक: वाइल्डलाइफ़ फ़ोटोग्राफ़र सत्यप्रकाश पांडेय और कंचन पांडेय बिलासपुर के मोहनभाटा इलाके में 'बर्ड वॉक' (Bird Walk) पर निकले थे.

  • भौगोलिक स्थिति: मोहनभाटा एक खुला घास का मैदान है जहाँ मवेशी चरते हैं और मौसमी जलभराव होता है. मानसून के दौरान यहाँ का कीचड़युक्त मैदान और उथला पानी दूर-दराज़ से आने वाले प्रवासी पक्षियों के रुकने के लिए एक बेहद मुफ़ीद (आदर्श) जगह बन जाता है.

  • अलग व्यवहार ने खींचा ध्यान: बर्ड वॉक के दौरान टीम को 'पैसिफिक गोल्डन प्लोवर', 'लिटिल रिंग्ड प्लोवर' और 'केंटिश प्लोवर' जैसे आम पक्षी दिखे. लेकिन तभी तीन लिटिल रिंग्ड प्लोवर के बीच एक बिल्कुल अलग व्यवहार करने वाला पक्षी दिखाई दिया. यह पक्षी शिकार के लिए 'रुकने और खाने' का एक विशेष पैटर्न दिखा रहा था. जब कैमरे से ली गई तस्वीरों की बारीक़ी से जांच की गई, तो इसकी पहचान 'कैस्पियन प्लोवर' के रूप में पुख़्ता हुई.

वैज्ञानिक मान्यता दिलाने में विशेषज्ञ की अहम भूमिका

ज़मीनी स्तर पर की गई फ़ोटोग्राफ़ी की इस अहम खोज को वैश्विक वैज्ञानिक मान्यता दिलाने में छत्तीसगढ़ के जाने-माने पक्षी विशेषज्ञ प्रतीक ठाकुर का विशेष योगदान रहा. उन्होंने इस पूरी खोज का बारीक़ी से वैज्ञानिक अध्ययन किया, एक सटीक रिसर्च पेपर तैयार किया और अंततः इसे 'इंडियन बर्ड्स' जैसे प्रतिष्ठित जर्नल में प्रकाशन के मुकाम तक पहुँचाया.

छोटे शावकों के साथ सूंड से पानी उछालते दिखे हाथी... तालाब का VIDEO वायरल

TODAY छत्तीसगढ़  /  छत्तीसगढ़ के बिलासपुर वन वृत्त के अंतर्गत कटघोरा वन मंडल से हाथियों के कुनबे का एक वीडियो सामने आया है. एतमानगर वन परिक्षेत्र के गुरसिया परिसर स्थित एक कृत्रिम तालाब में 16 हाथियों का एक दल एक साथ पानी में मौजूद दिखा.

यह वीडियो कटघोरा के वन मंडलाधिकारी (DFO) कुमार निशांत द्वारा जारी किया गया है, जो सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है.

शावकों के साथ अठखेलियां करता दिखा दल

वन विभाग से मिली तकनीकी जानकारी के अनुसार, यह दृश्य गुरसिया परिसर के बांस प्लाट कक्ष क्रमांक P-456 में बने तालाब का है.

  • दल की संरचना: इस झुंड में वयस्क हाथियों के साथ-साथ छोटे शावक (बच्चे) भी शामिल हैं.

  • वन्यजीव प्रबंधन: मैदानी अधिकारियों का कहना है कि गर्मियों के मौसम को ध्यान में रखकर जंगल के भीतर तैयार किए गए ये जल स्रोत (वाटर बॉडीज) वन्यजीवों के लिए मददगार साबित हो रहे हैं. पानी की उपलब्धता के कारण वन्यजीवों का आबादी वाले क्षेत्रों की ओर रुख करना भी कम होता है.

ग्रामीणों के लिए अलर्ट और सुरक्षा व्यवस्था

हाथियों की आमद को देखते हुए वन विभाग ने सुरक्षात्मक और एहतियाती कदम उठाए हैं:

  • सतत निगरानी: वन परिक्षेत्र के कर्मचारियों और 'एलीफेंट ट्रैकर' दल द्वारा हाथियों की इस आवाजाही और गतिविधियों पर लगातार नज़र रखी जा रही है.

  • सुरक्षा अपील: वन विभाग ने आस-पास के ग्रामीण अंचलों के लोगों से अपील की है कि वे हाथियों की मौजूदगी वाले जंगलों और रास्तों की ओर अनावश्यक आवाजाही न करें. हाथियों के करीब जाने या उन्हें उकसाने से बचने की सख्त हिदायत दी गई है ताकि किसी भी प्रकार के मानव-हाथी द्वंद्व (Man-Elephant Conflict) या अप्रिय स्थिति से बचा जा सके.

क्षेत्र के वन्यजीव प्रेमियों और पर्यावरणविदों के मुताबिक़, हाथियों के कुनबे की ऐसी तस्वीरें बिलासपुर और कोरबा के वनांचलों में वन्यजीवों के अनुकूल वातावरण और जल प्रबंधन के सकारात्मक संकेत देती हैं. 


"क्या खुद को शासन से ऊपर समझा?" छत्तीसगढ़ के वन बल प्रमुख पर लगे गंभीर आरोप, मुख्य सचिव तक पहुंचा मामला

TODAY छत्तीसगढ़  / छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में नक्सलवाद के प्रभाव में कमी आने के बाद बढ़ते अवैध शिकार और जंगलों में आग लगाने की घटनाओं को रोकने के प्रशासनिक उपायों को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। रायपुर के एक पर्यावरण कार्यकर्ता ने राज्य के मुख्य सचिव को पत्र लिखकर वर्तमान प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) सह वन बल प्रमुख (HoFF) के ख़िलाफ़ अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग की है।

याचिकाकर्ता का आरोप है कि वन विभाग के शीर्ष अधिकारी ने ज़िला रिजर्व गार्ड (DRG) की तैनाती के संबंध में राज्य शासन द्वारा जारी स्पष्ट दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया, जिससे वन संरक्षण के एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव में अनावश्यक विलंब हुआ।

क्या है पूरा मामला?

शिकायतकर्ता नितिन सिंघवी के मुताबिक़, पिछले दिनों दंतेवाड़ा ज़िले के राजा बंगला क्षेत्र के घने जंगलों और पहाड़ियों में बड़े पैमाने पर अवैध शिकार की घटना सामने आई थी। आरोप है कि सैकड़ों की संख्या में शिकारियों ने वन्यजीवों को फंसाने के लिए जंगल में आग लगा दी थी। शिकारियों की बड़ी तादाद के आगे वन विभाग की मैदानी टीम असमर्थ साबित हुई और उन्हें पीछे हटना पड़ा।

सिंघवी का कहना है कि बस्तर क्षेत्र में नक्सली गतिविधियों में कमी आने के बाद अवैध शिकार, वनों में आग लगाने, अवैध कटाई और लकड़ी तस्करी के मामलों में तेज़ी आई है। इसी को देखते हुए उन्होंने मुख्य सचिव को सुझाव दिया था कि दंतेवाड़ा में उपलब्ध लगभग 1000 डीआरजी (DRG) जवानों को वन विभाग के साथ संयुक्त ऑपरेशन में लगाया जाए, ताकि वन अपराधों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया जा सके।


राज्य शासन के निर्देश और पीसीसीएफ का क़दम

राज्य शासन ने इस सुझाव को गंभीरता से लेते हुए 7 मई 2026 को एक आदेश जारी किया था। इसके तहत:

  • संयुक्त प्रस्ताव की मांग: प्रधान मुख्य वन संरक्षक सह वन बल प्रमुख और तत्कालीन प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) को निर्देश दिया गया था कि वे इस प्रस्ताव का परीक्षण कर एक संयुक्त हस्ताक्षरयुक्त प्रस्ताव शासन को भेजें।

  • उद्देश्य: इस प्रस्ताव के आधार पर शासन स्वयं गृह विभाग से समन्वय स्थापित कर डीआरजी जवानों को वन विभाग के साथ संयुक्त ऑपरेशन में तैनात करने पर अंतिम फ़ैसला ले सके।

नितिन सिंघवी का आरोप है कि तत्कालीन प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी)—जो अब वर्तमान में पीसीसीएफ सह वन बल प्रमुख हैं—ने शासन को सीधे प्रस्ताव भेजने के बजाय 9 जून 2026 को पुलिस महानिदेशक (DGP) को पत्र लिखकर इस संबंध में उनका अभिमत (ओपिनियन) मांग लिया। 

कार्रवाई की मांग के पीछे का तर्क

मुख्य सचिव को भेजे गए पत्र में सिंघवी ने दलील दी है कि राज्य शासन ने अपने आदेश में कहीं भी वन विभाग को पुलिस महानिदेशक से सीधे राय लेने का निर्देश नहीं दिया था। यदि डीजीपी का अभिमत आवश्यक होता, तो शासन स्वयं गृह विभाग के माध्यम से इसे प्राप्त कर सकता था।

आरोप है कि शासन के निर्देशों से परे जाकर पुलिस विभाग से अभिमत मांगने के कारण न केवल आदेश का उल्लंघन हुआ, बल्कि बस्तर के संवेदनशील जंगलों की सुरक्षा से जुड़े इस महत्वपूर्ण मामले में एक महीने से अधिक का विलंब हो गया। सिंघवी का दावा है कि शासन के निर्देश स्पष्ट होने के बावजूद आज तक वह संयुक्त प्रस्ताव प्रस्तुत नहीं किया गया है।

इन्हीं आधारों पर उन्होंने मुख्य सचिव से वर्तमान पीसीसीएफ सह वन बल प्रमुख के ख़िलाफ़ विभागीय नियमों की अनदेखी और वन संरक्षण के प्रति संवेदनहीनता बरतने के आरोप में अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का अनुरोध किया है। फिलहाल इस मामले में वन विभाग या संबंधित अधिकारी की ओर से कोई आधिकारिक पक्ष सामने नहीं आया है। 

शिकार और पानी की तलाश हुई पूरी ! उदंती-सीतानदी में बाघिन की दस्तक

TODAY छत्तीसगढ़  / छत्तीसगढ़ के उदंती-सीतानदी टाइगर रिज़र्व में पिछले कुछ दिनों से एक बाघिन की नियमित मौजूदगी दर्ज की गई है. वन विभाग की ओर से विभिन्न इलाक़ों में लगाए गए कैमरा ट्रैप के वीडियो और तस्वीरों में इस बाघिन को देखा गया है.

वन अधिकारियों के मुताबिक़, यह बाघिन प्राकृतिक रूप से विचरण करते हुए इस वन क्षेत्र तक पहुंची है और अब इसे अपना स्थायी ठिकाना (आशियाना) बनाने की प्रक्रिया में है.

वन्यजीव विशेषज्ञों की राय और आवास सुधार

लंबे समय से बाघों की वापसी का इंतज़ार कर रहे इस रिज़र्व के लिए वन्यजीव विशेषज्ञ इसे एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मान रहे हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि किसी बाघ या बाघिन का किसी वन क्षेत्र को स्थायी निवास के रूप में चुनना इस बात का प्रमाण है कि वहां पर्याप्त मात्रा में शिकार (प्रेय बेस), बेहतर आवास और सुरक्षित माहौल उपलब्ध है.

वन विभाग के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में उदंती-सीतानदी रिज़र्व में वन्यजीवों के अनुकूल वातावरण तैयार करने के लिए कई कार्य किए गए हैं, जिनका असर अब दिखने लगा है:

  • सघन गश्त और एंटी-पोचिंग: शिकार विरोधी नेटवर्क को मज़बूत किया गया है और जंगलों के भीतर गश्त बढ़ाई गई है.

  • कृत्रिम जलस्रोतों का निर्माण: वन्यजीवों के लिए पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से सैकड़ों कृत्रिम जलस्रोतों और झिरियों का निर्माण कराया गया है.

  • वन भूमि की बहाली: क्षतिग्रस्त वन क्षेत्रों को पुनर्जीवित करने के लिए अतिक्रमण हटाकर वन भूमि को वापस लिया गया है.

सुरक्षा और निगरानी बढ़ाने का फ़ैसला

कैमरा ट्रैप के विश्लेषण के बाद वन अधिकारियों ने बताया कि बाघिन पूरी तरह स्वस्थ है और वह क्षेत्र का निरीक्षण कर अपनी टेरिटरी (प्रभाव क्षेत्र) स्थापित करने की कोशिश कर रही है.

बाघिन की मौजूदगी को देखते हुए वन विभाग ने रिज़र्व क्षेत्र में निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़ करने का निर्णय लिया है. अधिकारियों को उम्मीद है कि यदि परिस्थितियां अनुकूल रहीं, तो यह रिज़र्व आने वाले समय में मध्य भारत के प्रमुख बाघ आवासों के रूप में फिर से अपनी पहचान बना सकेगा और भविष्य में अन्य बाघों के आगमन का मार्ग भी प्रशस्त होगा.


छत्तीसगढ़ के जंगलों का 'हिडन जेम': इंसानी नज़रों से दूर रहने वाली दुर्लभ उड़न गिलहरी कैमरे में क़ैद

TODAY छत्तीसगढ़  /  छत्तीसगढ़ के गरियाबंद और धमतरी ज़िले में फैले उदंती-सीतानदी टाइगर रिज़र्व में एक दुर्लभ 'इंडियन जायंट फ्लाइंग स्क्विरल' (भारतीय उड़न गिलहरी) देखी गई है.

वन्यजीव विशेषज्ञों और वन विभाग के मुताबिक़, इस दुर्लभ प्रजाति का नज़र आना इस बात का प्रमाण है कि रिज़र्व का वन पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) और जैव विविधता बेहद स्वस्थ और प्राकृतिक रूप से समृद्ध है.

गश्त के दौरान कैमरे में क़ैद हुआ जीव

वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, हाल ही में जंगल की गश्त (पेट्रोलिंग) के दौरान यह जीव दिखाई दिया. मुख्य रूप से घने जंगलों में पाई जाने वाली यह गिलहरी अमूमन इंसानी नज़रों से दूर ही रहती है.

विशेषज्ञों का मानना है कि उड़न गिलहरी केवल घने और सुरक्षित जंगलों में ही अपना बसेरा बनाती है, इसलिए इसका मिलना संरक्षण प्रयासों के लिहाज़ से एक अहम संकेत है. उदंती-सीतानदी टाइगर रिज़र्व के उप संचालक (डिप्टी डायरेक्टर) वरुण जैन ने बताया कि इस दुर्लभ जीव का दिखाई देना वन्यजीवों के सुरक्षित आवास को लेकर किए जा रहे संरक्षण कार्यों का सकारात्मक परिणाम है.

उड़न गिलहरी की क्या है ख़ासियत?

  • असल में उड़ती नहीं, 'ग्लाइड' करती है: नाम के विपरीत, यह गिलहरी पक्षियों की तरह असल में उड़ती नहीं है. इसके आगे और पीछे के पैरों के बीच एक ख़ास त्वचा (झिल्ली) होती है, जो पैराशूट की तरह काम करती है. इसी झिल्ली को फैलाकर यह एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक हवा में फिसलते (Gliding) हुए लंबी दूरी तय करती है.

  • निशाचर (रात में जागने वाला) जीव: यह एक रात्रिचर जीव है. दिन के समय यह आमतौर पर पेड़ों के खोखले हिस्सों में आराम करती है और रात के अंधेरे में ही भोजन की तलाश में बाहर निकलती है.

इको-पर्यटन और रिसर्च को मिलेगी मदद

वन विभाग का मानना है कि इस दुर्लभ प्रजाति के दस्तावेज़ीकरण (डॉक्यूमेंटेशन) से छत्तीसगढ़ की जैव विविधता को एक नई पहचान मिलेगी. अधिकारियों को उम्मीद है कि इस खोज से न केवल विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और प्रकृति प्रेमियों के बीच वन्यजीवों के प्रति जागरूकता बढ़ेगी, बल्कि राज्य में 'इको-पर्यटन' (Eco-tourism) को भी बढ़ावा मिलेगा.


अचानकमार में दिखा ‘गिद्धों का राजा’, पहली बार नजर आया दुर्लभ किंग वल्चर

बिलासपुर। TODAY छत्तीसगढ़  /  छत्तीसगढ़ के अचानकमार टाइगर रिजर्व (ATR) से वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में एक बड़ी और उत्साहजनक खबर सामने आई है। रिजर्व क्षेत्र में पहली बार बेहद दुर्लभ रेड-हेडेड वल्चर (King Vulture) की मौजूदगी दर्ज की गई है। वन विभाग ने इसकी आधिकारिक पुष्टि करते हुए इसे अचानकमार की समृद्ध जैव विविधता और गिद्धों के लिए अनुकूल वातावरण का महत्वपूर्ण संकेत बताया है।

अचानकमार टाइगर रिजर्व की मुख्य वन संरक्षक एवं फील्ड डायरेक्टर श्रीमती प्रियंका पांडेय ने बताया कि रेड-हेडेड वल्चर का देखा जाना वन्यजीव संरक्षण की दृष्टि से बड़ी उपलब्धि है। यह प्रजाति देश में तेजी से घटती गिद्ध आबादी के बीच बेहद दुर्लभ मानी जाती है और संकटग्रस्त श्रेणी में शामिल है। 

गिद्धों का राजा माना जाता है किंग वल्चर

देश में पाई जाने वाली नौ गिद्ध प्रजातियों में रेड-हेडेड वल्चर को विशेष स्थान प्राप्त है। इसकी लाल रंग की गर्दन और प्रभावशाली आकार के कारण इसे "गिद्धों का राजा" कहा जाता है। वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, मृत पशुओं के शव पर सबसे पहले यही गिद्ध पहुंचता है और इसके बाद अन्य गिद्ध प्रजातियां भोजन के लिए वहां आती हैं।

औरापानी क्षेत्र पहले से गिद्ध संरक्षण का केंद्र

अचानकमार टाइगर रिजर्व का बफर क्षेत्र औरापानी पहले से ही Indian Long-billed Vulture के लिए प्रदेश में विशेष पहचान रखता है। ऐसे में उसी क्षेत्र में रेड-हेडेड वल्चर की उपस्थिति दर्ज होना वन विभाग और संरक्षण विशेषज्ञों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

पर्यावरण संतुलन में अहम भूमिका

गिद्धों को प्रकृति का सफाईकर्मी माना जाता है। ये मृत पशुओं के अवशेषों को खाकर पर्यावरण को स्वच्छ बनाए रखते हैं और कई प्रकार की संक्रामक बीमारियों तथा महामारी के खतरे को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन दवाओं के दुष्प्रभाव, आवासीय संकट और अन्य कारणों से पिछले कुछ दशकों में गिद्धों की संख्या में भारी गिरावट आई है।

संरक्षण प्रयासों को मिलेगी नई दिशा

वन विभाग का मानना है कि रेड-हेडेड वल्चर की मौजूदगी इस बात का प्रमाण है कि अचानकमार के जंगल आज भी दुर्लभ वन्यजीवों के लिए सुरक्षित और अनुकूल आवास बने हुए हैं। यह खोज प्रदेश में गिद्ध संरक्षण और जैव विविधता संरक्षण के प्रयासों को नई दिशा देने वाली साबित हो सकती है। 


रोमांचक यात्रा: 6000 किमी की नॉनस्टॉप उड़ान, भारत लौट रहे अमूर फाल्कन


नई दिल्ली।
  TODAY छत्तीसगढ़  /  पिछले एक दशक से नॉर्थईस्ट इंडिया में अमूर फाल्कन के कंजर्वेशन के लिए लगातार कोशिशों में, नवंबर 2025 में मणिपुर के तामेंगलोंग जिले में उनके स्टॉपओवर साइट (चिउलुआन) में तीन अमूर फाल्कन को सैटेलाइट-टैग किया गया।

दक्षिणी अफ्रीका में अपने नॉन-ब्रीडिंग ग्राउंड में चार महीने से ज़्यादा समय बिताने के बाद, इनमें से दो अमूर फाल्कन अपने स्प्रिंग माइग्रेशन पर हैं, और इंडिया के रास्ते फ़ार-ईस्ट एशिया में अपने ब्रीडिंग रीजन में लौट रहे हैं। सोमालिया से नॉर्थईस्ट इंडिया आते समय वे छह दिनों में लगभग 6000 km की नॉनस्टॉप उड़ान भरते हैं। 

‘अलंग’ नाम की एक टैग की हुई युवा मादा अमूर अभी इंडिया के वेस्ट कोस्ट की ओर जा रही है, और अरब सागर पार कर रही है, जिसकी शुरुआत कल सुबह सोमालिया से हुई थी। अभी, अच्छी हवा चलने पर, समुद्र पार करना तीन दिन का नॉनस्टॉप होगा। @MoEFCC से फंडिंग सपोर्ट के साथ, यह प्रोजेक्ट इंडिया में कम्युनिटी के नेतृत्व वाले कंजर्वेशन के सफल प्रयासों में से एक रहा है।

इसके साथ ही, इस शानदार छोटे रैप्टर के बारे में दिलचस्प जानकारी मिली है, जो एक लंबी दूरी का ट्रांस-हेमिस्फेरिक माइग्रेंट है, जो मैनेजमेंट और कंज़र्वेशन की कोशिशों को गाइड कर रहा है। 


ऑलिव रिडले बच्चों की पहली यात्रा ने मोह लिया सबका दिल


गंजम।
  TODAY छत्तीसगढ़  /  ओडिशा के गंजम जिले में ऋषिकुल्या नदी के मुहाने पर इन दिनों प्रकृति का अद्भुत और भावुक कर देने वाला दृश्य देखने को मिल रहा है। हजारों ऑलिव रिडले समुद्री कछुओं के नन्हे बच्चे अंडों से बाहर निकलकर समुद्र की ओर अपनी पहली यात्रा पर निकल पड़े हैं।

करीब 45 दिनों तक रेत में सुरक्षित रहने के बाद अब ये छोटे कछुए तेजी से बंगाल की खाड़ी की ओर बढ़ रहे हैं। समुद्र तट पर यह नजारा लोगों को रोमांचित कर रहा है। इस मौसम में लाखों अंडे तट पर दिए गए थे, जिससे यह इलाका ऑलिव रिडले कछुओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण नर्सरी बन गया है।

विशेषज्ञों के अनुसार, इस सामूहिक अंडे देने की प्रक्रिया को ‘अरिबाडा’ कहा जाता है। यह एक दुर्लभ प्राकृतिक घटना है, जिसमें हजारों मादा कछुए एक साथ समुद्र तट पर पहुंचकर अंडे देती हैं। ‘अरिबाडा’ शब्द स्पेनिश भाषा से लिया गया है, जिसका अर्थ है “समुद्र के रास्ते आगमन।” 

बताया जाता है कि मादा कछुए अक्सर उसी तट पर लौटती हैं जहां उनका जन्म हुआ था। वे रेत में घोंसले बनाकर लगभग 80 से 120 अंडे देती हैं। अंडों से बाहर निकलने के बाद नन्हे कछुओं को समुद्र तक पहुंचने के लिए लंबी और खतरनाक यात्रा तय करनी पड़ती है। इस दौरान उन्हें समुद्री लहरों, पक्षियों और अन्य शिकारियों के अलावा इंसानी दखल जैसी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। बावजूद इसके, उनकी सहज प्रवृत्ति उन्हें समुद्र की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित करती है। 

वन विभाग और पर्यावरण प्रेमियों ने लोगों से अपील की है कि इस संवेदनशील समय में समुद्र तट पर अनावश्यक भीड़ और रोशनी से बचें, ताकि कछुओं की यह प्राकृतिक यात्रा सुरक्षित रह सके।

रामसर साइट कोपरा के पास सकर्रा में प्रस्तावित स्टील प्लांट नहीं लगेगा, कंपनी ने खुद लिया फैसला


बिलासपुर।
जिले के सकरी क्षेत्र में प्रस्तावित स्टील प्लांट परियोजना को लेकर एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। IMAEC स्टील एंड पावर लिमिटेड ने पर्यावरणीय कारणों का हवाला देते हुए अपनी प्रस्तावित ग्रीनफील्ड स्टील प्लांट परियोजना को स्वेच्छा से वापस लेने का निर्णय लिया है। इस संबंध में कंपनी ने छत्तीसगढ़ राज्य वेटलैंड प्राधिकरण को औपचारिक पत्र भेजकर अपने आवेदन को निरस्त करने का अनुरोध किया है।

कंपनी द्वारा 20 अप्रैल 2026 को भेजे गए पत्र के अनुसार, ग्राम सकरी, तहसील सकरी, जिला बिलासपुर में प्रस्तावित इस परियोजना के लिए वेटलैंड NOC हेतु आवेदन प्रस्तुत किया गया था। यह आवेदन 24 मार्च 2026 को संबंधित प्राधिकरण के समक्ष रखा गया था। 

कंपनी ने अपने पत्र में उल्लेख किया है कि परियोजना स्थल के समीप स्थित कोपर्रा जलाशय (रामसर साइट/वेटलैंड क्षेत्र) पर्यावरणीय दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील है। यह क्षेत्र समृद्ध जैव विविधता (फ्लोरा एवं फौना) से भरपूर है और यहां विभिन्न प्रजातियों के पक्षियों का आवागमन होता है।

वन विभाग एवं अन्य संबंधित एजेंसियों से प्राप्त जानकारी के आधार पर यह स्पष्ट हुआ कि इस क्षेत्र का पर्यावरणीय महत्व अत्यधिक है। ऐसे में किसी भी औद्योगिक परियोजना से यहां के पारिस्थितिक संतुलन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

IMAEC स्टील एंड पावर लिमिटेड ने अपने पत्र में कहा है कि वह पर्यावरण संरक्षण के प्रति प्रतिबद्ध है और इसी को ध्यान में रखते हुए कंपनी ने यह निर्णय लिया है। कंपनी ने स्पष्ट किया कि प्रस्तावित स्टील प्लांट (जिसमें DRI किल्न, पावर प्लांट और अन्य सहायक इकाइयां शामिल थीं) को पूरी तरह से वापस लिया जा रहा है।

कंपनी ने यह भी बताया कि पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) के PARIVESH पोर्टल पर प्रस्तुत आवेदन को भी विधिवत वापस ले लिया गया है। कंपनी ने वेटलैंड NOC के लिए दिए गए आवेदन को निरस्त मानते हुए इस संबंध में आगे किसी भी प्रकार की कार्रवाई न करने का अनुरोध किया है।

इस फैसले को पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है। आमतौर पर औद्योगिक परियोजनाओं को लेकर पर्यावरणीय विवाद सामने आते रहते हैं, लेकिन इस मामले में कंपनी द्वारा स्वयं परियोजना वापस लेना एक महत्वपूर्ण संकेत है। 

गौरतलब हो कि कल ही हमने इस आशय को लेकर एक खबर प्रकाशित की थी उसके बाद  यह बड़ा और ऐतिहासिक फैसला लिया गया।  आपको बता दें कि छत्तीसगढ़ की पहली रामसर साइट कोपरा जलाशय एक बार फिर विवादों के केंद्र में थी। प्रस्तावित स्टील एवं पावर प्लांट परियोजना के लिए तैयार इनवायरमेंट इंपैक्ट एसेसमेंट (EIA) रिपोर्ट में कथित तौर पर भ्रामक जानकारी दिए जाने का मामला सामने आया था । इसको लेकर अधिवक्ता संदीप तिवारी एवं वाइल्डलाइफ फोटोजर्नलिस्ट सत्यप्रकाश पांडेय ने गंभीर आपत्ति दर्ज कराई थी। इधर वेटलैंड अथॉरिटी ने बिलासपुर कलेक्टर को पत्र भेजकर दर्ज आपत्ति और शिकायतों की जांच करने कहा था ।  

श्री तिवारी ने वेटलैंड अथॉरिटी को भेजे पत्र में उल्लेख किया है कि EIA रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि परियोजना स्थल के 10 किलोमीटर दायरे में किसी भी वन्यजीव का प्रवासी मार्ग नहीं है। जबकि वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 के अनुसार पक्षियों को भी वन्यजीव की श्रेणी में रखा गया है।

रामसर कन्वेंशन को दी गई आधिकारिक जानकारी के अनुसार कोपरा जलाशय 161 प्रजातियों के पक्षियों का महत्वपूर्ण आवास है। इनमें 58 प्रवासी प्रजातियां शामिल हैं, जो सेंट्रल एशियन फ्लाईवे के माध्यम से हर वर्ष यहां पहुंचती हैं। इनमें पांच अत्यंत संकटग्रस्त प्रजातियां भी हैं।

“रामसर साइट कोपरा पर संकट ? EIA रिपोर्ट में ‘गायब’ हो गए प्रवासी पक्षी !”  

“रामसर साइट कोपरा पर संकट ? EIA रिपोर्ट में ‘गायब’ हो गए प्रवासी पक्षी !”


रायपुर। 
TODAY छत्तीसगढ़  /  छत्तीसगढ़ की पहली रामसर साइट कोपरा जलाशय एक बार फिर विवादों के केंद्र में है। प्रस्तावित स्टील एवं पावर प्लांट परियोजना के लिए तैयार इनवायरमेंट इंपैक्ट एसेसमेंट (EIA) रिपोर्ट में कथित तौर पर भ्रामक जानकारी दिए जाने का मामला सामने आया है। इसको लेकर अधिवक्ता संदीप तिवारी एवं वाइल्डलाइफ फोटोजर्नलिस्ट सत्यप्रकाश पांडेय ने गंभीर आपत्ति दर्ज कराई है। इधर वेटलैंड अथॉरिटी ने बिलासपुर कलेक्टर को पत्र भेजकर दर्ज आपत्ति और शिकायतों की जांच करने कहा है।  

श्री तिवारी ने वेटलैंड अथॉरिटी को भेजे पत्र में उल्लेख किया है कि EIA रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि परियोजना स्थल के 10 किलोमीटर दायरे में किसी भी वन्यजीव का प्रवासी मार्ग नहीं है। जबकि वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 के अनुसार पक्षियों को भी वन्यजीव की श्रेणी में रखा गया है।

रामसर कन्वेंशन को दी गई आधिकारिक जानकारी के अनुसार कोपरा जलाशय 161 प्रजातियों के पक्षियों का महत्वपूर्ण आवास है। इनमें 58 प्रवासी प्रजातियां शामिल हैं, जो सेंट्रल एशियन फ्लाईवे के माध्यम से हर वर्ष यहां पहुंचती हैं। इनमें पांच अत्यंत संकटग्रस्त प्रजातियां भी हैं।

Central Asian Flyway का एक अंतरराष्ट्रीय प्रवासी मार्ग है, जिसके जरिए पक्षी हर साल ठंड के मौसम में उत्तर (साइबेरिया/मध्य एशिया) से भारत जैसे देशों में आते हैं। यह मार्ग पक्षियों के लिए भोजन, विश्राम और जीवित रहने के लिए महत्वपूर्ण आर्द्रभूमियों (जैसे कोपरा जलाशय) पर निर्भर करता है। इसलिए इस मार्ग के किसी भी स्थल को नुकसान पहुंचाना प्रवासी पक्षियों और पूरे पारिस्थितिक तंत्र पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है।

श्री तिवारी का कहना है कि रिपोर्ट में सेंट्रल एशियन फ्लाईवे के महत्व को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया है। उन्होंने मांग की है कि भ्रामक एवं अपूर्ण जानकारी के आधार पर तैयार EIA रिपोर्ट को निरस्त किया जाए तथा एक स्वतंत्र एवं वैज्ञानिक अध्ययन कराया जाए, जिसमें परियोजना के समग्र पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन हो।

वेटलैंड अथॉरिटी द्वारा मामले को कलेक्टर बिलासपुर को भेजे जाने पर भी आपत्ति जताई गई है। तिवारी का कहना है कि रामसर से संबंधित तकनीकी जानकारी वेटलैंड अथॉरिटी के पास उपलब्ध है, ऐसे में इसकी जांच भी उसी स्तर पर की जानी चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि जिला प्रशासन इस प्रकार के जटिल पर्यावरणीय मुद्दे का तकनीकी परीक्षण कैसे कर पाएगा। 

इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन को लेकर बहस तेज कर दी है। एक ओर औद्योगिक परियोजनाओं के माध्यम से आर्थिक विकास की बात कही जा रही है, वहीं दूसरी ओर जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर चिंता व्यक्त की जा रही है। 

पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि रामसर साइट जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में किसी भी परियोजना को स्वीकृति देने से पहले अत्यंत सावधानी बरतना आवश्यक है। यदि प्रवासी पक्षियों के मार्ग और आवास प्रभावित होते हैं, तो इसका असर केवल स्थानीय नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी देखने को मिल सकता है।

कोपरा जलाशय का मामला केवल एक परियोजना का नहीं, बल्कि नीति और प्राथमिकताओं का सवाल है। यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संरक्षित वेटलैंड भी सटीक जानकारी और जिम्मेदारी के अभाव में खतरे में पड़ जाएं, तो यह बेहद चिंताजनक स्थिति है। आवश्यक है कि संबंधित एजेंसियां पारदर्शिता और वैज्ञानिक आधार पर निर्णय लें, ताकि विकास के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण भी सुनिश्चित हो सके।

माहुल: एक वृक्ष का संकट; आजीविका, पर्यावरण और परंपरा—तीनों पर खतरा


बिलासपुर।
  TODAY छत्तीसगढ़  /  छत्तीसगढ़ के जंगलों में जीवन और आजीविका का आधार रहे ‘माहुल’ वृक्ष पर अब अस्तित्व का संकट गहरा गया है। अंतरराष्ट्रीय संस्था IUCN ने इसे अपनी रेड डेटा बुक में सर्वाधिक संकटग्रस्त (Critically Endangered) प्रजाति के रूप में दर्ज किया है। यह खुलासा न केवल पर्यावरणविदों, बल्कि उन हजारों परिवारों के लिए भी चिंता का विषय बन गया है, जिनकी रोजी-रोटी इस वृक्ष पर निर्भर है। 

वन अनुसंधानों में सामने आया है कि पौधरोपण के प्रति अनिच्छा, जंगलों की अंधाधुंध कटाई, संरक्षण की अनदेखी और इसके बीजों का समुचित उपयोग न होना जैसे कारणों से माहुल तेजी से विलुप्ति की कगार पर पहुंच गया है। यह स्थिति इसलिए भी गंभीर है क्योंकि ‘माहुल परिवार’ का प्रमुख वृक्ष पलाश पहले ही इसी तरह के संकट से गुजर रहा है। 

माहुल की पत्तियां ग्रामीण और आदिवासी अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती हैं। दोना-पत्तल निर्माण, छप्पर और घरेलू उपयोग, बीजों से औषधि निर्माण और जड़ों से पारंपरिक दवाइयां बनाई जाती रही हैं। ग्रामीण जनजीवन और कुछ शहरी क्षेत्र के हजारों परिवारों का जीवनयापन 'माहुल' से जुड़ा हुआ है।

सबसे आश्चर्य और हैरत की बात यह है कि यह हर जमीन पर उगने वाला ‘जीवन वृक्ष’ है। माहुल की खासियत यह है कि यह लगभग हर प्रकार की भूमि में उग सकता है जिसकी ऊंचाई 10–30 मीटर तक हो सकती है । यह वृक्ष मिट्टी के कटाव को रोकता है साथ ही पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखता है। इसके अलावा बेल और वृक्ष की छाल से रस्सी, तने से टोकरी व चटाई और पत्तियों से पर्यावरण अनुकूल उत्पाद तैयार किए जाते हैं। ऐसे में यह सिर्फ एक पेड़ का संकट नहीं है बल्कि यह उस पूरी जीवन-श्रृंखला का संकट है, जो इससे जुड़ी हुई है। 


हाथियों के परिवार का भावुक दृश्य वायरल, IAS सुप्रिया साहू ने साझा किया वीडियो


दिल्ली।
 TODAY छत्तीसगढ़  /  आईएएस सुप्रिया साहू ने अपने X हैंडल पर इस वीडियो को ट्वीट करते हुए लिखा है कि तमिलनाडु के अनामलाई टाइगर रिज़र्व के गहरे जंगलों में हाथियों का एक प्यारा परिवार सो रहा है—एक ऐसा अद्भुत पल जो कैमरे में कैद हो गया। हाथी का बच्चा बड़े हाथी के ऊपर अपना पैर धीरे से रखता है, मानो वह उससे आराम, सुरक्षा और प्यार चाहता हो। हाथियों की दुनिया में, परिवार ही सब कुछ होता है। और उनके चारों ओर जंगल खामोश, सुरक्षा देने वाला और शाश्वत रूप से खड़ा है—ठीक उस पालने की तरह जो जीवन को अपनी गोद में थामे रहता है। 'अंतर्राष्ट्रीय वन दिवस' के इस अवसर पर, यह कोमल दृश्य हमें एक सीधी-सादी सच्चाई की याद दिलाता है: अगर जंगल नहीं होंगे, तो कुछ भी नहीं बचेगा। बिल्कुल कुछ भी नहीं। जंगलों के बिना, यह दुनिया और भी गरीब, कठोर और सूनी हो जाएगी। हाथियों के लिए, वन्यजीवों के लिए, नदियों के लिए और इंसानों के लिए—जंगल ही जीवन हैं। अद्भुत तस्वीर  
अंतर्राष्ट्रीय वन दिवस के अवसर पर साझा किए गए इस वीडियो के जरिए उन्होंने जंगलों के संरक्षण का संदेश भी दिया। उन्होंने कहा कि यदि जंगल नहीं रहेंगे तो न केवल वन्यजीव बल्कि इंसानों का अस्तित्व भी संकट में पड़ जाएगा। जंगल ही जीवन का आधार हैं।

ATR: जब जंगल में बाघ मरा और व्यवस्था खामोश रही


बिलासपुर।
  TODAY छत्तीसगढ़  /  आज 26 जनवरी को छत्तीसगढ़ के अचानकमार टाइगर रिज़र्व से आई एक ख़बर ने केवल वन्यजीव प्रेमियों को नहीं, बल्कि लोकतंत्र में जवाबदेही पर भरोसा रखने वाले हर नागरिक को असहज कर दिया। जंगल के भीतर एक युवा नर बाघ मृत पाया गया। आधिकारिक बयान आया, मौत दो बाघों के बीच आपसी संघर्ष का नतीजा है। फ़ाइलें चलीं, पोस्टमार्टम हुआ, रिपोर्ट बनी और मामला लगभग बंद मान लिया गया है। गणतंत्र दिवस के मौके पर आज जब तिरंगे के नीचे संविधान की शपथ दोहराई जा रही थी, उसी देश के चर्चित जंगल अचानकमार टाईगर रिजर्व में एक राष्ट्रीय पशु चुपचाप सड़ता रहा और जब उसकी मौत का सच सामने आया, तब जवाबों से ज़्यादा बचाव के बयान सामने आए। 

छत्तीसगढ़ के अचानकमार टाइगर रिज़र्व में एक युवा नर बाघ की मौत को वन विभाग ने दो बाघों के बीच हुए आपसी संघर्ष का परिणाम बताया है। घटना 25 जनवरी 2026 को अचानकमार परिक्षेत्र के सारसडोल क्षेत्र अंतर्गत कुडेरापानी परिसर की बताई गई है, जहाँ नियमित पेट्रोलिंग के दौरान सुरक्षा बलों ने बाघ का शव देखा। सूचना मिलते ही वन विभाग की टीम ने इलाके को सुरक्षित कर लिया और वरिष्ठ अधिकारियों को जानकारी दी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के निष्कर्षों के आधार पर यह दावा तकनीकी रूप से संभव भी है। बाघों के बीच क्षेत्रीय द्वंद्व प्राकृतिक व्यवहार का हिस्सा होता है और देश के कई संरक्षित इलाकों में ऐसी घटनाएँ दर्ज की गई हैं। लेकिन लोकतंत्र में ओप-एड का दायित्व केवल आधिकारिक निष्कर्ष दोहराना नहीं, बल्कि उन प्रश्नों को सामने लाना है जो सरकारी बयान के दायरे से बाहर रह जाते हैं। अचानकमार की यह घटना भी ऐसी ही है जहाँ मौत से ज़्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है, मौत के बाद का प्रबंधन।

विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, जिस बाघ का शव 26 जनवरी को पाया गया, उसकी मौत संभवतः कई दिन पहले हो चुकी थी। शव की स्थिति और इलाके में फैली दुर्गंध इस ओर संकेत करती है कि घटना और उसकी पहचान के बीच समय का अंतर था। अगर यह सही है, तो सवाल बाघ की मौत के कारण पर नहीं, बल्कि निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर उठता है। 

यहाँ बताना लाज़िमी होगा कि कुछ दिन पहले ही अचानकमार टाईगर रिजर्व क्षेत्र में बाघ गड़ना के लिये लगाये गये ट्रैप कैमरों में से दो ट्रैप कैमरों की मेमोरी चिप चोरी हो गई थी। यह घटना साधारण चोरी नहीं कही जा सकती। कैमरा ट्रैप को खोलना और उसमें से डेटा निकालना तकनीकी जानकारी की माँग करता है। मतलब साफ़ है, प्रतिबंधित क्षेत्र में लगाये गये कैमरों से चिप चोरी करने वाला अज्ञात शख़्स उन कैमरों को आपरेट करने की तकनीकि से वाकिफ है। अब यहां यह सवाल अनिवार्य हो जाता है कि चोरी किसने की ? क्या यह किसी बाहरी शिकारी का काम था या आंतरिक मिलीभगत ? और क्या इस मामले में आपराधिक जांच को प्राथमिकता दी गई ? ऐसे में जब निगरानी उपकरण ही निष्क्रिय कर दिए जाएँ, तो किसी भी संरक्षण दावे की विश्वसनीयता कमजोर पड़ जाती है। 

अचानकमार टाइगर रिज़र्व सालों से विवादों में रहा है। बाघ की मौत, ट्रैप कैमरों से डेटा कार्ड की चोरी के कुछ समय पहले ही कोर क्षेत्र में प्रभावशाली युवकों की मौजूदगी का एक वीडियो सामने आया था, उस वीडियो ने एटीआर प्रबंधन की लाचारी और अव्यवस्था की कलई खोलकर रख दी। सियासत, प्रभावशाली लोगों के सामने एटीआर प्रबंधन कितना बौना है और जंगल कितना असुरक्षित यह बात उस वीडियो से उजागर हुई। इस जंगल में कानून और नियम सभी के लिए समान रूप से लागू नहीं हैं। जहाँ स्थानीय समुदायों पर कड़े प्रतिबंध लागू होते हैं, वहीं रसूखदारों की घुसपैठ पर अक्सर नरमी दिखाई देती है। यह दोहरा मापदंड न केवल संरक्षण प्रयासों को कमजोर करता है, बल्कि स्थानीय लोगों के बीच व्यवस्था के प्रति अविश्वास भी पैदा करता है।

भारत में बाघ संरक्षण को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक सफलता के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है। बाघों की संख्या में वृद्धि, नए रिज़र्व की घोषणा और पर्यटन के आँकड़े ये सब सकारात्मक संकेत हैं। लेकिन संरक्षण केवल संख्या का खेल नहीं है। एटीआर में अगर बाघों की संख्या बढ़ रही है, तो निगरानी और सुरक्षा भी उसी अनुपात में मज़बूत होनी चाहिए। अचानकमार की ये तमाम घटनायें यह याद दिलाती है कि काग़ज़ी उपलब्धियाँ ज़मीनी हकीकत की जगह नहीं ले सकतीं। 

बंजर में जीवन की आहट: मोहनभाठा में इंडियन कोर्सर की वापसी


बिलासपुर।
 TODAY छत्तीसगढ़  /  कभी-कभी धरती बहुत धीमी आवाज़ में बोलती है। इतनी धीमी कि अगर सुनने का धैर्य न हो, तो वह आवाज़ खो जाती है। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले का मोहनभाठा भी ऐसी ही एक आवाज़ है सूखी, बंजर और उपेक्षित, लेकिन भीतर ही भीतर जीवन से भरी हुई। सवा साल के लंबे इंतज़ार के बाद 18 जनवरी को जब यहाँ एक बार फिर इंडियन कोर्सर (Indian Courser) दिखाई पड़ा, तो लगा जैसे इस ज़मीन ने खुद कहा हो 'मैं अब भी ज़िंदा हूँ।' 

"वह आता है, दौड़ता है और बिना कोई निशान छोड़े ओझल हो जाता है। लेकिन उसकी मौजूदगी बहुत कुछ कह जाती है।"

तेज़ चाल, सतर्क स्वभाव और खुले, शुष्क मैदानों से गहरे रिश्ते वाला यह दुर्लभ परिंदा कल शाम जब मोहनभाठा में अपनी ज़मीन तलाशता दिखाई देता है, तो यह महज़ एक पक्षी का दिखना नहीं बल्कि एक पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के जीवित होने का संकेत होता है। कल तीन कौरसरों का मोहनभाठा में दिखना इस बात का प्रमाण है कि तमाम दबावों के बावजूद यह मैदान अब भी उन्हें बुला रहा है। मध्यम आकार का, पतले शरीर और लंबी टाँगों वाला इंडियन कोर्सर (Indian Courser) उड़ने से ज़्यादा दौड़कर चलता है। 

"उन तस्वीरों में सिर्फ़ अंडे नहीं थे वे भरोसे की निशानी थीं। भरोसा कि यह ज़मीन सुरक्षित है, भरोसा कि यहीं अगली पीढ़ी जन्म ले सकती है।"

इन ख़ास पक्षियों को लेकर सबसे चौकाने वाली बात करीब दो बरस पहले सामने आई। बिलासपुर के दो नामचीन पक्षी प्रेमी और फोटोग्राफर संदीपन अधिकारी, राधाकिशन शर्मा ने इंडियन कोर्सर (Indian Courser) के अंडे की तस्वीरें दर्ज कीं। यह महज़ फ़ोटोग्राफ़ी नहीं थी यह ठोस प्रमाण था कि मोहनभाठा की बंजर भूमि उन्हें केवल भाती ही नहीं, बल्कि यहीं वे अपनी अगली पीढ़ी को भी बढ़ा रहे हैं। कुछ फ़ोटोग्राफ़रों के पास इनके चूजों की तस्वीरें होना इस विश्वास को और मज़बूत करता है कि यह मैदान एक सक्रिय प्रजनन स्थल है।

मोहनभाठा की पहचान उसकी जैव-विविधता है। यहाँ शेड्यूल–I से लेकर IV तक के पक्षी, जीव-जंतु और वन्यप्राणी समय-समय पर दिखाई देते हैं। बारिश के मौसम में यह क्षेत्र कई दुर्लभ प्रजाति के प्रवासी पक्षियों के ठहराव का बड़ा केंद्र बन जाता है। सबसे संकटग्रस्त श्रेणी में शामिल इजिप्शन वल्चर का हर साल परिवार के साथ यहां दिखाई देना बताता है कि आसपास कहीं उनका रहवास मौजूद है। ऐसे संकेत किसी भी इलाके के पारिस्थितिक स्वास्थ्य का पैमाना होते हैं। 

इंडियन कोर्सर की वापसी हमें खुश करती है, लेकिन साथ ही सवाल भी पूछती है क्या यह ज़मीन आने वाले वर्षों में भी उसे स्वीकार कर पाएगी ? इंडियन कोर्सर जैसे पक्षी संकेतक होते हैं। वे बताते हैं कि प्रकृति अब भी हमें एक मौका दे रही है। 

लेकिन यही समृद्धि आज खतरे में है। मोहनभाठा जो कभी पक्षी प्रेमियों के लिए स्वर्ग समान था अब अवैध भूमि अधिग्रहण, शिकारियों की बेख़ौफ़ आवाजाही, मुरूम के अवैध उत्खनन, पेड़ों की कटाई और असामाजिक तत्वों की पनाहगाह बनता जा रहा है। प्रशासनिक उदासीनता और जिम्मेदार विभागों की अनदेखी ने इस चारागाह को सिमटने की कगार पर ला खड़ा किया है।

इंडियन कोर्सर की वापसी जितनी सुखद है, उतनी ही चेतावनी भी। यह बताती है कि अगर संरक्षण की ठोस पहल नहीं हुई, तो यह जीवन-रेखा टूट सकती है। घास भूमियाँ अक्सर “बंजर” कहकर नज़रअंदाज़ कर दी जाती हैं, जबकि यही मैदान दुर्लभ प्रजातियों का आधार होते हैं। कौरसर जैसे संकेतक पक्षी हमें बताते हैं कि प्रकृति कहाँ तक सहन कर सकती है और कहाँ नहीं। 

मोहनभाठा के संरक्षण की मुहिम जारी रहनी चाहिए क्योंकि मैदान बचेंगे, तभी परिंदे लौटेंगे; और परिंदे लौटेंगे, तभी उम्मीदें जिंदा रहेंगी।

मोहनभाठा को बचाना केवल एक मैदान को बचाना नहीं, बल्कि उस विरासत को संभालना है जो आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवन का सबक बन सकती है। जब तक इंडियन कोर्सर (Indian Courser) जैसे पक्षी यहाँ दौड़ते रहेंगें, तब तक यह धरती ज़िंदा है। इसके संरक्षण की मुहिम जारी रहनी चाहिए क्योंकि मैदान बचेंगे, तभी परिंदे लौटेंगे; और परिंदे लौटेंगे, तभी उम्मीदें जिंदा रहेंगी।

ATR रिज़र्व या रियासत ? अचानकमार की अंदरूनी कहानी


बिलासपुर।
 TODAY छत्तीसगढ़  / छत्तीसगढ़ का अचानकमार टाइगर रिज़र्व केवल बाघों का आवास नहीं है, यह राज्य की वन-नीति, प्रशासनिक ईमानदारी और सरकार की नीयत का जीवित प्रमाण होना चाहिए था लेकिन आज एटीआर जिस हालत में खड़ा है, वह बताता है कि यहाँ संरक्षण नहीं, संरक्षण का नाटक चल रहा है; क़ानून नहीं, रसूख़ सर्वोपरि है। 2009 में टाइगर रिज़र्व घोषित होने के बाद से एटीआर लगातार विवादों में रहा है। कभी बाघों की संख्या को लेकर संदेह, तो कभी अफसरों की लापरवाही। लेकिन हालिया घटनाएँ यह स्पष्ट कर देती हैं कि समस्या अब केवल प्रशासनिक अक्षमता की नहीं, बल्कि सिस्टमेटिक मिलीभगत की है।

कोर एरिया में निजी वाहन, राइफल, खुलेआम फायरिंग, आग जलाना और घंटों तक बेरोक-टोक घूमना ये सब किसी आम नागरिक के लिए असंभव है। यह सब तभी संभव है, जब नीचे से ऊपर तक संरक्षण और शह मौजूद हो। 

लोरमी क्षेत्र के रसूख़दार युवकों का मामला इसी सच्चाई को उजागर करता है। उनका आत्मविश्वास बताता है कि उन्हें न पकड़े जाने का डर था, न कार्रवाई का। क्योंकि अनुभव से वे जानते थे यह जंगल काग़ज़ों में संरक्षित है, हक़ीक़त में नहीं। चूँकि उनका ही बनाया हुआ वीडियो जब सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तो अफसरों को कार्रवाही की प्रक्रिया शुरू करनी पड़ी। विभागीय ढोल में पोल होने के बाद उन युवकों को पकड़ा गया और जेल भेज दिया गया। अब मामला न्यायालयीन व्यवस्था और प्रक्रिया के बीच है। 

वायरल वीडियो को देखकर कहना गलत नहीं होगा कि जमुनाही, सुरही और कंचनपुर जैसे कई बैरियर वन-सुरक्षा के प्रतीक नहीं, बल्कि अब रसूख़दारों के लिए स्वागत द्वार बन चुके हैं। बिना पूछताछ, बिना तलाशी, बिना अनुमति बैरियर उठते चले जाते हैं। सवाल यह नहीं कि गार्ड ने बैरियर क्यों उठाया, सवाल यह है कि गार्ड को यह भरोसा किसने दिया कि उससे कोई सवाल नहीं होगा ? 

जब मामला सामने आया, तब जो हुआ वह और भी चिंताजनक है। फील्ड डायरेक्टर छुट्टी का हवाला देते हैं, डिप्टी डायरेक्टर और रेंज अफसर फोन बंद रखते हैं, और सहायक संचालक “नंबर देने से मना है” कहकर कॉल काट देते हैं। यह केवल गैर-जिम्मेदारी नहीं, यह जांच से बचने की सोची-समझी रणनीति है।

यह मानना भोलापन ही होगा कि सरकार को इन हालात की जानकारी नहीं है। सवाल यह है कि जानते हुए भी चुप क्यों है? क्या इसलिए कि आरोपी “प्रभावशाली” हैं ? क्या इसलिए कि कार्रवाई करने से राजनीतिक असुविधा होगी ? अगर ऐसा है, तो सरकार को साफ़ कहना चाहिए कि उसके लिए जंगल, बाघ और क़ानून तीनों से ऊपर रसूख़, राजनैतिक प्रभाव है। 

आज एटीआर में बाघों की संख्या बढ़ने के दावे किए जाते हैं, लेकिन जब कोर एरिया में राइफलें गरजें, आग जले और अफसर आंखें मूंद लें तो ये आंकड़े सिर्फ़ प्रेस रिलीज़ बनकर रह जाते हैं। बाघ केवल शिकारी से नहीं मरता, वह प्रशासनिक लापरवाही और राजनीतिक संरक्षण से भी मरता है। कईयों सवाल हैं जैसे, कोर एरिया में निजी हथियारों को ले जाने की अनुमति किसने दी ? बैरियर पर तैनात कर्मचारियों ने किसके निर्देश पर बिना जांच रास्ता खोला ? प्रतिबंधित क्षेत्र में 3–4 घंटे तक मौज मस्ती, फायरिंग और आगजनी की जानकारी वरिष्ठ अफसरों तक क्यों नहीं पहुँची या जानबूझकर पहुँचने नहीं दी गई ? और सबसे बड़ा सवाल, क्या इस मामले में सिर्फ़ राजनैतिक और रसूख़दार युवक ही दोषी हैं या पूरा सिस्टम ? 

यहां का हालिया घटनाक्रम यह दर्शाता है कि एटीआर में कानून, नियम और संरक्षण की अवधारणा गंभीर रूप से कमजोर हुई है। स्थिति ऐसी बन चुकी है कि यह मामला अब प्रशासनिक चूक का नहीं, बल्कि संवैधानिक कर्तव्यों के उल्लंघन और सार्वजनिक संसाधनों की अवैध लूट का बनता जा रहा है जिस पर न्यायिक हस्तक्षेप जरूरी है।

 उपलब्ध वीडियो साक्ष्यों के अनुसार न केवल वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की धारा 27, 28 एवं 38-V का उल्लंघन है, बल्कि नेशनल टाइगर कंज़र्वेशन अथॉरिटी (NTCA) की गाइडलाइंस का भी सीधा अपमान है।

अब तो ऐसा लगता है अचानकमार टाइगर रिज़र्व आज बाघों से ज़्यादा सिस्टम के शिकंजे में फंसा हुआ है। अगर अब भी जिम्मेदार अफसरों पर सख़्त कार्रवाई नहीं होती, अगर राजनीतिक संरक्षण पर पर्दा नहीं उठता तो यह मान लेना चाहिए कि यह जंगल संरक्षण नहीं, बल्कि सत्ता-संरक्षित अराजकता का इलाका बन चुका है। ऐसे हालात में इतिहास यही दर्ज करेगा कि बाघ जंगल में नहीं मरे, उन्हें सिस्टम ने मारा है। 

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