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छत्तीसगढ़ के जंगलों का 'हिडन जेम': इंसानी नज़रों से दूर रहने वाली दुर्लभ उड़न गिलहरी कैमरे में क़ैद

TODAY छत्तीसगढ़  /  छत्तीसगढ़ के गरियाबंद और धमतरी ज़िले में फैले उदंती-सीतानदी टाइगर रिज़र्व में एक दुर्लभ 'इंडियन जायंट फ्लाइंग स्क्विरल' (भारतीय उड़न गिलहरी) देखी गई है.

वन्यजीव विशेषज्ञों और वन विभाग के मुताबिक़, इस दुर्लभ प्रजाति का नज़र आना इस बात का प्रमाण है कि रिज़र्व का वन पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) और जैव विविधता बेहद स्वस्थ और प्राकृतिक रूप से समृद्ध है.

गश्त के दौरान कैमरे में क़ैद हुआ जीव

वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, हाल ही में जंगल की गश्त (पेट्रोलिंग) के दौरान यह जीव दिखाई दिया. मुख्य रूप से घने जंगलों में पाई जाने वाली यह गिलहरी अमूमन इंसानी नज़रों से दूर ही रहती है.

विशेषज्ञों का मानना है कि उड़न गिलहरी केवल घने और सुरक्षित जंगलों में ही अपना बसेरा बनाती है, इसलिए इसका मिलना संरक्षण प्रयासों के लिहाज़ से एक अहम संकेत है. उदंती-सीतानदी टाइगर रिज़र्व के उप संचालक (डिप्टी डायरेक्टर) वरुण जैन ने बताया कि इस दुर्लभ जीव का दिखाई देना वन्यजीवों के सुरक्षित आवास को लेकर किए जा रहे संरक्षण कार्यों का सकारात्मक परिणाम है.

उड़न गिलहरी की क्या है ख़ासियत?

  • असल में उड़ती नहीं, 'ग्लाइड' करती है: नाम के विपरीत, यह गिलहरी पक्षियों की तरह असल में उड़ती नहीं है. इसके आगे और पीछे के पैरों के बीच एक ख़ास त्वचा (झिल्ली) होती है, जो पैराशूट की तरह काम करती है. इसी झिल्ली को फैलाकर यह एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक हवा में फिसलते (Gliding) हुए लंबी दूरी तय करती है.

  • निशाचर (रात में जागने वाला) जीव: यह एक रात्रिचर जीव है. दिन के समय यह आमतौर पर पेड़ों के खोखले हिस्सों में आराम करती है और रात के अंधेरे में ही भोजन की तलाश में बाहर निकलती है.

इको-पर्यटन और रिसर्च को मिलेगी मदद

वन विभाग का मानना है कि इस दुर्लभ प्रजाति के दस्तावेज़ीकरण (डॉक्यूमेंटेशन) से छत्तीसगढ़ की जैव विविधता को एक नई पहचान मिलेगी. अधिकारियों को उम्मीद है कि इस खोज से न केवल विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और प्रकृति प्रेमियों के बीच वन्यजीवों के प्रति जागरूकता बढ़ेगी, बल्कि राज्य में 'इको-पर्यटन' (Eco-tourism) को भी बढ़ावा मिलेगा.


अचानकमार में दिखा ‘गिद्धों का राजा’, पहली बार नजर आया दुर्लभ किंग वल्चर

बिलासपुर। TODAY छत्तीसगढ़  /  छत्तीसगढ़ के अचानकमार टाइगर रिजर्व (ATR) से वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में एक बड़ी और उत्साहजनक खबर सामने आई है। रिजर्व क्षेत्र में पहली बार बेहद दुर्लभ रेड-हेडेड वल्चर (King Vulture) की मौजूदगी दर्ज की गई है। वन विभाग ने इसकी आधिकारिक पुष्टि करते हुए इसे अचानकमार की समृद्ध जैव विविधता और गिद्धों के लिए अनुकूल वातावरण का महत्वपूर्ण संकेत बताया है।

अचानकमार टाइगर रिजर्व की मुख्य वन संरक्षक एवं फील्ड डायरेक्टर श्रीमती प्रियंका पांडेय ने बताया कि रेड-हेडेड वल्चर का देखा जाना वन्यजीव संरक्षण की दृष्टि से बड़ी उपलब्धि है। यह प्रजाति देश में तेजी से घटती गिद्ध आबादी के बीच बेहद दुर्लभ मानी जाती है और संकटग्रस्त श्रेणी में शामिल है। 

गिद्धों का राजा माना जाता है किंग वल्चर

देश में पाई जाने वाली नौ गिद्ध प्रजातियों में रेड-हेडेड वल्चर को विशेष स्थान प्राप्त है। इसकी लाल रंग की गर्दन और प्रभावशाली आकार के कारण इसे "गिद्धों का राजा" कहा जाता है। वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, मृत पशुओं के शव पर सबसे पहले यही गिद्ध पहुंचता है और इसके बाद अन्य गिद्ध प्रजातियां भोजन के लिए वहां आती हैं।

औरापानी क्षेत्र पहले से गिद्ध संरक्षण का केंद्र

अचानकमार टाइगर रिजर्व का बफर क्षेत्र औरापानी पहले से ही Indian Long-billed Vulture के लिए प्रदेश में विशेष पहचान रखता है। ऐसे में उसी क्षेत्र में रेड-हेडेड वल्चर की उपस्थिति दर्ज होना वन विभाग और संरक्षण विशेषज्ञों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

पर्यावरण संतुलन में अहम भूमिका

गिद्धों को प्रकृति का सफाईकर्मी माना जाता है। ये मृत पशुओं के अवशेषों को खाकर पर्यावरण को स्वच्छ बनाए रखते हैं और कई प्रकार की संक्रामक बीमारियों तथा महामारी के खतरे को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन दवाओं के दुष्प्रभाव, आवासीय संकट और अन्य कारणों से पिछले कुछ दशकों में गिद्धों की संख्या में भारी गिरावट आई है।

संरक्षण प्रयासों को मिलेगी नई दिशा

वन विभाग का मानना है कि रेड-हेडेड वल्चर की मौजूदगी इस बात का प्रमाण है कि अचानकमार के जंगल आज भी दुर्लभ वन्यजीवों के लिए सुरक्षित और अनुकूल आवास बने हुए हैं। यह खोज प्रदेश में गिद्ध संरक्षण और जैव विविधता संरक्षण के प्रयासों को नई दिशा देने वाली साबित हो सकती है। 


रोमांचक यात्रा: 6000 किमी की नॉनस्टॉप उड़ान, भारत लौट रहे अमूर फाल्कन


नई दिल्ली।
  TODAY छत्तीसगढ़  /  पिछले एक दशक से नॉर्थईस्ट इंडिया में अमूर फाल्कन के कंजर्वेशन के लिए लगातार कोशिशों में, नवंबर 2025 में मणिपुर के तामेंगलोंग जिले में उनके स्टॉपओवर साइट (चिउलुआन) में तीन अमूर फाल्कन को सैटेलाइट-टैग किया गया।

दक्षिणी अफ्रीका में अपने नॉन-ब्रीडिंग ग्राउंड में चार महीने से ज़्यादा समय बिताने के बाद, इनमें से दो अमूर फाल्कन अपने स्प्रिंग माइग्रेशन पर हैं, और इंडिया के रास्ते फ़ार-ईस्ट एशिया में अपने ब्रीडिंग रीजन में लौट रहे हैं। सोमालिया से नॉर्थईस्ट इंडिया आते समय वे छह दिनों में लगभग 6000 km की नॉनस्टॉप उड़ान भरते हैं। 

‘अलंग’ नाम की एक टैग की हुई युवा मादा अमूर अभी इंडिया के वेस्ट कोस्ट की ओर जा रही है, और अरब सागर पार कर रही है, जिसकी शुरुआत कल सुबह सोमालिया से हुई थी। अभी, अच्छी हवा चलने पर, समुद्र पार करना तीन दिन का नॉनस्टॉप होगा। @MoEFCC से फंडिंग सपोर्ट के साथ, यह प्रोजेक्ट इंडिया में कम्युनिटी के नेतृत्व वाले कंजर्वेशन के सफल प्रयासों में से एक रहा है।

इसके साथ ही, इस शानदार छोटे रैप्टर के बारे में दिलचस्प जानकारी मिली है, जो एक लंबी दूरी का ट्रांस-हेमिस्फेरिक माइग्रेंट है, जो मैनेजमेंट और कंज़र्वेशन की कोशिशों को गाइड कर रहा है। 


ऑलिव रिडले बच्चों की पहली यात्रा ने मोह लिया सबका दिल


गंजम।
  TODAY छत्तीसगढ़  /  ओडिशा के गंजम जिले में ऋषिकुल्या नदी के मुहाने पर इन दिनों प्रकृति का अद्भुत और भावुक कर देने वाला दृश्य देखने को मिल रहा है। हजारों ऑलिव रिडले समुद्री कछुओं के नन्हे बच्चे अंडों से बाहर निकलकर समुद्र की ओर अपनी पहली यात्रा पर निकल पड़े हैं।

करीब 45 दिनों तक रेत में सुरक्षित रहने के बाद अब ये छोटे कछुए तेजी से बंगाल की खाड़ी की ओर बढ़ रहे हैं। समुद्र तट पर यह नजारा लोगों को रोमांचित कर रहा है। इस मौसम में लाखों अंडे तट पर दिए गए थे, जिससे यह इलाका ऑलिव रिडले कछुओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण नर्सरी बन गया है।

विशेषज्ञों के अनुसार, इस सामूहिक अंडे देने की प्रक्रिया को ‘अरिबाडा’ कहा जाता है। यह एक दुर्लभ प्राकृतिक घटना है, जिसमें हजारों मादा कछुए एक साथ समुद्र तट पर पहुंचकर अंडे देती हैं। ‘अरिबाडा’ शब्द स्पेनिश भाषा से लिया गया है, जिसका अर्थ है “समुद्र के रास्ते आगमन।” 

बताया जाता है कि मादा कछुए अक्सर उसी तट पर लौटती हैं जहां उनका जन्म हुआ था। वे रेत में घोंसले बनाकर लगभग 80 से 120 अंडे देती हैं। अंडों से बाहर निकलने के बाद नन्हे कछुओं को समुद्र तक पहुंचने के लिए लंबी और खतरनाक यात्रा तय करनी पड़ती है। इस दौरान उन्हें समुद्री लहरों, पक्षियों और अन्य शिकारियों के अलावा इंसानी दखल जैसी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। बावजूद इसके, उनकी सहज प्रवृत्ति उन्हें समुद्र की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित करती है। 

वन विभाग और पर्यावरण प्रेमियों ने लोगों से अपील की है कि इस संवेदनशील समय में समुद्र तट पर अनावश्यक भीड़ और रोशनी से बचें, ताकि कछुओं की यह प्राकृतिक यात्रा सुरक्षित रह सके।

रामसर साइट कोपरा के पास सकर्रा में प्रस्तावित स्टील प्लांट नहीं लगेगा, कंपनी ने खुद लिया फैसला


बिलासपुर।
जिले के सकरी क्षेत्र में प्रस्तावित स्टील प्लांट परियोजना को लेकर एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। IMAEC स्टील एंड पावर लिमिटेड ने पर्यावरणीय कारणों का हवाला देते हुए अपनी प्रस्तावित ग्रीनफील्ड स्टील प्लांट परियोजना को स्वेच्छा से वापस लेने का निर्णय लिया है। इस संबंध में कंपनी ने छत्तीसगढ़ राज्य वेटलैंड प्राधिकरण को औपचारिक पत्र भेजकर अपने आवेदन को निरस्त करने का अनुरोध किया है।

कंपनी द्वारा 20 अप्रैल 2026 को भेजे गए पत्र के अनुसार, ग्राम सकरी, तहसील सकरी, जिला बिलासपुर में प्रस्तावित इस परियोजना के लिए वेटलैंड NOC हेतु आवेदन प्रस्तुत किया गया था। यह आवेदन 24 मार्च 2026 को संबंधित प्राधिकरण के समक्ष रखा गया था। 

कंपनी ने अपने पत्र में उल्लेख किया है कि परियोजना स्थल के समीप स्थित कोपर्रा जलाशय (रामसर साइट/वेटलैंड क्षेत्र) पर्यावरणीय दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील है। यह क्षेत्र समृद्ध जैव विविधता (फ्लोरा एवं फौना) से भरपूर है और यहां विभिन्न प्रजातियों के पक्षियों का आवागमन होता है।

वन विभाग एवं अन्य संबंधित एजेंसियों से प्राप्त जानकारी के आधार पर यह स्पष्ट हुआ कि इस क्षेत्र का पर्यावरणीय महत्व अत्यधिक है। ऐसे में किसी भी औद्योगिक परियोजना से यहां के पारिस्थितिक संतुलन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

IMAEC स्टील एंड पावर लिमिटेड ने अपने पत्र में कहा है कि वह पर्यावरण संरक्षण के प्रति प्रतिबद्ध है और इसी को ध्यान में रखते हुए कंपनी ने यह निर्णय लिया है। कंपनी ने स्पष्ट किया कि प्रस्तावित स्टील प्लांट (जिसमें DRI किल्न, पावर प्लांट और अन्य सहायक इकाइयां शामिल थीं) को पूरी तरह से वापस लिया जा रहा है।

कंपनी ने यह भी बताया कि पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) के PARIVESH पोर्टल पर प्रस्तुत आवेदन को भी विधिवत वापस ले लिया गया है। कंपनी ने वेटलैंड NOC के लिए दिए गए आवेदन को निरस्त मानते हुए इस संबंध में आगे किसी भी प्रकार की कार्रवाई न करने का अनुरोध किया है।

इस फैसले को पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है। आमतौर पर औद्योगिक परियोजनाओं को लेकर पर्यावरणीय विवाद सामने आते रहते हैं, लेकिन इस मामले में कंपनी द्वारा स्वयं परियोजना वापस लेना एक महत्वपूर्ण संकेत है। 

गौरतलब हो कि कल ही हमने इस आशय को लेकर एक खबर प्रकाशित की थी उसके बाद  यह बड़ा और ऐतिहासिक फैसला लिया गया।  आपको बता दें कि छत्तीसगढ़ की पहली रामसर साइट कोपरा जलाशय एक बार फिर विवादों के केंद्र में थी। प्रस्तावित स्टील एवं पावर प्लांट परियोजना के लिए तैयार इनवायरमेंट इंपैक्ट एसेसमेंट (EIA) रिपोर्ट में कथित तौर पर भ्रामक जानकारी दिए जाने का मामला सामने आया था । इसको लेकर अधिवक्ता संदीप तिवारी एवं वाइल्डलाइफ फोटोजर्नलिस्ट सत्यप्रकाश पांडेय ने गंभीर आपत्ति दर्ज कराई थी। इधर वेटलैंड अथॉरिटी ने बिलासपुर कलेक्टर को पत्र भेजकर दर्ज आपत्ति और शिकायतों की जांच करने कहा था ।  

श्री तिवारी ने वेटलैंड अथॉरिटी को भेजे पत्र में उल्लेख किया है कि EIA रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि परियोजना स्थल के 10 किलोमीटर दायरे में किसी भी वन्यजीव का प्रवासी मार्ग नहीं है। जबकि वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 के अनुसार पक्षियों को भी वन्यजीव की श्रेणी में रखा गया है।

रामसर कन्वेंशन को दी गई आधिकारिक जानकारी के अनुसार कोपरा जलाशय 161 प्रजातियों के पक्षियों का महत्वपूर्ण आवास है। इनमें 58 प्रवासी प्रजातियां शामिल हैं, जो सेंट्रल एशियन फ्लाईवे के माध्यम से हर वर्ष यहां पहुंचती हैं। इनमें पांच अत्यंत संकटग्रस्त प्रजातियां भी हैं।

“रामसर साइट कोपरा पर संकट ? EIA रिपोर्ट में ‘गायब’ हो गए प्रवासी पक्षी !”  

“रामसर साइट कोपरा पर संकट ? EIA रिपोर्ट में ‘गायब’ हो गए प्रवासी पक्षी !”


रायपुर। 
TODAY छत्तीसगढ़  /  छत्तीसगढ़ की पहली रामसर साइट कोपरा जलाशय एक बार फिर विवादों के केंद्र में है। प्रस्तावित स्टील एवं पावर प्लांट परियोजना के लिए तैयार इनवायरमेंट इंपैक्ट एसेसमेंट (EIA) रिपोर्ट में कथित तौर पर भ्रामक जानकारी दिए जाने का मामला सामने आया है। इसको लेकर अधिवक्ता संदीप तिवारी एवं वाइल्डलाइफ फोटोजर्नलिस्ट सत्यप्रकाश पांडेय ने गंभीर आपत्ति दर्ज कराई है। इधर वेटलैंड अथॉरिटी ने बिलासपुर कलेक्टर को पत्र भेजकर दर्ज आपत्ति और शिकायतों की जांच करने कहा है।  

श्री तिवारी ने वेटलैंड अथॉरिटी को भेजे पत्र में उल्लेख किया है कि EIA रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि परियोजना स्थल के 10 किलोमीटर दायरे में किसी भी वन्यजीव का प्रवासी मार्ग नहीं है। जबकि वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 के अनुसार पक्षियों को भी वन्यजीव की श्रेणी में रखा गया है।

रामसर कन्वेंशन को दी गई आधिकारिक जानकारी के अनुसार कोपरा जलाशय 161 प्रजातियों के पक्षियों का महत्वपूर्ण आवास है। इनमें 58 प्रवासी प्रजातियां शामिल हैं, जो सेंट्रल एशियन फ्लाईवे के माध्यम से हर वर्ष यहां पहुंचती हैं। इनमें पांच अत्यंत संकटग्रस्त प्रजातियां भी हैं।

Central Asian Flyway का एक अंतरराष्ट्रीय प्रवासी मार्ग है, जिसके जरिए पक्षी हर साल ठंड के मौसम में उत्तर (साइबेरिया/मध्य एशिया) से भारत जैसे देशों में आते हैं। यह मार्ग पक्षियों के लिए भोजन, विश्राम और जीवित रहने के लिए महत्वपूर्ण आर्द्रभूमियों (जैसे कोपरा जलाशय) पर निर्भर करता है। इसलिए इस मार्ग के किसी भी स्थल को नुकसान पहुंचाना प्रवासी पक्षियों और पूरे पारिस्थितिक तंत्र पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है।

श्री तिवारी का कहना है कि रिपोर्ट में सेंट्रल एशियन फ्लाईवे के महत्व को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया है। उन्होंने मांग की है कि भ्रामक एवं अपूर्ण जानकारी के आधार पर तैयार EIA रिपोर्ट को निरस्त किया जाए तथा एक स्वतंत्र एवं वैज्ञानिक अध्ययन कराया जाए, जिसमें परियोजना के समग्र पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन हो।

वेटलैंड अथॉरिटी द्वारा मामले को कलेक्टर बिलासपुर को भेजे जाने पर भी आपत्ति जताई गई है। तिवारी का कहना है कि रामसर से संबंधित तकनीकी जानकारी वेटलैंड अथॉरिटी के पास उपलब्ध है, ऐसे में इसकी जांच भी उसी स्तर पर की जानी चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि जिला प्रशासन इस प्रकार के जटिल पर्यावरणीय मुद्दे का तकनीकी परीक्षण कैसे कर पाएगा। 

इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन को लेकर बहस तेज कर दी है। एक ओर औद्योगिक परियोजनाओं के माध्यम से आर्थिक विकास की बात कही जा रही है, वहीं दूसरी ओर जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर चिंता व्यक्त की जा रही है। 

पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि रामसर साइट जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में किसी भी परियोजना को स्वीकृति देने से पहले अत्यंत सावधानी बरतना आवश्यक है। यदि प्रवासी पक्षियों के मार्ग और आवास प्रभावित होते हैं, तो इसका असर केवल स्थानीय नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी देखने को मिल सकता है।

कोपरा जलाशय का मामला केवल एक परियोजना का नहीं, बल्कि नीति और प्राथमिकताओं का सवाल है। यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संरक्षित वेटलैंड भी सटीक जानकारी और जिम्मेदारी के अभाव में खतरे में पड़ जाएं, तो यह बेहद चिंताजनक स्थिति है। आवश्यक है कि संबंधित एजेंसियां पारदर्शिता और वैज्ञानिक आधार पर निर्णय लें, ताकि विकास के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण भी सुनिश्चित हो सके।

माहुल: एक वृक्ष का संकट; आजीविका, पर्यावरण और परंपरा—तीनों पर खतरा


बिलासपुर।
  TODAY छत्तीसगढ़  /  छत्तीसगढ़ के जंगलों में जीवन और आजीविका का आधार रहे ‘माहुल’ वृक्ष पर अब अस्तित्व का संकट गहरा गया है। अंतरराष्ट्रीय संस्था IUCN ने इसे अपनी रेड डेटा बुक में सर्वाधिक संकटग्रस्त (Critically Endangered) प्रजाति के रूप में दर्ज किया है। यह खुलासा न केवल पर्यावरणविदों, बल्कि उन हजारों परिवारों के लिए भी चिंता का विषय बन गया है, जिनकी रोजी-रोटी इस वृक्ष पर निर्भर है। 

वन अनुसंधानों में सामने आया है कि पौधरोपण के प्रति अनिच्छा, जंगलों की अंधाधुंध कटाई, संरक्षण की अनदेखी और इसके बीजों का समुचित उपयोग न होना जैसे कारणों से माहुल तेजी से विलुप्ति की कगार पर पहुंच गया है। यह स्थिति इसलिए भी गंभीर है क्योंकि ‘माहुल परिवार’ का प्रमुख वृक्ष पलाश पहले ही इसी तरह के संकट से गुजर रहा है। 

माहुल की पत्तियां ग्रामीण और आदिवासी अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती हैं। दोना-पत्तल निर्माण, छप्पर और घरेलू उपयोग, बीजों से औषधि निर्माण और जड़ों से पारंपरिक दवाइयां बनाई जाती रही हैं। ग्रामीण जनजीवन और कुछ शहरी क्षेत्र के हजारों परिवारों का जीवनयापन 'माहुल' से जुड़ा हुआ है।

सबसे आश्चर्य और हैरत की बात यह है कि यह हर जमीन पर उगने वाला ‘जीवन वृक्ष’ है। माहुल की खासियत यह है कि यह लगभग हर प्रकार की भूमि में उग सकता है जिसकी ऊंचाई 10–30 मीटर तक हो सकती है । यह वृक्ष मिट्टी के कटाव को रोकता है साथ ही पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखता है। इसके अलावा बेल और वृक्ष की छाल से रस्सी, तने से टोकरी व चटाई और पत्तियों से पर्यावरण अनुकूल उत्पाद तैयार किए जाते हैं। ऐसे में यह सिर्फ एक पेड़ का संकट नहीं है बल्कि यह उस पूरी जीवन-श्रृंखला का संकट है, जो इससे जुड़ी हुई है। 


हाथियों के परिवार का भावुक दृश्य वायरल, IAS सुप्रिया साहू ने साझा किया वीडियो


दिल्ली।
 TODAY छत्तीसगढ़  /  आईएएस सुप्रिया साहू ने अपने X हैंडल पर इस वीडियो को ट्वीट करते हुए लिखा है कि तमिलनाडु के अनामलाई टाइगर रिज़र्व के गहरे जंगलों में हाथियों का एक प्यारा परिवार सो रहा है—एक ऐसा अद्भुत पल जो कैमरे में कैद हो गया। हाथी का बच्चा बड़े हाथी के ऊपर अपना पैर धीरे से रखता है, मानो वह उससे आराम, सुरक्षा और प्यार चाहता हो। हाथियों की दुनिया में, परिवार ही सब कुछ होता है। और उनके चारों ओर जंगल खामोश, सुरक्षा देने वाला और शाश्वत रूप से खड़ा है—ठीक उस पालने की तरह जो जीवन को अपनी गोद में थामे रहता है। 'अंतर्राष्ट्रीय वन दिवस' के इस अवसर पर, यह कोमल दृश्य हमें एक सीधी-सादी सच्चाई की याद दिलाता है: अगर जंगल नहीं होंगे, तो कुछ भी नहीं बचेगा। बिल्कुल कुछ भी नहीं। जंगलों के बिना, यह दुनिया और भी गरीब, कठोर और सूनी हो जाएगी। हाथियों के लिए, वन्यजीवों के लिए, नदियों के लिए और इंसानों के लिए—जंगल ही जीवन हैं। अद्भुत तस्वीर  
अंतर्राष्ट्रीय वन दिवस के अवसर पर साझा किए गए इस वीडियो के जरिए उन्होंने जंगलों के संरक्षण का संदेश भी दिया। उन्होंने कहा कि यदि जंगल नहीं रहेंगे तो न केवल वन्यजीव बल्कि इंसानों का अस्तित्व भी संकट में पड़ जाएगा। जंगल ही जीवन का आधार हैं।

ATR: जब जंगल में बाघ मरा और व्यवस्था खामोश रही


बिलासपुर।
  TODAY छत्तीसगढ़  /  आज 26 जनवरी को छत्तीसगढ़ के अचानकमार टाइगर रिज़र्व से आई एक ख़बर ने केवल वन्यजीव प्रेमियों को नहीं, बल्कि लोकतंत्र में जवाबदेही पर भरोसा रखने वाले हर नागरिक को असहज कर दिया। जंगल के भीतर एक युवा नर बाघ मृत पाया गया। आधिकारिक बयान आया, मौत दो बाघों के बीच आपसी संघर्ष का नतीजा है। फ़ाइलें चलीं, पोस्टमार्टम हुआ, रिपोर्ट बनी और मामला लगभग बंद मान लिया गया है। गणतंत्र दिवस के मौके पर आज जब तिरंगे के नीचे संविधान की शपथ दोहराई जा रही थी, उसी देश के चर्चित जंगल अचानकमार टाईगर रिजर्व में एक राष्ट्रीय पशु चुपचाप सड़ता रहा और जब उसकी मौत का सच सामने आया, तब जवाबों से ज़्यादा बचाव के बयान सामने आए। 

छत्तीसगढ़ के अचानकमार टाइगर रिज़र्व में एक युवा नर बाघ की मौत को वन विभाग ने दो बाघों के बीच हुए आपसी संघर्ष का परिणाम बताया है। घटना 25 जनवरी 2026 को अचानकमार परिक्षेत्र के सारसडोल क्षेत्र अंतर्गत कुडेरापानी परिसर की बताई गई है, जहाँ नियमित पेट्रोलिंग के दौरान सुरक्षा बलों ने बाघ का शव देखा। सूचना मिलते ही वन विभाग की टीम ने इलाके को सुरक्षित कर लिया और वरिष्ठ अधिकारियों को जानकारी दी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के निष्कर्षों के आधार पर यह दावा तकनीकी रूप से संभव भी है। बाघों के बीच क्षेत्रीय द्वंद्व प्राकृतिक व्यवहार का हिस्सा होता है और देश के कई संरक्षित इलाकों में ऐसी घटनाएँ दर्ज की गई हैं। लेकिन लोकतंत्र में ओप-एड का दायित्व केवल आधिकारिक निष्कर्ष दोहराना नहीं, बल्कि उन प्रश्नों को सामने लाना है जो सरकारी बयान के दायरे से बाहर रह जाते हैं। अचानकमार की यह घटना भी ऐसी ही है जहाँ मौत से ज़्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है, मौत के बाद का प्रबंधन।

विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, जिस बाघ का शव 26 जनवरी को पाया गया, उसकी मौत संभवतः कई दिन पहले हो चुकी थी। शव की स्थिति और इलाके में फैली दुर्गंध इस ओर संकेत करती है कि घटना और उसकी पहचान के बीच समय का अंतर था। अगर यह सही है, तो सवाल बाघ की मौत के कारण पर नहीं, बल्कि निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर उठता है। 

यहाँ बताना लाज़िमी होगा कि कुछ दिन पहले ही अचानकमार टाईगर रिजर्व क्षेत्र में बाघ गड़ना के लिये लगाये गये ट्रैप कैमरों में से दो ट्रैप कैमरों की मेमोरी चिप चोरी हो गई थी। यह घटना साधारण चोरी नहीं कही जा सकती। कैमरा ट्रैप को खोलना और उसमें से डेटा निकालना तकनीकी जानकारी की माँग करता है। मतलब साफ़ है, प्रतिबंधित क्षेत्र में लगाये गये कैमरों से चिप चोरी करने वाला अज्ञात शख़्स उन कैमरों को आपरेट करने की तकनीकि से वाकिफ है। अब यहां यह सवाल अनिवार्य हो जाता है कि चोरी किसने की ? क्या यह किसी बाहरी शिकारी का काम था या आंतरिक मिलीभगत ? और क्या इस मामले में आपराधिक जांच को प्राथमिकता दी गई ? ऐसे में जब निगरानी उपकरण ही निष्क्रिय कर दिए जाएँ, तो किसी भी संरक्षण दावे की विश्वसनीयता कमजोर पड़ जाती है। 

अचानकमार टाइगर रिज़र्व सालों से विवादों में रहा है। बाघ की मौत, ट्रैप कैमरों से डेटा कार्ड की चोरी के कुछ समय पहले ही कोर क्षेत्र में प्रभावशाली युवकों की मौजूदगी का एक वीडियो सामने आया था, उस वीडियो ने एटीआर प्रबंधन की लाचारी और अव्यवस्था की कलई खोलकर रख दी। सियासत, प्रभावशाली लोगों के सामने एटीआर प्रबंधन कितना बौना है और जंगल कितना असुरक्षित यह बात उस वीडियो से उजागर हुई। इस जंगल में कानून और नियम सभी के लिए समान रूप से लागू नहीं हैं। जहाँ स्थानीय समुदायों पर कड़े प्रतिबंध लागू होते हैं, वहीं रसूखदारों की घुसपैठ पर अक्सर नरमी दिखाई देती है। यह दोहरा मापदंड न केवल संरक्षण प्रयासों को कमजोर करता है, बल्कि स्थानीय लोगों के बीच व्यवस्था के प्रति अविश्वास भी पैदा करता है।

भारत में बाघ संरक्षण को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक सफलता के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है। बाघों की संख्या में वृद्धि, नए रिज़र्व की घोषणा और पर्यटन के आँकड़े ये सब सकारात्मक संकेत हैं। लेकिन संरक्षण केवल संख्या का खेल नहीं है। एटीआर में अगर बाघों की संख्या बढ़ रही है, तो निगरानी और सुरक्षा भी उसी अनुपात में मज़बूत होनी चाहिए। अचानकमार की ये तमाम घटनायें यह याद दिलाती है कि काग़ज़ी उपलब्धियाँ ज़मीनी हकीकत की जगह नहीं ले सकतीं। 

बंजर में जीवन की आहट: मोहनभाठा में इंडियन कोर्सर की वापसी


बिलासपुर।
 TODAY छत्तीसगढ़  /  कभी-कभी धरती बहुत धीमी आवाज़ में बोलती है। इतनी धीमी कि अगर सुनने का धैर्य न हो, तो वह आवाज़ खो जाती है। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले का मोहनभाठा भी ऐसी ही एक आवाज़ है सूखी, बंजर और उपेक्षित, लेकिन भीतर ही भीतर जीवन से भरी हुई। सवा साल के लंबे इंतज़ार के बाद 18 जनवरी को जब यहाँ एक बार फिर इंडियन कोर्सर (Indian Courser) दिखाई पड़ा, तो लगा जैसे इस ज़मीन ने खुद कहा हो 'मैं अब भी ज़िंदा हूँ।' 

"वह आता है, दौड़ता है और बिना कोई निशान छोड़े ओझल हो जाता है। लेकिन उसकी मौजूदगी बहुत कुछ कह जाती है।"

तेज़ चाल, सतर्क स्वभाव और खुले, शुष्क मैदानों से गहरे रिश्ते वाला यह दुर्लभ परिंदा कल शाम जब मोहनभाठा में अपनी ज़मीन तलाशता दिखाई देता है, तो यह महज़ एक पक्षी का दिखना नहीं बल्कि एक पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के जीवित होने का संकेत होता है। कल तीन कौरसरों का मोहनभाठा में दिखना इस बात का प्रमाण है कि तमाम दबावों के बावजूद यह मैदान अब भी उन्हें बुला रहा है। मध्यम आकार का, पतले शरीर और लंबी टाँगों वाला इंडियन कोर्सर (Indian Courser) उड़ने से ज़्यादा दौड़कर चलता है। 

"उन तस्वीरों में सिर्फ़ अंडे नहीं थे वे भरोसे की निशानी थीं। भरोसा कि यह ज़मीन सुरक्षित है, भरोसा कि यहीं अगली पीढ़ी जन्म ले सकती है।"

इन ख़ास पक्षियों को लेकर सबसे चौकाने वाली बात करीब दो बरस पहले सामने आई। बिलासपुर के दो नामचीन पक्षी प्रेमी और फोटोग्राफर संदीपन अधिकारी, राधाकिशन शर्मा ने इंडियन कोर्सर (Indian Courser) के अंडे की तस्वीरें दर्ज कीं। यह महज़ फ़ोटोग्राफ़ी नहीं थी यह ठोस प्रमाण था कि मोहनभाठा की बंजर भूमि उन्हें केवल भाती ही नहीं, बल्कि यहीं वे अपनी अगली पीढ़ी को भी बढ़ा रहे हैं। कुछ फ़ोटोग्राफ़रों के पास इनके चूजों की तस्वीरें होना इस विश्वास को और मज़बूत करता है कि यह मैदान एक सक्रिय प्रजनन स्थल है।

मोहनभाठा की पहचान उसकी जैव-विविधता है। यहाँ शेड्यूल–I से लेकर IV तक के पक्षी, जीव-जंतु और वन्यप्राणी समय-समय पर दिखाई देते हैं। बारिश के मौसम में यह क्षेत्र कई दुर्लभ प्रजाति के प्रवासी पक्षियों के ठहराव का बड़ा केंद्र बन जाता है। सबसे संकटग्रस्त श्रेणी में शामिल इजिप्शन वल्चर का हर साल परिवार के साथ यहां दिखाई देना बताता है कि आसपास कहीं उनका रहवास मौजूद है। ऐसे संकेत किसी भी इलाके के पारिस्थितिक स्वास्थ्य का पैमाना होते हैं। 

इंडियन कोर्सर की वापसी हमें खुश करती है, लेकिन साथ ही सवाल भी पूछती है क्या यह ज़मीन आने वाले वर्षों में भी उसे स्वीकार कर पाएगी ? इंडियन कोर्सर जैसे पक्षी संकेतक होते हैं। वे बताते हैं कि प्रकृति अब भी हमें एक मौका दे रही है। 

लेकिन यही समृद्धि आज खतरे में है। मोहनभाठा जो कभी पक्षी प्रेमियों के लिए स्वर्ग समान था अब अवैध भूमि अधिग्रहण, शिकारियों की बेख़ौफ़ आवाजाही, मुरूम के अवैध उत्खनन, पेड़ों की कटाई और असामाजिक तत्वों की पनाहगाह बनता जा रहा है। प्रशासनिक उदासीनता और जिम्मेदार विभागों की अनदेखी ने इस चारागाह को सिमटने की कगार पर ला खड़ा किया है।

इंडियन कोर्सर की वापसी जितनी सुखद है, उतनी ही चेतावनी भी। यह बताती है कि अगर संरक्षण की ठोस पहल नहीं हुई, तो यह जीवन-रेखा टूट सकती है। घास भूमियाँ अक्सर “बंजर” कहकर नज़रअंदाज़ कर दी जाती हैं, जबकि यही मैदान दुर्लभ प्रजातियों का आधार होते हैं। कौरसर जैसे संकेतक पक्षी हमें बताते हैं कि प्रकृति कहाँ तक सहन कर सकती है और कहाँ नहीं। 

मोहनभाठा के संरक्षण की मुहिम जारी रहनी चाहिए क्योंकि मैदान बचेंगे, तभी परिंदे लौटेंगे; और परिंदे लौटेंगे, तभी उम्मीदें जिंदा रहेंगी।

मोहनभाठा को बचाना केवल एक मैदान को बचाना नहीं, बल्कि उस विरासत को संभालना है जो आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवन का सबक बन सकती है। जब तक इंडियन कोर्सर (Indian Courser) जैसे पक्षी यहाँ दौड़ते रहेंगें, तब तक यह धरती ज़िंदा है। इसके संरक्षण की मुहिम जारी रहनी चाहिए क्योंकि मैदान बचेंगे, तभी परिंदे लौटेंगे; और परिंदे लौटेंगे, तभी उम्मीदें जिंदा रहेंगी।

ATR रिज़र्व या रियासत ? अचानकमार की अंदरूनी कहानी


बिलासपुर।
 TODAY छत्तीसगढ़  / छत्तीसगढ़ का अचानकमार टाइगर रिज़र्व केवल बाघों का आवास नहीं है, यह राज्य की वन-नीति, प्रशासनिक ईमानदारी और सरकार की नीयत का जीवित प्रमाण होना चाहिए था लेकिन आज एटीआर जिस हालत में खड़ा है, वह बताता है कि यहाँ संरक्षण नहीं, संरक्षण का नाटक चल रहा है; क़ानून नहीं, रसूख़ सर्वोपरि है। 2009 में टाइगर रिज़र्व घोषित होने के बाद से एटीआर लगातार विवादों में रहा है। कभी बाघों की संख्या को लेकर संदेह, तो कभी अफसरों की लापरवाही। लेकिन हालिया घटनाएँ यह स्पष्ट कर देती हैं कि समस्या अब केवल प्रशासनिक अक्षमता की नहीं, बल्कि सिस्टमेटिक मिलीभगत की है।

कोर एरिया में निजी वाहन, राइफल, खुलेआम फायरिंग, आग जलाना और घंटों तक बेरोक-टोक घूमना ये सब किसी आम नागरिक के लिए असंभव है। यह सब तभी संभव है, जब नीचे से ऊपर तक संरक्षण और शह मौजूद हो। 

लोरमी क्षेत्र के रसूख़दार युवकों का मामला इसी सच्चाई को उजागर करता है। उनका आत्मविश्वास बताता है कि उन्हें न पकड़े जाने का डर था, न कार्रवाई का। क्योंकि अनुभव से वे जानते थे यह जंगल काग़ज़ों में संरक्षित है, हक़ीक़त में नहीं। चूँकि उनका ही बनाया हुआ वीडियो जब सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तो अफसरों को कार्रवाही की प्रक्रिया शुरू करनी पड़ी। विभागीय ढोल में पोल होने के बाद उन युवकों को पकड़ा गया और जेल भेज दिया गया। अब मामला न्यायालयीन व्यवस्था और प्रक्रिया के बीच है। 

वायरल वीडियो को देखकर कहना गलत नहीं होगा कि जमुनाही, सुरही और कंचनपुर जैसे कई बैरियर वन-सुरक्षा के प्रतीक नहीं, बल्कि अब रसूख़दारों के लिए स्वागत द्वार बन चुके हैं। बिना पूछताछ, बिना तलाशी, बिना अनुमति बैरियर उठते चले जाते हैं। सवाल यह नहीं कि गार्ड ने बैरियर क्यों उठाया, सवाल यह है कि गार्ड को यह भरोसा किसने दिया कि उससे कोई सवाल नहीं होगा ? 

जब मामला सामने आया, तब जो हुआ वह और भी चिंताजनक है। फील्ड डायरेक्टर छुट्टी का हवाला देते हैं, डिप्टी डायरेक्टर और रेंज अफसर फोन बंद रखते हैं, और सहायक संचालक “नंबर देने से मना है” कहकर कॉल काट देते हैं। यह केवल गैर-जिम्मेदारी नहीं, यह जांच से बचने की सोची-समझी रणनीति है।

यह मानना भोलापन ही होगा कि सरकार को इन हालात की जानकारी नहीं है। सवाल यह है कि जानते हुए भी चुप क्यों है? क्या इसलिए कि आरोपी “प्रभावशाली” हैं ? क्या इसलिए कि कार्रवाई करने से राजनीतिक असुविधा होगी ? अगर ऐसा है, तो सरकार को साफ़ कहना चाहिए कि उसके लिए जंगल, बाघ और क़ानून तीनों से ऊपर रसूख़, राजनैतिक प्रभाव है। 

आज एटीआर में बाघों की संख्या बढ़ने के दावे किए जाते हैं, लेकिन जब कोर एरिया में राइफलें गरजें, आग जले और अफसर आंखें मूंद लें तो ये आंकड़े सिर्फ़ प्रेस रिलीज़ बनकर रह जाते हैं। बाघ केवल शिकारी से नहीं मरता, वह प्रशासनिक लापरवाही और राजनीतिक संरक्षण से भी मरता है। कईयों सवाल हैं जैसे, कोर एरिया में निजी हथियारों को ले जाने की अनुमति किसने दी ? बैरियर पर तैनात कर्मचारियों ने किसके निर्देश पर बिना जांच रास्ता खोला ? प्रतिबंधित क्षेत्र में 3–4 घंटे तक मौज मस्ती, फायरिंग और आगजनी की जानकारी वरिष्ठ अफसरों तक क्यों नहीं पहुँची या जानबूझकर पहुँचने नहीं दी गई ? और सबसे बड़ा सवाल, क्या इस मामले में सिर्फ़ राजनैतिक और रसूख़दार युवक ही दोषी हैं या पूरा सिस्टम ? 

यहां का हालिया घटनाक्रम यह दर्शाता है कि एटीआर में कानून, नियम और संरक्षण की अवधारणा गंभीर रूप से कमजोर हुई है। स्थिति ऐसी बन चुकी है कि यह मामला अब प्रशासनिक चूक का नहीं, बल्कि संवैधानिक कर्तव्यों के उल्लंघन और सार्वजनिक संसाधनों की अवैध लूट का बनता जा रहा है जिस पर न्यायिक हस्तक्षेप जरूरी है।

 उपलब्ध वीडियो साक्ष्यों के अनुसार न केवल वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की धारा 27, 28 एवं 38-V का उल्लंघन है, बल्कि नेशनल टाइगर कंज़र्वेशन अथॉरिटी (NTCA) की गाइडलाइंस का भी सीधा अपमान है।

अब तो ऐसा लगता है अचानकमार टाइगर रिज़र्व आज बाघों से ज़्यादा सिस्टम के शिकंजे में फंसा हुआ है। अगर अब भी जिम्मेदार अफसरों पर सख़्त कार्रवाई नहीं होती, अगर राजनीतिक संरक्षण पर पर्दा नहीं उठता तो यह मान लेना चाहिए कि यह जंगल संरक्षण नहीं, बल्कि सत्ता-संरक्षित अराजकता का इलाका बन चुका है। ऐसे हालात में इतिहास यही दर्ज करेगा कि बाघ जंगल में नहीं मरे, उन्हें सिस्टम ने मारा है। 

आसमान की शहजादियां: Amur falcon ने 6 दिन में मणिपुर से केन्या तक रिकॉर्ड उड़ान भरी


नई दिल्ली।
 TODAY छत्तीसगढ़  /  मणिपुर के घने जंगलों से सैटेलाइट टैग के जरिये निगरानी में रखे गए तीन अमूर फाल्कन ने इस साल फिर ऐसा कमाल कर दिखाया है, जिसने दुनिया भर के पक्षी वैज्ञानिकों को हैरत में डाल दिया है। महज 150 ग्राम वज़न वाले इन छोटे परिंदों ने कुछ ही दिनों में महाद्वीप पार कर अविश्वसनीय दूरी तय की है।

सबसे आगे रही ‘अपापंग’, जिसे नारंगी टैग लगाया गया है। इस नन्ही योद्धा ने पूर्वोत्तर भारत से उड़ान भरकर महज 6 दिन 8 घंटे में 6,100 किलोमीटर की नॉन-स्टॉप यात्रा पूरी की। भारत के पूर्वी पहाड़ों से लेकर प्रायद्वीपीय भारत, अरब सागर और हॉर्न ऑफ़ अफ्रीका को पार करते हुए उसने केन्या में लैंड किया। वैज्ञानिकों के मुताबिक इतनी लंबी निर्बाध उड़ान किसी छोटे शिकारी पक्षी के लिए लगभग असंभव मानी जाती है।

पीछे-पीछे पहुंची ‘अलांग’, जिसे पीला टैग मिला है और जो इन तीनों में सबसे कम उम्र की है। उसने 5,600 किलोमीटर की दूरी 6 दिन 14 घंटे में तय की। रास्ते में उसने एक रात तेलंगाना में बिताई और महाराष्ट्र में लगभग तीन घंटे का छोटा विश्राम लेकर दोबारा समुद्र पार करने उड़ चली। पहली बार लंबी दूरी की यात्रा करने वाली अलांग की सहनशक्ति ने विशेषज्ञों को भी चौंका दिया है। आखिरकार वह भी केन्या पहुंच गई।

तीसरी सदस्य ‘अहू’ (लाल टैग) ने थोड़ा उत्तरी रास्ता चुना और अरब सागर के पार जाने से पहले पश्चिमी बांग्लादेश में रणनीतिक ठहराव लिया। उसने अब तक 5,100 किलोमीटर की उड़ान 5 दिन 14 घंटे में पूरी कर ली है और इस समय सोमालिया के उत्तरी सिरे पर रुकी हुई है। अनुमान है कि वह जल्द ही अपने साथियों से केन्या के प्रसिद्ध Tsavo National Park में आ मिलेगी, जहां ये पक्षी हर साल रुकते हैं।

अमूर फाल्कन को यूँ ही “टाइनी लॉन्ग-डिस्टेंस वॉयेजर” नहीं कहा जाता। भारत से पूर्वी अफ्रीका तक इनका सालाना प्रवास, जिसमें वे सागर, रेगिस्तान और निर्जन इलाकों को पार करती हैं, दुनिया भर के पक्षी प्रेमियों और संरक्षणवादियों को लगातार प्रेरित करता है। इनकी ये यात्राएं बताती हैं कि महाद्वीपों को जोड़ने वाली प्राकृतिक प्रवासी मार्गों की रक्षा कितनी ज़रूरी है।



मैकू मठ का टूटा शिलालेख: जंगल की स्मृति पर प्रहार और समाज के टूटते विवेक का आईना


बिलासपुर। 
TODAY छत्तीसगढ़  / अचानकमार टाइगर रिज़र्व (ATR) के कोर ज़ोन में स्थित ऐतिहासिक मेकू मठ सिर्फ पत्थरों का ढेर नहीं है—यह जंगल, वन्यजीवन और उन लोगों के साहस का मौन स्मारक है, जिन्होंने इस कठिन भौगोलिक क्षेत्र में अपनी जान जोखिम में डालकर काम किया। लेकिन हाल ही में इस स्मारक के शिलालेख को तोड़ दिया गया। यह केवल एक पत्थर तोड़ने की घटना नहीं, बल्कि इतिहास, स्मृति और संवेदनशीलता पर किया गया असंवेदनशील प्रहार है।

एक शहीद वनरक्षक की विरासत

मेकू गोंड, बिंदावल वन ग्राम के एक फायर वॉचर थे—सीमित संसाधनों के बीच जंगल की रक्षा करने वाले उन अनेक अज्ञात नायकों में से एक। 10 अप्रैल 1949 को वह आदमखोर बाघिन का शिकार बने। वन विभाग ने कार्रवाई की और 13 अप्रैल 1949 को कोटा परिक्षेत्र के रेंजर एम. डब्ल्यू. के. खोखर ने उस बाघिन का सफाया किया। इस घटना की याद में यहाँ स्मारक बनाया गया। समय के साथ दूसरा स्मारक भी खड़ा किया गया। लेकिन अब नए मठ का शिलालेख किसी ने तोड़ दिया—यह कृत्य सिर्फ गलत ही नहीं, बल्कि बेहद दुखद और चिंताजनक भी है।  

कोर ज़ोन में हुई शरारत: गंभीर प्रश्नों को जन्म

यह क्षेत्र सामान्य नहीं है। अचानकमार टाईगर रिजर्व क्षेत्र का यह कोर ज़ोन है, जहाँ आज भी बाघों की उपस्थिति दर्ज की जाती है। ऐसे सुरक्षित क्षेत्र में किसी का घुसकर शिलालेख तोड़ देना सुरक्षा व्यवस्था और संवेदनशीलता दोनों पर प्रश्नचिह्न लगाता है। क्या यह महज शरारत है, या स्मारकों से असम्मान का बढ़ता चलन ? 

स्मारक—इतिहास का संरक्षक

एक समाज तभी सभ्य माना जाता है जब वह अपने इतिहास, अपने नायकों और अपनी विरासत को संजोकर रखे। मेकू मठ का शिलालेख केवल पत्थर नहीं था। वह उस व्यक्ति के साहस का प्रतीक था, जिसने वन की रक्षा करते हुए अपना जीवन आहुति कर दिया। उस स्मृति को नष्ट करना न केवल अपराध है, बल्कि हमारे सामाजिक विवेक पर भी गहरा धब्बा है। ऐसा कृत्य किसी ‘शैतानी दिमाग’ की उपज है और इससे कठोर संदेश जाना चाहिए कि इतिहास और संरक्षित क्षेत्रों से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। वन विभाग और स्थानीय प्रशासन को इस मामले को गंभीरता से लेना चाहिए, दोषियों की पहचान करके उन्हें दंडित करना चाहिए। 


टाइगर सफारी पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त रोक, सिंघवी ने फैसले को वन्यजीव संरक्षण का टर्निंग पॉइंट बताया


 रायपुर। 
TODAY छत्तीसगढ़  / सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने सोमवार 17 नवम्बर 2025 को पारित ऐतिहासिक निर्णय में देशभर के टाइगर रिज़र्व प्रबंधन, वन प्रशासन और मानव–वन्यजीव संघर्ष से जुड़े मुआवज़ा ढांचे में व्यापक बदलाव की दिशा तय कर दी है। इस निर्णय ने राज्यों पर तत्काल प्रभाव से कई महत्त्वपूर्ण सुधार लागू करने की जिम्मेदारी भी डाली है।

रायपुर निवासी वन्यजीव प्रेमी नितिन सिंघवी ने इस फैसले को “वन्यजीव संरक्षण का टर्निंग पॉइंट” बताते हुए मुख्य सचिव एवं अतिरिक्त मुख्य सचिव (वन एवं जलवायु परिवर्तन) को पत्र लिखकर आदेश के तत्काल क्रियान्वयन की माँग की है।

कोर और क्रिटिकल हैबिटेट में टाइगर सफारी पर पूर्ण प्रतिबंध

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कोर क्षेत्र और क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट में किसी भी प्रकार की टाइगर सफारी संचालित नहीं की जा सकती। बफ़र क्षेत्र में सफारी की अनुमति भी तभी होगी जब भूमि गैर-वन अथवा अविकसित/अवक्रमित वन भूमि हो और वह किसी टाइगर कॉरिडोर का हिस्सा न हो। वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार यह निर्णय बाघ संरक्षण और प्राकृतिक आवागमन को सुरक्षित बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

मानव–वन्यजीव संघर्ष को ‘प्राकृतिक आपदा’ घोषित करने का निर्देश

अदालत ने सभी राज्यों से मानव–वन्यजीव संघर्ष को ‘प्राकृतिक आपदा’ घोषित करने पर तत्काल प्रभाव से कदम उठाने को कहा है। ऐसे मामलों में हर मानव मृत्यु पर 10 लाख रुपये का अनिवार्य एक्स-ग्रेशिया भुगतान किया जाएगा। यह प्रावधान विशेष रूप से हाथियों से प्रभावित क्षेत्रों के लिए राहतकारी माना जा रहा है।

टाइगर रिज़र्व प्रबंधन में सुधारों पर जोर

सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि सभी राज्य सरकारें छह महीनों के भीतर टाइगर कंज़र्वेशन प्लान (TCP) तैयार करें। इसके साथ ही—

O टाइगर रिज़र्वों में लम्बे समय से खाली पड़े पदों को शीघ्र भरा जाए,

O वेटरिनरी डॉक्टर और वाइल्डलाइफ़ बायोलॉजिस्ट के लिए अलग कैडर बनाया जाए, ताकि फील्ड स्तर पर वैज्ञानिक और पेशेवर संरक्षण कार्यों को गति मिल सके।

O फ्रंटलाइन वनकर्मियों के लिए बीमा और सुरक्षा कवच

ड्यूटी के दौरान मृत्यु या पूर्ण विकलांगता की स्थिति में किसी भी वन कर्मी अथवा दैनिक वेतनभोगी को अनिवार्य बीमा कवर प्रदान करने का आदेश दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने सभी फील्ड स्टाफ को आयुष्मान भारत योजना में शामिल करने को भी अनिवार्य किया है।

MSP आधारित फसल मुआवज़े की माँग हुई तेज

अदालत ने राज्यों को फसल क्षति सहित मानव और मवेशियों की मृत्यु के मामलों में सरल एवं समावेशी मुआवज़ा नीति लागू करने की सलाह दी है। इसके बाद छत्तीसगढ़ में वन्यजीव प्रेमियों और सामाजिक संगठनों ने फसल क्षति मुआवज़ा MSP के आधार पर निर्धारित करने की माँग तेज कर दी है।

वर्तमान में धान की क्षति पर मात्र ₹9,000 प्रति एकड़ मुआवज़ा मिलता है, जबकि किसान को सामान्य परिस्थितियों में लगभग ₹65,000 प्रति एकड़ की प्राप्ति होती है। वन्यजीव संरक्षण से जुड़े कार्यकर्ताओं का कहना है कि न्यूनतम मुआवज़े के कारण किसान फसल बचाने खेतों में जाने को मजबूर होते हैं, जहाँ हाथियों से आमने-सामने की घटनाओं में जान का जोखिम बना रहता है।

रायपुर स्थित वन्यजीव प्रेमी नितिन सिंघवी ने मुख्य सचिव और अतिरिक्त मुख्य सचिव (वन एवं जलवायु परिवर्तन) को भेजे पत्र में कहा है कि MSP आधारित मुआवज़ा लागू होने से किसान खेतों की सुरक्षा के लिए रात में जाने को विवश नहीं होंगे, जिससे संघर्ष की घटनाएँ भी कम होंगी और सरकार का आर्थिक बोझ भी अनावश्यक रूप से नहीं बढ़ेगा। यह आदेश राज्यों के लिए वन्यजीव संरक्षण और मानव सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में तत्काल और निर्णायक कदम उठाने का अवसर प्रदान करता है।

Supreme Court: मानव–वन्यजीव संघर्ष को ‘प्राकृतिक आपदा’ मानने पर राज्यों से विचार करने को कहा, टाइगर सफारी पर कड़े निर्देश


नई दिल्ली। 
TODAY छत्तीसगढ़  /  सुप्रीम कोर्ट ने मानव–वन्यजीव संघर्ष के बढ़ते मामलों पर चिंता जताते हुए सोमवार को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। अदालत ने सभी राज्य सरकारों को निर्देश दिया है कि वे ऐसे मामलों को ‘प्राकृतिक आपदा’ घोषित करने पर गंभीरता से विचार करें, ताकि पीड़ितों को त्वरित राहत मिल सके। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसी घटनाओं में अगर किसी व्यक्ति की मौत होती है, तो परिजनों को 10 लाख रुपये का अनिवार्य मुआवजा दिया जाएगा।

मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि यह मुआवजा पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की सीएसएस–आईडब्ल्यूडीएच योजना के तहत तय मानकों के मुताबिक होगा। अदालत ने राज्यों को यह भी सुनिश्चित करने को कहा कि मुआवजा प्रक्रिया सरल, सुलभ और समयबद्ध हो।

टाइगर सफारी पर कड़े निर्देश

अदालत ने बाघ संरक्षण से जुड़े मामलों पर भी विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि कोर या सघन बाघ आवास क्षेत्रों में टाइगर सफारी की अनुमति नहीं दी जा सकती। सफारी सिर्फ बफर ज़ोन में ऐसी बंजर या गैर-वन भूमि पर स्थापित की जा सकेगी, जो बाघ गलियारे के दायरे में न आती हो। इसके साथ ही सफारी चलाने वालों को अनिवार्य रूप से एक रिस्क्यू और रिहैबिलिटेशन सेंटर भी संचालित करना होगा।

कॉर्बेट टाइगर रिज़र्व पर सख्त रुख

उत्तराखंड के कॉर्बेट टाइगर रिज़र्व में कथित अवैध निर्माण और बड़े पैमाने पर पेड़ कटाई की शिकायतों पर गठित विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट को कोर्ट ने स्वीकार कर लिया। राज्य सरकार को तीन महीनों के भीतर सभी अवैध संरचनाएँ गिराने और कटे हुए पेड़ों की भरपाई करने के निर्देश दिए गए हैं। फैसले के अनुसार पारिस्थितिक पुनर्स्थापना की संपूर्ण प्रक्रिया की निगरानी केंद्रीय सशक्त समिति (CEC) करेगी।

राज्यों के लिए छह महीने की समय-सीमा

सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) को छह महीने के भीतर मानव–वन्यजीव संघर्ष पर मॉडल दिशानिर्देश तैयार करने का आदेश दिया है। राज्यों को इन्हें आगे छह महीनों के भीतर लागू करना होगा। अदालत ने वन, राजस्व, पुलिस, आपदा प्रबंधन और पंचायती राज विभागों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

बफर क्षेत्र में प्रतिबंधित गतिविधियाँ

कोर्ट ने बफर और फ्रिंज क्षेत्रों में कई गतिविधियों पर रोक लगाने की विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों को मंजूरी दे दी। इनमें वाणिज्यिक खनन, आरा मिलें, प्रदूषणकारी उद्योग, बड़ी जलविद्युत परियोजनाएँ, खतरनाक पदार्थों का उत्पादन और कम-उड़ान वाले विमानों का संचालन शामिल है।

रिसॉर्ट्स प्रतिबंधित, रात के पर्यटन पर प्रतिबंध, शांत क्षेत्र अनिवार्य

सुप्रीम कोर्ट ने टाइगर रिजर्व के पास पर्यटन के लिए विशिष्ट निर्देश जारी किए. इसके तहत पर्यावरण के अनुकूल रिसॉर्ट्स को केवल बफर्स ​​में ही अनुमति दी जाएगी और वाहनों की वहन क्षमता लागू की जाए. रात्रि पर्यटन पर पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगी. आपातकालीन वाहनों को छोड़कर, मुख्य क्षेत्रों से गुजरने वाली सड़कें शाम से सुबह तक बंद रखी जाएं. इसके अतिरिक्त, सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि ईएसजेड सहित पूरा टाइगर रिजर्व तीन महीने के भीतर ध्वनि प्रदूषण नियमों के तहत साइलेंस जोन के रूप में अधिसूचित किया जाए.

पर्यटन पर नियंत्रण और ‘साइलेंस ज़ोन’ की घोषणा

टाइगर रिज़र्व के नजदीक पर्यटन गतिविधियों के लिए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पर्यावरण-अनुकूल रिसॉर्ट्स सिर्फ बफर ज़ोन में ही अनुमति योग्य होंगे और गाड़ियों की वहन क्षमता का सख्ती से पालन किया जाएगा। रात्रि पर्यटन पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि पूरे टाइगर रिज़र्व क्षेत्र — जिसमें ईको-सेंसिटिव ज़ोन भी शामिल है — को तीन महीनों के भीतर साइलेंस ज़ोन के रूप में अधिसूचित किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बाघ संरक्षण को प्राथमिकता देना अनिवार्य है, और पर्यटन तभी बढ़ाया जा सकता है जब वह पर्यावरण के अनुकूल और स्थानीय पारिस्थितिकी से सामंजस्यपूर्ण हो।

Short Story: धारीदार सन्नाटा, उस दिन जंगल की चुप्पी अलग थी


TODAY
 छत्तीसगढ़  / 
जंगल के दिल में समाई वह संकरी सड़क हमेशा की तरह शांत थी—इतनी शांत कि लगता था पूरी दुनिया अपनी साँसें थामे खड़ी है। पेड़ों की लंबी छायाएँ सड़क पर जाल की तरह फैल रहीं थीं, और हवा में पत्तों, मिट्टी और धूप की मिली-जुली सुगंध तैर रही थी।

इसी रास्ते से रोज़ लौटता था चरवाहा रमू, अपनी काली, भारी भैंसों के साथ। वह इस पगडंडी के हर मोड़, हर उभार को जानता था—मानो यह रास्ता उसके भीतर ही बसा हो। भैंसें भी बिना कहे- सुने उसकी चाल को समझतीं, जैसे वर्षों की संगत ने उन्हें एक ही लय में बाँध दिया हो।

लेकिन उस दिन जंगल की चुप्पी अलग थी।

जैसे हवा कहीं थम गई हो।

जैसे कोई अनदेखी आँखें कहीं पास से देख रही हों।

और फिर, मोड़ के पास अचानक तीन धारीदार बिल्लियाँ सड़क पर प्रकट हुईं।

न शोर, न हलचल।

बस तीन सधी हुई, चिकनी आकृतियाँ—धूप में चमकती धारियों के साथ। उनके कान आगे को तने थे, पूँछें फड़कना भी भूल गई थीं, और उनकी जिज्ञासु आँखें भैंसों के झुंड पर टिकी थीं।

रमू एकदम रुक गया।

भैंसें उसके पीछे सटकर खड़ी हो गईं, जैसे किसी अदृश्य संकेत पर। उनकी साँसों की भारी गूँज उन बिल्लियों की स्थिरता के सामने एक अलग ही संगीत बना रही थी।

कुछ क्षण ऐसे बीते जो समय की पकड़ में नहीं आते—

दो अलग दुनियाएँ आमने-सामने खड़ी थीं।

एक ओर वे बिल्लियाँ—जन्मजात शिकारी—जिन्हें शायद ही कभी ऐसे शांत, संगठित जुलूस का सामना करना पड़ा होगा।

दूसरी ओर रमू और उसका झुंड—आदत, अनुशासन और एक-दूसरे पर भरोसे से बंधा परिवार।

बिल्लियाँ भैंसों को ऐसे देख रही थीं जैसे किसी पहेली को सुलझा रही हों।

क्या ये शिकार हैं?

नहीं।

क्या ये खतरा हैं?

शायद।

या फिर बस एक असामान्य दृश्य—जो जंगल की अपनी दिनचर्या में बाधा डाल रहा है।

रमू के दिल की धड़कनें गूँजने लगीं।

उसे पता था कि ये बिल्लियाँ कुछ भी कर सकती हैं—लेकिन उतना ही यह भी कि भैंसें उसे कभी अकेला नहीं छोड़ेंगी।

फिर अचानक, धूप में चमकती उनकी धारियाँ सरक गईं—चुपचाप—जंगल के घने झुरमुटों में वापस।

जैसे वे कभी आई ही न हों।

रमू ने गहरी साँस छोड़ी—एक जो राहत से भरी थी, और एक जो उन रहस्यमयी जंगल-जीवों के प्रति सम्मान से।

उसने धीरे से हाथ हिलाया, और भैंसें फिर चल पड़ीं—सड़क पर, धूप पर, और अपने रोज़ के जीवन की ओर।

सन्नाटा लौट आया, पर वह वैसा नहीं था।

उसमें अब एक कहानी थी—एक असंभव, ठहरी हुई मुठभेड़ की।

और रमू जानता था कि वह इस पल को उम्र भर याद रखेगा—जब जंगल ने एक क्षण के लिए अपने रहस्य उसके सामने खोल दिए थे। 

(साभार - @_planettiger_  credit @harsh_gate_photography)

अमरकंटक की राह में एक अनदेखा झरना — मानो प्रकृति मुझे कह रही हो, “रुककर देखो मैं यहीं हूँ सदियों से।”


 बिलासपुर।
  TODAY छत्तीसगढ़  /  अमरकंटक की ओर जाती घुमावदार सड़कें जैसे-जैसे सतपुड़ा-मैकल की गोद में उतरती हैं, हर मोड़ पर प्रकृति का एक नया रूप सामने आता है। इसी यात्रा के दौरान, कबीर चबूतरा से करीब पाँच किलोमीटर पहले, अचानकमार टाइगर रिज़र्व के बफर ज़ोन में, मुझे एक छोटा-सा झरना मिला — अनायास, लेकिन अप्रत्याशित रूप से मन मोह लेने वाला।

सड़क किनारे पत्थरों के बीच से फूटता वह निर्मल जल, मानो पहाड़ियों की धड़कनों में बहती कोई मधुर धुन हो। सूरज की किरणें जब जल पर गिरतीं, तो बूंदें सोने-सी चमक उठतीं। आसपास का वन क्षेत्र हरियाली से आच्छादित था, और पक्षियों की चहचहाहट उस सन्नाटे में जीवन भर देती थी।

स्थानीय लोग बताते हैं कि बरसात के मौसम में यह झरना अपने पूरे सौंदर्य पर होता है — तब इसका पानी उफनता हुआ नीचे की ओर बहता है, और पूरा जंगल धुंध और हरियाली से ढक जाता है। राहगीर यहां रुककर विश्राम करते हैं, तस्वीरें खींचते हैं, और कुछ पल प्रकृति के साथ बिताते हैं।

मुझे यह झरना न केवल अपनी सुंदरता से आकर्षित करता दिखा, बल्कि इसने उस गहराई का एहसास कराया जो सतपुड़ा-मैकल की पहाड़ियों में बसती है — जल, जंगल और जीवन का त्रिवेणी संगम। यही तो इस क्षेत्र की असली पहचान है।

पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि ऐसे कई अनदेखे स्थल इस क्षेत्र की जैवविविधता के जीवंत उदाहरण हैं, और शायद यही कारण है कि पर्यटन विभाग भविष्य में इस जगह को इको-टूरिज़्म सर्किट में शामिल करने की सोच रहा है। अमरकंटक की ओर बढ़ते हुए, उस झरने की आवाज़ देर तक मेरे कानों में गूंजती रही — मानो प्रकृति मुझे कह रही हो, “रुककर देखो, मैं यहीं हूँ, सदियों से।”

(यात्रा वृत्तांत- सत्यप्रकाश पांडेय) 

पक्षियों की शरणस्थली पर संकट: अवैध मुरुम खनन ने बढ़ाई चिंता


 बिलासपुर / 
TODAY छत्तीसगढ़  /  प्रकृति का संतुलन तब बिगड़ता है जब मनुष्य अपने अल्पकालिक लाभ के लिए पर्यावरण के दीर्घकालिक हितों को नज़रअंदाज़ कर देता है। बिलासपुर जिला मुख्यालय से केवल 23 किलोमीटर दूर स्थित मोहनभाठा, प्रवासी/स्थानीय पक्षियों के अलावा अन्य जीव जंतुओं की शरणस्थली इस समय ऐसी ही मानवजनित गतिविधियों के कारण गंभीर खतरे का सामना कर रही है। हाल ही में यहाँ अवैध मुरुम खनन का काम द्रुत गति से शुरू हो गया है, जो इस क्षेत्र के पारिस्थितिकी तंत्र और जैव विविधता के लिए गहरे संकट का संकेत है। 

प्रवासी पक्षियों की सुरक्षित शरणस्थली

मोहनभाठा, ब्रिटिशकालीन सेना के लिए बनाई गई हवाई पट्टी और उसके आस-पास के सैकड़ों एकड़ की बंजर भूमि भले ही आज अतिक्रमणकारियों के हिस्से में हो लेकिन आज भी बहुत बड़ा क्षेत्र पक्षियों की सैकड़ों प्रजातियों और वन्यजीवों के लिए अनुकूल है।  जिले के पक्षी और प्रकृति प्रेमी वर्षों से मोहनभाठा को पक्षियों की सुरक्षित शरणस्थली के रूप में जानते रहे है। 

खनन से बदल रहा है भूगोल

मोहनभाठा, अवैध मुरुम खनन से इस क्षेत्र की प्राकृतिक बनावट तेजी से नष्ट हो रही है। अवैध मुरुम उत्खनन से पक्षियों के रहवास और उनके अनुकूल परिस्थितियों पर अब भीषण संकट दिखाई दे रहा है। ग्रामीण बताते हैं कि रात करीब 9 बजे के बाद खनन के लिए जरूरी मशीन और ढुलाई के लिये हाईवा आता है। रात के अँधेरे में शुरू हुआ खनन का गोरखधंधा तड़के तक जारी रहता है। सरकारी (कभी ब्रिटिश सेना की) जमीन पर रात के अँधेरे में अवैध तरीके से मुरुम के खनन में स्थानीय जनप्रतिनिधियों के संरक्षण की बात भी दबी जुबान से कही जा रही है। ग्रामीण ऐसे माफियाओं से खौफ खाते हैं लिहाजा खुलकर विरोध करने से कतरा रहें हैं।  

    

कानूनी प्रावधानों की अनदेखी

पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 तथा खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1957 के तहत बिना अनुमति खनन पूरी तरह अवैध है। इसके बावजूद स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक उदासीनता और राजनैतिक हस्तक्षेप के कारण यह गतिविधि खुलेआम जारी है। अवैध खनन किसी भी रूप में केवल “आर्थिक गतिविधि” नहीं होता; यह एक पारिस्थितिक अपराध है। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, वन्यजीव संरक्षण अधिनियम और खनिज विनियमन अधिनियम — सभी इस तरह की गतिविधियों पर सख्त रोक लगाते हैं। फिर भी, स्थानीय प्रशासन की आँखों के सामने यह सब खुलेआम हो रहा है।

अवैध गतिविधियाँ और शिकारियों का जमावड़ा

खनन कार्य के बहाने यहाँ बाहरी लोगों की आवाजाही बढ़ गई है। स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, रात के समय कई संदिग्ध वाहन इस क्षेत्र में घूमते हैं। पिछले कुछ समय से शिकारियों और अवैध धंधों में लिप्त लोगों का जमावड़ा यहाँ नियमित रूप से देखा जा रहा है। इसका सीधा असर पक्षियों और अन्य वन्यजीवों की सुरक्षा पर पड़ रहा है। 

अब बच्चों की सुरक्षा पर भी संकट

खनन स्थल के पास ही गाँव के बच्चे प्रतिदिन क्रिकेट और अन्य खेल खेलने के लिए इकट्ठा होते हैं। पहले यह जगह उनका खेल मैदान हुआ करती थी, लेकिन अब वहाँ बने गहरे गड्ढे स्थिति को बेहद खतरनाक बना चुके है। खेल के दौरान थोड़ी सी लापरवाही किसी गंभीर हादसे का कारण बन सकती है। ग्रामीणों का कहना है कि “जहाँ पहले बच्चे खेलते थे, वहाँ अब खाई बनती दिखाई देती है। 

जरूरी है ठोस कदम

अब वक्त है कि प्रशासन, पर्यावरण प्रेमी और स्थानीय समुदाय मिलकर इस अवैध खनन को तुरंत रोके। मोहनभाठा की प्राकृतिक विरासत की रक्षा केवल कानून से नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना और जिम्मेदारी से संभव है। पक्षियों के शोरगुल और वन्य प्राणियों की शांति तभी बचेगी जब हम विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना सीखेंगे। 

अचनाकमार टाइगर रिजर्व में बाघों की संख्या दोगुनी, WWF INDIA की रिपोर्ट में सामने आई खुशखबरी

 ATR:  2017 में 5 से बढ़कर 2024 में 10 बाघ

TODAY छत्तीसगढ़  /  रायपुर। बाघ संरक्षण की दिशा में छत्तीसगढ़ के लिए बड़ी उपलब्धि दर्ज हुई है। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया ने “रिकवरिंग स्ट्राइप्स – अ पॉपुलेशन स्टेटस ऑफ टाइगर्स एंड देयर प्रे इन अचनाकमार टाइगर रिजर्व, छत्तीसगढ़” शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की है, जिसमें अचनाकमार टाइगर रिजर्व में बाघों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है।

रिपोर्ट के अनुसार, 2017 में जहां अचनाकमार में केवल 5 बाघ दर्ज किए गए थे, वहीं 2024 तक यह संख्या बढ़कर 10 हो गई है। इनमें पड़ोसी बांधवगढ़ और कान्हा टाइगर रिजर्व से आए बाघ भी शामिल हैं। यह स्वस्थ परिदृश्य-स्तरीय कनेक्टिविटी का संकेत है।

डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया के वरिष्ठ प्रोजेक्ट अधिकारी उपेंद्र दुबे ने बताया कि लगभग 15 वर्षों में पहली बार अचनाकमार में प्रजनन योग्य आयु वाले नर-मादा बाघ मौजूद हैं। संतुलित लैंगिक अनुपात और शावकों की मौजूदगी रिजर्व के लिए स्थायी जनसंख्या वृद्धि का बड़ा मोड़ साबित हो सकती है। 

कनेक्टिविटी है अहम - 

अचनाकमार का मध्य भारत में रणनीतिक स्थान इसे टाइगर कॉरिडोर नेटवर्क का अहम हिस्सा बनाता है, जो कान्हा और बांधवगढ़ जैसे बड़े टाइगर रिजर्व से जुड़ा हुआ है। यह कनेक्टिविटी बाघों की आवाजाही, आनुवंशिक विविधता और दीर्घकालिक अस्तित्व के लिए बेहद जरूरी है।

 सीसीएफ (वन्यजीव) व फील्ड डायरेक्टर मनोज कुमार पांडेय ने बताया कि अध्ययन में वैज्ञानिक पद्धतियों से बाघों और उनके शिकार प्रजातियों की घनत्व का आकलन किया गया। “यह रिपोर्ट अचनाकमार में प्रभावी प्रबंधन और संरक्षण रणनीतियां बनाने के लिए महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध कराती है।”

सामूहिक प्रयासों का नतीजा - 

अध्ययन में शिकार प्रजातियों की मजबूत आबादी की अहमियत भी रेखांकित की गई है, क्योंकि यही बाघों की दीर्घकालिक मौजूदगी का आधार है। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया और छत्तीसगढ़ वन विभाग लंबे समय से अचनाकमार में आवास प्रबंधन, वनकर्मियों के प्रशिक्षण और स्थानीय समुदायों की सहभागिता जैसे कार्यक्रम चला रहे हैं।

रिपोर्ट के निष्कर्ष इन प्रयासों की सफलता को दर्शाते हैं और यह भी साबित करते हैं कि विज्ञान-आधारित रणनीति और सतत सहयोग से ही भारत में बाघों का भविष्य सुरक्षित किया जा सकता है।


सिमिलीपाल का ब्लैक टाइगर केवल वन्य जीवन का चमत्कार नहीं है - प्रसेन्जीत


 TODAY छत्तीसगढ़  /   ये तस्वीर एक ऐसे बाघ की है, जो इतना दुर्लभ है कि पूरी दुनिया में सिर्फ़ एक ही जंगल में मौजूद है। तस्वीर में दिखाई देते काले रंग के बाघ की तस्वीर एक फोटोग्राफ़र के असीम धैर्य का प्रतीक है। ओडिशा के सिमिलीपाल टाइगर रिज़र्व के घने जंगलों में, वाइल्डलाइफ फोटोग्राफ़र प्रसेन्जीत यादव ने 120 दिन इस सपने को पूरा करने में बिताए, उस जानवर की तस्वीर लेने के लिए जिसे यहाँ के लोग भी शायद ही देख पाते हों।

महीनों की खामोशी और कई असफल प्रयासों के बाद, उन्होंने आखिरकार एक स्यूडो-मेलानिस्टिक बाघ, जिसे अक्सर ब्लैक टाइगर कहा जाता है, की तस्वीर ली। यह जादुई पल अब अक्टूबर 2025 के नेशनल जियोग्राफिक के कवर पर है, और यह दुनिया में पहला अवसर है।

प्रसेन्जीत ने NatGeo को बताया:

 “ये ब्लैक टाइगर बहुत शर्मीले थे। वे मेरे कैमरा ट्रैप से दूर रहते थे और इंसानी मौजूदगी को सूंघ सकते थे। एक को देखने में मुझे दो महीने लग गए।” सिमिलीपाल, जो 2,700 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है, दुनिया का एकमात्र स्थान है जहाँ ये दुर्लभ बाघ पाए जाते हैं। लगभग 30 बाघों में से, आधे से ज्यादा में एक अनोखी आनुवंशिक बदलाव होती है, जो उनके काले धारियों को जोड़कर उनका अद्भुत काला पैटर्न बनाती है।

प्रसेन्जीत यादव के लिए यह सिर्फ़ एक तस्वीर नहीं थी, बल्कि एक सपना था। उन्होंने कहा: “बारह साल पहले मैंने इस कहानी को बताने का सपना देखा था। आज, वह सपना National Geographic Magazine International के कवर पर है।”

सिमिलीपाल का ब्लैक टाइगर केवल वन्य जीवन का चमत्कार नहीं है। यह हमें याद दिलाता है कि हमारे देश के जंगल इन जीवों का घर हैं और उनकी सुरक्षा हम सबकी जिम्मेदारी है। [ साभार / द बेटर इण्डिया ] {Credits: प्रसेन्जीत यादव [@prasen.yadav on IG], National Geographic}


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