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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 11 वकीलों को दिया सीनियर एडवोकेट का दर्जा


बिलासपुर। 
 TODAY छत्तीसगढ़  /  छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने अधिवक्ता अधिनियम 1961 तथा हाईकोर्ट ऑफ छत्तीसगढ़ (डिजिग्नेशन ऑफ सीनियर एडवोकेट्स) नियम 2025 के तहत 11 अधिवक्ताओं को वरिष्ठ अधिवक्ता (सीनियर एडवोकेट) के रूप में नामित किया है। इस संबंध में गुरुवार को हाईकोर्ट प्रशासन की ओर से अधिसूचना जारी की गई।

जारी अधिसूचना के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों और पूर्ण न्यायालय (फुल कोर्ट) की स्वीकृति के बाद इन अधिवक्ताओं को तत्काल प्रभाव से वरिष्ठ अधिवक्ता का दर्जा प्रदान किया गया है। सीनियर एडवोकेट घोषित किए गए अधिवक्ताओं में शैलेंद्र दुबे, रणवीर सिंह मरहास, हमीदा सिद्दीकी, यशवंत ठाकुर, अनूप मजूमदार, नीलाभ दुबे, अमृतो दास, मतीन सिद्दीकी, नौशिना अफरीन अली, अरविंद श्रीवास्तव तथा तरेंद्र कुमार झा के नाम शामिल हैं। 

हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल रजनीश श्रीवास्तव द्वारा जारी अधिसूचना में कहा गया है कि यह निर्णय पूर्ण न्यायालय की बैठक में अनुमोदन के बाद लिया गया।

ताड़मेटला हत्याकांड में राज्य सरकार की अपील खारिज, 76 जवान शहीद हुये थे


बिलासपुर।
  TODAY छत्तीसगढ़  /  छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने ताड़मेटला नक्सली हमले मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी है। डिवीजन बेंच ने कहा कि इतने गंभीर और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामले में भी अभियोजन पक्ष अदालत के सामने कानूनी रूप से मान्य और विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत करने में विफल रहा।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में टिप्पणी करते हुए कहा कि यह अत्यंत दुखद है कि बड़े पैमाने पर जवानों की शहादत वाले इस मामले में जांच एजेंसियां आरोप साबित नहीं कर सकीं। अदालत ने कहा कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य अधूरे थे और प्रत्यक्ष साक्ष्य का अभाव था, जिसके चलते ट्रायल कोर्ट को आरोपियों को बरी करना पड़ा।

दरअसल राज्य सरकार ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 378(1) के तहत अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश दक्षिण बस्तर, दंतेवाड़ा द्वारा 7 जनवरी 2013 को दिए गए फैसले को चुनौती दी थी। निचली अदालत ने ओयामी गंगा समेत अन्य आरोपियों को आईपीसी की धारा 148, 120बी, 396 और शस्त्र अधिनियम व विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धाराओं के तहत आरोपों से बरी कर दिया था।

क्या था ताड़मेटला नरसंहार?

6 अप्रैल 2010 को सीआरपीएफ की 62वीं बटालियन और पुलिस बल एरिया डोमिनेशन ऑपरेशन पर निकले थे। सुबह ताड़मेटला गांव के जंगल में नक्सलियों ने सुरक्षाबलों पर घात लगाकर हमला कर दिया। नक्सलियों ने भारी गोलीबारी और विस्फोटक हमलों के जरिए 76 जवानों को शहीद कर दिया था। हमले के बाद नक्सली जवानों के हथियार भी लूटकर ले गए थे। घटनास्थल के आसपास कई टिफिन बम लगाए गए थे, जिन्हें बाद में निष्क्रिय किया गया। यह घटना देश के सबसे बड़े नक्सली हमलों में से एक मानी जाती है।

हाईकोर्ट ने कहा कि अपराध कितना भी गंभीर क्यों न हो, अदालत केवल विश्वसनीय और कानूनी साक्ष्यों के आधार पर ही दोष सिद्ध कर सकती है।

राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता ने रखा पक्ष

राज्य शासन की ओर से पैरवी करते हुए महाधिवक्ता विवेक शर्मा ने कहा, निचली अदालत द्वारा पारित बरी करने का फैसला अवैध और अस्थिर है। निचली अदालत महत्वपूर्ण साक्ष्यों को समझने में विफल रही है, जिसमें आरोपी बरसे लखमा का मजिस्ट्रेट के समक्ष धारा 164 सीआरपीसी के तहत दिया गया इकबालिया बयान भी शामिल है, जिसमें उसने अन्य आरोपियों के साथ इस अपराध में शामिल होने की बात स्वीकार की है। इसके अलावा, निचली अदालत बम निरोधक दस्ते द्वारा जब्त किए गए पाइप बमों और विस्फोटकों तथा अन्य सहायक सामग्री को भी समझने में विफल रही है। धारा 311 सीआरपीसी के तहत सात घायल सीआरपीएफ जवान, जो चश्मदीद गवाह थे, की जांच के लिए अभियोजन पक्ष के आवेदन को खारिज करना एक गंभीर त्रुटि है, जो मामले को कमजोर करती है।

इस मामले में राज्य सरकार ने निचली अदालत द्वारा आरोपियों को बरी किए जाने के फैसले को चुनौती दी थी। राज्य की ओर से महाधिवक्ता विवेक शर्मा ने दलील दी कि ट्रायल कोर्ट ने महत्वपूर्ण साक्ष्यों की अनदेखी की, जैसे— आरोपी बरसे लखमा का धारा 164 सीआरपीसी के तहत मजिस्ट्रेट के सामने दिया गया कथित इकबालिया बयान, बम निरोधक दस्ते द्वारा जब्त पाइप बम, विस्फोटक और अन्य सामग्री, सात घायल सीआरपीएफ जवानों को गवाह के रूप में पेश करने के अभियोजन आवेदन को खारिज करना लेकिन हाई कोर्ट ने जांच और अभियोजन में कई गंभीर कमियां पाईं। अदालत ने कहा— आरोपियों को सीधे हत्या या हमले से जोड़ने वाला कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं है। किसी प्रत्यक्षदर्शी ने आरोपियों की पहचान नहीं की। धारा 164 का इकबालिया बयान स्वतंत्र साक्ष्यों से पुष्ट नहीं था। विस्फोटक सामग्री घटनास्थल से मिली थी, आरोपियों के कब्जे से नहीं। एफएसएल रिपोर्ट पेश नहीं की गई, इसलिए विस्फोटक होने का वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिला। टीआईपी (Test Identification Parade) नहीं कराई गई। शस्त्र अधिनियम के तहत अभियोजन स्वीकृति का रिकॉर्ड भी नहीं था।

इन्हीं कारणों से हाई कोर्ट ने कहा कि अभियोजन “उचित संदेह से परे” अपराध साबित नहीं कर सका और राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी। आरोपियों की बरी होने की स्थिति बरकरार रखी गई। साथ ही अदालत ने राज्य सरकार को भविष्य में गंभीर अपराधों की जांच अधिक पेशेवर और प्रक्रियात्मक रूप से मजबूत करने की हिदायत दी, ताकि आपराधिक न्याय प्रणाली पर जनता का भरोसा बना रहे। 

हत्याकांड मामले में पुलिस ने जिन 10 लोगों को आरोपी बनाया था, उन्हें बाद में अदालत से बरी कर दिया गया। आरोपियों की सूची इस प्रकार है—

ओयामी गंगा — पुत्र लखमा, निवासी मिनपा पटेलपारा, थाना चिंतागुफा, जिला सुकमा

माडवी दुला — पुत्र मुक्का, निवासी मिनपा पटेलपारा, चिंतागुफा, सुकमा

पोदियामी हिड़मा — पत्नी माया, निवासी पटेलपारा, चिंतागुफा, सुकमा

ओयामी हिड़मा — पुत्र गंगा, निवासी पटेलपारा, चिंतागुफा, सुकमा

कवासी बुथरा — पुत्र हड़मा, निवासी पटेलपारा, चिंतागुफा, sुकमा

हुर्रा जोगा — पुत्र हड़मा, निवासी मिनपा पटेलपारा, चिंतागुफा, सुकमा

बरसे लखमा — पुत्र भीमा, निवासी कावासीरस मारेपल्ली, चिंतागुफा, सुकमा

मड़कम गंगा — पुत्र मड़कम हड़मा, निवासी गोरगुंडा, चिंतागुफा, सुकमा

राजेश नायक — पिता चिकन राम, निवासी गोरगुंडा, चिंतागुफा, सुकमा

करतम जोगा — पुत्र बंदी, निवासी मिस्मा, चिंतागुफा, सुकमा

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त और विश्वसनीय साक्ष्य पेश नहीं कर सका, इसलिए सभी आरोपियों की दोषमुक्ति बरकरार रखी गई।

जग्गी हत्याकांड में हाईकोर्ट के फैसले पर लगी रोक, अमित जोगी को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत

नई दिल्ली। TODAY छत्तीसगढ़  / छत्तीसगढ़ के पूर्व सीएम अजीत जोगी के बेटे अमित जोगी को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है. सुप्रीम कोर्ट ने उनकी आजीवन कारावास की सजा पर रोक लगा दी है. एनसीपी नेता राम अवतार जग्गी हत्याकांड मामले में अमित जोगी छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की तरफ से दोषी मानते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी. जिसके खिलाफ अमित जोगी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी. जहां 23 अप्रैल को हुई सुनवाई में सर्वोच्च न्यायालय ने  अमित जोगी को दोषी ठहराए जाने के फैसले पर रोक लगाई है. जो उनके लिए बड़ी राहत मानी जा रही है.  

सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के उस फैसले को पलट दिया है. जिसमें हाईकोर्ट ने अमित जोगी को जग्गी हत्याकांड में आरोपी मानते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी. उन्हें तीन हफ्ते के अंदर सरेंडर करने के लिए भी कहा गया था. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को पलट दिया है. सर्वोच्च न्यायालय ने आजीवन कारावास की सजा पर रोक लगा दी है. जग्गी हत्याकांड 2003 में हुआ था. यह छत्तीसगढ़ बनने के बाद कोई पहला हाईप्रोफाइल मामला था. जिसमें अमित जोगी का नाम सामने आया था. ऐसे में यह मामला पूरे छत्तीसगढ़ में चर्चा में था. 

अमित जोगी ने लगाई थी दो याचिका 

अमित जोगी ने सुप्रीम कोर्ट में दो याचिका लगाई थी. जिसमें पहली याचिका में सीबीआई से संबंधित अपील दायर करने के मामले में थी. दूसरी याचिका में हाई कोर्ट के मुख्य फैसले को चुनौती दी गई थी. जिसमें उन्हें आजीवन कारावास की सजा दी गई थी. अमित जोगी के वकीलों ने तर्कों के आधार पर सजा पर रोक लगाने या निरस्त करने की मांग की थी. ऐसे में अमित जोगी के लिए फिलहाल राहत मिली है. 

जग्गी हत्याकांड से जुड़ा है मामला 

मामला रायपुर के कारोबारी और एनसीपी नेता रामअवतार जग्गी की हत्या से जुड़ा है. 4 जून 2003 को रायपुर में गोली मारकर उनकी हत्या कर दी गई थी. जिसमें अजित जोगी का नाम सामने आया था. 2007 में उन्हें इस मामले में बरी कर दिया गया था. लेकिन जग्गी के बेटे ने इस फैसले के खिलाफ याचिका लगाई थी. जिसमें हाई कोर्ट ने 2026 में अमित जोगी को दोषी पाया था. इसके बाद उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुना दी गई थी. 23 साल पुराने इस मामले में अब एक बार फिर बड़ा फैसला आ गया है. 


हाईकोर्ट ने राजस्व उप निरीक्षक की नियुक्ति रद्द की, 13 साल बाद बड़ा फैसला


बिलासपुर।
 TODAY छत्तीसगढ़  / छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भाटापारा नगर पालिका परिषद में राजस्व उप निरीक्षक की नियुक्ति को लेकर बड़ा फैसला सुनाते हुए 13 वर्ष पुरानी नियुक्ति को रद्द कर दिया है। न्यायालय ने चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता के अभाव को गंभीर मानते हुए नई प्रक्रिया के तहत नियुक्ति करने का निर्देश दिया है। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति रविन्द्र कुमार अग्रवाल की एकलपीठ में हुई।

नगर पालिका परिषद भाटापारा द्वारा वर्ष 2012 में राजस्व उप निरीक्षक पद के लिए विज्ञापन जारी किया गया था। याचिकाकर्ता देवेंद्र कुमार साहू ने सभी दस्तावेजों के साथ आवेदन किया, लेकिन उनका नाम पात्र और अपात्र दोनों सूचियों से गायब रहा। इसके बावजूद वर्ष 2013 में सतीश सिंह चौहान को नियुक्त कर दिया गया। सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि चयनित उम्मीदवार के पिता उस समय नगर पालिका में सीएमओ पद पर पदस्थ थे और अनुभव प्रमाण पत्र भी उन्हीं द्वारा जारी किया गया था। अदालत ने इसे चयन प्रक्रिया को संदिग्ध बनाने वाला महत्वपूर्ण पहलू माना।

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता मतीन सिद्दीकी एवं ईशान सलूजा ने तर्क रखा कि सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त दस्तावेजों से यह स्पष्ट है कि आवेदन विधिवत प्राप्त हुआ था, फिर भी उसे नजरअंदाज किया गया।

हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता को सूची से बाहर रखना गंभीर त्रुटि है। चयन प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी नहीं रही और अनुभव प्रमाण पत्र से पक्षपात की आशंका प्रबल है। इन आधारों पर न्यायालय ने 23 मार्च 2013 की नियुक्ति निरस्त कर दी।

करंट से वन्यजीवों की मौत पर हाई कोर्ट सख्त, अपर मुख्य सचिव से मांगा शपथ पत्र


रायपुर ।
  TODAY छत्तीसगढ़  / छत्तीसगढ़ में बिजली करंट से हो रही हाथियों और अन्य वन्यजीवों की लगातार मौत के मामलों पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने स्वत: संज्ञान लेते हुए वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के अपर मुख्य सचिव से शपथ पत्र प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। सोमवार को मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा एवं न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ में मामले की सुनवाई हुई।

 लगातार घटनाओं ने बढ़ाई चिंता

रायपुर निवासी नितिन सिंघवी की ओर से अदालत में प्रस्तुत समाचार पत्रों की कतरनों के आधार पर बताया गया कि मार्च माह में प्रदेश के विभिन्न जिलों में करंट से कई वन्यजीवों की मौत हुई है। इनमें प्रमुख घटनाएं— रायगढ़ के घरघोड़ा वन क्षेत्र में दो हाथी शावकों की मौत,  सूरजपुर के प्रतापपुर में खेत में करंट तार से हाथी की मौत, कोरबा में 11 केवी तार की चपेट में मादा भालू व दो शावकों की मौत AUR मैनपाट व सारंगढ़ क्षेत्रों में अवैध करंट से मानव और वन्यजीवों की मौत शामिल हैं।

 कोर्ट ने मांगा विस्तृत जवाब

खंडपीठ ने अपर मुख्य सचिव से यह स्पष्ट करने को कहा है कि उक्त घटनाएं किन परिस्थितियों में हुईं जिम्मेदार अधिकारियों ने क्या कार्रवाई की ? भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं ? 

 अवैध करंट बना मौत का कारण

प्राथमिक तौर पर सामने आया है कि खेतों व जंगलों में जंगली जानवरों से फसलों की सुरक्षा या शिकार के लिए अवैध रूप से करंट युक्त तार बिछाए जा रहे हैं, जो वन्यजीवों के लिए घातक साबित हो रहे हैं। हाईकोर्ट ने मामले को गंभीर मानते हुए अगली सुनवाई 5 मई को निर्धारित की है और तब तक संबंधित विभाग से शपथ पत्र प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।

जग्गी हत्याकांड: सुप्रीम कोर्ट में हाईकोर्ट के दो फैसलों को जोड़कर संयुक्त सुनवाई 20 अप्रैल को


नई दिल्ली / बिलासपुर।
 TODAY छत्तीसगढ़  /  बहुचर्चित रामअवतार जग्गी हत्याकांड में पूर्व विधायक अमित जोगी को सुप्रीम कोर्ट से तत्काल राहत नहीं मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) पर सुनवाई करते हुए फिलहाल कोई अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया, हालांकि मामले की अगली सुनवाई 20 अप्रैल 2026 को तय की गई है।

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस विक्रम नाथ और संजीव मेहता की पीठ ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के 25 मार्च और 2 अप्रैल 2026 के फैसलों को एक साथ जोड़ते हुए 20 अप्रैल को संयुक्त सुनवाई का निर्णय लिया है।अमित जोगी ने हाईकोर्ट द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सजा को चुनौती देते हुए एसएलपी दायर की थी।

हाईकोर्ट ने उन्हें हत्या और साजिश के मामले में दोषी करार दिया है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल सजा पर रोक लगाने से इनकार किया है। सुनवाई के दौरान अमित जोगी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, मुकुल रोहतगी, विवेक तन्खा और सिद्धार्थ दवे ने पक्ष रखा।

वकीलों ने दलील दी कि—
हाईकोर्ट के फैसलों में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन नहीं हुआ
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व आदेशों की अवहेलना की गई
एक निर्णय बिना सुनवाई का अवसर दिए पारित किया गया

सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि अमित जोगी अंतिम निर्णय के विरुद्ध 20 अप्रैल से पहले याचिका दायर करें, ताकि सभी संबंधित मामलों की एक साथ अंतिम सुनवाई की जा सके।

बिलासपुर हाईकोर्ट: अमित जोगी दोषी, उम्रकैद की सजा


बिलासपुर।
  TODAY छत्तीसगढ़  /  छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वर्ष 2003 के बहुचर्चित राम अवतार जग्गी हत्याकांड में बड़ा फैसला सुनाते हुए पूर्व विधायक अमित जोगी को दोषी ठहराकर आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के 31 मई 2007 के फैसले को पलटते हुए यह निर्णय दिया है । मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार वर्मा की डिवीजन बेंच ने सीबीआई की अपील और शिकायतकर्ता की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया।

हाईकोर्ट ने अमित जोगी को हत्या की साजिश (धारा 120-बी), हत्या (धारा 302/34) और संपत्ति क्षति (धारा 427/34) के तहत दोषी माना है। अदालत ने कहा कि यह घटना एक सुनियोजित राजनीतिक साजिश का हिस्सा थी, जिसमें अमित जोगी मुख्य साजिशकर्ता थे।

एनसीपी नेता राम अवतार जग्गी की 4 जून 2003 की रात रायपुर में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। घायल अवस्था में उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां उनकी मौत हो गई। प्रारंभिक जांच में मामला लूट से जुड़ा बताया गया था, लेकिन बाद में सीबीआई जांच में राजनीतिक साजिश का एंगल सामने आया।

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि— होटल ग्रीन पार्क में हुई बैठक में साजिश रची गई।  आरोपी की मौजूदगी और भूमिका के पर्याप्त साक्ष्य हैं। चिमन सिंह को हत्या की जिम्मेदारी दी गई। घटना के बाद साक्ष्यों को प्रभावित करने का प्रयास हुआ। कोर्ट ने माना कि साजिश जैसे मामलों में परिस्थितिजन्य साक्ष्य भी पर्याप्त होते हैं।

हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया और महत्वपूर्ण तथ्यों को नजरअंदाज किया। इसी आधार पर अमित जोगी को बरी किया गया था, जिसे अब निरस्त कर दिया गया है। हाईकोर्ट के आदेश में साफ़ लिखा गया है कि अमित जोगी तीन सप्ताह के भीतर न्यायालय में सरेंडर करें। 

सीबीआई और मृतक के पुत्र सतीश जग्गी की ओर से दायर याचिकाओं में कहा गया था कि सभी आरोपियों के खिलाफ समान साक्ष्य होने के बावजूद अमित जोगी को गलत तरीके से बरी किया गया। हाईकोर्ट के फैसले के बाद अमित जोगी ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। मामले में आगे की सुनवाई वहां होगी। 

जग्गी हत्याकांड: सरेंडर आदेश पर अमित जोगी का बड़ा बयान—“मेरे साथ गंभीर अन्याय हुआ है”


बिलासपुर। 
TODAY छत्तीसगढ़  /  बहुचर्चित जग्गी हत्याकांड में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट द्वारा दिए गए सरेंडर के आदेश के बाद राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। गुरुवार 2 अप्रैल को चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की डिवीजन बेंच ने अमित जोगी को तीन सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है।

हाई कोर्ट के इस फैसले के तुरंत बाद जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जेसीसीजे) के अध्यक्ष अमित जोगी ने सोशल मीडिया के जरिए अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने उच्च न्यायालय के आदेश को अपने साथ “गंभीर अन्याय” बताया है। न्यायालय के आदेश के तुरंत बाद सोशल मीडिया X पर अमित जोगी ने लिखा- 

प्रिय मित्रों और शुभचिंतकों 🙏

आज माननीय उच्च न्यायालय ने मेरे विरुद्ध CBI की अपील को मात्र 40 मिनट में स्वीकार कर लिया- बिना सुनवाई का अवसर दिए। 

मुझे खेद है कि जिस व्यक्ति को अदालत ने दोषमुक्त किया था, उसे बिना सुनवाई का एक भी अवसर दिए दोषी करार दिया गया। यह अप्रत्याशित है। अदालत ने मुझे 3 सप्ताह के अंदर सरेंडर करने का समय दिया है।

मुझे लगता है कि मेरे साथ गंभीर अन्याय हुआ है। मुझे पूरा विश्वास है कि सर्वोच्च न्यायालय से मुझे न्याय अवश्य मिलेगा। 

मैं न्याय व्यवस्था पर पूरा विश्वास रखता हूँ। मैं पूर्ण शांति, आस्था और धैर्य के साथ आगे बढ़ रहा हूँ। सत्य की जीत अवश्य होगी।

आप सभी से आग्रह है कि मेरे लिए प्रार्थना करें और अपना आशीर्वाद बनाए रखें।

जय छत्तीसगढ़ 🙏  

इसे भी पढ़ें - हाई कोर्ट:  जग्गी हत्याकांड में 23 साल बाद पलटा फैसला, अमित जोगी को सरेंडर का आदेश

गौरतलब है कि हाई कोर्ट ने हाल ही में सीबीआई की अपील स्वीकार करते हुए पूर्व के आदेश को पलट दिया और अमित जोगी को तीन सप्ताह के भीतर सरेंडर करने का निर्देश दिया है। इस घटनाक्रम के बाद राजनीतिक गलियारों में भी हलचल बढ़ गई है। जहां एक ओर विपक्ष इस मामले को लेकर सवाल उठा सकता है, वहीं जोगी समर्थक इसे राजनीतिक और कानूनी लड़ाई का हिस्सा बता रहे हैं। फिलहाल सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि अमित जोगी आगे क्या कानूनी कदम उठाते हैं और इस मामले में अगला घटनाक्रम क्या होता है।

हाई कोर्ट: जग्गी हत्याकांड में 23 साल बाद पलटा फैसला, अमित जोगी को सरेंडर का आदेश


बिलासपुर। 
TODAY छत्तीसगढ़  /  छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित रामअवतार जग्गी हत्याकांड में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने गुरुवार को बड़ा और अहम फैसला सुनाते हुए पूरे मामले को नई दिशा दे दी। अदालत ने पूर्व में पारित आदेशों को पलटते हुए सीबीआई की अपील स्वीकार कर ली है और इस मामले के प्रमुख आरोपी अमित जोगी को दोषी मानते हुये तीन सप्ताह के भीतर न्यायालय में आत्मसमर्पण (सरेंडर) करने का निर्देश दिया है। डिवीजन बेंच के इस आदेश से करीब 23 वर्ष पुराने इस हत्याकांड में एक बार फिर न्यायिक प्रक्रिया तेज हो गई है और मामले ने नया मोड़ ले लिया है। आपको बता दें कि छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के पुत्र हैं अमित जोगी जो वर्तमान में जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जेसीसीजे) के प्रदेश अध्यक्ष भी हैं। हालांकि पिता की मृत्यु के बाद अमित जोगी का राजनैतिक भविष्य करीब-करीब हाशिये पर ही था। 

 सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर फिर खुली फाइल

दरअसल, इस मामले में सतीश जग्गी और CBI ने पूर्व में हाई कोर्ट के आदेशों को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में अलग-अलग याचिकाएं दायर की थीं। सुप्रीम कोर्ट ने 6 नवंबर 2025 को पारित आदेश में याचिका दायर करने में हुई देरी को क्षमा करते हुए मामले को पुनर्विचार के लिए छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट वापस भेज दिया था। साथ ही निर्देश दिया था कि सुनवाई के दौरान CBI, राज्य शासन और वास्तविक शिकायतकर्ता को आवश्यक पक्षकार बनाया जाए।

 डिवीजन बेंच ने पलटे पुराने फैसले

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार वर्मा की डिवीजन बेंच में हुई सुनवाई के दौरान सभी पक्षों की दलीलें सुनी गईं। CBI की ओर से अधिवक्ता वैभव ए. गोवर्धन तथा राज्य की ओर से उप महाधिवक्ता डॉ. सौरभ पांडे ने संयुक्त रूप से पक्ष रखा। अदालत को बताया गया कि वर्ष 2007 में ही निचली अदालत के फैसले के विरुद्ध अपील की अनुमति मांगी गई थी, जिसे बाद में तकनीकी आधारों पर खारिज कर दिया गया था। सुनवाई के बाद कोर्ट ने वर्ष 2011 में पारित आदेशों को पलटते हुए CBI की अपील को स्वीकार कर लिया।

 तकनीकी आधार पर खारिज हुई थीं याचिकाएं

गौरतलब है कि इससे पहले हाई कोर्ट ने राज्य की अपील को अस्वीकार्य मानते हुए खारिज किया था। CBI की याचिका को विलंब के आधार पर निरस्त कर दिया गया था। वहीं सतीश जग्गी की पुनरीक्षण याचिका भी खारिज हो गई थी। अब सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद इन सभी बिंदुओं पर पुनर्विचार किया गया।

अमित जोगी को तीन सप्ताह में सरेंडर का आदेश

ताजा फैसले में हाई कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि आरोपी अमित जोगी तीन सप्ताह के भीतर न्यायालय के समक्ष आत्मसमर्पण करें। साथ ही कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि गंभीर आपराधिक मामलों में केवल तकनीकी आधारों पर अपीलों को खारिज करना न्याय के हित में नहीं माना जा सकता।

 क्या है पूरा हत्याकांड?

4 जून 2003 को रामअवतार जग्गी की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस मामले में पुलिस ने 31 आरोपियों को नामजद किया था। ट्रायल के दौरान दो आरोपी सरकारी गवाह बन गए, जबकि 28 आरोपियों को दोषी ठहराया गया। हालांकि, अमित जोगी को बाद में बरी कर दिया गया था, जिसे लेकर लंबे समय से कानूनी लड़ाई जारी थी।

 कौन थे रामअवतार जग्गी?

रामअवतार जग्गी व्यवसायिक पृष्ठभूमि से जुड़े प्रभावशाली नेता थे और पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल के करीबी माने जाते थे। जब विद्याचरण शुक्ल कांग्रेस छोड़कर NCP में शामिल हुए, तब जग्गी भी उनके साथ पार्टी में गए और उन्हें छत्तीसगढ़ में NCP का कोषाध्यक्ष बनाया गया था।

 राजनीतिक और कानूनी हलकों में हलचल

हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद प्रदेश की राजनीति और कानूनी गलियारों में हलचल तेज हो गई है। लंबे समय से ठंडे बस्ते में पड़े इस मामले के फिर से सक्रिय होने से आने वाले दिनों में कई अहम घटनाक्रम सामने आने की संभावना है।

हत्याकांड में ये हैं दोषी 

 जग्गी हत्याकांड में अभय गोयल, याहया ढेबर, वीके पांडे, फिरोज सिद्दीकी, राकेश चंद्र त्रिवेदी, अवनीश सिंह लल्लन, सूर्यकांत तिवारी, अमरीक सिंह गिल, चिमन सिंह, सुनील गुप्ता, राजू भदौरिया, अनिल पचौरी, रविंद्र सिंह, रवि सिंह, लल्ला भदौरिया, धर्मेंद्र, सत्येंद्र सिंह, शिवेंद्र सिंह परिहार, विनोद सिंह राठौर, संजय सिंह कुशवाहा, राकेश कुमार शर्मा, (मृत) विक्रम शर्मा, जबवंत और विश्वनाथ राजभर दोषी हैं। 

 न्यायालय से मिली जीत के बाद स्वर्गीय रामवतार जग्गी के बेटे सतीश जग्गी ने मीडिया से बात करते हुये इसे सत्य की जीत बताया और न्याय वयवस्था के प्रति आभार प्रकट किया। 

जग्गी हत्याकांड: हाईकोर्ट में अंतिम सुनवाई कल 2 अप्रैल को

बिलासपुर। TODAY छत्तीसगढ़  /  राज्य के चर्चित राम अवतार जग्गी हत्याकांड में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अंतिम सुनवाई के लिए गुरुवार, 2 अप्रैल की तारीख तय की है। आज बुधवार को हुई सुनवाई के दौरान आरोपी अमित जोगी की ओर से पेश वकील ने अदालत से अतिरिक्त समय की मांग की, जिसे अदालत ने सीमित रूप से स्वीकार करते हुए केवल एक दिन का समय दिया।

यह मामला साल 2003 का है, जब राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के नेता राम अवतार जग्गी की राजधानी रायपुर में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस घटना ने उस समय प्रदेश की राजनीति और कानून-व्यवस्था को लेकर व्यापक बहस को जन्म दिया था। साल 2007 में इस मामले में 28 लोगों को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। हालांकि, पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के बेटे अमित जोगी को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया गया था।

इसके बाद यह मामला एक बार फिर कानूनी प्रक्रिया में तब लौटा, जब सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) की अपील को स्वीकार करते हुए इसे पुनः सुनवाई के लिए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट भेज दिया। इससे पहले हाईकोर्ट की एक डिवीजन बेंच दोषियों की अपील खारिज कर चुकी थी और निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा था।

बुधवार को मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली डिवीजन बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए संकेत दिए कि अब सुनवाई को और लंबित नहीं रखा जाएगा। अदालत के इस रुख को देखते हुए माना जा रहा है कि गुरुवार को होने वाली सुनवाई इस लंबे समय से चले आ रहे मामले में महत्वपूर्ण मोड़ ला सकती है। 

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ईमेल से हाई कोर्ट को उड़ाने की धमकी, कोर्ट परिसर छावनी में तब्दील


बिलासपुर।
   TODAY छत्तीसगढ़  /  छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट को ईमेल के ज़रिए बम से उड़ाने की धमकी बुधवार को मिली, जिसके बाद अदालत की कार्यवाही एहतियातन रोक दी गई और पूरे परिसर में तलाशी अभियान चलाया गया।

पुलिस के अनुसार, यह ईमेल उस समय मिला जब मुख्य न्यायाधीश समेत अन्य न्यायाधीश अपने-अपने कोर्ट रूम में मामलों की सुनवाई कर रहे थे। ईमेल मिलने के बाद अदालत प्रशासन ने तुरंत पुलिस को सूचना दी और सुनवाई अस्थायी रूप से स्थगित कर दी गई। हाईकोर्ट से जानकारी मिलते ही पुलिस और प्रशासन के आला अधिकारी मौके पर पहुंचे। इसके बाद अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात किया गया। बम निरोधक दस्ता और डॉग स्क्वायड की टीमों ने उच्च न्यायालय परिसर, कोर्ट रूम, बार रूम, रजिस्ट्रार कार्यालय और अन्य महत्वपूर्ण स्थानों की सघन तलाशी ली। 

एसएसपी के मुताबिक़ ईमेल कहाँ से आया, किसने किया ऐसे तमाम माध्यम का पता लगाने के लिए साइबर टीम पड़ताल कर रही है। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक श्री सिंह ने बताया कि धमकी को गंभीरता से लिया गया है और सभी आवश्यक सुरक्षा उपाय किए गए हैं। हालांकि इस तरह के ईमेल कुछ समय पहले भी भेजे गये जिसमें स्थानीय अदालतों को बम के जरिये उड़ाने की धमकी दी गई थी। 

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High Court: पुलिस अफसर पर यौन उत्पीड़न का आरोप, अग्रिम जमानत नामंजूर


बिलासपुर। 
 TODAY छत्तीसगढ़  / यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों में फंसे एक पुलिस अधिकारी को छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट से कोई राहत नहीं मिली है। हाई कोर्ट की सिंगल बेंच ने आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि आरोपी पुलिस अफसर है और उसे अग्रिम जमानत देने पर गवाहों को प्रभावित करने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरोपों की प्रकृति अत्यंत गंभीर है, ऐसे में राहत देने का कोई आधार नहीं बनता।

मामला दुर्ग जिले के पुराना भिलाई थाना क्षेत्र का है। यहां रहने वाली एक महिला की शिकायत पर पुलिस अधिकारी अरविंद कुमार मेढ़े के खिलाफ यौन उत्पीड़न का अपराध दर्ज किया गया है। पीड़िता ने एफआईआर में बताया कि उसका बेटा पॉक्सो एक्ट के एक मामले में जेल में बंद है। इसी का फायदा उठाकर आरोपी अधिकारी ने बेटे की जमानत कराने का झांसा दिया और उससे संपर्क बढ़ाया।

पीड़िता के अनुसार, 18 नवंबर 2025 की शाम उसे थाने बुलाया गया, जहां महिला पुलिसकर्मियों द्वारा कुछ दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कराए गए। इसके बाद आरोपी ने फोन कर उसे चरौदा बस स्टैंड बुलाया और अपनी गाड़ी में बैठाकर एक सुनसान जंगल वाले इलाके में ले गया। वहां आरोपी ने शारीरिक संबंध बनाने का दबाव डाला, गले लगाया और अश्लील हरकतें कीं। मासिक धर्म की जानकारी देने पर आरोपी ने उसे छोड़ दिया और दो दिन बाद फिर मिलने की बात कही।

घटना के लगभग 24 घंटे बाद, 19 नवंबर 2025 की शाम करीब छह बजे पीड़िता ने थाने में आरोपी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई। इसके बाद आरोपी की ओर से हाई कोर्ट में अग्रिम जमानत याचिका दायर की गई, जिसमें आरोपों को निराधार बताते हुए एफआईआर में देरी और आपराधिक रिकॉर्ड न होने की दलील दी गई। हालांकि, कोर्ट ने इन तर्कों को स्वीकार नहीं किया और याचिका खारिज कर दी।

इस आदेश के जरिए हाई कोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिया है कि वर्दी या पद की आड़ में किए गए अपराधों पर न्यायालय सख्त रुख अपनाएगा। साथ ही, यह फैसला यौन अपराधों में पीड़ितों की शिकायतों को गंभीरता से लेने और जांच को स्वतंत्र व निष्पक्ष बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

अतिरिक्त महाधिवक्ता रणवीर सिंह मरहास ने दिया इस्तीफा, विधि सचिव को भेजा त्यागपत्र


बिलासपुर।
  TODAY छत्तीसगढ़  / छत्तीसगढ़ शासन के अतिरिक्त महाधिवक्ता रणवीर सिंह मरहास ने शनिवार को अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने राज्य सरकार के विधि सचिव को त्यागपत्र भेजते हुए इसे तत्काल प्रभाव से स्वीकार करने का अनुरोध किया है।

गौरतलब है कि इससे पहले 17 नवंबर को तत्कालीन महाधिवक्ता प्रफुल्ल भारत ने अपने पद से त्यागपत्र दिया था। इसके बाद अतिरिक्त महाधिवक्ता विवेक शर्मा को नया महाधिवक्ता नियुक्त किया गया। विधि सचिव को प्रेषित अपने इस्तीफे में मरहास ने कहा है कि पिछले दो वर्षों तक इस महत्वपूर्ण पद पर सेवा देना उनके लिए सम्मान और सौभाग्य की बात रही। इस दौरान उन्हें राज्य से जुड़े कानूनी मामलों में योगदान देने, विभिन्न न्यायालयों में शासन का प्रतिनिधित्व करने और अनुभवी व समर्पित सहकर्मियों के साथ कार्य करने का अवसर मिला। 

मरहास ने अपने पत्र में राज्य सरकार द्वारा मिले विश्वास और सहयोग के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि शासन के समर्थन से ही वे अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन पूरी क्षमता के साथ कर सके। उन्होंने उल्लेख किया कि उन्होंने अपना कार्यकाल संतोषजनक रूप से पूरा किया है और अब पद छोड़ने का यह उचित समय है।

उल्लेखनीय है कि रणवीर सिंह मरहास भारतीय जनता पार्टी के विभिन्न अनुषांगिक संगठनों से जुड़े रहे हैं और सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय भूमिका निभाते आए हैं। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की स्थापना के बाद वे जबलपुर से बिलासपुर आए और न्यायिक क्षेत्र में निरंतर सक्रिय रहे। वे लंबे समय तक शासकीय अधिवक्ता के रूप में भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं।


सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के विवादित फैसले पर लगाई रोक, यौन हिंसा मामलों में टिप्पणी पर बनेगी गाइडलाइन


दिल्ली। 
 TODAY छत्तीसगढ़  /सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस निर्णय पर रोक लगा दी है, जिसमें कहा गया था कि नाबालिग लड़की के ब्रेस्ट दबाना, पायजामे का नाड़ा तोड़ना और उसे पुलिया के नीचे खींचने की कोशिश करना ‘दुष्कर्म के प्रयास’ की श्रेणी में नहीं आता। सर्वोच्च न्यायालय ने इस फैसले पर सख्त रुख अपनाते हुए टिप्पणी की कि यौन अपराध से जुड़े संवेदनशील मामलों पर अदालतों की टिप्पणी पीड़िता और समाज पर गंभीर असर डालती है, इसलिए जरूरत है कि न्यायिक मर्यादा के अनुरूप दिशानिर्देश तय किए जाएं।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की डिवीजन बेंच ने सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि इस मामले में ट्रायल IPC की धारा 376 (दुष्कर्म) और POCSO एक्ट की धारा 18 (रेप की कोशिश) के तहत ही चलेगा। अदालत ने इस पर रोक लगाते हुए कहा कि संवेदनशील मामलों में अदालतों के शब्द समाज में गलत संदेश न दें।


यह मामला NGO ‘वी द वीमेन ऑफ इंडिया’ द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के बाद सामने आया। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि देश के विभिन्न हाई कोर्ट ऐसे मामलों में आपत्तिजनक टिप्पणियां कर चुके हैं, जिससे सामाजिक मानसिकता और न्यायिक दृष्टिकोण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
अधिवक्ता ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक अन्य फैसले का हवाला देते हुए कहा कि एक पीड़िता के नशे में होने पर कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि “आप खुद मुसीबत को बुला रहे हैं।” इसी तरह के बयान कलकत्ता और राजस्थान हाई कोर्ट के मामलों में भी दर्ज हैं।


सुनवाई के दौरान CJI ने कहा,

“न्यायपालिका को संवेदनशीलता दिखानी चाहिए। कभी-कभी ऐसे बयान दिए जाते हैं जो पीड़ित पर उल्टा असर डालते हैं और समाज में गलत संदेश पहुंचाते हैं।”

सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि यौन हिंसा से जुड़े मामलों में अदालतों के लिए जल्द ही मार्गदर्शक सिद्धांत तैयार किए जाएंगे, ताकि न्यायिक टिप्पणियां न्यायिक गरिमा और सामाजिक संवेदनशीलता के अनुरूप हों। 


58% आरक्षण पर फिर विवाद, प्रभावित अभ्यर्थियों की अवमानना याचिका; सुप्रीम कोर्ट के फैसले तक सुनवाई टली


बिलासपुर।
 TODAY छत्तीसगढ़  / छत्तीसगढ़ में 58 प्रतिशत आरक्षण लागू रखने के राज्य सरकार के फैसले पर फिर विवाद गहराने लगा है। इसी मुद्दे पर प्रभावित अभ्यर्थियों ने एक बार फिर छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। अभ्यर्थियों की ओर से अदालत में अवमानना याचिका दायर कर राज्य सरकार से 58 प्रतिशत आरक्षण की स्थिति स्पष्ट करने की मांग की गई है।

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि प्रदेश में दो अलग-अलग आरक्षण रोस्टर लागू होने से राज्य स्तरीय भर्तियों में पदों की संख्या प्रभावित हो रही है, जिससे वे प्रत्यक्ष रूप से नुकसान और असमंजस की स्थिति का सामना कर रहे हैं।

गौरतलब है कि 19 सितंबर 2022 को हाईकोर्ट ने 58 प्रतिशत आरक्षण को असंवैधानिक ठहराया था, जिसके खिलाफ राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। अदालत में अतिरिक्त महाधिवक्ता ने बताया कि मामला वर्तमान में उच्चतम न्यायालय में लंबित है। यह भी स्पष्ट किया गया कि राज्य सरकार को सुप्रीम कोर्ट से 58 प्रतिशत आरक्षण जारी रखने के लिए कोई स्थगन आदेश प्राप्त नहीं हुआ है।

अभ्यर्थियों ने अमीन पटवारी, एडीईओ और अन्य भर्ती प्रक्रियाओं में 58 प्रतिशत आरक्षण लागू करने के खिलाफ यह अवमानना याचिका दायर की है। सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने माना कि राज्य में 58 प्रतिशत आरक्षण लागू करना हाईकोर्ट के आदेश की अवमानना है, हालांकि मामला सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन होने के कारण अदालत ने फिलहाल निर्णय टालते हुए कहा कि उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद ही इस मामले में आगे सुनवाई की जाएगी।

प्रशिक्षु न्यायाधीशों को लैपटॉप, मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा ने किया वितरण

फाइल फोटो / टीसीजी न्यूज़ 

Chhattisgarh High Court: ग्रुप-डी भर्ती में अभ्यर्थियों को राहत, रेलवे की याचिकाएं खारिज


बिलासपुर।
 TODAY छत्तीसगढ़  / रेलवे में ग्रुप-डी की नौकरी पाने का इंतजार कर रहे अभ्यर्थियों को हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे में वर्ष 2010 में निकाली गई भर्ती की प्रक्रिया को लेकर दायर याचिकाओं पर अदालत ने अभ्यर्थियों के पक्ष में फैसला सुनाया है। जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की डबल बेंच ने रेलवे की सभी याचिकाएं खारिज कर दी। इसके साथ ही रिप्लेसमेंट कोटा के तहत योग्य अभ्यर्थियों की नियुक्ति का रास्ता साफ हो गया है।

मामला 15 दिसंबर 2010 का है, जब आरआरबी बिलासपुर ने ग्रुप-डी के पदों के लिए अधिसूचना जारी की थी। लंबे समय तक नियुक्ति नहीं होने पर अभ्यर्थियों ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) में मामला पहुंचाया। कैट ने 6 मार्च 2024 को रेलवे को निर्देश दिया था कि 17 जून 2008 की अधिसूचना के अनुसार रिक्त पदों की स्थिति की जांच कर, रिप्लेसमेंट कोटा में योग्य अभ्यर्थियों की नियुक्ति पर विचार किया जाए।

रेलवे ने कैट के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए दलील दी कि चयन पैनल में शामिल होने से किसी उम्मीदवार को नियुक्ति का अधिकार स्वतः प्राप्त नहीं हो जाता। हाईकोर्ट ने रेलवे की दलील को खारिज करते हुए कहा कि वैध रूप से तैयार चयन पैनल को बिना ठोस कारण नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भले ही चयनित उम्मीदवार को स्वतः नियुक्ति का अधिकार न हो, लेकिन वह निष्पक्ष, उचित और कानूनी विचार का हकदार है।

अदालत ने यह भी कहा कि जब मेरिट में योग्य उम्मीदवार मौजूद हों और पद रिक्त हों, तो नियुक्ति केवल उचित कारणों से ही रोकी जा सकती है। फैसले से 100 से अधिक अभ्यर्थियों को राहत मिलने की उम्मीद है, जो लंबे समय से नियुक्ति की प्रतीक्षा कर रहे थे।

हाई कोर्ट: सक्ती के राजा धर्मेंद्र सिंह बरी, छेड़खानी और दुष्कर्म की कोशिश मामले में ट्रायल कोर्ट की सजा रद्द


बिलासपुर । 
 TODAY छत्तीसगढ़  /  छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के डिवीजन बेंच ने सक्ती के राजा धर्मेंद्र सिंह उर्फ धर्मेंद्र सिदार को छेड़खानी और दुष्कर्म की कोशिश के आरोपों से बरी कर दिया है। अदालत ने ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई पांच और सात वर्ष की कठोर कैद तथा जुर्माने की सजा को रद्द करते हुए उनकी तत्काल रिहाई के आदेश जारी किए हैं। ट्रायल कोर्ट के फैसले के बाद आरोपी जेल में बंद था।

ट्रायल कोर्ट के फैसले को हाई कोर्ट में दी गई थी चुनौती

बीएनएसएस, 2023 की धारा 415(2) के तहत धर्मेंद्र सिंह ने 21 मई 2025 को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (एफटीसी) सक्ती द्वारा पारित आदेश को चुनौती दी थी। ट्रायल कोर्ट ने उन्हें

  • धारा 450 आईपीसी में पांच वर्ष का कठोर कारावास एवं ₹5000 जुर्माना

  • धारा 376(1) आईपीसी में सात वर्ष का कठोर कारावास एवं ₹10000 जुर्माना
    की सजा सुनाई थी, जिसे एकसाथ चलाने का आदेश दिया गया था।

दूसरी ओर, पीड़िता ने सजा बढ़ाने की मांग करते हुए हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। दोनों मामलों की एकसाथ सुनवाई की गई।


क्या है मामला?

पीड़िता ने 10 जनवरी 2022 को पुलिस में लिखित रिपोर्ट दी थी कि 09 जनवरी की रात करीब 9 बजे, जब वह घर पर अकेली थी, आरोपी धर्मेंद्र सिदार घर में घुस आया और अभद्र व्यवहार करते हुए दुष्कर्म की कोशिश की। आरोप है कि आरोपी ने उसकी साड़ी, ब्लाउज और पेटीकोट फाड़ने की कोशिश की। विरोध करने पर उसकी चूड़ियां टूट गईं। शोर मचाने पर आरोपी भाग गया।

रिपोर्ट के आधार पर थाना सक्ती में धारा 450, 354, 376 और 377 आईपीसी के तहत अपराध दर्ज किया गया। जांच के दौरान धारा 377 हटाकर 354(बी) और 376 जोड़ी गईं। पुलिस ने पीड़िता, गवाहों और आरोपी के बयान दर्ज कर आरोपी का मेडिकल परीक्षण कराया। जांच पूरी होने पर आरोप–पत्र न्यायालय में प्रस्तुत किया गया।


याचिकाकर्ता बोले—पारिवारिक विवाद में झूठा फंसाया गया

हाई कोर्ट में याचिका दायर करते हुए धर्मेंद्र सिंह ने कहा कि उन्हें संपत्ति, गोद लेने व उत्तराधिकार से जुड़े पुराने पारिवारिक विवादों के चलते झूठा फंसाया गया है। उन्होंने कहा कि सक्ती के युवराज के रूप में राज्याभिषेक के बाद से उनके खिलाफ झूठी शिकायतें दर्ज होती रही हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि—

  • एक पूर्व शिकायत एसडीओ जांच में झूठी पाई गई थी।

  • 06 मार्च 2022 की डीएसपी जांच में भी घटना के प्रमाण नहीं मिले।

  • सीसीटीवी फुटेज में पीड़िता को रात 9:30 बजे पुलिस स्टेशन पहुंचते देखा गया, जो उसके बयान से मेल नहीं खाता।

  • तत्कालीन टीआई रूपक शर्मा जैसे महत्वपूर्ण गवाहों से पूछताछ नहीं की गई।

  • मेडिकल रिपोर्ट में कोई चोट का निशान नहीं पाया गया।

याचिकाकर्ता का कहना था कि ट्रायल कोर्ट ने इन महत्वपूर्ण तथ्यों को नजरअंदाज कर दिया।


हाई कोर्ट ने कहा—अभियोजन आरोप सिद्ध नहीं कर सका

चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस बीडी गुरु की डिवीजन बेंच ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करने में विफल रहा।

फैसले में कहा गया—

“अभियोजन के बयानों में विरोधाभास, चिकित्सीय साक्ष्य का अभाव, महत्वपूर्ण गवाहों से पूछताछ न होना, सीसीटीवी फुटेज से उत्पन्न संदेह और भौतिक तथ्यों की अनदेखी के चलते दोषसिद्धि को बरकरार रखना सुरक्षित नहीं होगा। आरोपी संदेह का लाभ पाने का हकदार है।”


धर्मेंद्र सिंह सभी आरोपों से बरी, रिहाई के आदेश

डिवीजन बेंच ने ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई सजा और दोषसिद्धि को पूर्णतः रद्द करते हुए धर्मेंद्र सिंह को धारा 450, 354 और 376(1) आईपीसी के सभी आरोपों से बरी कर दिया। अदालत ने जेल प्रशासन को उनकी तत्काल रिहाई के निर्देश दिए हैं।

हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: अमित बघेल की तत्काल गिरफ्तारी की मांग खारिज


रायपुर।
 TODAY छत्तीसगढ़  / जोहार छत्तीसगढ़ पार्टी के प्रमुख अमित बघेल के खिलाफ कथित हेट स्पीच मामले में दायर याचिका पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी भी आपराधिक जांच में अदालत जबरन दिशा-निर्देश नहीं दे सकती। कोर्ट ने आरोपी की तत्काल गिरफ्तारी और वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा निगरानी की मांग को न्यायिक दायरे से बाहर बताया।

अवंती विहार निवासी अमित अग्रवाल की ओर से दायर याचिका में आरोप लगाया गया था कि बघेल सिंधी, जैन और अग्रवाल समाज के खिलाफ आपत्तिजनक बयान दे रहे हैं और राज्य सरकार कार्रवाई नहीं कर रही है । याचिकाकर्ता ने बघेल की तुरंत गिरफ्तारी, समयबद्ध जांच और उच्च स्तरीय मॉनिटरिंग की मांग की थी।

राज्य सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि बघेल के खिलाफ विभिन्न स्थानों पर कई एफआईआर दर्ज हैं और सभी मामलों में जांच विधि सम्मत रूप से जारी है। जांच में देरी या निष्क्रियता के आरोपों को सरकार ने गलत बताया। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की डिवीजन बेंच ने कहा कि जब कई FIR की जांच पहले से प्रगति पर है, तब हाईकोर्ट के लिए हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं बनती। 

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि:
“किसी आपराधिक जांच का माइक्रो मैनेजमेंट न्यायालय नहीं कर सकता।” अंत में कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि कानून अपनी प्रक्रिया से ही चलेगा, न दबाव में और न निर्देशों से।

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय: विवेक शर्मा नए महाधिवक्ता नियुक्त, प्रफुल्ल कुमार भारत का इस्तीफ़ा स्वीकार

 


बिलासपुर। 
TODAY छत्तीसगढ़  / छत्तीसगढ़ सरकार ने शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक बदलाव किया है। राज्यपाल द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, राज्य के महाधिवक्ता प्रफुल्ल कुमार भारत का त्यागपत्र तत्काल प्रभाव से स्वीकार कर लिया गया है।

उनके इस्तीफ़े के बाद सरकार ने बिलासपुर के अतिरिक्त महाधिवक्ता विवेक शर्मा को राज्य का नया महाधिवक्ता (Advocate General) नियुक्त किया है। राज्यपाल ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 165(1) के तहत विवेक शर्मा को यह नियुक्ति प्रदान की है। अधिसूचना के अनुसार, शर्मा कार्यभार ग्रहण करने की तारीख से महाधिवक्ता के रूप में अपना पद संभालेंगे।

प्रफुल्ल कुमार भारत राज्य के शीर्ष विधि अधिकारी के रूप में अपनी सेवाएँ दे रहे थे। उनके इस्तीफ़े के बाद अब विवेक शर्मा पर राज्य सरकार के कानूनी मामलों की पूरी ज़िम्मेदारी होगी। 

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