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जग्गी हत्याकांड में हाईकोर्ट के फैसले पर लगी रोक, अमित जोगी को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत

नई दिल्ली। TODAY छत्तीसगढ़  / छत्तीसगढ़ के पूर्व सीएम अजीत जोगी के बेटे अमित जोगी को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है. सुप्रीम कोर्ट ने उनकी आजीवन कारावास की सजा पर रोक लगा दी है. एनसीपी नेता राम अवतार जग्गी हत्याकांड मामले में अमित जोगी छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की तरफ से दोषी मानते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी. जिसके खिलाफ अमित जोगी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी. जहां 23 अप्रैल को हुई सुनवाई में सर्वोच्च न्यायालय ने  अमित जोगी को दोषी ठहराए जाने के फैसले पर रोक लगाई है. जो उनके लिए बड़ी राहत मानी जा रही है.  

सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के उस फैसले को पलट दिया है. जिसमें हाईकोर्ट ने अमित जोगी को जग्गी हत्याकांड में आरोपी मानते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी. उन्हें तीन हफ्ते के अंदर सरेंडर करने के लिए भी कहा गया था. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को पलट दिया है. सर्वोच्च न्यायालय ने आजीवन कारावास की सजा पर रोक लगा दी है. जग्गी हत्याकांड 2003 में हुआ था. यह छत्तीसगढ़ बनने के बाद कोई पहला हाईप्रोफाइल मामला था. जिसमें अमित जोगी का नाम सामने आया था. ऐसे में यह मामला पूरे छत्तीसगढ़ में चर्चा में था. 

अमित जोगी ने लगाई थी दो याचिका 

अमित जोगी ने सुप्रीम कोर्ट में दो याचिका लगाई थी. जिसमें पहली याचिका में सीबीआई से संबंधित अपील दायर करने के मामले में थी. दूसरी याचिका में हाई कोर्ट के मुख्य फैसले को चुनौती दी गई थी. जिसमें उन्हें आजीवन कारावास की सजा दी गई थी. अमित जोगी के वकीलों ने तर्कों के आधार पर सजा पर रोक लगाने या निरस्त करने की मांग की थी. ऐसे में अमित जोगी के लिए फिलहाल राहत मिली है. 

जग्गी हत्याकांड से जुड़ा है मामला 

मामला रायपुर के कारोबारी और एनसीपी नेता रामअवतार जग्गी की हत्या से जुड़ा है. 4 जून 2003 को रायपुर में गोली मारकर उनकी हत्या कर दी गई थी. जिसमें अजित जोगी का नाम सामने आया था. 2007 में उन्हें इस मामले में बरी कर दिया गया था. लेकिन जग्गी के बेटे ने इस फैसले के खिलाफ याचिका लगाई थी. जिसमें हाई कोर्ट ने 2026 में अमित जोगी को दोषी पाया था. इसके बाद उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुना दी गई थी. 23 साल पुराने इस मामले में अब एक बार फिर बड़ा फैसला आ गया है. 


जग्गी हत्याकांड: सुप्रीम कोर्ट से अमित जोगी को राहत नहीं, 23 अप्रैल को अगली सुनवाई


नई दिल्ली/रायपुर।
  TODAY छत्तीसगढ़  /  बहुचर्चित रामअवतार जग्गी हत्याकांड में उम्रकैद की सजा पाए अमित जोगी को सुप्रीम कोर्ट से फिलहाल कोई राहत नहीं मिली है। सोमवार को दो जजों की बेंच ने उनकी अपील पर सुनवाई करते हुए सरेंडर पर रोक देने से इनकार कर दिया। अब इस मामले की अगली सुनवाई 23 अप्रैल को होगी।

अमित जोगी की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दो अलग-अलग याचिकाएं दायर की गई थीं। एक याचिका हाईकोर्ट के आदेश के तहत सरेंडर पर स्थगन के लिए एक जज के चैंबर में प्रस्तुत की गई, जबकि दूसरी याचिका दो जजों की बेंच के समक्ष लगाई गई। सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि सरेंडर पर राहत का निर्णय संबंधित जज के चैंबर में ही लिया जाएगा। सुनवाई के दौरान मृतक नेता रामअवतार जग्गी के पुत्र सतीश जग्गी के वकील भी अदालत में उपस्थित रहे। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल कोई अंतरिम राहत देने से इनकार करते हुए मामले को 23 अप्रैल के लिए सूचीबद्ध किया है।

गौरतलब है कि बिलासपुर हाईकोर्ट ने वर्ष 2003 के इस चर्चित हत्याकांड में बड़ा फैसला सुनाते हुए अमित जोगी को दोषी ठहराया था। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की बेंच ने सीबीआई की अपील स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट के 31 मई 2007 के फैसले को पलट दिया था। हाईकोर्ट ने अमित जोगी को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 और 120-बी के तहत दोषी मानते हुए आजीवन कारावास और एक हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। अदालत ने अपने आदेश में कहा था कि समान साक्ष्यों के आधार पर अन्य आरोपियों को दोषी ठहराना और मुख्य साजिशकर्ता को बरी करना न्यायसंगत नहीं है। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को त्रुटिपूर्ण और साक्ष्यों के विपरीत बताया था।

मामले के अनुसार, 4 जून 2003 की रात रायपुर में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के नेता रामअवतार जग्गी की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। सीबीआई जांच में इसे राजनीतिक साजिश बताते हुए अमित जोगी को मुख्य आरोपी बनाया गया था। जांच के दौरान गवाहों के बयान, कॉल डिटेल और दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर साजिश की पुष्टि हुई थी। हाईकोर्ट ने अमित जोगी को तीन सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट में सरेंडर करने का निर्देश दिया था और समय सीमा में पालन न होने पर गिरफ्तारी के निर्देश भी दिए गए थे।

जग्गी हत्याकांड: सुप्रीम कोर्ट में हाईकोर्ट के दो फैसलों को जोड़कर संयुक्त सुनवाई 20 अप्रैल को


नई दिल्ली / बिलासपुर।
 TODAY छत्तीसगढ़  /  बहुचर्चित रामअवतार जग्गी हत्याकांड में पूर्व विधायक अमित जोगी को सुप्रीम कोर्ट से तत्काल राहत नहीं मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) पर सुनवाई करते हुए फिलहाल कोई अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया, हालांकि मामले की अगली सुनवाई 20 अप्रैल 2026 को तय की गई है।

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस विक्रम नाथ और संजीव मेहता की पीठ ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के 25 मार्च और 2 अप्रैल 2026 के फैसलों को एक साथ जोड़ते हुए 20 अप्रैल को संयुक्त सुनवाई का निर्णय लिया है।अमित जोगी ने हाईकोर्ट द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सजा को चुनौती देते हुए एसएलपी दायर की थी।

हाईकोर्ट ने उन्हें हत्या और साजिश के मामले में दोषी करार दिया है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल सजा पर रोक लगाने से इनकार किया है। सुनवाई के दौरान अमित जोगी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, मुकुल रोहतगी, विवेक तन्खा और सिद्धार्थ दवे ने पक्ष रखा।

वकीलों ने दलील दी कि—
हाईकोर्ट के फैसलों में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन नहीं हुआ
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व आदेशों की अवहेलना की गई
एक निर्णय बिना सुनवाई का अवसर दिए पारित किया गया

सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि अमित जोगी अंतिम निर्णय के विरुद्ध 20 अप्रैल से पहले याचिका दायर करें, ताकि सभी संबंधित मामलों की एक साथ अंतिम सुनवाई की जा सके।

सुप्रीम कोर्ट ने अमित जोगी को राहत देने से किया इनकार, उम्रकैद बरकरार

नई दिल्ली।  TODAY छत्तीसगढ़  /  बहुचर्चित रामअवतार जग्गी हत्याकांड में पूर्व विधायक अमित जोगी को सुप्रीम कोर्ट से भी राहत नहीं मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट के फैसले पर रोक देने से इनकार कर दिया। इससे पहले छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 2003 के चर्चित रामअवतार जग्गी हत्याकांड में अमित जोगी को दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट ने उन्हें हत्या की साजिश और हत्या के अपराध में मुख्य साजिशकर्ता मानते हुए सजा दी थी।

हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए अमित जोगी ने सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर की थी, लेकिन शीर्ष अदालत से उन्हें कोई राहत नहीं मिली। सुप्रीम कोर्ट के इस रुख के बाद अब उन्हें सजा का पालन करना होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के विवादित फैसले पर लगाई रोक, यौन हिंसा मामलों में टिप्पणी पर बनेगी गाइडलाइन


दिल्ली। 
 TODAY छत्तीसगढ़  /सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस निर्णय पर रोक लगा दी है, जिसमें कहा गया था कि नाबालिग लड़की के ब्रेस्ट दबाना, पायजामे का नाड़ा तोड़ना और उसे पुलिया के नीचे खींचने की कोशिश करना ‘दुष्कर्म के प्रयास’ की श्रेणी में नहीं आता। सर्वोच्च न्यायालय ने इस फैसले पर सख्त रुख अपनाते हुए टिप्पणी की कि यौन अपराध से जुड़े संवेदनशील मामलों पर अदालतों की टिप्पणी पीड़िता और समाज पर गंभीर असर डालती है, इसलिए जरूरत है कि न्यायिक मर्यादा के अनुरूप दिशानिर्देश तय किए जाएं।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की डिवीजन बेंच ने सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि इस मामले में ट्रायल IPC की धारा 376 (दुष्कर्म) और POCSO एक्ट की धारा 18 (रेप की कोशिश) के तहत ही चलेगा। अदालत ने इस पर रोक लगाते हुए कहा कि संवेदनशील मामलों में अदालतों के शब्द समाज में गलत संदेश न दें।


यह मामला NGO ‘वी द वीमेन ऑफ इंडिया’ द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के बाद सामने आया। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि देश के विभिन्न हाई कोर्ट ऐसे मामलों में आपत्तिजनक टिप्पणियां कर चुके हैं, जिससे सामाजिक मानसिकता और न्यायिक दृष्टिकोण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
अधिवक्ता ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक अन्य फैसले का हवाला देते हुए कहा कि एक पीड़िता के नशे में होने पर कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि “आप खुद मुसीबत को बुला रहे हैं।” इसी तरह के बयान कलकत्ता और राजस्थान हाई कोर्ट के मामलों में भी दर्ज हैं।


सुनवाई के दौरान CJI ने कहा,

“न्यायपालिका को संवेदनशीलता दिखानी चाहिए। कभी-कभी ऐसे बयान दिए जाते हैं जो पीड़ित पर उल्टा असर डालते हैं और समाज में गलत संदेश पहुंचाते हैं।”

सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि यौन हिंसा से जुड़े मामलों में अदालतों के लिए जल्द ही मार्गदर्शक सिद्धांत तैयार किए जाएंगे, ताकि न्यायिक टिप्पणियां न्यायिक गरिमा और सामाजिक संवेदनशीलता के अनुरूप हों। 


Supreme Court : 'बुलडोज़र एक्शन' बिना कारण बताओ नोटिस के कार्रवाई नहीं, जारी हुए दिशा-निर्देश

नई दिल्ली / TODAY छत्तीसगढ़  / सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय बेंच ने बुधवार को देश में बुलडोज़र से संपत्तियों को तोड़े जाने को लेकर दिशा निर्देश जारी किए हैं. जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने कहा है कि किसी व्यक्ति के घर या संपत्ति को सिर्फ़ इसलिए तोड़ दिया जाना कि उस पर अपराध के आरोप हैं, क़ानून के शासन के ख़िलाफ़ है.

सुप्रीम कोर्ट ने ये दिशा-निर्देश घरों को बुलडोज़र से तोड़े जाने के ख़िलाफ़ दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दिए हैं. अपना आदेश सुनाते हुए जस्टिस गवई ने कहा, ''एक आम नागरिक के लिए घर बनाना कई सालों की मेहनत, सपनों और महत्वाकांक्षाओं का नतीजा होता है.'' कई राज्यों में प्रशासन ने ऐसे लोगों के घरों को तोड़ा है, जिन पर सरकार के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शनों में शामिल होने का शक़ था.

उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के शासन में बुलडोज़र का महिमामंडन भी किया गया है. उनके कई समर्थक राजनीतिक रैलियों में बुलडोज़र लेकर आते रहे.

अपना आदेश सुनाते हुए जस्टिस गवई और जस्टिस विश्वनाथन की बेंच ने कहा, ''हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि अगर कार्यपालिका मनमाने ढंग से किसी नागरिक के घर को केवल इस आधार पर तोड़ देती है कि वह किसी अपराध का अभियुक्त है तो कार्यपालिका क़ानून के शासन के सिद्धांतों के ख़िलाफ़ कार्य करती है.''

''अगर कार्यपालिका न्यायाधीश के रूप में कार्य करते हुए किसी नागरिक पर केवल अभियुक्त होने के आधार पर विध्वंस का दंड लगाती है तो यह शक्तियों के विभाजन के सिद्धांत का भी उल्लंघन है.''

एकतरफ़ा कार्रवाई रोकने के लिए अदालत ने क्या निर्देश दिए - 

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में ये भी कहा है कि ऐसे मामलों में जो अधिकारी क़ानून अपने हाथ में लेते हुए इस तरह की मनमानी कार्रवाई करते हैं, उन्हें भी जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस तरह की मनमानी, एकतरफ़ा और भेदभावपूर्ण कार्रवाइयों को रोकने के लिए कुछ दिशा निर्देश ज़रूरी है.

अदालत ने ऐसी परिस्थितियों से निबटने के लिए कई दिशा-निर्देश भी जारी किए हैं.

पूर्व में कारण बताओ नोटिस दिए बिना विध्वंस की कोई कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए. इस नोटिस का उत्तर या तो स्थानीय नगरपालिका क़ानूनों में निर्धारित समय के अनुसार या नोटिस दिए जाने के पंद्रह दिनों के भीतर दिया जा सके.

नोटिस पंजीकृत डाक से भेजा जाए और संपत्ति पर भी चिपकाया जाए. नोटिस में विध्वंस के आधार स्पष्ट हो.

नोटिस को पूर्व तिथि पर जारी किए जाने के आरोपों से बचने के लिए, जैसे ही नोटिस संपत्ति के स्वामी या वहां रहने वालों को भेजा जाए, उसके बारे में जानकारी ज़िलाधिकारी कार्यालय या कलेक्टर ऑफ़िस में भी भेजी जाए.

देश की हर स्थानीय नगर पालिका प्राधिकरण को, इन दिशा निर्देशों के प्रकाशन के तीन महीनों के भीतर एक डिज़िटल पोर्टल बनाना करना होगा, जिस पर नोटिस दिए जाने, नोटिस चिपकाए जाने, नोटिस के जवाब और इस संबंध में जारी आदेश की कॉपी सार्वजनिक हो.

प्रशासन को पीड़ित को सुनवाई का मौक़ा देना होगा और इसकी बैठक की रिकॉर्डिंग भी की जाए.

विध्वंस के आदेश के ख़िलाफ़ अपील किए जाने और न्यायिक समीक्षा का अवसर भी होना चाहिए.

विध्वंस के आदेश को डिज़िटल पोर्टल पर प्रदर्शित किया जाना चाहिए.

संपत्ति के स्वामी को अवैध हिस्से को पंद्रह दिनों के भीतर स्वयं गिराने का अवसर दिया जाना चाहिए और अगर अपील प्राधिकरण विध्वंस आदेश पर स्थगन आदेश ना दे, तब ही विध्वंस की कार्रवाई की जानी चाहिए.

विध्वंस की कार्रवाई की वीडियोग्राफ़ी की जानी चाहिए और विध्वंस रिपोर्ट तैयार की जानी चाहिए.

किसी भी निर्देश का उल्लंघन होने पर अवमानना की कार्रवाई की जाएगी. अगर विध्वंस की कार्रवाई में अदालत के निर्देशों का उल्लंघन पाया जाता है तो संबंधित अधिकारियों अपने निजी खर्च पर गिराई गई संपत्ति की पुनर्स्थापना कराएंगे.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ये आदेश ऐसे मामलों में लागू नहीं होंगे जहां सार्वजनिक स्थलों, जैसे कि सड़क पर कोई अवैध संरचना हो. किसी अदालत द्वारा दिए गए विध्वंस के आदेशों पर भी यह दिशा निर्देश लागू नहीं होंगे.

इससे पहले अदालत ने अपने आदेश सुरक्षित करते हुए आश्वासन दिया था कि वह दोषी क़रार दिए गए अपराधियों की भी वैध निजी संपत्तियों की राज्य प्रायोजित दंडात्मक विध्वंस कार्रवाइयों से रक्षा करेगी. (सोर्स/ साभार - बीबीसी)


नागरिकता एक्ट की धारा 6A की वैधता बरकरार, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

 नई दिल्ली /  TODAY छत्तीसगढ़  /  सुप्रीम कोर्ट ने सिटीजनशिप एक्ट की धारा 6A की वैधता पर अपना फैसला सुना दिया है. कोर्ट ने धारा 6A की वैधता को बरकरार रखा है. CJI डीवाई चंद्रचूड़ का कहना था कि 6A उन लोगों को नागरिकता प्रदान करता है जो संवैधानिक प्रावधानों के अंतर्गत नहीं आते हैं और ठोस प्रावधानों के अंतर्गत नहीं आते हैं. 

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार से अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों की पहचान, पता लगाने और निर्वासन के लिए असम में तत्कालीन सर्बानंद सोनोवाल सरकार में NRC को लेकर दिए गए निर्देशों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए कहा है. सुप्रीम कोर्ट अब से इस पहचान और निर्वासन प्रक्रिया की निगरानी करेगा.

दरअसल, सिटीजनशिप एक्ट की धारा 6A को 1985 में असम समझौते को आगे बढ़ाने के लिए संशोधन के बाद जोड़ा गया था. असम समझौते के तहत भारत आने वाले लोगों की नागरिकता के लिए एक विशेष प्रावधान के रूप में नागरिकता अधिनियम में धारा 6ए जोड़ी गई थी. इस धारा में कहा गया है कि जो लोग 1985 में बांग्लादेश समेत क्षेत्रों से 1 जनवरी 1966 या उसके बाद लेकिन 25 मार्च 1971 से पहले असम आए हैं और तब से वहां रह रहे हैं, उन्हें भारतीय नागरिकता प्राप्त करने के लिए धारा 18 के तहत अपना रजिस्ट्रेशन कराना होगा. इस प्रावधान ने असम में बांग्लादेशी प्रवासियों को नागरिकता देने की अंतिम तारीख 25 मार्च 1971 तय कर दी. इससे पहले दिसंबर 2023 में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामे दायर किया था और कहा था कि वो भारत में अवैध प्रवास की सीमा के बारे में सटीक डेटा नहीं दे पाएगा क्योंकि प्रवासी चोरी-छिपे आए हैं.

गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कहा, 6ए उन लोगों को नागरिकता प्रदान करता है जो जुलाई 1949 के बाद प्रवासित हुए, लेकिन नागरिकता के लिए आवेदन नहीं किया. सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा, S6A उन लोगों को नागरिकता प्रदान करता है जो 1 जनवरी 1966 से पहले प्रवासित हुए थे. इस प्रकार यह उन लोगों को नागरिकता प्रदान करता है जो अनुच्छेद 6 और 7 के अंतर्गत नहीं आते हैं. 

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को नागरिकता अधिनियम 1955 की धारा 6ए की वैधता बरकरार रखी और 4:1 के बहुमत से फैसला दिया. जस्टिस जे पारदीवाला ने असहमति जताई. जस्टिस पारदीवाला का कहना था कि यह संभावित प्रभाव से असंवैधानिक है. सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस सूर्यकांत, एमएम सुंदरेश और मनोज मिश्रा बहुमत में रुख रहा. नागरिकता अधिनियम 1955 की धारा 6ए को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी. इन याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने सुनवाई की और फैसला सुनाया. कोर्ट का कहना था कि असम में 40 लाख प्रवासी हैं और पश्चिम बंगाल में 56 लाख प्रवासी हैं. लेकिन इसका प्रभाव असम में ज्यादा है. इसलिए असम को अलग करना वैध है. 1971 की कटऑफ तिथि तर्कसंगत विचार पर आधारित है. ऑपरेशन सर्चलाइट के बाद पूर्वी पाकिस्तान से पलायन बढ़ा है. 

कोर्ट ने कहा, 6A (3) का उद्देश्य दीर्घकालिक समाधान प्रदान करना है. असम समझौता वहां के निवासियों के अधिकारों को कमजोर करना था. बांग्लादेश और असम समझौते के बाद प्रावधान का उद्देश्य भारतीय नीति के संदर्भ में समझा जाना चाहिए. इसे हटाने से वास्तविक कारणों की अनदेखी होगी. भारत में नागरिकता प्रदान करने के लिए पंजीकरण व्यवस्था जरूरी नहीं है. S 6A को सिर्फ इसलिए अमान्य नहीं कहा जा सकता, क्योंकि यह पंजीकरण व्यवस्था का अनुपालन नहीं करता है. सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि संसद बाद की नागरिकता के लिए शर्तें निर्धारित करने के लिए अलग-अलग शर्तें निर्धारित करने में सक्षम है.

याचिकाकर्ता का तर्क है कि 6A असंवैधानिक है, क्योंकि यह संविधान के अनुच्छेद 6 और 7 की तुलना में नागरिकता के लिए अलग-अलग तारीखें निर्धारित करता है. अलग-अलग तारीख निर्धारित करने की संसद की क्षमता संविधान में है.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, प्रत्येक नागरिक को अनिवार्य रूप से भारत के कानून और संविधान का पालन करना होगा. नागरिकता प्रदान करने से पहले निष्ठा की शपथ का स्पष्ट अभाव कानून का उल्लंघन नहीं है. कोर्ट ने कहा, हम हस्तक्षेप करने के इच्छुक नहीं हैं. S6A स्थायी रूप से संचालित नहीं होता है. 1971 के बाद प्रवेश करने वालों को नागरिकता प्रदान नहीं करता है.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 1 जनवरी 1966 और 24 मार्च 1971 के बीच आए प्रवासियों के लिए नागरिकता नियम कानून के साथ सामंजस्यपूर्ण भूमिका के लिए बनाए गए थे. S6A उन लोगों के निर्वासन की अनुमति देता है जो कट ऑफ तिथि के बाद अवैध रूप से प्रवेश करते हैं. यह नहीं कह सकते कि आप्रवासन ने असम के नागरिकों के वोट देने के अधिकार को प्रभावित किया है. याचिकाकर्ता किसी भी अधिकार का उल्लंघन साबित करने में विफल रहे हैं.

कोर्ट ने कहा, S6A को यह कहने के लिए प्रतिबंधात्मक तरीके से समझने की जरूरत नहीं है कि किसी भी व्यक्ति का पता लगाया जा सकता है और सिर्फ विदेशी अधिनियम के तहत निर्वासित किया जा सकता है. हमें कोई कारण नहीं दिखता कि विदेशियों का पता लगाने के उद्देश्य से IEAA के तहत वैधानिक पहचान का उपयोग 6A के साथ संयोजन में क्यों नहीं किया जा सकता है. IEAA और 6A के बीच कोई विरोध नहीं है. IEAA और धारा 6A को सामंजस्य में पढ़ा जा सकता है. 

तिरुपति लडडू विवाद पर SC ने सुनाया फैसला, कहा हम कोर्ट को राजनीति का अखाड़ा नहीं बनने देंगे


नई दिल्ली
/  TODAY छत्तीसगढ़  /  सुप्रीम कोर्ट ने तिरुपति लड्डू बनाने में जानवरों की चर्बी के इस्तेमाल के आरोपों की जांच के लिए शुक्रवार को एक स्वतंत्र विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह करोड़ों लोगों की आस्था का सवाल है। कोर्ट ने इस पूरे मामले की जांच के पांच सदस्यीय एसआईटी गठित करने का आदेश दिया जिसमें सीबीआई, पुलिस और FSSAI के अधिकारी शामिल होंगे। 

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तिरुपति लड्डू विवाद पर सुप्रीम कोर्ट से कहा कि यदि आरोपों में थोड़ी भी सच्चाई है तो यह अस्वीकार्य है। तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को सुझाव दिया कि एसआईटी जांच की निगरानी केंद्र सरकार के किसी वरिष्ठ अधिकारी द्वारा की जाए। 30 सितंबर को इस मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मेहता से यह तय करने में सहायता करने को कहा था कि राज्य द्वारा नियुक्त एसआईटी द्वारा जांच जारी रहनी चाहिए या किसी स्वतंत्र एजेंसी द्वारा जांच की जानी चाहिए। 

तिरुपति मंदिर में प्रसाद के लड्डू बनाने में जानवरों की चर्बी के कथित इस्तेमाल के मामले में सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच के अनुरोध वाली याचिका समेत अन्य दूसरी याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सामने आया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम अदालत को राजनीतिक युद्धक्षेत्र के रूप में इस्तेमाल नहीं होने देंगे। पिछले महीने की शुरुआत में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने दावा किया था कि राज्य में पिछली जगन मोहन रेड्डी के नेतृत्व वाली सरकार के दौरान तिरुपति में लड्डू तैयार करने में पशु चर्बी का उपयोग किया गया था, जिससे एक बड़ा राजनीतिक विवाद पैदा हो गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने पिछली सुनवाई के दौरान आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू के सार्वजनिक बयान पर सवाल उठाया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि लैब रिपोर्ट बिल्कुल स्पष्ट नहीं है। कोर्ट ने पूछा कि इस बात का क्या सबूत है कि तिरुपति मंदिर में लड्डू बनाने में दूषित घी का इस्तेमाल किया गया था। (साभार-एनबीटी)


Article 370 : मोदी सरकार का फैसला संवैधानिक रूप से वैध - सुप्रीम कोर्ट


 नई दिल्ली।
  TODAY छत्तीसगढ़  /   सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने आज अनुच्छेद 370 पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया. सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को संवैधानिक बताते हुए कहा कि इससे जम्मू-कश्मीर को बाकी भारत से जोड़ने की प्रक्रिया मजबूत हुई है. जम्मू कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा है. 5 अगस्त 2019 को मोदी सरकार ने जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 के प्रभाव को खत्म कर दिया था, साथ ही राज्य को 2 हिस्सों जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में बांट दिया था और दोनों को केंद्र शासित प्रदेश बना दिया था.

सुप्रीम कोर्ट से सोमवार को मोदी सरकार को बड़ी राहत मिली. सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के फैसले को बरकरार रखा है. सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा, जम्मू कश्मीर भारत का अभिन्न अंग हैं. इसकी कोई आंतरिक संप्रभुता नहीं है. 

बता दें कि 5 अगस्त 2019 को मोदी सरकार ने जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 के प्रभाव को खत्म कर दिया था, साथ ही राज्य को 2 हिस्सों जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में बांट दिया था और दोनों को केंद्र शासित प्रदेश बना दिया था. केंद्र के इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 23 अर्जियां दी गई थीं, सभी को सुनने के बाद सितंबर में कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया था. 370 हटने के 4 साल, 4 महीने, 6 दिन बाद आज सुप्रीम कोर्ट में पांच जजों जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस संजय किशन कौल, जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने फैसला सुनाया.  

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बकरीद पर ढील देने पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई सरकार को फटकार

TODAY छत्तीसगढ़  / नई दिल्ली /  सुप्रीम कोर्ट ने बकरीद के मौके पर COVID-19 प्रतिबंधों में ढील देने के लिए केरल सरकार को जमकर फटकार लगाई। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि यह चौंकाने वाली स्थिति है कि केरल सरकार ने लॉकडाउन मानदंडों में ढील देने में व्यापारियों की मांग को मान लिया। इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर सरकार की ओर से दी गई ढील के चलते राज्य में कोरोना का संक्रमण फैलता है तो कोर्ट उचित कार्रवाई करेगी। TODAY छत्तीसगढ़ के WhatsApp ग्रुप में जुड़ने के लिए क्लिक करें   

शीर्ष अदालत ने व्यापारियों के दबाव में बकरीद से पहले ढील देने के लिए केरल सरकार को फटकार लगाई और कहा कि यह माफी योग्य नहीं है। न्यायमूर्ति आर एफ नरीमन और न्यायमूर्ति बी आर गवई की पीठ ने कहा कि केरल सरकार ने बकरीद के अवसर पर पाबंदियों में इस तरह की छूट देकर देश के नागरिकों के लिए राष्ट्रव्यापी महामारी के जोखिम को बढ़ा दिया है।

'केस बढ़े तो कोर्ट उचित कार्रवाई करेगी'

सुप्रीम कोर्ट ने केरल सरकार को चेतावनी देते हुए कि अगर बकरीद के कारण केरल सरकार की ओर से लॉकडाउन में ढील के कारण कोरोना संक्रमण फैलता है, तो कोई भी व्यक्ति इसे अदालत के संज्ञान में ला सकता है। कोर्ट इस पर उचित कार्रवाई करेगी।

दो जस्टिस की बेंच ने आगे कहा, 'किसी भी तरह का दबाव भारत के नागरिकों के जीवन के सबसे कीमती अधिकार से ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं हो सकता है। अगर कोई अप्रिय घटना होती है तो कोई भी जनता इसे हमारे संज्ञान में ला सकती है और उसके अनुसार कार्रवाई की जाएगी।'

कांवड़ यात्रा पर कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया था

पीठ ने कहा, ‘हम केरल सरकार को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निहित जीवन के अधिकार पर ध्यान देने का निर्देश देते हैं।’ पीठ बकरीद के त्योहार के मद्देनजर केरल सरकार द्वारा पाबंदियों में ढील देने के मुद्दे को लेकर दायर एक आवेदन पर सुनवाई कर रही थी। कोर्ट ने महामारी के बीच कांवड़ यात्रा की इजाजत देने के संबंध में उत्तर प्रदेश सरकार के फैसले संबंधी मीडिया में आई खबरों पर पिछले हफ्ते स्वत: संज्ञान लिया था।

कांवड़ यात्रा मामले में दिए गए आदेशों के पालन को कहा

कांवड़ यात्रा पर कोर्ट का कड़ा रुख देखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य में कांवड़ यात्रा रद्द करने का फैसला किया था। इसी परिप्रेक्ष्य में केरल में बकरीद के अवसर पर छूट देने के राज्य सरकार के निर्णय की ओर कोर्ट का ध्यान दिलाने के लिए एक आवेदन दायर किया गया था। इसी के साथ कोर्ट ने केरल को कांवड़ यात्रा मामले में दिए गए आदेशों का पालन करने को कहा। [एनबीटी] 

सुप्रीम कोर्ट : शिव मंदिरों तक गंगा जल पहुँचाने की व्यवस्था हो, योगी सरकार न दे कांवड़ यात्रा की इजाजत


TODAY छत्तीसगढ़  / नई दिल्ली / उत्तर प्रदेश में कांवड़ यात्रा को मंजूरी देने के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में आज सुनवाई हुई। स्वत: संज्ञान मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने कहा कि कांवड़ यात्रा की इजाजत नहीं दी जा सकती है। केंद्र सरकार ने साफ कहा है कि योगी सरकार को शिवमंदिरों तक गंगा जल उपलब्ध कराना चाहिए और कोरोना को देखते हुए हरिद्वार से कांवड़ यात्रा की अनुमति नहीं देनी चाहिए। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को अपने फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए सोमवार तक की मोहलत दी है। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने कोविड-19 महामारी के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा कांवड़ यात्रा निकालने की अनुमति देने की खबर का स्वत: संज्ञान लिया और इस मामले पर राज्य सरकार के साथ-साथ केंद्र से भी जवाब- तलब किया था।

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सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर केंद्र सरकार ने कहा कि राज्य सरकारों को कोरोना के मद्देनजर हरिद्वार से 'गंगा जल' लाने के लिए कांवड़ियों की आवाजाही की अनुमति नहीं देनी चाहिए। हालांकि, धार्मिक भावनाओं को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकारों को निर्दिष्ट स्थानों पर टैंकरों के माध्यम से 'गंगा जल' उपलब्ध कराने के लिए प्रणाली विकसित करनी चाहिए। बता दें कि कोरोना के चलते उत्‍तराखंड सरकार ने कांवड़ यात्रा पर पहले ही रोक लगा दी है 

केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि टैंकर चिन्हित अथवा निर्धारित स्थानों पर उपलब्ध हों ताकि आस-पास के भक्त यहां से 'गंगा जल' को इकट्ठा कर सकें और अपने नजदीकी शिव मंदिरों में 'अभिषेक' कर सकें। हालांकि, केंद्र सरकार ने कहा कि गंगा जल वितरण के दौरान सोशल डिस्टेंसिंग, मास्क और कोविड प्रोटोकॉल का पालन करवाना राज्य सरकार की जिम्मेवारी होगी।  - हिंदुस्तान 

सुप्रीम कोर्ट नाराज : IT एक्ट की धारा 66A रद्द होने के बाद भी दर्ज हो रहे केस

 TODAY छत्तीसगढ़  /  नई दिल्ली / सुप्रीम कोर्ट ने IT एक्ट की धारा 66A रद्द होने के बाद भी मामले दर्ज होने को लेकर नाराजगी जताई है. सुप्रीम कोर्ट ने धारा 66A रद्द करने के बाद भी मुकदमें दर्ज करना चौंकाने वाला, आश्चर्यजनक और परेशानी भरा बताया है.सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह बेहद हैरानी भरा मामला है. हम इसको लेकर कोई कदम उठाएंगे. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. यह जवाब दो हफ्ते में देने को कहा गया है. TODAY छत्तीसगढ़ के WhatsApp ग्रुप में जुड़ने के लिए क्लिक करें

याचिकाकर्ता PUCL की ओर से पेश याचिका को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने यह प्रतिक्रिया दी. सुप्रीम कोर्ट ने 24 मार्च, 2015 को अदालत द्वारा असंवैधानिक घोषित सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66 ए के तहत FIR दर्ज करने के खिलाफ सभी पुलिस थानों को सलाह जारी करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई की.याचिका में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार  को निर्देश दे कि वो एडवाइजरी जारी करे कि कहीं भी इस धारा के तहत FIR दर्ज ना हो.

एनजीओ (NGO PUCL) ने ये याचिका दाखिल की है. पीयूसीएल ने अदालत से केंद्र को FIR या जांच के संबंध में सभी डेटा एकत्र करने का निर्देश देने का आग्रह किया है, जहां धारा 66 ए लागू की गई है और साथ ही देश भर की अदालतों में मामले लंबित हैं. दरअसल श्रेया सिंघल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इस धारा को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया था.

दरअसल, आईटी ऐक्ट के दुरुपयोग को लेकर लंबे समय से शिकायत की जा रही थी, इसको लेकर अदालत में भी याचिका दाखिल की गई थी. इसको लेकर सोशल मीडिया में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सवाल भी उठा था, जिसे अदालत ने बेहद महत्वपूर्ण माना था.

सुप्रीम कोर्ट : कोरोना से मरने वालों के परिवार को मुआवजा दे सरकार

 TODAY छत्तीसगढ़  / नई दिल्ली / सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कोरोना वायरस से मरने वालों के परिवार को मुआवजा देने के मामले में अपना फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को आदेश दिया कि केंद्र कोविड से मरने वालों के परिवारों को मुआवजा दे। कोर्ट ने कहा कि केंद्र मुआवजा राशि तक कर छह हफ्तों के भीतर राज्य सरकारों को निर्देश दे। साथ ही केंद्र को निर्देश दिया कि मृत्यु प्रमाण पत्र पाने की प्रक्रिया को भी सरल किया जाना चाहिए।

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सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक अहम फैसला सुनाते हुए आदेश दिया कि जिनकी मौत कोरोना के कारण हुई है, केंद्र सरकार उनके परिवारों को मुआवजा दे। हालांकि, ये मुआवजा कितना होना चाहिए ये खुद सरकार को तय करना होगा। फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि कोरोना से मरने वालों के परिवारों को चार-चार लाख का मुआवजा नहीं दिया जा सकता है। 

 सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) से यह भी कहा कि वह एक ऐसा सिस्टम बनाए, जिससे कम से कम ही सही, लेकिन पीड़ितों को मुआवजा दिया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह कोविड से जुड़े मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करे, जो प्रमाण पत्र पहले ही जारी हो गए हैं, उनमें सुधार किया जाए। 

इससे पहले केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट हलफनामा दाखिल कर कहा था कि कोविड-19 के पीड़ितों को चार-चार लाख रुपये का मुआवजा नहीं दिया जा सकता है क्योंकि आपदा प्रबंधन कानून में केवल भूकंप, बाढ़ आदि प्राकृतिक आपदाओं पर ही मुआवजे का प्रावधान है। सरकार ने आगे कहा कि अगर एक बीमारी से होने वाली मौत पर मुआवजे की राशि दी जाए और दूसरी पर नहीं तो यह पूरी तरह से गलत होगा। 

केंद्र सरकार ने कहा कि सरकारी संसाधनों की एक सीमा होती है। केंद्र ने यह भी कहा है कि अगर इस तरह से मुआवजा दिया गया तो वर्ष 2021-22 के लिए राज्य आपदा राहत कोष (एसडीआरएफ) के लिए आवंटित राशि 22184 करोड़ रुपये इस मद में ही खर्च हो जाएंगे और इससे महामारी के खिलाफ लड़ाई में उपयोग होने वाली राशि प्रभावित होगी। चार लाख रुपये की अनुग्रह राशि राज्य सरकारों की वित्तीय सामर्थ्य से परे है। पहले से ही राज्य सरकारों और केंद्र सरकार के वित्त पर भारी दबाव है।

क्या है मामला ?

केंद्र सरकार ने यह जवाब वकील गौरव बंसल और रीपक कंसल द्वारा दायर उन याचिकाओं पर दिया है, जिसमें कोविड -19 महामारी से मारे गए लोगों के परिवार के सदस्यों को आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 के तहत  चार लाख रुपये का मुआवजा देने की मांग की गई है। सुप्रीम कोर्ट इस मामले की सोमवार को सुनवाई करेगा।  

सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों से कहा, 31 जुलाई तक लागू करें 'एक राष्ट्र, एक राशन कार्ड' योजना


TODAY छत्तीसगढ़  / नई दिल्ली / सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को COVID-19 के कारण प्रवासी कामगारों के कल्याण के संबंध में केंद्र और राज्य सरकारों को कई दिशा-निर्देश जारी किए हैं, जिसमें कोर्ट ने सरकारों को निर्देश दिया कि वे प्रवासी श्रमिकों के लिए सूखा राशन प्रदान करें और महामारी जारी रहने तक सामुदायिक रसोई जारी रखें. इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने ये निर्देश भी जारी किया है कि एक नेशन एक राशन कार्ड योजना हर हाल में  31 जुलाई, 2021 तक शुरू कर दें. इस योजना से तहत प्रवासी मजदूरों को बड़ा लाभ मिलेगा और देश के किसी भी हिस्से में उन्हें राशन लेने की सुविधा मिल सकेगी. TODAY छत्तीसगढ़ के WhatsApp ग्रुप में जुड़ने के लिए क्लिक करें   

सुप्रीम कोर्ट ने ‘एक राष्ट्र एक राशन कार्ड’ योजना को लागू करने के लिए 31 जुलाई, 2021 की समय सीमा तय की है और कोर्ट  ने केंद्र से असंगठित और प्रवासी श्रमिकों को पंजीकृत करने और पोर्टल को पूरा करने और 31 जुलाई, 2021 के बाद प्रक्रिया शुरू करने के लिए NIC के परामर्श से एक पोर्टल विकसित करने को कहा है.

बता दें कि कोरोना की दूसरी लहर के दौरान लगाए गए प्रतिबंधों से दोबारा बुरी तरह प्रभावित हुए प्रवासी कामगारों के लिए खाद्य सुरक्षा, नकदी हस्तांतरण और अन्य कल्याणकारी उपाय सुनिश्चित करने के केंद्र और राज्यों को निर्देश देने की मांग करने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने आज यानी मंगलवार को अपना फैसला सुनाया है.

जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एमआर शाह की पीठ ने 11 जून को इस संबंध में कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज, हर्ष मंदर और जगदीप छोकर की याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था और इस सिलसिले में एक नई याचिका 2020 के स्वत: संज्ञान वाले लंबित मामले में दायर की गई थी. कोर्ट ने पिछले साल मई महीने में ही कोविड की वजह से परेशान प्रवासी कामगारों के हित में संज्ञान लिया था और कई निर्देश जारी किए थे.

आंध्र प्रदेश सरकार को सुप्रीम कोर्ट ने सख़्त लहज़े में कहा - अगर एक बच्चे को भी कुछ हुआ तो...

 TODAY छत्तीसगढ़  /  नई दिल्ली / कोरोना को लेकर ज्यादातर राज्यों में 10वीं और 12वीं की बोर्ड परीक्षा रद्द की जा चुकी है। लेकिन आंध्र प्रदेश सरकार 12वीं बोर्ड की परीक्षा आयोजित करने को लेकर अड़ी हुई है। मामले की सुनवाई अब सुप्रीम कोर्ट में हो रही है। शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार को सख्त लहजे में चेतावनी देते हए कहा कि अगर एक भी बच्चे को कुछ हुआ तो राज्य सरकार को इसका खामियाजा भुगताना पड़ेगा। कोर्ट ने कहा कि अगर किसी की भी मौत हुई तो राज्य सरकार को 1 करोड़ का मुआवजा चुकाना पड़ सकता है। कोर्ट ने आंध्र सरकार को कहा कि जब तक सभी बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो जाती, वह राज्यों में 12वीं बोर्ड की परीक्षा आयोजित करने की अनुमति नहीं देगा।

कोर्ट ने गुरुवार को राज्यों को आदेश दिया है कि सीबीएसई की तर्ज पर राज्य 10 दिन के भीतर इंटर्नल असेसटमेंट पॉलिसी जारी करें और 31 जुलाई तक नतीजे घोषित करें। उधर 12वीं बोर्ड परीक्षा आयोजित कराने को लेकर अड़ी आंध्र सरकार को कोर्ट ने कहा कि वह तब तक परीक्षा आयोजित करने की अनुमति नहीं देगा, जब तक यह सुनिश्चित नहीं हो जाए कि इन परीक्षाओं की वजह से 5.2 लाख छात्रों की जान को खतरा नही होगा।

जस्टिस एम खानविलकर और दिनेश माहेश्वरी की पीठ ने आंध्र सरकार से पूछा कि जब कोरोना का इतना खतरनाक वेरियंट फैल रहा है और अन्य राज्य परीक्षाएं रद्द कर चुके हैं तो फिर वो फिजिकल परीक्षाएं क्यों करना चाहती है ? कोर्ट ने चेतावनी दी कि अगर परीक्षा आयोजित होने की वजह से 1 भी मौत होती है तो वह राज्य को 1 करोड़ के मुआवजे का आदेश देगा। आंध्र प्रदेश सरकार ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट को भरोसा दिलाया था कि वह बारहवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षाएं सफलतापूर्वक करा लेगी क्योंकि राज्य बोर्ड के विद्यार्थियों के मूल्यांकन के लिए और कोई भरोसेमंद विकल्प नहीं हैं।

राज्य सरकार ने कोर्ट में कहा है कि वह संभावित रूप से जुलाई के अंतिम सप्ताह में 12वीं कक्षा की परीक्षा कराएगी और इस संबंध में परीक्षा का कार्यक्रम जल्द जारी किया जाएगा। राज्य के स्थायी वकील महफूज ए नाजकी के माध्यम से दाखिल हलफनामे में राज्य सरकार ने कहा कि प्रदेश में कोविड-19 के मामले तेजी से घट रहे हैं। राज्य सरकार ने बताया कि 20 जून को प्रदेश में कोविड-19 के 5,646 मामले थे। 21 जून के संक्रमण के मामलों की संख्या 5,541 और 22 जून को 4,169 थी। और पिछले माह की इन तारीखों से तुलना करें तो 20 मई को संक्रमण के 22,610, 21 मई को 20,937 और 22 मई को 19,981 मामले थे।

आंध्र सरकार ने कहा कि विशेषज्ञों से सलाह ली गई है और उनका मानना है कि परीक्षा कराना व्यावहारिक होगा। राज्य सरकार उसी के अनुसार जुलाई के अंतिम सप्ताह में परीक्षाएं कराने का प्रयास करेगी। शीर्ष अदालत कोविड-19 महामारी के मद्देनजर बोर्ड परीक्षाएं नहीं कराने का राज्य सरकारों को निर्देश देने के अनुरोध वाली याचिकाओं पर सुनवाई हो रही है। न्यायालय ने मंगलवार को कहा था कि अगर किसी की मौत हुई तो हम राज्य को जिम्मेदार ठहरायेंगे। - एनबीटी 

सुप्रीम कोर्ट : आसाराम की अंतरिम ज़मानत याचिका खारिज, आयुर्वेदिक इलाज के मामले की होगी सुनवाई


TODAY छत्तीसगढ़  / नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट  ने आसाराम को अंतरिम जमानत देने से इनकार कर दिया है. वहीं आसाराम के ऋषिकेश में इलाज के लिए आयुर्वेदिक संस्थान भेजने की याचिका पर सुनवाई के लिए राजी हो गई है. आसाराम को ऋषिकेश के आयुर्वेदिक अस्पताल में भर्ती कराने की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार को नोटिस जारी किया है. 

                                         

इससे पहले राजस्‍थान हाईकोर्ट ने भी रेप के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे आसाराम की अंतरिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी. आसाराम की ओर से स्‍वास्‍थ्‍य के आधार पर अंतरिम जमानत की मांग की गई थी. बीते दिनों कोरोना संक्रमित होने के बाद आसाराम को एम्‍स में भर्ती कराया गया था. आसाराम इलाज के कुछ ही दिनों बाद कोरोना संक्रमण से मुक्त हो गया था. बता दें कि आसाराम एक नाबालिग लड़की से यौन उत्पीड़न के मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहा है.

Supreme Court : केंद्र सरकार दावा - इस साल के अंत तक 18 साल के ऊपर के सभी लोगों का टीकाकरण कर लिया जाएगा

 " केंद्र ने कोर्ट को बताया कि जनवरी से अब तक 5 फीसदी लोगों को ही वैक्सीन की दोनों डोज मिल सकी है और इस साल के अंत तक 18 से ऊपर की पूरी आबादी को वैक्सीन दे दी जाएगी. "

TODAY छत्तीसगढ़  /  नई दिल्ली /  कोरोना संक्रमण को लेकर कई याचिकायों पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है. एक मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र ने कोर्ट में दावा किया है कि 2021 के अंत तक 18 साल से ऊपर के सभी लोगों का टीकाकरण हो जाएगा. सरकार ने कोर्ट को ये भी बताया कि जनवरी से अब तक 5 फीसदी लोगों को ही वैक्सीन की दोनों डोज मिल सकी है. हालांकि, कई एक्सपर्ट का दावा है कि अब तक की जो रफ्तार है उसके हिसाब से इस साल के आखिर तक 35 से 40 फीसदी आबादी को ही वैक्सीन दी जा सकेगी.
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा कि विदेशों से कोविड रोधी टीकों की खरीद के लिए कई राज्य ग्लोबल टेंडर जारी कर रहे हैं, क्या यह सरकार की नीति है? केंद्र ने बताया कि टीकों के लिहाज से पात्र संपूर्ण आबादी का 2021 के अंत तक टीकाकरण किया जाएगा. केंद्र की फाइजर जैसी कंपनियों से बात चल रही है. अगर यह बातचीत सफल रहती है तो साल के अंत तक टीकाकरण पूरा करने की समय-सीमा भी बदल जाएगी.
कोर्ट ने टीकाकरण के लिए कोविन ऐप पर अनिवार्य रूप से रजिस्ट्रेशन करवाने पर केंद्र से सवाल किया. कहा कि ग्रामीण इलाकों के लोगों को इसमें परेशानी आ सकती है. नीति निर्माता जमीनी हालात से अवगत रहें, एक डिजिटल विभाजन नजर आ रहा है. केंद्र ने कोविन ऐप पर अनिवार्य रजिस्ट्रेशन पर कहा, 'केंद्र को देखना चाहिए कि देशभर में क्या कुछ हो रहा है और उसी के मुताबिक नीति में बदलाव करने चाहिए.'
ग़ौर करने वाली बात ये है कि बीते मई महीने में अप्रैल के मुकाबले वैक्सीनेशन की रफ्तार कमजोर रही है. अप्रैल में जहां रोजाना 25 लाख वैक्सीन की डोज दी जा रही थी वहीं मई महीने में ये घटकर 15 लाख के रोजाना पर आ गई.  -एबीपी 

सुप्रीम कोर्ट : CBSE, CISCE 12th Exam 2021 मामले पर 2 दिन में अंतिम फैसला लेगी केंद्र सरकार, 3 जून को अगली सुनवाई


 सीबीएसई ने 14 अप्रैल को कोरोना वायरस मामलों में वृद्धि को देखते हुए कक्षा 10 की परीक्षा रद्द करने और कक्षा 12 वीं की परीक्षा स्थगित करने की घोषणा की थी।

TODAY छत्तीसगढ़  / नई दिल्ली / केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) और काउंसिल फॉर द इंडियन स्कूल सर्टिफिकेट एग्जामिनेशन (CISCE) की 12वीं बोर्ड परीक्षा को कोविड-19 महामारी के चलते रद्द करने की मांग वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई 3 जून तक स्थगित कर दी है। केंद्र सरकार ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में कहा कि सीबीएसई व आईसीएसई 12वीं बोर्ड परीक्षाएं आयोजित करने या उसे रद्द करने के संबंध में वह दो दिनों के भीतर फैसला लेगी। सरकार ने अपना फैसला कोर्ट के समक्ष पेश करने के लिए गुरुवार तक का समय मांगा। 

शीर्ष अदालत ने पिछले वर्ष जैसी स्थिति देखते हुए मामले की सुनवाई गुरुवार तक के लिए टाल दी। कोर्ट में केंद्र का पक्ष रख रहे अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल से पीठ ने कहा, 'कोई बात नहीं। आप निर्णय लें। आप इसके हकदार हैं। यदि आप पिछले साल वाली पॉलिसी से अलग रुख अपना रहे हैं तो आपको इसके लिए ठोस कारण बताना चाहिए।'

आपको बता दें कि शीर्ष अदालत ने 26 जून 2020 को CBSE और CISCE को कोरोना के चलते 1 जुलाई से 15 जुलाई के बीच शेड्यूल परीक्षाएं रद्द करने की इजाजत दी थी और पेपर में मार्क्स देने के सरकार द्वारा सुझाए फॉर्मूले पर मुहर लगाई थी। 

अदालत ने दूसरी बार मामले की सुनवाई टाली है। इससे पहले 28 मई को कोर्ट ने सुनवाई 31 मई तक के लिए स्थगित कर दी थी। याचिकाकर्ता ने देशभर में कोरोना महामारी की मौजूदा स्थिति के बीच होने वाली 12वीं परीक्षाओं को स्थगित करने की मांग की है।

आपको बता दें कि एडवोकेट ममता शर्मा की ओर से सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका दायर की गई है। शर्मा ने अदालत से मांग की थी कि केंद्र सरकार, सीबीएसई और आईसीएससीई को निर्देश दिया जाए कि कक्षा 12 की परीक्षाएं कैंसिल की जाएं।

दहेज मृत्यु के मुकदमों पर सुप्रीम कोर्ट का निर्देश - ' ये साबित करना ज़रूरी नहीं कि महिला की मौत से बिल्कुल पहले ही दहेज की मांग हुई '

" धारा 304 B के मुताबिक अगर शादी के 7 साल के भीतर किसी महिला की जलने, चोट लगने या किसी भी अप्राकृतिक वजह से मृत्यु हुई हो और यह साबित होता है कि मृत्यु से पहले महिला को दहेज के लिए प्रताड़ित किया जा रहा था, तो यह दहेज मृत्यु का मामला बनेगा. "

TODAY छत्तीसगढ़  / नई दिल्ली / दहेज मृत्यु के मामलों से जुड़े मुकदमों पर सुप्रीम कोर्ट ने नए निर्देश जारी किए हैं. कोर्ट ने कहा है कि ऐसे मामलों में यह साबित करना जरूरी नहीं है कि महिला की अप्राकृतिक मृत्यु से बिल्कुल पहले ही दहेज की मांग की गई हो. अगर मृत्यु से कुछ समय पहले भी दहेज के लिए दबाव बनाने और उत्पीड़न करने की बात साबित होती है, तो यह ऐसे मामलों में सजा देने के लिए पर्याप्त होगा. दहेज मृत्यु के एक मामले में दोषियों को निचली अदालत और हाई कोर्ट से मिली 7 साल की सजा को सही ठहराते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आईपीसी की धारा 3048 से जुड़े मुकदमों पर निचली अदालतों को कुछ अहम निर्देश दिए हैं. सतबीर सिंह बनाम हरियाणा मामले में आज चीफ जस्टिस एन वी रमना की अध्यक्षता वाली बेंच से जारी इन निर्देशों की बात करने से पहले वह समझ लेना जरूरी है कि आईपीसी की यह धारा क्या कहती है ? 
'जहां किसी स्त्री की मृत्यु किसी दाह या शारीरिक क्षति द्वारा कारित की जाती है या उसके विवाह के 7 वर्ष के भीतर सामान्य परिस्थितियों से अन्यथा उसकी मौत हो जाती है और यह दर्शाया जाता है कि उसकी मृत्यु के ठीक पूर्व उसके पति ने या उसके पति के किसी नातेदार ने दहेज की किसी मांग के लिए उसके संबंध में उसके साथ क्रूरता की थी या उसे तंग किया था, वहां ऐसी मृत्यु को दहेज मृत्यु कहा जाएगा और ऐसा पति या नातेदार उसकी मृत्यु कारित करने वाला समझा जाएगा।'
धारा 304 B के मुताबिक अगर शादी के 7 साल के भीतर किसी महिला की जलने, चोट लगने या किसी भी अप्राकृतिक वजह से मृत्यु हुई हो और यह साबित होता है कि मृत्यु से पहले महिला को दहेज के लिए प्रताड़ित किया जा रहा था, तो यह दहेज मृत्यु का मामला बनेगा. ऐसे मामलों में एविडेंस एक्ट की धारा 1138 लागू होगी. दूसरे मामलों की तरह इसमें अपराध साबित करने की जिम्मेदारी आरोप पक्ष की नहीं होगी, बल्कि बचाव पक्ष की जिम्मेदारी होगी कि वह खुद को निर्दोष साबित करे अगर आरोपी महिला की मृत्यु में अपनी भूमिका को लेकर खुद को बेगुनाह बताने वाला सबूत नहीं दे पाता, तो उसे दोषी माना जाएगा. इस धारा के तहत दोषी को न्यूनतम 7 साल और अधिकतम उम्र कैद तक की सजा हो सकती है:

सुप्रीम कोर्ट ने आईपीसी की धारा 304 बी के तहत चलने वाले मुकदमों के बारे में बेहद अहम निर्देश देते हुए कहा है कि

  1. मुकदमे के दौरान इस धारा के उद्देश्य को याद रखा जाना चाहिए. इसे महिलाओं की जला कर की जाने वाली हत्याओं और दहेज की मांग जैसी सामाजिक बुराई पर नियंत्रण के लिए आईपीसी में जोड़ा गया। 
  2. इस बात का भी ध्यान रखा जाए कि इस धारा में हत्या, आत्महत्या और दुर्घटना से मृत्यु को अलग-अलग नहीं किया गया है. सिर्फ अप्राकृतिक मृत्यु की बात कही गई है.
  3. CrPC 232 के तहत कोर्ट आरोप पक्ष और बचाव पक्ष की बातें सुने आरोपी के बयान और उसके खिलाफ रखे गए सबूतों को देखने के बाद तय करे कि क्या आरोपी को बरी कर दिया जाना चाहिए। अगर कोर्ट का निष्कर्ष बरी न करने का हो तो बचाव पक्ष को अपनी दलीलें रखने के लिए एक तय समय दे। 
  4. CrPC 313 के तहत आरोपी का बयान दर्ज करते समय पूरी गंभीरता बरती जाए, कोर्ट आरोपी को उसके खिलाफ मौजूद सबूत बताए और मौका दे कि वह उस बारे में अपनी सफाई दे सके. बता सके कि "उसे मौत के लिए जिम्मेदार क्यों नहीं माना जाना चाहिए.
  5.  यह जरूरी नहीं कि धारा 3048 में लिखे ठीक पहले' को मौत से बिल्कुल नजदीक का समय ही समझा जाए. अगर कोर्ट को उससे कुछ पहले भी दहेज प्रताड़ना के ठोस सबूत मिलते हैं तो उसके आधार पर दोष साबित हो सकता है.
  6.  यह देखा गया है कि पीड़िता का परिवार कई बार ससुराल पक्ष के उन रिश्तेदारों का भी नाम मुकदमे में जोड़ देता है, जो कहीं दूर रहते हो. जिनका मामले से कोई संबंध न हो, जज मुकदमे के दौरान इस पहलू पर भी ध्यान दें. 

कौन होगा देश का नया CBI प्रमुख, आज तय हो सकता है नाम !

TODAY
 छत्तीसगढ़  / 
दिल्ली / देश की शीर्ष जांच एजेंसी के प्रमुख का चयन करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली उच्चाधिकार प्राप्त समिति की आज बैठक होगी। इस बैठक में सीबीआई के अगले प्रमुख के नाम पर मुहर लग सकती है। इस समिति में सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाशीश (सीजेआई) और विपक्ष के नेता अधीर रंजन चौधरी शामिल हैं। इस पद के लिए कई अधिकारियों के नाम दौड़ में हैं। गत फरवरी से सीबीआई प्रमुख का पद रिक्त है।  

आखिर क्या कर बैठा ओलम्पिक विजेता जिसके चलते पुलिस ने रिमांड पर लिया  - पढ़े पूरी ख़बर 

दौड़ में कई अधिकारियों के नाम - 

सूत्रों का कहना है कि इस पद के लिए 1984, 1985 और 1986 बैच के अधिकारियों के नाम पर विचार होगा। हालांकि जिन अधिकारियों के नाम पर ज्यादा चर्चा है उनमें राकेश अस्थाना, वाईसी मोदी और सुबोध जायसवाल शामिल हैं। अभी फिलहाल 1988 बैच के गुजरात कैडर के आईपीएस अधिकारी प्रवीण सिन्हा सीबीआई के कार्यवाहक प्रमुख का कार्यभार संभाल रहे हैं। सीबीआई के डिप्टी चीफ राकेश अस्थाना के साथ हुए विवाद के बाद सीबीआई के निदेशक आलोक वर्मा को हटा दिया गया था। इसके बाद ऋषि कुमार शुक्ला को सीबीआई का निदेशक बनाया गया था। TODAY छत्तीसगढ़ के WhatsApp ग्रुप में जुड़ने के लिए क्लिक करें 

यूपी के डीजी का नाम भी चर्चा में - 

1985 बैच के अधिकारी सुबोध जायसवाल इस समय सीआईएसफ के डीजी हैं जबकि 1984 बैच के अधिकारी राकेश अस्थाना डीजी बीएसएफ के रूप में तैनात हैं। वहीं, 1984 बैच के आईपीएस अधिकारी वाईसी मोदी एनआईए के चीफ हैं। सीबीआई के अगले प्रमुख पद के लिए उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक एचसी अवस्थी का नाम भी चर्चा में है। 

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