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सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के विवादित फैसले पर लगाई रोक, यौन हिंसा मामलों में टिप्पणी पर बनेगी गाइडलाइन


दिल्ली। 
 TODAY छत्तीसगढ़  /सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस निर्णय पर रोक लगा दी है, जिसमें कहा गया था कि नाबालिग लड़की के ब्रेस्ट दबाना, पायजामे का नाड़ा तोड़ना और उसे पुलिया के नीचे खींचने की कोशिश करना ‘दुष्कर्म के प्रयास’ की श्रेणी में नहीं आता। सर्वोच्च न्यायालय ने इस फैसले पर सख्त रुख अपनाते हुए टिप्पणी की कि यौन अपराध से जुड़े संवेदनशील मामलों पर अदालतों की टिप्पणी पीड़िता और समाज पर गंभीर असर डालती है, इसलिए जरूरत है कि न्यायिक मर्यादा के अनुरूप दिशानिर्देश तय किए जाएं।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की डिवीजन बेंच ने सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि इस मामले में ट्रायल IPC की धारा 376 (दुष्कर्म) और POCSO एक्ट की धारा 18 (रेप की कोशिश) के तहत ही चलेगा। अदालत ने इस पर रोक लगाते हुए कहा कि संवेदनशील मामलों में अदालतों के शब्द समाज में गलत संदेश न दें।


यह मामला NGO ‘वी द वीमेन ऑफ इंडिया’ द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के बाद सामने आया। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि देश के विभिन्न हाई कोर्ट ऐसे मामलों में आपत्तिजनक टिप्पणियां कर चुके हैं, जिससे सामाजिक मानसिकता और न्यायिक दृष्टिकोण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
अधिवक्ता ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक अन्य फैसले का हवाला देते हुए कहा कि एक पीड़िता के नशे में होने पर कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि “आप खुद मुसीबत को बुला रहे हैं।” इसी तरह के बयान कलकत्ता और राजस्थान हाई कोर्ट के मामलों में भी दर्ज हैं।


सुनवाई के दौरान CJI ने कहा,

“न्यायपालिका को संवेदनशीलता दिखानी चाहिए। कभी-कभी ऐसे बयान दिए जाते हैं जो पीड़ित पर उल्टा असर डालते हैं और समाज में गलत संदेश पहुंचाते हैं।”

सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि यौन हिंसा से जुड़े मामलों में अदालतों के लिए जल्द ही मार्गदर्शक सिद्धांत तैयार किए जाएंगे, ताकि न्यायिक टिप्पणियां न्यायिक गरिमा और सामाजिक संवेदनशीलता के अनुरूप हों। 


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