बिलासपुर। TODAY छत्तीसगढ़ / छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति वर्ग के विरुद्ध कथित आपत्तिजनक शब्दों के उपयोग के आरोप से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए एट्रोसिटी एक्ट के तहत दोषसिद्ध तीन ग्रामीणों को बरी कर दिया है। अदालत ने विशेष न्यायाधीश, एट्रोसिटी, धमतरी द्वारा 2008 में सुनाई गई सजा को रद्द कर दिया।
क्या था मामला
शिकायतकर्ता लखन लाल कुर्रे ने 22 सितंबर 2007 को भखारा थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि वह 17 सितंबर को ग्राम जोरातराई में एक बैठक में शामिल हुआ था, जहाँ दानीराम, लखन लाल सेन और महेश उर्फ महेन्द्र साहू ने उसे घेरकर गालियाँ दीं और जातिसूचक शब्दों का प्रयोग किया, जिससे वह बेहोश हो गया। यदि अन्य ग्रामीणों ने हस्तक्षेप न किया होता, तो उसकी हत्या भी हो सकती थी। पुलिस ने IPC की धारा 294, 506, 323/34 व एससी-एसटी एक्ट की धारा 3(1)(10) के तहत प्रकरण दर्ज किया था।
विशेष न्यायाधीश ने 10 नवंबर 2008 को धारा 294 में प्रत्येक को 500 रुपये और धारा 323/34 में 1,000 रुपये अर्थदंड (अदा न करने पर क्रमश: एक माह व दो माह कैद) की सजा सुनाई थी। आरोपियों ने इस निर्णय के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।
हाईकोर्ट का निर्णय - 14 नवंबर 2025 को सुनाए गए फैसले में हाईकोर्ट ने कहा कि—
रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं है कि अपीलकर्ताओं का कृत्य दूसरों को परेशान करने वाला था। शिकायतकर्ता ने स्वयं अश्लील शब्दों के प्रयोग का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया, बल्कि केवल जातिगत गालियों का आरोप लगाया, जो IPC की धारा 294 के दायरे में नहीं आता। गवाहों के बयान में कई विरोधाभास पाए गए। शिकायतकर्ता के बयान में अतिशयोक्ति और चूक दर्ज की गई।
बचाव पक्ष का यह तर्क कि ग्रामीणों ने शिकायतकर्ता के विरुद्ध भी शिकायत की थी, जांच अधिकारी की गवाही से पुष्ट होता है, लेकिन उस शिकायत की जांच नहीं की गई। ट्रायल कोर्ट ने गवाहों के बयानों का समुचित मूल्यांकन नहीं किया। इन तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने विशेष न्यायाधीश के आदेश को निरस्त करते हुए आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया।
