इक्कीसवीं सदी के भारत में इलाज कैशलेस है, लेकिन रास्ता अब भी इंसानों के कंधों पर चलता है।
आइये इस तस्वीर पर फोकस करते है। ये तस्वीर छत्तीसगढ़ राज्य गठन के 25 बरस बाद “विकास कथा” का स्थायी फ्रेम है। कोरिया जिले के ग्राम पंचायत बंजारीडाँड़ के रोहना ठीहाई गांव में एक अनोखी, लेकिन बेहद भरोसेमंद स्वास्थ्य सेवा आज भी पूरे आत्मविश्वास के साथ चल रही है। नाम है “चारपाई एक्सप्रेस”। यह सेवा न ऐप पर मिलती है, न टोल-फ्री नंबर पर, न GPS मांगती है और न ही सड़क की ज़िद करती है। बस चार मज़बूत कंधे चाहिए, एक पुरानी खटिया और किस्मत का साथ। रोहना ठीहाई में भी यही हुआ। गांव तक सड़क नहीं है, इसलिए एम्बुलेंस वहीं तक आई, जहां सड़क खत्म होती है। उसके आगे मरीज को खटिया पर उठाकर लाने की जिम्मेदारी ग्रामीणों ने निभाई। यह जन-भागीदारी का बेहतरीन उदाहरण है, जिसे नीति आयोग की रिपोर्टों में जगह मिलनी चाहिए। मरीज का नाम लक्ष्मी नारायण है, लक्ष्मी की कृपा से दूर मरीज सिर्फ नारायण के भरोसे है।
यह वही गांव है जहां इलाज से पहले मरीज को यह साबित करना पड़ता है कि वह सड़क तक पहुंचने लायक है। जो सड़क तक पहुंच गया, वही सिस्टम की नजर में “इलाज के योग्य” माना जाता है। यहां संविधान में “जीवन का अधिकार” तो है, लेकिन उस जीवन तक पहुंचने का रास्ता नहीं है। छत्तीसगढ़ हो, झारखंड हो, मध्यप्रदेश हो, बिहार, ओडिशा, उत्तर प्रदेश या पूर्वोत्तर के राज्य, ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सुविधा आज भी चारपाई पर लेटी हुई है। फर्क बस इतना है कि कहीं चारपाई बांस की है, कहीं लकड़ी की; कहीं उठाने वाले चार लोग हैं, कहीं दो। लेकिन व्यवस्था हर जगह एक सी बेहोश पड़ी है।
यह तस्वीर किसी एक गांव की नहीं, उस व्यवस्था की है जो विकास को नक्शों में और मरीज को खटिया पर छोड़ देती है।
सरकारी नक्शों में सड़कें हैं, स्वास्थ्य केंद्र हैं, योजनाएं हैं, और लक्ष्य भी हैं। लेकिन रोहना ठीहाई जैसे गांवों में यह सब नक्शे पर ही रह जाता है। जमीन पर जो है, वह है कच्ची पगडंडी, नेटवर्क का सन्नाटा, बिजली की अनियमितता और इलाज की अनिश्चितता। जब बीमारी दस्तक देती है, तो न योजना काम आती है, न फाइल। काम आती है चारपाई जो यहां एम्बुलेंस है, स्ट्रेचर है और कई बार ज़िंदगी का अंतिम वाहन भी। यह कैसी विडंबना है कि जिस देश में “स्मार्ट सिटी” शब्द गर्व से बोला जाता है, उसी देश में “स्मार्ट गांव” आज भी खटिया के भरोसे है।
इस देश में 108, 112, 104, ये सभी नंबर स्वास्थ्य सुरक्षा के प्रतीक माने जाते हैं। लेकिन इन सेवाओं का दायरा भी सड़क की सीमा तक ही है। जहां सड़क खत्म, वहीं आपातकाल समाप्त। यह व्यवस्था बड़ी ईमानदारी से मानती है कि गांव में बीमारी उतनी गंभीर नहीं होती, जितनी शहर में। इसलिए गांव का मरीज अगर बच गया, तो उसे सहनशील माना जाता है; और अगर नहीं बचा—तो फाइल में लिख दिया जाता है, “दुर्गम क्षेत्र।”
दिल्ली से घोषित ‘सार्वभौमिक स्वास्थ्य’ गांव पहुंचते-पहुंचते चारपाई पर सिमट जाता है।
केंद्र और राज्य सरकारों ने कस्बाई इलाकों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के नाम पर दो-तीन कमरों का ढांचा खड़ा कर रखा हैं। बाहरी दीवार पर बोर्ड लगे हैं, उद्घाटन शिलाएं चमक रही हैं लेकिन भीतर डॉक्टर अक्सर अस्थायी रूप से अनुपस्थित रहते हैं, दवाएं आपूर्ति की प्रतीक्षा में होती हैं और जांच सुविधाएं जिला स्तर पर उपलब्ध बताई जाती हैं। यानि इलाज की पूरी श्रृंखला मौजूद है, बस गांव में कुछ भी नहीं। डिजिटल हेल्थ मिशन के तहत हेल्थ आईडी, ऑनलाइन रिपोर्ट और टेलीमेडिसिन का सपना दिखाया जा रहा है। रोहना ठीहाई जैसे गांव पूछ रहे है—“नेटवर्क कब मिलेगा?” जहां मोबाइल सिग्नल नहीं, वहां टेलीमेडिसिन एक प्रेरक नारा भर है। मरीज खटिया पर है और व्यवस्था ऐप डाउनलोड करने की सलाह दे रही है। रोहना ठीहाई गाँव अकेला नहीं है। देश के कई राज्यों के ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सुविधा आज भी चारपाई पर ही सफर करती है। कहीं तस्वीर सामने आ जाती है, तो कुछ दिन चर्चा का विषय बनी होती है। फिर सब कुछ सामान्य, अगली खटिया के इंतजार में।
रोहना ठीहाई अकेला गांव नहीं है। देश के कई राज्यों के ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सुविधा आज भी चारपाई पर ही सफर करती है। जहां मोबाइल सिग्नल नहीं, वहां टेलीमेडिसिन एक प्रेरक नारा भर है। मरीज खटिया पर है और व्यवस्था ऐप डाउनलोड करने की सलाह दे रही है।
हम किसी एक सरकार या विभाग पर आरोप नहीं लगा रहे, बल्कि उस स्थायी मानसिकता पर कटाक्ष कर रहे है, जिसमें गांव को हमेशा प्राथमिकता के क्रम में आखरी पायदान पर रखा जाता है। चारपाई पर लेटा मरीज किसी योजना की विफलता नहीं, बल्कि केंद्र और राज्य सरकारों की संयुक्त स्वास्थ्य नीति की मैदानी रिपोर्ट का जीवंत प्रमाण पत्र है। चारपाई पर लेटा लोकतंत्र केवल इलाज नहीं मांग रहा। वह सत्ता से, नौकरशाहों से यह सवाल पूछ रहा है “क्या इस देश में स्वास्थ्य सेवा तक पहुंचने के लिए भी पहले सड़क पास करनी होगी?” जवाब में व्यवस्था हमेशा की तरह, खामोशी से खटिया की ओर इशारा कर देती है।






















