कैमरे की कलम: आयुष्मान भारत बनाम चारपाई इंडिया

इस तस्वीर को देखिए। बड़े ध्यान से देखिए। यह कोई दुर्लभ, असामान्य या अपवादस्वरूप घटना नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था का आईना है जिसे हम बड़े गर्व से “स्वास्थ्य तंत्र” कहते हैं। चारपाई पर लेटा एक मरीज, कंधों पर उठाए कुछ लोग, कीचड़, पगडंडी और दूर कहीं पक्की सड़क की उम्मीद, यही आज ग्रामीण भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था की वास्तविक पहचान है। यह तस्वीर किसी एक राज्य, किसी एक जिले या किसी एक गांव की नहीं है; यह उस देश की सामूहिक तस्वीर है जो खुद को दुनिया की उभरती महाशक्ति कहने में नहीं थकता। देश में आयुष्मान भारत है, राज्य की अपनी स्वास्थ्य बीमा योजनाएं हैं, कैशलेस इलाज की लंबी-चौड़ी सूचियां हैं। कागजों में इलाज जन्म से मृत्यु तक सुरक्षित है। बस एक छोटी सी कमी है, गांव से अस्पताल तक पहुंचने का प्रावधान किसी भी योजना में स्पष्ट नहीं है। योजनाएं इलाज का खर्च उठाती हैं, लेकिन रास्ते का बोझ अब भी मरीज और उसके तीमारदार उठा रहे हैं—कंधों पर। 

इक्कीसवीं सदी के भारत में इलाज कैशलेस है, लेकिन रास्ता अब भी इंसानों के कंधों पर चलता है।

आइये इस तस्वीर पर फोकस करते है। ये तस्वीर छत्तीसगढ़ राज्य गठन के 25 बरस बाद “विकास कथा” का स्थायी फ्रेम है। कोरिया जिले के ग्राम पंचायत बंजारीडाँड़ के रोहना ठीहाई गांव में एक अनोखी, लेकिन बेहद भरोसेमंद स्वास्थ्य सेवा आज भी पूरे आत्मविश्वास के साथ चल रही है। नाम है “चारपाई एक्सप्रेस”। यह सेवा न ऐप पर मिलती है, न टोल-फ्री नंबर पर, न GPS मांगती है और न ही सड़क की ज़िद करती है। बस चार मज़बूत कंधे चाहिए, एक पुरानी खटिया और किस्मत का साथ। रोहना ठीहाई में भी यही हुआ। गांव तक सड़क नहीं है, इसलिए एम्बुलेंस वहीं तक आई, जहां सड़क खत्म होती है। उसके आगे मरीज को खटिया पर उठाकर लाने की जिम्मेदारी ग्रामीणों ने निभाई। यह जन-भागीदारी का बेहतरीन उदाहरण है, जिसे नीति आयोग की रिपोर्टों में जगह मिलनी चाहिए। मरीज का नाम लक्ष्मी नारायण है, लक्ष्मी की कृपा से दूर मरीज सिर्फ नारायण के भरोसे है। 

यह वही गांव है जहां इलाज से पहले मरीज को यह साबित करना पड़ता है कि वह सड़क तक पहुंचने लायक है। जो सड़क तक पहुंच गया, वही सिस्टम की नजर में “इलाज के योग्य” माना जाता है। यहां संविधान में “जीवन का अधिकार” तो है, लेकिन उस जीवन तक पहुंचने का रास्ता नहीं है। छत्तीसगढ़ हो, झारखंड हो, मध्यप्रदेश हो, बिहार, ओडिशा, उत्तर प्रदेश या पूर्वोत्तर के राज्य, ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सुविधा आज भी चारपाई पर लेटी हुई है। फर्क बस इतना है कि कहीं चारपाई बांस की है, कहीं लकड़ी की; कहीं उठाने वाले चार लोग हैं, कहीं दो। लेकिन व्यवस्था हर जगह एक सी बेहोश पड़ी है। 

यह तस्वीर किसी एक गांव की नहीं, उस व्यवस्था की है जो विकास को नक्शों में और मरीज को खटिया पर छोड़ देती है।

सरकारी नक्शों में सड़कें हैं, स्वास्थ्य केंद्र हैं, योजनाएं हैं, और लक्ष्य भी हैं। लेकिन रोहना ठीहाई जैसे गांवों में यह सब नक्शे पर ही रह जाता है। जमीन पर जो है, वह है कच्ची पगडंडी, नेटवर्क का सन्नाटा, बिजली की अनियमितता और इलाज की अनिश्चितता। जब बीमारी दस्तक देती है, तो न योजना काम आती है, न फाइल। काम आती है चारपाई जो यहां एम्बुलेंस है, स्ट्रेचर है और कई बार ज़िंदगी का अंतिम वाहन भी। यह कैसी विडंबना है कि जिस देश में “स्मार्ट सिटी” शब्द गर्व से बोला जाता है, उसी देश में “स्मार्ट गांव” आज भी खटिया के भरोसे है। 

इस देश में 108, 112, 104, ये सभी नंबर स्वास्थ्य सुरक्षा के प्रतीक माने जाते हैं। लेकिन इन सेवाओं का दायरा भी सड़क की सीमा तक ही है। जहां सड़क खत्म, वहीं आपातकाल समाप्त। यह व्यवस्था बड़ी ईमानदारी से मानती है कि गांव में बीमारी उतनी गंभीर नहीं होती, जितनी शहर में। इसलिए गांव का मरीज अगर बच गया, तो उसे सहनशील माना जाता है; और अगर नहीं बचा—तो फाइल में लिख दिया जाता है, “दुर्गम क्षेत्र।” 

दिल्ली से घोषित ‘सार्वभौमिक स्वास्थ्य’ गांव पहुंचते-पहुंचते चारपाई पर सिमट जाता है।

केंद्र और राज्य सरकारों ने कस्बाई इलाकों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के नाम पर दो-तीन कमरों का ढांचा खड़ा कर रखा हैं। बाहरी दीवार पर बोर्ड लगे हैं, उद्घाटन शिलाएं चमक रही हैं लेकिन भीतर डॉक्टर अक्सर अस्थायी रूप से अनुपस्थित रहते हैं, दवाएं आपूर्ति की प्रतीक्षा में होती हैं और जांच सुविधाएं जिला स्तर पर उपलब्ध बताई जाती हैं। यानि इलाज की पूरी श्रृंखला मौजूद है, बस गांव में कुछ भी नहीं। डिजिटल हेल्थ मिशन के तहत हेल्थ आईडी, ऑनलाइन रिपोर्ट और टेलीमेडिसिन का सपना दिखाया जा रहा है। रोहना ठीहाई जैसे गांव पूछ रहे है—“नेटवर्क कब मिलेगा?” जहां मोबाइल सिग्नल नहीं, वहां टेलीमेडिसिन एक प्रेरक नारा भर है। मरीज खटिया पर है और व्यवस्था ऐप डाउनलोड करने की सलाह दे रही है। रोहना ठीहाई गाँव अकेला नहीं है। देश के कई राज्यों के ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सुविधा आज भी चारपाई पर ही सफर करती है। कहीं तस्वीर सामने आ जाती है, तो कुछ दिन चर्चा का विषय बनी होती है। फिर सब कुछ सामान्य, अगली खटिया के इंतजार में। 

रोहना ठीहाई अकेला गांव नहीं है। देश के कई राज्यों के ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सुविधा आज भी चारपाई पर ही सफर करती है। जहां मोबाइल सिग्नल नहीं, वहां टेलीमेडिसिन एक प्रेरक नारा भर है। मरीज खटिया पर है और व्यवस्था ऐप डाउनलोड करने की सलाह दे रही है।

हम किसी एक सरकार या विभाग पर आरोप नहीं लगा रहे, बल्कि उस स्थायी मानसिकता पर कटाक्ष कर रहे है, जिसमें गांव को हमेशा प्राथमिकता के क्रम में आखरी पायदान पर रखा जाता है। चारपाई पर लेटा मरीज किसी योजना की विफलता नहीं, बल्कि केंद्र और राज्य सरकारों की संयुक्त स्वास्थ्य नीति की मैदानी रिपोर्ट का जीवंत प्रमाण पत्र है। चारपाई पर लेटा लोकतंत्र केवल इलाज नहीं मांग रहा। वह सत्ता से, नौकरशाहों से यह सवाल पूछ रहा है “क्या इस देश में स्वास्थ्य सेवा तक पहुंचने के लिए भी पहले सड़क पास करनी होगी?” जवाब में व्यवस्था हमेशा की तरह, खामोशी से खटिया की ओर इशारा कर देती है।  

कैमरे की कलम: न्याय की मंशा बनाम व्यवस्था की हिचक


उच्च शिक्षा के परिसरों में समानता और गरिमा का प्रश्न कोई नया नहीं है। वर्षों से यह सवाल उठता रहा है कि क्या विश्वविद्यालय ज्ञान के मंदिर हैं या सामाजिक भेदभाव की प्रयोगशाला। इसी पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट द्वारा यूजीसी के 2026 के भेदभाव-रोधी नियमों पर लगाई गई अंतरिम रोक एक साधारण न्यायिक आदेश नहीं, बल्कि व्यवस्था के अंतर्विरोधों पर तीखी टिप्पणी है। कोर्ट का कहना है कि ये नियम “दूरगामी परिणाम” पैदा कर सकते हैं और “समाज को विभाजित” कर सकते हैं। सवाल यह है कि क्या समाज पहले से विभाजित नहीं है? क्या रोहित वेमुला और डॉ. पायल तडवी की मौतें किसी काल्पनिक विभाजन की उपज थीं, या उस सच्चाई का आईना थीं जिसे लंबे समय तक संस्थागत चुप्पी ने ढक रखा था ?

इन नियमों की उत्पत्ति किसी अकादमिक प्रयोग से नहीं, बल्कि पीड़ा से हुई थी। वर्षों की याचिकाएँ, माताओं की गुहार और न्याय की उम्मीद इन्हीं से यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन के 2026 के नियम जन्मे। इनका उद्देश्य था: शिकायत की सुनवाई, जवाबदेही और संरक्षण। परंतु विरोध की तेज़ आँधी जिसमें बड़े पैमाने पर सामान्य वर्ग की असहजता दिखी,  उसने यह उजागर किया कि समानता की बात आते ही विशेषाधिकार कितने असुरक्षित हो जाते हैं।

वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह की टिप्पणी इस बहस का नैतिक केंद्र है। अगर सरकार अपने ही नियमों का बचाव नहीं कर सकती, तो यह केवल कानूनी कमजोरी नहीं संवैधानिक कर्तव्य से पलायन है। न्यायपालिका ने समिति बनाने का सुझाव देकर संतुलन साधने की कोशिश की है, पर समिति की शरण अक्सर निर्णय को टालने का सुविधाजनक रास्ता भी बन जाती है। यहां मूल टकराव स्पष्ट है: भेदभाव-रोधी व्यवस्था बनाम ‘रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन’ की आशंका। पर क्या सुरक्षा देना भेदभाव है? क्या कमजोर के लिए ढाल बनना, मज़बूत पर अन्याय है? विश्वविद्यालयों में सत्ता-संरचना आज भी वही है फर्क बस इतना है कि अब पीड़ित बोलने लगे हैं।

सुप्रीम कोर्ट की यह रोक अंतिम फैसला नहीं है, पर एक चेतावनी अवश्य है कि नियम जल्दबाज़ी में नहीं, गहन विमर्श से बनें। मगर विमर्श का अर्थ विलंब नहीं होना चाहिए। हर स्थगन के साथ कैंपस में डर का एक और दिन जुड़ जाता है। न्याय तब तक अधूरा है, जब तक वह समय पर न मिले। यह कहना गलत नहीं होगा कि नियमों की भाषा सुधारी जा सकती है, प्रक्रिया पर बहस हो सकती है, पर भेदभाव के अस्तित्व से इनकार नहीं। अगर उच्च शिक्षा में समानता को ‘विभाजन’ कहा जाएगा, तो सवाल नियमों पर नहीं हमारे सामाजिक विवेक पर उठेगा।

किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसके विश्वविद्यालयों, स्कूलों और शिक्षकों के हाथों में आकार लेता है। शिक्षा केवल डिग्री पाने का माध्यम नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा, सामाजिक न्याय की रीढ़ और आर्थिक प्रगति की बुनियाद होती है। लेकिन आज भारत में यह सवाल पहले से कहीं ज़्यादा तीखेपन के साथ खड़ा है, क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था वास्तव में नागरिक गढ़ रही है या केवल आज्ञाकारी उपभोक्ता और सुविधाजनक भीड़ तैयार कर रही है?

देश की शिक्षा व्यवस्था इस समय एक गहरे असमंजस से गुजर रही है। एक तरफ़ “विश्वगुरु” बनने के दावे हैं, नई-नई नीतियाँ हैं, तकनीक और नवाचार की भाषा है; दूसरी ओर जर्जर स्कूल, खाली पद, असमान अवसर, बढ़ता निजीकरण और विश्वविद्यालय परिसरों में भय का माहौल। यह विरोधाभास किसी दुर्घटना का नतीजा नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही राजनीतिक प्राथमिकताओं का परिणाम है। 

सरकारें अक्सर शिक्षा नीतियों का हवाला देती हैं। नई शिक्षा नीति (NEP) को ऐतिहासिक बताया गया, लचीलापन, बहुविषयकता और मातृभाषा में शिक्षा जैसे वादे किए गए। लेकिन नीति और ज़मीनी हकीकत के बीच की खाई लगातार चौड़ी होती गई। शिक्षा पर सार्वजनिक खर्च आज भी जीडीपी के उस स्तर तक नहीं पहुँचा, जिसकी सिफ़ारिश दशकों से होती रही है। नई इमारतें और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म दिखाने में आसान हैं, लेकिन शिक्षक भर्ती, शोध अनुदान और छात्रवृत्तियाँ राजनीतिक प्राथमिकताओं की सूची में नीचे खिसकती चली गईं। इससे यह सवाल उठता है क्या सरकारें शिक्षा को सशक्तिकरण का औज़ार मानती हैं, या केवल एक प्रबंधन योग्य तंत्र?

शिक्षा में निजीकरण अब अपवाद नहीं, बल्कि मुख्यधारा बन चुका है। मेडिकल, इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट हर जगह फीस आसमान छू रही है। छात्र ऋण लेकर पढ़ने को मजबूर हैं और डिग्री पूरी होते ही रोज़गार की अनिश्चितता उनका इंतज़ार करती है। इस व्यवस्था में शिक्षा सामाजिक गतिशीलता का साधन कम और आर्थिक बोझ ज़्यादा बनती जा रही है। सरकारें निजी निवेश को समाधान के रूप में पेश करती हैं, लेकिन यह भूल जाती हैं कि बाज़ार का पहला लक्ष्य लाभ होता है, समानता नहीं। जब शिक्षा लाभ का साधन बनती है, तो हाशिये पर खड़े समुदाय सबसे पहले बाहर धकेले जाते हैं। 

विश्वविद्यालयों का हाल इससे भी ज़्यादा चिंताजनक है। कभी जिन परिसरों में बहस, असहमति और विचारों की टकराहट होती थी, आज वहाँ नोटिस, जांच और निलंबन का डर छाया रहता है। प्रशासनिक नियंत्रण इतना बढ़ चुका है कि विश्वविद्यालय अब ज्ञान के केंद्र नहीं, बल्कि सत्ता की प्रयोगशाला बनते जा रहे हैं। जब छात्र सवाल पूछते हैं, तो उन्हें “राष्ट्रविरोधी” कहा जाता है। जब शिक्षक असहमति जताते हैं, तो उन्हें “अनुशासनहीन”। यह कोई संयोग नहीं कि आलोचनात्मक सोच को पाठ्यक्रम से धीरे-धीरे हटाया जा रहा है। इतिहास को सुविधाजनक बनाया जा रहा है, समाजशास्त्र को संदिग्ध और दर्शन को अनुपयोगी। यह सब किसी अज्ञानवश नहीं हो रहा। यह एक स्पष्ट संकेत है कि सरकारें ऐसे नागरिक नहीं चाहतीं जो सोचें, बल्कि ऐसे जो मानें।

जातिगत भेदभाव, मानसिक उत्पीड़न और संस्थागत उपेक्षा ये विश्वविद्यालयों की कड़वी सच्चाइयाँ हैं। जब इन्हें रोकने के लिए नियम बनाए जाते हैं, तो हंगामा मचता है कि “समाज बँट जाएगा।” जैसे समाज पहले से बराबरी पर खड़ा हो ! 

ATR: जब जंगल में बाघ मरा और व्यवस्था खामोश रही


बिलासपुर।
  TODAY छत्तीसगढ़  /  आज 26 जनवरी को छत्तीसगढ़ के अचानकमार टाइगर रिज़र्व से आई एक ख़बर ने केवल वन्यजीव प्रेमियों को नहीं, बल्कि लोकतंत्र में जवाबदेही पर भरोसा रखने वाले हर नागरिक को असहज कर दिया। जंगल के भीतर एक युवा नर बाघ मृत पाया गया। आधिकारिक बयान आया, मौत दो बाघों के बीच आपसी संघर्ष का नतीजा है। फ़ाइलें चलीं, पोस्टमार्टम हुआ, रिपोर्ट बनी और मामला लगभग बंद मान लिया गया है। गणतंत्र दिवस के मौके पर आज जब तिरंगे के नीचे संविधान की शपथ दोहराई जा रही थी, उसी देश के चर्चित जंगल अचानकमार टाईगर रिजर्व में एक राष्ट्रीय पशु चुपचाप सड़ता रहा और जब उसकी मौत का सच सामने आया, तब जवाबों से ज़्यादा बचाव के बयान सामने आए। 

छत्तीसगढ़ के अचानकमार टाइगर रिज़र्व में एक युवा नर बाघ की मौत को वन विभाग ने दो बाघों के बीच हुए आपसी संघर्ष का परिणाम बताया है। घटना 25 जनवरी 2026 को अचानकमार परिक्षेत्र के सारसडोल क्षेत्र अंतर्गत कुडेरापानी परिसर की बताई गई है, जहाँ नियमित पेट्रोलिंग के दौरान सुरक्षा बलों ने बाघ का शव देखा। सूचना मिलते ही वन विभाग की टीम ने इलाके को सुरक्षित कर लिया और वरिष्ठ अधिकारियों को जानकारी दी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के निष्कर्षों के आधार पर यह दावा तकनीकी रूप से संभव भी है। बाघों के बीच क्षेत्रीय द्वंद्व प्राकृतिक व्यवहार का हिस्सा होता है और देश के कई संरक्षित इलाकों में ऐसी घटनाएँ दर्ज की गई हैं। लेकिन लोकतंत्र में ओप-एड का दायित्व केवल आधिकारिक निष्कर्ष दोहराना नहीं, बल्कि उन प्रश्नों को सामने लाना है जो सरकारी बयान के दायरे से बाहर रह जाते हैं। अचानकमार की यह घटना भी ऐसी ही है जहाँ मौत से ज़्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है, मौत के बाद का प्रबंधन।

विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, जिस बाघ का शव 26 जनवरी को पाया गया, उसकी मौत संभवतः कई दिन पहले हो चुकी थी। शव की स्थिति और इलाके में फैली दुर्गंध इस ओर संकेत करती है कि घटना और उसकी पहचान के बीच समय का अंतर था। अगर यह सही है, तो सवाल बाघ की मौत के कारण पर नहीं, बल्कि निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर उठता है। 

यहाँ बताना लाज़िमी होगा कि कुछ दिन पहले ही अचानकमार टाईगर रिजर्व क्षेत्र में बाघ गड़ना के लिये लगाये गये ट्रैप कैमरों में से दो ट्रैप कैमरों की मेमोरी चिप चोरी हो गई थी। यह घटना साधारण चोरी नहीं कही जा सकती। कैमरा ट्रैप को खोलना और उसमें से डेटा निकालना तकनीकी जानकारी की माँग करता है। मतलब साफ़ है, प्रतिबंधित क्षेत्र में लगाये गये कैमरों से चिप चोरी करने वाला अज्ञात शख़्स उन कैमरों को आपरेट करने की तकनीकि से वाकिफ है। अब यहां यह सवाल अनिवार्य हो जाता है कि चोरी किसने की ? क्या यह किसी बाहरी शिकारी का काम था या आंतरिक मिलीभगत ? और क्या इस मामले में आपराधिक जांच को प्राथमिकता दी गई ? ऐसे में जब निगरानी उपकरण ही निष्क्रिय कर दिए जाएँ, तो किसी भी संरक्षण दावे की विश्वसनीयता कमजोर पड़ जाती है। 

अचानकमार टाइगर रिज़र्व सालों से विवादों में रहा है। बाघ की मौत, ट्रैप कैमरों से डेटा कार्ड की चोरी के कुछ समय पहले ही कोर क्षेत्र में प्रभावशाली युवकों की मौजूदगी का एक वीडियो सामने आया था, उस वीडियो ने एटीआर प्रबंधन की लाचारी और अव्यवस्था की कलई खोलकर रख दी। सियासत, प्रभावशाली लोगों के सामने एटीआर प्रबंधन कितना बौना है और जंगल कितना असुरक्षित यह बात उस वीडियो से उजागर हुई। इस जंगल में कानून और नियम सभी के लिए समान रूप से लागू नहीं हैं। जहाँ स्थानीय समुदायों पर कड़े प्रतिबंध लागू होते हैं, वहीं रसूखदारों की घुसपैठ पर अक्सर नरमी दिखाई देती है। यह दोहरा मापदंड न केवल संरक्षण प्रयासों को कमजोर करता है, बल्कि स्थानीय लोगों के बीच व्यवस्था के प्रति अविश्वास भी पैदा करता है।

भारत में बाघ संरक्षण को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक सफलता के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है। बाघों की संख्या में वृद्धि, नए रिज़र्व की घोषणा और पर्यटन के आँकड़े ये सब सकारात्मक संकेत हैं। लेकिन संरक्षण केवल संख्या का खेल नहीं है। एटीआर में अगर बाघों की संख्या बढ़ रही है, तो निगरानी और सुरक्षा भी उसी अनुपात में मज़बूत होनी चाहिए। अचानकमार की ये तमाम घटनायें यह याद दिलाती है कि काग़ज़ी उपलब्धियाँ ज़मीनी हकीकत की जगह नहीं ले सकतीं। 

Chhattisgarh: एटीआर में नर बाघ की मौत, आपसी संघर्ष को कारण बताया गया

बिलासपुर/अचानकमार। छत्तीसगढ़ के अचानकमार टाइगर रिज़र्व में एक नर बाघ मृत अवस्था में पाया गया है। वन विभाग के अनुसार प्रारंभिक जांच में बाघ की मौत का कारण दो बाघों के बीच हुआ आपसी संघर्ष सामने आया है।

यह घटना 25 जनवरी 2026 को अचानकमार परिक्षेत्र के सारसडोल क्षेत्र अंतर्गत कुडेरापानी परिसर की बताई गई है, जहाँ नियमित पेट्रोलिंग के दौरान सुरक्षा बलों ने बाघ का शव देखा। सूचना मिलते ही वन विभाग की टीम ने इलाके को सुरक्षित कर लिया और वरिष्ठ अधिकारियों को जानकारी दी।

राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) की मानक प्रक्रिया के तहत गठित समिति की मौजूदगी में अगले दिन पशु चिकित्सकों की टीम ने बाघ का पोस्टमार्टम किया। अधिकारियों के मुताबिक मृत बाघ की उम्र लगभग दो वर्ष थी और वह नर था।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बताया गया है कि बाघ की गर्दन की हड्डी टूटी हुई पाई गई, वहीं गर्दन के निचले हिस्से पर दूसरे नर बाघ के दाँतों के स्पष्ट निशान मिले हैं। घटनास्थल पर झाड़ियों के टूटे हुए हिस्से, खरोंच के निशान, बाल और मल जैसे संकेत भी पाए गए हैं, जो क्षेत्रीय संघर्ष की ओर इशारा करते हैं। वन विभाग का कहना है कि मृत बाघ के पंजों में भी दूसरे बाघ के बाल मिले हैं, जिससे इस निष्कर्ष को बल मिलता है कि मौत आपसी द्वंद्व का नतीजा है। एहतियातन, एनटीसीए के दिशा-निर्देशों के अनुसार आंतरिक अंगों को संरक्षित कर प्रयोगशाला जांच के लिए भेजा गया है। 

घटना में शामिल दूसरे बाघ की पहचान कर ली गई है और उसकी गतिविधियों पर कैमरा ट्रैप और फील्ड ट्रैकिंग के ज़रिये निगरानी की जा रही है। पोस्टमार्टम के बाद अधिकारियों और विशेषज्ञों की मौजूदगी में बाघ का अंतिम संस्कार किया गया। वन अधिकारियों का कहना है कि अचानकमार टाइगर रिज़र्व में बाघों की संख्या में हाल के वर्षों में वृद्धि हुई है। कान्हा–बांधवगढ़ कॉरिडोर से प्राकृतिक प्रवासन, अनुकूल आवास और प्रजनन सफलता के कारण क्षेत्र में बाघों की उपस्थिति बढ़ी है, जिसके चलते क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा और संघर्ष की घटनाएँ स्वाभाविक मानी जाती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार ऐसी घटनाएँ स्वस्थ बाघ आबादी वाले क्षेत्रों में कभी-कभी सामने आती हैं और यह वन्यजीवों के प्राकृतिक व्यवहार का हिस्सा होती हैं।

कैमरे की कलम: शोर का लोकतंत्र और आस्था की राजनीति


आज का भारत बहसों से नहीं, शोर से चल रहा है। यह शोर टीवी स्टूडियो से लेकर सोशल मीडिया तक फैला है। हर मुद्दा तात्कालिक है, हर गुस्सा प्रायोजित, और हर बहस अधूरी। धर्म, जाति और पहचान ये अब सामाजिक विमर्श नहीं रहे, ये राजनीतिक औज़ार बन चुके हैं। जिस दिन कोई मुद्दा जनसरोकार के सवालों की ओर बढ़ने लगता है, उसी दिन नया शोर पैदा कर दिया जाता है। समाज, धर्म और जाति जो कभी पहचान और सह-अस्तित्व के आधार थे अब टकराव की रेखाओं में बदलते दिख रहे हैं। भीड़ के शोर में व्यक्ति की आवाज़ गुम होती जा रही है। हर मुद्दा दो ध्रुवों में बँट जाता है समर्थन या विरोध, बीच की विवेकपूर्ण आवाज़ के लिए कोई जगह नहीं बचती। यह हालात लोकतंत्र के लिए खतरनाक हैं, क्योंकि लोकतंत्र बहस से मजबूत होता है, उन्माद से नहीं।

पिछले एक सप्ताह से देश में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से जुड़े मुद्दों पर गरमाई बहस यह दिखाती है कि आज आस्था भी राजनीतिक हथियार बनती जा रही है। कोई समर्थन में खड़ा है, कोई विरोध में। लेकिन बहुत कम लोग सवाल पूछने की जगह बचा पा रहे हैं। धर्म जब संवाद के बजाय दमन का माध्यम बन जाए, तो समस्या धर्म में नहीं उसके राजनीतिक इस्तेमाल में होती है। यह विवाद असल में इस बात का प्रतीक है कि हम असहमति को अपमान समझने लगे हैं। जैसा कि सभी जानते हैं प्रयागराज में मौनी अमावस्या के अवसर पर संगम स्नान को लेकर ज्योतिष पीठ बद्रीनाथ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और मेला प्रशासन के बीच टकराव देखने को मिला। इस दौरान शंकराचार्य के स्नान कार्यक्रम और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर प्रशासन और उनके समर्थकों के बीच मतभेद सामने आए। मौनी अमावस्या के दिन मेला प्रशासन ने शंकराचार्य को पालकी पर सवार होकर स्नान के लिए जाने से रोक दिया। प्रशासन का कहना था कि सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन को देखते हुए विशेष व्यवस्था लागू की गई थी। वहीं शंकराचार्य समर्थकों ने इसे परंपराओं का अपमान बताया। स्थिति उस समय तनावपूर्ण हो गई जब शंकराचार्य समर्थकों और पुलिस के बीच धक्का-मुक्की की खबरें सामने आईं। इसके बाद शंकराचार्य ने मेला और स्थानीय प्रशासन के खिलाफ धरना शुरू कर दिया। इस घटनाक्रम ने न सिर्फ प्रयागराज बल्कि देशभर में ध्यान खींचा और सोशल मीडिया से लेकर टीवी चैनलों तक यह मुद्दा चर्चा का विषय बन गया। हालांकि यह पहला मौका नहीं है जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सार्वजनिक विवादों में आए हों। इससे पहले भी उनके कई बयान और हस्तक्षेप चर्चा और विवाद का कारण बन चुके हैं।

वैसे भी भारत में विवाद कोई नई चीज़ नहीं है। यहाँ विवाद जन्म लेते हैं, पलते हैं, मीडिया में जवान होते हैं और फिर किसी अगले विवाद की आहट में खो जाते हैं। लेकिन कुछ विवाद ऐसे होते हैं जो सिर्फ किसी व्यक्ति या बयान तक सीमित नहीं रहते वे समाज के भीतर चल रहे गहरे अंतर्विरोधों को उजागर कर देते हैं। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को लेकर देशभर में जो बहस चल रही है, वह भी ऐसा ही एक मामला है। कोई उनके शंकराचार्य होने पर सवाल खड़े करता है, कोई उनके अहंकारी तेवर का हवाला देकर गलत ठहराता है। ऐसा लगता है यह विवाद किसी एक बयान का नहीं, बल्कि उस भूमिका का है जो एक धार्मिक पदाधिकारी आज के भारत में निभा रहा है या निभाना चाहता है। 

भारतीय परंपरा में शंकराचार्य केवल एक धार्मिक गुरु नहीं होता। वह विचार की परंपरा का वाहक होता है संयम, विवेक और तटस्थता का प्रतीक। ऐसे में जब कोई शंकराचार्य बार-बार समकालीन राजनीति, सरकार, नीतियों या सामाजिक समूहों पर तीखे वक्तव्य देता है, तो प्रश्न उठना स्वाभाविक है क्या यह आध्यात्मिक मार्गदर्शन है या वैचारिक हस्तक्षेप ? स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के हालिया वक्तव्यों ने यही प्रश्न फिर से केंद्र में ला दिया है। कभी गाय, कभी संविधान, कभी राष्ट्रवाद, कभी सरकार, विषयों की सूची लंबी है। समस्या यह नहीं कि वे बोल रहे हैं; समस्या यह है कि वे किस स्वर, किस भाषा और किस उद्देश्य से बोल रहे हैं। सदियों से व्यंग्य और कटाक्ष भारतीय बौद्धिक परंपरा का हिस्सा रहे हैं। कबीर ने भी किया, तुलसी ने भी संकेत दिए। लेकिन वहाँ व्यंग्य आत्ममंथन के लिए था, न कि तालियाँ बटोरने के लिए। आज जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का कोई बयान आता है, तो वह टीवी बहसों की हेडलाइन बनता है, सोशल मीडिया के ट्रेंड में बदल जाता है और फिर राजनीतिक खेमों में बाँट दिया जाता है। एक पक्ष उन्हें “सच्चा धर्मरक्षक” बताता है, दूसरा “राजनीतिक एजेंडा चलाने वाला साधु”। यह विभाजन बताता है कि उनका वक्तव्य अब आध्यात्मिक संवाद नहीं रह गया, वह राजनीतिक हथियार बन चुका है। 

यहाँ एक असहज प्रश्न खड़ा होता है, क्या एक साधु की भाषा उतनी ही कठोर हो सकती है जितनी एक राजनीतिक नेता की? जब धर्माचार्य सरकार पर सीधा हमला करते हैं, तो एक वर्ग इसे “साहस” कहता है। लेकिन जब वही धर्माचार्य किसी विशेष सामाजिक या वैचारिक समूह के प्रति कठोर रुख अपनाते हैं, तो वही वर्ग “धर्म की रक्षा” का तर्क देता है। यह दोहरा मापदंड ही विवाद की असली जड़ है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के कुछ वक्तव्यों में यह स्पष्ट दिखता है कि वे खुद को नैतिक सत्ता के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। एक ऐसी सत्ता जो चुनी नहीं गई, लेकिन जो चुनी हुई सत्ता को चुनौती देती है। 

आज स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की चर्चा केवल इसलिए भी नहीं है कि वे एक शंकराचार्य हैं, बल्कि इसलिए भी कि वे उस बदलती भूमिका का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसमें धर्माचार्य आध्यात्मिक मार्गदर्शन से आगे बढ़कर सामाजिक और राजनीतिक विमर्श में सक्रिय दिखाई देते हैं। यह भूमिका भारतीय लोकतंत्र और समाज, दोनों के लिए नए सवाल खड़े करती है। क्या धर्माचार्यों की यह सक्रियता समय की मांग है, या इससे धार्मिक पदों की तटस्थता प्रभावित होती है यह बहस अभी जारी है। लेकिन इतना स्पष्ट है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद आज के भारत में धर्म, राजनीति और सार्वजनिक विमर्श के संगम पर खड़े एक ऐसे व्यक्ति हैं, जिनकी हर टिप्पणी केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक अर्थ भी ग्रहण कर लेती है। 

इस पूरे विवाद में मीडिया की भूमिका भी कम दिलचस्प नहीं है। हर बयान को ब्रेकिंग न्यूज़, हर कटाक्ष को राष्ट्रीय बहस और हर प्रतिक्रिया को टकराव बना दिया गया। टीवी स्टूडियो में बैठे एंकर पूछते हैं— “क्या स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती देश की आवाज़ हैं?” “क्या वे राजनीति में हस्तक्षेप कर रहे हैं?” लेकिन शायद ही कोई यह पूछता है कि क्या हम धर्माचार्यों को इस भूमिका में धकेल रहे हैं, क्योंकि हमें शोर चाहिए, समाधान नहीं? 


बंजर में जीवन की आहट: मोहनभाठा में इंडियन कोर्सर की वापसी


बिलासपुर।
 TODAY छत्तीसगढ़  /  कभी-कभी धरती बहुत धीमी आवाज़ में बोलती है। इतनी धीमी कि अगर सुनने का धैर्य न हो, तो वह आवाज़ खो जाती है। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले का मोहनभाठा भी ऐसी ही एक आवाज़ है सूखी, बंजर और उपेक्षित, लेकिन भीतर ही भीतर जीवन से भरी हुई। सवा साल के लंबे इंतज़ार के बाद 18 जनवरी को जब यहाँ एक बार फिर इंडियन कोर्सर (Indian Courser) दिखाई पड़ा, तो लगा जैसे इस ज़मीन ने खुद कहा हो 'मैं अब भी ज़िंदा हूँ।' 

"वह आता है, दौड़ता है और बिना कोई निशान छोड़े ओझल हो जाता है। लेकिन उसकी मौजूदगी बहुत कुछ कह जाती है।"

तेज़ चाल, सतर्क स्वभाव और खुले, शुष्क मैदानों से गहरे रिश्ते वाला यह दुर्लभ परिंदा कल शाम जब मोहनभाठा में अपनी ज़मीन तलाशता दिखाई देता है, तो यह महज़ एक पक्षी का दिखना नहीं बल्कि एक पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के जीवित होने का संकेत होता है। कल तीन कौरसरों का मोहनभाठा में दिखना इस बात का प्रमाण है कि तमाम दबावों के बावजूद यह मैदान अब भी उन्हें बुला रहा है। मध्यम आकार का, पतले शरीर और लंबी टाँगों वाला इंडियन कोर्सर (Indian Courser) उड़ने से ज़्यादा दौड़कर चलता है। 

"उन तस्वीरों में सिर्फ़ अंडे नहीं थे वे भरोसे की निशानी थीं। भरोसा कि यह ज़मीन सुरक्षित है, भरोसा कि यहीं अगली पीढ़ी जन्म ले सकती है।"

इन ख़ास पक्षियों को लेकर सबसे चौकाने वाली बात करीब दो बरस पहले सामने आई। बिलासपुर के दो नामचीन पक्षी प्रेमी और फोटोग्राफर संदीपन अधिकारी, राधाकिशन शर्मा ने इंडियन कोर्सर (Indian Courser) के अंडे की तस्वीरें दर्ज कीं। यह महज़ फ़ोटोग्राफ़ी नहीं थी यह ठोस प्रमाण था कि मोहनभाठा की बंजर भूमि उन्हें केवल भाती ही नहीं, बल्कि यहीं वे अपनी अगली पीढ़ी को भी बढ़ा रहे हैं। कुछ फ़ोटोग्राफ़रों के पास इनके चूजों की तस्वीरें होना इस विश्वास को और मज़बूत करता है कि यह मैदान एक सक्रिय प्रजनन स्थल है।

मोहनभाठा की पहचान उसकी जैव-विविधता है। यहाँ शेड्यूल–I से लेकर IV तक के पक्षी, जीव-जंतु और वन्यप्राणी समय-समय पर दिखाई देते हैं। बारिश के मौसम में यह क्षेत्र कई दुर्लभ प्रजाति के प्रवासी पक्षियों के ठहराव का बड़ा केंद्र बन जाता है। सबसे संकटग्रस्त श्रेणी में शामिल इजिप्शन वल्चर का हर साल परिवार के साथ यहां दिखाई देना बताता है कि आसपास कहीं उनका रहवास मौजूद है। ऐसे संकेत किसी भी इलाके के पारिस्थितिक स्वास्थ्य का पैमाना होते हैं। 

इंडियन कोर्सर की वापसी हमें खुश करती है, लेकिन साथ ही सवाल भी पूछती है क्या यह ज़मीन आने वाले वर्षों में भी उसे स्वीकार कर पाएगी ? इंडियन कोर्सर जैसे पक्षी संकेतक होते हैं। वे बताते हैं कि प्रकृति अब भी हमें एक मौका दे रही है। 

लेकिन यही समृद्धि आज खतरे में है। मोहनभाठा जो कभी पक्षी प्रेमियों के लिए स्वर्ग समान था अब अवैध भूमि अधिग्रहण, शिकारियों की बेख़ौफ़ आवाजाही, मुरूम के अवैध उत्खनन, पेड़ों की कटाई और असामाजिक तत्वों की पनाहगाह बनता जा रहा है। प्रशासनिक उदासीनता और जिम्मेदार विभागों की अनदेखी ने इस चारागाह को सिमटने की कगार पर ला खड़ा किया है।

इंडियन कोर्सर की वापसी जितनी सुखद है, उतनी ही चेतावनी भी। यह बताती है कि अगर संरक्षण की ठोस पहल नहीं हुई, तो यह जीवन-रेखा टूट सकती है। घास भूमियाँ अक्सर “बंजर” कहकर नज़रअंदाज़ कर दी जाती हैं, जबकि यही मैदान दुर्लभ प्रजातियों का आधार होते हैं। कौरसर जैसे संकेतक पक्षी हमें बताते हैं कि प्रकृति कहाँ तक सहन कर सकती है और कहाँ नहीं। 

मोहनभाठा के संरक्षण की मुहिम जारी रहनी चाहिए क्योंकि मैदान बचेंगे, तभी परिंदे लौटेंगे; और परिंदे लौटेंगे, तभी उम्मीदें जिंदा रहेंगी।

मोहनभाठा को बचाना केवल एक मैदान को बचाना नहीं, बल्कि उस विरासत को संभालना है जो आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवन का सबक बन सकती है। जब तक इंडियन कोर्सर (Indian Courser) जैसे पक्षी यहाँ दौड़ते रहेंगें, तब तक यह धरती ज़िंदा है। इसके संरक्षण की मुहिम जारी रहनी चाहिए क्योंकि मैदान बचेंगे, तभी परिंदे लौटेंगे; और परिंदे लौटेंगे, तभी उम्मीदें जिंदा रहेंगी।

कैमरे की कलम: चूहे, दीमक और सात करोड़ की लोकतांत्रिक भूख


छत्तीसगढ़ के कवर्धा जिले में जो हुआ, वह घोटाला नहीं घोटाले का सरकारी विज्ञापन है। फर्क बस इतना है कि इस बार पोस्टर पर नेता नहीं, चूहे मुस्कुरा रहे हैं। 26 हजार क्विंटल धान, सात करोड़ रुपये और जवाब चूहा, दीमक, मौसम। यानी चोरी भी प्रकृति ने की, गिनती भी प्रकृति ने बिगाड़ी और जवाबदेही भी प्रकृति ले जाएगी। यह घटना उस व्यवस्था का चरित्र प्रमाणपत्र है, जो हर बड़े घोटाले के बाद और ज्यादा बेशर्म, ज्यादा आत्मविश्वासी और ज्यादा रचनात्मक होती जा रही है। सात करोड़ रुपये का धान न आग में जला, न बाढ़ में बहा, न ही किसी युद्ध में लुटा बस चूहों, दीमकों और मौसम ने खा लिया। यह सफाई इतनी मासूम है कि अपराध भी खुद को ठगा हुआ महसूस करे।

यह पहला मौका है जब सरकारी बयान ने जीव-जंतुओं को भ्रष्टाचार की अग्रिम पंक्ति में ला खड़ा किया है। अब तक घोटालों में नेता, अफसर, दलाल और ठेकेदार बदनाम होते थे, लेकिन कवर्धा ने इतिहास रच दिया यहाँ चूहे मुख्य अभियुक्त हैं। वे भी ऐसे चूहे, जो क्विंटल में खाते हैं, रजिस्टर में एंट्री करवाते हैं, फर्जी बिल बनवाते हैं और जाते-जाते CCTV की आंखों पर पट्टी भी बाँध देते हैं। यह कोई साधारण चूहा नहीं, बल्कि सिस्टम-अनुकूल चूहा है।

प्रश्न यह नहीं है कि 26 हजार क्विंटल धान कैसे गायब हुआ। असली प्रश्न यह है कि इतना धान गायब होने के बाद भी सिस्टम कैसे खड़ा है? गोदामों में धान आता है, तौला जाता है, सील होता है, निरीक्षण होता है, रिपोर्ट बनती है और फिर एक दिन पता चलता है कि धान था ही नहीं। यह जादू नहीं, यह प्रशासनिक कला है। इसे भ्रष्टाचार कहना इस कला का अपमान होगा; यह तो प्रशासनिक शिल्प है।

प्रशासन की सफाई बताती है कि चूहे और दीमक अब सिर्फ अनाज या लकड़ी नहीं खाते, वे जवाबदेही भी खाते हैं। मौसम सिर्फ फसल नहीं खराब करता, वह फाइलें भी साफ कर देता है। यह वही मौसम है जो हर घोटाले के बाद अचानक सक्रिय हो जाता है कभी बारिश बनकर, कभी नमी बनकर, कभी “लंबे समय तक भंडारण” के बहाने। लगता है प्रकृति भी अब सरकारी तंत्र का हिस्सा बन चुकी है।

विपक्ष ने इसे घोटाला कहा, जनता ने मज़ाक बनाया और प्रशासन ने औपचारिक कार्रवाई। कुछ निलंबन, कुछ नोटिस यानी संस्कार अनुसार शोकसभा । असली दोषी वहीं सुरक्षित हैं, जहाँ हर घोटाले के बाद रहते हैं फ़ाइलों के पीछे, पदों के ऊपर और व्यवस्था की छाया में। निलंबन यहाँ सज़ा नहीं, रिवाज़ है। नोटिस यहाँ सवाल नहीं, ढाल है।

यह पूरा प्रकरण बताता है कि भ्रष्टाचार अब चोरी नहीं करता, वह प्रक्रिया का पालन करता है। सब कुछ नियमों के भीतर होता है काग़ज़ पूरे, हस्ताक्षर पूरे, मुहरें पूरी। कमी सिर्फ गोदाम में होती है। और जब कमी पकड़ में आती है, तो कारण इतने प्राकृतिक होते हैं कि मानव जिम्मेदारी की जरूरत ही नहीं पड़ती।

कल्पना कीजिए यदि किसी किसान के घर से एक बोरी धान गायब हो जाए, तो क्या वह यह कह सकता है कि “चूहे खा गए”? शायद नहीं। उससे पूछा जाएगा लापरवाही क्यों की, सुरक्षा क्यों नहीं की। लेकिन जब सरकारी गोदाम से सात करोड़ का धान गायब होता है, तो सवाल उल्टा हो जाता है बेचारे चूहे क्या करें ? यही तो शासन और आम आदमी का फर्क है। आम आदमी दोषी होता है, सिस्टम हमेशा पीड़ित।

यह मामला यह भी बताता है कि निगरानी तंत्र सिर्फ काग़ज़ पर जिंदा है। CCTV कैमरे थे, लेकिन उन्होंने कुछ नहीं देखा। रजिस्टर थे, लेकिन उन्होंने सब कुछ सही बताया। निरीक्षण हुए, लेकिन किसी को कमी नहीं दिखी। यह सामूहिक अंधापन नहीं, सहमति से ओढ़ी गई पट्टी है। जब सबको पता हो कि क्या नहीं देखना है, तब कुछ भी नहीं दिखता।

कवर्धा का यह प्रकरण एक जिले की कहानी नहीं है। यह उस राज्य और उस व्यवस्था का प्रतीक है, जहाँ धान खरीदी किसान के नाम पर होती है, लेकिन फायदा हमेशा किसी और को मिलता है। किसान खेत में खड़ा रहता है, धूप में, कर्ज़ में, इंतज़ार में और धान गोदाम पहुँचते ही अदृश्य हो जाता है। न किसान को जवाब, न जनता को हिसाब। आज चूहे हैं, कल कुछ और होगा। कभी कहा जाएगा नमी ज्यादा थी। कभी रिकॉर्ड पुराना था। कभी मानव भूल। लेकिन एक बात स्थायी रहेगी ऊपर तक कोई जिम्मेदार नहीं। क्योंकि जिम्मेदारी वहीं मर जाती है, जहाँ सत्ता शुरू होती है।

सबसे खतरनाक यह नहीं कि धान गायब हुआ। सबसे खतरनाक यह है कि इसे लेकर सिस्टम शर्मिंदा नहीं है। वह सफाई दे रहा है, तर्क दे रहा है, बहस कर रहा है और आगे बढ़ रहा है। यह निर्लज्जता ही असली संकट है। जब घोटाला भी रूटीन हो जाए, तब लोकतंत्र सिर्फ चुनावी रस्म बनकर रह जाता है।

कवर्धा ने हमें यह सिखाया है कि आज के शासन में चूहा सबसे सुरक्षित पात्र है। न उसे गिरफ्तार किया जा सकता है, न उससे पूछताछ। वह हर बार बच निकलता है बिल्कुल वैसे ही जैसे असली दोषी। फर्क सिर्फ इतना है कि चूहा भूखा होता है, और व्यवस्था लालची।

मेरा यह कथन किसी चूहे के खिलाफ नहीं है। यह उस तंत्र के खिलाफ है, जिसने चूहे को बहाना बना लिया है। क्योंकि सच यह है कि धान चूहों ने नहीं खाया धान व्यवस्था ने खाया है। और जब व्यवस्था खुद खाने लगे, तब देश सिर्फ गोदाम नहीं खोता, विश्वास भी खो देता है। 

आज सवाल यह नहीं है कि 26 हजार क्विंटल धान कहाँ गया। सवाल यह है कि हमारी जवाबदेही, हमारी नैतिकता और हमारी शासन व्यवस्था कब और कहाँ गायब हुई ? और उसका जवाब शायद किसी गोदाम में नहीं मिलेगा वह कहीं फाइलों के बीच, नोटिसों के नीचे और चूहों की आड़ में दफन है।

कैमरे की कलम: राष्ट्रीय परिसंवाद या मौन सम्मेलन ?


किसी विश्वविद्यालय का सभागार आमतौर पर ज्ञान, संवाद और असहमति का सुरक्षित स्थल माना जाता है। यहाँ सवाल पूछे जाते हैं, बहस होती है और कभी-कभी तीखी असहमति भी सामने आती है लेकिन वही असहमति विश्वविद्यालय को विश्वविद्यालय बनाती है। यदि वहाँ सिर्फ़ ताली बजाने वाले श्रोता चाहिए हों, तो वह मंच अकादमिक नहीं, मनोरंजनात्मक हो जाता है। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर स्थित गुरू घासीदास सेंट्रल यूनिवर्सिटी में हाल में जो हुआ, उसने यही बुनियादी सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या हमारे विश्वविद्यालय अब संवाद के लिए हैं या केवल कुर्सियों की पूजा के लिए।

घटना एक राष्ट्रीय परिसंवाद की है, विषय था ‘समकालीन हिन्दी कहानी : बदलते जीवन संदर्भ’। यानी ऐसा विषय जिसमें जीवन की जटिलताएँ, विडंबनाएँ और असहमति स्वाभाविक हैं। आयोजन साहित्य अकादमी, दिल्ली के सहयोग से था। मंच पर देश के कई प्रतिष्ठित साहित्यकार मौजूद थे, जिनमें कथाकार मनोज रूपड़ा भी शामिल थे। लेकिन परिसंवाद साहित्य से अधिक सत्ता और संवेदनशीलता के टकराव का मंच बन गया।

बताया जाता है कि विश्वविद्यालय के कुलपति आलोक कुमार चक्रवाल अपने वक्तव्य में विषय से भटकते हुए चुटकुलों के सहारे श्रोताओं को संबोधित कर रहे थे। यह कोई अपराध नहीं है जब तक कि चुटकुले ज्ञान का विकल्प न बनने लगें। लेकिन जब कुलपति ने मंच पर बैठे कथाकार से यह पूछ लिया कि वे कहीं बोर तो नहीं हो रहे, तो मानो उन्होंने स्वयं संवाद का दरवाज़ा खोल दिया। कथाकार ने भी उसी खुले दरवाज़े से भीतर कदम रखते हुए सिर्फ़ इतना कहा “आप विषय पर नहीं बोल रहे हैं।”

यहीं से विश्वविद्यालय का सभागार अचानक अदालत में बदल गया, जहाँ जज भी वही थे, अभियोजक भी वही और फ़ैसला सुनाने वाले भी वही। एक साधारण-सी टिप्पणी को असहिष्णुता का ऐसा झोंका लगा कि कुलपति ने सार्वजनिक मंच से ही अतिथि लेखक को अनुशासनहीन, बदतमीज़ और अवांछित घोषित कर दिया। फिर आदेश आया बाहर जाइए। मानो यह कोई विश्वविद्यालय नहीं, निजी ड्रॉइंग रूम हो, जहाँ मेहमान वही टिक सकता है जो मेज़बान की हर बात पर सिर हिलाए।

विडंबना यह है कि विश्वविद्यालय में कुलपति को पहला विद्वान माना जाता है, पहला शिक्षक, पहला श्रोता भी। लेकिन यहाँ तो पहला श्रोता ही सवाल सुनने को तैयार नहीं था। सवाल सुनते ही कुर्सी ने अपनी असली शक्ति दिखा दी। यह वही कुर्सी है जो आदमी को ऊँचा नहीं करती, लेकिन उसे यह भ्रम ज़रूर दे देती है कि वह ऊँचा हो गया है।

वीडियो में दिखता है कि कुछ श्रोता कथाकार के साथ सभागृह से बाहर निकल गए। यह दृश्य किसी विरोध प्रदर्शन जैसा नहीं था, बल्कि एक मौन असहमति थी जैसे कोई कह रहा हो, “अगर सवाल पूछना अपराध है, तो हम इस अदालत में नहीं बैठेंगे।” यह शायद उस दिन की सबसे सार्थक प्रतिक्रिया थी।

अब सवाल उठता है क्या विश्वविद्यालयों में असहमति की कोई जगह बची है? क्या ‘राष्ट्रीय परिसंवाद’ का अर्थ यह है कि मंच से केवल वही बोला जाए जो सत्ता को अच्छा लगे? अगर ऐसा ही है, तो फिर विश्वविद्यालय और सरकारी दफ़्तर में क्या अंतर रह जाता है?

कुलपति का पद केवल प्रशासनिक नहीं होता, वह नैतिक और बौद्धिक नेतृत्व का भी प्रतीक होता है। गुरु घासीदास जैसे संत के नाम पर बने विश्वविद्यालय से यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वहाँ विनम्रता और संवाद की परंपरा होगी। लेकिन यहाँ तो हाथ हिलाकर अतिथि को बाहर निकालना ही संवाद का अंतिम रूप बन गया।

यह तर्क दिया जा सकता है कि मंच की मर्यादा बनाए रखना ज़रूरी है। यह बात सही है। लेकिन मर्यादा केवल अतिथि के लिए नहीं होती, मेज़बान के लिए भी होती है। और जब मर्यादा की परिभाषा यह हो जाए कि “आप हमारी बात से असहमत नहीं हो सकते”, तो वह मर्यादा नहीं, मौन का अनुशासन कहलाता है।

कुलपति बनने से पहले वे गुजरात के सौराष्ट्र विश्वविद्यालय में प्राध्यापक रह चुके हैं। यानी अकादमिक जीवन में बहस, सवाल और आलोचना से उनका परिचय नया नहीं होना चाहिए। फिर भी यदि एक टिप्पणी से इतना विचलन हो जाए कि सार्वजनिक अपमान का रास्ता चुना जाए, तो समस्या टिप्पणी में नहीं, संवेदनशीलता के अभाव में है।

यह घटना केवल एक लेखक और एक कुलपति के बीच का विवाद नहीं है। यह उस व्यापक संकट का लक्षण है, जिसमें संस्थानों की कुर्सियाँ व्यक्तियों से बड़ी हो गई हैं। जहाँ आलोचना को दुश्मनी समझा जाने लगा है और असहमति को अनुशासनहीनता। विश्वविद्यालयों में उत्कृष्टता इसी वजह से घट रही है क्योंकि सवाल पूछने वाले कम होते जा रहे हैं और ताली बजाने वाले बढ़ते जा रहे हैं।

अचरज की बात यह भी है कि ऐसी घटनाओं पर व्यवस्था की चुप्पी अब असामान्य नहीं रही। न केंद्र सरकार से कोई प्रतिक्रिया, न राज्यपाल स्तर से कोई सवाल। शायद इसलिए कि बदतमीजी अब अपवाद नहीं रही, बल्कि धीरे-धीरे ‘नया सामान्य’ बनती जा रही है। गरिमा जैसे शब्द अब भाषणों में ज़्यादा मिलते हैं, व्यवहार में कम।

ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या साहित्यकारों, शिक्षाविदों और पत्रकारों को ऐसे कुलपतियों के रहते विश्वविद्यालयों का बहिष्कार नहीं करना चाहिए? यह बहिष्कार किसी विचारधारा के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि व्यवहार के ख़िलाफ़ होना चाहिए। यह किसी वाम-दक्षिण की लड़ाई नहीं, बल्कि न्यूनतम इंसानियत की माँग है। कहा जाता है कि वाम और दक्षिण के बीच कहीं एक मानवपंथ भी होना चाहिए। शायद वही मानवपंथ हमें यह सिखाता है कि सत्ता अस्थायी होती है, लेकिन शब्द स्थायी। और शब्दों के साथ किया गया अन्याय देर-सबेर इतिहास में दर्ज हो जाता है।

यदि छत्तीसगढ़ के राज्यपाल को अपनी संवैधानिक भूमिका का ज़रा भी अहसास है, तो उन्हें इस घटना के वीडियो को केवल देखना नहीं चाहिए, बल्कि यह सवाल भी पूछना चाहिए कि विश्वविद्यालयों को भय और अहंकार का प्रयोगशाला बनाने का अधिकार आखिर किसने दिया ?

फिलहाल, समाज के पास ऐसे अहंकार का कोई बड़ा इलाज नहीं है। न अदालतें, न आयोग, न समितियाँ। लेकिन एक छोटा-सा लोकतांत्रिक उपाय अब भी बचा है स्मृति। लोग याद रखें कि किसने सवाल को अपमान समझा और किसने अपमान को सवाल बना दिया। और अगर कोई चिट्ठी भेजनी ही हो, तो उसमें लंबे भाषण की ज़रूरत नहीं। कभी-कभी एक वाक्य भी पर्याप्त होता है  “आप कुर्सी पर तो बैठे हैं, लेकिन गरिमा अभी बाहर खड़ी है।”

छत्तीसगढ़ के पर्यावरण इतिहास में एक नया अध्याय: रामसर का ताज, ज़मीन पर सन्नाटा


12 दिसंबर 2025, इस तारीख़ ने छत्तीसगढ़ के पर्यावरण इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ा। बिलासपुर जिले का कोपरा जलाशय राज्य का पहला रामसर स्थल घोषित हुआ। काग़ज़ों में यह क्षण गौरव का था। ऐसा गौरव, जिसे माथे पर तिलक की तरह सजाया जाना चाहिए था पर विडंबना देखिए कि तिलक लगते ही आईना धुंधला कर दिया गया। शोर बहुत हुआ, सार गुम हो गया।

रामसर का तमगा मिलते ही श्रेय की होड़ शुरू हो गई सियासत ने माइक पकड़ा, विभागीय दांव-पेंचों ने फाइलें तेज़ दौड़ाईं, और ठेकेदारों की चाल अचानक फुर्तीली हो गई। सरकारी बोर्ड रातों-रात उग आए; जलाशय के किनारे पक्षियों की तस्वीरें टंगीं, जिसे गायब होते भी समय नहीं लगा । काम सरकारी था, इसलिए अंदाज़ भी वही दिखावटी, जल्दबाज़, आत्मसंतुष्ट ।

कोपरा को रामसर का गौरव हासिल होने मौके पर एक आयोजन का तम्बू सजाने के लिये 9 जनवरी 2026 को वन विभाग ने ‘बर्ड वॉक’ और संगोष्ठी का आयोजन किया। सरकारी आमंत्रण कार्ड छपे, अतिथियों की सूची लंबी थी बस एक चीज़ कम थी: कोपरा। संगोष्ठी सकरी के वन चेतना केंद्र में हुई कोपरा से चार किलोमीटर दूर। यह दूरी केवल भौगोलिक नहीं थी; यह उस सोच की दूरी थी, जो मानती है कि सम्मान मंच पर बँटता है, ज़मीन पर नहीं।

बर्ड वॉक में कुछ पक्षी प्रेमी और फोटोग्राफ़र दिखे वे ही, जो बरसों से बिना तामझाम, बिना फंड, बिना बोर्ड के कोपरा को समझते रहे। संगोष्ठी में भीड़ थी, पर कोपरा के लोग नहीं थे। जिस गाँव को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली, वहाँ का नज़ारा हर रोज़ जैसा ही रहा। जिन युवाओं और स्कूली बच्चों के बीच संरक्षण का बीज बोया जाना था, वे आयोजन के शोर से दूर खड़े रहे या यूँ कहें, खड़ा कर दिए गए। 

सबसे पीड़ादायक उपेक्षा उन वरिष्ठ लोगों की रही, जो तथ्य, धैर्य और ज़मीन से जुड़ी समझ रखते हैं वे जो कोपरा के गौरव को संरक्षित करने में मील का पत्थर बन सकते थे। उन्हें आमंत्रण नहीं मिला; शायद इसलिए कि वे तालियाँ नहीं, सवाल पूछते हैं। सवाल जो तस्वीरों से नहीं, सच से डराते हैं। मुझे इस आयोजन का निमंत्रण भी मिला, विभाग के अधिकारियों ने भरपूर तवज्जो भी दी, लेकिन कोपरा की गैर मौजूदगी ने मुझे न सिर्फ परेशान किया बल्कि कईयों सवाल सोचने पर मजबूर कर दिया, व्यक्तिगत मेरे लिये 12 दिसंबर 2025 बड़ी ख़ुशी का दिन रहा। कोपरा को रामसर का दर्जा मिलने के साथ केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव से लेकर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, वन मंत्री केदार कश्यप के ट्वीटर पर शुभकामनाओं के सन्देश समेत अन्य स्थानों पर जिन तस्वीरों को शेयर किया गया वो मेरी खींची हुई थी लेकिन आयोजन स्थल पर कोपरा गाँव की अनुपस्थिति से मेरी भावनाएँ  व्यक्तिगत आहत हुईं। सच यह है कि वन विभाग को संरक्षण से ज़्यादा क्रेडिट मैनेजमेंट आता है। पहले अनदेखी, फिर घोषणा, फिर समारोह और अंत में आत्ममुग्धता। यकीनन संरक्षण को ‘इवेंट’ बना दिया गया है। 

यह वही कोपरा है, जिसकी महत्ता को लेकर पिछले एक दशक से कुछ पक्षी प्रेमी और फ़ोटोग्राफ़र लगातार चेताते रहे। अतिक्रमण, प्रदूषण, शिकार, असामाजिक गतिविधियाँ सब कुछ प्रशासन के संज्ञान में था। मुरुम का अवैध उत्खनन, कोलवॉशरी के लिए टैंकरों से पानी की चोरी, सूचनाएँ वन विभाग से लेकर जिला प्रशासन तक पहुँचीं पर कानों में जूँ तक न रेंगी। मछली मारने की पुरानी रवायतें चलीं, और संरक्षण की नई भाषा फाइलों में सोती रही।

रामसर का दर्जा, यह केवल एक पदक नहीं, एक जिम्मेदारी है। यह याद दिलाता है कि आर्द्रभूमि कोई सजावटी वस्तु नहीं, जीवन-रेखा है। पर हमारे यहाँ जीवन-रेखाएँ भी तब तक दिखती नहीं, जब तक उन पर रिबन न बँध जाए। और रिबन बँधते ही, कैंची खोजी जाने लगती है काटने के लिए, जोड़ने के लिए नहीं।

12 दिसंबर से पहले सिर्फ सुगबुगाहटें थीं, उहापोह था। अब जब घोषणा हो चुकी है। संरक्षण बोर्ड से नहीं, सबकी सहभागिता से होता है। संगोष्ठी केंद्रों से नहीं, गाँव की चौपाल से जन्म लेती है। बर्ड वॉक कैमरे से नहीं, चेतना से पूरी होती है। अगर रामसर का ताज सच में पहनना है, तो उसे संभालने के लिए सिर भी चाहिए वह सिर, जो झुके नहीं; वह आँख, जो दिखावे के परे देखे; और वह दिल, जो कोपरा को तस्वीर नहीं, जीवित तंत्र माने। वरना इतिहास यही लिखेगा कि हमने गौरव तो पाया, पर उसे बचाने की हिम्मत खो दी। 

ATR रिज़र्व या रियासत ? अचानकमार की अंदरूनी कहानी


बिलासपुर।
 TODAY छत्तीसगढ़  / छत्तीसगढ़ का अचानकमार टाइगर रिज़र्व केवल बाघों का आवास नहीं है, यह राज्य की वन-नीति, प्रशासनिक ईमानदारी और सरकार की नीयत का जीवित प्रमाण होना चाहिए था लेकिन आज एटीआर जिस हालत में खड़ा है, वह बताता है कि यहाँ संरक्षण नहीं, संरक्षण का नाटक चल रहा है; क़ानून नहीं, रसूख़ सर्वोपरि है। 2009 में टाइगर रिज़र्व घोषित होने के बाद से एटीआर लगातार विवादों में रहा है। कभी बाघों की संख्या को लेकर संदेह, तो कभी अफसरों की लापरवाही। लेकिन हालिया घटनाएँ यह स्पष्ट कर देती हैं कि समस्या अब केवल प्रशासनिक अक्षमता की नहीं, बल्कि सिस्टमेटिक मिलीभगत की है।

कोर एरिया में निजी वाहन, राइफल, खुलेआम फायरिंग, आग जलाना और घंटों तक बेरोक-टोक घूमना ये सब किसी आम नागरिक के लिए असंभव है। यह सब तभी संभव है, जब नीचे से ऊपर तक संरक्षण और शह मौजूद हो। 

लोरमी क्षेत्र के रसूख़दार युवकों का मामला इसी सच्चाई को उजागर करता है। उनका आत्मविश्वास बताता है कि उन्हें न पकड़े जाने का डर था, न कार्रवाई का। क्योंकि अनुभव से वे जानते थे यह जंगल काग़ज़ों में संरक्षित है, हक़ीक़त में नहीं। चूँकि उनका ही बनाया हुआ वीडियो जब सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तो अफसरों को कार्रवाही की प्रक्रिया शुरू करनी पड़ी। विभागीय ढोल में पोल होने के बाद उन युवकों को पकड़ा गया और जेल भेज दिया गया। अब मामला न्यायालयीन व्यवस्था और प्रक्रिया के बीच है। 

वायरल वीडियो को देखकर कहना गलत नहीं होगा कि जमुनाही, सुरही और कंचनपुर जैसे कई बैरियर वन-सुरक्षा के प्रतीक नहीं, बल्कि अब रसूख़दारों के लिए स्वागत द्वार बन चुके हैं। बिना पूछताछ, बिना तलाशी, बिना अनुमति बैरियर उठते चले जाते हैं। सवाल यह नहीं कि गार्ड ने बैरियर क्यों उठाया, सवाल यह है कि गार्ड को यह भरोसा किसने दिया कि उससे कोई सवाल नहीं होगा ? 

जब मामला सामने आया, तब जो हुआ वह और भी चिंताजनक है। फील्ड डायरेक्टर छुट्टी का हवाला देते हैं, डिप्टी डायरेक्टर और रेंज अफसर फोन बंद रखते हैं, और सहायक संचालक “नंबर देने से मना है” कहकर कॉल काट देते हैं। यह केवल गैर-जिम्मेदारी नहीं, यह जांच से बचने की सोची-समझी रणनीति है।

यह मानना भोलापन ही होगा कि सरकार को इन हालात की जानकारी नहीं है। सवाल यह है कि जानते हुए भी चुप क्यों है? क्या इसलिए कि आरोपी “प्रभावशाली” हैं ? क्या इसलिए कि कार्रवाई करने से राजनीतिक असुविधा होगी ? अगर ऐसा है, तो सरकार को साफ़ कहना चाहिए कि उसके लिए जंगल, बाघ और क़ानून तीनों से ऊपर रसूख़, राजनैतिक प्रभाव है। 

आज एटीआर में बाघों की संख्या बढ़ने के दावे किए जाते हैं, लेकिन जब कोर एरिया में राइफलें गरजें, आग जले और अफसर आंखें मूंद लें तो ये आंकड़े सिर्फ़ प्रेस रिलीज़ बनकर रह जाते हैं। बाघ केवल शिकारी से नहीं मरता, वह प्रशासनिक लापरवाही और राजनीतिक संरक्षण से भी मरता है। कईयों सवाल हैं जैसे, कोर एरिया में निजी हथियारों को ले जाने की अनुमति किसने दी ? बैरियर पर तैनात कर्मचारियों ने किसके निर्देश पर बिना जांच रास्ता खोला ? प्रतिबंधित क्षेत्र में 3–4 घंटे तक मौज मस्ती, फायरिंग और आगजनी की जानकारी वरिष्ठ अफसरों तक क्यों नहीं पहुँची या जानबूझकर पहुँचने नहीं दी गई ? और सबसे बड़ा सवाल, क्या इस मामले में सिर्फ़ राजनैतिक और रसूख़दार युवक ही दोषी हैं या पूरा सिस्टम ? 

यहां का हालिया घटनाक्रम यह दर्शाता है कि एटीआर में कानून, नियम और संरक्षण की अवधारणा गंभीर रूप से कमजोर हुई है। स्थिति ऐसी बन चुकी है कि यह मामला अब प्रशासनिक चूक का नहीं, बल्कि संवैधानिक कर्तव्यों के उल्लंघन और सार्वजनिक संसाधनों की अवैध लूट का बनता जा रहा है जिस पर न्यायिक हस्तक्षेप जरूरी है।

 उपलब्ध वीडियो साक्ष्यों के अनुसार न केवल वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की धारा 27, 28 एवं 38-V का उल्लंघन है, बल्कि नेशनल टाइगर कंज़र्वेशन अथॉरिटी (NTCA) की गाइडलाइंस का भी सीधा अपमान है।

अब तो ऐसा लगता है अचानकमार टाइगर रिज़र्व आज बाघों से ज़्यादा सिस्टम के शिकंजे में फंसा हुआ है। अगर अब भी जिम्मेदार अफसरों पर सख़्त कार्रवाई नहीं होती, अगर राजनीतिक संरक्षण पर पर्दा नहीं उठता तो यह मान लेना चाहिए कि यह जंगल संरक्षण नहीं, बल्कि सत्ता-संरक्षित अराजकता का इलाका बन चुका है। ऐसे हालात में इतिहास यही दर्ज करेगा कि बाघ जंगल में नहीं मरे, उन्हें सिस्टम ने मारा है। 

कैमरे की कलम: वर्दी नोची गई, व्यवस्था खामोश रही


छत्तीसगढ़ के तमनार से सामने आई यह घटना केवल एक अपराध नहीं है यह हमारे समाज के चेहरे पर पड़ा एक गहरा तमाचा है। जेपीएल कोयला खदान के विरोध में हो रहे प्रदर्शन के दौरान ड्यूटी पर तैनात एक महिला आरक्षक को खेत-खलिहानों में दौड़ाया जाना, फिर थककर गिरने के बाद उसके साथ मारपीट करना और उसके कपड़े फाड़कर अर्धनग्न कर देना यह विवरण पढ़ना भी शर्मनाक है, देखना तो असहनीय रहा होगा और उससे भी ज़्यादा विचलित करने वाली बात यह है कि उस दौरान वह महिला आरक्षक लोगों के सामने छोड़ देने की गुहार लगाती रही, गिड़गिड़ाती रही और वहीं मौजूद कुछ लोग उसे बचाने के बजाय इस अमानवीय कृत्य का वीडियो बनाते रहे। यह दृश्य केवल एक महिला की बेबसी नहीं दिखाता, यह हमारे सामूहिक पतन का आईना है। मामले का खुलासा भी सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो के बाद हुआ, चर्चा है शासन-प्रशासन के कुछ लोग मामले में चुप्पी साधने का इशारा करते रहे।  

तमनार की तस्वीर: लोकतंत्र का सबसे शर्मनाक फ्रेम

ड्यूटी निभा रही एक महिला के कपड़े फाड़े जाना, उसके साथ बदसलूकी और उसके सम्मान को सार्वजनिक रूप से रौंदा जाना यह किसी भी परिस्थिति में, किसी भी तर्क के साथ, किसी भी आंदोलन या असंतोष के नाम पर कभी जायज़ नहीं ठहराया जा सकता। अगर कोई समाज यह बहस करने लगे कि “हालात ऐसे थे” या “भीड़ उग्र थी”, तो समझ लेना चाहिए कि वह समाज अपने नैतिक आधार खो चुका है। 

लोकतंत्र में विरोध एक मौलिक अधिकार है। असहमति, आंदोलन, प्रदर्शन ये सब लोकतांत्रिक ढाँचे की ताकत हैं लेकिन जब विरोध हिंसा में बदल जाए और वह हिंसा किसी महिला की देह और गरिमा पर हमला बन जाए, तो वह विरोध नहीं रहता वह अराजकता बन जाता है। जब एक थकी हुई महिला आरक्षक खेत में गिरती है और भीड़ उसे घेर लेती है तो वह सत्ता का प्रतीक नहीं रहती, वह सिर्फ़ एक असहाय महिला रह जाती है और उस क्षण अगर समाज उसे बचाने के बजाय तमाशा देखे, तो समझ लेना चाहिए कि समस्या सिर्फ़ अपराधियों की नहीं, हम सबकी है। 

तमनार में उस महिला के कपड़े नहीं फटे, राज्य की साख फटी है। भीड़ ने वर्दीधारी महिला को अर्धनग्न नहीं किया गया बल्कि पूरा प्रशासन नंगा हुआ है।

तमनार की घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या आज विरोध का अर्थ सिर्फ़ आक्रोश उगलना रह गया है ? क्या अब विरोध में यह भी शामिल है कि सामने खड़ी महिला वर्दीधारी है तो उसे “टारगेट” बनाया जाए ? और अगर वर्दी में खड़ी महिला भी सुरक्षित नहीं, तो फिर आम महिलाओं के लिए यह समाज कितना सुरक्षित है ? इस तरह की घटनाओं में सबसे डरावनी चीज़ सिर्फ़ अपराध नहीं होती, बल्कि आसपास खड़ी भीड़ की चुप्पी होती है। कितने लोगों ने रोका ? कितनों ने कहा कि “यह गलत है” ? कितनों ने आगे बढ़कर उस महिला की मदद की ? तमनार की घटना ने एक बार फिर यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि भारत में महिला सशक्तिकरण की वास्तविक स्थिति क्या है। यह घटना उस व्यापक सामाजिक दावे को भी चुनौती देती है, जिसके तहत यह कहा जाता है कि भारत में महिलाएँ अब पहले से कहीं अधिक सशक्त हो चुकी हैं। 

अक्सर कहा जाता है कि वर्दी सत्ता का प्रतीक होती है। लेकिन यहाँ यह तर्क भी खोखला साबित होता है। क्योंकि अगर यह केवल सत्ता का विरोध होता, तो हमला प्रतीकात्मक होता नारे, प्रतिरोध, गिरफ्तारी, पर यहाँ हमला महिला पर था उसके शरीर पर, उसके सम्मान पर। यह फर्क समझना ज़रूरी है। यह घटना बताती है कि हमारे समाज में आज भी महिला को सबसे आसान निशाना माना जाता है, चाहे वह आम नागरिक हो या वर्दी में खड़ी राज्य की प्रतिनिधि।  

यह मत कहिए कि छत्तीसगढ़ हिंसक हो गया है। छत्तीसगढ़ आज भी उतना ही सरल, आत्मीय और मानवीय है। बदली है तो व्यवस्था, जिसने लोगों के आक्रोश को संवाद नहीं, हिंसा में बदल दिया है। बदले हैं तो शासक, जो उद्योगपतियों के लिए रेड कार्पेट बिछाते हैं और जनता के लिए पुलिस की लाठी छोड़ देते हैं।

तमनार की घटना छत्तीसगढ़ के सामने कई कठिन सवाल रखती है—क्या बढ़ता आक्रोश राज्य की पारंपरिक सामाजिक सहनशीलता को पीछे छोड़ रहा है? और क्या विकास, विरोध और कानून-व्यवस्था के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए नई सोच की ज़रूरत है ? क्या इस विरोध प्रदर्शन के मद्देनज़र मौके पर पुलिस अफसरों के अलावा सैकड़ों पुलिस कर्मी उस पीड़ित महिला सहकर्मी की मदद करने में नाकाम नहीं रहे ? क्या पुलिस सत्ता के इशारे पर केवल पूंजीपतियों की ढाल बनकर हक़ मांगने वालों के सामने खड़ी रहेगी ? पिछले कई दिनों से शांति पूर्ण तरीके से चल रहे विरोध प्रदर्शन में उस दिन (27 दिसंबर) आखिर वो कौन लोग थे जिन्होंने प्रदर्शनकारियों और प्रशासन के बीच अपनी रोटी सेंकी ? शासन-प्रशासन की भद्द पिट जाने के बाद पुलिस हरकत में आई है ऐसी ख़बरें हैं। अब मामलें में दोषियों की गिरफ्तारी और जरूरी कार्रवाही होगी। कुछ गिरफ्तारियां भी हुई हैं।   

इस घटना को केवल एक अलग-थलग मामला मानकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं होगा। यह एक चेतावनी है कि यदि आक्रोश को दिशा नहीं मिली और संवेदनशीलता कमजोर पड़ी, तो उसका सबसे बड़ा असर समाज के सबसे असुरक्षित वर्गों पर पड़ता है। 

सड़क हादसा: अमरकंटक जा रहे पांच दोस्तों की कार पेड़ से टकराई, दो की मौत


बिलासपुर |
  TODAY छत्तीसगढ़  / अमरकंटक की ओर जा रहे पांच दोस्तों की एक तेज़ रफ्तार कार के पेड़ से टकरा जाने से दो लोगों की मौत हो गई, जबकि तीन अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए। हादसा इतना भीषण था कि कार के परखच्चे उड़ गए और एक युवक का शव वाहन में फंस गया। पुलिस के मुताबिक, कार (क्रमांक CG 04 QJ 2152) रायपुर से आमागोहन होते हुए मरहीमाता रोड के रास्ते अमरकंटक जा रही थी। सुबह करीब 9:30 बजे जब वाहन ग्राम भस्को के पास पहुंचा, तभी वह अनियंत्रित होकर सड़क किनारे एक पेड़ से जा टकराई।

दो की मौत, तीन की हालत गंभीर

हादसे में पीछे की सीट पर बैठे रामकुमार धीवर (45), निवासी कचना, रायपुर की मौके पर ही मौत हो गई। वहीं राजकुमार साहू ने अस्पताल में इलाज के दौरान दम तोड़ दिया। कार चालक नीलेश्वर धीवर (38), निवासी दलदल सिवनी, रायपुर, सुखसागर मानिकपुरी (39) निवासी मजेठा, आरंग और अमित चंद्रवंशी (39) निवासी दलदल सिवनी, मोवा रायपुर गंभीर रूप से घायल हुए हैं। तीनों को इलाज के लिए सिम्स अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जहां उनकी हालत चिंताजनक बताई जा रही है।

घटना की सूचना मिलते ही बेलगहना चौकी प्रभारी हेमंत सिंह पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंचे। कार बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुकी थी और चालक के दोनों पैर टूटकर वाहन में फंस गए थे। पुलिस और स्थानीय ग्रामीणों की मदद से घायलों को बाहर निकाला गया और एंबुलेंस से अस्पताल भेजा गया। पुलिस की प्रारंभिक जांच में हादसे का कारण तेज़ रफ्तार और सड़क की स्थिति को माना जा रहा है। पुलिस ने मर्ग कायम कर लिया है और मामले की आगे की जांच जारी है। 

तमनार घटना: महिला कांग्रेस की निंदा, सरकार पर संवादहीनता और कानून-व्यवस्था को लेकर सवाल


रायपुर |
  TODAY छत्तीसगढ़  / छत्तीसगढ़ के तमनार क्षेत्र में महिला पुलिसकर्मियों के साथ हुई घटना को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ तेज़ हो गई हैं। फूलोदेवी नेताम ने इस घटना की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए राज्य सरकार और प्रशासन पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। फूलोदेवी नेताम ने कहा कि तमनार में महिला टीआई और महिला आरक्षक के साथ जो घटना घटी, वह बेहद दुखद और चिंताजनक है। उन्होंने कहा कि राज्य में इस तरह का माहौल पहले कभी देखने को नहीं मिला।

कोल माइंस परियोजना और स्थानीय विरोध

नेताम ने बताया कि रायगढ़ जिले के तमनार क्षेत्र के गारे पेलमा सेक्टर-1 में जिंदल स्टील को ओपन कास्ट कोयला खदान आवंटित की गई है। इसके लिए 8 दिसंबर को जनसुनवाई आयोजित की गई थी, लेकिन क्षेत्र के ग्रामीण, आदिवासी और स्थानीय निवासी शुरुआत से ही इस परियोजना का विरोध कर रहे हैं।

उनके अनुसार, प्रभावित 14 गांवों के लोग अपनी पुश्तैनी ज़मीन देने को तैयार नहीं हैं। ग्रामीणों का कहना है कि कोयला उत्खनन से खेती-बाड़ी, जंगल और पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचेगा। नेताम ने कहा कि स्थानीय लोग लंबे समय से सरकार से संवाद और समाधान की मांग कर रहे थे, लेकिन सरकार या प्रशासन की ओर से किसी भी स्तर पर उनसे बातचीत का प्रयास नहीं किया गया।

संवाद की कमी और बढ़ता तनाव

फूलोदेवी नेताम का कहना है कि संवाद की कमी के कारण प्रदेश में तनावपूर्ण स्थिति बन रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार के कार्यकाल में राज्य में अराजकता का माहौल बनता जा रहा है और कानून-व्यवस्था की स्थिति गंभीर है। उन्होंने कहा, “आंदोलनकारियों पर लाठीचार्ज किया जाना दुखद है और महिला पुलिस कर्मियों के साथ हुई घटना भी उतनी ही पीड़ादायक है। दोनों ही घटनाएँ चिंता का विषय हैं।”

सरकार पर लगाए आरोप

महिला कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष ने सवाल उठाया कि भारतीय जनता पार्टी की “डबल इंजन सरकार” में जनता क्यों लगातार आक्रोशित हो रही है और क्यों लोग कानून अपने हाथ में लेने को मजबूर हो रहे हैं। उनके अनुसार, राज्य की स्थिति अब चिंताजनक होती जा रही है।

उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य सरकार जल, जंगल और ज़मीन को केवल पूंजीपतियों के लिए मानकर चल रही है और जो लोग अपनी बात मुखरता से रखते हैं या आंदोलन करते हैं, उनके साथ बिना संवाद के बल प्रयोग किया जा रहा है। नेताम ने यह भी कहा कि आंदोलन के दौरान हुई एक व्यक्ति की मृत्यु के लिए भी सरकार की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।

महिला सुरक्षा पर सवाल

फूलोदेवी नेताम ने कहा कि यदि राज्य में महिला टीआई और महिला आरक्षक ही सुरक्षित नहीं हैं, तो आम महिलाओं की सुरक्षा की कल्पना करना मुश्किल हो जाता है। उन्होंने इस घटना को महिला सुरक्षा के लिहाज़ से भी बेहद गंभीर बताया। इस संबंध में जानकारी वंदना राजपूत की ओर से दी गई है।

Chhattisgarh: बीस साल का संरक्षण या दो दशक का भ्रम ? वन विभाग की नीति पर सवाल

उदंती सीता नदी टाइगर रिजर्व में पूरी ब्रीड का अकेला बच्चा छोटू वन भैंसा

हेरोइन सप्लाई करते पति-पत्नी गिरफ्तार, NDPS एक्ट में कार्रवाई


रायपुर।
  TODAY छत्तीसगढ़  / पुलिस ने हेरोइन (चिट्टा) की तस्करी में लिप्त पति-पत्नी को गिरफ्तार किया है। आरोपियों के कब्जे से 16.01 ग्राम प्रतिबंधित मादक पदार्थ हेरोइन (चिट्टा) और मोबाइल फोन जब्त किया गया है। जब्त हेरोइन की कीमत करीब 3.20 लाख रुपये आंकी गई है। 

पुलिस के अनुसार हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी अंतर्गत एलआईजी 02/20 निवासी हरप्रीत कौर के पास हेरोइन बिक्री के लिए रखे जाने की सूचना मिली थी। सूचना पर पुलिस टीम ने दबिश देकर उसे रंगे हाथों पकड़ लिया। घर की तलाशी लेने पर पलंग के दराज में रखी प्लास्टिक जिपर थैली से हेरोइन बरामद की गई। पूछताछ में हरप्रीत कौर ने बताया कि हेरोइन उसका पति जोधा सिंह पंजाब से लेकर आया था। इसी दौरान जोधा सिंह भी घर पहुंचा, जिसे पुलिस ने मौके पर ही गिरफ्तार कर लिया।

दोनों आरोपियों से कुल 16.01 ग्राम हेरोइन, एक मोबाइल फोन जब्त किया गया है। पुलिस ने पति-पत्नी के खिलाफ धारा 21 (बी) एनडीपीएस एक्ट के तहत अपराध दर्ज कर आगे की कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी है। पुलिस का कहना है कि मादक पदार्थों की तस्करी के नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों की भूमिका की भी जांच की जा रही है।


राष्ट्रपति को भाया जशपुर का जशक्राफ्ट, हस्तशिल्प की सराहना


जशपुरनगर। 
 TODAY छत्तीसगढ़  / राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू एवं मुख्यमंत्री विष्णु देव साय को जशपुर जिले के जशक्राफ्ट ब्रांड के अंतर्गत स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों बांस और सवई घास से निर्मित आकर्षक हस्तशिल्प उत्पाद उपहार स्वरूप भेंट किए गए। इन उत्पादों को पारंपरिक जनजातीय कलाकृतियों के रूप में प्रस्तुत किया गया।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने जशक्राफ्ट के हस्तशिल्प उत्पादों को देखकर विशेष प्रसन्नता व्यक्त की और स्थानीय कारीगरों द्वारा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के साथ विकसित की गई इन पारंपरिक कलाकृतियों की भूरि-भूरि प्रशंसा की। यह अवसर जशपुर जिले की समृद्ध जनजातीय कला, कारीगरों के उत्कृष्ट कौशल और जशपुर वनमंडल के नवाचारपूर्ण प्रयासों के लिए गौरवपूर्ण क्षण रहा। जशपुर वनमंडल की ओर से बताया गया कि भविष्य में भी इस प्रकार की नवाचारपूर्ण पहलें निरंतर जारी रखी जाएंगी, जिससे स्थानीय संसाधनों का संरक्षण, पारंपरिक ज्ञान का संवर्धन और ग्रामीण आजीविका को मजबूती मिल सके।

महिला कारीगरों को मिला स्वरोजगार

नवाचार के तहत ग्राम कोटानपानी की संयुक्त वन प्रबंधन समिति को चक्रीय निधि से वित्तीय सहायता प्रदान की गई है। इससे ग्रामीण महिला कारीगरों को स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध हुए हैं। समिति के सदस्य बांस और सवई घास से पर्यावरण-अनुकूल हस्तशिल्प उत्पादों का निर्माण कर रहे हैं।

जशक्राफ्ट ब्रांड के अंतर्गत झुमके, माला, टोपी सहित अन्य पारंपरिक आभूषण और दैनिक उपयोग की सामग्री तैयार की जा रही है। ये उत्पाद स्थानीय कारीगरों की पारंपरिक कला, रचनात्मकता और पीढ़ियों से संचित जनजातीय ज्ञान का सशक्त प्रतीक हैं। निर्माण प्रक्रिया में पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के सतत उपयोग के सिद्धांतों का विशेष ध्यान रखा जा रहा है। 

जशक्राफ्ट पहल से न केवल स्थानीय कारीगरों और ग्रामीण परिवारों का आर्थिक सशक्तिकरण हो रहा है, बल्कि जशपुर की जनजातीय कला और हस्तकला को राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। इससे स्थानीय उत्पादों के लिए नए बाजार खुलेंगे और रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।

नववर्ष पर कानून तोड़ा तो होगी कार्रवाई, SSP सिंह का साफ संदेश


बिलासपुर। 
 TODAY छत्तीसगढ़  / नववर्ष के अवसर पर शहर के अलावा जिले में अपराध नियंत्रण और आम नागरिकों की सुरक्षा के लिहाज से पुलिस अलर्ट मोड में दिखाई देगी। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक रजनेश सिंह के निर्देश पर पुलिस प्रशासन ने व्यापक तैयारियां पूरी कर ली हैं। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ने नागरिकों से अपील की है कि वे कानून का पालन करें और जिम्मेदार नागरिक की भूमिका निभाएं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि शांति भंग करने, हुड़दंग, नशे में वाहन चलाने और कानून तोड़ने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

एसएसपी ने बताया कि नववर्ष की रात शहर के प्रमुख चौक-चौराहों, सार्वजनिक स्थलों और भीड़भाड़ वाले इलाकों में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया जाएगा। पेट्रोलिंग बढ़ाई जाएगी और संदिग्ध गतिविधियों पर कड़ी नजर रखी जाएगी। यातायात व्यवस्था सुचारु रखने के लिए विशेष इंतजाम किए गए हैं। उन्होंने युवाओं से खास तौर पर अपील की कि जश्न मनाते समय मर्यादा बनाए रखें, शराब पीकर वाहन न चलाएं और दूसरों की सुरक्षा का भी ध्यान रखें। पुलिस प्रशासन का उद्देश्य है कि नववर्ष का स्वागत सुरक्षित, शांत और खुशहाल माहौल में हो।

छत्तीसगढ़ की प्रमुख नृत्य एवं लोक कला, संस्कृति पर केंद्रित फोटो प्रदर्शनी 2 से 4 जनवरी तक

सांकेतिक तस्वीर 

Chaattisgarh: शराब पीने के पैसे मांगने पर चाकू से जानलेवा हमला


जांजगीर-चांपा।
  TODAY छत्तीसगढ़  / जिले के चांपा थाना क्षेत्र अंतर्गत ग्राम बहेराडीह में शराब पीने के लिए पैसे की मांग को लेकर हुए विवाद में एक युवक पर धारदार हथियार से जानलेवा हमला करने वाले आरोपी को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। आरोपी के कब्जे से घटना में प्रयुक्त चाकू भी बरामद कर लिया गया है।

पुलिस ने बताया कि प्रार्थी मंगलूराम यादव, निवासी बहेराडीह, ने 29 दिसंबर को चांपा थाना में रिपोर्ट दर्ज कराई थी। उसने बताया कि वह शाम करीब 4.30 बजे तेली तालाब की ओर दिशा मैदान के लिए गया था। लौटते समय उसकी मुलाकात पड़ोसी ओमप्रकाश यादव से हुई।

आरोप है कि ओमप्रकाश यादव ने मंगलूराम से शराब पीने के लिए कहा। मना करने पर उसने शराब के लिए पैसे की मांग करते हुए गाली-गलौज शुरू कर दी। विवाद बढ़ने पर आरोपी ने अपने पास रखे चाकू से मंगलूराम यादव के गले पर जानलेवा हमला कर दिया, जिससे अत्यधिक खून बहने लगा। घटना को अंजाम देने के बाद आरोपी मौके से फरार हो गया था । पुलिस का कहना है कि आरोपी के खिलाफ संबंधित धाराओं में मामला दर्ज कर आगे की कानूनी कार्रवाई की जा रही है। 

पुलिस की गिरफ़्त में आरोपी 

CHHATTISGARH: विधायक की पत्नी पर धारदार हथियार से जानलेवा हमला, हालत गंभीर


जगदलपुर।
  TODAY छत्तीसगढ़  / मंगलवार की सुबह बस्तर से जो सनसनीखेज वारदात सामने आई है जाहिर तौर पर वो राज्य की कानून व्यवस्था पर सीधे सवाल खड़े करने वाली हो सकती है । क्षेत्रीय विधायक लखेश्वर बघेल की पत्नी पर अज्ञात हमलावरों ने धारदार हथियार से जानलेवा हमला कर दिया। हमले में उनके दोनों हाथों की नसें कट गईं, जबकि गले पर भी गहरे घाव हैं। इस घटना के बाद इलाके में चर्चाओं का बाज़ार गर्म है।

बघेल के पारिवारिक सदस्यों के अनुसार, घटना के बाद आज सुबह करीब 8 बजे उन्हें गंभीर हालत में महारानी अस्पताल लाया गया। स्थिति नाजुक होने के कारण डॉक्टरों ने तत्काल उन्हें आईसीयू में भर्ती कर लिया। विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम लगातार उनकी निगरानी कर रही है। डॉक्टरों के अनुसार फिलहाल हालत गंभीर बनी हुई है।

घटना की सूचना मिलते ही पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी मौके पर पहुंचे और मामले की जांच शुरू कर दी गई है। अस्पताल परिसर और आसपास के क्षेत्र में सुरक्षा के लिहाज से कुछ पुलिस बल तैनात कर दिया गया है, ताकि किसी भी प्रकार की अप्रिय स्थिति से निपटा जा सके। पुलिस हमले के कारणों और आरोपियों की तलाश में जुटी हुई है।

इस घटना के बाद राजनीतिक और सामाजिक हलकों में भी भारी चिंता का माहौल है। पुलिस का कहना है कि सभी पहलुओं को ध्यान में रखकर जांच की जा रही है और जल्द ही पूरे मामले का खुलासा किया जाएगा। 

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