रायपुर। TODAY छत्तीसगढ़ / छत्तीसगढ़ के उदंती–सीता नदी टाइगर रिज़र्व से हाल ही में कुछ वन भैंसों को हटाए जाने की ख़बर ने राज्य के वन्यजीव संरक्षण प्रयासों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बताया जा रहा है कि इन जानवरों को हाइब्रिड घोषित करते हुए रिज़र्व क्षेत्र से लगभग 100 किलोमीटर दूर ले जाकर छोड़ा गया है। कुछ जानकारों के अनुसार, इन्हें पड़ोसी राज्य ओडिशा में छोड़े जाने की भी चर्चा है, हालांकि इस पर आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
उदंती सीता नदी टाइगर रिजर्व में पूरी ब्रीड का अकेला बच्चा छोटू वन भैंसा
यह घटनाक्रम इसलिए अहम है क्योंकि पिछले लगभग बीस वर्षों से छत्तीसगढ़ वन विभाग इन वन भैंसों के संरक्षण और संवर्धन पर लगातार खर्च करता रहा है और समय-समय पर यह दावा किया जाता रहा कि उदंती–सीता क्षेत्र में वन भैंसों की संख्या में वृद्धि हो रही है।
हाइब्रिड होने का मुद्दा कैसे सामने आया
इस पूरे मामले में निर्णायक मोड़ तब आया जब केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण ने उदंती–सीता में मौजूद वन भैंसों को हाइब्रिड बताते हुए असम से लाए जाने वाले शुद्ध नस्ल के वन भैंसों के साथ इनके प्रजनन की अनुमति देने से इनकार कर दिया। इसके बाद यह स्पष्ट हुआ कि जिन जानवरों को लंबे समय से “वन भैंसा” बताया जा रहा था, वे आनुवंशिक रूप से शुद्ध नस्ल के नहीं थे।
इसके बाद वन विभाग ने संविधान के अनुच्छेद 48(ए) और 51(ए)(जी) का हवाला देते हुए हाइब्रिड वन भैंसों को रिज़र्व क्षेत्र से हटाने का प्रस्ताव तैयार किया। अक्टूबर 2023 में यह कहा गया कि ये जानवर बाड़ा तोड़कर बाहर निकल गए हैं।
ग्रामीणों पर असर और मुआवज़े का सवाल
रिज़र्व क्षेत्र के आसपास बड़ी संख्या में गाँव बसे हुए हैं। बाड़े से बाहर आने के बाद इन हाइब्रिड वन भैंसों से फसलों को नुकसान हुआ। ग्रामीणों ने मुआवज़े की मांग की, लेकिन वन विभाग का कहना था कि हाइब्रिड वन जानवरों से हुए नुकसान की भरपाई के लिए स्पष्ट प्रावधान नहीं हैं। अगस्त 2024 में ग्रामीणों ने खुद पहल करते हुए इन जानवरों को पुराने बोमा में बंद किया। खेती के मौसम में वे बाड़े में रहते थे और अन्य समय जंगल में विचरण करते थे। अब, हालिया जानकारी के अनुसार, इन्हें पूरी तरह उदंती–सीता क्षेत्र से बाहर कर दिया गया है।
दस्तावेज़ों के अनुसार, 2007 में वन विभाग एक ग्रामीण से “आशा” नामक मादा भैंस को लेकर आया और उसे शुद्ध नस्ल का वन भैंसा बताया गया। आशा से कई बच्चों का जन्म हुआ। इसके बाद विभाग ने रंभा और मेनका नाम की दो मादा भैंसें खरीदीं, जिनके खरीद दस्तावेज़ों में ही उन्हें क्रॉस-ब्रीड बताया गया था। इसके बावजूद 2013–14 से 2024–25 के बीच भोजन, पूरक आहार, बाड़ा निर्माण और रखरखाव सहित विभिन्न मदों में लगभग ₹2.46 करोड़ खर्च किए गए। यह खर्च उस समय हुआ, जब विभाग के पास हाइब्रिड होने की जानकारी पहले से मौजूद थी।
वन विभाग अब बारनवापारा से तीन मादा वन भैंसों को उदंती–सीता लाने की योजना पर काम कर रहा है, ताकि वहाँ मौजूद एकमात्र नर वन भैंसा “छोटू” के साथ उनका प्रजनन कराया जा सके। छोटू की उम्र लगभग 26 वर्ष बताई जा रही है और विशेषज्ञों के अनुसार, इस उम्र में प्रजनन की संभावना सीमित होती है।
यही वह बिंदु है, जिस पर विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि यदि असम से लाई गई शुद्ध नस्ल की मादाओं को अंततः उदंती–सीता ही लाना था, तो 2020 में उन्हें बारनवापारा में बाड़े में क्यों रखा गया। उस समय छोटू अपेक्षाकृत कम उम्र का था और प्रजनन की संभावना अधिक हो सकती थी। इसके अलावा, जिन मादा भैंसों को लाने की तैयारी है, उनके छोटे बच्चे बारनवापारा में ही रहेंगे। जानकारों के अनुसार, यह वह उम्र होती है जब बच्चों का अपनी माँ के साथ रहना उनके व्यवहारिक विकास के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
रायपुर के वन्यजीव प्रेमी नितिन सिंघवी ने पूरे मामले की जांच के लिए एक उच्चस्तरीय समिति गठित करने की मांग की है। उनका कहना है कि यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि हाइब्रिड वन भैंसों पर करोड़ों रुपये खर्च करने का निर्णय किस स्तर पर लिया गया, जनता को वर्षों तक किस आधार पर यह बताया गया कि वन भैंसों की संख्या बढ़ रही है और क्या जिम्मेदार अधिकारियों से इस खर्च की जवाबदेही तय की जाएगी।
उदंती–सीता से हाइब्रिड वन भैंसों को हटाए जाने का मामला केवल वन्यजीव प्रबंधन का नहीं है। यह प्रशासनिक निर्णयों की निरंतरता, पारदर्शिता और सार्वजनिक धन के उपयोग से जुड़ा हुआ प्रश्न भी है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरे घटनाक्रम को एक अलग-थलग घटना मानकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं होगा।
यह मामला यह तय करने की चुनौती भी पेश करता है कि भविष्य में वन्यजीव संरक्षण की नीतियाँ वैज्ञानिक आधार पर होंगी या फिर प्रशासनिक तात्कालिकताओं के अनुसार। क्योंकि वन भैंसे भले ही अब रिज़र्व क्षेत्र से बाहर कर दिए गए हों, लेकिन उनसे जुड़े सवाल अभी भी वहीं खड़े हैं।