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कैमरे की कलम: "आईना तोड़ो, व्यवस्था बचाओ"

बिलासपुर में एक वीडियो वायरल हुआ। वीडियो में एक पुलिसकर्मी थाने के भीतर जमीन पर लेटा दिखाई देता है। आसपास कुछ शराब की बोतलें भी नजर आती हैं। वीडियो की सत्यता क्या है, उसमें दिख रहा दृश्य किस परिस्थिति का है, उसे किसने रिकॉर्ड किया और किसने वायरल किया—ये सब जांच का विषय हैं। होना भी चाहिए। किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले तथ्यों की पड़ताल आवश्यक है लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बाद जो सबसे दिलचस्प दृश्य सामने आया, वह वीडियो में नहीं बल्कि उसके बाद की प्रतिक्रिया में था।

जिले के पुलिस कप्तान ने कड़े शब्दों में कहा कि यदि कोई व्यक्ति लाइक, कमेंट्स और व्यूअरशिप बढ़ाने के लिए फर्जी वीडियो बनाएगा या बिना प्रमाणिकता के वायरल करेगा तो उसके खिलाफ अपराध दर्ज किया जाएगा। यह बात बिल्कुल उचित है। झूठ फैलाना, किसी की छवि खराब करना और सोशल मीडिया को अफवाहों का अखाड़ा बनाना किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं हो सकता। मगर समस्या यह है कि हमारे यहां अक्सर अपराध की परिभाषा घटना से नहीं, व्यक्ति से तय होती दिखाई देती है।  

इतिहास बताता है कि संस्थाएँ आईना तोड़कर नहीं, आईने में दिख रही खामियों को सुधारकर मजबूत होती हैं। क्योंकि अंततः किसी भी लोकतंत्र में सबसे बड़ा अपराध सच दिखाना नहीं, सच से आँख चुराना होता है।

यही कारण है कि इस मामले में सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं बन पाया कि वीडियो में क्या है, बल्कि यह बन गया कि वीडियो किसने बनाया। यानी अगर किसी थाने के भीतर कुछ असामान्य दिख रहा है तो उससे ज्यादा गंभीर विषय यह है कि किसी ने उसे रिकॉर्ड कैसे कर लिया। यह वही मानसिकता है जिसमें दीवार पर उभरी सीलन से ज्यादा गुस्सा उस आदमी पर आता है जिसने सीलन की तस्वीर खींच ली।

विडंबना यह है कि यही व्यवस्था वर्षों से जनता से अपील करती रही है कि कहीं अपराध दिखे, भ्रष्टाचार दिखे, अवैध वसूली दिखे, सार्वजनिक व्यवस्था का उल्लंघन दिखे तो वीडियो बनाइए, सबूत दीजिए, शिकायत कीजिए। लेकिन जैसे ही कैमरे का कोण व्यवस्था की ओर घूम जाता है, अचानक कैमरा संदिग्ध हो जाता है और रिकॉर्डिंग अपराध के करीब पहुंच जाती है। ऐसा लगता है मानो समस्या बीमारी नहीं, एक्स-रे मशीन हो। हमारे यहां कानून की एक बड़ी खूबी यह है कि वह सबके लिए समान बताया जाता है और उसकी सबसे बड़ी विडंबना भी यही है कि व्यवहार में वह सबके लिए समान दिखाई नहीं देता।

यदि कोई सामान्य नागरिक सार्वजनिक स्थान पर शराब के नशे में मिलता है तो उसके वीडियो सोशल मीडिया पर घंटों घूमते रहते हैं। लोग उसे नैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं, पुलिस उसे कानून का पाठ पढ़ाती है और समाज उसे संस्कारों का पाठ पढ़ाता है। लेकिन जब चर्चा में कोई सफेदपोश या वर्दीधारी आता है तो अचानक निजता, प्रतिष्ठा, गरिमा और प्रक्रिया जैसे शब्द शब्दकोश से निकलकर प्रेस कॉन्फ्रेंस की मेज पर सज जाते हैं।

ऐसा नहीं है कि पुलिसकर्मी को गरिमा का अधिकार नहीं है, बिल्कुल है। बल्कि उतना ही है जितना किसी आम नागरिक को है लेकिन प्रश्न यह है कि क्या यह अधिकार सभी को समान रूप से मिलता है? यदि हां, तो फिर आम आदमी की गरिमा की रक्षा के समय यही तीखापन अक्सर दिखाई क्यों नहीं देता? दरअसल समस्या वीडियो नहीं है। समस्या वह असहजता है जो वीडियो पैदा करता है। आईना हमेशा सुंदर चेहरा नहीं दिखाता। कभी-कभी वह चेहरे पर जमी धूल भी दिखाता है। और इतिहास गवाह है कि धूल साफ करने की तुलना में आईना तोड़ना हमेशा आसान काम रहा है।

पुलिस महकमा भी आखिर इसी समाज का हिस्सा है। वहां भी अच्छे लोग हैं, ईमानदार लोग हैं, कर्तव्यनिष्ठ लोग हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जहां शक्ति होती है, वहां जवाबदेही की आवश्यकता और बढ़ जाती है। क्योंकि जनता पुलिस को केवल एक कर्मचारी के रूप में नहीं देखती। वह उसे कानून के प्रतिनिधि के रूप में देखती है।

यही वजह है कि पुलिसकर्मी की छोटी गलती भी बड़ी खबर बन जाती है लेकिन यहां एक और रोचक प्रवृत्ति देखने को मिलती है। जब कोई नागरिक पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाता है तो उसे कानून समझाया जाता है। जब कोई पत्रकार सवाल उठाता है तो उसे जिम्मेदारी समझाई जाती है। जब कोई सामाजिक कार्यकर्ता सवाल उठाता है तो उसे प्रक्रिया समझाई जाती है। और जब सोशल मीडिया सवाल उठाता है तो उसे आईटी एक्ट समझाया जाता है। कुल मिलाकर हर सवाल पूछने वाले के लिए कोई न कोई धारा तैयार रहती है। सवालों के जवाब कभी-कभी तैयार नहीं होते। 

"लोकतंत्र में कैमरा अपराधी नहीं होता, वह केवल घटनाओं का दस्तावेज़ होता है। यदि कोई वीडियो फर्जी है तो उस पर कार्रवाई होना स्वाभाविक है"

यहां यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि फर्जी वीडियो बनाना अपराध है और होना भी चाहिए। किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा से खिलवाड़ की अनुमति नहीं दी जा सकती। लेकिन उसी सांस में यह भी उतना ही जरूरी है कि हर असुविधाजनक वीडियो को "फर्जी", "भ्रामक" या "वायरल गैंग" की श्रेणी में डाल देने की प्रवृत्ति से बचा जाए क्योंकि अगर हर असहज करने वाला तथ्य फर्जी घोषित कर दिया जाएगा तो फिर सत्य की पहचान कौन करेगा?

आज सोशल मीडिया का दौर है। यहां अफवाहें भी दौड़ती हैं और सच्चाइयां भी। चुनौती यह है कि दोनों के बीच फर्क किया जाए। लेकिन अक्सर ऐसा प्रतीत होता है कि व्यवस्था की प्राथमिकता फर्क करना नहीं, नियंत्रण स्थापित करना होती है। नियंत्रण हमेशा आकर्षक होता है। सवालों को नियंत्रित करो। वीडियो को नियंत्रित करो। सूचना को नियंत्रित करो। चर्चा को नियंत्रित करो और यदि संभव हो तो आईने को भी नियंत्रित कर लो। मगर लोकतंत्र का स्वभाव नियंत्रण नहीं, संवाद है। लोकतंत्र में संस्थाओं का सम्मान इसलिए नहीं होता कि वे शक्तिशाली हैं। उनका सम्मान इसलिए होता है क्योंकि वे आलोचना सहने की क्षमता रखती हैं। जिस दिन कोई संस्था आलोचना से डरने लगे, उस दिन उसकी ताकत पर नहीं, उसके आत्मविश्वास पर सवाल उठने लगते हैं।

विडंबना यह भी है कि हमारे यहां अक्सर जांच की दिशा भी बड़ी दिलचस्प होती है। कभी-कभी घटना से ज्यादा ऊर्जा इस बात में लगती है कि जानकारी बाहर कैसे आई। फाइल में क्या लिखा था, यह बाद की बात है; फाइल लीक किसने की, यह पहले जांचा जाता है। कमरे में क्या हुआ, यह बाद में देखा जाता है; कमरे का वीडियो किसने बनाया, यह पहले पूछा जाता है। मानो व्यवस्था का सबसे बड़ा संकट घटना नहीं, उसकी सार्वजनिक जानकारी हो।

बिलासपुर की यह घटना भी उसी व्यापक मानसिकता की एक झलक बन गई है। यहां बहस कानून और जवाबदेही के बीच संतुलन की होनी चाहिए थी। चर्चा इस बात पर होनी चाहिए थी कि यदि वीडियो गलत है तो उसे तथ्यात्मक रूप से गलत साबित किया जाए, और यदि उसमें कोई सच्चाई है तो उसे स्वीकार कर सुधार की प्रक्रिया शुरू की जाए लेकिन हमारे यहां अक्सर सुधार से पहले संदेश दिया जाता है। संदेश यह कि व्यवस्था को देखने का अधिकार सीमित है। संदेश यह कि सवाल पूछने से पहले सावधान रहिए। संदेश यह कि कैमरा उठाने से पहले सोचिए और धीरे-धीरे यह संदेश समाज के भीतर एक भय में बदलने लगता है। हालांकि इतिहास बताता है कि समाज कैमरों से नहीं बदलते, बल्कि उन कारणों को दूर करने से बदलते हैं जिनकी वजह से कैमरे उठते हैं। यदि संस्थाएं पारदर्शी हों तो वीडियो सनसनी नहीं बनते। यदि जवाबदेही मजबूत हो तो वायरल पोस्ट व्यवस्था के लिए खतरा नहीं बनते। यदि जनता का विश्वास बना रहे तो अफवाहें भी ज्यादा दूर तक नहीं जातीं। 

यदि हर असुविधाजनक वीडियो के जवाब में पहला सवाल यह पूछा जाए कि उसे बनाया किसने, तो संदेह पैदा होता है कि व्यवस्था की चिंता सच्चाई से अधिक उसके सार्वजनिक होने को लेकर है।

आखिर में सवाल केवल बिलासपुर का नहीं है। सवाल उस सोच का है जिसमें व्यक्ति देखकर अपराध की गंभीरता तय की जाती है। जहां वर्दी, पद और प्रभाव के अनुसार संवेदनशीलता का स्तर बदलता रहता है। जहां कभी-कभी कानून की किताब एक ही रहती है, लेकिन उसका वजन अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग महसूस होता है।

लोकतंत्र में पुलिस का सम्मान होना चाहिए, क्योंकि वह कानून की रक्षक है। लेकिन उसी लोकतंत्र में जनता के सवालों का भी सम्मान होना चाहिए, क्योंकि वही कानून की अंतिम मालिक है, इसलिए आवश्यकता वीडियो से डरने की नहीं, सच्चाई से सामना करने की है क्योंकि जिस समाज में आईना दिखाना अपराध और आईना छिपाना कर्तव्य बन जाए, वहां समस्या कैमरे में नहीं होती। समस्या चेहरे पर होती है और चेहरों की मरम्मत आईना तोड़कर नहीं, आत्मनिरीक्षण करके की जाती है। 

'जेल भिजवा देंगे' कहकर वसूले पैसे, दुष्कर्म कांड में नया खुलासा

रायपुर। TODAY छत्तीसगढ़  /  चौकी सिलयारी क्षेत्र में दर्ज नाबालिग बालिका से दुष्कर्म के चर्चित मामले की जांच में बड़ा खुलासा हुआ है। पुलिस ने मामले में ब्लैकमेलिंग और अवैध वसूली के आरोप में दो और आरोपियों को गिरफ्तार कर न्यायिक रिमांड पर जेल भेज दिया है।

पुलिस के अनुसार दुष्कर्म मामले की विवेचना के दौरान पहले ही दो आरोपियों की गिरफ्तारी की जा चुकी थी। जांच आगे बढ़ने पर यह तथ्य सामने आया कि कुछ लोगों ने इस मामले को सार्वजनिक करने और जेल भिजवाने की धमकी देकर आरोपी पक्ष से मोटी रकम वसूलने की साजिश रची थी।

विवेचना में पाया गया कि मोहम्मद उस्मान सैफी, सूरज सिंह ठाकुर और एक अन्य व्यक्ति लगातार दुष्कर्म प्रकरण के आरोपियों और उनके परिजनों के संपर्क में थे। आरोप है कि उन्होंने मामले को उजागर करने की धमकी देकर आरोपियों से नगद और डिजिटल माध्यम से राशि वसूली।

पुलिस जांच में यह भी सामने आया कि 28 मई 2026 को मोहम्मद उस्मान सैफी अपनी क्रेटा कार से सूरज सिंह ठाकुर और एक अन्य व्यक्ति के साथ आरोपियों के घर पहुंचा था। वहां आरोपियों के परिजनों को डराते हुए कहा गया कि यदि उनकी मांग के अनुसार रकम नहीं दी गई तो मामले को सार्वजनिक कर उन्हें जेल भिजवा दिया जाएगा। बाद में सौदेबाजी के बाद रकम ली गई।

पुलिस ने तकनीकी साक्ष्यों, कॉल डिटेल और अन्य साक्ष्यों के आधार पर ब्लैकमेलिंग एवं अवैध वसूली की पुष्टि होने पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 308(2) सहित अन्य धाराएं जोड़कर कार्रवाई की। गिरफ्तार आरोपियों में सूरज सिंह ठाकुर (35) निवासी ग्राम सिलयारी तथा मोहम्मद उस्मान सैफी (36) निवासी ग्राम सिलयारी, धरसींवा शामिल हैं। दोनों को न्यायालय में पेश कर न्यायिक रिमांड पर भेज दिया गया है। पुलिस का कहना है कि मामले की जांच अभी जारी है और प्रकरण से जुड़े अन्य तथ्यों की भी पड़ताल की जा रही है।


जहरीली शराब या सुनियोजित साजिश? 8 मौतों ने खड़े किए बड़े सवाल

बलौदाबाजार। TODAY छत्तीसगढ़  /  जिले के कसडोल क्षेत्र अंतर्गत खरवे गांव में पांच दिनों के भीतर आठ ग्रामीणों की मौत के बाद पूरे इलाके में सनसनी फैल गई है। ग्रामीणों ने गांव के ही एक व्यक्ति पर जहरीली शराब पिलाकर लोगों की जान लेने का आरोप लगाया है। मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस और फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (एफएसएल) की टीम गांव पहुंचकर जांच में जुट गई है।

जानकारी के अनुसार, मौतों के वास्तविक कारणों का पता लगाने के लिए मृतकों के दफन शवों को बाहर निकाला जा रहा है। शवों का पोस्टमार्टम और फॉरेंसिक परीक्षण कराया जाएगा, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि मौतें जहरीली शराब के सेवन से हुई हैं या इसके पीछे कोई अन्य कारण है। जांच के दौरान घटनास्थल पर बड़ी संख्या में ग्रामीण मौजूद रहे। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि सभी पहलुओं को ध्यान में रखकर जांच की जा रही है। जांच रिपोर्ट आने के बाद ही मौतों के वास्तविक कारणों का खुलासा हो सकेगा।

उल्लेखनीय है कि कथित जहरीली शराब कांड के बाद मंगलवार को खरवे गांव के सैकड़ों ग्रामीण कसडोल थाना पहुंचे थे। ग्रामीणों ने गांव के ही एक व्यक्ति पर लोगों को शराब पिलाकर उनकी जान लेने का गंभीर आरोप लगाते हुए निष्पक्ष जांच और कड़ी कार्रवाई की मांग की थी। ग्रामीणों का दावा है कि जिन लोगों की मौत हुई, उन्होंने एक ही स्रोत से शराब का सेवन किया था। शराब पीने के कुछ समय बाद उनकी तबीयत बिगड़ गई और बाद में उनकी मौत हो गई। इस घटना ने पूरे गांव में दहशत और आक्रोश का माहौल पैदा कर दिया है।

फिलहाल पुलिस, एफएसएल और प्रशासनिक अमला पूरे मामले की जांच में जुटा हुआ है। अब सभी की निगाहें पोस्टमार्टम और फॉरेंसिक रिपोर्ट पर टिकी हैं, जिससे इस रहस्यमय मौतों की गुत्थी सुलझने की उम्मीद है।




दहेज केस में पूरा परिवार फंसाना नहीं चलेगा, हाई कोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला

बिलासपुर। TODAY छत्तीसगढ़  / छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने दहेज प्रताड़ना के मामलों में पति के पूरे परिवार को एक साथ आरोपी बनाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा है कि केवल सामान्य और अस्पष्ट आरोपों के आधार पर किसी के खिलाफ आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। कोर्ट ने इसे न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग बताते हुए पति और उसके परिजनों के खिलाफ दर्ज एफआईआर, चार्जशीट तथा निचली अदालत में चल रही पूरी कार्यवाही को निरस्त कर दिया।

चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने कहा कि दहेज प्रताड़ना कानून का उद्देश्य पीड़ित महिलाओं को न्याय दिलाना है, लेकिन इसका उपयोग व्यक्तिगत प्रतिशोध या पूरे परिवार को कानूनी विवाद में घसीटने के लिए नहीं किया जा सकता। किसी भी आरोपी के खिलाफ विशिष्ट आरोप, स्पष्ट भूमिका और ठोस साक्ष्य होना आवश्यक है।

मामला ओडिशा के नुआपाड़ा जिले के निवासी विवेकानंद भोई और उनकी पत्नी गीता साहू से जुड़ा है। पत्नी ने दिसंबर 2024 में शिकायत दर्ज कराते हुए पति, सास-ससुर, ननद और देवर पर दहेज प्रताड़ना का आरोप लगाया था। शिकायत के आधार पर मार्च 2025 में एफआईआर दर्ज हुई और बाद में पुलिस ने चार्जशीट पेश कर दी थी। जेएमएफसी कसडोल ने आरोप भी तय कर दिए थे।

हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से तर्क दिया गया कि एफआईआर में किसी भी आरोपी की अलग-अलग भूमिका, घटना की तारीख या विशिष्ट आरोपों का उल्लेख नहीं है। ननद अपने वैवाहिक घर में रहती है और सास-ससुर बुजुर्ग हैं। पूरे परिवार को सामूहिक रूप से आरोपी बनाया गया है।

सभी पक्षों को सुनने के बाद खंडपीठ ने माना कि शिकायत में लगाए गए आरोप सामान्य और अस्पष्ट प्रकृति के हैं। किसी भी आरोपी की प्रत्यक्ष भूमिका या सक्रिय संलिप्तता का उल्लेख नहीं किया गया है। ऐसे में मुकदमा जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।

कोर्ट ने राजादेवरी थाने में दर्ज एफआईआर, पुलिस की चार्जशीट तथा जेएमएफसी कसडोल द्वारा पारित संज्ञान और आरोप तय करने के आदेश को निरस्त कर दिया। साथ ही मामले से जुड़ी सभी आनुषंगिक कार्यवाहियों पर भी रोक लगा दी।

बालाजी ढाबा में रंगे हाथों पकड़े गए शराबी, संचालक भी नहीं बचा

बिलासपुर। TODAY छत्तीसगढ़  / चकरभाठा पुलिस ने ढाबा चेकिंग अभियान के दौरान अवैध रूप से शराब सेवन कराने और सार्वजनिक स्थान पर शराब पीने वालों के खिलाफ कार्रवाई की है। पुलिस ने बालाजी ढाबा के संचालक समेत छह लोगों के विरुद्ध आबकारी अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया है।

पुलिस के अनुसार 12 जून को होटल एवं ढाबों की जांच के दौरान चकरभाठा स्थित बालाजी ढाबा में अवैध रूप से शराब सेवन की सुविधा उपलब्ध कराई जा रही थी। मौके पर पुलिस ने ढाबा संचालक अशोक जोतवानी को ग्राहकों को शराब पीने की सुविधा उपलब्ध कराते हुए पकड़ा।

जांच के दौरान पांच व्यक्ति भी सार्वजनिक स्थान पर शराब का सेवन करते मिले। पुलिस ने सभी के खिलाफ आबकारी अधिनियम की धारा 36(ग) एवं 36(च) के तहत वैधानिक कार्रवाई की।

कार्रवाई के दौरान हर्ष श्रीवास, अभिषेक कुमार सिंह, राजीव दुबे, मयंक सिंह और बिट्टू कौशिक को शराब सेवन करते हुए पकड़ा गया। वहीं ढाबा संचालक अशोक जोतवानी के खिलाफ शराब सेवन की सुविधा उपलब्ध कराने के आरोप में मामला दर्ज किया गया है। पुलिस ने बताया कि सार्वजनिक स्थानों पर शराब सेवन और अवैध गतिविधियों के खिलाफ अभियान आगे भी जारी रहेगा।

विधायक से बहस और उसी दिन सस्पेंशन! EO पर गिरी गाज, देखें VIDEO

भरतपुर। TODAY छत्तीसगढ़  /  राजस्थान में एक बार फिर जनप्रतिनिधि और अफसरशाही के बीच टकराव चर्चा का विषय बन गया है। भरतपुर जिले की बयाना नगरपालिका में निर्दलीय विधायक ऋतु बनावत और अधिशासी अधिकारी (EO) अनीता कुशवाह के बीच हुए विवाद के बाद EO को निलंबित कर दिया गया है। निलंबन के बाद उनका मुख्यालय जयपुर स्थित डीएलबी कार्यालय निर्धारित किया गया है।

यह मामला पिछले दो दिनों से सोशल मीडिया पर चर्चा का केंद्र बना हुआ है। नगरपालिका कार्यालय में आयोजित बैठक के दौरान विधायक और EO के बीच हुई तीखी बहस सार्वजनिक हो गई थी। विवाद के कुछ ही समय बाद अधिशासी अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई कर दी गई।

राजनीतिक गलियारों में इस घटनाक्रम को जनप्रतिनिधि और ब्यूरोक्रेसी के बीच शक्ति संतुलन के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि विवाद में वास्तविक गलती किसकी थी, यह अभी स्पष्ट नहीं हो पाया है।

उल्लेखनीय है कि विधायक ऋतु बनावत पहली बार विधानसभा पहुंची हैं। वह पहले भाजपा से जुड़ी रही हैं, लेकिन टिकट नहीं मिलने पर निर्दलीय चुनाव लड़कर विजयी हुई थीं। उनके पति ऋषि बंसल भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष रह चुके हैं।

सूत्रों के मुताबिक विधायक और EO के बीच विवाद की मुख्य वजह करोड़ों रुपये का एक टेंडर माना जा रहा है। हालांकि प्रशासन की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। फिलहाल EO के निलंबन ने पूरे मामले को राजनीतिक और प्रशासनिक बहस का विषय बना दिया है। 


कोयला भंडारण में गड़बड़ी मिली, जेसीबी-ट्रेलर जब्त कर डिपो किया सील

बिलासपुर। जिले में खनिजों के अवैध उत्खनन, परिवहन और भंडारण के खिलाफ खनिज विभाग ने बड़ी कार्रवाई करते हुए तीन हाइवा, तीन ट्रैक्टर-ट्रॉली, एक जेसीबी मशीन और एक ट्रेलर वाहन जब्त किया है। इसके अलावा कोयला भंडारण में अनियमितता पाए जाने पर एक अस्थायी भंडारण डिपो को सील कर दिया गया है। हालांकि इतनी कारवाही के बावजूद जिले में खनिजों के अवैध उत्खनन, परिवहन और बारिश पूर्व भंडारण का काम तेजी से चल रहा है। 

कलेक्टर के निर्देश और उप संचालक खनिज के मार्गदर्शन में खनिज विभाग द्वारा लगातार अभियान चलाया जा रहा है। इसी कड़ी में 10 जून को खनिज विभाग और सकरी पुलिस की संयुक्त टीम ने ग्राम गतौरी स्थित बालाजी कोल ट्रेडिंग एंड कंस्ट्रक्शन के अस्थायी कोयला भंडारण स्थल की जांच की।

जांच के दौरान कोयले की गुणवत्ता में कथित मिलावट, हेरफेर तथा भंडारण अनुज्ञा की शर्तों के उल्लंघन के मामले सामने आए। इसके बाद मौके से एक ट्रेलर और एक जेसीबी मशीन जब्त कर कोनी थाना की अभिरक्षा में रखा गया। साथ ही संबंधित भंडारण डिपो को सील कर दिया गया।

इसके बाद 11 और 12 जून को खनिज विभाग की टीम ने सकरी, कोटा, विजयपुर, दर्री और तखतपुर क्षेत्र में सघन जांच अभियान चलाया। जांच के दौरान दर्री-विजयपुर क्षेत्र से गिट्टी का अवैध परिवहन करते एक हाइवा वाहन को जब्त किया गया। वहीं सकरी क्षेत्र में रेत और गिट्टी का परिवहन कर रहे दो अन्य हाइवा वाहनों पर भी कार्रवाई की गई। जिला बिलासपुर और गौरेला-पेंड्रा-मरवाही की सीमा से लगे खोगसरा क्षेत्र में दोनों जिलों के खनिज अमले ने संयुक्त जांच की। इस दौरान अरपा नदी क्षेत्र में अवैध रूप से रेत उत्खनन करते तीन ट्रैक्टर-ट्रॉली जब्त किए गए।

खनिज विभाग ने कुल आठ वाहन एवं मशीनों को जब्त कर पुलिस थाना कोनी, सकरी, तखतपुर और गौरेला की अभिरक्षा में रखा है। विभाग ने स्पष्ट किया है कि खनिजों के अवैध उत्खनन, परिवहन और भंडारण के खिलाफ अभियान आगे भी जारी रहेगा।

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