बिलासपुर। TODAY छत्तीसगढ़ / छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने दहेज प्रताड़ना के मामलों में पति के पूरे परिवार को एक साथ आरोपी बनाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा है कि केवल सामान्य और अस्पष्ट आरोपों के आधार पर किसी के खिलाफ आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। कोर्ट ने इसे न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग बताते हुए पति और उसके परिजनों के खिलाफ दर्ज एफआईआर, चार्जशीट तथा निचली अदालत में चल रही पूरी कार्यवाही को निरस्त कर दिया।
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने कहा कि दहेज प्रताड़ना कानून का उद्देश्य पीड़ित महिलाओं को न्याय दिलाना है, लेकिन इसका उपयोग व्यक्तिगत प्रतिशोध या पूरे परिवार को कानूनी विवाद में घसीटने के लिए नहीं किया जा सकता। किसी भी आरोपी के खिलाफ विशिष्ट आरोप, स्पष्ट भूमिका और ठोस साक्ष्य होना आवश्यक है।
मामला ओडिशा के नुआपाड़ा जिले के निवासी विवेकानंद भोई और उनकी पत्नी गीता साहू से जुड़ा है। पत्नी ने दिसंबर 2024 में शिकायत दर्ज कराते हुए पति, सास-ससुर, ननद और देवर पर दहेज प्रताड़ना का आरोप लगाया था। शिकायत के आधार पर मार्च 2025 में एफआईआर दर्ज हुई और बाद में पुलिस ने चार्जशीट पेश कर दी थी। जेएमएफसी कसडोल ने आरोप भी तय कर दिए थे।
हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से तर्क दिया गया कि एफआईआर में किसी भी आरोपी की अलग-अलग भूमिका, घटना की तारीख या विशिष्ट आरोपों का उल्लेख नहीं है। ननद अपने वैवाहिक घर में रहती है और सास-ससुर बुजुर्ग हैं। पूरे परिवार को सामूहिक रूप से आरोपी बनाया गया है।
सभी पक्षों को सुनने के बाद खंडपीठ ने माना कि शिकायत में लगाए गए आरोप सामान्य और अस्पष्ट प्रकृति के हैं। किसी भी आरोपी की प्रत्यक्ष भूमिका या सक्रिय संलिप्तता का उल्लेख नहीं किया गया है। ऐसे में मुकदमा जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।
कोर्ट ने राजादेवरी थाने में दर्ज एफआईआर, पुलिस की चार्जशीट तथा जेएमएफसी कसडोल द्वारा पारित संज्ञान और आरोप तय करने के आदेश को निरस्त कर दिया। साथ ही मामले से जुड़ी सभी आनुषंगिक कार्यवाहियों पर भी रोक लगा दी।
