एक समय था जब तिलचट्टे रसोई में मिलते थे। अब वे राजनीति में मिल रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि रसोई वाले तिलचट्टे देखकर लोग चीखते थे, राजनीतिक तिलचट्टों को देखकर लोग सेल्फी लेते हैं। और देश की हालत ऐसी हो चुकी है कि अब युवा यह तय नहीं कर पा रहा कि वह नौकरी ढूंढे, परीक्षा की तैयारी करे, या किसी नए आंदोलन का सदस्य बन जाए।
भारत आज दुनिया की सबसे युवा आबादी वाला देश कहलाता है। यह अलग बात है कि इस युवा आबादी का बड़ा हिस्सा रोजगार कार्यालयों, कोचिंग संस्थानों और सोशल मीडिया के बीच पेंडुलम की तरह झूल रहा है। सरकारें हर साल करोड़ों नौकरियों का सपना दिखाती हैं और बदले में करोड़ों युवाओं को "अगले प्रयास के लिए शुभकामनाएँ" का संदेश मिलता है।
पेपर लीक अब कोई दुर्घटना नहीं रह गया है, यह तो हमारी परीक्षा व्यवस्था का आधिकारिक पाठ्यक्रम बन चुका है। पहले छात्र प्रश्नपत्र खोलते थे, अब प्रश्नपत्र पहले से ही छात्रों के मोबाइल खोल लेते हैं। परीक्षा केंद्रों से ज्यादा चर्चा व्हाट्सऐप ग्रुपों की होती है। कोचिंग संस्थानों से ज्यादा भरोसा टेलीग्राम चैनलों पर किया जाता है। और सरकारें हर बार ऐसे चौंक जाती हैं जैसे पहली बार उन्हें पता चला हो कि पानी गीला होता है।
देश का बेरोज़गार युवा आज सबसे बड़ा व्यंग्य बन चुका है। वह सुबह राष्ट्रनिर्माण के भाषण सुनता है, दोपहर में भर्ती परीक्षा का फार्म भरता है, शाम को परीक्षा स्थगित होने की खबर पढ़ता है और रात को पेपर लीक का वीडियो देखता है। फिर उससे कहा जाता है कि धैर्य रखो, देश आगे बढ़ रहा है। देश आगे बढ़ भी रहा है—बस समस्या यह है कि युवा पीछे छूट रहा है।
ऐसे माहौल में अगर कोई "कॉकरोच जनता पार्टी" पैदा होती है तो उसमें आश्चर्य कैसा? असली सवाल यह नहीं है कि कॉकरोच कौन हैं। असली सवाल यह है कि देश के लाखों पढ़े-लिखे नौजवान खुद को तिलचट्टों से जोड़ने में अपमान क्यों महसूस नहीं कर रहे? शायद इसलिए कि उन्हें लगने लगा है कि इस व्यवस्था में उनकी हैसियत भी किसी दीवार की दरार में छिपे जीव से ज्यादा नहीं है।
राजनीतिक दल आज कॉकरोचों की वंशावली खोज रहे हैं। कोई उन्हें सत्ता का एजेंट बता रहा है, कोई विपक्ष की साजिश। लेकिन कोई यह नहीं पूछ रहा कि आखिर वह जमीन क्यों तैयार हुई जिसमें ऐसे आंदोलन अंकुरित हो रहे हैं? जब भर्ती परीक्षाएँ मज़ाक बन जाएँ, डिग्रियाँ सजावट का सामान बन जाएँ और मेहनत का इनाम पेपर लीक हो जाए, तब राजनीति के पुराने ब्रांडों पर भरोसा टूटना स्वाभाविक है।
देश में आज हर समस्या का समाधान नैरेटिव से खोजा जा रहा है। बेरोज़गारी है तो राष्ट्रवाद की चर्चा कर लो। पेपर लीक है तो किसी और मुद्दे पर बहस करा दो। महँगाई है तो इतिहास की लड़ाई छेड़ दो। लेकिन पेट इतिहास से नहीं भरता, नौकरी नैरेटिव से नहीं मिलती और भविष्य भाषणों से नहीं बनता।
विडंबना यह है कि आज का युवा सरकार से कम, सिस्टम से ज्यादा नाराज़ है। उसे यह भरोसा नहीं रहा कि उसकी मेहनत और प्रतिभा का सम्मान होगा। उसे लगता है कि परीक्षा से पहले प्रश्नपत्र बिक सकता है, भर्ती से पहले सीटें तय हो सकती हैं और इंटरव्यू से पहले परिणाम लिखा जा सकता है।
ऐसे समय में कॉकरोच सड़क पर उतर रहे हैं। वे सफल होंगे या असफल, ईमानदार होंगे या अवसरवादी, यह भविष्य बताएगा। लेकिन उनकी लोकप्रियता एक चेतावनी है। यह उस पीढ़ी की बेचैनी का संकेत है जो वर्षों से सुन रही है कि वही देश का भविष्य है, लेकिन वर्तमान में उसके हिस्से सिर्फ प्रतीक्षा, परीक्षा और निराशा आई है और अगर व्यवस्था ने इस चेतावनी को भी मज़ाक समझ लिया, तो आने वाले समय में तिलचट्टे ही नहीं, पूरी दीवारें बोलने लगेंगी।








