बिलासपुर। TODAY छत्तीसगढ़ / थाना चकरभाठा क्षेत्र के ग्राम कड़ार में युवती पर जानलेवा हमला करने वाले आरोपी को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। आरोपी ने अपनी पूर्व प्रेमिका के घर में घुसकर धारदार चाकू से हमला किया था। पुलिस ने आरोपी के कब्जे से वारदात में प्रयुक्त चाकू भी बरामद किया है। पुलिस के मुताबिक गिरफ्तार आरोपी का नाम भरत वर्मा (27 वर्ष) निवासी ग्राम कड़ार, थाना चकरभाठा, जिला बिलासपुर है।
इश्क का खौफनाक अंत, युवती को मारने पहुंचा प्रेमी गिरफ्तार
बिलासपुर। TODAY छत्तीसगढ़ / थाना चकरभाठा क्षेत्र के ग्राम कड़ार में युवती पर जानलेवा हमला करने वाले आरोपी को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। आरोपी ने अपनी पूर्व प्रेमिका के घर में घुसकर धारदार चाकू से हमला किया था। पुलिस ने आरोपी के कब्जे से वारदात में प्रयुक्त चाकू भी बरामद किया है। पुलिस के मुताबिक गिरफ्तार आरोपी का नाम भरत वर्मा (27 वर्ष) निवासी ग्राम कड़ार, थाना चकरभाठा, जिला बिलासपुर है।
छट्ठी कार्यक्रम से लौट रही युवती बनी हवस का शिकार, जंगल में अर्धनग्न हालत में मिली
कवर्धा। TODAY छत्तीसगढ़ / जिले के थाना चिल्फी क्षेत्र में युवती के साथ सामूहिक दुष्कर्म का सनसनीखेज मामला सामने आया है। आरोप है कि छट्ठी कार्यक्रम से घर लौट रही युवती को रास्ते में रोककर दो परिचित युवकों ने जबरन शराब पिलाई और जंगल क्षेत्र में उसके साथ दुष्कर्म किया।
जानकारी के अनुसार, पीड़िता शुक्रवार-शनिवार की रात एक परिचित के घर आयोजित छट्ठी कार्यक्रम में शामिल होने गई थी। कार्यक्रम समाप्त होने के बाद वह देर रात घर लौट रही थी। इसी दौरान ग्राम सरोदादादर से रानीदहरा मार्ग के बीच जंगल क्षेत्र में दो युवकों ने उसका रास्ता रोक लिया। आरोप है कि दोनों युवकों ने पहले युवती को जबरन शराब पिलाई और फिर बारी-बारी से दुष्कर्म किया। घटना के बाद आरोपी युवती को अर्धनग्न और बेहोश हालत में मौके पर छोड़कर फरार हो गए। सुबह गांव के लोग जंगल से गुजर रहे थे, तब उन्होंने युवती को संदिग्ध हालत में देखा और पुलिस को सूचना दी। सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और पीड़िता को उपचार के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया।
पुलिस ने पीड़िता के बयान और प्रत्यक्षदर्शियों से पूछताछ के आधार पर घटना में शामिल दो आरोपियों को हिरासत में लिया है। पीड़िता द्वारा आरोपियों की पहचान किए जाने के बाद आगे की वैधानिक कार्रवाई की जा रही है।
कैमरे की कलम: देशभक्ति अब पेट्रोल पंप पर मापी जाएगी !
देश एक बार फिर संकट में है। यह जानकारी हमें किसी अर्थशास्त्री, रणनीतिक विशेषज्ञ या संसद की बहस से नहीं मिली, बल्कि सीधे उस अपील से मिली जिसमें देशवासियों से कहा गया कि पेट्रोल बचाइए, डीजल कम खर्च कीजिए, विदेश यात्रा रोक दीजिए और फिलहाल सोना खरीदने का विचार त्याग दीजिए। यानी अब देशभक्ति का नया पैमाना तय हो चुका है—जिसने बाइक कम चलाई, वही सच्चा राष्ट्रभक्त; जिसने दुबई की टिकट कैंसिल की, वही असली देशसेवक; और जिसने पत्नी को सोने का हार नहीं दिलाया, वही आधुनिक बलिदानी नागरिक।
भारत बड़ा अद्भुत देश है। यहाँ हर संकट का समाधान अंततः आम आदमी की जेब से ही निकलता है। सरकारें योजनाएँ बनाती हैं, भाषण देती हैं, नारे गढ़ती हैं और अंत में जनता से कहती हैं—"थोड़ा और त्याग कर लीजिए, देश मुश्किल में है।" जनता भी वर्षों से इस संवाद की अभ्यस्त हो चुकी है। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले त्याग स्वतंत्रता के लिए होता था, अब पेट्रोल की कीमतों और विदेशी मुद्रा भंडार के लिए होने लगा है।
दरअसल, यह संकट केवल आर्थिक नहीं, मानसिक भी है। हम एक ऐसे समाज में बदल चुके हैं जहाँ दिखावा राष्ट्रीय चरित्र बन चुका है। घर में राशन कम हो सकता है, लेकिन एसयूवी गाड़ी चमचमाती रहनी चाहिए। मोहल्ले में पानी की समस्या हो सकती है, लेकिन इंस्टाग्राम पर विदेश यात्रा की तस्वीरें जरूरी हैं। शादी में कर्ज लेकर सोना खरीदना अब सामाजिक प्रतिष्ठा का हिस्सा है। ऐसे समाज से जब अचानक कहा जाता है कि “संयम रखिए”, तो यह वैसा ही है जैसे किसी बच्चे से मिठाई की दुकान के सामने उपवास रखने को कहा जाए।
पेट्रोल बचाने की अपील सुनकर सबसे अधिक दुख शायद उन लोगों को हुआ होगा जिन्होंने दो किलोमीटर दूर जिम जाने के लिए भी कार खरीद रखी है। भारत में अब पैदल चलना स्वास्थ्य का नहीं, गरीबी का प्रतीक माना जाने लगा है। अगर कोई आदमी बाजार तक पैदल चला जाए, तो लोग पूछते हैं—"गाड़ी खराब हो गई क्या?" ऐसे दौर में ईंधन बचत का संदेश केवल आर्थिक सलाह नहीं, सामाजिक क्रांति जैसा लगता है।
विडंबना देखिए, एक तरफ विज्ञापनों में नई-नई कारें खरीदने को सफलता का प्रतीक बताया जाता है, दूसरी तरफ नागरिकों से कहा जाता है कि पेट्रोल बचाइए। यानी पहले उपभोग को जीवन का लक्ष्य बनाइए, फिर संकट आने पर त्याग को राष्ट्रधर्म घोषित कर दीजिए। यह ठीक वैसा ही है जैसे पहले किसी को मिठाइयों की थाली परोस दी जाए और बाद में डायबिटीज़ के लिए उसे ही जिम्मेदार ठहरा दिया जाए।
असल प्रश्न यह है कि क्या केवल जनता के संयम से देश आर्थिक संकटों से उबर जाएगा? अगर ऐसा होता, तो भारत अब तक दुनिया की सबसे मजबूत अर्थव्यवस्था बन चुका होता। यहाँ आम आदमी पहले ही टैक्स, महंगाई, बेरोजगारी और बढ़ते खर्चों के बीच अपनी इच्छाओं का गला घोंटकर जी रहा है। मध्यम वर्ग की स्थिति तो ऐसी है कि वह पेट्रोल भरवाते समय मीटर नहीं, अपनी धड़कनें देखता है।
आज हालत यह है कि आदमी बाइक की टंकी फुल कराने से पहले बैंक बैलेंस चेक करता है। पेट्रोल पंप अब केवल ईंधन भरवाने की जगह नहीं, मानसिक साहस की परीक्षा केंद्र बन चुके हैं। कर्मचारी पूछता है—"कितने का डालूँ?" और ग्राहक मन ही मन देश की अर्थव्यवस्था, अपनी सैलरी और महीने के बाकी खर्चों का गणित लगाने लगता है।
लेकिन संकट केवल तेल का नहीं है। विदेश यात्राओं पर रोक की अपील भी कम दिलचस्प नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में विदेशी यात्रा भारतीय मध्यवर्ग के लिए नई सामाजिक प्रतिष्ठा बन चुकी है। अब लोग घूमने कम, सोशल मीडिया पर साबित करने ज्यादा जाते हैं कि वे “ग्लोबल” हो चुके हैं। बैंक लोन लेकर यूरोप घूम आना आधुनिक सफलता का नया प्रमाणपत्र है। ऐसे में जब सरकार कहती है कि विदेश यात्रा टाल दीजिए, तो यह सीधे भारतीय इंस्टाग्राम संस्कृति पर हमला प्रतीत होता है।
हालाँकि, इसमें विडंबना भी कम नहीं है। जिस देश में लाखों युवा रोजगार और बेहतर भविष्य के लिए विदेश जाने का सपना देख रहे हों, वहाँ विदेशी मुद्रा बचाने के नाम पर विदेश यात्राएँ रोकने की अपील एक अजीब विरोधाभास पैदा करती है। एक तरफ हम वैश्विक शक्ति बनने के सपने देखते हैं, दूसरी तरफ नागरिकों से कहते हैं कि फिलहाल दुनिया देखने मत जाइए।
अब बात सोने की। भारत में सोना केवल धातु नहीं, भावनात्मक धर्म है। यहाँ बेटी के जन्म के साथ ही परिवार सोना जोड़ना शुरू कर देता है। शादी में रिश्तेदार दूल्हे से कम, सोने के सेट से ज्यादा प्रभावित होते हैं। भारतीय परिवारों के लिए बैंक बैलेंस से अधिक भरोसेमंद चीज अगर कोई है, तो वह अलमारी के लॉकर में रखा सोना है। ऐसे समाज से कहना कि “सोना मत खरीदिए”, लगभग वैसा ही है जैसे क्रिकेट प्रेमियों से कहना कि विश्वकप के दौरान टीवी मत देखिए।
लेकिन सच यह भी है कि भारत हर वर्ष अरबों डॉलर का सोना आयात करता है। विदेशी मुद्रा का बड़ा हिस्सा इसी चमकती धातु में दफन हो जाता है। दुखद बात यह है कि हम उत्पादन, अनुसंधान और उद्योग में निवेश करने से अधिक संतोष निष्क्रिय सोना खरीदने में महसूस करते हैं। यानी अर्थव्यवस्था को गति देने के बजाय हम अपनी बचत तिजोरियों में बंद कर देते हैं और फिर शिकायत करते हैं कि रोजगार क्यों नहीं बढ़ रहे।
हालाँकि, केवल जनता को दोष देना आसान रास्ता है। असली सवाल यह भी है कि क्या शासन और व्यवस्था खुद उतनी ही मितव्ययी है जितनी अपेक्षा जनता से की जा रही है? क्या सरकारी फिजूलखर्ची रुकी? क्या राजनीतिक रैलियों, विज्ञापनों और दिखावटी आयोजनों पर खर्च कम हुआ? क्या सत्ता प्रतिष्ठान ने अपने वैभव में कटौती की? क्योंकि त्याग का उपदेश तभी प्रभावी लगता है जब नेतृत्व स्वयं उदाहरण प्रस्तुत करे।
भारत में समस्या यह है कि त्याग हमेशा नीचे वालों से माँगा जाता है। ऊपर वालों के लिए “राष्ट्रीय हित” अक्सर वातानुकूलित सभागारों में दिया गया भाषण बनकर रह जाता है। आम आदमी से कहा जाता है कि वह पेट्रोल बचाए, लेकिन वीआईपी काफिले पूरे शहर का ट्रैफिक रोककर दर्जनों गाड़ियों के साथ निकलते रहते हैं। जनता से कहा जाता है कि खर्च कम करें, लेकिन सत्ता की चमक-दमक में कोई कमी दिखाई नहीं देती। यही विरोधाभास नागरिकों के भीतर अविश्वास पैदा करता है।
फिर भी, यह भी सच है कि संकट वास्तविक है। दुनिया अस्थिर दौर से गुजर रही है। युद्ध, वैश्विक मंदी, बढ़ती महंगाई और ऊर्जा संकट का असर भारत पर भी पड़ रहा है। ऐसे समय में यदि नागरिक जिम्मेदारी नहीं दिखाएँगे, तो स्थिति और कठिन हो सकती है। लेकिन जिम्मेदारी केवल जनता की नहीं, शासन की भी होनी चाहिए। देशभक्ति का अर्थ केवल जनता से त्याग करवाना नहीं, बल्कि संसाधनों के ईमानदार उपयोग का भरोसा देना भी है।
आज जरूरत केवल पेट्रोल बचाने की नहीं, बल्कि उस मानसिकता को बदलने की है जिसने उपभोग को ही विकास मान लिया है। हम जितना कमाते नहीं, उससे ज्यादा दिखाने की कोशिश करते हैं। हमारी अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा दिखावे की संस्कृति में फँस चुका है। बड़ी गाड़ी, बड़ा मोबाइल, विदेशी छुट्टियाँ और भारी-भरकम शादियाँ अब सामाजिक सम्मान का पैमाना बन चुकी हैं। ऐसे समाज में आर्थिक संकट केवल बाजार से नहीं, मानसिकता से पैदा होता है।
सवाल यह भी है कि क्या हम हर बार संकट आने पर ही जागेंगे? क्या ऊर्जा बचत केवल आपातकालीन अपील का विषय रहेगी? क्या आत्मनिर्भरता केवल भाषणों का शब्द बनी रहेगी? यदि देश वास्तव में मजबूत बनना चाहता है, तो नागरिकों और सरकार दोनों को उपभोग की अंधी दौड़ से बाहर निकलना होगा।
देशभक्ति का सबसे आसान तरीका सोशल मीडिया पर झंडा लगाना है, लेकिन सबसे कठिन तरीका है अपने व्यवहार में अनुशासन लाना। कम ईंधन खर्च करना, स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देना, अनावश्यक दिखावे से बचना और आर्थिक संयम अपनाना—ये बातें सुनने में साधारण लगती हैं, लेकिन किसी भी राष्ट्र की वास्तविक ताकत इन्हीं से बनती है।
लेकिन भारत का दुर्भाग्य यह है कि यहाँ हर गंभीर बात भी अंततः नारे में बदल जाती है। कुछ दिन लोग पेट्रोल बचाने की बात करेंगे, फिर वही ट्रैफिक जाम, वही दिखावा, वही फिजूलखर्ची लौट आएगी। संकट बीत जाएगा, लेकिन आदतें नहीं बदलेंगी। हम फिर किसी अगले संकट का इंतजार करेंगे, जब हमें दोबारा बताया जाएगा कि देश कठिन दौर में है और अब त्याग की जरूरत है।
दरअसल, यह समय केवल आर्थिक आत्मनिरीक्षण का नहीं, सामाजिक आत्मचिंतन का भी है। हमें तय करना होगा कि हम जिम्मेदार नागरिक बनना चाहते हैं या केवल उपभोक्ता। क्योंकि उपभोक्ता केवल खरीदता है, जबकि नागरिक भविष्य बचाता है।
आज देश को भाषणों से अधिक ईमानदार व्यवहार की जरूरत है। जनता को भी समझना होगा कि संसाधन असीमित नहीं हैं, और सरकार को भी यह साबित करना होगा कि जनता का त्याग केवल आंकड़ों में नहीं, राष्ट्रीय हित में बदल रहा है। वरना वह दिन दूर नहीं जब देशभक्ति की अगली परीक्षा बिजली, पानी और रसोई गैस की बचत से आगे बढ़कर सांस लेने की सीमा तय करने तक पहुँच जाएगी।
और तब शायद कोई नया नारा गढ़ा जाएगा— “कम सांस लीजिए, देश संकट में है।”
रोमांचक यात्रा: 6000 किमी की नॉनस्टॉप उड़ान, भारत लौट रहे अमूर फाल्कन
नई दिल्ली। TODAY छत्तीसगढ़ / पिछले एक दशक से नॉर्थईस्ट इंडिया में अमूर फाल्कन के कंजर्वेशन के लिए लगातार कोशिशों में, नवंबर 2025 में मणिपुर के तामेंगलोंग जिले में उनके स्टॉपओवर साइट (चिउलुआन) में तीन अमूर फाल्कन को सैटेलाइट-टैग किया गया।
दक्षिणी अफ्रीका में अपने नॉन-ब्रीडिंग ग्राउंड में चार महीने से ज़्यादा समय बिताने के बाद, इनमें से दो अमूर फाल्कन अपने स्प्रिंग माइग्रेशन पर हैं, और इंडिया के रास्ते फ़ार-ईस्ट एशिया में अपने ब्रीडिंग रीजन में लौट रहे हैं। सोमालिया से नॉर्थईस्ट इंडिया आते समय वे छह दिनों में लगभग 6000 km की नॉनस्टॉप उड़ान भरते हैं।
‘अलंग’ नाम की एक टैग की हुई युवा मादा अमूर अभी इंडिया के वेस्ट कोस्ट की ओर जा रही है, और अरब सागर पार कर रही है, जिसकी शुरुआत कल सुबह सोमालिया से हुई थी। अभी, अच्छी हवा चलने पर, समुद्र पार करना तीन दिन का नॉनस्टॉप होगा। @MoEFCC से फंडिंग सपोर्ट के साथ, यह प्रोजेक्ट इंडिया में कम्युनिटी के नेतृत्व वाले कंजर्वेशन के सफल प्रयासों में से एक रहा है।
इसके साथ ही, इस शानदार छोटे रैप्टर के बारे में दिलचस्प जानकारी मिली है, जो एक लंबी दूरी का ट्रांस-हेमिस्फेरिक माइग्रेंट है, जो मैनेजमेंट और कंज़र्वेशन की कोशिशों को गाइड कर रहा है।
In a continued effort over the last decade for conservation of Amur Falcons in Northeast India, three Amur Falcons were satellite-tagged in their stopover site (Chiuluan) in Tamenglong district of Manipur in November 2025.
— Bhupender Yadav (@byadavbjp) May 16, 2026
Having completed more than four months in their… pic.twitter.com/7XmkUxbND6





