देश एक बार फिर संकट में है। यह जानकारी हमें किसी अर्थशास्त्री, रणनीतिक विशेषज्ञ या संसद की बहस से नहीं मिली, बल्कि सीधे उस अपील से मिली जिसमें देशवासियों से कहा गया कि पेट्रोल बचाइए, डीजल कम खर्च कीजिए, विदेश यात्रा रोक दीजिए और फिलहाल सोना खरीदने का विचार त्याग दीजिए। यानी अब देशभक्ति का नया पैमाना तय हो चुका है—जिसने बाइक कम चलाई, वही सच्चा राष्ट्रभक्त; जिसने दुबई की टिकट कैंसिल की, वही असली देशसेवक; और जिसने पत्नी को सोने का हार नहीं दिलाया, वही आधुनिक बलिदानी नागरिक।
भारत बड़ा अद्भुत देश है। यहाँ हर संकट का समाधान अंततः आम आदमी की जेब से ही निकलता है। सरकारें योजनाएँ बनाती हैं, भाषण देती हैं, नारे गढ़ती हैं और अंत में जनता से कहती हैं—"थोड़ा और त्याग कर लीजिए, देश मुश्किल में है।" जनता भी वर्षों से इस संवाद की अभ्यस्त हो चुकी है। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले त्याग स्वतंत्रता के लिए होता था, अब पेट्रोल की कीमतों और विदेशी मुद्रा भंडार के लिए होने लगा है।
दरअसल, यह संकट केवल आर्थिक नहीं, मानसिक भी है। हम एक ऐसे समाज में बदल चुके हैं जहाँ दिखावा राष्ट्रीय चरित्र बन चुका है। घर में राशन कम हो सकता है, लेकिन एसयूवी गाड़ी चमचमाती रहनी चाहिए। मोहल्ले में पानी की समस्या हो सकती है, लेकिन इंस्टाग्राम पर विदेश यात्रा की तस्वीरें जरूरी हैं। शादी में कर्ज लेकर सोना खरीदना अब सामाजिक प्रतिष्ठा का हिस्सा है। ऐसे समाज से जब अचानक कहा जाता है कि “संयम रखिए”, तो यह वैसा ही है जैसे किसी बच्चे से मिठाई की दुकान के सामने उपवास रखने को कहा जाए।
पेट्रोल बचाने की अपील सुनकर सबसे अधिक दुख शायद उन लोगों को हुआ होगा जिन्होंने दो किलोमीटर दूर जिम जाने के लिए भी कार खरीद रखी है। भारत में अब पैदल चलना स्वास्थ्य का नहीं, गरीबी का प्रतीक माना जाने लगा है। अगर कोई आदमी बाजार तक पैदल चला जाए, तो लोग पूछते हैं—"गाड़ी खराब हो गई क्या?" ऐसे दौर में ईंधन बचत का संदेश केवल आर्थिक सलाह नहीं, सामाजिक क्रांति जैसा लगता है।
विडंबना देखिए, एक तरफ विज्ञापनों में नई-नई कारें खरीदने को सफलता का प्रतीक बताया जाता है, दूसरी तरफ नागरिकों से कहा जाता है कि पेट्रोल बचाइए। यानी पहले उपभोग को जीवन का लक्ष्य बनाइए, फिर संकट आने पर त्याग को राष्ट्रधर्म घोषित कर दीजिए। यह ठीक वैसा ही है जैसे पहले किसी को मिठाइयों की थाली परोस दी जाए और बाद में डायबिटीज़ के लिए उसे ही जिम्मेदार ठहरा दिया जाए।
असल प्रश्न यह है कि क्या केवल जनता के संयम से देश आर्थिक संकटों से उबर जाएगा? अगर ऐसा होता, तो भारत अब तक दुनिया की सबसे मजबूत अर्थव्यवस्था बन चुका होता। यहाँ आम आदमी पहले ही टैक्स, महंगाई, बेरोजगारी और बढ़ते खर्चों के बीच अपनी इच्छाओं का गला घोंटकर जी रहा है। मध्यम वर्ग की स्थिति तो ऐसी है कि वह पेट्रोल भरवाते समय मीटर नहीं, अपनी धड़कनें देखता है।
आज हालत यह है कि आदमी बाइक की टंकी फुल कराने से पहले बैंक बैलेंस चेक करता है। पेट्रोल पंप अब केवल ईंधन भरवाने की जगह नहीं, मानसिक साहस की परीक्षा केंद्र बन चुके हैं। कर्मचारी पूछता है—"कितने का डालूँ?" और ग्राहक मन ही मन देश की अर्थव्यवस्था, अपनी सैलरी और महीने के बाकी खर्चों का गणित लगाने लगता है।
लेकिन संकट केवल तेल का नहीं है। विदेश यात्राओं पर रोक की अपील भी कम दिलचस्प नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में विदेशी यात्रा भारतीय मध्यवर्ग के लिए नई सामाजिक प्रतिष्ठा बन चुकी है। अब लोग घूमने कम, सोशल मीडिया पर साबित करने ज्यादा जाते हैं कि वे “ग्लोबल” हो चुके हैं। बैंक लोन लेकर यूरोप घूम आना आधुनिक सफलता का नया प्रमाणपत्र है। ऐसे में जब सरकार कहती है कि विदेश यात्रा टाल दीजिए, तो यह सीधे भारतीय इंस्टाग्राम संस्कृति पर हमला प्रतीत होता है।
हालाँकि, इसमें विडंबना भी कम नहीं है। जिस देश में लाखों युवा रोजगार और बेहतर भविष्य के लिए विदेश जाने का सपना देख रहे हों, वहाँ विदेशी मुद्रा बचाने के नाम पर विदेश यात्राएँ रोकने की अपील एक अजीब विरोधाभास पैदा करती है। एक तरफ हम वैश्विक शक्ति बनने के सपने देखते हैं, दूसरी तरफ नागरिकों से कहते हैं कि फिलहाल दुनिया देखने मत जाइए।
अब बात सोने की। भारत में सोना केवल धातु नहीं, भावनात्मक धर्म है। यहाँ बेटी के जन्म के साथ ही परिवार सोना जोड़ना शुरू कर देता है। शादी में रिश्तेदार दूल्हे से कम, सोने के सेट से ज्यादा प्रभावित होते हैं। भारतीय परिवारों के लिए बैंक बैलेंस से अधिक भरोसेमंद चीज अगर कोई है, तो वह अलमारी के लॉकर में रखा सोना है। ऐसे समाज से कहना कि “सोना मत खरीदिए”, लगभग वैसा ही है जैसे क्रिकेट प्रेमियों से कहना कि विश्वकप के दौरान टीवी मत देखिए।
लेकिन सच यह भी है कि भारत हर वर्ष अरबों डॉलर का सोना आयात करता है। विदेशी मुद्रा का बड़ा हिस्सा इसी चमकती धातु में दफन हो जाता है। दुखद बात यह है कि हम उत्पादन, अनुसंधान और उद्योग में निवेश करने से अधिक संतोष निष्क्रिय सोना खरीदने में महसूस करते हैं। यानी अर्थव्यवस्था को गति देने के बजाय हम अपनी बचत तिजोरियों में बंद कर देते हैं और फिर शिकायत करते हैं कि रोजगार क्यों नहीं बढ़ रहे।
हालाँकि, केवल जनता को दोष देना आसान रास्ता है। असली सवाल यह भी है कि क्या शासन और व्यवस्था खुद उतनी ही मितव्ययी है जितनी अपेक्षा जनता से की जा रही है? क्या सरकारी फिजूलखर्ची रुकी? क्या राजनीतिक रैलियों, विज्ञापनों और दिखावटी आयोजनों पर खर्च कम हुआ? क्या सत्ता प्रतिष्ठान ने अपने वैभव में कटौती की? क्योंकि त्याग का उपदेश तभी प्रभावी लगता है जब नेतृत्व स्वयं उदाहरण प्रस्तुत करे।
भारत में समस्या यह है कि त्याग हमेशा नीचे वालों से माँगा जाता है। ऊपर वालों के लिए “राष्ट्रीय हित” अक्सर वातानुकूलित सभागारों में दिया गया भाषण बनकर रह जाता है। आम आदमी से कहा जाता है कि वह पेट्रोल बचाए, लेकिन वीआईपी काफिले पूरे शहर का ट्रैफिक रोककर दर्जनों गाड़ियों के साथ निकलते रहते हैं। जनता से कहा जाता है कि खर्च कम करें, लेकिन सत्ता की चमक-दमक में कोई कमी दिखाई नहीं देती। यही विरोधाभास नागरिकों के भीतर अविश्वास पैदा करता है।
फिर भी, यह भी सच है कि संकट वास्तविक है। दुनिया अस्थिर दौर से गुजर रही है। युद्ध, वैश्विक मंदी, बढ़ती महंगाई और ऊर्जा संकट का असर भारत पर भी पड़ रहा है। ऐसे समय में यदि नागरिक जिम्मेदारी नहीं दिखाएँगे, तो स्थिति और कठिन हो सकती है। लेकिन जिम्मेदारी केवल जनता की नहीं, शासन की भी होनी चाहिए। देशभक्ति का अर्थ केवल जनता से त्याग करवाना नहीं, बल्कि संसाधनों के ईमानदार उपयोग का भरोसा देना भी है।
आज जरूरत केवल पेट्रोल बचाने की नहीं, बल्कि उस मानसिकता को बदलने की है जिसने उपभोग को ही विकास मान लिया है। हम जितना कमाते नहीं, उससे ज्यादा दिखाने की कोशिश करते हैं। हमारी अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा दिखावे की संस्कृति में फँस चुका है। बड़ी गाड़ी, बड़ा मोबाइल, विदेशी छुट्टियाँ और भारी-भरकम शादियाँ अब सामाजिक सम्मान का पैमाना बन चुकी हैं। ऐसे समाज में आर्थिक संकट केवल बाजार से नहीं, मानसिकता से पैदा होता है।
सवाल यह भी है कि क्या हम हर बार संकट आने पर ही जागेंगे? क्या ऊर्जा बचत केवल आपातकालीन अपील का विषय रहेगी? क्या आत्मनिर्भरता केवल भाषणों का शब्द बनी रहेगी? यदि देश वास्तव में मजबूत बनना चाहता है, तो नागरिकों और सरकार दोनों को उपभोग की अंधी दौड़ से बाहर निकलना होगा।
देशभक्ति का सबसे आसान तरीका सोशल मीडिया पर झंडा लगाना है, लेकिन सबसे कठिन तरीका है अपने व्यवहार में अनुशासन लाना। कम ईंधन खर्च करना, स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देना, अनावश्यक दिखावे से बचना और आर्थिक संयम अपनाना—ये बातें सुनने में साधारण लगती हैं, लेकिन किसी भी राष्ट्र की वास्तविक ताकत इन्हीं से बनती है।
लेकिन भारत का दुर्भाग्य यह है कि यहाँ हर गंभीर बात भी अंततः नारे में बदल जाती है। कुछ दिन लोग पेट्रोल बचाने की बात करेंगे, फिर वही ट्रैफिक जाम, वही दिखावा, वही फिजूलखर्ची लौट आएगी। संकट बीत जाएगा, लेकिन आदतें नहीं बदलेंगी। हम फिर किसी अगले संकट का इंतजार करेंगे, जब हमें दोबारा बताया जाएगा कि देश कठिन दौर में है और अब त्याग की जरूरत है।
दरअसल, यह समय केवल आर्थिक आत्मनिरीक्षण का नहीं, सामाजिक आत्मचिंतन का भी है। हमें तय करना होगा कि हम जिम्मेदार नागरिक बनना चाहते हैं या केवल उपभोक्ता। क्योंकि उपभोक्ता केवल खरीदता है, जबकि नागरिक भविष्य बचाता है।
आज देश को भाषणों से अधिक ईमानदार व्यवहार की जरूरत है। जनता को भी समझना होगा कि संसाधन असीमित नहीं हैं, और सरकार को भी यह साबित करना होगा कि जनता का त्याग केवल आंकड़ों में नहीं, राष्ट्रीय हित में बदल रहा है। वरना वह दिन दूर नहीं जब देशभक्ति की अगली परीक्षा बिजली, पानी और रसोई गैस की बचत से आगे बढ़कर सांस लेने की सीमा तय करने तक पहुँच जाएगी।
और तब शायद कोई नया नारा गढ़ा जाएगा— “कम सांस लीजिए, देश संकट में है।”
