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सुप्रीम कोर्ट ने किया था लीज कैंसल, अब हाईकोर्ट ने कंपनी को लौटाए 23 करोड़, जानें क्या है पूरा मामला

'स्टांप पेपर इस्तेमाल हो गया तो क्या पैसे नहीं लौटेंगे?' हाईकोर्ट ने कलेक्टर का आदेश पलट कंपनी को दी बड़ी राहत

बिलासपुर: TODAY छत्तीसगढ़  /  छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट से राजस्थान की एक सरकारी बिजली कंपनी को बड़ी राहत मिली है। कोर्ट ने कोयला ब्लॉक आवंटन रद्द होने के बाद 23.23 करोड़ रुपये की स्टांप ड्यूटी ब्याज समेत लौटाने का आदेश दिया है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अगर किसी वजह से मूल लीज ही प्रभावहीन हो जाए, तो सरकार तकनीकी पेंच फंसाकर कंपनी के करोड़ों रुपये डकार नहीं सकती।

क्या है पूरा मामला?

दरअसल, यह पूरा विवाद सरगुजा जिले के 'परसा ईस्ट और कांता बसन' (PEKB) कोल ब्लॉक से जुड़ा है। साल 2012 में राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड ने इस ब्लॉक की 30 साल की माइनिंग लीज के लिए करीब 27.97 करोड़ रुपये बतौर स्टांप, उपकर और रजिस्ट्रेशन शुल्क चुकाए थे। लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए देशभर के कोल ब्लॉक आवंटन को अवैध करार दे दिया और उन्हें कैंसल कर दिया। इसके चलते कंपनी की लीज भी खत्म हो गई और नई लीज के लिए उन्हें दोबारा करोड़ों रुपये की फीस भरनी पड़ी।

कलेक्टर ने कहा- 'कागज इस्तेमाल हो गया, पैसे नहीं मिलेंगे'

दोहरी मार झेल रही कंपनी ने पहले दिए गए स्टांप शुल्क को वापस मांगने के लिए आवेदन किया। लेकिन स्टांप कलेक्टर ने उनकी अर्जी यह कहते हुए खारिज कर दी कि 'दस्तावेज तो इस्तेमाल हो चुका है, इसलिए अब पैसे नहीं लौटाए जा सकते।' इसके बाद कंपनी ने न्याय के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

हाईकोर्ट ने लगाई फटकार, पलट दिया आदेश

जस्टिस संजय के. अग्रवाल की सिंगल बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए कलेक्टर के तर्क को सिरे से खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि भारतीय स्टांप अधिनियम का मकसद सिर्फ सरकार के लिए राजस्व जुटाना है, तकनीकी आधार पर किसी पार्टी को उसके जायज हक से वंचित करना नहीं। जब सुप्रीम कोर्ट के फैसले की वजह से माइनिंग लीज का वजूद ही खत्म हो गया, तो उस पर चुकाई गई ड्यूटी कंपनी को वापस मिलनी ही चाहिए।

4 हफ्ते में ब्याज समेत लौटाने होंगे पैसे

हाईकोर्ट ने भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 65 यानी 'रेस्टिट्यूशन' (पूर्व स्थिति में बहाली) के सिद्धांत को लागू करते हुए स्टांप कलेक्टर का आदेश रद्द कर दिया। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि संबंधित प्राधिकारी 4 सप्ताह के भीतर कंपनी को 23.23 करोड़ रुपये (स्टांप शुल्क और उपकर) ब्याज के साथ वापस करें। हालांकि, कंपनी को रजिस्ट्रेशन फीस वापस नहीं मिलेगी, क्योंकि कानून में इसकी वापसी का कोई प्रावधान नहीं है।

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