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भगवान जगन्नाथ हुए स्वस्थ, 14 जुलाई को मिलेगा दिव्य नवयौवन स्वरूप का दर्शन

ध्वज परिवर्तन के साथ खत्म होगा अनवसर काल, 16 जुलाई को निकलेगी भव्य रथ यात्रा

भगवान जगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा 16 जुलाई 2026 से पुरी में शुरू होगी। नौ दिनों तक चलने वाले इस महापर्व में भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा भव्य रथों पर सवार होकर गुंडिचा मंदिर तक जाएंगे। मान्यता है कि रथ की रस्सी खींचने से 100 यज्ञों के बराबर पुण्य प्राप्त होता है।
बिलासपुर।  TODAY छत्तीसगढ़  / रेलवे परिक्षेत्र स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर में 15 दिनों से चल रहे अनवसर काल का समापन 14 जुलाई को होगा। इस अवसर पर भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा दिव्य नवयौवन (नेत उत्सव) स्वरूप में भक्तों को दर्शन देंगे। इसी दिन मंदिर के शिखर पर पारंपरिक ध्वज परिवर्तन की रस्म भी निभाई जाएगी, जिसे भगवान के पूर्ण स्वस्थ होकर पुनः भक्तों के बीच आने का प्रतीक माना जाता है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार स्नान पूर्णिमा के बाद भगवान जगन्नाथ अस्वस्थ होकर 15 दिनों तक एकांतवास (अनवसर काल) में रहते हैं। इस दौरान उनकी औषधीय सेवा, विशेष पूजा-अर्चना की जाती है और मंदिर के पट श्रद्धालुओं के लिए बंद रहते हैं। अनवसर काल समाप्त होने के बाद भगवान नवीन श्रृंगार में भक्तों को दर्शन देते हैं, जिसे नवयौवन दर्शन कहा जाता है।

उड़िया समाज के अध्यक्ष के.के. बेहरा ने बताया कि इस वर्ष तिथियों में परिवर्तन के कारण 14 जुलाई को नेत उत्सव एवं नवयौवन दर्शन होगा, जबकि 16 जुलाई को भगवान जगन्नाथ की भव्य रथ यात्रा निकाली जाएगी।

मंदिर समिति के अनुसार 14 जुलाई को सुबह विशेष पूजा-अर्चना, श्रृंगार और ध्वज परिवर्तन की सभी धार्मिक परंपराएं संपन्न होंगी। इसके बाद श्रद्धालुओं के लिए मंदिर के पट खोल दिए जाएंगे। नवयौवन दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना को देखते हुए मंदिर परिसर में दर्शन व्यवस्था, सुरक्षा और अन्य आवश्यक तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा रहा है।

बहन की इच्छा से शुरू हुई रथ यात्रा की परंपरा

पौराणिक मान्यता के अनुसार, एक बार देवी सुभद्रा ने नगर भ्रमण की इच्छा व्यक्त की थी। तब भगवान जगन्नाथ और बलभद्र उन्हें भव्य रथों में बैठाकर नगर भ्रमण के लिए निकले और गुंडिचा मंदिर पहुंचे। इसी घटना की स्मृति में हर वर्ष रथ यात्रा का आयोजन किया जाता है।

रथ यात्रा का धार्मिक महत्व

स्कंद पुराण के अनुसार, भगवान जगन्नाथ के रथ की रस्सी खींचने और यात्रा में शामिल होने से व्यक्ति को 100 यज्ञों के बराबर पुण्य प्राप्त होता है तथा मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। यही कारण है कि इस यात्रा में देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु शामिल होते हैं।

हर साल नए बनते हैं रथ

रथ यात्रा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के तीनों रथ हर वर्ष नई और पवित्र नीम की लकड़ी से तैयार किए जाते हैं। इन विशाल रथों के निर्माण में लोहे की कील या नट-बोल्ट का उपयोग नहीं किया जाता, बल्कि पारंपरिक लकड़ी की जोड़ाई तकनीक अपनाई जाती है।

'छेरा पहंरा' की अनोखी परंपरा

रथ यात्रा के दौरान पुरी के गजपति महाराज सोने की झाड़ू से रथों के सामने मार्ग की सफाई करते हैं। इसे 'छेरा पहंरा' कहा जाता है। यह परंपरा इस संदेश का प्रतीक है कि भगवान के सामने राजा और आम व्यक्ति सभी समान हैं।

भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि आस्था, समानता, सेवा और सामाजिक समरसता का अद्भुत प्रतीक मानी जाती है। हर वर्ष लाखों श्रद्धालु इस महापर्व में शामिल होकर भगवान के दर्शन और रथ खींचने का सौभाग्य प्राप्त करते हैं।

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