छत्तीसगढ़ के तमनार से सामने आई यह घटना केवल एक अपराध नहीं है यह हमारे समाज के चेहरे पर पड़ा एक गहरा तमाचा है। जेपीएल कोयला खदान के विरोध में हो रहे प्रदर्शन के दौरान ड्यूटी पर तैनात एक महिला आरक्षक को खेत-खलिहानों में दौड़ाया जाना, फिर थककर गिरने के बाद उसके साथ मारपीट करना और उसके कपड़े फाड़कर अर्धनग्न कर देना यह विवरण पढ़ना भी शर्मनाक है, देखना तो असहनीय रहा होगा और उससे भी ज़्यादा विचलित करने वाली बात यह है कि उस दौरान वह महिला आरक्षक लोगों के सामने छोड़ देने की गुहार लगाती रही, गिड़गिड़ाती रही और वहीं मौजूद कुछ लोग उसे बचाने के बजाय इस अमानवीय कृत्य का वीडियो बनाते रहे। यह दृश्य केवल एक महिला की बेबसी नहीं दिखाता, यह हमारे सामूहिक पतन का आईना है। मामले का खुलासा भी सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो के बाद हुआ, चर्चा है शासन-प्रशासन के कुछ लोग मामले में चुप्पी साधने का इशारा करते रहे।
तमनार की तस्वीर: लोकतंत्र का सबसे शर्मनाक फ्रेम
ड्यूटी निभा रही एक महिला के कपड़े फाड़े जाना, उसके साथ बदसलूकी और उसके सम्मान को सार्वजनिक रूप से रौंदा जाना यह किसी भी परिस्थिति में, किसी भी तर्क के साथ, किसी भी आंदोलन या असंतोष के नाम पर कभी जायज़ नहीं ठहराया जा सकता। अगर कोई समाज यह बहस करने लगे कि “हालात ऐसे थे” या “भीड़ उग्र थी”, तो समझ लेना चाहिए कि वह समाज अपने नैतिक आधार खो चुका है।
लोकतंत्र में विरोध एक मौलिक अधिकार है। असहमति, आंदोलन, प्रदर्शन ये सब लोकतांत्रिक ढाँचे की ताकत हैं लेकिन जब विरोध हिंसा में बदल जाए और वह हिंसा किसी महिला की देह और गरिमा पर हमला बन जाए, तो वह विरोध नहीं रहता वह अराजकता बन जाता है। जब एक थकी हुई महिला आरक्षक खेत में गिरती है और भीड़ उसे घेर लेती है तो वह सत्ता का प्रतीक नहीं रहती, वह सिर्फ़ एक असहाय महिला रह जाती है और उस क्षण अगर समाज उसे बचाने के बजाय तमाशा देखे, तो समझ लेना चाहिए कि समस्या सिर्फ़ अपराधियों की नहीं, हम सबकी है।
तमनार में उस महिला के कपड़े नहीं फटे, राज्य की साख फटी है। भीड़ ने वर्दीधारी महिला को अर्धनग्न नहीं किया गया बल्कि पूरा प्रशासन नंगा हुआ है।
तमनार की घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या आज विरोध का अर्थ सिर्फ़ आक्रोश उगलना रह गया है ? क्या अब विरोध में यह भी शामिल है कि सामने खड़ी महिला वर्दीधारी है तो उसे “टारगेट” बनाया जाए ? और अगर वर्दी में खड़ी महिला भी सुरक्षित नहीं, तो फिर आम महिलाओं के लिए यह समाज कितना सुरक्षित है ? इस तरह की घटनाओं में सबसे डरावनी चीज़ सिर्फ़ अपराध नहीं होती, बल्कि आसपास खड़ी भीड़ की चुप्पी होती है। कितने लोगों ने रोका ? कितनों ने कहा कि “यह गलत है” ? कितनों ने आगे बढ़कर उस महिला की मदद की ? तमनार की घटना ने एक बार फिर यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि भारत में महिला सशक्तिकरण की वास्तविक स्थिति क्या है। यह घटना उस व्यापक सामाजिक दावे को भी चुनौती देती है, जिसके तहत यह कहा जाता है कि भारत में महिलाएँ अब पहले से कहीं अधिक सशक्त हो चुकी हैं।
अक्सर कहा जाता है कि वर्दी सत्ता का प्रतीक होती है। लेकिन यहाँ यह तर्क भी खोखला साबित होता है। क्योंकि अगर यह केवल सत्ता का विरोध होता, तो हमला प्रतीकात्मक होता नारे, प्रतिरोध, गिरफ्तारी, पर यहाँ हमला महिला पर था उसके शरीर पर, उसके सम्मान पर। यह फर्क समझना ज़रूरी है। यह घटना बताती है कि हमारे समाज में आज भी महिला को सबसे आसान निशाना माना जाता है, चाहे वह आम नागरिक हो या वर्दी में खड़ी राज्य की प्रतिनिधि।
यह मत कहिए कि छत्तीसगढ़ हिंसक हो गया है। छत्तीसगढ़ आज भी उतना ही सरल, आत्मीय और मानवीय है। बदली है तो व्यवस्था, जिसने लोगों के आक्रोश को संवाद नहीं, हिंसा में बदल दिया है। बदले हैं तो शासक, जो उद्योगपतियों के लिए रेड कार्पेट बिछाते हैं और जनता के लिए पुलिस की लाठी छोड़ देते हैं।
तमनार की घटना छत्तीसगढ़ के सामने कई कठिन सवाल रखती है—क्या बढ़ता आक्रोश राज्य की पारंपरिक सामाजिक सहनशीलता को पीछे छोड़ रहा है? और क्या विकास, विरोध और कानून-व्यवस्था के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए नई सोच की ज़रूरत है ? क्या इस विरोध प्रदर्शन के मद्देनज़र मौके पर पुलिस अफसरों के अलावा सैकड़ों पुलिस कर्मी उस पीड़ित महिला सहकर्मी की मदद करने में नाकाम नहीं रहे ? क्या पुलिस सत्ता के इशारे पर केवल पूंजीपतियों की ढाल बनकर हक़ मांगने वालों के सामने खड़ी रहेगी ? पिछले कई दिनों से शांति पूर्ण तरीके से चल रहे विरोध प्रदर्शन में उस दिन (27 दिसंबर) आखिर वो कौन लोग थे जिन्होंने प्रदर्शनकारियों और प्रशासन के बीच अपनी रोटी सेंकी ? शासन-प्रशासन की भद्द पिट जाने के बाद पुलिस हरकत में आई है ऐसी ख़बरें हैं। अब मामलें में दोषियों की गिरफ्तारी और जरूरी कार्रवाही होगी। कुछ गिरफ्तारियां भी हुई हैं।
इस घटना को केवल एक अलग-थलग मामला मानकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं होगा। यह एक चेतावनी है कि यदि आक्रोश को दिशा नहीं मिली और संवेदनशीलता कमजोर पड़ी, तो उसका सबसे बड़ा असर समाज के सबसे असुरक्षित वर्गों पर पड़ता है।



