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अचानकमार टाइगर रिजर्व: आनुवंशिक विविधता की एक जीवंत कहानी

केवल बाघों की संख्या नहीं, जीन प्रवाह भी तय करता है संरक्षण की सफलता

जंगल की असली कहानी केवल बाघों की संख्या नहीं है जब हम किसी जंगल के बारे में सोचते हैं, तो सबसे पहले हमारे मन में एक सवाल आता हैवहाँ कितने बाघ हैं? लेकिन बाघ संरक्षण की असली कहानी केवल संख्या से पूरी नहीं होती। किसी जंगल में क्षमता के अनुरूप पर्याप्त बाघ होना निश्चित रूप से अच्छी बात है, लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण यह है कि उन बाघों के बीच आनुवंशिक विविधता कितनी है। क्या वे सभी एक ही परिवार से हैं? या अलग-अलग जंगलों से आए बाघ यहाँ मिल रहे हैं, प्रजनन कर रहे हैं और नई पीढ़ी को जन्म दे रहे हैं

यही वह सवाल है, जिसका उत्तर हमें अचानकमार टाइगर रिजर्व में मिलता है। अचानकमार के जंगलों में रहने वाले सभी बाघ स्थानीय नहीं हैं। कुछ बाघ दूर-दराज के दूसरे टाइगर रिजर्वों से जंगलों और प्राकृतिक वन्यजीव कॉरिडोरों के रास्ते यहाँ पहुँचे हैं। उन्होंने यहाँ अपना क्षेत्र बनाया, साथी चुना और शावकों को जन्म दिया। इस तरह अचानकमार केवल बाघों का घर नहीं रहा, बल्कि अलग-अलग जंगलों से आने वाले बाघों के जीन के मिलन का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया है। यही कारण है कि अचानकमार को समझने के लिए केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि यहाँ कितने बाघ हैं। यह देखना भी जरूरी है कि ये बाघ कहाँ-कहाँ से आए हैं।

अचानकमारप्रकृति की अद्भुत देन

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर और मुंगेली जिलों में स्थित अचानकमार टाइगर रिजर्व का इतिहास बहुत पुराना है। वर्ष 1975 में इसे वन्यजीव अभयारण्य घोषित किया गया था। उस समय इसका क्षेत्रफल 551.552 वर्ग किलोमीटर था। बाद में 9 फरवरी 2009 को इसे टाइगर रिजर्व का दर्जा मिला और इसका क्षेत्र बढ़ाकर 914.017 वर्ग किलोमीटर कर दिया गया। इसमें 626.195 वर्ग किलोमीटर कोर क्षेत्र और 287.822 वर्ग किलोमीटर बफर क्षेत्र शामिल हैं।

सतपुड़ा और मैकल पर्वतमालाओं की गोद में बसा अचानकमार प्रकृति की अनोखी सुंदरता से भरपूर है। यहाँ ऊँचे-ऊँचे पहाड़ हैं, गहरी घाटियाँ हैं, विस्तृत पठार हैं, चट्टानी करार हैं, प्राकृतिक गुफाएँ हैं और कहीं-कहीं खुले घास के मैदान भी हैं। घने साल के जंगलों के बीच सागौन और बाँस के वन इस पूरे क्षेत्र को और समृद्ध बनाते हैं। यहाँ बाघ के साथ-साथ तेंदुआ, हाथी, भालू, ढोल, भेड़िया, लकड़बग्घा, सियार, लोमड़ी, गौर, सांभर, चीतल, चौसिंघा, कोटरी, मूषक हिरण और जंगली सूअर जैसे अनेक वन्यजीव पाए जाते हैं। भरपूर शिकार, पानी और सुरक्षित वन क्षेत्रये सभी मिलकर अचानकमार को बाघों के लिए एक आदर्श घर बनाते हैं।

बाघों की संख्या से आगे की कहानी

यदि किसी जंगल में बाघों की आबादी लंबे समय तक अलग-थलग रहे और केवल आपस में ही प्रजनन करती रहे, तो इनब्रीडिंग का खतरा बढ़ सकता है। इससे आने वाली पीढ़ियों में रोगों के प्रति संवेदनशीलता, शारीरिक कमजोरी और प्रजनन क्षमता में कमी जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। लेकिन जब कोई बाघ दूसरे जंगल से आता है और स्थानीय बाघों के साथ प्रजनन करता है, तो वह अपने साथ नए जीन भी लाता है। यही जीन विविधता आने वाली पीढ़ियों को अधिक स्वस्थ और मजबूत बनाती है। इसलिए कहा जा सकता है: वन्यजीव कॉरिडोर केवल जंगलों को नहीं जोड़ते, वे बाघों के जीन को भी जोड़ते हैं।

अचानकमार की विशेषता यह है कि यहाँ आने वाले कई बाघों की कहानी दूसरे टाइगर रिजर्वों से जुड़ी हुई है, जो हमें कॉरिडोर का महत्व बताते है।

बाघों की यात्राएँकॉरिडोर और जीन विविधता की कहानी

अचानकमार टाइगर रिजर्व में पाए जाने वाले बाघों की कहानियाँ इसके सक्रिय वन्यजीव कॉरिडोरों और आनुवंशिक विविधता का जीवंत प्रमाण हैं। AKT-8 (झुमरी) बांधवगढ़ से प्राकृतिक रूप से अचानकमार पहुँची, यहाँ सफलतापूर्वक प्रजनन कर रही है और उसकी संतति इस कॉरिडोर की महत्ता को दर्शाती है। AKT-14 पेंच से होते हुए अचानकमार पहुँची और यहाँ दूसरी बार प्रजनन कर रही है, जो पेंचकान्हाअचानकमार परिदृश्य के आपसी जुड़ाव को प्रमाणित करता है। AKT-22 का कान्हा से अचानकमार आगमन स्थानीय बाघ आबादी में नए जीन के प्रवाह का महत्वपूर्ण उदाहरण है। वहीं ATR-16, जिसे सूरजपुर में मानवबाघ संघर्ष के दौरान घायल अवस्था में रेस्क्यू कर उपचार के बाद अचानकमार में छोड़ा गया, आज सफलतापूर्वक प्रजनन कर रही है और संरक्षण की सफलता की कहानी कहती है।रजनीनामक एक उम्रदराज बाघिन, जिसे 2021 में गंभीर रूप से घायल अवस्था में रेस्क्यू किया गया था, लगभग एक वर्ष की देखभाल के बाद बच नहीं सकी; लेकिन कैमरा ट्रैप और वैज्ञानिक पहचान से यह पता चला कि उसका जन्म 2009 में बांधवगढ़ में हुआ था। उसकी जीवन-यात्रा भी बांधवगढ़अचानकमार के बीच वर्षों से सक्रिय प्राकृतिक संपर्क का प्रमाण है।

बाघ केवल आते नहींआगे भी जाते हैं

अचानकमार में केवल दूसरे जंगलों से बाघ आते ही नहीं हैं। कई युवा बाघ बड़े होने के बाद अपना नया क्षेत्र खोजने के लिए अचानकमार से आगे भी निकलते हैं। यही प्रकृति का नियम है। एक युवा नर या मादा बाघ जब अपनी जन्मभूमि छोड़ता है, तो वह नए क्षेत्र की तलाश में जंगलों के बीच यात्रा करता है।

इसी यात्रा के दौरान वह दूसरे जंगलों तक पहुँचता है और अपने साथ नए जीन ले जाता है। कैमरा ट्रैप निगरानी और वैज्ञानिक बाघ पहचान से यह स्पष्ट हुआ है कि अचानकमार मध्य भारत के विभिन्न जंगलों के बीच एक महत्वपूर्ण जैविक सेतु की भूमिका निभा रहा है।

अचानकमार से जुड़े प्रमुख वन्यजीव कॉरिडोर

कान्हाअचानकमार कॉरिडोर - मैकल पर्वतमाला के घने जंगलों से होकर मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के वन क्षेत्रों को जोड़ता है। यह बाघ, हाथी, तेंदुए और अन्य वन्यजीवों के आवागमन का महत्वपूर्ण मार्ग है।

अचानकमारबांधवगढ़ कॉरिडोर - मैकल और विंध्य पर्वतमालाओं के बीच एक प्राकृतिक सेतु है, जो मरवाही क्षेत्र से होते हुए बांधवगढ़ तक जाता है। झुमरी और रजनी जैसी बाघिनों की यात्राएँ इसकी महत्ता का जीवंत प्रमाण हैं।

उत्तर-पूर्वी कॉरिडोर - अचानकमार को छत्तीसगढ़ के उत्तरी वन क्षेत्रों से जोड़ते हुए गुरु घासीदासतैमोर पिंगला और आगे झारखंड के पलामू क्षेत्र तक पहुँचता है। इन जुड़े हुए जंगलों में बाघों, हाथियों और अन्य वन्यजीवों की आवाजाही होती रहती है।

कॉरिडोरों  संरक्षण से सुरक्षित होगा बाघों, हाथियों तथा अन्य वन्यप्राणियों का भविष्य

कॉरिडोर बचेंगे, तभी बाघ बचेंगे -कल्पना कीजिए कि जंगलों के बीच बने प्राकृतिक रास्ते अचानक बंद हो जाएँ और सड़कें, रेल लाइनें, खनन, बस्तियाँ या अन्य विकास कार्य जंगलों को छोटे-छोटे हिस्सों में बाँट दें। ऐसी स्थिति में बाघों के लिए एक जंगल से दूसरे जंगल तक जाना कठिन हो जाएगा और धीरे-धीरे अलग-अलग बाघ आबादियाँ एक-दूसरे से अलग हो सकती हैं। इससे उनके बीच जीन का आदान-प्रदान कम होगा और भविष्य में आनुवंशिक विविधता के लिए खतरा उत्पन्न हो सकता है। इसके विपरीत, यदि जंगल जुड़े रहें और कॉरिडोर सुरक्षित रहें, तो युवा बाघ सुरक्षित रूप से नए क्षेत्र खोज सकते हैं, दूसरे क्षेत्रों की बाघ आबादियों तक पहुँच सकते हैं और नई पीढ़ियों में नए जीन का प्रवाह बनाए रख सकते हैं। इसलिए कॉरिडोर केवल जंगलों के बीच बने रास्ते नहीं हैं, बल्कि बाघों के भविष्य की जीवनरेखाएँ हैं। बाघ संरक्षण का अर्थ केवल टाइगर रिजर्व की सीमाओं की रक्षा करना नहीं, बल्कि उन जंगलों और वन क्षेत्रों को भी सुरक्षित रखना है जो एक टाइगर रिजर्व को दूसरे से जोड़ते हैंक्योंकि कई बार बाघ का भविष्य टाइगर रिजर्व के अंदर नहीं, बल्कि दो टाइगर रिजर्वों के बीच स्थित जंगलों में तय होता है।

अचानकमार टाइगर रिजर्व से जुड़े वन्यजीव कॉरिडोरों की महत्ता केवल बाघों के आवागमन तक सीमित नहीं है, बल्कि ये मध्य भारत में बाघों के दीर्घकालिक अस्तित्व और आनुवंशिक विविधता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। जब कान्हा, बांधवगढ़, पेंच, गुरु घासीदासतैमोर पिंगला और अन्य वन क्षेत्रों के बीच प्राकृतिक संपर्क बना रहता है, तो बाघ एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक आवागमन कर सकते हैं, नए क्षेत्रों में बस सकते हैं और अलग-अलग आबादियों के बीच जीन का आदान-प्रदान संभव होता है। यही जीन प्रवाह बाघों की आनुवंशिक विविधता को बनाए रखने और आने वाली पीढ़ियों को स्वस्थ एवं मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसलिए कॉरिडोर केवल जंगलों को जोड़ने वाले प्राकृतिक मार्ग नहीं, बल्कि मध्य भारत के बाघों के भविष्य की जीवनरेखाएँ हैं। यदि ये कॉरिडोर सुरक्षित रहेंगे, तो बाघों की आवाजाही, जीन प्रवाह और प्राकृतिक आबादियों का आपसी जुड़ाव भी बना रहेगाऔर यही बाघ संरक्षण की वास्तविक सफलता होगी। 

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