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300 साल से चली आ रही परंपरा आज भी कायम, ऐसे निकलती है भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा

कहीं बैलगाड़ी तो कहीं भक्तों के हाथों खिंचता है रथ, जानिए बिलासपुर की अनोखी परंपरा

बिलासपुर: TODAY छत्तीसगढ़  /  भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा केवल ओडिशा के पुरी तक सीमित नहीं है, बल्कि बिलासपुर में भी इसकी समृद्ध और प्राचीन परंपरा आज तक जीवित है। शहर के रेलवे परिक्षेत्र, सदर बाजार स्थित पाराशर मंदिर, जूना बिलासपुर के सीताराम मंदिर और गोंड़पारा के दर्जी मंदिर में मंदिर स्थापना के समय से ही भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की रथयात्रा श्रद्धा और परंपरा के साथ निकाली जाती है। कहीं भगवान बैलगाड़ी पर विराजते हैं तो कहीं सजे-धजे रथ को खींचने के लिए भक्तों की लंबी कतार लगती है।

रेलवे परिक्षेत्र मंदिर में 1996 से पुरी की परंपरा का निर्वाह

रेलवे परिक्षेत्र स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर की स्थापना 26 नवंबर 1996 को हुई थी। स्थापना समारोह में पुरी के गजपति महाराज दिव्य सिंह देव और श्रीमंदिर के मुख्य पंडा रमेश राजगुरु विशेष रूप से शामिल हुए थे। यहां स्नान यात्रा, रथयात्रा, नवयौवन दर्शन और नवकलेवर जैसे सभी प्रमुख अनुष्ठान पुरी की परंपराओं के अनुसार संपन्न होते हैं।

वर्ष 2015 में यहां पहली बार पुरी की तर्ज पर नवकलेवर महोत्सव आयोजित किया गया, जिसमें भगवान के ब्रह्म परिवर्तन की प्रक्रिया पुरी से आए सेवायतों के मार्गदर्शन में संपन्न हुई। मंदिर में स्थापित भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की प्रतिमाएं महानीम की लकड़ी से निर्मित हैं, जिन्हें प्रसिद्ध शिल्पकार गजेंद्र महाराणा ने तैयार किया था।

पाराशर मंदिर में तीन शताब्दियों से निभाई जा रही परंपरा

सदर बाजार स्थित पाराशर मंदिर को शहर का सबसे प्राचीन जगन्नाथ मंदिर माना जाता है। दुबे परिवार के अनुसार इसकी स्थापना लगभग 300 वर्ष पहले पंडित पाराशर दुबे ने की थी और आज उनकी सातवीं पीढ़ी मंदिर की सेवा कर रही है।

यहां केवल गुंडिचा यात्रा निकाली जाती है। पहले भगवान की यात्रा बैलगाड़ी से होती थी, जबकि अब सुसज्जित वाहन में शोभायात्रा निकाली जाती है। वर्ष 1980 में मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया, लेकिन गर्भगृह और मूल विग्रहों की प्राचीनता को यथावत रखा गया।

जूना बिलासपुर में आज भी बैलगाड़ी से निकलती है यात्रा

जूना बिलासपुर स्थित सीताराम मंदिर में करीब 75 से 80 वर्षों से भगवान जगन्नाथ की पूजा पुरी की परंपरा के अनुसार हो रही है। पहले यहां लकड़ी के विशाल रथ में भगवान की यात्रा निकलती थी, लेकिन रथ क्षतिग्रस्त होने के बाद पिछले दो दशकों से बैलगाड़ी को सजाकर रथयात्रा निकाली जा रही है। यहां भी महानीम की लकड़ी से बनी प्रतिमाएं विराजमान हैं।

दर्जी मंदिर में काष्ठ विग्रहों के साथ निकलती है शोभायात्रा

गोंड़पारा स्थित करीब 100 वर्ष पुराने दर्जी मंदिर में भी प्रतिवर्ष भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की रथयात्रा आयोजित होती है। गर्भगृह में स्थापित पत्थर की प्रतिमाओं को स्थानांतरित नहीं किया जा सकता, इसलिए रथयात्रा के लिए विशेष रूप से तैयार काष्ठ विग्रहों का उपयोग किया जाता है। भजन-कीर्तन के साथ निकलने वाली यह शोभायात्रा आज भी मंदिर की प्राचीन परंपरा को जीवंत बनाए हुए है।

आषाढ़ मास का विशेष महत्व

धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान जगन्नाथ के लिए आषाढ़ मास अत्यंत पवित्र माना जाता है। इसी महीने रथयात्रा, नवयौवन दर्शन और विशेष अनुष्ठानों का आयोजन होता है। अधिकमास (दो आषाढ़) आने पर नवकलेवर की परंपरा निभाई जाती है, जिसमें भगवान के विग्रहों का पुनर्निर्माण और ब्रह्म परिवर्तन किया जाता है।


बॉक्स | बिलासपुर के प्रमुख जगन्नाथ मंदिर और उनकी विशेषता

मंदिरविशेषता
रेलवे परिक्षेत्र जगन्नाथ मंदिर1996 से पुरी की परंपरा के अनुसार रथयात्रा और नवकलेवर
पाराशर मंदिर, सदर बाजारलगभग 300 वर्ष पुराना, शहर का सबसे प्राचीन जगन्नाथ मंदिर
सीताराम मंदिर, जूना बिलासपुर75-80 वर्षों से बैलगाड़ी के माध्यम से रथयात्रा
दर्जी मंदिर, गोंड़पारा100 वर्ष पुराना, काष्ठ विग्रहों के साथ निकलती है शोभायात्रा
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