दुर्ग के गनियारी गांव पहुंचकर पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई को श्रद्धांजलि अर्पित की। इस दौरान उन्होंने उनके नाम पर लोककला अलंकरण, विद्यालय के नामकरण और उनके तंबूरे को संग्रहालय में संरक्षित रखने की घोषणा की।
मुख्यमंत्री ने डॉ. तीजन बाई के पुत्र दिलहरण पारधी सहित परिवार के अन्य सदस्यों से भेंट कर उन्हें ढांढस बंधाया। उन्होंने कहा कि डॉ. तीजन बाई केवल छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे देश की सांस्कृतिक पहचान थीं। अपनी अद्भुत साधना और पंडवानी की कापालिक शैली के माध्यम से उन्होंने छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई।
मुख्यमंत्री ने कहा कि डॉ. तीजन बाई का जीवन लोककला, संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण के लिए समर्पित रहा। उनकी कला और साधना आने वाली पीढ़ियों को निरंतर प्रेरित करती रहेगी। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार उनकी स्मृतियों को चिरस्थायी बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठा रही है।
इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने तीन महत्वपूर्ण घोषणाएं कीं। उन्होंने कहा कि राज्योत्सव के अवसर पर प्रतिवर्ष 'डॉ. तीजन बाई लोककला अलंकरण' प्रदान किया जाएगा, जिसके माध्यम से लोककला के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले कलाकारों को सम्मानित किया जाएगा।
इसके अलावा ग्राम गनियारी स्थित शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय का नामकरण डॉ. तीजन बाई के नाम पर किया जाएगा, ताकि विद्यार्थी उनके संघर्ष, साधना और उपलब्धियों से प्रेरणा ले सकें।
मुख्यमंत्री ने यह भी घोषणा की कि डॉ. तीजन बाई के जीवनभर की कला-साधना का प्रतीक रहा उनका तंबूरा रायपुर के संग्रहालय में सम्मानपूर्वक संरक्षित किया जाएगा, जिससे आने वाली पीढ़ियां उनकी सांस्कृतिक विरासत को करीब से जान सकें।
श्रद्धांजलि सभा को सांसद विजय बघेल, पर्यटन, संस्कृति, धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व मंत्री राजेश अग्रवाल तथा विधायक एवं पद्मश्री अनुज शर्मा ने भी संबोधित किया। सभी वक्ताओं ने डॉ. तीजन बाई के व्यक्तित्व, कृतित्व और भारतीय लोककला में उनके योगदान को याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।
सभा में उपस्थित लोगों ने दो मिनट का मौन रखकर दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की। इस अवसर पर पद्मश्री आर.एस. बारले, स्कूल शिक्षा मंत्री गजेन्द्र यादव, विधायक डोमन लाल कोर्सेवाड़ा, छत्तीसगढ़ फिल्म विकास निगम की अध्यक्ष मोना सेन, विभिन्न क्षेत्रों से आए कलाकार, जनप्रतिनिधि और बड़ी संख्या में नागरिक उपस्थित रहे।

