हथियार छोड़ मुख्यधारा में लौटे पापाराव, 17 कैडरों के साथ आत्मसमर्पण


रायपुर। 
TODAY छत्तीसगढ़  /  छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में चल रही ‘पूना मारगेम’ पुनर्वास पहल के तहत बुधवार को 18 माओवादी कैडरों ने आत्मसमर्पण किया है। अधिकारियों का कहना है कि यह कदम क्षेत्र में हिंसा छोड़कर मुख्यधारा में लौटने की दिशा में एक और संकेत है। यह आत्मसमर्पण कार्यक्रम जगदलपुर के लालबाग स्थित शौर्य भवन में आयोजित किया गया, जहां पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बलों के वरिष्ठ अधिकारी, जिला प्रशासन के प्रतिनिधि और स्थानीय टीम के सदस्य मौजूद थे।

पुलिस के मुताबिक, आत्मसमर्पण करने वालों में दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी (डीकेएसजेडसी) से जुड़े पापा राव के अलावा डिविजनल स्तर के नेता प्रकाश मड़वी और अनिल ताती भी शामिल हैं। अधिकारियों का कहना है कि ये सभी लंबे समय से सक्रिय कैडर रहे हैं। आत्मसमर्पण के दौरान कैडरों ने एके-47, एसएलआर, इंसास राइफल, .303 राइफल और बीजीएल लॉन्चर सहित कई हथियार सुरक्षा बलों के हवाले किए।

अधिकारियों ने बताया कि ‘पूना मारगेम’ पहल का उद्देश्य उन लोगों को हिंसा के रास्ते से हटाना है, जो माओवादी गतिविधियों में शामिल रहे हैं, और उन्हें समाज की मुख्यधारा में वापस लाकर बेहतर जीवन के अवसर उपलब्ध कराना है। कार्यक्रम में मौजूद अधिकारियों ने आत्मसमर्पण करने वालों के फैसले का स्वागत किया और कहा कि सरकार की पुनर्वास नीति के तहत उन्हें आर्थिक और सामाजिक सहायता दी जाएगी।

हाल के महीनों में बस्तर क्षेत्र में आत्मसमर्पण की घटनाओं में बढ़ोतरी देखी गई है। सुरक्षा बल इसे अपनी रणनीति की सफलता के रूप में देखते हैं, हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि दीर्घकालिक शांति के लिए पुनर्वास के साथ-साथ विकास और स्थानीय विश्वास बहाली भी जरूरी होगी। 

बीजापुर और बस्तर संभाग में पिछले कुछ समय से आत्मसमर्पण की घटनाओं में वृद्धि देखी गई है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 1 जनवरी 2024 से अब तक 2,700 से अधिक माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया है। राज्य सरकार इसे अपनी पुनर्वास नीति और सुरक्षा अभियानों की सफलता के रूप में देखती है, जबकि कुछ विश्लेषकों का कहना है कि क्षेत्र में स्थायी शांति के लिए विकास, विश्वास और स्थानीय समुदायों की भागीदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण होगी। 



जग्गी हत्याकांड: सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर हाईकोर्ट में दोबारा शुरू हुई प्रक्रिया, 1 अप्रैल को अंतिम बहस तय


रायपुर। 
TODAY छत्तीसगढ़  / छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित रामावतार जग्गी हत्याकांड में एक बार फिर न्यायिक प्रक्रिया तेज हो गई है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद अब इस मामले की सुनवाई दोबारा छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में शुरू हो चुकी है। अदालत ने अंतिम सुनवाई के लिए 1 अप्रैल की तारीख तय की है।

मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली डिवीजन बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही है। यह घटनाक्रम तब सामने आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की उस अपील को स्वीकार किया, जिसमें मामले की दोबारा समीक्षा की मांग की गई थी। अदालत ने कहा कि केस के तथ्यों और सबूतों पर फिर से विस्तार से विचार किया जाना आवश्यक है। इससे पहले, अप्रैल 2024 में हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए 28 आरोपियों को दी गई उम्रकैद की सजा को सही ठहराया था। उस फैसले को इस लंबे समय से चल रहे मामले में एक अहम पड़ाव माना गया था।

रामावतार जग्गी की हत्या 4 जून 2003 को दिनदहाड़े गोली मारकर की गई थी। वे राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी से जुड़े एक प्रमुख नेता थे। इस घटना ने उस समय राज्य की राजनीति में व्यापक प्रतिक्रिया पैदा की थी और इसे छत्तीसगढ़ के चर्चित आपराधिक मामलों में गिना जाता है। मामले में एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू अमित जोगी से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने उनके बरी किए जाने के खिलाफ सीबीआई की अपील पर भी सुनवाई की अनुमति दी है। अब सभी की निगाहें हाईकोर्ट में होने वाली अंतिम सुनवाई पर टिकी हैं, जहां इस लंबे समय से चले आ रहे मामले में आगे की दिशा तय होने की संभावना है।

दीवार में छुपाकर रखा गया था हाथी दांत; डीएनए जांच के लिए देहरादून भेजा जाएगा, तीन आरोपी गिरफ्तार


गरियाबंद।
 TODAY छत्तीसगढ़  /  ज़िले में उदंती सीतानदी टाइगर रिजर्व की एंटी-पोचिंग टीम ने वन्यजीव तस्करी के एक मामले में तीन लोगों को गिरफ्तार किया है। अधिकारियों के अनुसार, आरोपियों के पास से एक हाथी का दांत और शिकार से जुड़े कई उपकरण बरामद किए गए हैं। वन विभाग की ओर से जारी जानकारी के मुताबिक, यह कार्रवाई एक गोपनीय सूचना के आधार पर की गई। सूचना में कहा गया था कि कुल्हाड़ीघाट क्षेत्र का एक व्यक्ति जंगली हाथी का दांत अपने पास रखे हुए है और उसे बेचने की कोशिश कर रहा है।

इसके बाद सहायक संचालक के निर्देशन में गठित टीम ने संदिग्ध के घर और आसपास की तलाशी ली। तलाशी के दौरान अधिकारियों को एक हाथी का दांत बरामद हुआ, जिसे कथित तौर पर आरोपी ने अपने घर की दीवार में छुपाकर रखा था। विभाग का कहना है कि यह दांत पिछले चार वर्षों से वहां छिपा हुआ था। गिरफ्तार किए गए लोगों में एक आरोपी का पहले भी वन्यजीव अपराधों से जुड़ा रिकॉर्ड सामने आया है। अधिकारियों के अनुसार, वह हाल ही में सांभर के शिकार से जुड़े एक मामले में जमानत पर बाहर था और उसी दौरान इस मामले में कथित रूप से शामिल पाया गया।

वन विभाग ने आरोपियों के पास से दो धनुष, कई तीर, पक्षियों के शिकार में इस्तेमाल होने वाला विशेष उपकरण, गुलेल और अन्य सामग्री भी जब्त की है। अधिकारियों का कहना है कि यह सामग्री शिकार की गतिविधियों में इस्तेमाल की जा सकती है। पूछताछ के दौरान एक आरोपी ने दावा किया कि हाथी का दांत उसे 2021 में एक अन्य व्यक्ति से मिला था, जिसकी 2022 में हाथी-मानव संघर्ष के दौरान मौत हो गई थी। हालांकि, वन विभाग ने इस दावे पर संदेह जताया है।

अधिकारियों के मुताबिक, जब्त किए गए हाथी दांत के नमूने को डीएनए जांच के लिए देहरादून स्थित भारतीय वन्यजीव संस्थान भेजा जा रहा है। इससे यह पता लगाने की कोशिश की जाएगी कि यह दांत किस हाथी का है और उसकी मौत किन परिस्थितियों में हुई थी। वन विभाग का कहना है कि मामले की आगे जांच जारी है और इससे जुड़े अन्य पहलुओं की भी पड़ताल की जा रही है। 

VIDEO: 13 साल की खामोशी के बाद हरीश राणा को अंतिम विदाई


नई दिल्ली।
 TODAY छत्तीसगढ़  /  दिल्ली के ग्रीन पार्क में बुधवार सुबह एक ऐसे जीवन को अंतिम विदाई दी गई, जो 13 वर्षों से अस्पताल के बिस्तर और मशीनों के बीच ठहरा हुआ था। हरीश राणा—एक नाम, जो कभी सपनों, पढ़ाई और भविष्य की योजनाओं से जुड़ा था, अब स्मृतियों में बदल गया है।

हरीश 2013 में एक हादसे के बाद कोमा में चले गए थे। पंजाब विश्वविद्यालय में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे इस छात्र के जीवन की दिशा एक पल में बदल गई, जब वह हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए। सिर में आई गंभीर चोट ने उन्हें ऐसी खामोशी में धकेल दिया, जहां से वे फिर कभी लौट नहीं सके।

“सुबह 9 बजे पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार… ॐ शांति ॐ…” —तो यह केवल सूचना नहीं थी, बल्कि 13 साल लंबे एक संघर्ष के अंत की घोषणा थी। 

इन 13 वर्षों में बहुत कुछ बदला—मौसम, शहर, लोग—लेकिन हरीश की स्थिति वैसी ही बनी रही। उनके लिए समय जैसे थम गया था, जबकि उनके परिवार के लिए हर दिन एक लंबा इंतज़ार बनता चला गया। उम्मीद और असहायता के बीच झूलता यह इंतज़ार आखिरकार एक कठिन निर्णय पर आकर ठहरा।

11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी। इसके बाद दिल्ली के एम्स में डॉक्टरों की देखरेख में उनके लाइफ सपोर्ट सिस्टम को चरणबद्ध तरीके से हटाया गया। अस्पताल के सूत्रों के अनुसार, इस पूरी प्रक्रिया के दौरान यह सुनिश्चित किया गया कि उन्हें किसी प्रकार की पीड़ा न हो—दवाओं के सहारे उन्हें शांति दी गई। 

उनके पिता अशोक राणा ने जब व्हाट्सऐप समूह में एक संक्षिप्त संदेश लिखा— “सुबह 9 बजे पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार… ॐ शांति ॐ…” —तो यह केवल सूचना नहीं थी, बल्कि 13 साल लंबे एक संघर्ष के अंत की घोषणा थी। यह संदेश पढ़ते ही कई लोगों की आंखें नम हो गईं। अंतिम संस्कार के दौरान माहौल शब्दों से परे था। परिवार, रिश्तेदार और स्थानीय लोग—सभी एक ऐसे जीवन को विदा कर रहे थे, जो जीते हुए भी जैसे कहीं ठहर गया था। 

13 साल तक उनका परिवार उम्मीद में जीता रहा—हर दिन एक चमत्कार का इंतजार। लेकिन जब कोई सुधार नहीं हुआ, तो यह इंतजार धीरे-धीरे असहनीय पीड़ा में बदल गया।

भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु को सुप्रीम कोर्ट ने कुछ शर्तों के साथ मान्यता दी है। लेकिन हर ऐसा मामला केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं होता—यह एक परिवार की पीड़ा, उम्मीद और अंततः स्वीकृति की कहानी भी होता है। हरीश राणा की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उन अनगिनत अनकहे सवालों की है, जो जीवन और मृत्यु के बीच की उस पतली रेखा पर खड़े होकर पूछे जाते हैं— क्या कभी-कभी विदाई ही सबसे शांतिपूर्ण उत्तर होती है? 

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