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Wildlife Deaths: कुत्तों के हमले के बाद संजय वन वाटिका बंद, 15 चीतलों की मौत


सरगुजा।
  TODAY छत्तीसगढ़  / छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर स्थित संजय वन वाटिका में 15 चीतलों की मौत ने सिर्फ एक हादसे का नहीं, बल्कि व्यवस्था की गहरी खामियों का सवाल खड़ा कर दिया है। जिस जगह को वन्यजीवों के संरक्षण के लिए बनाया गया था, वही अब उनकी असुरक्षा और मौत का कारण बनती दिख रही है। 

बताया जा रहा है कि 21 मार्च की रात पांच-छह आवारा कुत्ते बाड़े की कमजोर फेंसिंग का फायदा उठाकर अंदर घुस गए। इसके बाद जो हुआ, वह किसी भी संरक्षण क्षेत्र के लिए शर्मनाक है। यहां मौजूद हिरण प्रजाति के कई वन्यजीव आवारा कुत्तों के सामने बेबस, असहाय दिखे। बताया जा रहा है कि संजय पार्क में आवारा कुत्तों ने 14 चीतल और एक सांभर को मार डाला है । एक अन्य घायल चीतल ने आज सुबह दम तोड़ दिया। वन विभाग ने मरे हुए वन्यप्राणियों के शव को आनन-फानन में जला भी दिया है ताकि बड़े और गंभीर सवालों से बचा जा सके। 

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ एक ‘दुर्घटना’ है, या फिर लंबे समय से चली आ रही लापरवाही का नतीजा? प्रारंभिक जानकारी से साफ है कि बाड़े की फेंसिंग इतनी कमजोर थी कि आवारा कुत्ते आसानी से भीतर पहुंच गए। अगर यही सुरक्षा व्यवस्था है, तो फिर यह ‘वाटिका’ नहीं, एक खुला खतरा क्षेत्र बन चुका है। और सवाल यहीं खत्म नहीं होते क्या रात में कोई सुरक्षा गश्त नहीं थी? क्या निगरानी की कोई व्यवस्था नहीं थी? घटना रात में हुई, लेकिन इसकी जानकारी पार्क प्रबंधन और वन विभाग को अगले दिन सुबह मिली। इसका मतलब साफ है न तो तत्काल निगरानी थी, न ही कोई अलर्ट सिस्टम। संरक्षित क्षेत्र में अगर पूरी रात हिंसक हमला चलता रहे और किसी जिम्मेदार को खबर तक न हो, तो यह सिर्फ चूक नहीं, बल्कि तंत्र की विफलता है। 

हर बड़े हादसे के बाद ‘जांच के आदेश’ एक तय प्रक्रिया बन चुके हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या जांच से आगे भी कुछ होगा? क्या किसी अधिकारी की जवाबदेही तय होगी, या यह मामला भी फाइलों में दब जाएगा? हालांकि सुरक्षा में बड़ी चूक मानते हुए ड्यूटी पर तैनात 4 कर्मचारियों को तत्काल निलंबित (Suspend) कर दिया गया है। इस मामले में अब तक किसी बड़े अफसर पर गाज नहीं गिरी है, ना ही जवाबदेही तय की गई है। 

संरक्षण या दिखावा?

संजय वन वाटिका को पर्यटकों के लिए तीन दिनों के लिए बंद कर दिया गया है। लेकिन क्या यह कदम पर्याप्त है? जब तक सुरक्षा व्यवस्था की खामियों को दूर नहीं किया जाता, निगरानी तंत्र को मजबूत नहीं किया जाता और जिम्मेदारों पर कार्रवाई नहीं होती तब तक यह बंदी सिर्फ एक औपचारिकता भर ही रहेगी।

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