"क्या मैं भाग्यशाली हूँ कि आज भी जिंदा हूँ? या दुर्भाग्यशाली हूँ कि स्वस्थ होने के बावजूद आज़ादी से वंचित हूँ? यह फैसला मैं आप पर छोड़ता हूँ।"
मैं अभी युवा बाघ हूँ। मार्च 2025 की बात है। तब मैं छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बस्तर संभाग के बीजापुर के घने जंगलों में आज़ाद घूमता था। जंगल ही मेरा घर था और वही मेरी दुनिया। फिर एक दिन सब कुछ बदल गया ...
खैर, ताबड़तोड़ मुझे रेस्क्यू कर 16 अप्रैल को रायपुर के जंगल सफारी जू में लाया गया। इलाज शुरू हुआ, 30 जुलाई को मेरी सर्जरी भी हुई। मुझे बिल्कुल अलग रखा गया, सिर्फ केयर टेकर आता है ताकि मानव से मेरा सीधा संपर्क न हो सके। धीरे-धीरे मैं ठीक होने लगा, जीने की आस जागने लगी।
नवंबर तक मैं लगभग पूरी तरह ठीक हो गया। चार डॉक्टर आये, उन्होंने काफी देर तक मेरी जांच की और रिपोर्ट बनाई। मैंने केयर टेकर से रिपोर्ट लेकर पढ़ी। मैं खुशी से उछल पड़ा। रिपोर्ट में लिखा था कि मैं स्वस्थ हूं, जागरूक रहता हूं, सर्जरी का चीरा पूरी तरह भर गया है, बाल भी आ गए हैं। ऑपरेशन किए गए पैर पर शरीर का पूरा भार डाल सकता हूं, चल सकता हूं, घायल पंजा भी सामान्य हो गया है। चलने, दौड़ने या बैठकर उठते समय डॉक्टरों को दर्द के कोई लक्षण नहीं दिखे। केवल कभी-कभी हल्की लंगड़ाहट दिखाई दी, जो उनके अनुसार समय के साथ ठीक हो जाएगी, या बनी भी रह सकती है परंतु दौड़ने में कोई लंगड़ाहट नहीं थी। डॉक्टर आपस में चर्चा कर रहे थे कि पहले मुझे एक बड़े बाड़े में रखा जाएगा, वहां मेरी शिकार करने और प्राकृतिक जीवन जीने की क्षमता जांची जाएगी और उसके बाद मुझे जंगल में छोड़ दिया जाएगा। वे किसी सॉफ्ट रिलीज की बात कर रहे थे।
ग्रामीणों ने वन विभाग को सूचना दी कि जंगल में एक घायल बाघ पड़ा है। बाद में कुछ अधिकारियों ने यह कहकर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया कि शायद मेरे पैर पत्थरों के बीच फँस गए होंगे।
मैं आपको नहीं बता सकता उस दिन मैं कितना खुश था। लगा कि अब फिर वही जिंदगी मिलेगी, मजे से जियूंगा। केयर टेकर ने बताया कि बड़े साहब के आदेश के बाद ही मुझे छोड़ा जाएगा। कोई भी कदमों की आहट होती तो मुझे लगता आदेश आ गया होगा, लेकिन मेरा इंतजार जारी रहा। एक दिन मैंने केयर टेकर से पूछा कि आदेश आ क्यों नहीं रहा? उसने कहा कि विभाग अभी इको-टूरिज्म, विकास और लोगों को रोजगार देने में लगा है, आदेश निकालने का समय नहीं है।
खाली बैठे-बैठे मैंने वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम भी पढ़ लिया। उसमें तो कहीं भी इको-टूरिज्म, विकास और रोजगार जैसे शब्द नहीं लिखे दिखे। दो महीने बीत गए। मैंने फिर पूछा तो केयर टेकर ने बताया कि मेरी हेल्थ रिपोर्ट में तो सब कुछ ठीक लिखा था, लेकिन डॉक्टरों ने न जाने क्यों रिपोर्ट में सॉफ्ट रिलीज़ की कोई चर्चा नहीं की।
इस बीच वन्यजीव प्रेमियों ने मेरे बारे में पूछा तो मेरे पूरी तरह स्वस्थ घोषित होने के दो महीने बाद बड़े साहब को याद आया कि यहां एक टाइगर भी पड़ा हुआ है। फरवरी में देहरादून के एक संस्थान, जिसका नाम कुछ डब्ल्यू.आई.आई. जैसा है, को पत्र लिखा गया कि डॉक्टरों ने सुझाव दिया है कि मुझे जंगल में छोड़ने से पहले यह परख लिया जाए कि मैं फिर से जंगल के जीवन में ढल पाऊँगा या नहीं, इसलिए विशेषज्ञ भेजे जाएँ। मैंने अपनी हेल्थ रिपोर्ट कई बार पढ़ी, लेकिन उसमें तो डॉक्टरों ने ऐसा कोई सुझाव नहीं दिया था। साहब लोगों ने डॉक्टरों का नाम लेकर यह बात कहाँ से जोड़ दी, मुझे आज तक समझ में नहीं आया। शायद उन्हें अपने ही डॉक्टरों पर भरोसा नहीं रहा होगा। वन्यजीव प्रेमियों ने भी मुझे छोड़ने के लिए चिट्ठी लिखी, लेकिन डब्ल्यू.आई.आई. को न कोई रिमाइंडर भेजा गया और न विशेषज्ञ आए। महीने पर महीने बीतते गए। मैं निराश हो गया। अब तो कदमों की आहट पर आदेश का इंतजार भी खत्म हो चुका था।
अंतर्राष्टीय बाघ दिवस (29 जुलाई) की पूर्व संध्या पर यह लेख सुप्रसिद्ध वन्यजीव और पर्यावरण प्रेमी नितिन सिंघवी द्वारा लिखा गया है। इस लेख में वर्णित घटनाएँ वास्तविक हैं तथा तथ्य उपलब्ध अभिलेखों पर आधारित हैं।
वन्यजीव प्रेमी ने अधिकारियों से कहा कि मुझे कम से कम सॉफ्ट रिलीज वाले बाड़े में ही छोड़ दें। एक अधिकारी ने बताया कि ऐसा बाड़ा केवल अचानकमार टाइगर रिजर्व में है और वहां मुझे नहीं रखा जा सकता क्योंकि वहां पहले से बहुत बाघ हैं। कहीं और नया बाड़ा बनाने की तैयारी भी शुरू नहीं हुई है।
फरवरी से जून आ गया। नए साहब आ गए। वन्यजीव प्रेमियों ने मेरी रिहाई की मांग की। परन्तु फाइल में विशेषज्ञों की राय लेने की बात लिखी थी। नए साहब ने 24 जून को फिर डब्ल्यू.आई.आई. को पत्र लिखा। विशेषज्ञ तो नहीं आए, लेकिन अगले ही दिन चार विशेषज्ञों की समिति बनाने की सलाह आ गई। मालूम नहीं जिसने तीन महीने तक जवाब नहीं दिया, उस डब्ल्यू.आई.आई. ने दूसरे ही दिन समिति बनाने की सलाह कैसे दे दी। जो भी हो, समिति बन गई है और आपको अपना दुखड़ा सुनाने के दिन तक वह मुझे देखने नहीं आई है। केयर टेकर बता रहा था कि मुझे लेकर 2 दिन पहले शायद कोई वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग हुई है और मुझे छोड़े जाने की संभावना नकारात्मक है।
इस बीच कई बार अखबारों में पढ़ा कि साहब लोग पड़ोसी राज्य से तीन बाघ लाने की तैयारी कर रहे हैं। मेरा दिल टूट गया। खुद के घर के टाइगर को तो छोड़ नहीं रहे और बाहर से तीन लाने की तैयारी कर रहे हैं। बाघ जितने लंबे समय तक मानव संपर्क और कैद में रहता है, उसके मनुष्यों के प्रति अभ्यस्त होने का जोखिम उतना बढ़ जाता है, जिससे उसे दोबारा जंगल में सफलतापूर्वक प्राकृतिक जीवन अपनाने की संभावना कम हो सकती है।
आज, मेरे कैद होने के पंद्रह महीने बाद, वहीं पिछले कुछ महीनों में चार-पाँच बाघों का शिकार हो चुका है। केयर टेकर बताता है कि शायद अब वहाँ केवल एक बाघ बचा है। अगर मैं वहीं होता... तो शायद मेरा भी शिकार हो चुका होता।
मेरा गणित थोड़ा कमजोर है। जब मैं बीजापुर-नारायणपुर के जंगलों में घूमता था, तब वहां 10-12 बाघ थे। जो भी हो, मेरा शिकार करने का प्रयास किए पंद्रह महीने हो गए। मुझे स्वस्थ घोषित किए सात महीने हो गए। मैं जिंदा हूं, भले ही कैद में हूं, पर उसी बीजापुर और आसपास के इलाके में पिछले कुछ महीनों में चार से पांच बाघों का शिकार हो चुका है। केयर टेकर बता रहा था वहां सिर्फ एक बचा है। अगर मैं वहीं रहता रहा होता, तो हो सकता है मेरा भी शिकार हो जाता, मैं मर गया होता। ऐसे में आप बताइए, मैं यहां कैद में भाग्यशाली हूं या दुर्भाग्यशाली?
-सही-
बीजापुर टाइगर, 28 जुलाई 2026

