बिलासपुर। TODAY छत्तीसगढ़ / छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने भूमि अधिग्रहण के बदले मुआवजा भुगतान नहीं किए जाने से जुड़े एक मामले में राज्य सरकार के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई है। जस्टिस बिभू दत्त गुरु की एकलपीठ ने सरकार को अंतिम अवसर देते हुए 10 दिनों के भीतर यह साबित करने का निर्देश दिया है कि अधिग्रहित भूमि का मुआवजा याचिकाकर्ता के पिता को पूर्व में दिया जा चुका है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि इस संबंध में ठोस दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए तो न्यायालयीन आदेश की अवहेलना के मामले में सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
मामला याचिकाकर्ता विश्वनाथ नोनिया द्वारा दायर अवमानना याचिका से संबंधित है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि हाई कोर्ट द्वारा 7 सितंबर 2023 को दिए गए आदेश के बावजूद उन्हें भूमि अधिग्रहण का मुआवजा नहीं मिला। उस आदेश में न्यायालय ने सक्षम प्राधिकारी को निर्देश दिया था कि अधिग्रहित भूमि के मुआवजे का निर्धारण कर पांच माह के भीतर भुगतान सुनिश्चित किया जाए। निर्धारित समय सीमा बीत जाने के बाद भी भुगतान नहीं होने पर विश्वनाथ नोनिया ने तत्कालीन सचिव डॉ. कमल प्रीत सिंह सहित अन्य अधिकारियों के विरुद्ध अवमानना याचिका दायर की।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता सुशोभित सिंह ने तर्क दिया कि राज्य सरकार लगातार मामले को टालने का प्रयास कर रही है। उन्होंने बताया कि सरकार ने पहले पुनर्विचार याचिका दायर कर दावा किया था कि विवादित भूमि का मुआवजा याचिकाकर्ता के पिता को पहले ही दिया जा चुका है। हालांकि इस दावे के समर्थन में कोई दस्तावेज या विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया, जिसके चलते हाई कोर्ट ने 3 जुलाई 2025 को पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी थी।
वहीं राज्य सरकार की ओर से अधिवक्ता जितेंद्र पाली ने न्यायालय से अतिरिक्त समय की मांग करते हुए कहा कि शासन इस मामले में रिट अपील दायर करने के संबंध में महाधिवक्ता कार्यालय से विधिक राय प्राप्त कर रहा है। इसलिए जवाब प्रस्तुत करने के लिए कुछ और समय दिया जाए।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद न्यायालय ने कहा कि पुनर्विचार याचिका पहले ही खारिज हो चुकी है, ऐसे में सरकार को अपने दावे के समर्थन में प्रमाण प्रस्तुत करने होंगे। कोर्ट ने सरकार को केवल 10 दिनों की मोहलत देते हुए निर्देश दिया कि यदि मुआवजा वास्तव में याचिकाकर्ता के पिता को दिया गया है तो उसके ठोस दस्तावेज रिकॉर्ड पर प्रस्तुत किए जाएं। मामले की अगली सुनवाई 29 जून को निर्धारित की गई है। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि राज्य सरकार अपने दावे को साबित कर पाती है या नहीं।
