जंगल के मैदानों से राष्ट्रीय मंच तक : भारत की हॉकी विरासत को जीवित रखे हुए हैं जनजातीय समुदाय


रायपुर।
  TODAY छत्तीसगढ़  /  ओडिशा ने खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स-2026 में पुरुष और महिला दोनों वर्गों में हॉकी का स्वर्ण पदक जीतकर अपने दबदबे को साबित किया। रायपुर के सरदार वल्लभ भाई पटेल अंतरराष्ट्रीय हॉकी स्टेडियम में खेले गए फाइनल में पुरुष टीम ने झारखंड को 4-1 से हराया, जबकि महिला टीम ने रोमांचक मुकाबले में मिजोरम को 1-0 से मात दी। पुरुष वर्ग में झारखंड को रजत और छत्तीसगढ़ को कांस्य मिला, जबकि महिला वर्ग में झारखंड ने कांस्य पदक हासिल कर पोडियम पूरा किया।

रायपुर में खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स-2026 में ओडिशा की यह दोहरी स्वर्णिम सफलता केवल एक खेल उपलब्धि नहीं, बल्कि यह इस बात का सशक्त उदाहरण है कि कैसे हॉकी ओडिशा, झारखंड और छत्तीसगढ़ के जनजातीय क्षेत्रों में जीवन को नई दिशा दे रही है। खेल प्रतिभा के भंडार माने जाने वाले पूर्वोत्तर राज्यों ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, जहां मिजोरम की टीम ने फाइनल तक जगह बनाई।

ओडिशा की पुरुष टीम ने फाइनल में झारखंड को 4-1 से हराया, जबकि महिला टीम ने कड़े मुकाबले में मिजोरम को 1-0  से पराजित किया। झारखंड और छत्तीसगढ़ की टीमें भी पोडियम तक पहुंचीं, जो इन क्षेत्रों से उभरती प्रतिभा की गहराई को दर्शाता है। लेकिन पदकों से आगे बढ़कर असली कहानी उन गांवों, जंगलों और समुदायों में छिपी है, जहां हॉकी पहचान और अवसर दोनों बन चुकी है। दशकों से हॉकी जनजातीय संस्कृति का हिस्सा रही है। बच्चे पेड़ की टहनियों से स्टिक बनाकर ऊबड़-खाबड़ मैदानों पर नंगे पांव खेलते हैं। प्रतिभा हमेशा मौजूद थी, लेकिन उसे आगे बढ़ाने का रास्ता नहीं था—जो अब बदल रहा है।

केंद्रीय खेल मंत्रालय और राज्यों द्वारा संचालित सेंटर ऑफ एक्सीलेंस, बेहतर बुनियादी ढांचे और संगठित जमीनी कार्यक्रमों के चलते अब एक मजबूत खेल पारिस्थितिकी तंत्र विकसित हो रहा है। 1992 बार्सिलोना ओलंपिक में भारतीय टीम का हिस्सा रहे पूर्व ओलंपियन अजीत लकड़ा, जो वर्तमान में बिलासपुर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के मुख्य कोच हैं, इस बदलाव को करीब से देख रहे हैं। उन्होंने कहा, “ग्रासरूट से लेकर जूनियर और फिर सीनियर स्तर तक पूरी प्रणाली धीरे-धीरे मजबूत हो रही है। खासकर जनजातीय क्षेत्रों के खिलाड़ी इससे काफी लाभान्वित हो रहे हैं। उनकी प्राकृतिक प्रतिभा को अब सही मार्गदर्शन और प्रशिक्षण के जरिए निखारा जा रहा है।”

लकड़ा का मानना है कि यह संरचित सहयोग एक सकारात्मक श्रृंखला बना रहा है। उन्होंने कहा, “जब बच्चे यहां आकर सीखते हैं और अच्छा प्रदर्शन करते हैं, तो वे दूसरों को प्रेरित करते हैं। इससे लगातार नए खिलाड़ी सामने आ रहे हैं।” जो क्षेत्र कभी सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों और नक्सलवाद से प्रभावित थे, वहां अब खेल के माध्यम से एक शांत बदलाव देखने को मिल रहा है। हॉकी एक सेतु बनकर इन समुदायों को मुख्यधारा से जोड़ रही है। खेल मंत्रालय का ‘अस्मिता’ कार्यक्रम अधिक से अधिक महिला खिलाड़ियों को जोड़कर उन्हें मुख्यधारा में ला रहा है।

1984 लॉस एंजेलिस ओलंपिक में भारतीय टीम का हिस्सा रहे पूर्व ओलंपियन मनोहर टोपनो, जिन्होंने झारखंड और छत्तीसगढ़ की पुरुष टीमों को कोचिंग दी है, ने खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स जैसी पहल के जमीनी प्रभाव को रेखांकित किया। उन्होंने कहा, “मैं इस ग्रासरूट टूर्नामेंट के आयोजन के लिए साई का धन्यवाद करना चाहता हूं। हमारे समुदायों के लड़के और लड़कियां आगे बढ़ रहे हैं और खुद को नई पहचान दे रहे हैं। अगर हम ऐसे ही आगे बढ़ते रहे, तो एक दिन ये खिलाड़ी भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे।”

टोपनो ने प्रतिभा के पीछे की एक अहम सच्चाई पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा, “हमारे जनजातीय समुदायों में हॉकी स्वाभाविक रूप से खेली जाती है। अगर हम इन क्षेत्रों पर ध्यान दें, तो हमारे खिलाड़ी आगे बढ़ेंगे और देश का नाम रोशन करेंगे।” एक और महत्वपूर्ण बदलाव खेल विज्ञान, फिजियोथेरेपी और वीडियो विश्लेषण जैसी सुविधाओं का पहुंचना है, जो पहले केवल शीर्ष स्तर तक सीमित थीं। अब दूरदराज के क्षेत्रों के खिलाड़ी भी पेशेवर प्रशिक्षण वातावरण का लाभ उठा रहे हैं। पारंपरिक स्वाभाविक खेल और आधुनिक कोचिंग का यह मेल प्रदर्शन के नए स्तर खोल रहा है।

झारखंड की पूर्व खिलाड़ी और हॉकी इंडिया की सदस्य असृता लकड़ा ने कहा, “इन क्षेत्रों के बच्चों के खून में हॉकी बसती है, इसलिए वे स्वाभाविक रूप से इस खेल की ओर आकर्षित होते हैं। खेलो इंडिया जैसे प्लेटफॉर्म ने उन्हें दिशा दी है।”उन्होंने आगे कहा, “बेहतर सुविधाओं, प्रशिक्षण और एक्सपोजर के कारण अब खिलाड़ी राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच रहे हैं। उनका मनोबल बढ़ा है और प्रदर्शन में स्पष्ट सुधार दिख रहा है।”

अब इसका प्रभाव केवल कहानियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि नतीजों, प्रतिनिधित्व और बढ़ती महत्वाकांक्षा में साफ दिखाई दे रहा है। जनजातीय खिलाड़ी अब सिर्फ भाग लेने वाले नहीं, बल्कि दावेदार, चैंपियन और भविष्य के अंतरराष्ट्रीय सितारे बन रहे हैं।

रायपुर में ओडिशा का यह स्वर्णिम प्रदर्शन एक बड़े आंदोलन का प्रतीक है—जहां गांव उत्कृष्टता के केंद्र बन रहे हैं और हॉकी एक पूरी पीढ़ी के सपनों को नई दिशा दे रही है। बस्तर के धूल भरे मैदानों से लेकर रायपुर के भरे स्टेडियम तक, इन खिलाड़ियों की यात्रा न केवल भारतीय हॉकी, बल्कि जनजातीय भारत के सामाजिक ताने-बाने को भी बदल रही है।

जग्गी हत्याकांड: सरेंडर आदेश पर अमित जोगी का बड़ा बयान—“मेरे साथ गंभीर अन्याय हुआ है”


बिलासपुर। 
TODAY छत्तीसगढ़  /  बहुचर्चित जग्गी हत्याकांड में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट द्वारा दिए गए सरेंडर के आदेश के बाद राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। गुरुवार 2 अप्रैल को चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की डिवीजन बेंच ने अमित जोगी को तीन सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है।

हाई कोर्ट के इस फैसले के तुरंत बाद जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जेसीसीजे) के अध्यक्ष अमित जोगी ने सोशल मीडिया के जरिए अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने उच्च न्यायालय के आदेश को अपने साथ “गंभीर अन्याय” बताया है। न्यायालय के आदेश के तुरंत बाद सोशल मीडिया X पर अमित जोगी ने लिखा- 

प्रिय मित्रों और शुभचिंतकों 🙏

आज माननीय उच्च न्यायालय ने मेरे विरुद्ध CBI की अपील को मात्र 40 मिनट में स्वीकार कर लिया- बिना सुनवाई का अवसर दिए। 

मुझे खेद है कि जिस व्यक्ति को अदालत ने दोषमुक्त किया था, उसे बिना सुनवाई का एक भी अवसर दिए दोषी करार दिया गया। यह अप्रत्याशित है। अदालत ने मुझे 3 सप्ताह के अंदर सरेंडर करने का समय दिया है।

मुझे लगता है कि मेरे साथ गंभीर अन्याय हुआ है। मुझे पूरा विश्वास है कि सर्वोच्च न्यायालय से मुझे न्याय अवश्य मिलेगा। 

मैं न्याय व्यवस्था पर पूरा विश्वास रखता हूँ। मैं पूर्ण शांति, आस्था और धैर्य के साथ आगे बढ़ रहा हूँ। सत्य की जीत अवश्य होगी।

आप सभी से आग्रह है कि मेरे लिए प्रार्थना करें और अपना आशीर्वाद बनाए रखें।

जय छत्तीसगढ़ 🙏  

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गौरतलब है कि हाई कोर्ट ने हाल ही में सीबीआई की अपील स्वीकार करते हुए पूर्व के आदेश को पलट दिया और अमित जोगी को तीन सप्ताह के भीतर सरेंडर करने का निर्देश दिया है। इस घटनाक्रम के बाद राजनीतिक गलियारों में भी हलचल बढ़ गई है। जहां एक ओर विपक्ष इस मामले को लेकर सवाल उठा सकता है, वहीं जोगी समर्थक इसे राजनीतिक और कानूनी लड़ाई का हिस्सा बता रहे हैं। फिलहाल सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि अमित जोगी आगे क्या कानूनी कदम उठाते हैं और इस मामले में अगला घटनाक्रम क्या होता है।

दोस्ती का खौफनाक अंत ! जंगल में लटके मिले शव, आत्महत्या या साजिश?


कोरबा। 
TODAY छत्तीसगढ़  /  जिले के बाल्को थाना क्षेत्र अंतर्गत बेलाकछार जंगल में गुरुवार को उस समय सनसनी फैल गई, जब एक ही पेड़ पर दो युवकों के शव फंदे से लटके मिले। घटना की सूचना मिलते ही इलाके में दहशत का माहौल बन गया। मृतकों की पहचान प्रमोद कंवर (28) और अमित माथुर (27) के रूप में हुई है। दोनों एक ही बस्ती के रहने वाले थे और आपस में गहरे मित्र बताए जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि सुबह ग्रामीण रोजमर्रा की तरह जंगल की ओर गए थे। इसी दौरान उनकी नजर एक पेड़ पर लटके दो शवों पर पड़ी। यह भयावह दृश्य देखते ही ग्रामीणों के होश उड़ गए और उन्होंने तत्काल इसकी सूचना पुलिस को दी।

सूचना मिलते ही बाल्को थाना पुलिस मौके पर पहुंची और दोनों शवों को नीचे उतरवाकर पंचनामा कार्रवाई शुरू की। घटनास्थल को घेरकर जांच की जा रही है। पुलिस ने आसपास के क्षेत्र से साक्ष्य जुटाने के साथ ही पूरे घटनाक्रम को बारीकी से समझने का प्रयास शुरू कर दिया है। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि दोनों युवक भारत एल्युमिनियम लिमिटेड (बाल्को) में ठेका श्रमिक के रूप में कार्यरत थे, लेकिन बीते करीब एक माह से काम पर नहीं जा रहे थे। दोनों शादीशुदा थे, जिनमें से एक युवक का एक छोटा बच्चा भी है।

पुलिस ने मामले को प्रथम दृष्टया संदिग्ध मानते हुए आत्महत्या सहित अन्य सभी संभावनाओं पर जांच शुरू कर दी है। परिजनों और आसपास के लोगों से पूछताछ की जा रही है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि घटना के पीछे किन परिस्थितियों ने जन्म लिया। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही मौत के वास्तविक कारणों का खुलासा हो सकेगा। फिलहाल घटनास्थल से मिले साक्ष्यों और परिस्थितियों के आधार पर मामले की हर कड़ी को जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार की घटनाओं के पीछे मानसिक तनाव, पारिवारिक दबाव, आर्थिक तंगी या आपसी विवाद जैसे कारण हो सकते हैं। हालांकि, किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले जांच पूरी होना आवश्यक है। घटना के बाद पूरे इलाके में चर्चा का माहौल है और लोग इस घटना को लेकर तरह-तरह की आशंकाएं जता रहे हैं। पुलिस ने लोगों से अफवाहों से दूर रहने और जांच में सहयोग करने की अपील की है। 

बिलासपुर पुलिस द्वारा जनहित में जारी


हाई कोर्ट: जग्गी हत्याकांड में 23 साल बाद पलटा फैसला, अमित जोगी को सरेंडर का आदेश


बिलासपुर। 
TODAY छत्तीसगढ़  /  छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित रामअवतार जग्गी हत्याकांड में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने गुरुवार को बड़ा और अहम फैसला सुनाते हुए पूरे मामले को नई दिशा दे दी। अदालत ने पूर्व में पारित आदेशों को पलटते हुए सीबीआई की अपील स्वीकार कर ली है और इस मामले के प्रमुख आरोपी अमित जोगी को दोषी मानते हुये तीन सप्ताह के भीतर न्यायालय में आत्मसमर्पण (सरेंडर) करने का निर्देश दिया है। डिवीजन बेंच के इस आदेश से करीब 23 वर्ष पुराने इस हत्याकांड में एक बार फिर न्यायिक प्रक्रिया तेज हो गई है और मामले ने नया मोड़ ले लिया है। आपको बता दें कि छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के पुत्र हैं अमित जोगी जो वर्तमान में जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जेसीसीजे) के प्रदेश अध्यक्ष भी हैं। हालांकि पिता की मृत्यु के बाद अमित जोगी का राजनैतिक भविष्य करीब-करीब हाशिये पर ही था। 

 सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर फिर खुली फाइल

दरअसल, इस मामले में सतीश जग्गी और CBI ने पूर्व में हाई कोर्ट के आदेशों को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में अलग-अलग याचिकाएं दायर की थीं। सुप्रीम कोर्ट ने 6 नवंबर 2025 को पारित आदेश में याचिका दायर करने में हुई देरी को क्षमा करते हुए मामले को पुनर्विचार के लिए छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट वापस भेज दिया था। साथ ही निर्देश दिया था कि सुनवाई के दौरान CBI, राज्य शासन और वास्तविक शिकायतकर्ता को आवश्यक पक्षकार बनाया जाए।

 डिवीजन बेंच ने पलटे पुराने फैसले

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार वर्मा की डिवीजन बेंच में हुई सुनवाई के दौरान सभी पक्षों की दलीलें सुनी गईं। CBI की ओर से अधिवक्ता वैभव ए. गोवर्धन तथा राज्य की ओर से उप महाधिवक्ता डॉ. सौरभ पांडे ने संयुक्त रूप से पक्ष रखा। अदालत को बताया गया कि वर्ष 2007 में ही निचली अदालत के फैसले के विरुद्ध अपील की अनुमति मांगी गई थी, जिसे बाद में तकनीकी आधारों पर खारिज कर दिया गया था। सुनवाई के बाद कोर्ट ने वर्ष 2011 में पारित आदेशों को पलटते हुए CBI की अपील को स्वीकार कर लिया।

 तकनीकी आधार पर खारिज हुई थीं याचिकाएं

गौरतलब है कि इससे पहले हाई कोर्ट ने राज्य की अपील को अस्वीकार्य मानते हुए खारिज किया था। CBI की याचिका को विलंब के आधार पर निरस्त कर दिया गया था। वहीं सतीश जग्गी की पुनरीक्षण याचिका भी खारिज हो गई थी। अब सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद इन सभी बिंदुओं पर पुनर्विचार किया गया।

अमित जोगी को तीन सप्ताह में सरेंडर का आदेश

ताजा फैसले में हाई कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि आरोपी अमित जोगी तीन सप्ताह के भीतर न्यायालय के समक्ष आत्मसमर्पण करें। साथ ही कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि गंभीर आपराधिक मामलों में केवल तकनीकी आधारों पर अपीलों को खारिज करना न्याय के हित में नहीं माना जा सकता।

 क्या है पूरा हत्याकांड?

4 जून 2003 को रामअवतार जग्गी की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस मामले में पुलिस ने 31 आरोपियों को नामजद किया था। ट्रायल के दौरान दो आरोपी सरकारी गवाह बन गए, जबकि 28 आरोपियों को दोषी ठहराया गया। हालांकि, अमित जोगी को बाद में बरी कर दिया गया था, जिसे लेकर लंबे समय से कानूनी लड़ाई जारी थी।

 कौन थे रामअवतार जग्गी?

रामअवतार जग्गी व्यवसायिक पृष्ठभूमि से जुड़े प्रभावशाली नेता थे और पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल के करीबी माने जाते थे। जब विद्याचरण शुक्ल कांग्रेस छोड़कर NCP में शामिल हुए, तब जग्गी भी उनके साथ पार्टी में गए और उन्हें छत्तीसगढ़ में NCP का कोषाध्यक्ष बनाया गया था।

 राजनीतिक और कानूनी हलकों में हलचल

हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद प्रदेश की राजनीति और कानूनी गलियारों में हलचल तेज हो गई है। लंबे समय से ठंडे बस्ते में पड़े इस मामले के फिर से सक्रिय होने से आने वाले दिनों में कई अहम घटनाक्रम सामने आने की संभावना है।

हत्याकांड में ये हैं दोषी 

 जग्गी हत्याकांड में अभय गोयल, याहया ढेबर, वीके पांडे, फिरोज सिद्दीकी, राकेश चंद्र त्रिवेदी, अवनीश सिंह लल्लन, सूर्यकांत तिवारी, अमरीक सिंह गिल, चिमन सिंह, सुनील गुप्ता, राजू भदौरिया, अनिल पचौरी, रविंद्र सिंह, रवि सिंह, लल्ला भदौरिया, धर्मेंद्र, सत्येंद्र सिंह, शिवेंद्र सिंह परिहार, विनोद सिंह राठौर, संजय सिंह कुशवाहा, राकेश कुमार शर्मा, (मृत) विक्रम शर्मा, जबवंत और विश्वनाथ राजभर दोषी हैं। 

 न्यायालय से मिली जीत के बाद स्वर्गीय रामवतार जग्गी के बेटे सतीश जग्गी ने मीडिया से बात करते हुये इसे सत्य की जीत बताया और न्याय वयवस्था के प्रति आभार प्रकट किया। 

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